एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अतुल सिन्हा)। उत्तर प्रदेश में डबल इंजन और बुल्डोजर का मंत्र कुछ इस कदर सिर चढ़कर बोला कि विपक्षी गठबंधन के सपने चकनाचूर हो गए। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग पूरी तरह फेल हुई तो प्रियंका गांधी का लड़की हूं, लड़ सकती हूं का जबरदस्त अभियान फ्लॉप हो गया। बेशक समाजवादी पार्टी एक मजबूत विपक्ष बनकर जरूर उभरने में कामयाब रहा। अगर आपने अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी के अभियानों और सभाओं की भीड़ देखी होगी और खासकर अखिलेश यादव के हौसले देखे होंगे तो यह मानना मुश्किल हो रहा होगा कि आखिर नतीजे ऐसे कैसे आ गए। लेकिन भाजपा की जो कार्यशैली रही है और जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम दिग्गज नेताओं ने खुद को यूपी पर केन्द्रित किया है, उससे ये नतीजे बहुत हैरत नहीं पैदा करते। दरअसल, पिछले कई सालों से यूपी की सियासत एक खास दिशा में चलती रही है और अगर आप भाजपा की रणनीतियों पर गौर करें तो उसका सबसे बड़ा रणक्षेत्र यही प्रदेश रहा है। बेशक राम मंदिर और अयोध्या अब विवादास्पद या चुनावी मुद्दा न रहा हो, लेकिन मंदिर की राजनीति और हिन्दुत्व की प्रयोगशाला में भाजपा ने इस प्रदेश में अपनी पुख्ता जमीन जरूर तैयार कर ली है। उसे सबसे बड़ा फायदा अगर मिला है तो वह है यहां के बिखरे हुए और कमजोर विपक्ष का। सपा के दागदार अतीत और बसपा की लगातार कमजोर होती जमीन, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की बदहाली और इन तमाम पार्टियों से लोगों का तेजी से मोहभंग, भाजपा के लिए हमेशा से फायदेमंद रहा है। बतौर विपक्ष अगर देखें तो इस बार समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर से खड़े होने की कोशिश जरूर की है। चुनाव से पहले के गठबंधन की जो रणनीति बनी थी बेशक उस पर कई सवाल अब उठेंगे और उसकी खामियों का भी विश्लेषण जरूर होगा। लेकिन इतना तो जरूर है कि जब विपक्ष इतने खेमों में बंटा हो और सबके अपने-अपने अहंकार हों तो भला आप भाजपा जैसी पार्टी को सत्ता से कैसे उखाड़ सकते हैं। यूपी के चुनावी गणित कम पेचीदा नहीं हैं। जातिगत आधार पर देखें या धर्म-संप्रदाय के आधार पर, यहां मुख्य मुद्दे हर बार कहीं न कहीं गुम हो जाते हैं और वोटों का ध्रुवीकरण इन आपसी बयानबाजियों और आरोपों-प्रत्यारोपों के भावनात्मक जाल में उलझ कर रह जाता है। यूपी में जिस विपक्ष को कोरोना में सरकार की नाकामी, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्या, छुट्टा पशु से त्रस्त किसान, लखीमपुर कांड या महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे अहम लग रहे थे, वहीं भाजपा के लिए इनकी कोई अहमियत नहीं थी। विपक्ष लगातार लोगों में ये अवधारणा बनाने की कोशिश करता रहा कि योगी सरकार तमाम मोर्चों पर नाकाम रही है, वहीं योगी और उनकी टीम डबल इंजन, विकास की गाथाएं, सरकारी योजनाओं के लाभ को अंतिम आदमी तक पहुंचाने के साथ गुंडों, दंगइयों पर बुल्डोजर चलाने के साथ-साथ वाराणसी, अयोध्या और अन्य धर्मस्थलों के कायाकल्प की बात करते रहे। बेशक उनके लाभार्थियों ने उनकी बात सुनी और उन्हें दोबारा मौका दे दिया। लेकिन अब ये अहम सवाल है कि क्या इन नतीजों की रोशनी में हमें सपा या विपक्ष को एकदम कमजोर या असरहीन मान लेना चाहिए? क्या इसे 2024 में मोदी को वॉकओवर देने वाले नतीजे के तौर पर देखा जाना चाहिए? या फिर इससे सीख लेकर विपक्ष को नए और धारदार तरीके से अपनी रणनीति तैयार करने के तौर पर देखा जाना चाहिए। बेशक भाजपा ने यूपी में इतिहास रचा है। पहली बार प्रदेश में कोई सरकार दोबारा बनी है। इसने कई मिथक भी तोड़े हैं लेकिन पिछली बार की तुलना में देखें तो अखिलेश यादव की सपा को भी लोगों ने नकारा नहीं है। पिछली बार जहां विपक्ष सत्ता पक्ष के आगे कहीं नहीं ठहरता था, वहां इस बार वह एक मजबूत ताकत के तौर पर जरूर उभरा है। कांग्रेस को जरूर आत्ममंथन करने की जरूरत है कि आखिर उनकी स्टार महासचिव और लोगों से सीधा कनेक्ट करने वाली, भावनात्मक तौर पर जुड़ने की कोशिश करने वाली प्रियंका गांधी को भी लोगों ने क्यों ठुकरा दिया और क्यों अब कांग्रेस का वजूद इस नई पीढ़ी के नेतृत्व में लगातार खतरे में पड़ता दिख रहा है। अगर अब भी कांग्रेस अपने नेतृत्व में बदलाव और संगठन की खामियों को लेकर गंभीर नहीं हुई तो आने वाले कुछ राज्यों के चुनावों के साथ-साथ 2024 में उसकी हालत और खस्ता हो सकती है। यूपी तो एक बानगी भर है। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग अब आम लोगों को या उनके तथाकथित वोट बैंक को कमरे में बंद होकर नहीं पसंद आ रही। न तो उनमें वो धार बची, न सियासत करने का वो जज्बा। ऊपर से उनके भाजपा के साथ दोस्ताना रिश्तों की चर्चा और आने वाले वक्त में उपराष्ट्रपति बनने की महत्वाकांक्षा। अब पता नहीं भाजपा के साथ भीतर ही भीतर उनकी क्या बात हुई कि उन्होंने पूरी पार्टी को ही दांव पर लगा दिया। ऐसे में अब भी अगर यूपी के लोगों के लिए उम्मीद की कोई किरण हैं तो वे थोड़े-बहुत अखिलेश यादव ही हैं। बेशक इस बार अखिलेश यादव ने अपने गठबंधन और प्रत्याशियों के चयन में कई रणनीतिक गलतियां कीं, जिसका खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। सपा के दागदार इतिहास को दोहराते हुए उन्होंने एक बार फिर ऐसे ही कई दागदार उम्मीदवार उतारने की गलती की। अपने सहयोगियों में न तो राष्ट्रीय लोकदल को सही प्रतिनिधित्व दे पाए और चाचा शिवपाल यादव को खुश करने के चक्कर में अपने ही कुछ लोगों को नाराज होने से भी नहीं बचा पाए। इससे कम से कम उन्हें पचास सीटों का नुकसान तो हुआ ही। जाहिर है ये सपा की अंदरूनी चिंता का विषय है और अखिलेश की टीम इसकी समीक्षा करेगी। लेकिन फिलहाल तो अगले पांच साल एक बार फिर योगी आदित्यनाथ और भाजपा के खाते में चले गए। जाहिर है हर पार्टी अपनी हार की रणनीतिक खामियों की समीक्षा करेगी, कुछ समय बाद फिर से उठ खड़ी भी होगी। कुछ का मोहभंग होगा तो कुछ फिर से सत्ताधारी पार्टी की तरफ दौड़ लगाएंगे, लेकिन सियासत में जंग कभी खत्म नहीं होती। खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश और सत्ता के दांवपेंच कभी कम नहीं होते। फिलहाल, यूपी में जश्न का माहौल है। भाजपा की जबरदस्त कामयाबी के बीच अब सबकी निगाह साल 2024 के इंतजार में है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सूरज शाहदेव)। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध पर दुनियाभर की नजर है।युध्द से पहले एक आशंका थी कि कही यह तीसरा विश्व युद्ध की शुरूआत न कर दे। लेकिन रूस के यूक्रेन में आक्रमण के बाद अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देश यूक्रेन का साथ दे रहे है। तो वही दूसरी तरफ रशियन संगठन के 11 देशों के सेना मिलकर इस युद्ध मे भाग ले रहे है। यूक्रेन के साथ साथ पूरे विश्व को लगता था की अगर रूस यूक्रेन पर हमला करेगा तो नाटो देश की सेना यूक्रेन के साथ मिलकर रूसी सेना के साथ लड़ेंगे लेकिन जो नजारा देखने को मिल रहा है वह सोच से उलट है। ये नाटो के देश सिर्फ बन्दर घुड़की दे रहे थे सैन्य मदद से पूरी तरह से पीछे हट गए है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने तो अपने सेना भेजने से साफ इंकार कर दिया है। रूस ने साफ साफ कहा है कि जो भी देश यूक्रेन के पक्ष में लड़ने आएगा उसे गंभीर अंजाम भुगतने पड़ेंगे। अभी भारत के सामने बड़ी चुनौती है कि आखिर वह इस मसले पर क्या रुख अख्तियार करे। दरअसल रूस भारत का लंबे समय से मित्र देश रहा है और अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक महत्ता का देश है। लिहाजा भारत दोनों में से किसी भी देश के साथ अपने संबंध खराब नहीं करना चाहेगा। भारत शुरू से ही गुटनिरपेक्ष देश रहा है।प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूएसएसआर का गठन किया गया था और यूक्रेन भी इसका हिस्सा था। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने नाटो का गठन किया। और 1945 से लेकर 1991 तक लगातार रूस और अमेरिका के बीच शीत युद्ध चलता रहा। इस युद्ध मे कोई सेना नही कोई हथियार नही बल्कि मीडिया और बयानों के माध्यम से रूस को कमजोर करने की कोशिश होती रही। अमेरिका लगातार रूस को तोड़कर कमजोर करने की कोशिश में रहा। आखिरकार अमेरिका को यह सफलता 1991 में मिल ही गया और रूस से लगभग 15 देश अलग हो गए जिसमे यूक्रेन भी शामिल था। ब्लादिमीर पुतिन जब रूस के प्रधानमंत्री और बाद में राष्ट्रपति बने तब से वे लगातार रूस को मजबूत करने की कोशिश करते रहे जो देश रूसी संगठन से अलग हो गए थे उन्हें फिर से अपने साथ लाने में सफल हो गए। लेकिन 2010 में जब यूक्रेन ने रूस का विरोध करके नाटो में शामिल होने की कवायद शुरू की तो रूस नाराज हो गया। रूस-यूक्रेन के बीच तनाव नवंबर 2013 में तब शुरू हुआ जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का कीव में विरोध शुरू हुआ. यानुकोविच को रूस का समर्थन हासिल था जबकि प्रदर्शनकारियों को अमेरिका और ब्रिटेन का. बगावत के चलते फरवरी 2014 में यूक्रेन के राष्ट्रपति यानुकोविच को देश छोड़कर रूस में शरण लेनी पड़ी थी। रूस ने 2014 में यूक्रेन के एक आइलैंड क्रीमिया पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया। तब यूक्रेन और रसिया के बीच तनाव और बढ़ गया। वास्तव में रूस नही चाहता है कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो। नाटो एक सैन्य समूह है जिसमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश शामिल हैं। अब रूस के सामने चुनौती यह है कि उसके कुछ पड़ोसी देश पहले ही नाटो में शामिल हो चुके हैं। इनमें एस्टोनिया और लातविया जैसे देश हैं, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे। अब अगर यूक्रेन भी नाटो का हिस्सा बन गया तो रूस हर तरफ से अपने दुश्मन देशों से घिर जाएगा और अमेरिका जैसे देश उस पर हावी हो जाएंगे। अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बन जाता है और रूस भविष्य में उस पर हमला करता है तो समझौते के तहत इस समूह के सभी 30 देश इसे अपने खिलाफ हमला मानेंगे और यूक्रेन की सैन्य सहायता भी करेंगे। रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन ने एक बार कहा था कि यूक्रेन को खोना रूस के लिए एक शरीर से अपना सिर काट देने जैसा होगा। यही कारण है कि रूस नाटो में यूक्रेन के प्रवेश का विरोध कर रहा है। यूक्रेन रूस की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। जब 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस पर हमला किया गया तो यूक्रेन एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जहां से रूस ने अपनी सीमा की रक्षा की थी। अब अगर यूक्रेन नाटो देशों के साथ चला गया तो रूस की राजधानी मास्को, पश्चिम से सिर्फ 640 किलोमीटर दूर होगी। फिलहाल यह दूरी करीब 1600 किलोमीटर है।इसे लेकर ही रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन नही चाहते थे कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो और रूस के लिए खतरा बने। अब इन दोनों देशों के बीच छिड़ी जंग में पूरी दुनिया की नजर भारत के रुख पर है। अमेरिका सहित यूरोपियन देश चाहते है कि भारत रूस की आलोचना करे। लेकिन भारत अपनी सुरक्षा हित को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेगा। भारत का सम्बंध रूस के साथ बहुत ही अच्छा है। भारत की 55 प्रतिशत सैन्य उपकरण रूस से ही आयात होते है। रूस जरूरत के समय खुल कर भारत का साथ देता रहा है। रूस भारत और चीन विवाद के बीच तटस्थ रुख अपनाया है। 1998 का परमाणु परीक्षण हो या फिर कश्मीर का मसला हो रूस हमेशा भारत के पक्ष में रहा है। ऐसे समय मे अगर भारत रूस के खिलाफ जाएगा तो चीन रूस के और नजदीक आएगा जो भारत के लिए खतरनाक हो सकता है।अत: भारत कभी अपने मित्र देश को नाराज नही करना चाहेगा। अभी पिछले 10 सालों से अमेरिका के साथ भी भारत का सम्बंध बहुत ही प्रगाढ़ हुआ है। अमेरिका भारत के साथ मिलकर क्वाड का गठन किया है जिसमे अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया एवम भारत शामिल है। इस क्वाड का गठन एशिया में चीन कि बढ़ती प्रभाव के खिलाफ किया गया है। अमेरिका भी अच्छी तरह से जानता है कि दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत एक बहुत ही अहम देश है अत: अमेरिका भी भारत को नाराज नही करना चाहेगा। जिस प्रकार से चीन और पाकिस्तान रूस के साथ अपना सम्बन्ध को मजबूत बनाने में लगे हुए है इसको लेकर भी भारत सतर्क है। यूक्रेन और रूस के मामले में भारत कोई भी फैसला लेगा तो इस बात पर भी गौर जरूर करेगा। अत: भारत रूस एवम अमेरिका दोनों को ही नाराज नही करना चाहेगा।
एबीएन कैरियर डेस्क (विनय उमरजी)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही भारत में निजी भागीदारी बढ़ाने का आह्वान कर रहे हों ताकि छात्रों को चिकित्सा अध्ययन के लिए विदेश जाने की जरूरत महसूस न हो, लेकिन उद्योग का मानना है कि यह दायित्व सरकार का है। मोदी ने हाल ही में एक वेबिनार में कहा था आज हमारे बच्चे पढ़ने के लिए छोटे देशों में जा रहे हैं, खास तौर पर चिकित्सा शिक्षा में। वहां भाषा की दिक्कत होती है। फिर भी वे जा रहे हैं ... क्या हमारा निजी क्षेत्र इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर प्रवेश नहीं कर सकता है? क्या हमारी राज्य सरकारें इस संबंध में भूमि आवंटन के लिए अच्छी नीतियां नहीं बना सकतीं? हालांकि कई उद्योग पर्यवेक्षकों और हितधारकों का कहना है कि सस्ती जमीन उपलब्ध कराने वाली राज्य सरकारें अकेले ही सरकारी और निजी या स्व-वित्तपोषित मेडिकल कॉलेजों के बीच मौजूदा मूल्य अंतर को पूरा नहीं कर सकती हैं। जहां एक ओर सरकारी कॉलेजों और सरकारी कोटे में 4.5 वर्षीय एमबीबीएस कार्यक्रम के लिए मेडिकल सीटों की लागत 15,000 रुपये सालाना होती है, वहीं दूसरी ओर निजी कॉलेजों में यह लागत सालाना 5-6 लाख रुपये और 15-17 लाख रुपये के बीच रहती है। गुजरात में एक स्व-वित्तपोषित कॉलेज के डीन ने नाम न छापने की शर्त पर कहा यहां तक कि ग्रामीण इलाके में भी किसी निजी कॉलेज की स्थापना के लिए करोड़ों रुपये की जरूरत होती है और यहां जमीन की समस्या सबसे कम होती है। डीन ने कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के अंतर्गत सरकारी मानदंड यह बात विनियमित करते हैं कि कॉलेज की प्रत्येक मेडिकल सीट के लिए उसे 4-5 गुना अधिक संख्या वाले बेड के साथ अस्पताल चलाने की भी जरूरत होती है। इसके अलावा प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय अन्य बुनियादी ढांचा और संकाय का वेतन भी रहता है। उदाहरण के लिए हमारे अपने पुस्तकालय की लागत हमें प्रति वर्ष 80 लाख रुपये से 90 लाख रुपये पड़ती है। चीन तथा यूक्रेन, फिलिपींस और किर्गिस्तान जैसे छोटे देश कहीं ज्यादा किफायती विकल्प प्रदान करते हैं, जबकि भारतीय योग्यता मानकों की जरूरत नहीं होती है। अहमदाबाद में विदेशी शिक्षा सलाहकार समीर यादव ने कहा कि जहां भारत में निजी चिकित्सा शिक्षा की लागत 80 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये के बीच है, वहीं दूसरी ओर चीन और फिलिपींस जैसे देशों में इसकी लागत 25 लाख रुपये है। बेलारूस में यह 30 लाख रुपये और रूस में 40 से 45 लाख रुपये है। यादव ने कहा इसके अलावा इन देशों के चिकित्सा कार्यक्रमों को अमेरिका और ब्रिटेन में मान्यता प्राप्त है और स्नातकों को पश्चिमी देशों में केवल लाइसेंसिंग परीक्षा पास करने की ही आवश्यकता होती है। विदेशी चिकित्सा शिक्षा सलाहकार करियर एक्सपर्ट के संस्थापक गौरव त्यागी का विचार है कि सरकार को किफायती फीस के साथ सरकार द्वारा संचालित कॉलेजों और मेडिकल सीटों की संख्या में विस्तार करने की जरूरत है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय सहित कई सूत्रों का हवाला देते हुए नैशनल मेडिकल जर्नल आॅफ इंडिया में प्रकाशित तथा एनएमसी के अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड की अध्यक्ष अरुणा वाणीकर द्वारा सह-लेखन वाले एक वर्किंग पेपर में कहा गया है कि वर्ष 2020 में हालांकि भारत में 80,312 एमबीबीएस सीटें उपलब्ध थीं (इनमें से करीब 51 प्रतिशत सरकारी कोटे वाली थीं), लेकिन राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में बैठने वाले छात्रों की 14 लाख की विशाल संख्या थी। नवीनतम अनुमानों के अनुसार, जहां वर्ष 2021 में नीट के आवेदनों की संख्या वर्ष 2018 की 13.3 लाख से बढ़कर वर्ष 2021 में करीब 16 लाख हो गई है, वहीं दूसरी ओर एमबीबीएस की उपलब्ध सीटों की संख्या 88,000 से कुछ अधिक है। त्यागी ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा के लिए जो छात्र विदेश जाते हैं, वे मुख्य रूप से चीन, रूस, यूक्रेन, फिलिपींस, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और जॉर्जिया जैसे देशों में जाते हैं। इस बात के बावजूद ऐसा है कि इनमें से कई देशों में, जिनमें चीन, रूस और यूक्रेन भी शामिल है, उनकी स्थानीय भाषा सीखने की आवश्यकता होती है, जिसे भारतीय छात्र भारत में पर्याप्त सीटों की कमी और नीट में खराब प्रदर्शन के कारण पांच से छह महीने में पूरा कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि इस बहिर्वाह को रोकने के लिए न केवल सरकारी सीटों की संख्या में वृद्धि करने की जरूरत है, बल्कि मेरिट कट-आॅफ पर फिर से विचार करने के अलावा निजी कॉलेजों द्वारा ली जाने वाली फीस को भी विनियमित करने की आवश्यकता है। वर्ष 2021 में नीट कट-आॅफ पासिंग मार्क्स और पर्सेंटाइल सामान्य वर्ग के लिए क्रमश: 720-138 और 50 वां तथा एससी/एसटी/ओबीसी के लिए 137-18 और 40वां था। एनएमसी जैसे निकायों के जरिये भारत द्वारा आवश्यक मानक के मुकाबले इन देशों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम के मानक में अंतर से छात्रों की परेशानी बढ़ रही है। उदाहरण के लिए वर्किंग पेपर के अनुसार विदेशों में अध्ययन करने वाले 18 से 20 प्रतिशत मेडिकल स्नातक भारत में विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा (एफएमजीई) पास कर सकते हैं। एफएमजीई भारत में राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीई) द्वारा आयोजित लाइसेंसधारक परीक्षा होती है। यह उन भारतीय नागरिकों के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं में से एक होती है, जो यहां मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए विदेशों में किसी कॉलेज से मेडिकल डिग्री प्राप्त करते हैं। पेपर में कहा गया है कि एनएमसी एमबीबीएस में प्रवेश के लिए आयु सीमा को हटाकर और सरकारी कोटे में एमबीबीएस के लिए फीस कम करने की सिफारिश करके इस मसले को हल करने की कोशिश कर रहा है। डीन ने कहा कि बोझिल प्रक्रिया और भारी निवेश की आवश्यकता के मद्देनजर सरकार को निजी मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के लिए मानदंडों को आसान करने की भी जरूरत है। डीन ने कहा कि किसी निजी अस्पताल के लिए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के वास्ते आवेदन कई चरणों से गुजरता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आर जगन्नाथन)। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका तथा उसके वैश्विक साझेदारों ने बार-बार नियम आधारित विश्व व्यवस्था तथा लोकतंत्र को बचाने की बात कही है। यहां प्रश्न यह है कि आखिर किसके नियम? जब रूस और चीन तथा कुछ अन्य देश सोच रहे हैं कि वे नए नियम निर्माण करने वाले क्लब के सदस्य हैं लेकिन वे अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपने नियम चला रहे हैं तो हम किस नियम आधारित व्यवस्था की बात कर रहे हैं? नियम ताकत के अधीन हैं। विश्व व्यापार संगठन तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के प्रवेश के नियमों को अमेरिका तथा उसके साझेदारों ने सन 1970 और 1980 के दशक में शिथिल किया क्योंकि वे चाहते थे कि चीन सोवियत संघ के खिलाफ संतुलन साधने के काम आए। भारत के लिए उन नियमों को शिथिल नहीं किया गया। अमेरिका नियम आधारित व्यवस्था की बात करता है लेकिन उसने कभी अपने बनाये नियम ही नहीं माने। जब अपने हितों की बात आती है तो अमेरिका संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी या वैश्विक सहमति लिए बिना किसी देश पर आक्रमण कर देता है। वियतनाम, कोरिया, इराक, अफगानिस्तान आदि इसके उदाहरण हैं। बड़ी ताकतों के लिए कोई नियम नहीं होते। पश्चिम में नियमों और कानूनों पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया जाता है। प्रमुख बात यह है कि नियमों को लागू करना होता है और केवल वही नियम लागू किए जा सकते हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शक्तिशाली लोगों के लिए लाभप्रद हों या उनके लिए फायदेमंद हों जिन्होंने वे नियम बनाए हैं। अमेरिका दूसरे विश्व युद्ध के बाद मुक्त व्यापार चाहता था क्योंकि उसे यूरोप और एशिया पर दबदबा बनाना था। चूंकि अमेरिका को किए जाने वाले हर निर्यात के मूल्य के रूप में डॉलर स्वीकार्य था इसलिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आयातकों की भूमिका बढ़ी। परंतु एक बार चीन के आने के बाद इस नियम पर आधारित व्यवस्था लडखड़ाने लगी। अमेरिका ने पाया कि उसके नागरिकों को सस्ती चीनी वस्तुओं से फायदा हो रहा है, उसके उत्पादकों को सस्ते चीनी श्रम से लाभ मिल रहा है। ऐसे में उसने अपने तमाम रोजगार चीन स्थानांतरित किए। उसकी कंपनियां प्रतिस्पर्धी बनी रहीं क्योंकि उन्होंने पूंजी और तकनीक का इस्तेमाल करके श्रम को स्थानांतरित किया और उत्पाद तथा सेवाएं तैयार कीं। इससे उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार भारत तथा उभरते बाजार वाले अन्य देशों में भी आए। यदि अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप जीत सके और वाम झुकाव वाले नेताओं के राष्ट्रपति या गवर्नर पदों के करीब पहुंचने की संभावना बनी तो इसलिए क्योंकि उसके नियम अब उस पर ही कारगर नहीं हैं। नियम आधारित व्यवस्था अमेरिका के भीतर से ही टूट रही है और यही कारण है कि हमें देश के भीतर ऐसा ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है। यहां तक कि राजनीति के बाहर भी इस बात पर विचार कीजिए कि कैसे पुरुषों द्वारा बनाए गए नियम ध्वस्त हो रहे हैं क्योंकि महिलाएं उन्हें चुनौती दे रही हैं। जिस तरह आज पितृसत्ता उचित नहीं लगती वैसे ही अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी गठबंधन के नियम जो ईसाई अनुभवों और मूल्यों पर आधारित हों या चीन के नेतृत्व वाले कन्फूशियन मूल्यों पर आधारित नियम भी शायद लंबी अवधि में व्यवहार्य न हों। इनसे हम तीन नतीजों पर पहुंच सकते हैं। पहला, नियम तब तक काम करते हैं जब तक एक वर्चस्ववादी देश हो जिसने उनमें जमकर निवेश किया हो और जो नियम न बनाने वालों को कुछ लाभ सुनिश्चित करने की इच्छा रखता हो। अमेरिका के मुक्त व्यापार को यूरोप और एशिया के निर्यातक देशों से इसी के चलते लाभ मिला। उन्हें अमेरिकी लोकतंत्र से कोई लगाव नहीं था। बल्कि आरंभ में लाभान्वित होने वाले देशों में से ज्यादातर अधिनायकवादी थे। नियम और कानून कागज पर हो सकते हैं लेकिन प्रवर्तन क्षमता न हो तो वे वास्तविक दुनिया में काम नहीं करते। तीसरा, जब शक्ति द्विध्रुवीय हो या बहुध्रुवीय हो तब नियमों में निरंतर परिवर्तन करना होता है ताकि सभी के हितों का ध्यान रखा जा सके या फिर हमारे सामने दो समांतर व्यवस्थाएं उत्पन्न हो जाती हैं। इनमें से प्रत्येक के अपने नियम होते हैं। शीतयुद्ध के दौरान हमने ऐसा ही देखा जहां कुछ देश अमेरिका के नियम मानते थे तो कुछ अन्य सोवियत संघ के। द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यवस्था में वही कानून बच सकता है जिसका क्रियान्वयन कमजोर हो, भले ही प्रत्येक ब्लॉक अपने मूल समूह पर कड़ाई से नियम लागू करता हो। इससे भारत जैसे देशों के लिए दिक्कत पैदा होती है जो एशिया में हैं और जिसे चीन के नेतृत्व वाले ब्लॉक के साथ कारोबार करना है। जबकि उसके सामने चीन-पाकिस्तान का सैन्य खतरा भी है। उसे अपने पक्ष में पश्चिमी ब्लॉक की जरूरत है। कमजोर वैश्विक नियम हमें बिना किसी एक पक्ष से जुड़े अपने हितों के बचाव की गुंजाइश देते हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश तथा अफ्रीका के कई देश इसलिए बचे हुए हैं क्योंकि सार्वजनिक स्वीकार्यता वाले नियम उन पर नहीं थोपे जा सकते। ताकत एक ऐसा तत्त्व है जो नियम आधारित व्यवस्था की अनुमति देता है और फिलहाल इसे उभरती ताकतों से चुनौती मिल रही है। चीन का उभार हो चुका है लेकिन रूस दोबारा उभार के प्रयास में है। जापान और जर्मनी दोनों अपने-अपने उभार का प्रयास करेंगे। एक बार अगर जापान और जर्मनी का सैन्यीकरण हो गया तो अमेरिका अपने सहयोगियों के लिए भी नियम नहीं बना पाएगा। नियम निमार्ता के रूप में अमेरिका के दिन अब लदने वाले हैं। भारत के लिए दोहरी चुनौती है। पहला, उसे नियम निमार्ता क्लब का सदस्य बनना है तो उसे अर्थव्यवस्था मजबूत बनानी होगी और आंतरिक रक्षा क्षमता स्थापित करनी होगी। दूसरा, अल्पावधि में यानी हमारे 10 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के पहले हमें अमेरिका, चीन, रूस और जापान तथा यूरोपीय संघ के साथ सामंजस्य बनाना होगा। अल्पकाल में सामरिक अस्पष्टता चलेगी, बशर्ते दीर्घावधि के लक्ष्य स्पष्ट हों। यदि हम दोनों चुनौतियों का सामना कर सके तो 2030 के दशक तक भारत महाशक्ति बन सकता है। हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। (लेखक स्वराज्य पत्रिका के संपादकीय निदेशक हैं)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता सिंह)। नब्बे के दशक की शुरूआत में जहां देश में आर्थिक उदारीकरण बड़ा जोर -शोर से हो रहा था, वहीं दूसरी ओर इस प्रक्रिया में कृषि क्षेत्र बहुत ही पीछे छूट गया था।और भारत अपनी बढ़ती आबादी का भरण पोषण करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने को मजबूर था। वर्तमान में नरेंद्र मोदी की सरकार कृषि के क्षेत्र में चौतरफा प्रयास करते हुए कृषि और कृषि से जुड़े विभिन्न तरह के व्यवसाय को सामने लाकर आत्मनिर्भर भारत कृषि कार्यक्रम को और मजबूत करते जा रही है। केंद्र की मोदी सरकार देश में कृषि और किसानों को मजबूत करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। इस बार के बजट में कृषि पर लगभग 40 लाख करोड़ रुपए का आवंटन इसी बात को दर्शाता है। इसके साथ ही कृषि और खेती किसानी से जुड़े क्षेत्रों पर अलग-अलग जोर देते हुए कृषि को समग्रता में देखने की कोशिश भी की जा रही है ।मोदी सरकार ने खेती किसानी के लिए व्यापक सोच के साथ अनेकों संभावनाओं को देखते हुए कई महत्वपूर्ण योजनाएं भी लाई है। खेती किसानी पर बात करने से ही सामान्य धारणा बनती है- अनाज और सब्जी का उत्पादन। लेकिन मोदी सरकार ने आम जनों के बीच कृषि को समग्रता में देखने की दृष्टि भी पैदा की और साथ ही इसे जमीन पर उतारने की भरपूर कोशिश भी की है। मसलन पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री फॉर्म, तसर सिल्क उत्पादन आदि अनेकों ऐसे व्यवसाय हैं, जिस पर जोर दिया जा रहा है और साथ ही रोजगार के व्यापक द्वार को खोलने की कोशिश भी जारी है। केंद्र सरकार द्वारा देश में कृषि से जुड़े किसानों की आय में वृद्धि करने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रही है। इसके लिए देश के कृषि गतिविधियों से जुड़े किसानों, पशुपालकों के साथ अब केंद्र सरकार द्वारा मत्स्य पालन के व्यवसाय करने वाले किसानों को भी आर्थिक सहयोग देने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की शुरूआत की गई है। जिसे नीली क्रांति के नाम से भी जाना जा रहा है। इस योजना के माध्यम से केंद्र के साथ-साथ कई राज्य सरकारों के द्वारा मिलकर मत्स्य पालन का व्यवसाय करने वाले किसानों को 40 से 60% सब्सिडी का लाभ भी प्रदान किया जा रहा है। इसे शुरू करके किसान आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना कृषि क्षेत्र पर केंद्रित एक अनवरत चलनेवाली विकास योजना है, जिसे आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत वित्त वर्ष 2020-21 से वित्त वर्ष 2024 -25 तक सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यान्वित किया जाना है। इस योजना के अंतर्गत 20,050 करोड़ रुपए का निवेश मत्स्य क्षेत्र में होने वाला सबसे अधिक निवेश है। इसमें लगभग 12,340 करोड़ रुपए का निवेश समुद्री अंतरदेशीय मत्स्य पालन और जलीय कृषि में लाभार्थी केंद्रित गतिविधियों पर तथा 7,710 करोड़ रुपए का निवेश फिशरीज इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए प्रस्तावित है। इस योजना के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर आय वर्ग के किसान, जिनकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि मत्स्य पालन के व्यवसाय को शुरू करने के लिए उसमें अधिक पैसे खर्च कर सके, ऐसे सभी किसानों को सरकार योजना के माध्यम से 40% अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और महिला लाभार्थियों को सरकार द्वारा 60% तक की सब्सिडी का लाभ दिया जाता है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को पूरे देश में 5 वर्ष के लिए लागू किए जाने के बाद सरकार का मुख्य लक्ष्य देश में 55 लाख युवाओं के लिए रोजगार उत्पन्न करने का रखा गया है। इसके साथ ही देश में वर्ष 2018 -19 में 46589 करोड़ रुपए निर्यात आय को बढ़ाकर 2024 -25 तक एक लाख करोड़ की दुगुना निर्यात आय करके 70 लाख टन का अतिरिक्त मछली उत्पादन करना है। जिससे देश में मछली पालन का व्यवसाय शुरू करने वाले किसान अपने व्यवसाय से अधिक मछली का बेहतर लाभ अर्जित कर सकेंगे। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की प्रमुख बातों पर भी हमें गौर करना चाहिए। मछलियों की गुणवत्ता वाली प्रजातियों की नस्ल तैयार करने तथा उनकी विभिन्न प्रजातियां विकसित करने ,महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास और विपणन नेटवर्क आदि पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। नीली क्रांति योजना की उपलब्धियों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कई कार्य किये जा रहे हैं।-जिसमें मछली पकड़ने के जहाजों का बीमा, मछली पकड़ने वाले जहाजों /नावों के उन्नयन हेतु सहायता ,बायो -टॉयलेट्स, लवण छारीय में जलीय कृषि, मत्स्य पालन और जलीय कृषि स्टार्ट-अप्स, इंक्यूबेटर्स, एक्वाटिक प्रयोगशालाओं के नेटवर्क और उनकी सुविधाओं का विस्तार, ई ट्रेडिंग /विपणन मत्स्य प्रबंधन आदि योजना शामिल है। झारखंड में मत्स्य पालन की असीम संभावनाएं देखने को मिल रही है। झारखंड में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत राज्य में पिछले साल 2.38 लाख मैट्रिक टन मछली का उत्पादन किया गया। और आगे 2024 -25 तक 1.5 लाख मैट्रिक टन अतिरिक्त मछली उत्पादन करने का लक्ष्य लिया गया है। ज्ञात हो कि झारखंड के लगभग 70 फीसदी मछली का सेवन करती है। राज्य में ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को मछली पालन के क्षेत्र में अवश्य आगे आना चाहिए, जिससे कि एक तरफ युवाओं को रोजगार मिल सके और दूसरी तरफ मछली व्यवसाय के क्षेत्र में वे आगे बढ़ सकें। यह कहना सही होगा कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना देश के कृषि और किसानों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। वैसे तो देश में किसानों की आय बढ़ाने के मुद्दे पर राजनीतिक और नीतिगत चचार्एं तो खूब होती रही है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के रूप में इस क्षेत्र में सुधार करने में सक्षम अन्य दूसरी कोई सरकार नहीं रहीं। (लेखिका प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भाजपा झारखंड हैं।)
एबीएन डेस्क (के विश्वा)। लोकतंत्र में बहुसंख्यक जिस को वोट देता है वह पार्टी सरकार बनाती है। पर सरकार की राजनीतिक धर्म है कि सरकार जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर जो भी अल्पसंख्यक हैं, उनके सम्मान स्वाभिमान और सुरक्षा की गारंटी दे। पर इस राज्य में सरकार की विभाजन कारी नीतियों का परिणाम है कि भोजपुरी मगही और अंगिका बोलने वाले लोगों को राज्य में दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है। साथ ही उन्हें नफरत का सामना करना पड़ रहा है। उनके साथ भेदभाव बढ़ रहा है और इससे नफरत की खाई और बढ़ेगी। राज्य में संघर्ष पैदा होगा, जिससे राज्य की एकता और अखंडता को खतरा है। हम बहुत जिम्मेदारी के साथ यह कहते हैं कि यह षड्यंत्र झारखंड सरकार की है। सरकार राज्य के अहम मुद्दे जैसे बेरोजगारी भत्ता, जेपीएससी की धांधली, जेएसएससी की बहाली, सहायक पुलिस कर्मियों की मांग, आंगनबाड़ी सेविकाओं की मांग सहित अन्य सभी जरूरी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए राज्य के युवाओं को आपस में लड़ा रही है। जिसे हमें नाकाम करना है। लोगों को जागरूक करने के लिए हम यह प्रेस वार्ता कर रहे हैं। राज्य का निर्माण भाषा के आधार पर नहीं हुआ। राज्य के पलामू प्रमंडल की क्षेत्रीय भाषा हिंदी और भोजपुरी है। ऐसे में हमें हमारे ही राज्य में हमारे भाषा, संस्कृति को कोई बाहरी कहेगा तो यह कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम चाहते हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन यह स्पष्ट करें कि पलामू प्रमंडल झारखंड का हिस्सा है या नहीं है। अगर नहीं है तो उनकी मर्जी वह पलामू को अलग कर दें और अगर पलामू प्रमंडल झारखंड की हिस्सा है तो पलामू में कौन लोग रहते हैं जिंदा या मुर्दा। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि पलामू सिर्फ भूखंड नहीं है । पलामू में भी जिंदा लोग रहते हैं। और जहां लोग रहते हैं उनकी भी अपनी भाषा और संस्कृति होती है जिसकी रक्षा सरकार को करनी होती है। हमारे पास भी निलांबर-पितांबर की धरोहर है। हमारा भी स्वाभिमान है। अगर राज्य को सचमुच आगे बढ़ाना चाहते हैं तो सरकार को 24 जिलों की बात करनी होगी। और भाषा के नाम पर इस उन्माद को बंद करना होगा। अन्यथा क्रिया की प्रतिक्रिया और प्रतिकार के लिए सरकार को तैयार रहना चाहिए। राज्य की जनता से अनुरोध करेंगे कि हमारी साझी लड़ाई है, साझी संस्कृति और भौगोलिक विरासत है। हमें सबके भाषा संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा और उसका सम्मान करना चाहिए। हमें आपस में लड़ाने वाले अंग्रेजों से सावधान रहना चाहिए। जनता को जरूरी मुद्दों पर एक साथ सरकार को घेरना चाहिए। सरकार से सवाल करना चाहिए। सरकार की इस प्रायोजित आंदोलन को हम गैर झारखंडी और विभाजन कारी मानते हैं? क्योंकि यह आंदोलन पूरे राज्य के हितों की बात नहीं करता। इसलिए सरकार की इस नीति का हम विरोध करते हैं और राज्य के सभी भाषा, जाति, धर्म के अल्पसंख्यकों के साथ खड़े हैं। उनके हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। गैर संवैधानिक नीतियों का मुंहतोड़ जवाब देंगे और सरकार को जरूरी मुद्दों पर बात करने को मजबूर करेंगे।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अदिति)। 10 मार्च को यूपी विधानसभा के चुनाव परिणाम आने वाले हैं। महिलाओं और मुस्लिमों वोटरों का रूझान किस ओर रहा। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता इस वक्त दुविधा में हैं। अपनी पहचान की रक्षा करने की उनकी पुरजोर ख्वाहिश और प्रदेश के शासन में उनकी भी बात सुनी जाए, उसको देखते हुए उनके सामने आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) को ही वोट देने का विकल्प बचा है जो राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसके अलावा समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) जैसे परंपरागत राजनीति दलों से ही जुड़े रहने का एक रास्ता बचा है जो शायद अल्पसंख्यकों के हितों का भले ही खुलकर समर्थन नहीं कर पा रहे हों लेकिन वे प्रमुख विरोधी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराने के लिए बेहतर स्थिति में हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर हाल में सपा को लेकर सबसे ज्यादा निराशा इस बात को लेकर बढ़ी है कि पार्टी ने आजम खान की लंबी कैद के मुद्दे को ठीक तरह से नहीं उठाया। अदालत द्वारा जमानत देने से इनकार किए जाने के बाद खान जेल से सपा उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव (रामपुर से) लड़ रहे हैं। उनके और उनके परिवार के खिलाफ 104 अदालती मामले दर्ज हैं जिनमें भूमि अतिक्रमण से लेकर बकरी, भैंस और पुस्तकों की चोरी तक के आरोप शामिल हैं। इस समुदाय में इस बात को लेकर काफी अफसोस है कि सपा ने खान के मामले को पुरजोर तरीके से जनता के सामने नहीं उठाया लेकिन मुलायम सिंह यादव अगर पार्टी प्रमुख रहते तब इस मुद्दे पर पार्टी का रुख कुछ और ही होता। वर्ष 2021 में जब वह पहले से ही कई महीनों तक जेल में थे तब सपा ने उनकी रिहाई के लिए एक अभियान शुरू किया था। उनके बेटे अब्दुल्ला इस चुनाव में सपा उम्मीदवार (स्वार) हैं जो हाल ही जेल से रिहा हुए हैं। उन पर कथित रूप से चुनावी दस्तावेजों में गलत जन्मतिथि बताने के आरोप हैं। चुनाव विशेषज्ञ और नेता योगेंद्र यादव कहते हैं, एआईएमआईएम का उभार यह दर्शाता है कि मुसलमान कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के ब्रांड से थक चुके हैं जिस पर सपा और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी अमल करती है। वे वोट बैंक और बंधकों के रूप में अपने समुदाय के इस्तेमाल किए जाने से नाराज हैं। लेकिन अकादमिक जगत से जुड़ी रही और उत्तर प्रदेश की विशेषज्ञ सुधा पई का कहना है कि इस आधार के हिसाब से कम सबूत हैं कि मुसलमान अपने रणनीतिक मतदान के पिछले रुझान से अलग कुछ करेंगे। वह कहती हैं, आम रुझान यही है कि आप पहले प्रत्याशी को देखते हैं और आकलन करते हैं कि वह प्रत्याशी उस विशेष निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा को हराने जा रहा है या नहीं और उस आधार पर उस व्यक्ति को वोट दिया जाएगा। ऐसे में कोई अलग पैटर्न नहीं उभर सकता है बल्कि यह जमीनी वास्तविकता पर आधारित फैसला है। एआईएमआईएम का उदय अपने आप में एक दिलचस्प कहानी है। तेलंगाना के पुराने हैदराबाद क्षेत्र से गहरा ताल्लुक रखने वाली पार्टी ने 2017 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा था। उसने 38 सीट पर चुनाव लड़ा और एक भी सीट नहीं जीती और उसके 37 प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई। लेकिन इन सीट पर पार्टी 2.4 प्रतिशत की वोट हिस्सेदारी पाने में कामयाब रही। अगर यह पार्टी तस्वीर में नहीं होती तब ये वोट सपा या कांग्रेस के खाते में जा सकते थे और इसी वजह से उस पर भाजपा की बी टीम होने का तोहमत लगा। इस बात को तब और बल मिला जब उसने तृणमूल कांग्रेस के साथ सहयोग किए बिना अपने दम पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और उससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस बार भी पार्टी के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने सपा-रालोद गठबंधन का समर्थन करने से इनकार कर दिया है बल्कि 100 सीट पर चुनाव लड़ने की अपनी महत्त्वाकांक्षा भी बढ़ा दी। इस समुदाय के नेताओं ने नाम न बताने की शर्त पर दो रुझानों के बारे में बात की। उनका कहना है, मुस्लिम राजनीति के ओवैसीकरण में मुसलमानों के लिए कट्टरपंथी अधिकारों की बयानबाजी एक मुख्य विषय बन गया है। इसमें कोई शक नहीं कि ओवैसी शानदार वक्ता हैं और उन्होंने संसद में कई बार कहा है कि एक मुस्लिम के रूप में भारतीय संविधान उनका अंतिम हथियार है क्योंकि यह भारत के लिए, भारतीयों के लिए, मुसलमानों के लिए और दलितों के लिए सबसे अच्छा दस्तावेज है। यह सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए भी सबसे अच्छा दस्तावेज है। लेकिन ओवैसी चाहते हैं कि संविधान में निहित मुसलमानों के अधिकारों को उनकी वर्तमान परिस्थितियों पर लागू किया जाए। उदाहरण के लिए वह चाहते हैं कि हाल ही में उन पर हुए जानलेवा हमले के दोषियों को भी सख्त गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के हिसाब से दंडित किया जाए जिसके तहत कई मुस्लिम युवाओं को जेल में डाला गया है। हालांकि इस तरह की जोशीली बयानबाजी चुनावी जनसभाओं में काफी पसंद की जाती है लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इसका सीधा मतलब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अधिक ध्रुवीकरण करना है और भाजपा ऐसा ही चाहती है। अगर 403 सदस्यों वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रतिनिधित्व की बात करें तो पहले 63 मुस्लिम विधायक थे। 2017 में यह तादाद घटकर 24 रह गई। हालांकि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का तर्क है कि मुसलमानों को अकेले ही अपने समुदाय के लिए बोलने की जरूरत नहीं है बल्कि दूसरों को भी उनके लिए आवाज उठानी चाहिए। विधानसभा और राज्य के नीति निर्माण में उनकी हिस्सेदारी महज 5.9 प्रतिशत तक सिमट गई है जबकि राज्य की आबादी में इस समुदाय की हिस्सेदारी 20 फीसदी तक है। ऐसे में निश्चित तौर पर इस समुदाय के भीतर सपा और एआईएमआईएम जैसे दलों की भूमिका ही आंतरिक स्तर पर बहस का मुद्दा बनी हुई है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (प्रशांत झा)। युद्धों में कोई वास्तविक विजेता नहीं होता है क्योंकि इसमें शामिल सभी पक्षों को परिणाम भुगतना पड़ता है, जिसमें अक्सर दोनों पक्षों के हताहतों की संख्या अधिक होती है। युद्ध और उसके अंत के परिणाम हमेशा खतरनाक होते हैं। इसका सीधा प्रभाव लोगों, राजनीति, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर पड़ता है। युद्ध के शिकार प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में 17 से 20 मिलियन लोगों की मौत हुई। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के पीड़ितों की संख्या 50 से 56 मिलियन के बीच अनुमानित है (कुछ स्रोतों में तो 80 मिलियन का भी उल्लेख है)। द्वितीय विश्व युद्ध अधिक अन्य युद्ध ने इतना विनाश नहीं किया है, 1989 और 2010 के बीच हिंसक संघर्षों में अभी भी लगभग 800,000 लोग मारे गए। युद्ध के पीड़ितों की वास्तविक संख्या का केवल अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या पीड़ितों को केवल उन लोगों के रूप में परिभाषित किया गया है जो सशस्त्र हिंसा के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में मारे गए। इसका मतलब उन लोगों की अवहेलना करना होगा, जो युद्ध के दौरान, जोखिम, महामारी या (यौन) हिंसा और भूख के परिणामस्वरूप मर गए। यह उन लोगों की भी अवहेलना करता है जो वर्षों बाद युद्ध में लगे घावों या बीमारियों से मर गए हैं- जैसे कि हिरोशिमा और नागासाकी के विकिरण पीड़ित। वियतनाम और कंबोडिया (1965-1975) में अमेरिकी हस्तक्षेप के परिणामों पर एक नज़र इस समस्या की एक स्पष्ट तस्वीर प्रदान करता है। वियतनाम युद्ध में मरने वालों की संख्या 30 लाख आंकी गई है। इसकी समाप्ति के बाद से वियतनामी सरकार का दावा है कि पुराने गोला-बारूद के कारण होने वाली घातक दुर्घटनाओं से 42,000 से अधिक लोग मारे गए हैं। उत्तरी वियतनामी सैनिकों के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी सशस्त्र बलों ने 15 मिलियन टन बम और विस्फोटकों का इस्तेमाल किया, जिनमें से 800,000 टन अभी भी देश के 20 प्रतिशत को प्रदूषित करते हैं। ऐसा ही नजारा कंबोडिया में भी है। यूनिसेफ के अनुसार, चार से छह मिलियन बारूदी सुरंगें अभी भी रास्तों के पास, खेतों में और स्कूलों के पास या गांवों में कुओं के पास दुबकी हुई हैं। यह ज्यादातर नागरिक आबादी है जो पीड़ित है-हर तीसरा बारूदी सुरंग शिकार एक बच्चा है। साहित्य के लिए जर्मन नोबेल पुरस्कार विजेता हेनरिक बोल ने युद्धों के दीर्घकालिक प्रभावों की विशेषता बताई। युद्ध में घायल-चाहे वे सैनिक हों या नागरिक-अक्सर दशकों तक शारीरिक चोटों से पीड़ित रहते हैं। अक्सर, उन्हें अंधे या बहरे होने के कारण, विच्छेदन के साथ जीना सीखना पड़ता है। मनोवैज्ञानिक प्रभावों का भी उत्तरजीवियों के दैनिक जीवन पर प्रभाव पड़ता है। युद्ध के दैनिक अनुभवों से उत्पन्न भय और असुरक्षा चाहे अपराधियों या पीड़ितों के रूप में निशान छोड़ जाते हैं। देर से आने वाले लक्षण तनाव विकार, अवसाद और चिंता हो सकते हैं। ये परिणाम नागरिकों और सैनिकों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। युद्ध का एक अन्य परिणाम राष्ट्रीय नागरिकों का शरणार्थियों में परिवर्तन है। एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में 18 मिलियन शरणार्थी हैं जिन्हें संघर्ष या उत्पीड़न के कारण अपना घर छोड़ना पड़ा है। तीन-चौथाई विकासशील देशों में रहते हैं। युद्ध ने उनके घर और उनकी आजीविका, अक्सर दीर्घकालिक रूप से छीन ली है। भूख, कुपोषण, और बीमारियां सीधे शरणार्थियों और उनके बच्चों के लिए खतरा हैं। शरणार्थियों की स्थिति और अधिक कठिन हो जाती है जब अंतर्राष्ट्रीय ध्यान और समर्थन कम हो जाता है, जबकि उनकी कानूनी, आर्थिक और सामाजिक स्थिति का अभी भी कोई अंत नहीं है और दृष्टि में कोई टिकाऊ समाधान नहीं है। विशेष रूप से, जब शरणार्थियों को बड़े शिविरों में रहना पड़ता है, तो शरणार्थियों और उनके पर्यावरण दोनों के लिए विभिन्न सुरक्षा जोखिम उत्पन्न होते हैं जो नए हिंसक संघर्षों को जन्म दे सकते हैं। युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है युद्ध एक बर्बर गतिविधि है जो केवल जीवन और संपत्ति के नुकसान में समाप्त होती है। युद्ध की हिंसा जीवन के लिए खतरा है जो कभी भी किसी भी विवाद को हल नहीं कर सकती है। युद्ध का अभ्यास करने वाले दोनों पक्ष सामाजिक और आर्थिक नुकसान में समाप्त होते हैं जैसा कि जॉन एस सी एबॉट ने कहा है कि युद्ध विनाश का विज्ञान है।
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