एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संजय कुमार सिंह)। टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस ने हाल ही में क्रिटि-मेडिकेयर नाम की बीमा योजना शुरू की है, जिसमें 100 गंभीर बीमारियां शामिल की गई हैं। उसके बाद से ही गंभीर बीमारियों के लिए बीमा यानी क्रिटिकल इलनेस प्लान चर्चा में हैं। गंभीर बीमारियों के इलाज में बहुत अधिक खर्च आता है। ज्यादातर लोगों की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में अस्पताल में भर्ती होने की सूरत में जो राशि दी गई होती है, उससे कहीं अधिक रकम इन बीमारियों के इलाज में स्वाहा हो जाती है। इतना ही नहीं, ऐसी बीमारियों के इलाज के समय कई दूसरे खर्च भी आपके सामने आ जाते हैं, जिन्हें चुकाने में यह पॉलिसी आपकी मदद कर सकती है। बीमारी पता लगने पर एकमुश्त भुगतान : जिस व्यक्ति का बीमा है, उसे रकम हासिल करने के लिए अस्पताल के बिल नहीं दिखाने होते। स्टार हेल्थ ऐंड अलाइड इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक एस प्रकाश कहते हैं, जांच रिपोर्ट में अगर वही बीमारी आती है, जो बताई गई है तो रकम का भुगतान कर दिया जाता है। इन पॉलिसियों में अस्पताल में भर्ती होने के दौरान होने वाले खर्च और भुगतान की गई राशि में कोई संबंध नहीं होता। टाटा एआईजी हेल्थ इंश्योरेंस में कार्यकारी उपाध्यक्ष और उत्पाद प्रमुख (दुर्घटना एवं स्वास्थ्य) विवेक गंभीर कहते हैं, मान लीजिए किसी ने 1 करोड़ रुपये बीमा राशि वाला क्रिटिकल इलनेस प्लान लिया है। चाहे अस्पताल में उसके केवल 10 लाख रुपये खर्च हुए हों, उसे पूरे 1 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। बीमा कंपनी उससे यह भी नहीं पूछेगी कि इस रकम का वह व्यक्ति क्या करेगा। क्रिटिकल इलनेस प्लान का कवरेज आम तौर पर पूरी दुनिया में मिलता है। गंभीर कहते हैं, बीमा कराने वाले व्यक्ति को गंभीर बीमारी होने का पता भारत के बाहर ही क्यों न लगे, इस योजना के तहत उसे भुगतान किया जाएगा। इन पॉलिसियों के लिए दिए गए प्रीमियम पर आयकर अधिनियम की धारा 80डी के तहत कर छूट का फायदा भी मिलता है। कवरेज का दायरा जांच लीजिए : किसी भी बीमा योजना के अंतर्गत आने वाली गंभीर बीमारियों की संख्या 6 से 100 तक हो सकती है। ज्यादातर लोगों के लिए यह तय करना मुश्किल होगा कि इस योजना के तहत कितनी या कौन सी बीमारियों को शामिल किया जाना चाहिए। प्रकाश सलाह देते हैं, भारत में जो गंभीर बीमारियां सबसे अधिक होती हैं, उन्हें शामिल किया जाना चाहिए। इनमें कैंसर (इसके विभिन्न तरीके के उपचार), दिल की प्रमुख सर्जरी, ब्रेन ट्यूमर, लिवर या गुर्दे बेकार होना, दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी को क्षति पहुंचना आदि शामिल होने चाहिए। पॉलिसी बाजार डॉट कॉम में स्वास्थ्य कारोबार प्रमुख अमित छाबड़ा कहते हैं, पॉलिसी में जितनी अधिक बीमारियां शामिल होंगी उतना ही ज्यादा सुकून मिलेगा। पॉलिसी खरीदने वाले को गंभीर बीमारी की परिभाषा भी देखनी पड़ेगी। गंभीर कहते हैं, बीमा उद्योग 22 गंभीर बीमारियों के लिए मानक परिभाषाएं इस्तेमाल करता है। यदि प्लान 22 बीमारियों से अधिक शामिल की गई हैं तो ग्राहक को जान लेना चाहिए कि वह क्या खरीद रहा और उन गंभीर बीमारियों की क्या परिभाषा दी गई है। जरूरत पड़े तो वह डॉक्टर या सलाहकार जैसे किसी विशेषज्ञ की राय ले सकता है। इनमें से ज्यादातर बीमा योजनाओं में सर्वाइवल पीरियड होता है, जो शून्य से लेकर 60 दिन तक हो सकता है। बीमा कराने वाले व्यक्ति को बीमारी का पता लगने के बाद सर्वाइवल अवधि तक जीवित रहना ही होता है तभी उसे बीमा राशि का भुगतान किया जाता है। छाबड़ा कहते हैं, सर्वाइवल पीरियड जितना कम हो उतना बेहतर है। हाल में पेश की गई टाटा एआईजी की योजना में तीन सर्वाइवल पीरियड दिए गए हैं – 0, 7 या 15 दिन। इनमें से कोई एक चुनना होता है। बीमा खरीदने से पहले देख लीजिए कि इसमें भुगतान एकमुश्त किया जाएगा या टुकड़ों में दिया जाएगा। सना इंश्योरेंस ब्रोकर्स में ग्रुप बिजनेस और सेल्स एवं सर्विस के प्रमुख नयन गोस्वामी बताते हैं, जिस पॉलिसी में एकमुश्त भुगतान किया जाता है, उसमें लिखा हो सकता है कि कैंसर या किसी बीमारी के गंभीर चरण में पहुंचने पर ही एकमुश्त भुगतान किया जाएगा। दूसरी ओर चरणबद्ध भुगतान वाली पॉलिसी में बीमारी के आरंभिक चरणों में भी रकम दे दी जाती है। बीमा राशि सावधानी से चुनें : बीमा राशि चुनते समय देख लीजिए कि इलाज के साथ दूसरे कौन से खर्च हो सकते हैं। गोस्वामी कहते हैं, बीमा में रोगी या उसके तीमारदार को आय में होने वाला नुकसान भी शामिल होना चाहिए। कम से कम 25 लाख रुपये का बीमा करा लीजिए। ये प्लान हॉस्पिटलाइजेशन कवर की तुलना में सस्ते होते हैं। ध्यान रहें ये बातें : क्रिटिकल इलनेस प्लान स्टैंड-अलोन बीमा पॉलिसियों की तरह होते हैं और स्वास्थ्य या जीवन बीमा पॉलिसी के साथ राइडर के तौर पर भी आते हैं। स्टैंड-अलोन पॉलिसी खरीदना ही बेहतर होता है। गंभीर समझाते हैं कि अगर आप राइडर के तौर पर यह पॉलिसी खरीदते हैं तो एक बीमा कंपनी छोड़कर दूसरी कंपनी की पॉलिसी लेने पर आपको क्रिटिकल इलनेस राइडर देने से इनकार भी किया जा सकता है। स्टैंड-अलोन पॉलिसी में आप अपने स्वास्थ्य बीमा में किसी भी तरह का बदलाव कर सकते हैं और आपके क्रिटिकल इलनेस प्लान पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आम तौर पर भुगतान होते ही क्रिटिकल इलनेस प्लान खत्म हो जाता है। लेकिन हाल में आए कई प्लान में ऐसा नहीं होता। उदाहरण के लिए स्टार क्रिटिकल इलनेस मल्टीप्लाई इंश्योरेंस पॉलिसी में चार बार भुगतान किया जाता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नौशाद फोर्ब्स)। आम मान्यता कहती है कि वैज्ञानिक शोध से अविष्कार होते हैं। इन आविष्कारों से नयी तकनीकों का विकास होता है और ये नयी तकनीक उत्पाद एवं बाजार की मदद करती हैं। नवाचार का यह रेखीय मॉडल एकदम साधारण है लेकिन उसका यह साधारणपन खतरनाक भी है। वैज्ञानिक शोध वास्तव में औद्योगिक नवाचार में बहुत सीमित भूमिका निभाता है। तकनीक का लक्ष्य मनुष्य की व्यावहारिक संभावनाओं का विस्तार करना होता है। विज्ञान का लक्ष्य है प्रकृति के बारे में समझ बढ़ाना। तकनीक या इंजीनियरिंग के मूल में उपयोगिता है। एक नये तरह के विकास से ज्ञान मिल सकता है लेकिन वह तकनीक का उद्देश्य नहीं है। इसी प्रकार शोध का लक्ष्य है नया ज्ञान हासिल करना। विकास का लक्ष्य है एक नया उत्पाद या सेवा तैयार करना। इन अवधारणाओं को सही ढंग से समझा जाए तो कंपनियों तथा सार्वजनिक शोध को कई बेकार कामों से बचाया जा सकता है। औद्योगिक नवाचार में शोध की भूमिका: स्टैनफर्ड में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर स्टीव क्लाइन ने नवाचार के एक शृंखला संबद्ध मॉडल की मदद से साधारण रेखीय मॉडल को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया। यहां कुछ बातें ध्यान देने लायक हैं। नवाचार की शुरूआत और उसका अंत दोनों बाजार के साथ होते हैं। डिजाइनिंग और परीक्षण इसकी मूल गतिविधियां हैं। तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान नवाचार में अहम भूमिका निभाते हैं। जब मौजूद ज्ञान समस्या निवारण के लिए पर्याप्त नहीं होता है तब शोध किया जाता है। समस्या समाधान के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उसके लिए नया ज्ञान आवश्यक है। जैव प्रौद्योगिकी तथा सेमीकंडक्टर जैसे कुछ क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिक शोध आवश्यक हैं। तकनीकी उन्नति में वैज्ञानिक शोध की अहम भूमिका है। विज्ञान आधारित उद्योगों की तकनीकी प्रगति तथा नये तकनीकी क्षेत्रो में नवाचर में भी ऐसे शोध की अहम भूमिका है। दुनिया भर की हजारों शोध एवं विकास संस्थाएं अन्य संस्थाओं से सीखते हुए शुरूआत करती हैं तथा अपने उत्पादों को सुधारती हैं। इसके बाद ही शोध का इस्तेमाल नया ज्ञान तैयार करने में होता है। संस्थान के भीतर होने वाला शोध सार्वजनिक शोध प्रणाली के उत्पादन के इस्तेमाल की पूर्व शर्त होता है। यानी अगर कंपनियां शोध एवं विकास में निवेश करने में पर्याप्त सक्षम हों तो सार्वजनिक वैज्ञानिक शोध उचित है। इसके अलावा सार्वजनिक वैज्ञानिक शोध औद्योगिक नवाचार के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। केनेथ एरो तथा रिचर्ड नेल्सन ने छह दशक पहले वैज्ञानिक शोध में सार्वजनिक सब्सिडी को लेकर दलील तैयार की थी। उन्होंने कहा था कि समाज शोध में कम निवेश करता है क्योंकि उसके लाभ स्पष्ट नहीं होते। ऐसा इसलिए कि शोध के नतीजे अनिश्चित होते हैं। यही नहीं नयी खोज के लाभ निवेशक के साथ-साथ अन्य लोगों तक भी जाने की पूरी संभावना रहती है। शोध के नतीजों की अनिश्चितता के कारण सरकारी फंडिंग को उचित ठहराना जारी रहता है। मेरे पास अंतिम आधिकारिक आंकड़े 2019 के हैं और उस वर्ष भारत सरकार ने 18 अरब डॉलर के राष्ट्रीय शोध एवं विकास के करीब 63 फीसदी हिस्से की फंडिंग की। इसमें करीब 7 फीसदी हिस्सेदारी विश्वविद्यालयों की है। 56 प्रतिशत हिस्सेदारी स्वायत्त सरकारी शोध एवं विकास प्रयोगशालाओं में होता है। मैंने हाल ही में उस सरकारी तकनीकी शोध के बारे में भी लिखा है जो रक्षा क्षेत्र के लिए हो रहा है। इसमें से करीब 10 प्रतिशत सार्वजनिक फंडिंग वाला वैज्ञानिक शोध है जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद की ओर लक्षित है। उद्योग एवं उच्च शिक्षा व्यवस्था के बजाय स्वायत्त प्रयोगशालाओं में सरकारी फंडिंग वाले शोध की तलाश करने के क्रम में हम एक बड़ा अवसर गंवा देते हैं। संदेश एकदम साफ है: सार्वजनिक फंडिंग वाले वैज्ञानिक शोध की राह मजबूत है लेकिन ऐसा शोध उच्च शिक्षा व्यवस्था के तहत होनी चाहिए न कि स्वायत्त प्रयोगशालाओं में। सार्वजनिक शोध में प्रतिभा महत्त्वपूर्ण: कई लोग सोचते हैं कि शोध विश्वविद्यालय नयी वैज्ञानिक समझ का प्रमुख स्रोत हैं। यह सच भी है। स्टैनफर्ड को सिलिकन वैली तथा उसकी तकनीकी कंपनियों की सफलता में अहम योगदान करने वाला माना जाता है। यह विश्वविद्यालय इस प्रतिष्ठा का पात्र है लेकिन मेरी दृष्टि में स्टैनफर्ड के शोध निष्कर्षों भर को श्रेय नहीं मिलना चाहिए। अगर दुनिया ने 125 वर्षों में स्टैनफर्ड के शोध नतीजों का कोई लाभ नहीं देखा होता तो शायद ज्यादा बुरी बात होती लेकिन यहां अहम शोध नतीजे नहीं बल्कि छात्र हैं। स्टैनफर्ड ने दुनिया की कई दिग्गज कंपनियों की स्थापना की हैं जिनमें प्रमुख हैं: ह्यूलिट पैकर्ड, वैरियन, गूगल, याहू, उबर, ट्विटर, ऐपल वगैरह। इन कंपनियों ने अर्थव्यवस्था में इतना अधिक योगदान किया है कि उसके आगे स्टैनफर्ड के शोध से मिला योगदान पीछे रह जाएगा। वहीं हजारों स्नातकों ने अर्थव्यवस्था, विज्ञान, साहित्य तथा अन्य विषयों में जो योगदान किया है उसका मूल्य इन बड़ी कंपनियों के योगदान से भी आगे है। हर महान विश्वविद्यालय के बारे में यही बात कही जा सकती है। हमारे पास विश्वस्तरीय शोध को शिक्षण से जोड़ने के कुछ उदाहरण मौजूद हैं। बेंगलूरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान खासतौर पर अलग है। परंतु मुंबई स्थित इंस्टीट्यूट आॅफ केमिकल टेक्नॉलजी जिसे उसके पुराने नाम यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट आॅफ केमिकल टेक्नॉलजी अर्थात यूडीसीटी से अधिक जाना जाता है, वह सबसे उल्लेखनीय उदाहरण है। यूडीसीटी की स्थापना सन 1933 में की गई थी। संस्थान को अपने शोध पर गर्व है लेकिन इसके साथ ही जरा इस बात पर भी विचार कीजिए कि उसने अपने पुराने विद्यार्थियों की मदद से क्या योगदान किया। पुराने विद्यार्थियों की सूची पर एक नजर डालते हैं: मुकेश अंबानी (रिलायंस), अंजी रेड्डी (डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज), मधुकर पारेख (पिडिलाइट इंडस्ट्रीज), के के घार्दा (घार्दा केमिकल्स), अश्विन दानी (एशियन पेंट्स), नीलेश गुप्ता (ल्युपिन), रमेश माशेलकर (एनसीएल के निदेशक और सीएसआईआर के डीजी), एन सेकसरिया (अंबुजा सीमेंट्स) और एमएम शर्मा (जिन्होंने बाद में खुद यूडीसीटी का नेतृत्व किया और उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा स्थापित की)। सन 1800 के आरंभ में जब विल्हेम वॉन हंबॉल्ड ने दुनिया के पहले शोध विश्वविद्यालय यूनिवर्सिटी आॅफ बर्लिन के स्थापना सिद्धांत दिए तब से शोध विश्वविद्यालयों का लक्ष्य ज्ञान की तलाश करना रहा है। हमें यह बात इसमें शामिल करनी होगी कि ज्ञान खासतौर पर मानवता के काम तब आता है जब वह विश्वविद्यालय से बाहर छात्रों के मस्तिष्क में विराजमान होता है। यही कारण है कि उच्च शिक्षा में शोध किया जाना चाहिए। स्वायत्त प्रयोगशालाओं में शोध समाज को उसके प्राथमिक लाभ से वंचित करता है। जैसा कि स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के मानद प्रेसिडेंट गेरहार्ड कैस्पर ने दिल्ली में अपने एक भाषण में कहा भी था, ह्यएक विश्वविद्यालय के नेतृत्व वाला शोध ज्ञान के हस्तांतरण के लिए आज भी सबसे अच्छा योगदान बेहतरीन शिक्षा पाने वाले छात्रों के रूप में कर सकता है। (लेखक फोर्ब्स मार्शल के सह-चेयरमैन, सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष और सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी इनोवेशन ऐंड इकनॉमिक रिसर्च के चेयरमैन हैं)।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय सानी)। पाकिस्तान में आजकल एक चर्चा जोरों पर है। आए दिन इस बात पर डिबेट होती है कि भारत के पास इतना अनाज है कि दुनिया के तमाम देशों को वो खाद्यान्न की सप्लाई कर सकता है। हालांकि ये बात अतिश्योक्ति प्रतीत होती है पर इतना जरूर है कि खाद्यान्न के मामले में हम आत्मनिर्भर हुए हैं। पाकिस्तानी इस बात पर भी हैरान हैं कि भारत में प्रति हेक्टेयर पैदावार पाकिस्तान की तुलना में ढाई गुना ज्यादा कैसे है? यहां ये बताना आवश्यक है कि पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री मोहम्मद अली जिन्ना ने सन 1920 में ही भारत पाक विभाजन की रूपरेखा तैयार कर ली थी। कौन सा क्षेत्र अनाज उत्पादन और खनिज पदार्थों से भरपूर है, इसे चिन्हित कर लिया गया था ताकि भारत पाक विभाजन के समय इन्हीं क्षेत्रों को मांगकर पाकिस्तान बनाया जा सके। लाहौर, कराची और बलूचिस्तान खनिज बाहुल्य क्षेत्र है। पंजाब का अधिकांश क्षेत्र पाकिस्तान के हिस्से में आया जो दुग्ध और अनाज उत्पादन के मामले में अग्रणी था। इस लिहाज से अगर देखा जाये तो पाकिस्तान को भारत की अपेक्षा ज्यादा सम्पन्न होना चाहिए था। पर जैसे बंदर को हीरा पकड़ा दो तो वो उसे भी कंकड़ बना देता है, वैसा ही कुछ पाकिस्तान के साथ भी हुआ। तामसिक भोजन के शौकीन पाकिस्तानियों ने बगैर सोचे समझे स्वाद के लिए गाय, भैसों को भोजन बनाया। इन जानवरों की कमी के चलते प्राकृतिक खाद गोबर भी अनुपलब्ध हो गया जिसका स्थान यूरिया ने लिया। यूरिया के अंधाधुंध प्रयोग ने इनके खेतों को बंजर कर दिया। कभी गेंहूं, कपास, चावल का निर्यात करने वाला पाकिस्तान आज इनके आयात के लिए भारत के आगे गिड़गिड़ा रहा है। पाकिस्तान के ढाबों में एक रोटी की कीमत 50 रुपये है, दूध 200 रुपया लीटर है और मक्खन लगभग विलुप्त है। यही हाल अनाज का है दाल 1000 रुपया किलो तो आटा 170 रुपया किलो है। पाकिस्तानियों ने हिंदुओं-सिखों को मिटाने की हरसंभव कोशिश की। उनको महत्वहीन समझा। जिसका खामियाजा आज उन्हें भुगतना पड़ रहा है क्योंकि हिंदू-सिख गाय, भैंसों का महत्व जानते हैं, उनके पोषक होते हैं, उन्हें मारते नहीं हैं। जहां हिंदू-सिख होते हैं वहां भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि ही होती है। इसलिए विभाजन के समय कम उत्पादक क्षेत्र पाकर भी भारत आज पाकिस्तान की अपेक्षा प्रति हेक्टेयर ढाई गुना अनाज अधिक उत्पन्न कर रहा है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आकाश प्रकाश)। ऐंबिट कैपिटल की सलाहकार, अर्थशास्त्री ऋतिका मांकड़ मुखर्जी ने एक दिलचस्प रिपोर्ट लिखी है जिसका शीर्षक है-स्काउटिंग फॉर जाइंट्स। रिपोर्ट भारतीय कंपनियों में परिमाण की कमी से संबंधित है। उन्होंने अलग-अलग दौर और देशों की कंपनियों के आंकड़ों का राजस्व के आधार पर अध्ययन किया और पाया कि भारतीय कंपनियां अन्य देशों की कंपनियों की तुलना में छोटी हैं। देश में छोटी कंपनियां बहुत हैं जबकि वैश्विक आकार की कम। उनके विश्लेषण में बहुत विस्तृत ब्योरे और कुछ दिलचस्प आंकड़े हैं। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादा भारतीय कंपनियां अपना आकार बढ़ाने में सक्षम नहीं हैं। 7 फीसदी की वास्तविक (और 13 फीसदी की नॉमिनल) जीडीपी और 2.8 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था के बावजूद हमारी कंपनियां उभरते बाजारों की तुलना में भी बहुत छोटी हैं। उन्होंने बैंकिंग, वित्तीय सेवा और बीमा कंपनियों (बीएफएसआई) को छोड़कर 2,865 सूचीबद्ध कंपनियों का अध्ययन किया और पाया कि करीब 40 प्रतिशत कंपनियों का राजस्व एक अरब रुपये से कम है। अर्थव्यवस्था के विकास के बावजूद बीते दशक में यह अनुपात नहीं बदला और न ही छोटी कंपनियों की हिस्सेदारी घटी। देश की सूचीबद्ध कंपनियों में से 55 प्रतिशत का राजस्व एक अरब से 100 अरब रुपये के बीच है। जबकि 5 प्रतिशत से भी कम कंपनियों का राजस्व 100 अरब रुपये से अधिक है। केवल 12 कंपनियों का राजस्व एक लाख करोड़ रुपये से अधिक है। बीएफएसआई में भी ऐसा ही है। गैर सूचीबद्ध कंपनियों में भी औसत आकार छोटा है। भारत की तुलना अन्य उभरते बाजारों से की जाए तो अंतर और स्पष्ट है। एक ओर जहां देश की 40 फीसदी कंपनियों का राजस्व एक अरब रुपये से कम है, वहीं उभरते बाजारों में यह 12 फीसदी है। हमारी 55 फीसदी कंपनियों का राजस्व एक से 100 अरब रुपये के बीच है लेकिन उभरते बाजारों में ऐसी कंपनियां 64 फीसदी हैं। हमारी 4 फीसदी कंपनियों का राजस्व 100 अरब रुपये से अधिक है जबकि उभरते बाजारों में यह 15 प्रतिशत है। छोटी कंपनियां बड़ी क्यों नहीं हो पा रहीं? क्या इसका कोई अर्थ है? इस पर ध्यान क्यों दें? हमारी नीति ऐतिहासिक रूप से आकार और परिमाण के खिलाफ रही है। 1991 से पहले देश में एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार आयोग (एमआरटीपीसी) के रूप में नियामकीय ढांचा था। हम आर्थिक शक्ति के चुनिंदा हाथों में सिमटने को लेकर चिंतित रहते थे। इसके बाद श्रम कानून, लघु उद्योगों को संरक्षण या अप्रत्यक्ष कराधान आदि के रूप में कानून ने हमेशा छोटी कंपनियों को प्रोत्साहित किया और बड़ी कंपनियों को हतोत्साहित। नियामकीय जटिलताओं के कारण कंपनियों का आकार बढ़ाना कठिन बना रहा। न्यायिक और नियामकीय माहौल भी स्थिर नहीं रहा है। ऐसे में बड़ी कंपनियों में निवेश को प्रोत्साहन नहीं मिला। चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़कर हमारा घरेलू बाजार आज इतना बड़ा नहीं है कि वैश्विक परिमाण का समर्थन कर सके। एक लाख करोड़ रुपये से अधिक राजस्व वाली 12 कंपनियों पर नजर डालें तो ये सभी कंपनियां या तो ऊर्जा क्षेत्र की सरकारी कंपनियां हैं, टाटा स्टील और टाटा मोटर्स जैसी कंपनियां या फिर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और महिंद्रा समूह जैसे बड़े कारोबारी समूह। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज इकलौता अपवाद है जो अपने क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर शीर्ष पर है। कुछ ही ऐसी कंपनियां हैं जिनका आकार भी बढ़ा है और जो घरेलू तौर पर एक उद्योग पर केंद्रित हैं। हमारी कंपनियां शोध एवं विकास पर भी अधिक व्यय नहीं करतीं। इस विषय पर पहले भी बात हो चुकी है। कंपनियों का आकार छोटा होने के कारण वे शोध एवं विकास पर अधिक खर्च नहीं कर पातीं लेकिन यह कमी नवाचार को प्रभावित करती है। हम वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का हिस्सा भी नहीं बन सके। यदि हम स्मार्टफोन के मामले में वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा होते तो कई कंपनियों का स्वरूप बदल सकता था। ताइवान का इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र इसका उदाहरण है जो ऐपल कंपनी की आपूर्ति शृंखला पर आधारित है। प्रतिस्पर्धा और निर्यात को लेकर हमारे झुकाव की कमी जाहिर करता है। उत्पादकता और परिमाण में सीधा संबंध है। बड़ी फर्म के पास निवेश के लिए संसाधन होता है और वे आधुनिक तकनीक और प्रबंधन अपना सकती हैं। यदि हमारा कारोबारी क्षेत्र छोटा बना रहा तो प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा। तकनीक जिस तरह उद्योगों को बदल रही है उसे देखते हुए निवेश ओर आधुनिकीकरण की कमी तथा नए व्यवहार से दूर रहना हमें गैर प्रतिस्पर्धी बनाएगा। दो ऐसे रुझान हैं जो इसे बदल सकते हैं। पहला तो यही कि स्टार्टअप का परिदृश्य बहुत अच्छा है। अमेरिका और चीन के बाद भारत सबसे बड़ा स्टार्टअप वाला देश है। सरकार ने इस क्षेत्र में मदद का वास्तविक प्रयास किया है। देश में करीब 30 यूनिकॉर्न (एक अरब डॉलर का कारोबार) और 2-3 डेकाकॉर्न (10 अरब डॉलर का कारोबार) कंपनियां हैं। इनमें से अधिकांश अगले दो वर्ष तक अपनी जगह बनी रहेंगी। इनमें से ज्यादातर का कारोबारी मॉडल तकनीक आधारित है। तकनीक की मदद से कारोबार का परिमाण तेजी से बढ़ाया जा सकता है। वैश्विक कारोबारी मॉडल वाली अन्य कंपनियां या तो एनालिटिक्स में हैं या सॉफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में। इनका विकास तेजी से हो सकता है क्योंकि ये डिजिटल हैं और इनकी भौतिक जरूरतें उतनी नहीं हैं। जीएसटी और नोटबंदी के साथ अर्थव्यवस्था तेजी से औपचारिक हुई है। ऐसे में आशा यही करनी चाहिए कि बड़ी भारतीय कंपनियां तेजी से स्वरूप विस्तार करेंगी। जोखिम से बचने की प्रवृत्ति आम है और पूंजी केवल बड़े और सुरक्षित कर्जदारों के पास जा रही है। तमाम क्षेत्रों में हमें यही देखने को मिल रहा है कि बड़े कारोबारी मजबूत हो रहे हैं और सुदृढ़ीकरण कर रहे हैं। इससे जहां उनका आकार तेजी से बढ़ेगा और आर्थिक प्रतिफल तथा मुनाफा बढ़ेगा। वहीं इसकी कमियां भी हैं। कॉपोर्रेट मुनाफे की कमजोरी तथा बैलेंस शीट की हालत और वित्तीय तंत्र में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले समय में 2-3 बड़े कारोबारी समूहों का उभार होगा जिनके पास विसंगतिपूर्ण ढंग से संपत्ति की ज्यादा हिस्सेदारी होगी। इस पर ध्यान देना होगा। शायद हम नहीं चाहेंगे कि ऐसा हो और 2-3 घराने कारोबारी जगत पर नियंत्रण रखें। भारतीय कारोबारी जगत में परिमाण की समस्या विद्यमान है। यह उत्पादकता और शोध एवं विकास को प्रभावित करता है। यह समय के साथ सुधर जाएगा लेकिन हमें इस बात को लेकर सावधान रहना होगा कि हम कहीं ऐसी आर्थिक शक्ति न बन जाएं जहां शक्ति एक ही जगह पर एकत्रित हो।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (एनके ठाकुर)। कांग्रेस में कई बार उतार-चढ़ाव आए, लेकिन हर बार कांग्रेस और मजबूती से उभरकर सामने आई। वर्षों तक इस दल का शासन देश पर रहा। वर्षों से इस पर मनन किया जाता रहा है कि सवा सौ वर्ष पुरानी इस पार्टी को अभी पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में मुंह की क्यों खानी पड़ी! कहीं भी कांग्रेस की सरकार क्यों नहीं बन सकी! पिछले दिनों जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए उनमें एक पंजाब ही कांग्रेस के कब्जे में था। वहां उसकी सरकार थी, लेकिन एक सड़ी मछली ने पूरे तालाब को गंदा कर दिया जिससे पंजाब भी कांग्रेस के हाथ से फिसल गया। पंजाब, जहां भाजपा की आंधी में भी अपनी पार्टी की सरकार को बचाकर रखने वाले कद्दावर नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को सत्ताच्युत करके अपने ही हाथों उस राज्य को आम आदमी पार्टी के हाथों में सौंप दिया। दूसरा राज्य उत्तराखंड था, जहां कांग्रेस को कुछ उम्मीद थी कि हो सकता है कि भाजपा के हाथों से सत्ता खिसक जाए, लेकिन भाजपा की नीति के सामने उसकी एक नहीं चली और फिर से सरकार भाजपा की ही बनी। भाजपा के नीति-निमार्ताओं ने इन राज्यों की जनता की मानसिकता को पढ़कर अच्छी तरह समझ लिया था और उसके अनुसार ही अपनी नीतियों पर काम करके जनमानस के मन में अपने दल के प्रति विश्वास जगाया और फिर से सरकार बनाकर जनता में अपना विश्वास बरकरार रखने में कामयाब रहे। इन पांच राज्यों के चुनाव में यही लगा कि शायद विपक्ष का कोई ऐसा चेहरा ही नहीं है जो इन राज्यों में चुनाव में अपनी पार्टी को जीत दिला सकें। इन राज्यों के बड़े-बड़े कांग्रेस के नेता राज्य में अपनी सरकार बनाने की बात कौन करे, वह अपनी सीट भी नहीं बचा सके। ऐसा लगता है कि मतदाताओं के मन में कांग्रेस के प्रति उदासीनता का भाव आ गया है और उसकी समझ में यह बात आ गई कि भाजपा का कोई विकल्प आज कांग्रेस के पास नहीं है। अभी चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस की स्थिति पर एक प्रस्ताव पार्टी हाईकमान के समक्ष रखा। इसके तुरंत बाद से कांग्रेस के असंतुष्ट नेता इस बात को बर्दास्त नहीं कर पा रहे हैं कि कोई उसकी कमी को दूर करने के लिए उसे सलाह दे, उनसे राय-मशविरा करे। इसलिए प्रशांत किशोर के हाई कमान को प्रस्ताव देने के बाद से ही असंतुष्ट खेमा अपनी पार्टी के अंदर मरने-कटने और दल को छिन्न-भिन्न करने के लिए तैयार हो गए हैं। ऐसे असंतुष्ट नेता प्रशांत किशोर को कांग्रेस में शामिल करने और उनके प्रस्ताव को ढकोसला मानते हुए यह भी कह रहे हैं कि इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। वह इस बात पर अडिग होकर कहते हैं कि पार्टी की ध्वस्त हो चुकी जमीन को वापस हासिल करना कोई जादू का खेल नहीं है कि एक रणनीतिकार के जादुई नुस्खे से अचानक सब कुछ सही हो जाएगा। उनका यह भी कहना है कि कांग्रेस की राजनीतिक वापसी की चाबी इसके लाखों कार्यकतार्ओं के पास है, लेकिन दुर्भाग्यवश जमीन से आ रही इस आवाज को भी नजरंदाज किया जा रहा है। वे यह भी कहते हैं कि बैठक में उनको अलग रखकर उनके भरोसे को तोड़ा गया। बैठक में सबसे संवाद करते हुए प्रस्ताव पर कांग्रेस अध्यक्ष को विचार करना चाहिए था, जो नहीं किया गया। वे यह भी कहते हैं कि इस तरह कुछ चुनिंदा लोगों के साथ बैठक करना पार्टी के लिए अहितकारी ही होगा। इसे पार्टी के फायदे की बात कहना निहायत बेवकूफी है। यह भी कहा जा रहा है कि असुंतुष्ट गुटों का गुस्सा इतना बढ़ गया है कि कुछ नेता इस प्रकरण पर बातचीत के मूड में भी नहीं हैं तथा अंदर-ही-अंदर पार्टी में बड़े विस्फोट की तैयारी में जुट गए हैं। यहां तक कि केरल से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. जे. कुरियन के इस बयान का हवाला देते हुए कहा गया है कि नेहरू गांधी परिवार को पार्टी नेतृत्व छोड़ देना चाहिए। हो सकता है कि इस मामले पर चिंतन शिविर के बाद इस दिशा में कुछ बड़ी बात हो। ज्ञात हो कि 13 मई से राजस्थान के उदयपुर में तीन दिनों के लिए चिंतन शिविर होने जा रहा है, जिसमें देश के विभिन्न भागों से लगभग 400 नेता हिस्सा लेंगे। इसकी तैयारी में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राज्य के प्रभारी अजय माकन जुटे हुए हैं और उदयपुर का दौरा भी कर चुके हैं। जो भी हो, प्रशांत किशोर ने जो सुझाव दिया है उस पर कांग्रेस अध्यक्ष ने आठ कमेटी बनाकर उसकी मजबूती को परख कर उसपर अपने वरिष्ठ नेताओं को रिपोर्ट देने को कहा है, इसलिए प्रशांत किशोर का कांग्रेस में शामिल होने का बाजार गर्म था, उस पर विराम लग गया है, क्योंकि चुनावी राजनीतिकार प्रशांत किशोर स्वयं कांग्रेस में जाने का खण्डन कर दिया है। आइए, अब देखते हैं कि पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर का कांग्रेस के उत्थान के लिए जो प्रस्ताव दिया उसका लब्बो-लुआब क्या है। बताया जाता है कि प्रशांत किशोर ने पार्टी बैठक में एक प्लान बताया है जिसके मुताबिक कांग्रेस 370 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। इतना ही नहीं, कुछ राज्यों में गठबंधन को लेकर भी फॉमूर्ला सामने रखा गया है। प्रशांत किशोर ने यह भी सुझाव दिया है कि कांग्रेस को यूपी, बिहार और ओडिशा में अकेले चुनाव लड़ना चाहिए, जबकि तमिलनाडु, प. बंगाल और महाराष्ट्र में गठबंधन करना चाहिए। पीके के इस प्लान पर राहुल गांधी ने भी सहमति जताई है। पीके ने एक विस्तृत प्रेजेंटेशन के जरिये बताया था कि कैसे कांग्रेस को चुनाव की रणनीति तैयार करने की जरूरत है। उन्होंने बताया है कि कांग्रेस को राज्य-दर-राज्य चुनावी रणनीति पर आगे बढ़ने की जरूरत है। इसके अलावा पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की जरूरत पर भी बल दिया गया है। प्रशांत किशोर ने कहा कि पार्टी के वैसे राज्यों में गठबंधन के लिए ज्यादा हाथ-पांव नहीं मारना चाहिए जहां उसकी उपस्थिति नगण्य है, बल्कि यहां पार्टी को नई शुरुआत के बारे में सोचना चाहिए। इसके अलावा कांग्रेस को वैसे साझीदार को चुनने को प्राथमिकता देनी चाहिए जो अपना वोट ट्रांसफर करवा सके, तभी चुनावी गठबंधन सफल होगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। मोदी सरकार कोरोना संक्रमण में बगैर किसी बहानेबाजी के अपने सुधार कार्यक्रम में लगी है। अभी 1986 में बनी शिक्षा नीति के अनुसार ही शिक्षा व्यवस्था को संचालित किया जा रहा था। 1992 में इस नीति में कुछ बदलाव जरूर किया गया, पर उसे पर्याप्त नहीं माना जा रहा था। इसलिए भाजपा ने 2014 के अपने चुनाव घोषणा-पत्र में नई शिक्षा नीति लाने का भी अहम वादा किया था। सत्ता में आने के बाद उसने इस दिशा में कदम भी उठा दिया था। आखिरकार व्यापक सलाह-मशविरों और सुझावों के बाद के. कस्तूरीरंगन समिति द्वारा तैयार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित कर दी गई है। स्वाभाविक ही इससे शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षित बदलाव की उम्मीद जागती है। नई शिक्षा नीति का मकसद स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक समय की मांग के अनुसार पाठ्यक्रमों में बदलाव और उसके जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवाओं को प्रतस्पिर्धी परिवेश के लिए तैयार करना है। इससे युवाओं में कौशल विकास, नवोन्मेषी अनुसंधान और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है। नई शिक्षा नीति का जोर विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और कौशल विकास के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण पर भी है। इसके अलावा शिक्षा खर्च को छह फीसद तक ले जाने का संकल्प है। अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर फिर से शिक्षा मंत्रालय हो गया है। हमारी प्रतिस्पर्धा अब वैश्विक हो गयी है। यूपीए सरकार के समय ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने की बात उठी थी। उसके अनुसार शिक्षा क्षेत्र में बदलाव लाने और रोजगारोन्मुख शिक्षा प्रणाली बनाने का संकल्प लिया गया था। मगर इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई थी। फिर हमारे देश में जिस तरह शिक्षा क्षेत्र में विषमता बढ़ती गई है, उसमें बुनियादी शिक्षा और फिर उच्च शिक्षा के स्तर पर व्यावहारिक बदलाव करने की मांग उठती रही है। फिलहाल सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों की पढ़ाई-लिखाई के स्तर और सुविधाओं में बहुत बड़ा अंतर नजर आता है। इसे लेकर व्यापक सामाजिक असंतोष भी देखा जाता है। इस अंतर को पाटना बहुत जरूरी है। फिर उच्च शिक्षा के स्तर पर हमारे देश के विश्वविद्यालय पढ़ाई-लिखाई के तरीके, अनुसंधान, सुविधाएं आदि के पैमाने पर दुनिया के विश्वविद्यालयों के सामने फिसड्डी साबित होते रहे हैं। इस स्थिति से उबरने की जरूरत भी रेखांकित की जाती रही है। अब उच्च शिक्षा केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के तहत विद्यार्थियों को एक से दूसरे देशों में भेजने का मामला नहीं रह गया है। यह व्यावसायिक मामला भी है। नई शिक्षा नीति में इसे ध्यान में रखते हुए सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहित और विकसित करने की रूपरेखा तैयार की गई है। नई शिक्षा नीति में इस बिंदु पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है। फिर पाठ्यक्रमों का स्वरूप रोजगार और विशेष योग्यता अर्जित करने, अनुसंधान आदि के आधार पर तैयार करने पर जोर दिया गया है। दरअसल, अब शिक्षा प्रणाली को न सिर्फ अपने देश की, बल्कि वैश्विक जरूरतों के मुताबिक ढालना बहुत जरूरी है, ताकि विज्ञान, तकनीकी शिक्षा, सामाजिक विज्ञान आदि क्षेत्रों में प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका मिल सके। नई शिक्षा नीति से यह मकसद सध सकता है। संघ भी खुश और शिक्षाविद भी...: नई एजुकेशन पॉलिसी का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन की कमेटी ने देशभर की अलग-अलग संस्थाओं से जानकारियां लीं। इनमें एक बड़ी आवाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भी रही। बताया गया है कि आरएसएस से जुड़े कुछ लोगो भी शिक्षा नीति की ड्राफ्टिंग में शामिल रहे हैं। इसके लिए बकायदा संघ के कार्यकतार्ओं, भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सरकार के प्रतिनिधि और शिक्षा नीति के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष की मुलाकात भी हुई। भाषा के फॉर्मूले पर: हालांकि, केंद्रीय कैबिनेट ने जिस शिक्षा नीति को मंजूरी दी है, उसमें सरकार बीच का रास्ता अपनाती दिखी है। माना जा रहा है कि संघ के सुझाव के मुताबिक ही एचआरडी मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय करने पर सहमति बनी। संघ की अन्य कई मांगों पर केंद्र सरकार ने दूरी बना ली। खासकर बच्चों के लिए एक स्टेज पर तीन भाषाओं के फॉमूर्ले के प्रस्ताव पर। केंद्र सरकार ने उस प्रावधान को महत्व नहीं दिया है, जिसमें हिंदी को 6वीं क्लास के बाद अनिवार्य भाषा करार दिया गया था। खासकर तमिलनाडु के राजनीतिक दलों के विरोध के बाद, जिन्होंने इसे हिंदी को थोपने की तरकीब बताया था। लेकिन केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को जिस ड्राफ्ट को मंजूरी दी, उसमें भाषाई मामलों के लिए राज्यों को ज्यादा छूट दी गई है और कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। यानी छात्र जो भाषा सीखेंगे वो राज्य सरकार, क्षेत्र और खुद छात्रों का चुनाव होगा, जब तक तीन में से दो भाषाएं स्थानीय ही होंगी। विदेशी यूनिवर्सिटी के फॉर्मूले पर: दूसरी तरफ आरएसएस से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच के कड़े विरोध के बावजूद नई शिक्षा नीति में विदेशी यूनिवर्सिटियों के लिए भारत में कैंपस खोलने का प्रावधान जोड़ा गया है। हालांकि, इसके साथ ही आरएसएस की भारत के प्राचीन ज्ञान पर जोर देने की बात को नई नीति में रखा गया है। ड्राफ्ट में कहा गया है कि इस तरह के तत्व छात्रों को स्कूली पाठ्यक्रम के जरिए सही और वैज्ञानिक जरियों से ही पढ़ाए जाएंगे। नई शिक्षा नीति पर आरएसएस से जुड़े लोगों ने कहा कि उनकी मांगों को माना गया और वे नई नीति से काफी खुश हैं। (लेखिका उर्सूलाइन इंटर कॉलेज की प्राचार्या हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (निकिता वशिष्ठ)। पॉलिसीधारकों व खुदरा भागीदारों समेत निवेशकों ने भारतीय जीवन बीमा निगम में 47,000 करोड़ रुपये की रकम गंवा दी क्योंंकि बीमा दिग्गज का बाजार पूंजीकरण कारोबारी सत्र के आखिर में 5.53 लाख करोड़ रुपये रह गया जबकि आईपीओ मूल्यांकन 6 लाख करोड़ रुपये का था। बीएसई पर कंपनी का शेयर 8.6 फीसदी की गिरावट के साथ 867 रुपये पर सूचीबद्ध हुआ और कारोबारी सत्र में 860 रुपये के निचले स्तर तक गया। हालांकि अंत में यह थोड़ा सुधरा और इश्यू प्राइस 949 रुपये के मुकाबले 8 फीसदी गिरकर 875 रुपये पर बंद हुआ। इसकी तुलना में बेंचमार्क सूचकांकों में मंगलवार को 2.5-2.5 फीसदी की उछाल दर्ज हुई। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मैक्वेरी ने इस शेयर पर कवरेज शुरू किया है और इसे तटस्थ रेटिंग दी है क्योंंकि आने वाले समय में कंपनी की बढ़त को लेकर कई चुनौतियां दिख रही हैं। ब्रोकरेज ने 17 मई की रिपोर्ट में कहा है, एलआईसी मोटे तौर पर एक ही योजना पार्टिसिपेटिंग पॉलिसीज बेचती है। प्रबंधन ने पहले न्यू बिजनेस मार्जिन के लिहाज से योजनाओं के लाभ पर कभी भी नजर नहीं डाला और एम्बेडेड वैल्यू के रिटर्न पर भी। ऐसे में बिक्री का तरीका बदलने और उच्च मार्जिन वाली योजनाएं बेचने की शुररुआत हमारी नजर में मुश्किल नजर आ रही है। एलआईसी के लिए टिकट साइज भी निजी क्षेत्र के मुकाबले पाचवां हिस्सा है, जो लक्षित सेगमेंट अलग रहने की बात करता है। साथ ही छोटे टिकट साइज वाले सेगमेंट में नॉन पार सेविंग्स प्रॉडक्ट्स की बिक्री आसान नहीं होगी। दूसरा, बैंकएश्योरेंस बिजनेस को बढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंंकि तीन सबसे बड़े बैंक एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एसबीआई बैंकएश्योरेंस के लिए पार्टनर नहीं है। विश्लेषक हालांकि इस शेयर के लंबी अवधि के परिदृश्य को लेकर तेजी का नजरिया बनाए हुए हैं क्योंंकि एलआईसी भारत में सबसे बड़ी परिसंपत्ति प्रबंधक है और 31 दिसंबर 2021 को एकल आधार पर उसका एयूएम 40.1 लाख करोड़ रुपये था। विश्लेषकों ने हालांकि कहा कि कम कीमत पर सूचीबद्धता इस शेयर को और भी सस्ते स्तर पर खरीदने का मौका है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नीरज कुमार दुबे)। 2019 में कांग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल ने पार्टी छोड़ने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे एक पत्र में दावा किया कि कांग्रेस ने देश में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है और उसने हर चीज का महज विरोध ही किया है। हाल ही में उदयपुर में संपन्न कांग्रेस के चिंतन शिविर से पहले पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेसियों से कहा था कि पार्टी का कर्ज उतारने का समय आ गया है। सोनिया गांधी के इस आह्वान के बाद कितने कांग्रेसियों ने कर्ज उतारा इसका तो कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है लेकिन कांग्रेस का पटका उतार कर पार्टी छोड़ने का ऐलान दो बड़े नेता सुनील जाखड़ और अब हार्दिक पटेल कर चुके हैं। जी हाँ, गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार में उतर चुके राहुल गांधी को झटका देते हुए हार्दिक पटेल ने कांग्रेस छोड़ने का ऐलान कर दिया है। पाटीदार आरक्षण आंदोलन से उभरे नेता हार्दिक पटेल ने कांग्रेस की गुजरात इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष पद और पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देकर गुजरात की राजनीति में नये समीकरण बना दिये हैं। हार्दिक पटेल का कहना है कि वह कांग्रेस के ऐसे वर्किंग प्रेसिडेंट थे जिसके पास कोई वर्क नहीं था। हार्दिक कांग्रेस से नाराज चल रहे हैं इस बात की खबरें तो बहुत दिनों से चल रही थीं। माना जा रहा था कि वह गुजरात में अपना आधार बनाने की कोशिश कर रही आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं। लेकिन हार्दिक शायद अब अपने राजनीतिक कैरियर के साथ और प्रयोग नहीं करना चाहते इसलिए कांग्रेस छोड़ते समय उन्होंने जो पत्र लिखा है वह दर्शा रहा है कि हार्दिक पटेल जल्द ही भाजपा में शामिल होकर इस साल के अंत में होने वाला विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। संभवत: आने वाले दिनों में भाजपा जल्द ही कहे- हार्दिक स्वागत। क्योंकि हार्दिक की युवाओं के बीच अच्छी पकड़ और पटेलों के बीच समर्थन का लाभ उस पार्टी को होना ही है जिसके साथ हार्दिक जायेंगे। वैसे तो गुजरात में भाजपा का अपना जनाधार है लेकिन फिर भी वह कभी भी जीत के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखती। हार्दिक ने किन कारणों से कांग्रेस छोड़ी : 2019 में कांग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल ने पार्टी छोड़ने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे एक पत्र में दावा किया कि कांग्रेस ने देश में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है और उसने हर चीज का महज विरोध ही किया है। हार्दिक पटेल ने बिना कोई नाम लिए कहा कि उन्होंने जब भी गुजरात के लोगों के हितों से जुड़े मुद्दे उठाये, तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता फोन पर अपने संदेश देखने में मसरूफ होते और कुछ नेता जब पार्टी और देश को उनकी जरूरत होती तब विदेश में मजे कर रहे होते थे। हम आपको बता दें कि कांग्रेस छोड़ने वाले कई नेता यही आरोप लगाते रहे हैं कि जब-जब उन्होंने वरिष्ठ नेताओं के समक्ष अपने मुद्दे उठाये तो उनकी बात पर ध्यान देने की बजाय नेता या तो कुत्ते को बिस्किट खिलाने, मोबाइल फोन पर गेम खेलने, मोबाइल फोन पर मैसेज देखने आदि में बिजी रहते थे। कांग्रेस की क्या प्रतिक्रिया है : वहीं, कांग्रेस ने हार्दिक पटेल के इस्तीफे को लेकर आरोप लगाया है कि उनके त्यागपत्र में इस्तेमाल शब्द भारतीय जनता पार्टी के हैं और अब भाजपा के आका तय करेंगे कि हार्दिक का अगला कदम क्या होगा। पार्टी प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल ने यह दावा भी किया कि गुजरात में भाजपा अपने खिसकते जनाधार के कारण कांग्रेस को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, गुजरात में राहुल गांधी की हालिया रैली के बाद भाजपा में डर पैदा हो गया है। उसका आधार खिसक रहा है। गोहिल ने कहा कि डरी और बौखलाई भाजपा कांग्रेस के आधार को कमजोर बनाने के लिए सिर्फ साम, दाम, दंडभेद का सहारा ही नहीं ले रही है, बल्कि निम्न स्तर पर जाकर वार कर रही है। दूसरी तरफ हार्दिक ने अपने पत्र में कांग्रेस के बारे में जो कुछ कहा है वह विधानसभा चुनावों में पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है। क्योंकि गुजरात की राजनीति में एक तो हिंदुत्व का प्रभाव है साथ ही गुजराती गौरव की भावना भी प्रबल है। इसलिए हार्दिक पटेल के यह दो आरोप कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाले होंगे- 1. चाहे, अयोध्या में राम मंदिर हो, जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाना, जीएसटी लागू करना, भारत लंबे समय से इन मुद्दों का समाधान चाहता था और कांग्रेस ने केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है। 2. वरिष्ठ नेता ऐसे बर्ताव करते हैं, जैसे वे गुजरात और गुजरातियों से नफरत करते हों। कांग्रेस कैसे गुजरात के लोगों से अपेक्षा करती है कि वे उन्हें हमारे राज्य का नेतृत्व करने के एक विकल्प के रूप में देखें? बहरहाल, राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर तंज कसते हुए हार्दिक पटेल का यह कहना कि जब भी हमारा देश परेशानियों का सामना कर रहा होता है और कांग्रेस को नेतृत्व की जरूरत होती है, तो पार्टी के नेता विदेश में मजे कर रहे होते हैं महज एक आरोप भर नहीं है। याद कीजिये इस साल के शुरू में जब सभी राजनीतिक दल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटे हुए थे तब राहुल गांधी विदेश में थे, इसके चलते कांग्रेस की तैयारियां काफी देर से शुरू हो पाई थीं और देर से शुरू होने वाली तैयारियों का हश्र चुनाव परिणाम ने बता ही दिया है।
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