विचार

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Published / 2022-05-19 16:53:12
एलआईसी के लिए मैक्वेरी का लक्ष्य 1,000 रुपये

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (निकिता वशिष्ठ)। पॉलिसीधारकों व खुदरा भागीदारों समेत निवेशकों ने भारतीय जीवन बीमा निगम में 47,000 करोड़ रुपये की रकम गंवा दी क्योंंकि बीमा दिग्गज का बाजार पूंजीकरण कारोबारी सत्र के आखिर में 5.53 लाख करोड़ रुपये रह गया जबकि आईपीओ मूल्यांकन 6 लाख करोड़ रुपये का था। बीएसई पर कंपनी का शेयर 8.6 फीसदी की गिरावट के साथ 867 रुपये पर सूचीबद्ध हुआ और कारोबारी सत्र में 860 रुपये के निचले स्तर तक गया। हालांकि अंत में यह थोड़ा सुधरा और इश्यू प्राइस 949 रुपये के मुकाबले 8 फीसदी गिरकर 875 रुपये पर बंद हुआ। इसकी तुलना में बेंचमार्क सूचकांकों में मंगलवार को 2.5-2.5 फीसदी की उछाल दर्ज हुई। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मैक्वेरी ने इस शेयर पर कवरेज शुरू किया है और इसे तटस्थ रेटिंग दी है क्योंंकि आने वाले समय में कंपनी की बढ़त को लेकर कई चुनौतियां दिख रही हैं। ब्रोकरेज ने 17 मई की रिपोर्ट में कहा है, एलआईसी मोटे तौर पर एक ही योजना पार्टिसिपेटिंग पॉलिसीज बेचती है। प्रबंधन ने पहले न्यू बिजनेस मार्जिन के लिहाज से योजनाओं के लाभ पर कभी भी नजर नहीं डाला और एम्बेडेड वैल्यू के रिटर्न पर भी। ऐसे में बिक्री का तरीका बदलने और उच्च मार्जिन वाली योजनाएं बेचने की शुररुआत हमारी नजर में मुश्किल नजर आ रही है। एलआईसी के लिए टिकट साइज भी निजी क्षेत्र के मुकाबले पाचवां हिस्सा है, जो लक्षित सेगमेंट अलग रहने की बात करता है। साथ ही छोटे टिकट साइज वाले सेगमेंट में नॉन पार सेविंग्स प्रॉडक्ट्स की बिक्री आसान नहीं होगी। दूसरा, बैंकएश्योरेंस बिजनेस को बढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंंकि तीन सबसे बड़े बैंक एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एसबीआई बैंकएश्योरेंस के लिए पार्टनर नहीं है। विश्लेषक हालांकि इस शेयर के लंबी अवधि के परिदृश्य को लेकर तेजी का नजरिया बनाए हुए हैं क्योंंकि एलआईसी भारत में सबसे बड़ी परिसंपत्ति प्रबंधक है और 31 दिसंबर 2021 को एकल आधार पर उसका एयूएम 40.1 लाख करोड़ रुपये था। विश्लेषकों ने हालांकि कहा कि कम कीमत पर सूचीबद्धता इस शेयर को और भी सस्ते स्तर पर खरीदने का मौका है।

Published / 2022-05-18 13:39:42
सोनिया गांधी ने तो पार्टी का कर्ज उतारने को कहा था, मगर नेता कांग्रेस छोड़ रहे हैं...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नीरज कुमार दुबे)। 2019 में कांग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल ने पार्टी छोड़ने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे एक पत्र में दावा किया कि कांग्रेस ने देश में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है और उसने हर चीज का महज विरोध ही किया है। हाल ही में उदयपुर में संपन्न कांग्रेस के चिंतन शिविर से पहले पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेसियों से कहा था कि पार्टी का कर्ज उतारने का समय आ गया है। सोनिया गांधी के इस आह्वान के बाद कितने कांग्रेसियों ने कर्ज उतारा इसका तो कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है लेकिन कांग्रेस का पटका उतार कर पार्टी छोड़ने का ऐलान दो बड़े नेता सुनील जाखड़ और अब हार्दिक पटेल कर चुके हैं। जी हाँ, गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार में उतर चुके राहुल गांधी को झटका देते हुए हार्दिक पटेल ने कांग्रेस छोड़ने का ऐलान कर दिया है। पाटीदार आरक्षण आंदोलन से उभरे नेता हार्दिक पटेल ने कांग्रेस की गुजरात इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष पद और पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देकर गुजरात की राजनीति में नये समीकरण बना दिये हैं। हार्दिक पटेल का कहना है कि वह कांग्रेस के ऐसे वर्किंग प्रेसिडेंट थे जिसके पास कोई वर्क नहीं था। हार्दिक कांग्रेस से नाराज चल रहे हैं इस बात की खबरें तो बहुत दिनों से चल रही थीं। माना जा रहा था कि वह गुजरात में अपना आधार बनाने की कोशिश कर रही आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं। लेकिन हार्दिक शायद अब अपने राजनीतिक कैरियर के साथ और प्रयोग नहीं करना चाहते इसलिए कांग्रेस छोड़ते समय उन्होंने जो पत्र लिखा है वह दर्शा रहा है कि हार्दिक पटेल जल्द ही भाजपा में शामिल होकर इस साल के अंत में होने वाला विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। संभवत: आने वाले दिनों में भाजपा जल्द ही कहे- हार्दिक स्वागत। क्योंकि हार्दिक की युवाओं के बीच अच्छी पकड़ और पटेलों के बीच समर्थन का लाभ उस पार्टी को होना ही है जिसके साथ हार्दिक जायेंगे। वैसे तो गुजरात में भाजपा का अपना जनाधार है लेकिन फिर भी वह कभी भी जीत के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखती। हार्दिक ने किन कारणों से कांग्रेस छोड़ी : 2019 में कांग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल ने पार्टी छोड़ने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे एक पत्र में दावा किया कि कांग्रेस ने देश में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है और उसने हर चीज का महज विरोध ही किया है। हार्दिक पटेल ने बिना कोई नाम लिए कहा कि उन्होंने जब भी गुजरात के लोगों के हितों से जुड़े मुद्दे उठाये, तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता फोन पर अपने संदेश देखने में मसरूफ होते और कुछ नेता जब पार्टी और देश को उनकी जरूरत होती तब विदेश में मजे कर रहे होते थे। हम आपको बता दें कि कांग्रेस छोड़ने वाले कई नेता यही आरोप लगाते रहे हैं कि जब-जब उन्होंने वरिष्ठ नेताओं के समक्ष अपने मुद्दे उठाये तो उनकी बात पर ध्यान देने की बजाय नेता या तो कुत्ते को बिस्किट खिलाने, मोबाइल फोन पर गेम खेलने, मोबाइल फोन पर मैसेज देखने आदि में बिजी रहते थे। कांग्रेस की क्या प्रतिक्रिया है : वहीं, कांग्रेस ने हार्दिक पटेल के इस्तीफे को लेकर आरोप लगाया है कि उनके त्यागपत्र में इस्तेमाल शब्द भारतीय जनता पार्टी के हैं और अब भाजपा के आका तय करेंगे कि हार्दिक का अगला कदम क्या होगा। पार्टी प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल ने यह दावा भी किया कि गुजरात में भाजपा अपने खिसकते जनाधार के कारण कांग्रेस को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, गुजरात में राहुल गांधी की हालिया रैली के बाद भाजपा में डर पैदा हो गया है। उसका आधार खिसक रहा है। गोहिल ने कहा कि डरी और बौखलाई भाजपा कांग्रेस के आधार को कमजोर बनाने के लिए सिर्फ साम, दाम, दंडभेद का सहारा ही नहीं ले रही है, बल्कि निम्न स्तर पर जाकर वार कर रही है। दूसरी तरफ हार्दिक ने अपने पत्र में कांग्रेस के बारे में जो कुछ कहा है वह विधानसभा चुनावों में पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है। क्योंकि गुजरात की राजनीति में एक तो हिंदुत्व का प्रभाव है साथ ही गुजराती गौरव की भावना भी प्रबल है। इसलिए हार्दिक पटेल के यह दो आरोप कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाले होंगे- 1. चाहे, अयोध्या में राम मंदिर हो, जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाना, जीएसटी लागू करना, भारत लंबे समय से इन मुद्दों का समाधान चाहता था और कांग्रेस ने केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है। 2. वरिष्ठ नेता ऐसे बर्ताव करते हैं, जैसे वे गुजरात और गुजरातियों से नफरत करते हों। कांग्रेस कैसे गुजरात के लोगों से अपेक्षा करती है कि वे उन्हें हमारे राज्य का नेतृत्व करने के एक विकल्प के रूप में देखें? बहरहाल, राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर तंज कसते हुए हार्दिक पटेल का यह कहना कि जब भी हमारा देश परेशानियों का सामना कर रहा होता है और कांग्रेस को नेतृत्व की जरूरत होती है, तो पार्टी के नेता विदेश में मजे कर रहे होते हैं महज एक आरोप भर नहीं है। याद कीजिये इस साल के शुरू में जब सभी राजनीतिक दल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटे हुए थे तब राहुल गांधी विदेश में थे, इसके चलते कांग्रेस की तैयारियां काफी देर से शुरू हो पाई थीं और देर से शुरू होने वाली तैयारियों का हश्र चुनाव परिणाम ने बता ही दिया है।

Published / 2022-04-22 18:04:32
वीरता की मिसाल तेलंगा खड़िया को नमन...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ दुलार योताम कुल्लू)। वीर सपूत शहीद तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई. में झारखंड राज्य के ग्राम मुरगू, थाना सिसई, जिला गुमला में हुआ था। वे एक साधारण किसान के बेटे थे। इनके पिता का नाम ठुईया खड़िया और माता का नाम पेती खड़िया था। उनके दादा का नाम सिरू खड़िया तथा दादी का नाम बुच्ची खड़िया था। उनका परिवार मुरगू गांव का पहान तथा जमींदार तथा पाहन परिवार था। उनके दादा सिरू सामाजिक, धार्मिक, सरल तथा साहित्यिक विचार के व्यक्ति थे। तेलंगा बचपन से ही साहसी, ईमानदार तथा अधिक बोलने वाले थे। वे बिलुंग गोत्र से संबंध रखते थे। कृषि और पशुपालन का कार्य से जीवनयापन किया करते थे। उनका व्यक्तित्व मिलनसार, समाजसेवी ईमानदार एवं कर्मठ नेता जैसा था। वे सभी जाति धर्म, समुदाय का आदर करते थे। वे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, परंतु अपने विचार, तेजस्वी स्वभाव एवं कर्मठ समाजसेवी थे। उनकी शादी 1846 ई. में कुमारी रत्नी खड़िया से हुई थी। तेलंगा खड़िया के मुख्य कार्य कृषि तथा पशुपालन करना था। इसके साथ-साथ अखाडे़ में अपने अनुयायियों को तीर-धनुष, तलवार एवं गदा चलाने की कला का प्रशिक्षण देना भी था। तेलंगा से इस कला का प्रशिक्षण लेने के लिए हर क्षेत्र से उनके अनुयायी अखाड़े में आते थे। इनकी सेना की संख्या लगभग 900 से 1500 तक बतायी जाती है। शहीद तेलंगा के पिता ठुईयाखड़िया छोटानागपुर नागवंशी महाराजा के भंडारपाल थे। तेलंगा खड़िया अपने पिता के साथ कभी - कभी महाराजा के दरबार में जाते थे। वहां सामाजिक तथा राजनीतिक बातों की जानकारी प्राप्त करते थे। 1849-50 ई. तक छोटानागपुर में अंग्रेजों का शासन पूरी तरह कायम हो चुका था। उस समय छोटानागपुर में राजतंत्र था। राजा और जमींदारों का शासन कायम था। अन्याय, शोषण, जुल्म, बेगारी अपनी चरम सीमा पर थी। वस्तुत: प्राचीनकाल से ही जनजाति समुदाय अपनी परंपरागत स्वशासन व्यवस्था में स्वतंत्र जीवन-यापन करने के आदि थे। आदिवासी समुदाय की यह स्वतंत्रता ब्रिटिश सरकार के शासन प्रणाली में छिन्न-भिन्न हो गयी थी। इस प्रणाली के अंतर्गत मुंडा, संथाल, हो, उरांव, खड़िया एवं चेरो अपनी प्रकृति के विरूद्ध गुलामी का दंश झेल रहे थे। इन जनजातियों के विद्रोह का प्रमुख कारण ब्रिटिश सरकार की शासन व्यवस्था थी। तेलंगा खड़िया भी मानसिक रूप से अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार थे और समाज में लोगों को अपने अधिकार के लिए आगे आने को प्रेरित भी कर रहे थे। वे गांव-गांव जाकर जागरूक तथा एकता कायम करने के लिए प्रचार करने लगे। वे गांव में जाकर जूरी पंचायत का संगठन बनाने लगे। लोगों के मस्तिष्क में अंग्रेजों से लोहा लेने का बीज बोने लगे। अनुसंधान से ज्ञात होता है कि उन्होंने अनेक क्षेत्रों में जूरी पंचायत का गठन कर बहुत सारे केन्द्रों की स्थापना की थी। तेलंगा का प्रमुख हथियार तलवार, तीर-धनुष था।अंग्रेजों की बंदूक एवं रायफल को तेलंगा तीर-धनुष से ही रोक लेते थे। मानो उन्हें ईश्वर का अशीष प्राप्त हो। उनकी तीर-धनुष की शक्तियों के सामने अंग्रेजी हुकूमत को भी झुकना पड़ता था। ग्राम जूरी पंचायत की स्थापना करने के बाद धीरे-धीरे तेलंगा के अनुयायियों की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी होती गयी। जब तेलंगा खड़िया के संगठनात्मक कार्य के बारे में अंग्रेजी हुकूमत को पता चला तो उन्हें पकड़ने का आदेश जारी किया गया। तेलंगा ग्राम से बाहर रहकर ही संगठन का कार्य किया करते थे। अनुसंधान से पता चलता है कि इस इलाके में तेलंगा खड़िया ने 1850-60 ई. के आस-पास अंग्रेजी तथा देशी सिपाहियों के दलालों के विरूद्ध उलगुलान किया था। इस उलगुलान का कारण था, खड़िया सहित अन्य लोगों की जमीन का दलालों, साहूकारों और सरकार द्वारा छीन लिया जाना। जमीन की नापी हुई, परचा पप्ता बना और ऋण का कागज दिखा कर साहूकारों ने उनकी जमीन हथिया ली।उन्हें समझ में नहीं आया कि जिस जमीन को उनके बाप-दादाओं ने बनाया था, वह सरकार की कैसे हो गयी ? जब तेलंगा सहित अन्य लोग जमीन से बेदखल हो गये तो पिंजड़े की बाघ की तरह छटपटाने लगे। पुलिस और उनके समर्थकों को वे खदेड़ने लगे।अंग्रेज सपने में भी कभी नहीं सोचे थे कि जमीन से बेदखल लोग भी उनका विरोध करेंगे। अब तेलंगा की अगुवाई में लोग घायल बाघ की तरह आक्रमण कर दिये। जब तेलंगा और उनके साथियों ने इसका विरोध किया तो प्रशासन को बड़ी नाराजगी हुई। तेलंगा और दलालों तथा सिपाहियों के बीच उलगुलान बढ़ने लगा। तेलंगा का आक्रमण गुरिल्ला युद्ध की तरह था। विरोध हुआ तो तेलंगा और उनके साथियों ने अपने-अपने घरों को त्याग दिये। वे बारी घोरना के पीछे एवं जंगलों तथा वन कंदराओं में रहने लगे थे। ग्रामवालों ने इनके समूह को राटा टेटेंगा का नाम दिया था।तेलेंगा रूपी टेटेंगा को लोगों ने गीतों के माध्यम से सूचना देने का माध्यम बनाया था। उदारहण स्वरूप गीत देखा जा सकता है- वे सावधान हो जाये अपनी रक्षा को।वे मौका देखकर आक्रमण भी करें। प्रथम बार तेलंगा और उसके सैनिकों ने सिपाहियों तथा दलालों पर आक्रमण किये। इस पर कुडुख और नागपुरी में भी गीतों का उल्लेख है। तेलंगा और उनके साथियों के अचानक आक्रमण को सिपाही झेल नहीं पाये। वे खदेड़ दिये जाते। दूसरी बार डोम्बा के मैदान में लड़ाई हुई। असल में तेलंगा अपने अनुयायियों के साथ लड़ भी रहे थे और आंदोलन सर्वसाधारण रूप ले चुका था, लेकिन इसी बीच जमीन दलालों के चलते अंगे्रजों के द्वारा वे गिरफतार कर लिये गये। उन्हें लोहरदगा मुख्यालय जेल में रखा गया। लोहरदगा जेल में कुछ दिनों रखने के बाद तेलंगा खड़िया को कलकत्ता जेल भेज दिया गया। कहा जाता है कि उन्हें 14-18 साल की कठोर जेल सजा मिली। कलकत्ता जेल से रिहा होने के बाद तेलंगा गांव आये और सिसई के अखाड़े में अपने समर्थकों से मिले और विचार-विमर्श करने के बाद नये सिरे से उलगुलान करने में लग गये। इसकी भनक दुश्मनों को लग गयी। इसके बाद उन्होंने उन्हें मार डालने की योजना बनायी। 23 अप्रैल 1830 ई. को सिसई बाजार टांड़ मैदान में वे अपने समर्थकों के साथ ईश्वर की पूजा उपासना कर रहे थे। उसी समय उधर बड़े चप्तान के आड़ में झाड़ियों के पीछे अंग्रेजों के दलाल बोधन सिंह और उनके साथी छिपे हुए थे। भगवान के सामने जैसे ही तेलंगा खड़िया हाथ जोड़कर खड़े हुए बोधन सिंह ने उन पर गोली चला दी और वहीं तेलंगा शहीद हो गये। घनघोर जंगल होने के कारण कोयल नदी पार करके ग्राम सोसो नील टोली तथा चंदाली सीमा के बीच में उन्हें दफना दिया गया। उनकी समाधि के अवशेषअभी भी विद्यमान है। आज इस टांड़ को तेलंगा तोपाटांड़ के नाम से जाना जाता है। अनुसंधान में पता चला है कि पूरब बरगां निवासी बोधन सिंह को अंग्रेजों ने तेलंगा की हत्या करने के लिए 400 रुपए दिये थे। इसी प्रलोभन के चलते तेलंगा की जान ले ली थी, लेकिन कहा जाता है कि हत्यारे बोधन सिंह का वंश भी नहीं चला। वे निर्वंश होकर मर गये। (डॉ दुलार योताम कुल्लू, मानव शास्त्री एवं खड़िया समाज के चिंतक सह मानव शास्त्र विभाग, गोस्सनर महाविद्यालय रांची से जुड़े हैं।)

Published / 2022-04-21 13:45:15
हनुमान जयंती पर हिंसा की हो निष्पक्ष जांच...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ रमेश ठाकुर)। हनुमान जयंती के दिन निकाली जा रही शोभायात्रा के दौरान राजधानी दिल्ली में जो हिंसा हुई उसने कई सवालों को जन्म दिया है। इसकी नींव राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर राजनीतिक शास्त्र ने रखी। राजधानी की हिंसा सुनियोजित थी या नहीं? ये सवाल पुलिस पर छोड़ देते हैं, पर दूसरे सवाल हम खुद में खोजेंगे, आखिर ऐसा क्यों होता जा रहा है हमारे सौहार्दपूर्ण माहौल में, कौन है जो ये जहर घोल रहा है। घटना वाला इलाका ऐसा आवासीय क्षेत्र है जहां बेहद गरीब तबके के लोग रहते हैं, दिहाड़ी-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं, उन्हें राजनीति, दंगा-फसादों से कोई मतलब नहीं। राजनीतिक चश्मे के बिना कड़ाई से जांच होगी, तभी सच सामने आएगा। क्या दिल्ली हिंसा पहले से सुनियोजित थी? या फिर ये ट्रेलर मात्र है, पिक्चर अभी शेष है? या इसकी नींव राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर राजनीतिक शास्त्र ने रखी। ऐसे कुछ सवाल घटना थमने के बाद दिल्लीवासियों के जेहन में उठ रहे हैं। सवाल उठने भी चाहिए, आखिर ऐसा क्या है जो किस्तों में कुछ अंतराल के बाद राजधानी में ऐसे फसाद होते रहते हैं और तब तो और जब चुनावों की सुगबुहाट होने लगती है। कुछ समय बाद दिल्ली में एमसीडी चुनाव होने भी हैं, इसलिए कड़ियां आपसे में काफी हद तक मेल खाती भी हैं? खैर, ये तो आम इंसान के लिए सारे काल्पनिक अंदेशे मात्र हैं, जो होना होता है वो क्षण में हो ही जाता है। कमोबेश, वैसा हो भी रहा है, लेकिन हिंसा के राजनीतिक शास्त्र को अब आम आदमियों को बुनियादी रूप से समझने की जरूरत है। ये सवाल पुलिस पर छोड़ देते हैं, पर दूसरे सवाल हम खुद में खोजेंगे, आखिर ऐसा क्यों होता जा रहा है हमारे सौहार्दपूर्ण माहौल में, कौन है जो ये जहर घोल रहा है। 16 अप्रैल की शाम को जब दिल्ली में हिंसा हो रही थी, उसी वक्त सोशल मीडिया पर दो बेहद खूबसूरत तस्वीरें हम सबको दिख रही थी जिसमें हनुमान जन्मोत्सव के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग रैली में शामिल लोगों पर फूल बरसा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक और पानी की बोतलों का वितरण कर रहे थे। ये तस्वीरें उत्तर प्रदेश के शामली और नोएडा की हैं। शामली में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा कई समय बाद दिखा। दरअसल हमें ऐसा ही तो हिंदुस्तान चाहिए, जो आजादी से पहले था, जब एक ही थाली में सभी धर्म के लोग खाना खाते थे, पर अब न जाने अब ऐसा क्या हो गया है कि दोनों धर्म के लोग एकदूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं। घटना वाला इलाका जहांगीरपुरी दिल्ली का ऐसा आवासीय क्षेत्र है जहां बेहद गरीब तबके के लोग रहते हैं, दिहाड़ी-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं, उन्हें राजनीति, दंगा-फसादों से कोई मतलब नहीं, लेकिन हनुमान जन्मोत्सव के दिन लोगों ने उन्हें उकसाकर ये कारनामा कर दिया। जहां हिंसा हुई, वहां दोनों तरफ आमने-सामने मंदिर और मस्जिद हैं, हिंदु-मुस्लमान आपस में प्यार से रहते हैं। एक दूसरे के बनी-बिगड़ी और सुख-दुख में साथी होते हैं, आपस में हाथ बंटाते हैं। किसी तरह की कोई आज तक दिक्कतें नहीं हुई। घटना कैसे हुई, इस बात को वहां के लोग समझ नहीं पाए हैं, आखिर ये हुआ कैसे? हिंसक घटना के बाद से समूचा इलाका भयभीत है। हर तरह के काम धंधे बंद हैं, पुलिस ने सबको घरों में कैद किया हुआ है। सुरक्षा की दृष्टि से कोई कहीं आ-जा न सके इसके लिए केंद्र सरकार ने इलाके को छावनी में तब्दील कर धारा 144 लगा दी है। गलियों के गेट पर ताला जड़ दिया है। स्कूल, प्रतिष्ठान, दुकानें, बाजार सब बंद पड़े हैं। लोग घरों में सहमे हुए हैं। बहरहाल, घटना के पीछे किसका समाजशास्त्र था, उसकी तस्वीर अब दिखने लगी है। हिंसा को लेकर जमकर सियासत होनी शुरू गई है। पक्ष-विपक्ष की ओर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है, जबकि इस वक्त सिर्फ और सिर्फ समाधान की बात होनी चाहिए, पर नहीं, लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिराक में हैं। कोई एक दल नहीं, बल्कि सभी पार्टियां मौके का फायदा उठाना चाहती हैं। धरातल पर अंदरखाने राजधानी के हालात अच्छे नहीं हैं। इसके बाद भी कुछ अंदेशे ऐसे दिखते हैं जो सुखद नहीं? आगे भी हालात बिगड़ते नजर आते हैं। ये तय है कि जो हिंसा हुई, वह अचानक से घटने वाली घटना नहीं थी, बल्कि उसकी पटकथा पहले ही लिखी गई थी। इलाके के कई लोग तो खुलेआम बोल ही रहे हैं कि अगर पुलिस सतर्क होती तो घटना होती भी नहीं? प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं जब लोग हिंसक हो रहे थे, तब पुलिसकर्मी तमाशबीन बने हुए थे। लोगों के हाथों में धारदार हथियार थे, पत्थर थे। दोनों तरफ से जब पथराव शुरू हुआ तो सबसे पहले लोगों ने पुलिसकर्मियों को ही निशाना बनाया, जिसमें कई पुलिसकर्मी और स्थानीय लोग घायल हुए। घायलों का इलाज पास के बाबू जगजीवन राम अस्पताल में हो रहा है। फिलहाल पुलिस ने पूरे मामले पर एफआईआर दर्ज की हैं जिसमें मुस्लिम समुदाय के 14 लोगों को नामजद किया गया है जिसमें प्रमुख नाम मोहम्मद अंसार है जिसने सबसे पहले विरोध करना शुरू किया था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। ये बंदा इलाके का कुख्यात है, कई मुकदमे दर्ज हैं, गैंगस्टर के तरह चार बार जेल जा चुका है। समय का तकाजा यही है, घटना की निष्पक्ष जांच हो, दोषी पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो। फिलहाल हिंसा को लेकर केंद्र सरकार की नजर बनी हुई है, क्योंकि दिल्ली की सुरक्षा का जिम्मा उन्हीं के कंधों पर है। घटना की जानकारी के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने पुलिस कमिश्नर तलब कर जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी एलजी से बात करके दंगाइयों पर सख्त कार्रवाई की मांग की। गृह मंत्रालय में घटना को लेकर बड़ी बैठक भी हुई। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा हर घटना के बाद होता ही है, पर इस बार सिर्फ मामला शांत होने का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए। ड्रोन कैमरों भी लगे हैं जिन घरों से पथराव शुरू हुआ, उनकी जांच हो। हर एंगल से जांच की जाए। ईमानदारी से और राजनीतिक चश्मे के बिना कड़ाई से जांच होगी, तभी प्रत्येक वर्ष होने वाले दंगों से राजधानी मुक्त हो पायेगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Published / 2022-04-20 15:40:37
गंगा की निर्मलता से ही संभव है सांस्कृतिक विकास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अशोक कुमार)। गंगा नदी में प्रदूषण को कम करने के लिए 1985 में गंगा कार्य योजना (जीएपी) का शुभारंभ किया गया था। इसके जल के बिना सनातन धर्म के किसी अनुष्ठान की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। गंगा नदी अपनी सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से उर्वर यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। लगभग 3 किलोमीटर चौड़ी और 100 फीट यानी 31 मीटर की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में बेहद पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना मां और देवी के रूप में की जाती है। हिंदू धर्म में कहा जाता है कि यह नदी श्र्गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है, जो उत्तराखंड स्थित कुमायूं में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनदी से निकलती है। इस नदी की तुलना मिस्र की नील नदी के महत्व से की जाती है। इस पवित्र पावन नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियां पाई ही जाती हैं। मीठे पानी वाले दुर्लभ डॉल्फिन भी यहां पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, खेल तथा उद्योगों-कारोबारों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है। लेकिन इसकी पहचान दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक के रूप में की गई है। उदाहरणतया, हरिद्वार में गंगा जल में 55 सौ से अधिक कोलिफॉर्म है, जबकि कृषि के लिए माने डी श्रेणी के लिए मानक 5000 से कम कोलिफॉर्म हैं। भारत की सबसे पावन नगरी वाराणसी में कोलिफॉर्म जीवाणु गणना, संयुक्त राष्ट्र संघ नियंत्रित विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्थापित सुरक्षित मानक से, कम से कम 3000 गुना अधिक है। पर्यावरण जीव विज्ञान प्रयोगशाला, प्राणी विज्ञान विभाग, पटना विश्वविद्यालय द्वारा किये गए एक अध्ययन में वाराणसी शहर में गंगा नदी में पारे की उपस्थिति पाई गई है। यहां नदी के पानी में पारे की वार्षिक सघनता 0.00023 पीपीएम थी। इन सबका असर यह है कि भारत के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक गंगा नदी की क्रमिक हत्या हो रही है। इस योजना के अंतर्गत 200 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं। फिर भी प्रदूषण स्तर कम करने में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। जानकारी के मुताबिक, दिसंबर 2019 में गंगा नदी की सफाई के लिए विश्व बैंक एक अरब डॉलर उधार देने पर सहमत हुआ। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में उपस्थित अवशिष्ट का अंत करने की पहल का हिस्सा है। सर्वप्रथम, हमें यह तय करना होगा कि किसी भी कीमत पर मलजल और उद्योगों का गंदा पानी गंगा में नहीं जा पाए। इसके लिए कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, भागलपुर इत्यादि बड़े शहरों में बड़ा ड्रेन बनाया जाए, जिसमें वाहित मल और औद्योगिक कचरा युक्त जल का ट्रीटमेंट व रिसाइकिल कर उस जल को कृषि कार्य के उपयोग में लाया जाए। तीसरा, प्रत्येक स्नान घाट के किनारे शौचालय और चेंजिंग रूम की व्यवस्था होनी चाहिए और उसकी साफ-सफाई का पूर्ण ध्यान रखा जाना चाहिए। चतुर्थ, हरिद्वार से लेकर हल्दिया तक गंगा की चौड़ाई कहीं भी 3 किलोमीटर से कम नहीं रहे, इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इस 3 किलोमीटर की चौड़ाई में बीच का 1 किलोमीटर जहाज आदि के आवागमन के लिए शिपिंग कारपोरेशन आॅफ इंडिया को सौंपा जाए, जिससे कानपुर से हल्दिया तक वाटर ट्रांसपोर्टेशन का मार्ग प्रशस्त हो सके। पांचवां, गंगा की चौड़ाई के दोनों ओर कम से कम फोरलेन सड़क का निर्माण किया जाए, जिससे हरिद्वार से हल्दिया तक एक नया कॉरिडोर, जो काफी उपयोगी होगा और आवागमन को आसान करेगा। छठा, उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा का पानी की गहराई इतनी अवश्य होनी चाहिए कि युद्ध आदि विशेष परिस्थितियों में बोइंग विमान आदि इस पर उतारा जा सके। वहीं, गंगा के स्ट्रेच की चौड़ाई ज्यादा होने से टाल क्षेत्र की समस्या भी अपने आप दूर हो जाएगी। सातवां, बिहार में बक्सर के टेल पॉइंट से सोन, गंडक आदि नदियों को जोड़कर दक्षिण-उत्तर बिहार अर्थात भभुआ, सासाराम, औरंगाबाद, गया, नवादा की ओर एक अलग चैनल बना दिया जाए तो इन जिलों में पटवन का एक बड़ा साधन विकसित किया जा सकता है। इस चैनल को कोसी, कमला, बागमती और बूढ़ी गंडक नदी से जोड़ देने पर खगड़िया और दक्षिण-पूर्व बिहार के कई हिस्सों को पटवन आदि का साधन सहज ही मुहैया कराया जा सकता है। आठवां, गंगा के तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। गंगा आरती भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। अत: उन सभी प्राचीन नगरों और शहरों यथा वाराणसी, बक्सर, पटना, सुल्तानगंज, भागलपुर आदि में नियमित रूप से गंगा आरती का कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए। इससे क्षेत्रीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। नवम, गंगा की घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ, जिसका प्राचीन इतिहास अत्यंत गौरवमयी और वैभवशाली है। जहां ज्ञान, धर्म, अध्यात्म एवं सभ्यता- संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई, जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हुआ। इसी घाटी में रामायण और महाभारत कालीन युग का उद्भव और विकास हुआ। प्राचीन मगध महाजनपद का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ, जहां से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का स्वर्ण युग विकसित हुआ, जब मौर्य और गुप्त वंश के राजाओं ने यहां पर शासन किया। दशम, और सबसे अंतिम प्रयास के रूप में गंगा सफाई अभियान को न केवल सरकारी योजना के रूप में प्रचारित किया जाए बल्कि इसे जन-आंदोलन का व्यापक रूप दिया जाए। इसमें जनता के साथ-साथ राजनेताओं और अधिकारियों को आवश्यक रूप से जोड़ा जाए। मुझे उम्मीद है कि समन्वित प्रयास से ही गंगा को भागीरथी के पुरातन रूप में पाया जा सकता है। (लेखक बिहार सरकार के पूर्व नगर विकास एवं आवास मंत्री हैं।)

Published / 2022-04-19 15:59:37
हिंदुत्व की राजनीति से हारते अखिलेश...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय कुमार)। 2012 में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने में इन दोनों नेताओं के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है, जबकि मुलायम के बाद शिवपाल यादव और आजम खान मुख्यमंत्री की कुर्सी के प्रबल दावेदार समझे जाते थे। दोनों की ही गणना जनाधार वाले नेताओं के रूप में होती है। समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता और मुस्लिम चेहरा आजम खान की सपा हाईकमान से नाराजगी की जो बात सामने आ रही है, उसमें यदि दम है तो यह तय माना जाना चाहिए कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए खून के रिश्ते वाले चाचा शिवपाल यादव की तरह से ही राजनैतिक चाचा आजम खान भी अनुपयोगी हो गए हैं। इसीलिए तो दोनों चाचाओं का एक-सा दर्द सामने आ रहा है। शिवपाल की तरह आजम खान को भी लगने लगा है कि उनके साथ भतीजे अखिलेश ने यूज एंड थ्रो वाली ही सियासत की है। शिवपाल और आजम खान में समानता की बात की जाए तो दोनों ही सपा के दिग्गज नेताओं में शुमार रह चुके हैं। दोनों ही पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के भाई जैसे थे। दोनों की ही सपा में तूती बोला करती थी। सपा को फर्श से अर्श तक पहुंचाने में दोनों का योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। दोनों ही कई बार विधान सभा का चुनाव जीत चुके हैं। इस समय दोनों के ही सितारे गर्दिश में चल रहे हैं, जिसकी वजह और कोई नहीं वही शख्स है जिसे शिवपाल और आजम ने गोद में खिलाया था। दोनों ने अपने सामने ही अखिलेश को बढ़ते देखा था। 2012 में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने में इन दोनों नेताओं के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है, जबकि मुलायम के बाद शिवपाल यादव और आजम खान मुख्यमंत्री की कुर्सी के प्रबल दावेदार समझे जाते थे। दोनों की ही गणना जनाधार वाले नेताओं के रूप में होती है और वोटरों पर अच्छी पकड़ है। सवाल यह है कि अखिलेश को आजम अनुपयोगी क्यों लग रहे हैं, तो जानकार इसकी वजह प्रदेश में हिन्दुत्व के उभार की राजनीति बता रहे हैं। 2014 में जबसे मोदी ने केन्द्रीय स्तर पर हिन्दुत्व की राजनीति शुरू की थी और यूपी में वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ा था, तबसे अखिलेश की तुष्टिकरण की सियासत को ग्रहण लग गया है। 2017 तथा 2022 के विधानसभा और 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम तुष्टिकरण के सहारे कोई बड़ा राजनैतिक धमाका नहीं कर पाने वाले अखिलेश का धीरे-धीरे मुस्लिम-यादव सियासत से मोहभंग होता जा रहा है। अखिलेश को इस बात का भी मलाल है कि उनकी मुस्लिम परस्त छवि के कारण सपा का परम्परागत यादव वोटर भी मुंह मोड़ता जा रहा है। हाल यह है कि समाजवादी पार्टी की मुस्लिम परस्त छवि का खामियाजा उन दलों को भी भुगतना पड़ जाता है जो उनके साथ हाथ मिलाते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से और 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ जुड़े कई छोटे-छोटे दलों को भी सपा का हाथ थामने का खामियाजा भुगतना पड़ा था। बहरहाल, बात आजम खान की सपा प्रमुख अखिलेश यादव से नाराजगी की खबरों की कि जाए तो अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी से आजम खाम की शिकायत कोई अभी शुरू नहीं हुई है, बल्कि ये दर्द और नाराजगी पुरानी है। 2017 में यूपी में योगी सरकार की शुरूआत के बाद से आजम खान के लिए जब बुरे दौर का आगाज हुआ तो अखिलेश यादव काफी हद तक इस मामले पर चुप्पी साधे रहे। आजम खान के करीबियों का मानना है कि जब आजम की गिरफ्तारी हुई तो अखिलेश ने इसका उस तरह से विरोध नहीं किया, जितना करना करना चाहिए था। अखिलेश न ही विधानसभा के भीतर इस मुद्दे को धारदार तरीके से उठा पाए, न ही सड़क पर आजम के पक्ष में कहीं कोई आंदोलन चलाया गया। आजम खान से मुलाकत तक नहीं करने जाते हैं अखिलेश यादव। विधानसभा चुनाव में सपा को 111 सीटें मिलीं, इसमें मुस्लिमों वोटरों की बड़ी भूमिका थी, लेकिन फिर भी अखिलेश ने जेल जाकर आजम से मिलना जरूरी नहीं समझा। इससे पूर्व जब विधानसभा चुनाव 2022 का मौका आया तो इस मैके पर आजम खान खेमे में और ज्यादा नाराजगी बढ़ गई, क्योंकि अखिलेश यादव ने सिर्फ आजम खान और बेटे अब्दुल्ला आजम को टिकट दिया, जबकि अखिलेश ने उनके समर्थकों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था। बताया जाता है कि आजम खान ने करीब एक दर्जन अपने करीबी नेताओं की लिस्ट सपा प्रमुख को सौंपी थी, जो विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। इसके अलावा आजम खान के समर्थक ये भी चाहते थे कि संसदीय सीट से इस्तीफा देकर रामपुर सीट से विधायक बने आजम खान को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए, लेकिन अखिलेश यादव खुद नेता प्रतिपक्ष बन गए। जबकि अखिलेश चाहते तो आजम खान को नेता प्रतिपक्ष बनवा कर आजम के लिए जेल से बाहर आने की राह आसान कर सकते थे। इसलिए जेल में बंद आजम खान के करीबी खुल कर अखिलेश की मुखालिफत में सामने आ गए हैं। आजम खान के मीडिया प्रभारी फसाहत अली खान शानू ने रामपुर में सपा कार्यालय में कहा कि आजम खां ने अखिलेश यादव और उनके पिता का समाजवादी पार्टी के बनने और मुख्यमंत्री बनने तक हर कदम पर साथ दिया, लेकिन जब अखिलेश यादव को साथ देने की बारी आई तो वह पीछे हट गए। शानू ने कहा कि जब आपने कहा कि मैं कोरोना का टीका नहीं लगवाऊंगा तो आजम खान ने जेल में कोरोना का टीका नहीं लगवाया। नतीजा ये हुआ कि वो मौत के मुंह में जाते-जाते बचे। इसके साथ ही आजम को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाए जाने को लेकर भी नाराजगी नजर आ रही है। उधर, योगी कई बार कह चुके हैं कि अखिलेश ही नहीं चाहते हैं कि आजम बाहर आएं। इसको लेकर भी आजम खान और अखिलेश के बीच दरार बढ़ी है। आजम खान समर्थक अखिलेश को याद दिला रहे हैं कि अखिलेश यादव जी हमारा सलूक आपके साथ ये था कि जब 1989 में अपने वाजिद साहब को कोई सीएम बनाने को तैयार नहीं था।

Published / 2022-04-13 18:06:02
विराट व्यक्तित्व के धनी देशरत्न डॉ अंबेडकर

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संजय पासवान)। डॉ भीमराव आंबेडकर ने 1938 में मनमाड रेलवे वर्कर्स कॉन्फ्रेंस में कहा था, मुझे धर्म के प्रति युवाओं की बढ़ती उदासीनता को देख कर पीड़ा होती है। धर्म कोई अफीम नहीं है। जैसा कि कुछ लोग मानते हैं। मुझमें जो कुछ भी अच्छा है या मेरी शिक्षा से समाज का जो भी भला होता है, मैं उसका श्रेय अपने अंदर की धार्मिक भावनाओं को देता हूं। यह कथन उन लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है जो कि आंबेडकर को पढ़े बिना आंबेडकरवाद का अनुसरण करते हैं। ये स्थिति इसलिए है क्योंकि भारत के वामपंथी आंबेडकरवादी कार्यकर्ताओं ने उन्हें धर्म के विरोधी के रूप में चित्रित कर रखा है। जबकि आंबेडकर कार्ल मार्क्स जैसे नहीं थे। इसलिए एक व्यक्ति बिना किसी विरोधाभास के एक ही साथ तीनों हो सकता है एक हिंदू, एक राष्ट्रवादी और एक आंबेडकरवादी। यह बात उस वैचारिक कथानक के बिल्कुल विपरीत है, जो कि एक झूठे विचार की वकालत करता है कि आंबेडकर के विचार और राष्ट्रवाद एक साथ नहीं रह सकते। आंबेडकर ने धर्म को बहुत महत्व दिया था और यह बात उनकी विरासत पर एकाधिकार की हसरत रखने वाले साम्यवादियों की आज की पीढ़ी को रास नहीं आएगी.शांतिपूर्ण विरोध के जरिए दलित वर्ग के मंदिर प्रवेश की हिमायत करना आंबेडकर की विशेषता थी। तमिलनाडु में पेरियार के अनुयायी बड़ी अस्पष्टता की स्थिति निर्मित करते हैं। जबकि एक तरफ तो वे हिंदू प्रतिष्ठानों के तर्कहीन उन्मूलन का समर्थन करते हैं, पर साथ ही वे आंबेडकरवादी होने का दावा भी करते हैं। अपने जीवन के निर्णायक चरण में आंबेडकर धर्मांतरण के सवाल से जूझ रहे थे। धर्मशास्त्र संबंधी गहन विद्वता के मद्देनजर, वह तमाम भारतीय धर्मों की ताकतों और कमजोरियों को लेकर आश्वस्त थे। कोई दृढ़ कारण जरूर रहा होगा कि बहुत सोच-विचार और विभिन्न धार्मिक नेताओं से चर्चा के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसे आमतौर पर हिंदू धर्म की ही एक शाखा के रूप में देखा जाता है। क्या वह इस्लाम या ईसाई जैसे गैर-भारतीय धर्म को अपनाने के संभावित परिणामों से बचना चाहते थे? सामाजिक इतिहासकारों को इस सवाल पर रोशनी डालनी चाहिए, इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आंबेडकर के विचार जाति संघर्ष की उपज थे। उनका जीवन इस निरंतर संघर्ष का प्रमाण है। पर जाति के खिलाफ अपने वैचारिक रुख के कारण आंबेडकर को पूर्वाग्रहों का भी सामना करना पड़ा, यहां तक कि साम्यवादियों से भी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की केंद्रीय कमेटी ने 1952 में आंबेडकर की अगुआई वाले संगठन अनुसूचित जाति महासंघ (एससीएफ) के खिलाफ एक विशेष प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि आर्थिक बेहतरी और सामाजिक बराबरी की आकांक्षा को उनके साम्राज्य-समर्थक और अवसरवादी नेता डॉ आंबेडकर ने एक विकृत और अवरोधकारी रूप दे दिया है, जिन्होंने कि उनको एससीएफ में सांप्रदायिक और जाति-विरोधी हिंदुओं के तौर पर संगठित किया है। चुनाव के साथ भयादोहन भी आता है आरक्षण, हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के लिए संवैधानिक गारंटियों को लेकर। पर, ये कांग्रेस पार्टी ही है जिसने स्वतंत्रता सेनानी और दलितों के सबसे बड़े नेताओं में से एक बाबू जगजीवन राम को कभी भी पार्टी या सरकार में सम्मानजनक पद नहीं दिया। आखिरकार, जगजीवन राम को पार्टी से अलग होना पड़ा था। वे जनता पार्टी में शामिल हो गए और अंतत: जनसंघ समर्थित जनता पार्टी सरकार में उप-प्रधानमंत्री बने। एक दलित नेता के रूप में बाबू जगजीवन राम वामपंथियों के कथानक में फिट नहीं बैठते थे, क्योंकि वह एक समर्पित हिंदू थे। जिन्होंने हिंदू धर्म में रहते हुए इसकी बुराइयों का मुकाबला करने के विकल्प को चुना। कांशीराम और मायावती ने भी किसी अन्य धर्म को नहीं अपनाया। दलित आस्थावान हिंदू होते हैं। परंतु, भारतीय राजनीतिक इतिहास में किसी राष्ट्रीय दल की कमान संभालने वाला पहला दलित बंगारू लक्ष्मण बने, जो 2000 से 2001 तक भाजपा के अध्यक्ष रहे थे। भाजपा की ही अगुआई वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में जीएमसी बालायोगी, एक वकील, लोकसभा का पहला दलित स्पीकर बने थे। और एक बार फिर भाजपा ने ही रामनाथ कोविंद के रूप में भारत को पहला दलित राष्ट्रपति दिया। भारत के दसवें राष्ट्रपति केआर नारायणन एक दलित-ईसाई थे। इस समय सर्वाधिक दलित सांसद भाजपा से ही हैं। आंबेडकर ने लिखा था, जातीय रूप से हर व्यक्ति परस्पर भिन्न है। एकरूपता का आधार तो सांस्कृतिक एकता है। इस बात को मानते हुए, मैं यह कहना चाहूंगा कि सांस्कृतिक एकता में कोई भी देश भारतीय प्रायद्वीप की बराबरी नहीं कर सकता है। इस संदर्भ में संस्कृति की बारीकी से व्याख्या करने पर हमारी कालातीत सभ्यतामूलक अंत:चेतना सामने आती है जो कि युगों की कसौटी पर खरी उतरी है। आंबेडकर की बुनियाद भारतीय सभ्यता और संस्कृति में थी। ये भी कहा जाता है कि आंबेडकर संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रस्ताव के पक्ष में थे। वह हमारी सांस्कृति समृद्धि का हवाला देते रहते थे। मौजूदा वक़्त आंबेडकर के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं के ईमानदार विश्लेषण का है। और आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल) उनकी विरासत को लेकर एक नया, निष्पक्ष और रचनात्मक सार्वजनिक संवाद शुरू करने का उचित अवसर है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर आंबेडकर की पकड़, चीन को लेकर उनकी चेतावनी, और अर्थशास्त्र में उनकी असाधारण विद्वता को मौजूदा पीढ़ी के सामने लाया जाना चाहिए। आंबेडकर को मात्र सामाजिक न्याय का योद्धा और एक विशिष्ट दलित नेता के रूप में देखना उनकी विरासत के साथ बड़ा अन्याय होगा। (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं।)

Published / 2022-04-12 17:31:52
भारत को खलेगी नेपाल की आयात बंदिश

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्रेया नंदी और शैली सेठ मोहिले)। नेपाल सरकार ने विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के मद्देनजर गैर-जरूरी वस्तुओं के आयात पर रोक लगा दी है, जिसका असर भारत से होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है। निर्यातकों ने पिछले हफ्ते कहा था कि नेपाल के केंद्रीय बैंक (नेपाल राष्ट्र बैंक) ने वहां के वाणिज्यिक बैंकों को निर्देश दिया था कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार में आ रही गिरावट थामने के लिए वे गैर-जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए उधार सुविधा पत्र (क्रेडिट लैटर) जारी न करें। नेपाल की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार साइकल, मोपेड, चावल, सोना-चांदी, बिजली के उपकरणों आदि के आयात के लिए उधार पत्र जारी नहीं किया जाएगा। हाल के महीनों में नेपाल में आयात बढ़ने से देश से काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जा रही थी, जिससे आर्थिक संकट पैदा होने की चिंता बढ़ गई है। नेपाल दूतावास के एक अधिकारी ने आयात पर लगाए गए प्रतिबंध की पुष्टि की। हालांकि यह प्रतिबंध कितने समय तक रहेगा इस पर कोई टिप्पणी करने से उन्होंने इनकार कर दिया। भारत सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच स्थानीय मुद्रा कारोबार की अनुमति दी गई है लेकिन नेपाल के पास आयात के लिए भुगतान करने के लिए पर्याप्त मात्रा में भारतीय रुपया नहीं है। भारतीय निर्यात संगठनों के संघ (फियो) के महानिदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अजय सहाय ने कहा कि निर्यातक चिंतित हैं और वे आयात प्रतिबंध पर नेपाल से आधिकारिक पुष्टि मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने कहा, अधिकांश निर्यातकों को इसके बारे में पता नहीं है। श्रीलंका में घटनाक्रम देखने के बाद नेपाल सतर्क हो रहा है और यही कारण है कि वहां आयात सीमित किए जा रहे हैं। अभी तक हमारे पास इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है कि आयात के लिए किन सामानों को अनुमति नहीं दी जाएगी। कई देशों (जैसे श्रीलंका) में जैसे हालात बन रहे हैं ऐसे में निश्चित रूप से वैश्विक कारोबार को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है और यही चिंता का एक बड़ा कारण है। वाहन उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि नेपाल में आयात पर रोक से फिलहाल कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन भविष्य में नए अनुबंधों के मामले में चुनौती खड़ी हो सकती है। वाहन उद्योग के एक अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि वाहन और इसके कल-पुर्जों को भी प्रतिबंधित गैर-जरूरी वस्तुओं की सूची में शामिल किया गया है। हालांकि आयात के लिए मौजूदा उधार पत्र पहले की तरह ही नेपाल में मान्य होंगे। ऐसे में भारत से होने वाले निर्यात पर हाल-फिलहाल कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि अभी उधार पत्र उपलब्ध हैं। उधार पत्र वित्तीय अनुबंध या दस्तावेज होता है, जो विक्रेताओं को खरीदारों की ओर से भुगतान की गारंटी प्रदान करता है। समस्या नए अनुबंध की होगी, जिसके लिए नए उधार पत्र की जरूरत होगी। उक्त अधिकारी ने कहा कि इस निर्णय का मकसद नेपाल में जून में शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले व्यापार संतुलन के घाटे को कम करना है। हमें लगता है कि यह अस्थायी उपाय है। भारत हर साल नेपाल को 60 से 70 करोड़ डॉलर मूल्य के वाहन और कल-पुर्जे निर्यात करता है। मूल्य के लिहाज से कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी करीब 4 फीसदी है। भारतीय इंजीनियरिंग एवं निर्यात संवर्द्घन परिषद के सूत्रों ने कहा कि वह अभी इस प्रतिबंध के प्रभाव का आकलन कर रहा है। इस बारे में कोई टिप्पणी करना अभी जल्दबाजी होगा। पहले यह समझना होगा कि किन उत्पादों के आयात पर रोक लगाई गई है। निर्यात के मामले में नेपाल भारत का नौवां सबसे प्रमुख ठिकाना है। 2021 में भारत से 9.6 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया गया था और कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 2 फीसदी से अधिक थी। नेपाल भारत का 29वां सबसे बड़ा व्यापरिक साझेदार है और नेपाल में भारत विदेशी निर्यात का सबसे बड़ा स्रोत और अग्रणी भागीदार है। 2021-22 के पहले 11 महीने में दोनों देशों के बीच 10 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। नेपाल में भारतीय दूतावास के अनुसार नेपाल में वस्तुओं के व्यापार में भारत की हिस्सेदारी दो-तिहाई और सेवाओं में करीब एक-तिहाई है। नेपाल के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारत की हिस्सेदारी एक-तिहाई है। करीब 100 फीसदी पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति भारत से ही होती है और भारत में रहने वाले पेंशनभोगी, पेशेवर तथा श्रमिक काफी मात्रा में पैसे वहां भेजते हैं। एशियाई विकास बैंक ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा कि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के कारण तेल की ऊंची कीमतें होने से आयात बिल और बढ़ेगा। साथ ही नेपाल का व्यापार संतुलन बिगड़ने की भी संभावना है। इसमें चेतावनी देते हुए कहा गया, इन घटनाओं की वजह से चालू खाते का घाटा वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी के 9.7 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है जो वित्त वर्ष 2021 में 8.0 फीसदी तक था।

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