विचार

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Published / 2022-08-10 02:49:07
अहंकार सबसे कष्टदायक, क्योंकि यह हमें स्वयं के प्रति सजग बनाता है

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती)। अहंकार अन्तिम अवरोध है। अहंकार सबसे अधिक कष्ट देता है, क्योंकि यह हमें स्वयं के प्रति सजग बनाता है, हमें हमारे नाम, यश, पद और प्रतिष्ठा का ख्याल कराता है। यह हमें पूरी तरह स्व-केन्द्रित बना देता है। और यह अहंकार ही है जो हमें कर्मों के बंधन में जकड़ देता है और हमें धर्म से विमुख कर देता है। इसी वजह से हम कर्म को जिम्मेदारी के बजाय बोझ समझते हैं। और यह अहंकार इच्छाओं और कामनाओं द्वारा पोषित होता रहता है। अहंकार को सम्भालने के लिए अपने आप से समझौता करना आवश्यक है, क्योंकि जब तक अहं भाव बना रहेगा तब तक अपने परिवेश के साथ तुम्हारी क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहेगी, दूसरों के साथ संघर्ष होता रहेगा। तुम्हारी प्रतिक्रियाओं में मन की नकारात्मक वृत्तियां ही अभिव्यक्त होंगी। तुम दूसरों के कथनों पर प्रतिक्रिया करोगे और उनसे बदला लेने की कोशिश करोगे। जब तक अहंकार नियंत्रण में नहीं आता, तब तक समझौता नहीं होता। और जब अहंकार नहीं रहता, तब समझौता आसानी से हो जाता है और कर्म कर्मयोग में बदल जाता है। मानव धर्म का पालन करते जाओ, अहंकार को सिर मत उठाने दो, दूसरों की परिस्थिति, चिन्तन और आवश्यकताओं को समझने का प्रयास करो, और जिस तरह अपनी भलाई के लिए काम करते हो, वैसे ही दूसरों के उत्थान के लिए भी प्रयासरत रहो। ये कर्मयोगी के लक्षण हैं। कर्मयोग एक आन्तरिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अपने चरित्र को विक्षेपरहित और परिष्कृत बना सकते हैं। जब हम कर्म के साथ योग शब्द को जोड़ते हैं, तब इसका तात्पर्य एक ऐसी क्षमता से होता है जिसके द्वारा हम मन और अहंकार के थपेड़ों से अप्रभावित रहते हुए अपनी जीवन-यात्रा सहजता और सुगमता से संपन्न करते हैं, अपने कर्मों को सकारात्मक, सृजनात्मक और उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करते हैं। यही कर्मयोग की संपूर्ण प्रक्रिया है। (साभार : कर्म और कर्मयोग)

Published / 2022-08-08 17:38:20
मौद्रिक नीति को सामान्य बनाना आरबीआइ का लक्ष्य

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने गत सप्ताह नीतिगत रीपो दर को 50 आधार अंक बढ़ाकर 5.4 फीसदी करके अच्छा कदम उठाया। स्थायी जमा सुविधा और सीमांत स्थायी सुविधा दरों को समायोजित करके क्रमश: 5.15 तथा 5.65 फीसदी कर दिया गया। बाजार का एक हिस्सा यह आशा कर रहा था कि दरें तय करने वाली समिति धीमी गति से आगे बढ़ेगी। नीतिगत बैठक से पहले उच्च बॉन्ड कीमतों में यह परिलक्षित भी हुआ था। बहरहाल, एमपीसी ने जो कुछ किया वह करने की उसके पास मजबूत वजह थी। हालांकि खुदरा महंगाई दर में हाल के महीनों में कमी आई है लेकिन यह अभी भी काफी ऊंचे स्तर पर तथा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा तय दायरे से ऊंचे स्तर पर है। जून में खुदरा मुद्रास्फीति दर 7 फीसदी थी। यह लगातार छठा महीना था जब यह दर आरबीआई के तय दायरे के ऊपरी स्तर से भी ऊंची थी। चूंकि एमपीसी का अनुमान है कि मुद्रास्फीति चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही तक तय दायरे से ऊपर रहेगी इसलिए नीतिगत दर बढ़ाने में धीमापन अनुमानों को प्रभावित कर सकता था। वास्तविक नीतिगत दर अभी भी काफी हद तक ऋणात्मक है और ऐसे में समझदारी इसी में है कि जल्द से जल्द जरूरी कदम उठाए जाएं। गत सप्ताह के नीतिगत कदम के बाद रीपो दर महामारी के पहले के 5.15 फीसदी के स्तर से ऊपर निकल गई और यहां से एमपीसी को दरों से संबंधित कदम उठाने में कुछ समझदारी का परिचय देना होगा। हालांकि समिति ने इस वर्ष मुद्रास्फीति को लेकर अपने पूवार्नुमान नहीं बदले हैं लेकिन उसे उम्मीद है कि चालू वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में दरें कम होकर 5.8 फीसदी हो जाएंगी और 2023-24 की पहली तिमाही में यह 5 फीसदी हो जाएगी। साफ कहा जाए तो मुद्रास्फीतिक परिदृश्य अनिश्चित बना हुआ है और निष्कर्ष कई कारकों पर निर्भर करेंगे। हालांकि वैश्विक जिंस कीमतें हाल के सप्ताहों में कम हुई हैं लेकिन यूक्रेन युद्ध के कारण ईंधन कीमतों पर दबाव बना रहेगा। उदाहरण के लिए गैस आपूर्ति में अचानक गिरावट एक बार फिर वैश्विक ईंधन कीमतों में तेजी की वजह बन सकती है। अगर वैश्विक मुद्रास्फीति लगातार ऊंची बनी रहती है तो यह भी एक जोखिम है। वहीं अगर विकसित देशों में अनुमान से अधिक नीतिगत सख्ती बरती जाती है तो इससे मुद्रा बाजार लंबे समय तक अस्थिर होगा और इसका असर भारत में मुद्रास्फीति पर भी दिखेगा। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू जोखिमों मसलन मॉनसून की प्रगति आदि के अलावा आने वाले महीनों में नीतिगत निर्णय ब्याज की अनुमानित स्वाभाविक दर, मुद्रास्फीति के लिए समायोजित नीतिगत दर और वास्तविक दर आदि पर भी निर्भर करेंगे। रिजर्व बैंक के अर्थशास्त्रियों ने प्रकाशित एक हालिया शोध आलेख में कहा कि महामारी के बाद स्वाभाविक दर में कमी आई है और अनुमान है कि 2021-22 की तीसरी तिमाही में यह दर 0.8 फीसदी से एक फीसदी के दरमियान रहेगी। चूंकि इस दर का निर्धारण करना मुश्किल है, खासतौर पर उच्च अनि?श्चितता के दौर में इसलिए यह मानते हुए कि आरबीआई के अनुमान सही साबित होंगे, नीतिगत दरों को अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही तक 6 फीसदी के स्तर तक जाना होगा। ऐसे में मौद्रिक नीति समिति को यह तय करना होगा कि कितनी जल्दी वह उस स्तर पर पहुंचना चाहती है। यह निर्णय साफतौर पर इस बात पर निर्भर करेगा कि समिति की अगली बैठक में मुद्रास्फीतिक हालात कैसे उभरते हैं। ऊपरी स्तर पर कोई चकित करने वाली स्थिति संभवत: तभी बनेगी जब सितंबर में 50 आधार अंकों का इजाफा किया जाए। वहीं दूसरी ओर मुद्रास्फीतिक दबाव में कमी आने से एमपीसी के पास अवसर होगा कि वह दरों में कम इजाफा करे। तब वह यह तय कर सकेगी कि आने वाली तिमाहियों में वह क्या हासिल करना चाहती है।

Published / 2022-08-06 17:58:19
नौ अगस्त को किस तरह याद करे आदिवासी समुदाय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिवशंकर उरांव)। अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस नौ अगस्त को मनाया जाता है। यह दिन विश्व भर के आदिवासियों के हित और अधिकार को अपने में समेटे है। इस अवसर पर पूरे देश में छोटे बड़ें कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। इन कार्यक्रमों का सिलसिला 1993 से जोर पकड़ता गया है। इसी वर्ष से नौ अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाने की घोषणा हुई। विश्व मूल आदिवासी दिवस मनाने के कारणों पर जाए तो यह एक मर्माहत करने वाला अंदरूनी विषय है जिस पर चर्चा कम ही होती है। लेकिन इस सच को देश ही दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को जानना आवश्यक है। आज से 524 साल पहले 1498 ई में यूरोप के एक छोटे से देश स्पेन निवासी कोलंबस नामक नाविक अपने लाव लश्कर के साथ समुद्री यात्रा पर निकला। उसने भारत की संपन्नता और एर्श्वय के बारे में सुन रखा था। लेकिन समुद्री तुफान के कारण रास्ता भटक कर वह अमेरिका पहुंच गया। तब अमेरिका में गोरे लोग नहीं थे। काले और निर्धन आबादी का वहा जमावड़ा था। लेकिन वे अपनी संस्कृति रीति रिवाज और परम्पराओं के साथ ही जीते थे। कोलंबस भारत की खोज में निकला था लेकिन उसने एक नयी भूमि की खोज कर ली थी जो अमेरिका था। जिस दिन कोलंबस अमेरिका की धरती को छुआ था यानि उस धरती पर पहुंचा था वह तारीख नौ अगस्त 1498 थी। कोलंबस को लगा कि वह इंडिया की खोज करने में सफल हो गया है इसलिये उसने वहां स्थित लोगों को इंडियन कहकर संबोधित किया। वही लोग आगे चलकर रेड इंडियन कहलाये। कोलंबस के बाद यूरोप के कई देशों के नाविक और समुद्री अभियान में लगे जन समूह भी अमेरिका पहुंचे। धीरे-धीरे यूरोप के गोरों ने अमेरिका पर कब्जा जमा लिया। इन गोरों ने वहां के मूलवासी रेड इंडियन्स पर अंतहीन अमानवीय अत्याचार किये जिसके कारण उनकी स्थिति अत्यंत खराब होती हुई लुप्त प्राय हो गयी। जो थोड़ें बच गये उनके पास सनातन पद्धति रीति रिवाज और धार्मिक समाजिक बोध कराने वाले हरेक तत्व से उन्हें अलग कर दिया। उनके हाथ में बाइबिल थमा दिया गया। उनके नेटिव्स के आस्तित्व को ही समाप्त करने की साजिश रची गयी जिसमें एक हद तक उन्हें सफलता भी मिली।बाद के काल खंड में जो हुआ उसे याद कर दुनिया सिहर उठती है। रंगभेद और नरसंहार का खेल शायद सबसे पहले यही हुआ था। यूरोप के गोरों के द्धारा अमेरिका में यह खेल किया गया ऐसा नहीं था। पूरी दुनिया में जहां-जहां उन्हें अवसर मिला उन्होंने यही खेल किया। अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में भी ऐसे ही दुष्कृत्य किये गये। गोरे जहां भी गये एक ही प्रकार से अत्याचार का काम किया और हमारे पूर्वज इसके शिकार हुए। अफ्रीका में हमारे पूर्वजों ने इन गोरों का प्रसन्नता पूर्वक स्वागत किया लेकिन इन लोगों ने कुटिल चालचल कर हमारे धर्म और संस्कृति को समाप्त करने की दिशा में चाल चल दी। हमारे पूर्वजों के हाथ में बाइबिल थमा दी। जब तक हम आंख खोलते तब तक हमारी धरती हमारे आकाश और हमारा सब कुछ उनलोगों ने कब्जा कर लिया था। हम प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर पर्वत और पठारों पर सीमित साधनों के साथ निवास कर रहे थे। उनकी कुटिल नजर इस पर भी गयी और हमारे खनिज संपदा को भी जमकर लूट लिया गया। आस्ट्रेलिया के मूल निवासी माबो के साथ ऐसा ही कुछ किया गया। यही कारण था कि यूरोप के मूल निवासी आस्ट्रेलिया के पीएम ने अपने वंशजों के अत्याचार के कार्य पर वर्षो बाद क्षोभ व्यक्त किया। 24 फरवरी को उन्होंने पूरी दुनिया से अपने पूर्वजों द्वारा आदिवासियों पर किये गये अत्याचार के लिये दुनिया से माफी मांगी। अब मीडिया के त्वरित प्रसार के युग में नौ अगस्त का महत्व और उसके पीछे छिपे दर्द का पर्दाफाश हो चुका है और यह सच आदिवासी दिवस पर सभी लोगों को जानना चाहिए। मेरा मानना है कि यह दिन आक्रोस और दुख प्रकट करने का दिन है। इस पर हम खुशी मनाकर इस दिवस की गरिमा और हमारे समाज की पीड़ा को सही ढंग से याद नहीं करते हैं। इतिहास के पन्नों से सच निकाल कर उसका विश्लेषण कर दिया गया है। हमें इस दिन किसी भी हाल में खुशियां नहीं मनानी चाहिए। हमारे देश में 15 नवंबर जो हमारे स्वाभिमानी मूलवासी के आदर्श भगवान बिरसा मुंडा का जन्म दिन और वर्तमान मादी सरकार ने जिसे आदिवासी स्वाभिमान दिवस घोषित किया है उस दिन हमें गर्व और खुशी मनाना चाहिए। यूरोप के गोरों के लिये नौ अगस्त का दिन खुशी का दिन हो सकता है क्योंकि इसी दिन उन्होंने अमेरिका की धरती पर पैर रखा था लेकिन विश्व भर के मूलवासियों के लिये यह पीड़ा का दिन है। यूरोपीय देश नये नये नरेटिव पैदा कर उसे पूरी दुनिया में फैलाने के लिये तत्पर है और वे उसमें सफल भी हो जाते हैं। उनके द्वारा पोषित एजेन्सियां भारत में विभिन्न संगठनों के माध्यम से अपने एजेंडा को पूरे देश में लागू कर भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है। इनका काम जनजातिय संगठन को तोड़ मरोड़ कर अपने आप को स्थापित करना है। विश्व आदिवासी दिवस के नाम पर ऐसे संगठन विगत चार दशकों से सक्रिय हैं। यूरोप और दुनिया के विभिन्न देशों से धन प्राप्त कर अपनी कुत्सित दुकानदारी चलाने वाले इन संगठनोंने ही आदिवासी दिवस को प्रायोजित किया है। आखिर आदिवासी यातना के इस बुरे दिन नौ अगस्त को आदिवासी दिवस मनाने के पीछे क्या तर्क है? देश के भोले और सरल आदिवासी समुदाय और समाज इनके गलत चालों का अनजाने में शिकार हो गया है और कथित आदिवासी दिवस के नाम पर इतराता, इठलाता, झूमता अपने सभ्यता की बर्बादी के दिवस की तारीख नौ अगस्त में अपना अस्तित्व और पहचान तलाश रहा है। यह गंभीर चिंतन का विषय है। (लेखक पूर्व विधायक गुमला विस सह अध्यक्ष जनजातीय मोर्चा झारखंड हैं।)

Published / 2022-08-05 16:33:22
बैंकों की सबसे बड़ी समस्या है ‘एनपीए’

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ अश्विनी महाजन)। पिछले लंबे समय से एनपीए (नॉन परफार्मिंग एस्सेट्स) की समस्या से जूझ रहे बैंकों की मुश्किलों को आसान करने के तमाम प्रयास चल रहे हैं। फरवरी माह में केन्द्रीय बजट में सुझाया गया एस्सेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (एआरसी), यानी बैड बैंक का प्रावधान भी उसी श्रृंखला में इस समस्या के समाधान का एक और प्रयास कहा जा सकता है। सबसे पहले सरकार इन्सालवेंसी एवं बैंकरप्सी (आईबीसी) एक्ट लेकर आई और पहली बार दिवालियापन के लिए कोई ठोस कानूनी पहल की गई। माना गया कि इससे ईज आफ डूईंग बिजनेस में सुधार होगा, क्योंकि नुकसान के कारण देनदारिया चुका नहीं पाने की स्थिति में परिसंपत्तियों को आसानी से बेचकर व्यक्ति छुटकारा पा सकता है, लेकिन साथ ही इसका लाभ यह था कि बैंकों के लिए भी अपनी बैलेंस शीट साफ रखना संभव हो पाएगा। उसके उपरांत देखा गया कि पिछली सरकारों के समय दिए गए कर्ज की अदायगी में कोताही होने के कारण बैंकों की आर्थिक हालत बिगड़ने के कारण उन्हें पूंजीगत मदद की भी जरूरत है। ऐसे में अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में होने के कारण उनकी पूंजीगत जरूरतों की पूर्ति हेतु भी सरकार को ही मदद देनी जरूरी थी। केन्द्र ने पिछले वर्षों में अपने खजाने से अभी तक 2.5 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है ताकि बैंकों के घाटे की भरपाई हो सके। हालांकि इन सभी प्रयासों से बैंकों को डूबने से तो बचा लिया गया, लेकिन उनकी एनपीए की समस्या बदस्तूर बनी रही। हालांकि बैंकों के एनपीए जो 2017-18 तक आते-आते 11.2 प्रतिशत तक पहुंच गए थे, सितंबर 2020 तक वे 7.5 प्रतिशत तक कम हो गए थे, लेकिन पिछले वर्ष में कोविड महामारी के कारण व्यवसायों को नुकसान के चलते ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि सितंबर 2021 तक वे फिर से बढ़ जाएंगे। रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के हवाले से पता चलता है कि वे 13.5 प्रतिशत तक भी बढ़ सकते हैं। हालांकि कोर्ट के आदेश के अनुसार जिन ऋणों की अदायगी कोरोना के चलते आगे बढ़ा दिया गया था, उच्चतम न्यायालय ने उन ऋणों को एनपीए घोषित करने के लिए रोक लगा दी थी, लेकिन अब चूंकि न्यायालय ने इस रोक को हटा दिया है, अब बैंकों को उन ऋणों जिनकी वापसी नहीं हो रही, को एनपीए घोषित करना पड़ेगा। इससे एनपीए की प्रमाण में भारी वृद्धि हो सकती है। जानकारों का मानना है कि कोविड के कारण उत्पन्न अन्य समस्याओं का भी प्रभाव एनपीए पर पड़ सकता है। वर्ष 2021-22 का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकों की एनपीए की समस्या से निपटने के लिए एआरसी यानी बैड बैंक का प्रस्ताव रखा है। बैंकों की विषम एनपीए स्थिति के चलते पहले से ही बैड बैंक का प्रस्ताव आर्थिक जगत से जुड़े लोगों की ओर से आ रहा था। चूंकि भविष्य में एनपीए की समस्या बढ़ सकती है, ऐसे में बैड बैंक की अवधारणा और उससे जुड़े अन्य पहलुओं की जांच जरूरी हो जाती है कि क्या बैड बैंक बैंकों को उनकी समस्याओं से निजात दिला सकेगा। बैड बैंक की अवधारणा विदेशों से आई है। गौरतलब है कि जब अमेरिका में 2007-08 में बैंक धराशायी हो रहे थे, उस समय अमेरिका के राजस्व विभाग ने बैंकों के उन ऋणों को खरीद लिया, जिनकी वापसी नहीं हो पा रही थी। बाद में बाजार स्थितियां ठीक होने के बाद उन्हें बाजार में बेहतर कीमत पर बेच दिया। पूर्ण लॉकडाउन की तरफ न बढ़े देश लगभग वैसा ही कदम भारत सरकार भी उठाने जा रही है, जिसे एआरसी का नाम दिया गया है। यह कंपनी सेक्यूरटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन एंड एनफोर्समेंट और सेक्यूरिटीज इंटरेस्ट एक्ट (सरफायेसी एक्ट) 2002 के अंतर्गत स्थापित होगी। इस एआरसी की स्थापना हेतु उस कंपनी के पास स्वयं स्वामित्व की 100 करोड़ की राशि का फंड होना जरूरी है। जिन दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को यह कंपनी खरीदेगी, उसके 15 प्रतिशत के बराबर उसके पास पूंजी अनुपात का होना जरूरी होगा। यह एआरसी बैंकों के पास दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को उचित कीमत पर खरीदेगी। बैंकों को उस परिसंपत्ति के मूल्य का 15 प्रतिशत नकद प्राप्त होगा और शेष 85 प्रतिशत राशि उसे बॉन्ड और ऋण पत्र के रूप में प्राप्त होगी, जिसकी देयता अधिकतम 6 वर्ष की होगी। अपने कार्य को करने हेतु एआरसी डिबेंचर और बॉन्ड तो जारी कर ही सकता है, इसके साथ वह प्रतिभूति (सिक्योरिटी) रसीद भी जारी कर सकता है। सिक्योरिटी रसीद धारक के पास उस वित्तीय परिसंपत्ति का अधिकार होगा। वित्त की मदद से बैड बैंक (एआरसी) दबावग्रस्त ऋणों को खरीद सकेगा। इन दबावग्रस्त ऋणों को बट्टे पर खरीदने के बाद एआरसी के पास वो तमाम अधिकार होंगे जो बैंक के पास थे। यानी वह उन ऋणों का पुनर्गठन या पुननिर्धारण कर सकता है, समाधन कर सकता है, ऋणी के व्यवसाय को बेच सकता है या लीज पर दे सकता है अथवा प्रबंधन को बदल सकता है, लेकिन इस प्रकार की कार्यवाही को अंजाम देने के लिए ऋण दाताओं के 75 प्रतिशत और एआरसी की सहमति जरूरी होगी। यदि ऋण प्रतिभूति रहित है तो ऐसी हालत में ऋणी पर मुकदमा करने का भी अधिकार एआरसी के पास रहेगा। यह भी प्रश्न उठता है कि इंसोलवेंसी और बैकरप्सी कोड और एआरसी में अंतर क्या है? दोनों में ही अंतोत्गत्वा उद्देश्य एनपीए से छुटकारा पाना ही है, लेकिन समझना होगा कि आईबीसी उधारी के समाधान के लिए बनाया गया है। गौरतलब है कि आईबीसी से पहले इस काम को वर्षों लग जाते थे। दूसरी तरफ एआरसी का मकसद एनपीए ऋणों को बेचकर बैंकों की बैलेंस शीट को जल्द साफ करने का है, लेकिन देखा जाए तो दोनों के माध्यम से बैंकों की समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि बैड बैंक से भी एनपीए की समस्या का समाधान नहीं होने वाला। अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में हैं और एआरसी भी सरकारी स्वामित्व में होंगे। लेकिन समझना होगा कि बैंकों के आत्मविश्वास को बढ़ाने हेतु उनके एनपीए का हस्तांतरण दूसरी संस्था को करना एक अच्छा कदम हो सकता है।

Published / 2022-07-31 14:53:39
हौसले की उड़ान... पीवी सिंधु

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुधांशु कुमार)। हाथ में रैकेट लेकर जब वह बैडमिंटन कोर्ट में उतरती हैं तो सवा सौ करोड़ लोगों की निगाहें उन पर होती हैं। जोश, जज़्बा और जुनून का वह पर्याय हैं। ओलंपिक खेलों में भारतीय टीम बड़ी-बड़ी उम्मीदों के साथ उतरती रही हैं। टोक्यो ओलंपिक में कई बड़े नामों ने निराश किया पर उन्होंने आशा के दीप को जलाए रखा। अपनी आक्रामक शैली से प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों को मात देती हुई जब वह सेमीफाइनल तक पहुंचीं तो करोड़ों देशवासियों की निगाहों में सोने की चमक दिखने लगी। रियो ओलंपिक में उन्हें रजत मिला था। ऐसे में यदि इस बार सोना की चाहत सब रख रहे थे तो वह गलत भी नहीं था। लेकिन, सेमीफाइनल मैच में चीनी ताइपे की खिलाड़ी तायी जू यिंग की आक्रामकता ने पीवी सिंधु के स्वर्णिम इरादों पर पानी फेर दिया। वह निराश हुईं। करोड़ों भारतीय भी निराश हुए। लेकिन, पिता पी रमन्ना के लिए सब कुछ खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने अपनी विश्व चैंपियन बेटी से लंबी बातचीत की। उन्हें प्रेरित किया कि इतिहास रचने का मौका अब भी है। ओलंपिक मेडल के लिए तरसते भारत देश की यदि वह कांस्य पदक भी जीत लेती हैं, तो सारा देश उनको सिर आंखों पर बिठाएगा। पिता के शब्दों से उपजी प्रेरणा लेते हुए उन्होंने अपनी ताकत को फिर से बटोरा। कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में उन्होंने अपने आक्रमण को और तीक्ष्ण किया। जोरदार स्मैश लगाए। दक्षिण कोरिया के कोच पार्क ताइ सेंग के कुशल मार्गदर्शन में पीवी सिंधु ने कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में चीन की खिलाड़ी हे बिंग जियाओ को पराजित करते हुए इतिहास रच दिया। ओलंपिक खेलों में दो पदक जीतने वाली वह भारत की प्रथम महिला खिलाड़ी बन गई हैं। यही नहीं व्यक्तिगत स्पधार्ओं में दो ओलंपिक पदक जीतने वाले भारतीय खिलाड़ियों की सूची में उनका नाम तीसरे स्थान पर अंकित हो गया है। उनसे पहले नॉर्मन प्रिचार्ड और सुशील कुमार को ओलंपिक खेलों में भारत के लिए दो पदक जीतने का गौरव प्राप्त हुआ है। पीवी सिंधु टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय खिलाड़ी बनी हैं। भारतीय रेल में कार्यरत उसके माता-पिता वॉलीबॉल के नामी खिलाड़ी रहे हैं। उनके पिता पी रमन्ना ने सियोल एशियाड में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व भी किया। विरासत में मिले खेल में पहचान बनाना पीवी सिंधु के लिए आसान था। लेकिन, आॅल इंग्लैंड चैंपियनशिप में पुलेला गोपीचंद की सफलता ने पूरे परिवार को बैडमिंटन की ओर आकर्षित किया। माता-पिता की सहमति से पीवी सिंधु ने 5 वर्ष की उम्र में ही रैकेट थाम लिया और हैदराबाद स्थित भारतीय रेल सिग्नल एवं दूरसंचार अकादमी के स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में खेलने लगी। नैसर्गिक प्रतिभा, माता-पिता के कुशल निर्देशन और पीवी सिंधु की लगन से सकारात्मक संदेश मिलने लगे कि यह लड़की आगे चलकर बड़ा खिलाड़ी बन सकती है। फिर क्या था? पूरे परिवार ने अपने सपनों के आकार को बड़ा कर लिया जिससे बड़े संघर्ष की भूमिका तैयार हुई। जरूरत को देखते हुए मां ने सरकारी सेवा छोड़ दी तो पिता ने लंबे-लंबे अवकाश लिए। पुलेला गोपीचंद का ट्रेनिंग सेंटर उसके घर से करीब 50 किलोमीटर दूर था। प्रतिदिन सिंधु को उस ट्रेनिंग सेंटर तक समय से पहुंचाने की जिम्मेदारी पिता ने अपने कंधों पर ली। छोटी सी सिंधु को स्कूटर पर बैठाने के बाद वह उसे अपनी पीठ के साथ कपड़े से बांध देते थे ताकि सिंधु स्कूटर से गिर न पड़े। तमाम मुश्किलों के बाद भी उन्होंने सुनिश्चित किया कि सिंधु प्रतिदिन समय पर प्रशिक्षण के लिए मौजूद रहे। प्रशिक्षण के दौरान सिंधु ने भी मेहनत से कभी भी मुंह नहीं मोड़ा। लगातार अपने आप को मजबूत बनाती चली गईं। 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों में साइना नेहवाल ने जब कांस्य पदक जीता तो पीवी सिंधु के बाजूओं में भी फौलादी ताकत आ गई। उन्हें विश्वास हो गया कि बैडमिंटन के कोर्ट में भारत के सुनहरे दिनों की शुरूआत हो चुकी है। अधिकारियों और स्पॉन्सरों ने भी जब इस ओर अपनी निगाहें घुमाईं तो पीवी सिंधु की ताकत और बढ़ गई। पूरी दुनिया का बैडमिंटन कोर्ट उनके लिए खुल गया। एक के बाद एक लगातार वह सभी महत्वपूर्ण टूर्नामेंट जीतती चली गईं। 14 वर्ष से पहले जूनियर वर्ग की सभी प्रमुख भारतीय प्रतियोगिताओं में अपनी चमक बिखेरने के बाद पीवी सिंधु ने इंटरनेशनल सर्किट में कदम रखा। जीवन में अत्यंत सहज रहने वाली पुसर्ला वेंकट सिंधु जब बैडमिंटन कोर्ट पर उतरती हैं तब अपनी शानदार सर्विस और आक्रमक अंदाज से सबका मन मोह लेती है और प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को घुटने टेकने पर बाध्य कर देती हैं। ओलंपिक में दो पदक जीतने के अलावा वह विश्व चैंपियनशिप में भी पाँच पदक जीत चुकी हैं। 2019 के बासेल विश्व चैंपियनशिप में पीवी सिंधु ने स्वर्ण पदक जीता था। 2017 के ग्लासगो विश्व चैंपियनशिप तथा 2018 के नानजिंग विश्व चैंपियनशिप में उन्हें रजत पदक मिला था। 2013 के कोपनहेगन विश्व चैंपियनशिप तथा 2014 के ग्वांगझू विश्व चैंपियनशिप में उन्हें कांस्य पदक मिला। ओलंपिक तथा विश्व चैंपियनशिप मिलाकर सात पदक जीतने वाली वह विश्व की तीसरी खिलाड़ी हैं। पीवी सिंधु ने एशियाई खेलों में भी दो पदक जीते हैं। जकार्ता एशियाई खेलों में उन्हें रजत पदक और इचियोन एशियाई खेलों में कांस्य पदक मिला था। गोल्ड कोस्ट में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में पीवी सिंधु ने मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक और एकल स्पर्धा में रजत पदक प्राप्त किया जबकि ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल में उन्हें कांस्य पदक मिला। उन्होंने चीन, इंडोनेशिया,हांगकांग, ब्रिटेन सहित कई देशों में सफलता के झंडे गाड़े हैं। उनके नेतृत्व में भारत में उबेर कप की टीम स्पर्धा में कांस्य पदक भी जीता है। बैडमिंटन कोर्ट पर सिंधु की उपलब्धियां अपार हैं। एक व्यक्ति के रूप में पीवी सिंधु भारतीय सभ्यता और संस्कृति की प्रतिनिधि हैं। अपने माता-पिता का खूब सम्मान और उनके हर आदेश का पालन, खेल के प्रति पूरी निष्ठा, अनुशासन, गुरु के निर्देशों के प्रति समर्पण तथा भारतीय परंपराओं और तीज-त्योहारों का अंगीकरण पीवी सिंधु को विशिष्ट बनाता है। बैडमिंटन कोर्ट पर वह एक स्टार खिलाड़ी होती हैं जिसकी चीख सुन सामने वाले खिलाड़ी की कंपकंपी छूट जाती है।

Published / 2022-07-30 16:46:20
आज भी कराह रहे हैं प्रेमचंद के पात्र...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मुरलीधर)। हमारी कसौटी पर वह साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो, जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है। साल 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में प्रेमचंद द्वारा दिए थे। देश में प्रेमचंद ही ऐसे पहले शख्स थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य को रोमांस, तिलिस्म, ऐय्यारी, जासूसी कथानकों से बाहर निकालकर आम जन की जिंदगी से जोड़ा। दलित, अल्पसंख्यक और महिलाओं के अफसानों, जज्बात को अपनी कहानियों में ढाला। उन्हें अपनी आवाज दी। साहित्य को यथार्थ से जोड़ने और समाजोन्मुखी बनाने में प्रेमचंद का अहम योगदान है। पूस की रात, सद्गति, कफन, ईदगाह, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दरोगा आदि उनकी अनेक कहानियों में सामाजिक यथार्थ के दृश्य बहुतायत में मिलते हैं। घीसू, होरी, अमीना बी, जुम्मन, सूरदास, बूढ़ी काकी हमारे अपने समाज की देन और बेलाग चरित्र हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी कहानियों का मुख्य किरदार बनाया। वरदान, सेवा सदन, रंगभूमि, प्रेमाश्रम और कर्मभूमि वगैरह उनके कई उपन्यासों की कहानी किसानों की जिंदगानी और उनके संघर्षों के ही इर्द-गिर्द घूमती है। भारतीय गांवों का जो सजीव, मार्मिक चित्रण प्रेमचंद ने अपने उपन्यास गोदान में किया है, हिन्दी साहित्य में वैसी कोई दूसरी मिसाल हमें ढूंढे नहीं मिलती। साल 1917 में रूस की अक्टूबर क्रांति से प्रेमचंद भी बेहद प्रभावित थे। अपने दोस्त के नाम एक खत में उन्होंने इसका साफ जिक्र किया है- मैं बोल्शेविकों के मतामत से कमोबेश प्रभावित हूं। वर्गविहीन समाज का सपना प्रेमचंद का सपना था। ऐसा समाज जहां वर्ण, वर्ग, लिंग, रंग, जाति, भाषा और धर्म का कोई भेद न हो। शुरुआत में गांधीजी के आंदोलन में अपार श्रद्धा रखने वाले प्रेमचंद का आदर्शवाद उनके आखिरी काल में लिखे हुए साहित्य में टूटता दिखता है। यही नहीं आगे चलकर अपने उपन्यास के एक पात्र के मुंह से जब वे यह वाक्य बुलवाते हैं कि-शिकारी से लड़ने के लिए हथियार का सहारा लेना जरूरी है, शिकारी के चंगुल में आना सज्जनता नहीं कायरता है। तब हम यहां उपन्यास सेवासदन, रंगभूमि, कायाकल्प, कर्मभूमि के लेखक से इतर एक दूसरे ही प्रेमचंद को साकार होता देखते हैं। गोया कि इसके बाद ही प्रेमचंद गोदान जैसा एपिक उपन्यास, कफन जैसी कालजयी कहानी और दिल को झिंझोड़ देने वाला अपना आलेख महाजनी सभ्यता लिखते हैं। उनकी इन रचनाओं से पाठक पहली बार भारतीय समाज की वास्तविक और कठोर सच्चाईयों से सीधे-सीधे रु-ब-रु होता है। प्रेमचंद का युग हमारी गुलामी का दौर था। जब हम अंग्रेजों के साथ-साथ स्थानीय जागीरदारों, सामंतों की दोहरी गुलामी भी झेल रहे थे। वे दोनों को ही एक समान अवाम का दुश्मन समझते थे। प्रेमचंद घर में उपरोक्त किताब के एक अंश में वे अपनी पत्नी शिवरानी देवी से कहते हैं कि शोषक और शोषितों में लड़ाई हुई, तो वे शोषित, गरीब किसानों का पक्ष लेंगे। बिला शक प्रेमचंद की कहानी, उपन्यासों में यह पक्षधरता और प्रतिबद्धता हमें साफ दिखलाई देती है। उपन्यास प्रेमाश्रम में वे जहां सामूहिक खेती और वर्गविहीन समाज की वकालत करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर विदेशी शासन और शोषणकारी जमींदारी गठबंधन का असली चेहरा बेनकाब करते हैं। उनकी नजरों में आजादी का मतलब दूसरा ही था, जो शोषणकारी दमनचक्र से सर्वहारा वर्ग की मुक्ति के बाद ही मुमकिन था। साल 1933 में समाचार पत्र जागरण के अपने एक संपादकीय में प्रेमचंद लिखते हैं- अधिकांश भारतीय स्वराज इसलिए नहीं चाहते कि अपने देश के शासन में उनकी ही आवाज, बहसें सुनी जाएं बल्कि स्वराज का अर्थ उनके प्राकृतिक उपज पर नियंत्रण, अपनी वस्तुओं का स्वच्छंद उपयोग और अपनी पैदावार पर अपनी इच्छा अनुसार मूल्य लेने का स्वत्व। स्वराज का अर्थ केवल आर्थिक स्वराज है। यानी उनके मतानुसार आर्थिक आजादी के बाद ही वास्तविक आजादी मुमकिन है। उपन्यास प्रेमाश्रम में अपने पात्रों से प्रेमचंद कहलाते हैं- रूस देश में कास्तकारों का ही राज्य है, वह जो चाहते हैं, करते हैं। और कादिर कौतूहल से कहता है- चलो ठाकुर उसी देश में चलें। यही नहीं उपन्यास रंगभूमि में उनका एक पात्र कहता है- ईर्ष्या की व्यापकता ही साम्यवाद का सर्वप्रिय कारण है। प्रेमचंद ने अपनी छोटी सी जिंदगानी में बेशुमार लेखन किया। साहित्य की शायद ही कोई ऐसी विधा बची, जिसमें उन्होंने अपना लेखन नहीं किया हो। कहानी और उपन्यासों के अलावा उन्होंने कर्बला, रूहानी शादी, संग्राम, प्रेम की वेदी जैसे नाटक और कुछ विचार, कलम, महात्मा शेख सादी, दुगार्दास, त्याग और तलवार आदि सैंकड़ों निबंध लिखे। टालस्टाय की कहानियों का अनुवाद किया। साहित्यिक पत्रिका हंस और समाचार-पत्र जागरण के संपादन का जिम्मा संभाला। गोया कि हर क्षेत्र में वे कामयाब रहे। प्रेमचंद ने भारतीय समाज का गहन और व्यापक अध्ययन किया था। विश्व की प्रमुख घटनाओं, साहित्य से भी वे अछूते नहीं थे। साम्राज्यवाद, सामंतवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता को वे इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन समझते थे। मौजूदा दौर में जिस तरह से देश की कुछ सियासी पार्टियां और कट्टरपंथी संगठन धर्म और संस्कृति का इस्तेमाल अपने निजी फायदे के लिए करने में बाज नहीं आते, प्रेमचंद इसके बरखिलाफ थे। उनका ख्याल था, धर्म को राजनीति से गडमड न कीजिए, क्योंकि धर्म ईश्वर और मनुष्य के सम्बंध की वस्तु है।

Published / 2022-07-30 16:24:36
राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की उम्मीद...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। संकेत सरगर द्वारा असाधारण प्रयास! उनका प्रतिष्ठित रजत जीतना राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए एक शानदार शुरुआत है। इनको बधाई और भविष्य के सभी प्रयासों के लिए शुभकामनाएं। 73 वर्षों में पहली बार भारत ने थामस कप बैडमिंटन का खिताब जीता, पीवी सिंधु ने सिंगापुर ओपन में जीत का परचम लहराया, विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में श्रीशंकर(लंबी कूद) अन्नु रानी और रोहित यादव (जेवलीन थ्रो) ने अच्छे प्रदर्शन से प्रशंसा बटोरी और नीरज चोपड़ा ने रजत पदक जीत कर अपनी श्रेष्ठता बरकरार रखी। लेकिन महिला हाकी विश्व कप में खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलंपिक जैसा शानदार नहीं रहा और भारतीय महिला टीम 9 वें स्थान में रही। भारतीय पुरुष हाकी टीम को भी एशिया कप में सिर्फ कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। उधर इंग्लैंड से पांचवां और अंतिम टेस्ट हारने के कारण भारत विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की रैंकिंग में चौथे स्थान पर खिसक गया है। इन उतार चढ़ावों के बीच अब खेल प्रेमियों का ध्यान इंग्लैंड के बर्मिंघम की ओर खींचा चला गया है, जहां 28 जुलाई से 8 अगस्त तक राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होने जा रहा है। जहां 72 देशों के 4500 ज्यादा खिलाड़ी पदक के लिए संघर्ष करेंगे और 283 पदकों के लिए 19 तरह के खेलों में हिस्सा लेंगे। राष्ट्रमंडल खेलों में 215 खिलाड़ियों का भारतीय दल भी अपना दमखम दिखलाने के लिए तैयार है। जिसमें 108 पुरुष और 107 महिला हैं। एथलेटिक्स की स्पर्धाओं में 37 खिलाड़ी भाग लेंगे। राष्ट्रमंडल खेल जिसे पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था की शुरुआत 1930 में हुई थी, कनाडा के हैमिल्टन शहर में। 1978 में इन खेलों का नाम राष्ट्रमंडल खेल अर्थात कामनवेल्थ गेम्स पड़ा। इसका आयोजन प्रत्येक 4 वर्ष में होता है। ब्रिटेन और उसके द्वारा पूर्व में शासित देश राष्ट्रमंडल देश कहलाते हैं। ओलंपिक और एशियाई खेलों के बाद सबसे बड़ा खेल उत्सव राष्ट्रमंडल खेल ही माने जाते हैं। 1934 के बाद भारत लगातार (1950,1962एवं 1986 को छोड़कर) राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेता रहा है।1934 में भारत ने केवल दो खेलों कूश्ती और एथलेटिक्स में हिस्सा लिया और एक कांस्य पदक जीता। कुश्ती में कांस्य पदक जीतकर राशिद अनवर ब्रिटिश एम्पायर गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने। 1934 से लेकर 2018 तक भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में कुल 503 पदक जीते हैं। जिनमें 181 स्वर्ण,173 रजत तथा 149 कांस्य पदक हैं। सबसे अधिक पदक (135) निशानेबाजी में मिले हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे सफल भारतीय खिलाड़ी 9 स्वर्ण सहित कुल 15 पदक जीतने वाले जशपाल राणा रहे हैं। वैसे भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक धावक मिल्खा सिंह ने कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में 440 यार्ड इवेंट में प्राप्त किया था। भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2010 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में रहा था , जहां भारत ने 101पदक जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले ही भारत के दो खिलाड़ी फरार्टा धाविका धनलक्ष्मी और ट्रिपल जंपर ऐश्वर्य बाब डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए हैं। लेकिन विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीत कर नीरज चोपड़ा ने राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में उत्साह का संचार कर दिया है। आगामी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को अपने 37 एथलीटों से पदक की उम्मीद तो है ही, पुरुष और महिला हाकी टीम से भी कम उम्मीद नहीं है। इस बार ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हाकी टीम आस्ट्रेलिया को पछाड़ कर स्वर्ण जीत ले तो कोई आश्चर्य नहीं। इसके अलावा जैवलीन थ्रो में नीरज चोपड़ा, रोहित यादव और अन्नु रानी से, बैडमिंटन में पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन, के श्रीकांत, चिराग शेट्टी और सात्विक साईराज से, लंबी कूद में श्री शंकर और मो अनीश याहिया से,3000 मीटर स्टीपल चेज में अविनाश साबले से, त्रिकूद में प्रवीण चित्राबेल, अब्दुल्ला अबुबाकर से, चक्का फेंक में सीमा पुनिया और नवजीत कौर से, मैराथन रेस में नितेंद्र रावत से, कूश्ती में सागर अहलावत, दीपक पुनिया, बजरंग पुनिया, रवि दाहिया, विनेश फोगाट, साक्षी मलिकऔर अंशु मलिक से, मुक्केबाजी में अमित पंघाल और निकहत जरीन से, भारोत्तोलन में मीराबाई चानू से और टेबल टेनिस में अचंता शरत कमल और मोनिका बत्रा से पदक की उम्मीद है। इस बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रही है और इनसे भी खेलप्रेमियों को काफी उम्मीदें हैं।

Published / 2022-07-25 18:11:10
राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की उम्मीद...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। पिछले दिनों खेल के मैदान से कुछ अच्छी तो कुछ निराश करने वाली खबरें आईं। 73 वर्षों में पहली बार भारत ने थामस कप बैडमिंटन का खिताब जीता, पीवी सिंधु ने सिंगापुर ओपन में जीत का परचम लहराया, विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में श्रीशंकर (लंबी कूद) अन्नु रानी और रोहित यादव (जेवलीन थ्रो) ने अच्छे प्रदर्शन से प्रशंसा बटोरी और नीरज चोपड़ा ने रजत पदक जीत कर अपनी श्रेष्ठता बरकरार रखी। लेकिन महिला हाकी विश्व कप में खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलंपिक जैसा शानदार नहीं रहा और भारतीय महिला टीम 9 वें स्थान में रही। भारतीय पुरुष हाकी टीम को भी एशिया कप में सिर्फ कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। उधर इंग्लैंड से पांचवां और अंतिम टेस्ट हारने के कारण भारत विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की रैंकिंग में चौथे स्थान पर खिसक गया है। इन उतार चढ़ावों के बीच अब खेल प्रेमियों का ध्यान इंग्लैंड के बर्मिंघम की ओर खींचा चला गया है, जहां 28 जुलाई से 8 अगस्त तक राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होने जा रहा है। जहां 72 देशों के 4500 ज्यादा खिलाड़ी पदक के लिए संघर्ष करेंगे और 283 पदकों के लिए 19 तरह के खेलों में हिस्सा लेंगे। राष्ट्रमंडल खेलों में 215 खिलाड़ियों का भारतीय दल भी अपना दमखम दिखलाने के लिए तैयार है। जिसमें 108 पुरुष और 107 महिला हैं। एथलेटिक्स की स्पर्धाओं में 37 खिलाड़ी भाग लेंगे। राष्ट्रमंडल खेल जिसे पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था की शुरुआत 1930 में हुई थी, कनाडा के हैमिल्टन शहर में। 1978 में इन खेलों का नाम राष्ट्रमंडल खेल अर्थात कामनवेल्थ गेम्स पड़ा। इसका आयोजन प्रत्येक 4 वर्ष में होता है। ब्रिटेन और उसके द्वारा पूर्व में शासित देश राष्ट्रमंडल देश कहलाते हैं। ओलंपिक और एशियाई खेलों के बाद सबसे बड़ा खेल उत्सव राष्ट्रमंडल खेल ही माने जाते हैं। 1934 के बाद भारत लगातार (1950,1962 एवं 1986 को छोड़कर)-राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेता रहा है।1934 में भारत ने केवल दो खेलों कूश्ती और एथलेटिक्स में हिस्सा लिया और एक कांस्य पदक जीता। कूश्ती में कांस्य पदक जीतकर राशिद अनवर ब्रिटिश एम्पायर गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने।1934 से लेकर 2018 तक भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में कुल 503 पदक जीते हैं। जिनमें 181 स्वर्ण,173 रजत तथा 149 कांस्य पदक हैं। सबसे अधिक पदक (135) निशानेबाजी में मिले हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे सफल भारतीय खिलाड़ी 9 स्वर्ण सहित कुल 15 पदक जीतने वाले जशपाल राणा रहे हैं। वैसे भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक धावक मिल्खा सिंह ने कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में 440 यार्ड इवेंट में प्राप्त किया था। भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2010 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में रहा था , जहां भारत ने 101पदक जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले ही भारत के दो खिलाड़ी फर्राटा धाविका धनलक्ष्मी और ट्रिपल जंपर ऐश्वर्य बाब डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए हैं। लेकिन विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीत कर नीरज चोपड़ा ने राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में उत्साह का संचार कर दिया है। आगामी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को अपने 37एथलिटों से पदक की उम्मीद तो है ही, पुरुष और महिला हाकी टीम से भी कम उम्मीद नहीं है। इस बार ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हाकी टीम आस्ट्रेलिया को पछाड़ कर स्वर्ण जीत ले तो कोई आश्चर्य नहीं। इसके अलावा जैवलीन थ्रो में नीरज चोपड़ा, रोहित यादव और अन्नु रानी से, बैडमिंटन में पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन, के श्रीकांत, चिराग शेट्टी और सात्विक साईराज से, लंबी कूद में श्री शंकर और मो अनीश याहिया से,3000 मीटर स्टीपल चेज में अविनाश साबले से, त्रिकूद में प्रवीण चित्राबेल, अब्दुल्ला अबुबाकर से, चक्का फेंक में सीमा पुनिया और नवजीत कौर से, मैराथन रेस में नितेंद्र रावत से, कूश्ती में सागर अहलावत, दीपक पुनिया, बजऱंग पुनिया, रवि दाहिया, विनेश फोगाट, साक्षी मलिकऔर अंशु मलिक से, मुक्केबाजी में अमित पंघाल और निकहत ज़रीन से, भारोत्तोलन में मीराबाई चानू से और टेबल टेनिस में अचंता शरत कमल और मोनिका बत्रा से पदक की उम्मीद है।इस बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रही है और इनसे भी खेलप्रेमियों को काफी उम्मीदें हैं।

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