एबीएन सेंट्रल डेस्क। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीयकरण बैंकिंग उद्योग के लिए सबसे बड़ा पड़ाव रहा। 19 जुलाई, 1969 की मध्यरात्रि को कम से कम 50 करोड़ रुपये की जमा पूंजी वाले 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। फिर 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर चला, जिसमें न्यूनतम 200 करोड़ रुपये की जमा पूंजी वाले छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। राष्ट्रीयकरण के पहले दौर से ठीक पहले जून 1969 में 73 वाणिज्यिक बैंक थे, जिनकी 8,262 शाखाएं थीं। अब देश में 100 बैंक हैं। इनमें 12 सार्वजनिक क्षेत्र, 21 निजी क्षेत्र, तीन स्थानीय क्षेत्र बैंक, 12 स्मॉल फाइनैंस बैंक, छह पेमेंट बैंक और 46 विदेशी बैंक हैं। इनके अलावा 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक भी हैं। वे भी अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों की श्रेणी में आते हैं। गत वर्ष दिसंबर के आंकड़ों के अनुसार उनकी 2,11,332 शाखाएं हैं। जून 1969 में बैंकों की जमा राशि 4,646 करोड़ रुपये और उनके द्वारा दिया गया कर्ज 3,599 करोड़ रुपये था। इस साल जुलाई में जमा राशि बढ़कर 169.7 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज का आंकड़ा 123.7 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। वैसे तो भारत में बैंकिंग का संदर्भ कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समय से ही मिलता है, लेकिन आधुनिक इतिहास की बात करें तो भारत में वाणिज्यिक बैंकिंग की शुरूआत 1720 में बैंक आॅफ बॉम्बे से हुई। फिर 1770 में ‘बैंक आॅफ हिंदोस्तान’ ने कलकत्ता में शुरूआत की। यहीं पहले प्रेसिडेंसी बैंक- बैंक आॅफ बंगाल-की नींव भी रखी गई। उसे 1823 में करेंसी नोट जारी करने का अधिकार मिला। फिर 1840 में बैंक आॅफ बॉम्बे के रूप में दूसरे प्रेसिडेंसी बैंक की स्थापना हुई। उसके बाद जुलाई 1843 में बैंक आॅफ मद्रास नाम से तीसरा प्रेसिडेंसी बैंक शुरू हुआ। इन तीनों का 1921 में इंपीरियल बैंक में विलय हो गया। इसी बैंक ने 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना से पहले तक केंद्रीय बैंक की भूमिका निभाई। जहां इन बैंकों की स्थापना के पीछे अंग्रेज रहे, वहीं पहला भारतीय बैंक इलाहाबाद बैंक 1865 में अस्तित्व में आया। उसके बाद 1895 में पंजाब नैशनल बैंक (लाहौर में) बना। उसके 11 वर्ष उपरांत 1906 में बैंक आॅफ इंडिया की स्थापना हुई। वर्ष 1906 से 1913 के बीच कई बैंक फलते-फूलते गए। इस दौरान सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया, बैंक आॅफ बड़ौदा, केनरा बैंक और इंडियन बैंक जैसे नाम उभरे। दिसंबर 1913 तक विभिन्न किस्म के 56 बैंक और सामने आए। उनमें 12 विनिमय बैंक भी थे, जो विदेशी विनिमय कारोबार में सक्रिय थे। वर्ष 1930 तक तक वाणिज्यिक बैंकों की संख्या करीब दोगुनी बढ़कर 107 हो गई। इस अवधि में दो विश्व युद्धों और महामंदी ने तमाम बैंकों को धराशायी कर दिया। फिर भी 1947 तक समूचा बैंकिंग उद्योग निजी स्वामित्व के दायरे में था और उनमें छह में से प्रत्येक के पास कम से कम 100 करोड़ रुपये का पोर्टफोलियो था। तबसे बैंकिंग के मोर्चे पर हमने खासी प्रगति की है। फिर भी परिसंपत्तियों की दृष्टि से मात्र एक ही भारतीय बैंक विश्व के शीर्ष 50 बैंकों में जगह बना पाया है। हमारा क्रेडिट-जीडीपी अनुपात विकसित देशों को तो छोड़िए भूटान से भी कम है। इतना ही नहीं विश्व बैंक की एक ताजा रपट के अनुसार विश्व के सात देशों में 140 करोड़ वयस्क अभी भी औपचारिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच से वंचित हैं। इन देशों में से एक भारत भी है। रपट के अनुसार भारत में 13 करोड़ लोग ऐसे हैं। जिन लोगों की बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच भी है, उनका भी एक दमनकारी वित्तीय प्रणाली में शोषण-उत्पीड़न हो रहा है। ऐसा कहने के पक्ष में मेरे पास अपने तर्क हैं। श्रीमान ए की एक निजी बैंक में सावधि जमा (एफडी) है। उन्हें एक क्रेडिट कार्ड दिया गया और बैंक में बचत खाता खुलवाने के लिए भी राजी कर लिया, जिसमें खाते में न्यूनतम बैलेंस रखने के पहलू की ओर उनका ध्यान आकृष्ट ही नहीं कराया गया। दो साल बाद परिपक्व होने पर ब्याज अर्जित करने के बजाय श्रीमान ए की एफडी और सिकुड़ गई। क्यों? क्योंकि, बचत खाते में न्यूनतम बैलेंस नहीं था और हर तिमाही पर एफडी की एक निश्चित राशि हजार्ने के तौर पर ली जाती रही। श्रीमान ए को कभी इसकी सूचना नहीं दी गई। श्रीमान बी का एक बड़े सरकारी बैंक के साथ दो दशक पुराना नाता रहा। उनका बचत खाता, एफडी और पारिवारिक सदस्यों के कई खातों के साथ ही बैंक में उनका एक लॉकर भी था। जब 82 वर्षीय श्रीमान बी उसी शहर के दूसरे इलाके में रहने चले गए तो उनके सभी खाते तो करीबी स्थानीय इलाके की शाखा में स्थानांतरित हो गए, लेकिन लॉकर नहीं हो पाया। नई शाखा में उन्हें लॉकर सुविधा तभी मिलती जब वह एक लाख रुपये सालाना वाली बाजार-लिंक्ड पॉलिसी लेते। तीसरा उदाहरण और दिलचस्प है। इसमें ग्राहक अमेरिका में रहने वाला एनआरआई है। यहां मिस्टर सी का मुंबई के एक निजी बैंक की शाखा में एनआरओ खाता है। बंबई उच्च न्यायालय ने वसीयतनामे की पुष्टि के बाद उनकी बेटी को माता-पिता की संपत्ति का अधिकार प्रदान किया। कर अदायगी के बाद कायदे से इसमें राशि को लाभार्थी के खाते में डाल दिया जाता। पंरतु शाखा ने खाते को ही फ्रीज कर दिया, क्योंकि बैंक वित्तीय वर्ष के समापन से पहले राशि निर्गत नहीं करना चाहता। क्यों? इससे जमा राशि जुटाने का लक्ष्य पीछे रह जाता। आखिरकार पैसे अप्रैल के पहले सप्ताह में जारी हुए। इस प्रकार लाभार्थी को कर अदा करने के लिए एक और वित्तीय वर्ष की प्रतीक्षा करनी पड़ी, क्योंकि यहां लेनदेन 31 मार्च के पहले नहीं हो पाया था। चौथा उदाहरण तो सबसे विचित्र है। श्रीमान डी की एक निजी बैंक के संबंध प्रबंधक से गाढ़ी दोस्ती थी, जिन पर वह आंख मूंदकर भरोसा किया करते थे। प्रबंधक ने मिस्टर डी को 2019 से सितंबर 2001 में उनकी मृत्यु के बीच नौ बीमा पॉलिसी बेचीं। प्रबंधक इस बात से पूरी तरह अवगत थे कि सभी बीमित व्यक्ति अमेरिकी नागरिक हैं। चतुर बैंकर ने पॉलिसी के समयबद्ध भुगतान के लिए इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सर्विस (ईसीएस) का प्रावधान किया। उनके निधन के बाद जब उनकी पत्नी को यह पता लगा तो संपर्क प्रबंधक ने आश्वस्त किया कि तीन वर्षों तक प्रीमियम अदा करने के बाद पॉलिसी को सरेंडर किया जा सकता है और मूल राशि वापस हो जायेगी। इस बीच बीमाकर्ता ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी व्यक्ति के निधन की स्थिति में दावा खारिज हो जाएगा, क्योंकि इसमें बीमित व्यक्ति की नागरिकता आड़े आ जाएगी। उन नौ बीमा पॉलिसी का सालाना प्रीमियम पता है कितना था? तकरीबन 11,40,000 रुपये। मैं ऐसे तमाम मामले गिना सकता हूं। ऐसे में स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने की अवधि एक आदर्श अवसर है, जब हम ग्राहकों को बैंकों के उत्पीड़न से आजादी दिलाएं। ईमानदार बैंकिंग को प्रोत्साहन दिया जाए और ग्राहक अपनी आजादी का आनंद उठाएं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संतोष)। एकनाथ रानडे का जन्म 19 नवम्बर, 1914 को ग्राम टिलटिला (जिला अमरावती, महाराष्ट्र) में हुआ था। पढ़ने के लिए वे अपने बड़े भाई के पास नागपुर आ गये। वहीं उनका सम्पर्क डा. हेडगेवार से हुआ। वे बचपन से ही बहुत प्रतिभावान एवं शरारती थे। कई बार शरारतों के कारण उन्हें शाखा से निकाला गया; पर वे फिर जिदपूर्वक शाखा में शामिल हो जाते थे। इस स्वभाव के कारण वे जिस काम में हाथ डालते, उसे पूरा करके ही दम लेते थे। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर उन्होंने संघ के संस्थापक डा हेडगेवार के पास जाकर प्रचारक बनने की इच्छा व्यक्त की; पर डा जी ने उन्हें और पढ़ने को कहा। अत: 1936 में स्नातक बनकर वे प्रचारक बने। प्रारम्भ में उन्हें नागपुर के आसपास का और 1938 में महाकौशल का कार्य सौंपा गया। 1945 में वे पूरे मध्य प्रदेश के प्रान्त प्रचारक बने। 1948 में गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। संघ के सभी प्रमुख अधिकारी पकड़े गये। ऐसे में देशव्यापी सत्याग्रह की जिम्मेदारी एकनाथ जी को दी गयी। उन्होंने भूमिगत रहकर पूरे देश में प्रवास किया, जिससे 80,000 स्वयंसेवकों ने उस दौरान सत्याग्रह किया। एकनाथ जी ने संघ और शासन के बीच वार्ता के लिए मौलिचन्द्र शर्मा तथा द्वारका प्रसाद मिश्र जैसे प्रभावशाली लोगों को तैयार किया। इससे सरकार को सच्चाई समझ में आयी और प्रतिबंध हटा लिया गया। इसके बाद वे एक साल दिल्ली रहे। 1950 में उन्हें पूर्वोत्तर भारत का काम दिया गया। 1953 से 56 तक वे संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख और 1956 से 62 तक सरकार्यवाह रहे। इस काल में उन्होंने संघ कार्य तथा स्वयंसेवकों द्वारा स॰चालित विविध संगठनों को सुव्यवस्था प्रदान की। प्रतिबन्ध काल में संघ पर बहुत कर्ज चढ़ गया था। एकनाथ जी ने श्री गुरुजी की 51वीं वर्षगांठ पर श्रद्धानिधि संकलन कर उस संकट से संघ को उबारा। 1962 में वे अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख बने। 1963 में स्वामी विवेकानन्द की जन्म शताब्दी मनायी गयी। इसी समय कन्याकुमारी में जिस शिला पर बैठकर स्वामी जी ने ध्यान किया था, वहां स्मारक बनाने का निर्णय कर श्री एकनाथ जी को यह कार्य सौंपा गया। दक्षिण में ईसाइयों का काम बहुत बढ़ रहा था। उन्होंने तथा राज्य और केन्द्र सरकार ने इस कार्य में बहुत रोड़े अटकाये; पर एकनाथ जी ने हर समस्या का धैर्यपूर्वक समाधान निकाला। इसके स्मारक के लिए बहुत धन चाहिए था। विवेकानन्द युवाओं के आदर्श हैं, इस आधार पर एकनाथ जी ने जो योजना बनायी, उससे देश भर के विद्यालयों, छात्रों, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और धनपतियों ने इसके लिए पैसा दिया। इस प्रकार सबके सहयोग से बने स्मारक का उद्घाटन 1970 में उन्होंने राष्ट्रपति श्री वराहगिरि वेंकटगिरि से कराया। 1972 में उन्होंने विवेकानन्द केन्द्र की गतिविधियों को सेवा की ओर मोड़ा। युवक एवं युवतियों को प्रशिक्षण देकर देश के वनवासी अ॰चलों में भेजा गया। यह कार्य आज भी जारी है। केन्द्र से अनेक पुस्तकों तथा पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन भी हुआ। इस सारी दौड़धूप से उनका शरीर जर्जर हो गया। 22 अगस्त 1982 को मद्रास में भारी हृदयाघात से उनका देहान्त हो गया। कन्याकुमारी में बना स्मारक स्वामी विवेकानन्द के साथ श्री एकनाथ रानडे की कीर्त्ति का भी सदा गान करता रहेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ अशोक नाग)। विगत दिनों की बरसात में देश के शहरों में बाढ़ और जल जमाव की स्थिति भयावह हो गयी है। सौभाग्य से झारखंड एक ऐसा राज्य है जो पठारी होने के कारण बाढ़ की समस्या से मुक्त है। लेकिन विगत कुछ वर्षो से होने वाले जलवायु परिवर्तन और शहरों के बिना किसी योजना के विकास के कारण हमारी रांची में जल जमाव और बाढ़ की स्थिति देखी जा रही है। अगर ध्यान से सोचा जाए तो रांची में ड्रेनेज सिस्टम नाम की कोई चीज है ही नहीं। अगर ऐसी स्थिति रही तो आने वाले समय में हमें भारी कठिनाई का सामना करना होगा। जैसी की खबर आ रही है कि हमारी नदियों के किनारे पर पूर्ण अतिक्रमण हो चुका है। जमशेदपुर में बाढ़ से सैकड़ों घर डूब चुके हैं। अब इस बार की बरसात को ही देखें। झमाझम वारिश बीते 3-4 दिनों से रांची में हो रही है और रांची के अधिकांश शहरी इलाके में बाढ़ जैसी हालात हो गये हैं। आज तक करीब 1200 करोड़ खर्च करके भी पठारी इलाके रांची में बाढ़ के हालात पैदा हो गये हैं। पुराने लोगों से पूछिये आज से 25-30 साल पहले जब आज के जैसा बिना प्लानिंग का शहर नहीं पनपा था, घनघोर बारिश के आधे घंटे में ही पूरी रांची और साफ होकर पानी अपना रास्ता ढूंढ़ता स्वर्णरेखा नदी में मिल जाता था, पानी के निकासी के अपने रास्ते थे। हिनू पुल, डोरण्डा पुल, कोकर डिस्टलरी पुल, कांके पुल, चुटिया पुल, करमटोली पुल, बरियातु रोड, कलवेट, आदि का निर्माण ही पानी को सुगमता से निकालने के लिए हुआ था। सभी तालाब आपस में जुड़े थे। उदाहरण के लिए भुतहा तालाब (वर्तमान जयपाल सिंह स्टेडियम), जेल तालाब, लालपुर तालाब, गुदड़ी तालाब सभी एक दूसरे से जुड़े थे। पानी निकासी का स्थान नियत था, आज भी देखें तो जिन इलाकों में जल निकासी के स्थानों को भरकर फ्लैट, अपार्टमेंट, घर जोे अधिकांश बिना रजिस्ट्री, म्यूटेशन के हैं, में ही पानी अधिक जमता है और बाढ़ की स्थिति आ जाती है। जयपाल सिंह स्टेडियम के ऊपर अपर बाजार की स्थिति देखिए, कोकर, लालपुर की स्थिति देखिए, बरियातु, मोराहाबादी, हरिहर सिंह रोड की स्थिति देखिए कमोवेश पूरी रांची की स्थिति दिनोदिन नारकीय होती जा रही है। इसके जिम्मेवार कौन हैं? आज के दिन भी रांची नगर निगम के 2037 मास्टर प्लान को अपने मोबाइल में खोलिए इसमें पानी निकासी के रास्ते प्लाट नं0 सहित दिखाई देंगे, पर उन प्लॉटों पर अवैध मकान बनकर तैयार हैं जिसके कारण पानी निकासी के रास्ते अवरूद्घ होते हैं और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। रांची नगर निगम बिना प्लानिंग के करोड़ों रूपये खर्च करता है और सिर्फ पक्की नालियों का निर्माण, बिना ये समझे कि पानी कहां जायेगा? तालाब जीर्णोद्घार के नाम पर तालाब का सीमेंटीकरण कर तालाब को सिमेंट का हॉज बनाया जा रहा है। हम बरसात में बाढ़ सदृश्य विभीषिका झेलते हैं और उसको अपनी नियति समझते हैं, पर सच्चाई यह है कि यह कुछ अदूरदर्शी प्रशासनिक अधिकारियों और प्लानर की करस्तानी है। 1200 करोड़ में स्थिति सुधार नहीं सके, इन सबकी मंशा, नियत और क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। इन सबका हल आज भी कठिन नहीं है, आवश्यकता है ईमानदार और सख्त पहल की। भगवान बिरसा मुण्डा की समाधि कोकर में डिस्टलरी पुल के पास क्यों है? कभी सोचा इसके बारे में, इसका कारण है कि जब भगवान बिरसा की मृत्यु कारागार में हुई तो लोगों में आक्रोश दंगा न फैले, इसलिए रातों-रात उनके शव को डिस्टलरी पुल के समीप फेंक दिया गया, ताकि जलप्रपात के रूप में बहते करम नदी से होकर भगवान बिरसा का शव स्वर्णरेखा नदी में मिल जाए? आज वहां क्या स्थिति है, वर्षों साल पहले बने डिस्टलरी पुल को ढहा कर करम नदी, जिससे मोराहाबादी, बरियातु, लालपुर, मेन रोड का पानी निकलता था, के मुहाने पर नगर निगम द्वारा पार्क बना दिया गया जो हर बरसात में डूब जाता है। करमटोली तालाब से होकर बहने वाली करम नदी का अस्तित्व ही अवैध निर्माण कर खत्म कर दिया गया है। जबकि आज भी मास्टर प्लान 2037 जो रांची नगर निगम के वेबसाईट में उपलब्ध है में पानी निकासी या पानी का इलाका करमटोली चौक से होकर डिस्टलरी पुल दिखा रहा है। कौन है जिम्मेवार? प्रशासनिक अक्षमता का खामियाजा जनता क्यों भुगते। हमारी रांची शहर के हर पानी निकासी इलाकों को धड़ल्ले से बेचा जा रहा और अवैध निर्माण कर पानी निकासी के रास्ते को अवरूद्घ कर बाढ़ की स्थिति लाई जा रही है। इन सबका समाधान क्या है? इन सबका समाधान है दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्लानिंग कर कठोरता के साथ उसे लागू कराना। इन उपायों को तुरंत करें : पूरे शहर का पानी जिन जगहों से निकलता हो उसे चिह्नित करें। (जैसे कोकर डिस्टलरी पुल से होकर, जुमार नदी से होकर, चुटिया नदी से होकर, स्वर्णरेखा नदी की ओर) पानी ट्रीटमेंट प्लान्ट उन स्थानों पर लगायें ताकि गंदा पानी साफ होकर नदी में जाए। निचली और ऊंची भूमि को चिह्नित करें और कम से कम 50 फीट पानी निकासी हेतु जमीन को चिह्नित कर अधिग्रहित करें और अतिक्रमण को बलपूर्वक हटाये जायें। इस मुख्य 50 फीट पानी निकासी हेतु जमीन में अतिक्रमण किसी कीमत पर न हो और 5 फीट दोनों तरफ वृक्ष लगाए जायें। इस मुख्य 50 फीट निकासी हेतु जमीन को शहर की हर नालियों से जोड़ा जाए। जहां नाली सम्भव न हो वहां पाइपलाईन बिछायी जाए, पर टोपोग्राफी (ऊंची-नीची जमीन की माप) का विशेष ध्यान रखा जाए। इन 5 बिन्दुओं पर ही अमल कर हम अपनी पठारी रांची में बाढ़ आने से बचा सकते हैं। उपाय आसान है पर दृढ़-इच्छाशक्ति और सही प्लानिंग कर ही हम अपनी रांची को फिर से पुरानी रांची बना सकते हैं। रांची की स्वर्णरेखा, हरमू, पोटपोटो सहित सभी नदियों के तट पर वृक्षारोपण होने के साथ ही गंदे पानी नदियों में डाले जाए इसके लिये भी व्यवस्था हो जाए। यह सही सिस्टम से ही संभव है। (लेखक समाजसेवी, पर्यावरणविद हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (टीएन नाइनन)। यदि मैं दो दशक पहले की एक घटना याद करना चाहूं तो वह मौका था मुंबई के ताज महल होटल में रघुराम राजन की किताब ‘सेविंग कैपिटलिज्म फ्रॉम दी कैपिटलिस्ट’ पर एक चर्चा कार्यक्रम का। अचानक हॉल के एक ओर से एक अतिरिक्त भारी आवाज उभरी कि भारत और उसका शेयर बाजार ऐतिहासिक तेजी हासिल करने वाले हैं। यह बात उस स्थान और संदर्भ से एकदम अलग थी। पता चला कि वह आवाज राकेश झुनझुनवाला की है जिनसे मेरी बाद में ड्रिंक्स पर कुछ मुलाकात हुईं। कुछ नहीं ब?ल्कि हमारी कई मुलाकात हुईं और इनमें से कुछ दक्षिण मुंबई में उनके पसंदीदा बार ज्योफ्रेस में भी हुईं। जानें झुनझुनवाला का सफर : इस एकतरफा बातचीत में आमतौर पर अक्सर ऐसी रंगीन बातें होतीं जो शेयर बाजारों को कहीं न कहीं महिलाओं से जोड़कर कही जातीं। झुनझुनवाला भारतीय शेयर बाजार में आने वाली तेजी को लेकर अपनी वजहों के बारे में विस्तार से बात करते। उनका आशावाद बुनियादी आंतरिक सोच से संचालित था जिसमें कोई खास प्रभावित करने वाली बात नहीं होती। लेकिन वह पहले ही कुछ पैसा कमा चुके थे और आगे चलकर पता चला कि भविष्य में जो होने वाला था उसकी तुलना में वह कुछ नहीं था। राकेश अक्सर बहुत उत्साहित होकर बात किया करते थे। राकेश अपनी शेयरों के चयन की रणनीति को लेकर बहुत सरल ढंग से बात नहीं करते थे। वह शायद जानबूझकर बहुत संक्षेप में बात करते थे। बस एक बार उन्होंने मुझे निवेश की सलाह दी थी और कहा था कि मैं टाटा मोटर्स के शेयर खरीद लूं। हालांकि मैंने उनकी सलाह नहीं मानी। बाद में उन्होंने मुझे संदेश भेजकर बताया कि कंपनी के शेयरों की कीमत कितनी तेज हो गई है। यह बस इसलिए कि मैं भूल न जाऊं। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने शेयर बाजार से किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में अधिक पैसा कमाया, वह बाजार की तुलना में भारत को लेकर अधिक आशावादी थे। वह अपनी संपत्ति से अधिक देश के बारे में बात करने को उत्सुक रहते थे। उनका राजनीतिक नजरिया कट्टर हिंदू आग्रह की ओर मुड़ गया था और हमेशा की तरह उनका न तो अपनी भाषा पर नियंत्रण था और न ही अपने हावभाव पर कोई लगाम। मेरा मानना रहा कि उनके अधपके राजनीतिक विचारों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था, वह अपनी बात कह देते थे। दिलचस्प बात यह है कि अच्छे काम के लिए दिए जाने वाले उनके दान में राजनीतिक नजरिये से कोई भेदभाव नहीं होता था। वह एक पारिवारिक व्यक्ति थे। उनके पिता और पत्नी अक्सर उनकी बातचीत में आते। वह बच्चों की चाह रखते थे और जब उनके बच्चे हुए तो वह बेहद खुश हुए। उन्हें फिल्में पसंद थीं और उन्होंने कुछ फिल्मों में पैसा भी लगाया। अपने 60वें जन्मदिन पर उन्होंने व्हीलचेयर पर बैठकर जो नृत्य किया था वह उनके निधन के बाद वायरल हो गया। वह वीडियो उनकी जिजीविषा का प्रतीक है। उन्होंने मालाबार हिल पर एक बड़ा सा भूखंड खरीदा था और एक शानदार रिहाइश बनायी थी लेकिन उन्होंने उदारतापूर्वक दान देना भी शुरू कर दिया था और वह और अधिक दान देना चाहते थे। वह लोगों पर यकीन करते थे। उन्होंने उस विश्वविद्यालय में जाने से इनकार कर दिया था जिसमें उनका पैसा लगा था। वह कहते थे कि उसे चलाने के लिए लोग हैं। उनका दावा था कि उन्होंने आकाश एयर में 40 फीसदी शेयर अहम लोगों को उनकी मेहनत के बदले दिए हैं। उन्होंने कहा था, उनके पास पर्याप्त हिस्सेदारी है इसलिए मुझे चिंता करने की जरूरत नहीं है। मैं किसी को जवाब देना नहीं चाहता। वह सही थे और उन्होंने हमेशा केवल अपने पैसे का निवेश किया। इसके बावजूद विमानन कंपनी के साथ निवेशक राकेश आखिरकार एक उद्यमी बन गए थे। उनके करीबी मित्र और मृदुभाषी व्यक्ति राधाकृष्ण दमाणी ने उनसे पहले यही राह अपना ली थी। दमाणी के डीमार्ट रिटेल चेन शुरू करने के पहले वे संयोग से दलाल स्ट्रीट पर मिले थे और अब उनकी चेन का बाजार मूल्य 2.8 लाख करोड़ रुपये है। एक दिलचस्प बातचीत में राकेश ने एक बार कहा था कि उनका समुदाय देश का मालिक है। जब उनसे अपनी बात स्पष्ट करने को कहा गया तो उन्होंने कहा कि वह बनियों के अग्रवाल वंश से हैं यानी उसी वंश से जिससे जिंदल, बंसल, गोयल, मित्तल, सिंघल और कई अन्य गोत्र आते हैं। इसके बाद उन्होंने अग्रवाल वंश से ताल्लुक रखने वाले बड़े कारोबारियों की सूची निकाली और कहा कि अब बताइये कि हम इस देश पर मालिकाना रखते हैं या नहीं। हमारी आखिरी मुलाकात दिल्ली में हुई थी जहां वह प्रधानमंत्री तथा अन्य बड़े राजनेताओं से मिलने आए थे। दोपहर के भोजन पर उन्होंने मुझे और शेखर गुप्ता को आमंत्रित किया था। वह व्हीलचेयर पर थे और उनकी स्थिति ठीक नहीं लग रही थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका स्वास्थ्य ठीक है लेकिन उनमें वह पुरानी बात नजर नहीं आ रही थी। समय-समय पर एक सेवक उन्हें दवाएं दे रहा था। वहां से विदा होते समय इस विशाल व्यक्तित्व के भविष्य को लेकर कुछ पूवार्भास हो रहा था।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (पवन)। 75वें स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ संकल्प, आजादी के सौवें साल में भारत की तस्वीर और विरासत पर गर्व जैसी कुछ बातें इस बार कहीं। महंगाई, बेरोजगारी, काला धन जैसी समस्याएं देश में नहीं हैं, ऐसा वे मानते होंगे, इसलिए इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा। परिवारवाद उन्हें दंश की तरह चुभता है, सो इस बारे में उन्होंने जरूर कुछ बातें कहीं। आजादी के अमृतकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने देश से कुछ अमृत वचन कहे, जिसमें एक महत्वपूर्ण बात नारी शक्ति के सम्मान की थी। यह बात अपने आप में बड़ी अजीब और दुखदायी है कि महिला का आदर जैसी बातें जो स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाकर बच्चों को शुरू से पढ़ाई जानी चाहिए, उनका ज्ञान नागरिकों को लाल किले से देने की जरूरत पड़ रही है। वैसे मोदी सरकार जो नयी शिक्षा नीति लेकर आई है, उसमें अगर अभी से प्राथमिक कक्षा में स्त्री सम्मान, महिलाओं से बराबरी का व्यवहार जैसी बातों की सीख दी जाए, तो शायद आजादी के सौवें बरस में ऐसी कोई नसीहत लालकिले से देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि किसी न किसी वजह से हमारे अंदर यह सोच आ गई है कि हम अपनी वाणी से, अपने व्यवहार से, अपने कुछ शब्दों से महिलाओं का अनादर करते हैं। उन्होंने लोगों से रोजमर्रा की जिंदगी में महिलाओं को अपमानित करने वाली हर चीज से छुटकारा पाने का संकल्प लेने का आग्रह किया। इसके साथ ही उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महान महिला नेताओं के योगदान की भी सराहना की और लोगों से ‘मानसिकता में बदलाव’ की अपील की। हमें नहीं पता कि मोदीजी की अपील में इतनी ताकत है कि नहीं कि रातों रात मानसिकता में बदलाव आ जाए। प्रधानमंत्री इससे पहले बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारे भी दे चुके हैं। उत्तरप्रदेश चुनाव के वक्त उन्होंने मातृशक्ति महाकुंभ का आयोजन भी प्रयागराज में किया था। इन सबके बावजूद महिलाओं के साथ छेड़खानी, अपराध या हिंसा में कोई कमी आयी हो, ऐसे आंकड़े नहीं आए हैं। कांग्रेस समेत कई दलों ने तो प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में नारीशक्ति की बात सुनकर उनकी पिछली कई बातों का लेखा-जोखा सोशल मीडिया पर फिर से याद दिला दिया। अभी पिछली बातों का राजनैतिक हिसाब-किताब चल ही रहा था कि इस बीच खबर आई कि गोधरा कांड के बाद बिलकिस बानो से सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या करने वाले 11 अभियुक्तों को गुजरात सरकार की माफी नीति के तहत 15 अगस्त के दिन रिहा कर दिया गया है। इन 11 लोगों की रिहाई के बाद उन्हें तिलक लगाकर, मिठाई खिलाने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर चल रही हैं, जिन्हें देखकर रुह कांप जाती है। क्या एक समाज के तौर पर हमारा इतना नैतिक पतन हो चुका है कि अब बलात्कारियों और हत्यारों का जेल के बाहर स्वागत होने लगेगा। 2008 में मुंबई में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने इन 11 लोगों को उम्र कैद सुनाई थी। जिस पर बॉम्बे हाईकोर्ट की मुहर भी लगी थी। ये सभी अभियुक्त 15 साल की सजा काट चुके हैं, इस आधार पर इनमें से एक ने सजा में छूट की अपील की थी। गौरतलब है कि उम्रकैद की सजा पाए कैदी को कम से कम चौदह साल जेल में बिताने ही होते हैं। इसके बाद कैदी की फाइल की समीक्षा की जाती है। उम्र, अपराध की प्रकृति, जेल में व्यवहार वगैरह के आधार पर सजा घटाई जा सकती है। अगर सरकार को ऐसा लगता है कि कैदी ने अपने अपराध के मुताबिक सजा पा ली है, तो उसे रिहा भी किया जा सकता है। बिलकिस बानो के परिवार, शरीर और आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाले इन 11 लोगों की माफी की मांग पर बाकायदा कमेटी बनाकर, विचार-विमर्श कर रिहाई का फैसला लिया गया। कानूनन इसमें कमियां नहीं निकाली जा सकतीं। लेकिन क्या कानून के फैसले नैतिकता से परे लिए जाने लगे हैं, इस पर तो समाज में मंथन हो ही सकता है। बिलकिस बानो ने अपने साथ हुए गंभीर अपराध और अत्याचार के बावजूद दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। छलनी शरीर और मन के साथ उन्होंने इंसाफ की लौ अपने मन में जलाए रखी। लंबे संघर्ष के बाद पहले बिलकिस बानो के दोषियों को सजा हुई और फिर अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को बिलकीस बानो को 50 लाख रुपये का मुआवजा, सरकारी नौकरी और आवास देने का आदेश दिया था, उस समय बिलकीस ने कहा था, सुप्रीम कोर्ट ने मेरे दर्द, मेरी पीड़ा और 2002 की हिंसा में गंवाए गए मेरे संवैधानिक अधिकारों को वापस पाने के संघर्ष को समझा। किसी भी नागरिक को सरकार के हाथों पीड़ा नहीं झेलनी चाहिए, जिसका कर्तव्य हमारी रक्षा करना है। अब अपने दोषियों के माथे पर तिलक लगा देखकर बिलकिस फिर खुद को हारा हुआ महसूस कर रही होंगी। लेकिन ये अकेले उनकी हार नहीं है। ये एक सभ्य समाज के तौर पर हम सब के पतन की पराकाष्ठा है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। दूरदर्शिता का तकाजा यह है कि हम अपने स्वरूप और जीवन के प्रयोजन को समझें। शरीर और मन रूपी उपकरणों का उपयोग जानें और उन प्रयोजनों में तत्पर रहें, जिनके लिए प्राणिजगत का यह सर्वश्रेष्ठ शरीर, सुरदुर्लभ मानव जीवन उपलब्ध हुआ है। आत्मा वस्तुतः परमात्मा का पवित्र अंश है । उसकी मूल प्रवृत्तियां वही हैं, जो ईश्वर की। परमात्मा परम पवित्र है, श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण है। उसका समस्त क्रियाकलाप लोकमंगल के लिए है। वह लेने की आकांक्षा से दूर, प्रेम की, उदात्त भावना से परिपूर्ण है। आत्मा को इसी स्तर का होना चाहिए और उसके क्रियाकलापों में उसी प्रकार की गतिविधियों का समावेश होना चाहिए। परमेश्वर ने अपनी सृष्टि को सुंदर, सुसज्जित, सुगंधित और समुन्नत बनाने में सहयोगी की तरह योगदान करने के लिए मानव प्राणी को अपने प्रतिनिधि के रूप में सृजा है। उसका चिंतन और कर्तव्य इसी दिशा में नियोजित रहना चाहिए। यही है आत्मबोध, यही है आत्मिक जीवनक्रम। इसी को अपनाकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं। यह सर्वथा अवांछनीय है कि हम अपने को शरीर मान बैठें और इन्हीं की सुख-सुविधाओं और मर्जी जुटाने के लिए अनुचित मार्ग तक अपनाने में न हिचकें। (साभार : अखण्ड ज्योति मई १९७२पृष्ठ २१, पं.श्रीराम शर्मा आचार्य)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (त्रिपुरारी पाण्डेय)। महेंद्रपुर गांव में भोला नाम का एक किसान रहता था। उसकी दो बेटियां थीं जिया और खुशी। उसकी दोनों बेटियां बहुत ही सुंदर, सुशील, आज्ञाकारी और मेहनती थी। भोला अपनी बेटियों को गांव के ही स्कूलों में शिक्षा ग्रहण हेतु भेजता था। जिया और खुशी अपनी पढ़ाई के साथ-साथ खेती के कामों में भी अपने पिताजी को सहयोग करती थी। भोला को बेटा न होने की कमी ये दोनों बेटियां खलने नहीं देती थी। भोला भी अपनी दोनों बेटी जिया और खुशी को बहुत प्यार करता था। जब भी गांव के लोग भोला को बेटा न होने का ताना देते थे, तब वह कहता- मेरी दोनों बेटियां बेटों से कम नहीं है। जिया और खुशी अपने बापू के साथ खेत की मिट्टी काटती और हल भी चलाती थी। दोनों बेटियों के साथ भोला को खेत पर काम करते देख लोग ताने भी मारते थे। मगर... इन सब बातों से इतर भोला एक मेहनती किसान की तरह अपने खेती कार्यों में लगा रहता था। जिया और खुशी काफी लगनशील लड़की थी। दोनों समय पर स्कूल जाती और पढ़ाई में लगी रहती थी। भोला की पत्नी पार्वती भी अपनी दोनों बेटियों को खूब दुलार-प्यार करती थी। समय बीतता गया। जिया और खुशी बड़ी हो गयी। साथ ही दोनों ऊंचे वर्गों में पहुंच गयी। उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालय उसके गांव से दूर था। अब दोनों गांव से दूर कॉलेज जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करने लगी। गांव की औरतें भोला की पत्नी को कोसती और कहती, सुनो...। तुम्हारी बेटियां अब शयानी हो गयी हैं। ये पढ़ाई वगैरह छोड़ो और अच्छा सा लड़का देखकर दोनों का ब्याह करा दो। गांव से दूर शहर जाकर पढ़कर आना ठीक बात नहीं? जिया और खुशी की मां बस चुपचाप सब बातें सुनती और कहती। मेरी बेटियां अफसर बनेंगी। गांव की औरतें ये बातें सुनते ही मुंह बनाकर चली जाती थी। गांव के पुरुष साथी भी भोला को कहते- अरे भोलवा...। गांव की कोई लड़की गांव से बाहर नहीं है और एक तुम हो, जो अपनी बेटियों को शहर भेजते हो पढ़ने के लिए? कहीं तुम्हारी बेटियां गांव की सभी बेटियों को बिगाड़ न दें? भोला चुपचाप सुनता और धीरे से कहता था, मेरी बेटी जिया और खुशी एक दिन मेरा नाम रोशन करेगी। भोला के साथी भोला की बातें सुनकर ठहाके लगाकर हंसते थे और कहते थे... ये सपना छोड़ और अपने जैसा खेतीबाड़ी करने वाला कोई लड़का देखकर दोनों की शादी कराकर दोनों को घर से विदा कर दो। शयानी लड़की को घर में कुंवारी रखना अच्छी बात नहीं है? अब तुम ही बताओ भोलवा तुम्हारी बेटियों की उम्र की कोई लड़की इस गांव में कुंवारी है? भोला ये सब सुनकर मुस्कुराकर अपने खेत की और चल देता है। इधर, जिया और खशी दिन-रात मेहनत कर पढ़ाई कर रही थी। देखते-देखते जिया और खुशी स्नातक प्रतिष्ठा की परीक्षा बहुत अच्छे अंकों के साथ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण भी हो गयी। जिया और खुशी के माता-पिता अपनी बेटियों की सफलता पर काफी खुश थे। दूसरी ओर, गांव के लोग अपने मन की भड़ास और जलन जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। भोला की दोनों बेटियां प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने लगी। एक दिन दोनों बेटियों की मेहनत रंग लायी। दोनों बेटियों के परीक्षा परिणाम जैसे ही सामने आये, तो पूरा घर हर्षोल्लास से झूम उठा। क्योंकि भोला की बेटियां राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफलता प्राप्त कर दोनों अफसर बन चुकी थी। भोला की पत्नी पार्वती अपने आंचल से अपने खुशी की आंसू पोछते हुए बोली... तुम दोनों हम सब का मान बढ़ाया है। मेरी बेटियां अब अफसर बन गयी है। गांव के वे लोग बस मुंह लटकाये खड़े थे, जो बेटियों की शिक्षा के विरोधी थे। जिया और खुशी अब तो पूरे गांव की आंखों का तारा बन चुकी थीं। वे दोनों जिधर से गुजरती लोग कहते... वह देखो, हमारी अफसर बिटिया। इन दोनों बेटियों की सफलता ने पूरे गांव का दृश्य ही बदलकर रख दिया। उस गांव में बेटा और बेटी के बीच में जो असमानताएं मौजूद थी वो बिलकुल अब समाप्त हो चुकी थी। लोग अब अपनी बेटियों को घर से दूर शिक्षा प्राप्ति हेतु भेजने लगे। गांव के लोग शिक्षा के प्रति अब बहुत जागरूक हो चुके थे, जिसका परिणाम यह हुआ कि अब महेंद्रपुर गांव सबसे शिक्षित गांव हो गया। भोला की दोनों बेटियां पूरे गांव के लिए आदर्श थी। जब भी ये दोनों बिटिया अपनी नौकरी की छुट्टियों पर घर आती थी, तो गांव के लोग बड़े ही उमंग के साथ कहते थे, लो आ गयी हमारी अफसर बिटिया...। (लेखक मलयपुर, जमुई बिहार के निवासी हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनोद बंसल)। हिन्दू समाज की एकता व अखंडता को तार-तार कर उसे जातिवादी, क्षेत्रवादी, भाषावादी व मत-पंथ-संप्रदाय वादी विभेदों में बांट कर ही मुगलों ने और फिर अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया। विपत्ति चाहे अनगिनत आईं किन्तु, यहां के बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ना तो ज्ञान की ना वीरता व पौरुष की, ना धैर्य की और ना धर्म की कभी न्यूनता हुई। हां कभी आक्रमण सहे तो कभी उसके विरुद्ध क्षमता से भी अधिक भी प्रतिकार व वीरता का परिचय दिया। किन्तु हमारा विविध प्रकार का विखराव ही हमारा अभिशाप बना। 29 अगस्त 1964 को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर पवई, मुम्बई स्थित पूज्य स्वामी चिनमयानन्द जी के आश्रम सांदीपनि साधनालय में बुलाई गई एक बैठक में पूज्य स्वामी चिनमयानन्द, राष्ट्रसंत तुकडो जी महाराज, सिख सम्प्रदाय से माननीय मास्टर तारा सिंह, जैन सम्प्रदाय से पूज्य सुशील मुनि, गीता प्रेस गोरखपुर से हनुमान प्रसाद पोद्दार, केएम मुंशी तथा पूज्य श्री गुरुजी सहित 40-45 अन्य महानुभाव भी उपस्थित थे। इसी दिन इन महापुरुषों ने विश्व हिंदू परिषद के गठन की घोषणा कर दी। इसी बैठक में हिन्दू समाज को संगठित और जागृत करने, उसके स्वत्वों, मानबिन्दुओं तथा जीवन मूल्यों की रक्षा व संवर्धन करने तथा विदेशस्थ हिंदुओं से संपर्क स्थापित कर उन्हें सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ बनाने व उनकी सहायता करने सम्बन्धी विश्व हिंदू परिषद के तीन मुख्य उद्देश्य भी तय कर दिए गए। हिन्दू की परिभाषा करते हुए कहा गया कि जो व्यक्ति भारत में विकसित हुए जीवन मूल्यों में आस्था रखता है या जो व्यक्ति स्वयं को हिन्दू कहता है वह हिन्दू है। 22 से 24 जनवरी 1966 को कुम्भ के अवसर पर 12 देशों के 25 हज़ार प्रतिनिधियों की सहभागिता के साथ प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन प्रयाग में आयोजित किया गया। 300 प्रमुख संतों की सहभागिता के साथ पहली बार भारत के प्रमुख शंकराचार्य भी एक साथ आए और धर्मांतरण पर रोक तथा परावर्तन (घर-वापसी) का संकल्प लिया गया। मैसूर के महाराज चामराज वाडियार को अध्यक्ष व दादासाहब आप्टे को पहले महामंत्री के रूप में घोषित कर विहिप की प्रबंध समिति की घोषणा भी हुई। इस सम्मेलन में जहां परावर्तन को मान्यता देने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ वहीँ विहिप के बोध वाक्य धर्मो रक्षति रक्षितः और बोध चिह्न अक्षय वटवृक्ष भी तय हुआ। हिन्दू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता समाज के सामने एक बड़ी चुनौती थी। इस चुनौती को स्वीकारते हुए एक समरस समाज के पुन: निर्णय हेतु विहिप ने अपनी व्यापक कार्ययोजना बनाई। इस दुर्गम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु संगठन ने अपने 58 वर्षों की तपश्चर्या में अनेक कार्य किए जो तत्कालीन परिस्थियों में बेहद दुरूह कहे जा सकते थे किन्तु उनकी सफलता ने आज हिन्दू समाज की दशा व दिशा दोनों को बदलने में अभूतपूर्व योगदान किया है। गत लगभग छ: दशकों में समाज के सहयोग से किए गए इन प्रयासों में से कुछ निम्न लिखित हैं : 13-14 दिसम्बर 1969 के उडुपी धर्म संसद में संघ के तत्कालीन सर-संघचालक श्री गुरूजी के विशेष प्रयासों के परिणाम स्वरूप, भारत के प्रमुख संतों ने एकस्वर से हिन्दव: सोदरा सर्वे, ना हिन्दू पतितो भवेत के उद्घोष के साथ सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया।1994 में काशी में हुई धर्म संसद का निमंत्रण डोम राजा को देने पूज्य संत ना सिर्फ स्वयं चलकर गए बल्कि उनके घर का प्रसाद ग्रहण किया तथा अगले दिन डोम राजा धर्म संसद के अधिवेशन में संतों के मध्य बैठे और संतों ने उन्हें पुष्प हार पहनाकर स्वागत किया। इस धर्म संसद में 3500 संत उपस्थित थे। वनवासी, जनजाति, अति पिछड़ी व पिछड़ी जाति के हज़ारों लोगों को ग्राम पुजारी के रूप में प्रशिक्षण देकर उनका समय समय पर अभिनन्दन व मंदिरों में पुरोहित के रूप में नियुक्ति विहिप के ग्राम पुजारी प्रशिक्षण अभियान के कारण ही संभव हुई। 9 नवम्बर 1989 में श्रीराम जन्मभूमि का शिलान्यास एक अनुसूचित जाति के कार्यकर्ता कामेश्वर चौपाल द्वारा कराए जाने के अतिरिक्त, देश भर में आयोजित समरसता यज्ञ, समरसता यात्राएं, समरसता गोष्ठियां, हिन्दू परिवार मित्र योजना, अनुसूचित जाति व जन जातियों के लिए छात्रावास इत्यादि अनेक योजनाओं व कार्यक्रमों के माध्यम से हिन्दू समाज के बीच व्याप्त छूआछूत के अभिशाप से मुक्ति हेतु अभूतपूर्व कार्य किए हैं। सन् 2003 से लगातार देशभर में भगवान वाल्मीकि, संत रविदास तथा संविधान निर्माता डॉ भीमराव अम्बेडकर इत्यादि महापुरुषों, जिन्होंने देश की समरसता में योगदान दिया, की जयन्तियां व्यापक रूप से मनाई जा रही हैं। इन सब कार्यक्रमों के परिणाम स्वरूप अब संत समाज सहज रूप से वंचित बस्तियों में प्रवास, प्रवचन व सह भोज सहजता से करते हैं। देश के वनवासी, गिरिवासी व नगरवासियों के कुम्भ के रूप में असम के जोरहाट में 27 से 29 मार्च 1970 में देश की सभी प्रमुख तीर्थों व 45 नदियों के जल से एकात्म हुए इस सम्मेलन में अनेक पूज्य संत-महात्माओं व पूर्वोत्तर के विचारकों के साथ नागारानी गाइडिन्ल्यु ने यह घोषणा की कि प्रकृति पूजक वनवासी समाज जिसे ईसाई मिशनरियां अपने चंगुल में फंसा रही हैं, हिन्दू समाज का ही अभिन्न अंग है। 1982 में श्री अशोक सिंघल विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी बने। व्यापक जन जागरण के कार्यक्रम होने लगे। हिन्दू समाज को एकाकार करने वाली 1983 में हुई एकात्मता यात्रा में तो देश के 6 करोड़ लोगों ने सहभाग किया। अप्रैल 1984 में धर्म संसद का प्रथम अधिवेशन नई दिल्ली में संपन्न हुआ। इसमें विविध मत-पंथ-संप्रदायों के प्रतिनिधि व पूज्य वरिष्ठ संतों की सहभागिता रही। समग्र ग्राम विकास अभियान जिसे एकल अभियान के रूप में भी जानते हैं के अंतर्गत एक पंचमुखी परियोजना से अब तक 55 लाख से अधिक बच्चे लाभान्वित हो चुके हैं तथा लगभग 30 लाख विद्यार्थी अभी भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उन्हें एक साथ दी जा रही प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, ग्राम विकास (गौ-पालन, जैविक कृषि, कौशल विकास), संस्कार (हरिकथा व सत्संग) व जागरण शिक्षा (ग्रामीण विकास योजनाओं की जानकारी व उनका उपयोग) के माध्यम से देश के सुदूर क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन देखने को मिले हैं। इसमें आने वाले अधिकांश विद्यार्थी वंचित समाज से ही आते हैं। 26 फरवरी 2019 को भारत के राष्ट्रपति माननीय रामनाथ कोविंद एवं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस एकल अभियान को "गांधी शांति पुरस्कार-2017" द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्मानित कर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। देश के मठ-मंदिरों में पुरोहित प्रशिक्षित हों तथा ऊनमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी हो। इस संबंध में विहिप के प्रयास अनुकरणीय हैं। देश भर में अब तक हजारों अर्चक-पुरोहित या पुजारियों को धार्मिक कर्मकांडों की शिक्षा-दीक्षा देकर विभिन्न मठ-मंदिरों में भगवान की सेवार्थ लगाया गया है। 50 हजार प्रशिक्षणार्थियों में से लगभग 60% अनुसूचित जाति के तथा 15% अनुसूचित जनजाति के बंधु भगिनियां हैं जो, आज भी अनेक छोटे-बड़े मंदिरों के माध्यम से समाज में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ब्राह्मण समाज के लोग ना सिर्फ इन सभी को पांडित्य में दक्ष करते हैं अपितु, बाद में भी उनकी हर प्रकार की मदद करते हैं। एक गांव, एक मंदिर, एक कुआ व एक शमसान का नारा भी विहिप ने ही दिया था। विद्वान व समाज चिंतक कहते हैं कि हर मंदिर की समिति में कम से कम एक संस्कृत का विद्वान हो, तो वहीं, एक प्रतिनिधि वंचित समाज से भी हो। विश्व हिंदू परिषद द्वारा समाज के सहयोग से देश भर में 90 हजार से अधिक अन्य सेवा प्रकल्प भी चलाए जा रहे हैं। इनमें से लगभग 70 हजार संस्कार केंद्र, दो हजार से अधिक शिक्षा केंद्र, 1800 स्वास्थ्य केन्द्र, 1500 स्वावलंबन केंद्र तथा शेष लगभग 15 हजार केन्द्रों में आवासी छात्रावास, अनाथालय, चिकित्सा केंद्र, कम्प्यूटर, सिलाई, कढ़ाई प्रशिक्षण केंद्र, विवाह केंद्र, महा-विद्यालय, कॉलेज इत्यादि प्रमुख हैं। ये सभी केंद्र सामाजिक समरसता के अनुपम उदाहरण हैं। सामाजिक चेतना के जागरण का ही परिणाम है कि विहिप ने अभी तक लगभग 63 लाख हिन्दुओं के धर्मांतरण को रोकने के साथ-साथ लगभग 9 लाख की घर-वापसी भी हुई है। अनुसूचित जाति, जनजाति, वनवासी व गिरिवासी समाज के बीच सेवा, समर्पण व स्वावलंबन के मंत्र के साथ देश दर्जन भर राज्यों में छल-बल पूर्वक धर्मान्तरण के विरुद्ध कठोर दंड की व्यवस्था वाले कानून विहिप के सतत प्रयासों के कारण ही बन पाए हैं। भारत धर्म यात्राओं का देश है जिसकी आत्मा तीर्थों में वास करती है। इन यात्राओं के माध्यम से ही देश, धर्म व समाज की एकता, अखण्डता और समरसता प्रतिबिम्बित होती है। बात चाहे कांवड़ यात्रा की हो या कैलाश मान सरोवर की, अमर नाथ यात्रा हो या गोवर्धन परिक्रमा, जगन्नाथ की नव कलेवर यात्रा हो या सिन्धु यात्रा, श्रीराम जानकी विवाह बारात यात्रा हो या बाबा अमरनाथ की यात्रा, इन सभी को सस्ती, सफल, सुखद, संस्कारित व आध्यात्मिक स्वरूप देने में विश्व हिन्दू परिषद् के धर्मं यात्रा महासंघ ने वर्ष 1995 से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शासन-प्रशासन व सम्बन्धित सरकारों के साथ अनवरत संपर्क के माध्यम से इन्हें व्यवस्थित भी किया गया और समरस भी बनाया गया। 1984 में प्रारम्भ हुए श्री राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन ने देश के 3 लाख गांवों के 16 करोड़ लोगों को जोड़ा। सड़क से संसद व सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी आवाज बुलंद कर 492 वर्षों के संघर्ष के उपरांत, देश के स्वाभिमान की पुन: प्रतिष्ठा करते हुए, 5 अगस्त 2020 के अयोध्या में भूमि पूजन के ऐतिहासिक दिवस को स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा दिया। अगले वर्ष तक रामलला अपने भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित हो जाएंगे। इस आंदोलन ने विश्व भर के हिंदुओं को एक कर समरसता का एक नया बीजमंत्र दिया। 1995 में जब आतंकियों ने बाबा अमरनाथ की यात्रा बंद करने की धमकी देते हुए यह कहा कि यदि कोई आएगा तो वापस नहीं जाएगा। बजरंग दल के आह्वान पर 51 हजार बजरंगी व एक लाख अन्य शिव भक्तों ने जय भोले की हुंकार भरते हुए उस दुर्गम यात्रा की ओर जब कूच किया तो उस यात्रा को रोकने का कोई आज तक दुस्साहस नहीं कर पाया। पूंछ जिले के सीमांत क्षेत्र को हिन्दू विहीन करने के जिहादी षड्यंत्र को भांपते हुए बजरंग दल ने 2005 में बाबा बूढ़ा अमरनाथ की यात्रा को जब पुन: प्रारम्भ कराया तो वहां से हिन्दुओं का पलायन भी रुका और समाज व सुरक्षा कर्मियों का आत्मविश्वास भी बढ़ा। हरियाणा के मेवात में गत वर्ष पुन: प्रारंभ हुई बृजमण्डल (मेवात) जलाभिषेक यात्रा भी समरस भारत की दिशा में एक अनुपम प्रयास है। विहिप की युवा शाखा बजरंग दल तथा दुर्गा वाहिनी ने 1984 से लेकर आज तक देश-धर्म संस्कृति व राष्ट्र-रक्षा व समरस समाज के निर्माण हेतु अग्रणी भूमिका निभाई है। सेवा, सुरक्षा व संस्कार इनके मूल मंत्र रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा समरस समाज की दिशा में किए गए इन विभिन्न कार्यों के कारण हिन्दू दर्शन आज सम्पूर्ण विश्व के केंद्र में आ चुका है। अब विश्व को लगने लगा है कि हिन्दू दर्शन ही अब विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा। (लेखक विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)
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