एबीएन एडिटोरिलय डेस्क (अजयदीप बाधवा)। जीएसटी कंपनसेशन सेस क्या है जब भारत में सरकार ने वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लाने की बात आरंभ की थी तो कुछ राज्यों और राजनीतिज्ञों द्वारा उसका विरोध किया गया। कुछ राज्यों के विरोध के पीछे उनका अपनी आमदनी कम होने का भय था। ऐसा भारत के विकसित राज्य, जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात आदि ज्यादा सोच रहे थे। इस सोच के पीछे कारण भी गलत न था। वस्तुत: भारत में दो प्रकार के राज्य थे, (या आज भी हैं)। एक वो जिनके यहां बहुत उद्योग धंधे थे और हैं वा विकसित हैं, और दूसरे ओर वैसे राज्य, जहां औद्योगिक विकास काफी कम था, पर जनसंख्या बहुत ज्यादा थी, जैसे बिहार, उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि। पहले प्रकार के राज्यों को भय था कि जीएसटी आने के बाद ना सिर्फ विक्रय कर (सेल्स टैक्स / वैट) और एक्साइज ड्यूटी बंद हो जाएगी जो उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा थी, साथ ही जीएसटी की कमाई भी कम होगी क्योंकि जीएसटी एक डेस्टिनेशन आधारित कर प्रणाली है जिसका इसका मतलब था उत्पादों को बनाने वाले राज्यों के स्थान पर उन राज्यों को अधिक जीएसटी आय मिलेगी जहां ये उत्पाद बिकेंगे।
उनका मानना था कि वैसे राज्य जो स्वयं ज्यादा उत्पादन नहीं करते, बल्कि दूसरे राज्यों के उत्पादों का उपभोग करते है, की आमदनी बढ़ जायेगी क्योंकि उनकी जनसंख्या ज्यादा है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह माना जा रहा था जो राज्य मेहनत कर औद्योगिक विकास बढ़ा रहे है उनकी आमदनी घट जायेगी और निकम्मे राज्यों की बढ़ जायेगी। चूंकि यह बात कुछ हद तक सही भी थी तो भारत सरकार ने इसके लिए जीएसटी कंपनसेशन (क्षतिपूर्ति) सेस का रास्ता निकाला। भारत सरकार ने यह निर्णय लिया कि वह कुछ वैसे उत्पादों और सेवाओं पर सामान्य जीएसटी के अलावा जीएसटी सेस लगाएगी जिनका प्रयोग आम व्यक्ति नहीं करता है और उस से होने वाली आमदनी से वैसे राज्यों को भरपाई करेगी जिनकी आमदनी जीएसटी आने के बाद कम हो जाएगी।
जीएसटी आने के बाद भारत सरकार ने ऐसा ही किया और कई उत्पादों पर जीएसटी कंपनसेशन सेस भी लगा दिया और उस से होने वाली आमदनी राज्यों के बीच उनको होने वाली हानि के हिसाब से वितरित करनी आरंभ कर दी। आरंभ में यह सेस 1 जुलाई 2017 से पांच वर्ष के लिया लगाया गया था पर इस वर्ष 1 जुलाई 2022 से इसे और आगे पांच साल के लिए बढ़ा दिया गया है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (योगेश कुमार गोयल)। देश में क्रिप्टो करंसी की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) सुरक्षित और आसान डिजिटल करंसी लाने की योजना पर काफी समय से कार्य कर रहा था और अब 01 दिसंबर से आम लोगों के लिए ई-रुपये का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा चुका है। इससे पहले आरबीआई ने 01 नवंबर से डिजिटल करंसी ई-रुपये की शुरूआत सरकारी प्रतिभूतियों के थोक कारोबार के लिए की थी। फिलहाल खुदरा ई-रुपये के परीक्षण में चार बैंकों (आईसीआईसीआई बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, आईडीएफसी बैंक तथा यस बैंक) और चार शहरों (दिल्ली, मुम्बई, बेंगलुरू, भुवनेश्वर) को शामिल किया गया है। पहले ही दिन डिजिटल रुपये से करीब पौने दो करोड़ रुपये मूल्य का लेनदेन हुआ।
दरअसल इन चार बैंकों की ओर से कुल 1.71 करोड़ रुपये डिजिटल मुद्रा की मांग की गई थी। मांग के मुताबिक आरबीआई ने इनको डिजिटल रुपया जारी किया। आरबीआई के मुताबिक आने वाले दिनों में बैंकों की बढ़ती जरूरत के हिसाब से जारी की जाने वाली रकम में भी वृद्धि देखने को मिलेगी। आरबीआई से जारी किया गया डिजिटल रुपया भारत की पहली वर्चुअल करंसी है। इसे सेंट्रल बैंक डिजिटल करंसी (सीबीडीसी) रेग्युलेट करेगा। डिजिटल करंसी डिजिटल फॉर्मेट में है और यह हार्ड कैश की जगह लेगी। डिजिटल करंसी सीबीडीसी के तहत काम करती है और सीबीडीसी को भारत सरकार की मान्यता प्राप्त है।
सीबीडीसी को बराबर मूल्य पर कैश में एक्सचेंज किया जा सकेगा। डिजिटल करंसी को जलाया या डैमेज नहीं किया जा सकता। इसलिए एक बार जारी किए जाने के बाद यह हमेशा रहेगी जबकि करंसी नोट कुछ सालों में खराब हो जाते हैं। डिजिटल करंसी के इस्तेमाल से लोगों को अपनी नकदी की सुरक्षा की चिंता से मुक्ति मिलेगी और जिन लोगों का बैंक में खाता नहीं हैं, वे भी इसके जरिये बैंकिंग प्रणाली में शामिल हो सकेंगे। अभी हमारी जेब में जो करंसी नोट या सिक्के रहते हैं, डिजिटल करंसी में वही डिजिटल रूप में हमारे मोबाइल फोन या वॉलेट में रहेंगे और हमें लेनदेन के लिए बैंक की जरूरत नहीं पड़ेगी। हम फिलहाल जिस प्रकार नकद में पैसों का लेनदेन करते हैं बिल्कुल उसी प्रकार डिजिटल रुपये से भी कर पाएंगे।
यह भी जान लें कि ई-रुपया किस तरह काम करेगा। ई-रुपया पूरी तरह से कैशलैस और कांटैक्टलैस भुगतान प्रणाली है। इसका इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है। ई-रुपया वास्तव में टोकन आधारित होगा, जो एक ई-मेल जैसा हो सकता है और पैसे भेजने के लिए पासवर्ड डालना होगा, जो बिना इंटरनेट के कार्य करेगा। ई-रुपये से मोबाइल फोन के जरिये चंद सेकेंडों में ही लेनदेन संभव होगा और इस लेनदेन को इलेक्ट्रॉनिक रूप से देखा भी जा सकेगा। इसकी सबसे खास बात यही है कि इसके माध्यम से लेनदेन डिजिटल भुगतान प्रणाली की तुलना में ज्यादा रीयल टाइम और कम लागत में होगा और इसमें बैंकों की तरह निपटान की जरूरत भी नहीं होगी। सीबीडीसी में नकद देते ही इंटरबैंक सैटलमेंट की जरूरत नहीं रह जाएगी, जिससे लेनदेन कम लागत में होगा।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ई-रुपये से देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और ज्यादा मजबूत होगी और इससे देश की भुगतान प्रणाली को पारदर्शी बनाने में भी मदद मिलेगी। देश में डिजिटल करंसी का प्रचलन बढ़ने पर रुपये छापने की लागत बहुत कम हो जाएगी और इससे धन भेजना भी सस्ता होगा। वास्तव में यह क्रिप्टो करंसी से बिल्कुल अलग है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आरबीआई द्वारा जारी की गई डिजिटल करंसी अन्य वर्चुअल करंसी से अलग कैसे है? डिजिटल करंसी को लेकर आरबीआई स्पष्ट कर चुका है कि यह एक डिजिटल या आभासी मुद्रा है लेकिन इसकी तुलना उन निजी आभासी मुद्राओं अथवा क्रिप्टो करंसी से नहीं की जा सकती, जिनका चलन हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है। दरअसल बिट कॉइन या अन्य क्रिप्टो करंसी डीसेंट्रलाइज्ड होती है, जिन पर किसी भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होता जबकि आरबीआई द्वारा जारी की गई डिजिटल करंसी सेंट्रलाइज्ड है। इसे भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है और इसे आरबीआई ही जारी करेगा। इसलिए यह पूरी तरह सुरक्षित है। इसे आसानी से एक मोबाइल से दूसरे पर भेजा जा सकेगा और इससे हर प्रकार का सामान खरीदा जा सकेगा तथा प्रत्येक सेवाओं के लिए इसका उपयोग किया जा सकेगा।
सामान्य शब्दों में कहा जाए तो डिजिटल करंसी का इस्तेमाल हम अपने सामान्य रुपये-पैसे के रूप में कर सकेंगे लेकिन ये रुपये-पैसे डिजिटल फॉर्म में होंगे। यही कारण है कि डिजिटल करंसी में निवेश करना दुनियाभर में प्रचलित अन्य वर्चु्अल करंसी के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित माना जा रहा है। डिजिटल करंसी में ब्लॉक चेन टैक्नोलॉजी तथा अन्य तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। ब्लॉक चेन को डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टैक्नोलॉजी (डीएलटी) के रूप में भी जाना जाता है और इस टैक्नोलॉजी को क्रिप्टो करंसी का बैकबोन भी कहा जाता है। डिजिटल करंसी से भारत की अर्थव्यवस्था को काफी बढ़ावा मिलने और डिजिटल वित्तीय क्षेत्र में स्थिति मजबूत होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल करंसी देश में डिजिटल इकोनॉमी को नया आयाम प्रदान करेगी। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ फिलहाल डिजिटल करंसी को लेकर कुछ सवाल भी उठा रहे हैं। मसलन, बैंकों में जमा पूंजी को देश की अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण रीढ़ माना जाता है, ऐसे में यदि डिजिटल करंसी को बैंक खातों से ज्यादा सुरक्षित माना गया तो कहीं इससे बैंकिंग व्यवस्था पर असर न पड़े। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा यूपीआई के जरिये लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, उस पर भी डिजिटल करंसी से बड़ा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सीबीडीसी के चलन से बैंक में जमा के लिए लेनदेन की मांग कम हो जाएगी, जिससे उनकी जमा कम होगी।
इसके अलावा यदि बैंक जमा राशि खो देते हैं तो क्रेडिट बनाने की उनकी क्षमता सीमित हो जाएगी क्योंकि केन्द्रीय बैंक निजी क्षेत्र को लोन प्रदान नहीं कर सकते। एक बड़ी चिंता यह भी है कि एक ओर जहां भारत डिजिटलीकरण तथा डिजिटल लेनदेन के मामले में दुनिया में एक प्रमुख देश के रूप में उभरा है, वहीं देश में वित्तीय साक्षरता की स्थिति संतोषजनक नहीं है। डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिलने के साथ ही हाल के वर्षों में आॅनलाइन धोखाधड़ी के मामले तेजी से बढ़े हैं। चिंताओं को दूर करने के लिए कारगर कदम उठाते हुए देश में वित्तीय साक्षरता के लिए भी पुरजोर तरीके से अभियान चलाना चाहिए। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ आजकल जिस तरह के आंदोलन जगह-जगह हो रहे हैं, वे 1989 में थ्यानमेन चौराहे पर हुए भयंकर नरसंहार की याद ताजा कर रहे हैं। पिछले 33 साल में इतने जबरदस्त प्रदर्शन चीन में दुबारा नहीं हुए। ये प्रदर्शन तब हो रहे हैं जबकि यह माना जा रहा है कि माओत्से तुंग के बाद शी सबसे अधिक लोकप्रिय और शक्तिशाली नेता हैं। अभी-अभी उन्होंने अपने आपको तीसरी बार राष्ट्रपति घोषित करवा लिया है लेकिन चीन के लगभग 10 शहरों के विश्वविद्यालयों और सड़कों पर उनके खिलाफ नारे लग रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? सारे अखबार और टीवी चैनल मानकर चल रहे हैं कि ये प्रदर्शन कोरोना महामारी के दौरान जारी प्रतिबंधों के खिलाफ हो रहे हैं।
मोटे तौर पर यह बात सही है। चीन में कोरोना की शुरूआत हुई और वह सारी दुनिया में फैल गया लेकिन दुनिया से तो वह विदा हो लिया किंतु चीन में उसका प्रकोप अभी तक जारी है। ताजा सूचना के मुताबिक 40 हजार लोग अभी भी उस महामारी से पीड़ित पाये गये हैं। चीनी सरकार ने इस महामारी का मुकाबला करने के लिए दफ्तरों, बाजारों, कारखानों, स्कूल-कालेजों और लगभग हर जगह कड़े प्रतिबंध थोप रखे हैं। उनकी वजह से बेरोजगारी बढ़ी है, उत्पादन घटा है और मानसिक बीमारियां फैल रही हैं। इसीलिए लोग उन प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहे हैं। उन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन वे अब इससे भी ज्यादा आगे बढ़ गए हैं।
वे नारे लगा रहे हैं कि शी जिनपिंग तुम गद्दी छोड़ो। इसका कारण क्या है? वह कारण महामारी से भी अधिक गहरा है। वह है- चीनी लोगों का तानाशाही से तंग होना। वे अब लोकतंत्र की मांग कर रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए यह संदेश घर-घर पहुंच रहा है। इस मांग का सबसे ज्यादा असर शिनच्यांग (सिंक्यांग) प्रांत में देखने को मिल रहा है। उसकी राजधानी उरूमची में 10 लोगों की जान जा चुकी है। शिनच्यांग में उइगर मुसलमान रहते हैं। उनकी जिंदगी चीन के हान मालिकों के सामने गुलामों की तरह गुजरती है। इस प्रांत में लगभग 30 साल पहले मैं काफी लोगों से मिल चुका हूं। वहां हान जाति के चीनियों के विरुद्ध लंबे समय से आंदोलन चल रहा है।
उइगर मुसलमानों के इस बगावती तेवर को काबू करने के लिए लगभग 10 लाख मुसलमानों को सरकार ने यातना शिविरों में डाल रखा है। गैर हान तो चीन की सरकार के विरुद्ध हैं ही, अब हान चीनी भी खुलेआम तानाशाही के खात्मे की मांग कर रहे हैं। लेकिन चीन की सरकार का कहना है कि यदि वह तालाबंदी खोल देगी तो 80 साल से ज्यादा उम्र के लगभग 50 करोड़ लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ जाएगी। यदि महामारी ने विकराल रूप धारण कर लिया तो लाखों लोग मौत के घाट उतर जाएंगे। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं लेकिन यह आंदोलन बेकाबू हो गया तो कोई आश्चर्य नहीं कि चीन का भी रूस की तरह, शायद कम्युनिस्ट पार्टी से छुटकारा हो जाये। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कुमार गौरव)। हाल ही में आई कुछ खोजपरक रिपोर्टों में कहा गया है कि चीन की डेटा एनालिटिक्स कंपनी शेन्हुआ डेटा इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलजी ने करीब 10 हजार भारतीय नागरिकों से जुड़े आंकड़े जुटाए हैं। इन लोगों में कई बड़ी हस्तियां भी शामिल हैं। सवाल है कि कोई कंपनी किस तरह ऐसे आंकड़े जुटाती है और उनका विश्लेषण करती है? सच तो यह है कि इनमें से बहुत सारा डेटा सार्वजनिक या अर्द्ध-सार्वजनिक होता है। आज का कोई भी व्यक्ति लगातार डेटा पैदा करता रहता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में निजता को मौलिक अधिकार बताया था लेकिन भारत में निजी डेटा की निजता को सुरक्षा देने वाला कानून अब तक नहीं बना है। इस बारे में प्रस्तावित कानून में सरकार को अपनी मर्जी से हर तरह का डेटा जुटाने की खुली छूट दी गई है, लिहाजा इसके कानून बन जाने पर भी सरकारी निगरानी के खिलाफ नागरिकों को कोई सुरक्षा नहीं मिल पाएगी।
अधिकतर लोगों ने सोशल मीडिया साइट पर अपनी प्रोफाइल बनाई हुई हैं। फेसबुक, इन्स्टाग्राम, व्हाट्सऐप, ट्विटर, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे तमाम प्लेटफॉर्म पर लोगों के अकाउंट हैं। इसके अलावा लोगों की ईमेल आईडी भी होती हैं जिनमें से ज्यादातर गूगल की जीमेल पर हैं। लोग अपना ब्लॉग बनाते हैं या पेशेवर या निजी वेबसाइट भी बनाते हैं। कई लोगों ने लिंक्डइन और कुछ दूसरी पेशेवर साइट पर भी अकाउंट बना रखे हैं। कुछ लोग अपवर्क और वीवर्क रिमोटली जैसी गिग साइट से भी जुड़े हुए हैं। अकादमिक विशेषज्ञ अपने शोधपत्रों एवं उद्धरणों का जिक्र करते हैं और उनके विश्वविद्यालय से संबद्धता भी आॅनलाइन नजर आती है। ऐसा बहुत सारा डेटा कानूनी तरीके से और आसानी से जुटाया जा सकता है। ये डेटा संग्राहक (कलेक्टर) किसी के कामकाजी जीवन, आर्थिक स्थिति, शैक्षणिक पृष्ठभूमि, मनोरंजन संबंधी पसंद, दोस्तों, राजनीतिक रुझान और सामाजिक दृष्टिकोण जैसे तमाम पहलुओं के बारे में जानकारी जुटा सकते हैं।
किसी व्यक्ति की किसी जगह पर मौजूदगी संबंधी जानकारी भी उपयोगी होती है। निजता संबंधी प्रस्तावित कानून में भी इसे निजी डेटा नहीं माना गया है। फूड डिलिवरी सेवा और टैक्सी कैब जैसे कई कारोबार स्थान संबंधी जानकारियों पर आधारित होते हैं। आपके फोन का एक विशिष्ट अतंरराष्ट्रीय मोबाइल उपकरण पहचान (आईएमईआई) नंबर होता है। दो सिम वाले फोन में दो आईएमईआई नंबर होते हैं। इस तरह किसी भी हैंडसेट को सिम के साथ ट्रैक किया जा सकता है। हरेक सिम का भी विशिष्ट नंबर होता है। आईएमईआई और सिम के नंबर क्लोन किए जा सकते हैं लेकिन वह न तो आम है और न ही कानूनी।
अगर आपका फोन आॅन होते ही सबसे नजदीकी मोबाइल टावर से संपर्क स्थापित करता है। इस तरह आपके दूरसंचार सेवा प्रदाता को आपकी मौजूदगी वाले क्षेत्र के बारे में पता चल जाता है। अगर फोन में जीपीएस आॅन है तो आपकी वास्तविक लोकेशन भी पता चल जाती है। आरोग्य सेतु ऐप लोकेशन की जानकारी का ही इस्तेमाल करता है। ब्लूटुथ आॅन होने पर भी लोकेशन पता चल जाता है। ऐंड्रॉयड आॅपरेटिंग प्रणाली में वाई-फाई नेटवर्क तलाशने पर लोकेशन डेटा भी दर्ज हो जाता है। इसका मतलब है कि वाई-फाई आॅन रखने से हम अपनी लोकेशन भी बता देते हैं। शॉपिंग मॉल में लगे हार्डवेयर बीकॉन और रेडियो आवृत्ति पहचान (आरएफआईडी), मेट्रो पास एवं टॉल पर इस्तेमाल होने वाले स्मार्ट कार्ड से भी लोकेशन की जानकारी मिलती है। विज्ञापनों के सर्वर को भी विज्ञापन की जगह के बारे में पता होता है। इस डेटा को कई तरह से हासिल किया जा सकता है। ऐसे गुमनाम डेटा का बहुत बड़ा बाजार है।
थोड़ी अतिरिक्त जानकारी की मदद से गुमनाम डेटा को अक्सर गुमनामी से बाहर निकाला जा सकता है और चिह्नित लोगों के साथ उसे संबद्ध किया जा सकता है। कई हैंडसेट में विनिमार्ता द्वारा क्लॉउड बैकअप सेवा भी दी जाती है। वह क्लॉउड सर्वर लॉगिंग की जगह हो सकता है। उबर और जोमैटो जैसे कई ऐप लोकेशन मांगते हैं। अगर आप फोन सेटिंग्स में जाएं तो पता चलेगा कि कई ऐप लोकेशन डेटा का इस्तेमाल करते हैं। अगर लोकेशन डेटा को एक डिजिटल मानचित्र से जोड़ें और कुछ अन्य सूचनाएं भी मिल जाएं तो हम किसी फोन उपभोक्ता की 24 घंटे की गतिविधियों के बारे में बेहद सटीक अनुमान लगा सकते हैं। इसके अलावा लेनदेन संबंधी डेटा भी होता है। उम्मीद है कि क्रेडिट कार्ड एवं डेबिट कार्ड सेवाएं नेटबैंकिंग सेवाओं की तरह सुरक्षित हैं। लेकिन ई-कॉमर्स साइट पर खरीदारी करते समय आपके क्रेडिट एवं डेबिट कार्ड की जानकारियां भी दर्ज होती हैं और ये साइट उसे स्टोर कर लेती हैं। अगर डेटा कलेक्टर ने शॉपिंग ऐप तक पहुंच हासिल कर ली तो वह लेनदेन संबंधी जानकारियां भी ले सकता है।
जब कृत्रिम मेधा (एआई) के जरिये उन सूचनाओं के अंबार में से पैटर्न तलाशा जाता है तो अचंभित करने वाली बातें होती हैं। डिजिटल मार्केटिंग के एक बड़े हिस्से में लक्ष्य तक पहुंचने के लिए ऐसे विशाल डेटा का इस्तेमाल होता है। नेटफ्लिक्स, यूट्यूब और एमेजॉन पर दर्शक को अगले वीडियो या फिल्म के बारे में सुझाव देने के लिए एल्गोरिद्म का इस्तेमाल होता है। गूगल आपके ईमेल और आॅनलाइन सर्च से मिले पैटर्न के हिसाब से विज्ञापन भी भेजता है। वर्ष 2012 में अमेरिकी खुदरा विक्रेता टारगेट ने एक बड़े विवाद को जन्म दिया था जब उसने एक उपभोक्ता को होने वाले बच्चे के जन्म का बधाई संदेश भेज दिया था। साइट ने आॅनलाइन सर्च और खरीदारी रुझान के आधार पर बच्चे के जन्म का अंदाजा लगाकर संदेश भेजा था। जबकि वह खरीदार एक नाबालिग लड़की थी और उसके मां-बाप को गर्भावस्था के बारे में कोई खबर नहीं थी। डेटा माइनिंग की सटीकता एवं दायरा दोनों ही अचंभित करता है। मान लीजिए कि आप तिरुवनंतपुरम में चिली बीफ फ्राई आॅर्डर करने के लिए क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। उस आॅर्डर की रसीद से यह भी पता चल सकता है कि आपने क्या और कहां खाया? जरा सोचें कि इस जानकारी के बाद गोरक्षा के लिए संवेदनशील इलाके में यात्रा करते समय आपकी हालत कैसी होगी? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और दिशा सार्इं फाउंडेशन के संस्था प्रमुख हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय सानी)। हाल ही में बेंगलूरु के स्कूलों में सेलफोन का पता लगाने के लिए छात्रों के बस्तों की जांच की गई। दसवीं कक्षा के कई छात्रों के बस्तों से गर्भनिरोधक गोलियां और कंडोम मिले। इससे अंदाजा मिलता है कि इन छात्रों को इन चीजों की अच्छी समझ रही होगी। हालांकि कम उम्र में यौन संबंध बनाना गैरकानूनी है लेकिन अगर नाबालिगों में यौन संबंध बनाने का रुझान बढ़ रहा है तो बेहतर यही होगा कि ये संबंध सुरक्षित हों।
दुनिया के अन्य हिस्सों के सामाजिक अध्ययन से संकेत मिलते हैं कि उन जगहों पर किशोरों में गर्भधारण और यौन संचारित रोग अधिक हैं जहां यौन शिक्षा, स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। भारत में यौन शिक्षा अनिवार्य नहीं है और अधिकांश स्कूल इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने से बचते हैं। वहीं अधिकांश भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को प्रजनन और यौन शिक्षा से जुड़ी बातों को समझाने के बजाय दूर जाना ही बेहतर समझते हैं।
हालांकि ये बच्चे आजकल खुद ही कई चीजें सीख जाते हैं और शायद यह इंटरनेट के माध्यम से और भी आसान हो गया है। अच्छी बात यह भी है कि उनकी गर्भनिरोधक तक आसान पहुंच है। उदारीकरण के दौर तक अधिकांश भारतीयों की केवल निरोध तक पहुंच थी जो एक देसी कंडोम था और यह दिखने में भी अजीब था। पश्चिम बंगाल और असम में उच्च मध्यम वर्ग इंडोनेशियाई रबर के इस्तेमाल से एक डच कंपनी द्वारा बनाए गए और तस्करी किए गए बांग्लादेशी कंडोम का उपयोग करता था। 1990 के दौर में मुंबई के यौनकर्मियों वाले एक इलाके और सामान्य जगहों के बीच एक ही अंतर था कि यहां विकसित देशों से आए हुए महंगे कंडोम उपलब्ध थे।
बेंगलुरु के ये बच्चे भारत के तथाकथित कामकाजी वर्ग में शामिल होने वाली आबादी का हिस्सा हैं लेकिन दुखद बात यह है कि उन्हें यौन व्यवहार से जुड़ी जानकारियों से खुद को शिक्षित करना पड़ रहा है। देश के लगभग 25 प्रतिशत भारतीय 15 वर्ष से कम उम्र के हैं और लगभग 65 प्रतिशत 15 से 65 वर्ष की आयु के हैं। अगर आबादी का एक बड़ा हिस्सा कामकाजी उम्र का है, तब प्रति व्यक्ति उत्पादकता में बढ़त के बिना उच्च स्तर की वृद्धि संभव नहीं है।
इससे अंदाजा लगता है कि यह मुनाफे वाला रोजगार है और यह भी कि कार्यबल को तैनात करने के लिए पर्याप्त रूप से शिक्षित किया गया है। वैश्विक स्तर पर कामकाजी आयुवर्ग वाली आबादी के एक बड़े वर्ग में आर्थिक विकास की क्षमता होती है जिसने निरंतर वृद्धि वाली अवधि में एक अहम भूमिका निभाई है। इसके उदाहरण में चीन, जापान, पश्चिम जर्मनी, दक्षिण कोरिया, ताइवान, वियतनाम, बांग्लादेश और इससे पहले19 वीं शताब्दी के अंत से अमेरिका भी शामिल हैं। इस तरह की अवधि प्रति व्यक्ति मुनाफे से जुड़ी हुई है क्योंकि स्मार्ट युवा आबादी नवाचारों पर काम करती है।
हालांकि, आबादी में कामकाजी उम्र वाले लोगों का होना उच्च वृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता है। इसके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर होने चाहिए और आबादी को पर्याप्त रूप से शिक्षा मिलनी चाहिए। दुर्भाग्य से भारतीय शिक्षा प्रणाली में केवल यौन शिक्षा ही अछूता रहने वाला एकमात्र क्षेत्र नहीं है। कई भारतीय कार्यात्मक रूप से अशिक्षित हैं और विशेष रूप से लड़कियां माध्यमिक स्तर की स्कूली शिक्षा के दौरान पढ़ाई छोड़ देती हैं। भारत ने कामकाजी उम्र वाली आबादी को काम देने और उच्च स्तर की वृद्धि करने के लिए पर्याप्त रोजगार के अवसर कभी पैदा नहीं किए हैं जो संभव हो सकता था। भारत में व्यापक स्तर की बेरोजगारी, अल्प-रोजगार, और लोगों विशेष रूप से महिलाओं का नौकरी छोड़ना और कार्यबल से अलग होना कई दशकों से बेहद आम रहा है।
बड़ी-बड़ी नीतियों जैसे कि नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली (जीएसटी) को अमलीजामा पहनाने की प्रक्रिया बेहद खराब रही और लॉकडाउन ने हालात को बदतर बना दिया। हालांकि जहां तक रोजगार सृजन का प्रश्न है उसकी स्थिति हमेशा खराब रही है।
कामकाजी उम्र वाली आबादी से मिलने वाले फायदा का एक दूसरा पक्ष भी है। जैसे-जैसे आबादी आमदनी और शिक्षा की सीढ़ी पर आगे बढ़ती है तब जन्म दर में कमी आती है। जब कामकाजी आबादी कम होती है तब पेंशनभोगियों (जो बेहतर स्वास्थ्य देखभाल के कारण लंबे समय तक जीवित रहते हैं) में वृद्धि होती है। बदलाव का यह चरण और भी खराब होगा अगर स्त्री-पुरुषों के अनुपात में विषमता है। बच्चे पैदा करने की उम्र वाली कम महिलाओं के चलते बच्चे भी कम पैदा होते हैं।
यूरोपीय संघ (ईयू) और जापान में पेंशनभोगियों की तादाद बढ़ रही है और इसकी वजह से दुनिया के कई विकसित देशों की वृद्धि में लगभग ठहराव सा आ गया है। चीन में स्त्री-पुरुषों के अनुपात की स्थिति बेहद खराब है और यहां एक बच्चे की नीति की वजह से देश में अगले 20 वर्षों में आबादी में 35 प्रतिशत की गिरावट देखी जा सकती है और यहां एक बड़ी पेंशनभोगी आबादी से जूझना होगा।
अमेरिका अब तक इस गंभीर संकट से बचा है क्योंकि यहां से लोग दूसरे देश गए हैं। भारत की कुल प्रजनन दर (एक महिला के बच्चों की औसत संख्या) कई राज्यों में कम है, जिसका अर्थ घटती आबादी से जुड़ा है। ऐसे राज्य प्रति व्यक्ति, बेहतर शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवा वाले राज्य हैं। पूरे भारत में जनसंख्या वृद्धि दर में भी गिरावट आई है।
उम्र बढ़ने के साथ ही अधिक लोगों के कार्यबल से बाहर होने पर कामकाजी वर्ग में शामिल होने वाली आबादी का लाभ मिलना बंद हो जाएगा। स्त्री-पुरुष का खराब अनुपात इसे और बदतर बना सकता है। दुर्भाग्य से पांच साल के चुनावी चक्र के बारे में सोचने वाले नेताओं की शिक्षा में दीर्घकालिक निवेश करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती है जिससे इसमें अहम बदलाव आ सकता है। कामकाजी आबादी का लाभ लेने में हमारी विफलता हमें आगे भी परेशान करेगी जब यह दौर खत्म हो जाएगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नंद किशोर)। पंचकुला जिला परिषद चुनाव के नतीजों में राज्य में सत्तासीन भाजपा को झटका लगा है। पंचकुला जिले की सभी 10 सीटों पर भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया है। चुनाव में सभी निर्दलीय प्रत्याशी जीत गये हैं। निश्चित तौर पर यह एक जिला परिषद का चुनाव है लेकिन जिस प्रकार लोगों का भारतीय जनता पार्टी की नीतियों और वादाओं को लेकर मोहभंग हो रहा है उसका एक उदाहरण है।
यह सच है कि भारतीय जनता पार्टी से पूरे देश को बड़ी उम्मीद थी लेकिन कोरोना काल की त्रासदी और महंगाई का जो असर हुआ है उससे आम लोगों के जीवन पर नकरात्मक असर हुआ है। यह असर विभिन्न चुनावों के परिणामों में दिखेगा। आखिर भारतीय जनता पार्टी को आम लोगों ने जिस कांग्रेस के विकल्प के तौर पर भेजा था उन आमलोगों की परेशानियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र में सरकार ने गंभीर कदम नहीं उठाये हैं। क्रिकेट में हॉफ कोक शार्ट एक विख्यात शॉट है जिसमें बल्लेबाज अनमने ढंग से शॉट खेलता हुआ आउट हो जाता है। आज देश की गंभीर समस्या बेरोजगारी और महंगाई है। लेकिन इसको लेकर कोई ठोस नीति केन्द्र सरकार के पास नहीं दिखती है।
भारतीय जनता पार्टी के सभी चुनाव में उसके कार्यकता अतंरराष्ट्रीय उपलब्यिों को बताकर लोगों की परेशानियों को नजर अंदाज कर रहें हैं। हिमाचल और गुजरात के परिणाम भले ही भाजपा के पक्ष में आये लेकिन उसके विरोध में पड़ने वाले वोट को नजरअंदाज करना ठीक उसी तरह होगा जैसा झारखंड में क्षेत्रिय पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से हारकर भाजपा ने कहा था कि हमारा वोट बढ़ गया है। हिंदूत्व और मोदी के एजेंडा की एक सीमा है और लगता है इस सीमा पर भाजपा पहुंच चुकी है।
कांग्रेस और आप की कमजोरियों से सत्ता में आना अगर भाजपा की मजबूरी है तो निश्चित ऐसा संकेत भाजपा के लिये अच्छा नहीं है। पार्टी विथ डिफरेंस ने जिस प्रकार गुजरात में कांग्रेसियों को शामिल किया है वह एक नकरात्मक पहल है। आखिर भाजपा का कैडर और चुनाव जिताउ उम्मीदवार कम कैसे होत जा रहें हैं। राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और उसकी सभी सहयोगी संगठन के लोग भी अब निराश हो रहें हैं।
झारखंड की राजधानी रांची के हिंदू जागरण मंच के अध्यक्ष सुजीत कुमार सिंह कहते हैं कि पांच साल रघुवर सरकार में हम आम लोगों की समस्या को कम नहीं कर सके। शहर जाम से त्रस्त रहा। एक भी फ्लाई ओवर नहीं बना।विगत 30 साल से रातू रोड का पूरा ईलाका भाजपा को वोट देता रहा है और विधानसभा लोक सभा में जीत का कारण बनता है वहां के लोगों के लिये कुछ नहीं हुआ। हां अब फ्लाई ओवर बन रहा है जब चुनाव हार गये। आखिर भाजपा की सरकार से उसकी नीतियों से उसके संगठन के लोग ही नाराज है और अब सिर्फ मोदी के भरोसे केन्द्र जीत सकते हैं लेकिन हार की आशंका से नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। राहुल गांधी की मध्य प्रदेश यात्रा सर्वाधिक सफल रहने की उम्मीद है। पिछले तीन-चार दिनों में मुझे यहां के कई शहरों और गांवों से गुजरने का अवसर मिला है। जगह-जगह राहुल, कमलनाथ, दिग्विजयसिंह और स्थानीय नेताओं के पोस्टरों से रास्ते सजे हुए हैं। लेकिन राहुल के कुछ बयान इतने अटपटे होते हैं कि वे इस यात्रा पर पानी फेर देते हैं। जैसे जातीय जनगणना और सावरकर पर कुछ दिन पहले दिए गए बयानों ने यह सिद्ध कर दिया था कि वह अपनी दादी और माता की राय के भी विरुद्ध बोलने का साहस कर रहे हैं। ये कथन सचमुच साहसिक होते तो प्रशंसनीय भी शायद कहलाते। लेकिन वे साहसिक कम अज्ञानपूर्ण ज्यादा थे। इसके लिए असली दोष उनका है, जो राहुल को पर्दे के पीछे से पट्ठी पढ़ाते रहते हैं।
अब मध्य प्रदेश के महान स्वतंत्रता सेनानी टंट्या भील के जन्म स्थान पर पहुंचकर उन्होंने कह दिया कि टंट्या भील ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़कर अपनी जान दे दी, जबकि आरएसएस अंग्रेजों की मदद करता रहा। उन्होंने संघ द्वारा आदिवासियों को वनवासी कहने पर भी आपत्ति की, क्योंकि आदिवासियों की सेवा करनेवाले संघ के संगठन इसी नाम का इस्तेमाल करते हैं।
राहुल से कोई पूछे कि क्या ये आदिवासी शहरों में रहते हैं? जो वनों में रहते हैं, उन्हें वनवासी कहना तो एकदम सही है। आदिवासी शब्द का इस्तेमाल कबाइली या ट्राइबल के लिए हुआ करता था लेकिन उस समय यह सवाल भी उठा था कि क्या सिर्फ आदिवासी लोग भारत के मूल निवासी हैं? बाकी सब 80-90 प्रतिशत लोग क्या बाहर से आकर भारत में बस गये हैं?
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने टंट्या भील को एक महानायक का सम्मान दिया है। इसी प्रकार संघ को अंग्रेज का समर्थक बताना भी अपने इतिहास के अज्ञान को प्रदर्शित करना है। राहुल का भोलापन अद्भुत है। उस पर कुर्बान हो जाने का मन करता है।
देश की स्वाधीनता का ध्वज फहरानेवाली महान पार्टी कांग्रेस के पास आज कोई परिपक्व नेता नहीं है, यह देश का दुर्भाग्य है। यह ठीक है कि हमारे देश में कुछ नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए लेकिन उनका ज्ञान राहुल जितना या उससे भी कम रहा होगा लेकिन उनकी खूबी यह थी कि वे अपने चारों तरफ ऐसे लोगों को सटाए रखते थे, जो उन्हें लुढ़कने से बचाए रखते थे।
कांग्रेस के पास आज मोदी के विकल्प के तौर पर न तो कोई नेता है और न ही नीति है लेकिन इस अभाव के दौरान राहुल की यह भारत यात्रा बेचारे निराश कांग्रेसियों में कुछ आशा का संचार जरूर कर रही है लेकिन यदि अपने बयानों में राहुल थोड़ी रचनात्मकता बढ़ा दें और किसी के भी विरुद्ध निराधार अप्रिय टिप्पणियां न करें तो यह यात्रा उन्हें शायद जनता से कुछ हद तक जोड़ सकेगी। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कुमार गौरव, कोडरमा)। दुनिया लोकतंत्र को स्वार्थ के लिए हथियार बनाकर इस्तेमाल करना बंद करे। क्योंकि इससे वैसे राष्ट्र अपनी तात्कालिक स्वार्थ को भले ही पूर्ण कर लेते है। लेकिन इसका खामियाजा पूरे विश्व को भुगतना पड़ता है। ‘संप्रभुता’ लोकतंत्र की न्याय की रक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र है। लेकिन ताना शाह हियो ने लोकतंत्र को अपनी जागीर बना, वही ब्रह्मास्त्र से कुकर्म करते चले आ रहे हैं।
जब भी विश्व में तृष्टीकरण की चाल चली जाती है। लोकतंत्र कमजोर हो जाती है। उस बकरी की बच्चे की तरह जो दो चार बूंद दूध की भूखी है मगर उसका मेमीयाना सुनकर ऐसा लगता है मानो उसकी सांसें अब छूट चली। और जब ऐसा होता है, तो वैसे राष्ट्र जो लोकतंत्र को अपनी आत्मा बना बैठे हंै वहां की शासन व्यवस्था वेंटिलेसन पर चली जाती है। अराजकता इतनी बढ़ जाती है कि वहां की सरकारें भले कुछ न कहे लेकिन गृह युद्ध एैसी स्थितियां बन जाती है। वैसे राष्ट्रों का आवाम जो लोकतंत्र की ईबादत लिखने में सकारात्मक कर्म पथ रहते हैं। उन्हेें लोकतंत्र से घिन्न आने लगती है। लोकतंत्र की धज्जियां कुछ राष्ट्र ही उड़ाते हैं, मगर इसकी कीमत लोकतांत्रिक हर राष्ट्र को चुकानी पड़ती है।
ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध पर गौर कर लीजिए। दुनिया के हुकुमों की हकीकत दूध का दूध, पानी का पानी की तरह साफ हो जायेगी। द्वितीय विश्वयुद्ध में दुनिया दो गुटों मे पूर्ण रुपेण बंट चुकी थी। अमेरिका इसमें तटस्थ थी। क्योंकि अमेरिका की फौज युद्ध में शामिल नही थी। यह एक पक्ष थी अमेरिका की। मगर यह तो सिर्फ तृष्टीकरण के तरीके थे। अगर न्याय की दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह अमेरिका की दादागिरी तथा धौंस थी। जिसे बिहार की एक लोकउक्ति चोरी भी सीना जोरी भी को चरितार्थ करती है। अमेरिकी फौज लड़ाई में उतरी नहीं। मगर अमेरिका की दुलरुआ राष्ट्र विश्व युद्ध मे टिके हुए थे। उसका कारण था अमेरिकी हथियार। अमेरिका शुरुआती युद्ध में न उतरकर भी युद्ध लड़ रही थी क्योंकि अमेरिका अपने राष्ट्रों को हथियार मुहैया करा रही थी, तो क्या ये नहीं हुई कि अमेरिका तो शुरू से ही चाहता था कि विश्व में एक ग्लोबल युद्ध हो, जिस युद्ध मे लोकतंत्र के पावर सेन्टर पूरा पश्चिमी राष्ट्र युद्ध में लिप्त हो जाए। जिससे विश्व में जो सबसे ज्यादा उपनिवेश पश्चिमी राष्ट्रों के अधीन है वहां उनकी साख टूटे।
अराजकता तथा युद्ध की विभीषीका से ऊब कर उपनिवेश पश्चिमी राष्ट्रों के खिलाफ बगावत कर दे। उनसे अपनी सारी पिंड छुड़ा ले। ताकि पश्चिमी राष्ट्रों के प्रोडक्ट का उपनिवेशों पर एकाधिकार है वह समाप्त हो। ताकि उस बाजार की जरुरत अमेरिका पूरा कर अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनायी जा सके। अमेरिका की कूटनीति जानती थी कि जब तक ये राष्ट्र ग्लोबल युद्ध में फंसेंगे नहीं, तब तक इनका बाजार टूटेगा नहीं। क्योंकि उस समयावधि में पश्चिमी राष्ट्रों के बाजार जहां थे वहां उनका एकल साम्राज्य था। पश्चिमी राष्ट्र उस अवधि में अपने अपने बाजार में विकल्प के रूप में दूसरा कहीं रहने ही नहीं दिया।
अमेरिका अच्छे से जानती था कि अगर उसे विश्व के सबसे बड़े बाजार पर अपना नियंत्रण करना है तो पश्चिमी राष्ट्रों को युद्ध में धकेल दो। स्वत: पश्चिम की हर राष्ट्र का बाजार उसके पास चला आयेगा। द्वितीय विश्वयुद्ध काल में पष्चिमी राष्ट्रो में भी आपस में फूट थी। वे अपनी ताकत तथा पैसे की घमण्ड में इतने मतवाले हो गए थे कि किसी भी राष्ट्री की सम्प्रभुता उनकी जूतों के नीचे तथा मानवता उनके गुलाम हुआ करती थी। अमेरिका इसका जबरजस्त फायदा उठाया। उन राष्ट्रो को खूब हथियार देकर खूब पैसा कमाया। नौबत यहां तक आ गई कि वह पष्चिम जो दुनिया की भगवान थी, सबसे ज्यादा ताकतवार थी उसे भी बैसाखी की जरुरत होने लगी। अमेरिका अपनी कूटनिति से पष्चिमी राष्ट्रो की सच्च हमदर्द बन उनके बाजारो पर कब्जा करता गया और मानव की नरसंहार करने वाली हथियार भी उन राष्ट्रों को बेचकर धन भी खूब कमाया। और पष्चिम उसे अपना मित्र मानने लगे जो आज भी जारी है मगर किसी वक्त दुनिया पर राज करने वाले पष्चिम अमेरिका की कूटनिति के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया। दुनिया के वे मुल्क जो द्वितीय विश्वयुद्ध में दुसरे खेमे के थे। उन्होने युद्ध शुरू अपने विरुद्ध राष्ट्रो की सैन्य, आर्थिक क्षमता जान कर अपनी रणनिति बनायी थी उसकी वह नीतियां जीत से दूर हो रही थी। उसका खास कारण था अमेरिका के हथियार ,जो उस जमाने में दुनिया के सबसे आधुनिक हथियार थे। अच्छा चूंकि अमेरिका युद्ध से दूर थी इसलिए दूसरे खेमे की राष्ट्र अमेरिका पर सीधा हमला नही कर पा रहे थे। लेकिन इससे उन्हे भारी नुकसान हो रहा था। अमेरिकी हथियारें जापान को ज्यादा नुकसान दे रही थी। इसे जापान पचा नही पाया। हक्कीमत भी थी कि युद्ध मे हथियारों को मुहैया कराने वाला राष्ट्र भी युद्ध का हिस्सेदार होता है। जापान अमेरिका के पर्ल हर्बल मे वायु सेना पर कार्यवाही कर दी।
जापान की इस हमले में 50-55 हजार फैजी तथा अमेरिका के नागरिक मारे गए। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका इसे युद्ध के अन्दर होने वाली हवाई हमला ना कहकर इसे नरसंहार का नाम देकर विश्व की सहानभूतियाँ बटोरने की कोशिश की जिसमें अमेरिका सफल भी हुआ। अब तो द्वितीय विश्वयुद्ध जंग ना होकर क्रूरता की हर हद पार कर दी। और अमेरिका जापान की हिरोषिमा तथा नागासाकी पर परमानु बम गिराकर लोकतंत्र की तृष्टीकरण की बहुत बड़ी विसात बिछा दी। इससे जापान का ही नुकसान नही हुआ बल्कि समुचे विश्व में परमानेन्ट असुरक्षा, अराजकता की डर बैठ गई। हर राष्ट्रो में हथियरों की होड़ हो गई। और पृथ्वी जो ब्रँम्हाण्ड में एक ही है उसे हजारो बार मिटा देने की हथियारे बना ली गई। काश जितने पैसे मानव नाश पृथ्वी विनाश के लिए बहाई गई। उतने पैसे से तो यही हमारी पृथ्वी स्वर्ग सी सज जाती। मगर एैसा किसी ने नही किया। अमेरिका का परमाणु भले ही तत्कालिक विश्वयुद्ध बन्द करा दी, मगर दुनिया मे परमाणु होड़ बढ़ गई। हर राष्ट्र अपनी आजादी को सुरक्षा कवच परमाणु का देना चाहने लगी। जबकि परमाणु की विविषिका जापान ही बता सकती है। जब पर्ल हर्बल नरसंहार थी तो हीरोसीमा तथा नागासाकी क्या थी। जब हत्या का इंसाफ हत्या है और जब नरसंहार का बदला नरसंहार है तो इण्डिया एैसे इन्साफ करने वाले अमेरिका से अपना इन्साफ दिलाने की मांग करती है।
अमेरिका जिसके गोद में लोकतंत्र है वह साकारात्मक सोच रख इण्डिया का हिसाब करे। क्योंकि विश्व की सबसे पहले तथा सबसे सबसे बड़ी नरसंहार तैमुरगल ने की तैमुरगल ने 12वी सदी में ही एक लाख आवाम की हत्या कराई थी। अच्छा चलो यह पूरानी बाते है नई बाते आधुनिक विश्व की करते है। आधुनिक विश्व में अंग्रेजो ने इण्डिया के जालियावाला बाग में आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी नरसंहार कराई। आप हमारी ये इन्साफ दिला दे। यकीन मानिए इंडिया भगवान की तरह अमेरिका की पूजा करेगी। अगर आप दिला नही सकते तो आप इण्डिया को इंसाफ ले लेने के लिए आजाद छोड़ दे। आप लोकतंत्र के आइडियल है आपकी इन्साफ सर आँखों पर तो क्या मंगोल तथा ब्रिटेन पर इण्डिया को भी परमाणु बम पटक कर अपनी नरसंहार का बदला लेना चाहिए। लेकिन देखिए इण्डिया के संस्कार इण्डिया कभी भी परमाणु उपयोग की बात नही करती तथा उस नरसंहार को माफ कर मानव के लिए मानवता के लिए, आगे बढ़ गई है। और इस नरसंहार को उनकी नीयति तथा अपनी कुबार्नी मानकर अपना वतन सुन्दर वतन, सभ्य वतन, निष्ठावान वतन गढ़ने में लगी है। इण्डिया लोकतंत्र की रास्तो मे बहुत दूर निकल गई है। अगर लोकतंत्र के दिशा की ओर देखी जाए, तो इतना हो जाने के बाद भी इण्डिया ऊगता सूरज की तरह हर अधकार को रौशन दान कर रही है। जय हिन्द...
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