विचार

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Published / 2022-12-28 21:30:19
राष्ट्रवादी ईसाइयों पर भी है भारत को नाज...

आर के सिन्हा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मान्यता है कि भारत में इसाई धर्म की शुरुआत सबसे पहले केरल से हुई थी। माना जाता है कि ईसा मसीह के 12 प्रमुख शिष्यों में से एक सेंट थॉमस केरल में आये थे। भारत आने के बाद सेंट थॉमस ने 7 चर्च बनावाये। बहरहाल, यह क्रिसमस इस तरह का अनुपम अवसर है, जब हम जीवन के अलग-अलग भागों में भारत में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राष्ट्रवादी ईसाइयों की बात करें। इस लिहाज से पहला नाम डॉ टेसी थॉमस का जेहन में आता है। उन्हें भारत में मिसाइल वुमन के नाम से जाता है। वह अग्नि मिसाइल प्रोग्राम की अहम जिम्मेदारी संभालने वालीं देश की पहली महिला साइंटिस्ट हैं। अभी वह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में महानिदेशक एयरोनॉटिकल प्रणाली हैं। टेसी मिसाइल के क्षेत्र में महिलाओं के लिए पथप्रदर्शक साबित हुई हैं। टेसी थॉमस 1988 में डीआरडीओ में शामिल हुईं। यहां उन्होंने नई पीढ़ी की बैलिस्टिक मिसाइल, अग्नि के डिजाइन और विकास पर काम किया। उन्हें पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने अग्नि परियोजना के लिए नियुक्त किया था। टेसी 3,000 किमी रेंज की अग्नि-ककक मिसाइल परियोजना की सहयोगी परियोजना निदेशक भी रहीं। साल 2018 में वह डीआरडीओ में वैमानिकी प्रणाली की महानिदेशक बनीं।  

यह जानकारी कम लोगों को ही है कि प्रख्यात वकील हरीश साल्वे का संबंध भी एक ईसाई परिवार से है। वे बेहद प्रखर वक्ता भी हैं। जिरह के दौरान उन्हें इसका भरपूर लाभ मिलता है।  वे कान्स्टिटूशनल लॉ और कॉरपोरेट लॉ से जुड़े मामलों पर खासतौर पर महारत रखते हैं। हरीश साल्वे को इस समय देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में एक माना जाता है। वे लगभग उसी स्थान पर विराजमान है, जिस पर कभी नानी पालकीवाला, सोली सोराबजी या फली नरीमन जैसे दिग्गज विद्यामान रहे थे। वे मुकेश अंबानी से लेकर रतन टाटा के लिए सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर चुके हैं। वे टैक्स विवाद में वोडाफोन के लिए भी लड़े। साल्वे ने इतालवी सरकार के लिए दो इतालवी मरीनों के हक में भी सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा था। पर जब इतालवी राजदूत ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे का उल्लंघन किया है तो उन्होंने आगे केस को लड़ने से मना भी कर दिया था। आपको याद होगा कि इतालवी सरकार ने दो भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोपी दो इतालवी मरीनों को सुनवाई के लिए भारत वापस भेजने से मना कर दिया था। इसके बाद साल्वे ने इतालवी सरकार के वकील का पद छोड़ा था। 

भारत के हरेक शब्दों के शैदाइयों के लिए रस्किन बॉण्ड का कालजयी काम उन्हें विशेष बना देता है। वे अंग्रेजी भाषा के विश्वप्रसिद्ध भारतीय लेखक हैं। बॉन्ड ने बच्चों के लिए सैकड़ों लघु कथाएं, निबंध, उपन्यास और किताबें लिखी हैं। बच्चों में उनकी जान बसती है। वे कभी कोई पुरस्कार ग्रहण करने के लिए नहीं लिखते हैं। वर्ना बहुत से कथित लेखक तो पुरस्कार पाने के लिए ही लिखते हैं। लिखना रस्किन बॉण्ड के जीवन का अभिन्न अंग है। उन्हें 1999 में पद्मश्री और 2014 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। रस्किन बॉण्ड के पिता भारत में तैनात रॉयल एयरफोर्स के अधिकारी थे। अगर बात खेल जगत की करें तो लिएंडर पेस को आजाद भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों की सूची में रखा जाएगा। लिएंडर पेस के पिता वीस पेस भारत की हॉकी टीम में रहे और मां जेनिफर पेस भारत की बास्केटबॉल टीम का हिस्सा रहीं। उन्होंने 1990 जूनियर विंबलडन जीता था। उन्होंने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में कांस्य का पदक जीता। इसके बाद पेस ने महेश भूपति के साथ भारतीय टेनिस के इतिहास में कुछ यादगार पल जोड़ दिये।  

मीडिया की सुर्खियों से दूर रहने वाले जॉर्ज सोलोमन राजघाट, विजय घाट, शांतिवन और सरकार द्वारा आयोजित होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं का अनिवार्य अंग हैं। महात्मा गांधी  जबदक्षिण अफ्रीका में रहते थे। जॉर्ज सोलोमन राजधानी की कई चर्चों में पादरी भी रहे हैं।  जॉर्ज सोलोमन कहते हैं कि कि गांधीजी को बाइबिल और ईसाई धर्म के संबंध में करीब से जानने का अवसर मिला दीनबंधु सीएफ एंड्रूज से। दीनबंधु एंड्रूरज राजधानी के सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाते थे। उन्हीं के प्रयासों से गांधीजी पहली बार 1915 में दिल्ली आए थे। सेंट स्टीफंस कॉलेज की स्थापना दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी ने की थी। इससे ही दीनबंधु एन्ड्रूरज जुड़े थे और अब जॉर्ज सोलोमन इसका हिस्सा हैं। पूर्वोत्तर भारत से आने वाली मैरी कॉम की उपलब्धियों पर सारा देश गर्व महसूस करता है। उन्होंने मुक्केबाजी की दुनिया में अनेक बड़ी उपलब्धियां दर्ज की। मैरी कॉम ने 2012 में हुए ओलंपिक खेलों में ब्रोंज मेडल हासिल किया था। उन्होंने 5 बार वर्ल्ड बॉक्सर चैम्पियनशिप जीती है। खेल की दुनिया में इनके कोच चार्ल्स अत्किनसन, गोपाल देवांग, रोंगमी जोसिया, एम नरजीत सिंह रहे है, जिन्होंने मैरी कॉम को शिखर तक पहुंचाने में योगदान दिया। 

भारत में ईसाइयों की आबादी हिन्दू और मुसलमानों के बाद सबसे अधिक है। देश इसाई समाज से उम्मीद करता रहेगा कि वहां से देश का चौतरफा विकास करने वाली शख्सियतें निकलती रहें। अगर बात स्वाधीनता के बाद की करें तो ईसाई समाज से जॉर्ज फर्नांडीज, भारतीय वायु सेना के चीफ अनिल ब्राउन, चुनाव आयुक्त जेम्स माइकल लिंग्दोह, पुलिस अफसर जूलियस रिबेरो, भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल एसएन रोडग्रिस जैसी शानदार शख्सियतों ने देश को समृद्ध किया। आशा की जानी चाहिए कि ये आगे भी चलता रहेगा। 
और अंत में बात कर लें फादर कामिल बुल्के की। फादर बुल्के के अंग्रेजी-हिंदी शब्द कोष को कौन नहीं जानता? जिंदगी भर रांची के सेंट जेवियर कॉलेज में हिंदी पढ़ाते रहे। रामचरित-मानस के महान विद्वान थे। प्रतिवर्ष तुलसी जयंती पर देशभर के अनेकों लोग तुलसीदास और उनकी कालजयी कृति रामचरितमानस पर फादर कामिल बुल्के की गूढ़ विवेचनात्मक व्याख्यान को सुनने रांची पहुंचते थे। कई वर्ष मैं भी गया हूं। इन महान ईसाई हस्तियों को सलाम...।

Published / 2022-12-23 23:20:14
कोरोना की लहर से खतरा हर पहर...

कमलेश पांडेय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लीजिये... देश-दुनिया पर कोरोना संक्रमण का खतरा फिर मंडराने लगा है। चीन में लगातार बढ़ते मामलों के लिए जिम्मेदार कोविड 19 के ओमीक्रोन स्वरूप के सब-वेरिएंट बीएफ.7 के कई मामले भारत के गुजरात और ओडिशा आदि में भी सामने आए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है भारत को इससे ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है, क्यों कि प्राकृतिक और टीकाकरण से प्राप्त हाइब्रीड इम्युनिटी के चलते देश को खतरा सबसे न्यूनतम होगा। यह बात अलग बात है कि यदि कोई नया वेरिएंट जन्म लेता है तो फिर भारत में भी चुनौती बढ़ सकती है। भारत अब तक कोरोना की तीन लहरों का सामना कर चुका है। इसके लिए अल्फा, डेल्टा और ओमीक्रोन वेरिएंट जिम्मेदार थे।

चीन में हाहाकार के लिए ओमीक्रोन के सब-वेरिएंट बीएफ.7 को जिम्मेदार माना गया है। चीन के साथ अमेरिका, जापान, अर्जेंटीना, दक्षिण कोरिया और ब्राजील में भी कोरोना के केस बढ़ने लगे हैं। बीएफ.7 पर डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यह अब तक का सबसे तेजी से फैलने वाला वेरिएंट है। यह कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन में आर346टी म्यूटेशन से बना है। इसी की वजह से बीएफ.7 पर एंटीबॉडी का असर नहीं होता। यह एंटीबॉडी को हराकर शरीर में घुसने की क्षमता रखता है। इससे बचने के लिए टीकाकरण को अब भी सबसे अच्छा हथियार माना जा रहा है। इसलिए ब्रिटेन ने हाल में मॉडर्ना के टीके बायवैलेंट बूस्टर्स को मंजूरी दी है। यह कोरोना के सभी सब-वेरिएंट को खत्म करने में कारगर है।
कोरोना की मौजूदा वैश्विक स्थिति पर केंद्र सरकार सतर्क हो चुकी है। उसने अधिकारियों को सजग रहने और अपने निगरानी तंत्र को मजबूत करने को कहा है। दिल्ली समेत सभी राज्यों में सतर्कता बढ़ा दी गई है। भारत सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भले ही देश में लगातार कोरोना मामलों में गिरावट का रुझान है और गत सप्ताह रोजाना औसतन 158 संक्रमण के मामले दर्ज किए गए हैं। लेकिन कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ है। इसलिए आप घबरायें नहीं, क्योंकि सरकार किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। उसने लोगों को सुझाव दिया है कि भीड़ में मास्क पहनें और कोरोना टीके की तीसरी यानी एहतियाती खुराक जरूर लें।

जहां तक दुनिया के अन्य देशों की बात है तो यहां पर यह बताना जरूरी है कि वैश्विक स्तर पर पिछले 6 सप्ताहों के दौरान कोरोना मरीजों में लगातार वृद्धि हो रही है। विश्व में रोजाना औसत संक्रमण 5.9 लाख है। अनुमान है कि अगले कुछ महीनों में चीन में 80 करोड़ लोग संक्रमित हो सकते हैं। मात्र तीन माह में 10 लाख लोगों की मौत की आशंका जताई गई है। यही वजह है कि भारत के हवाई अड्डों पर चीन और अन्य देशों से आने वाले यात्रियों की औचक कोरोना जांच शुरू कर दी गई है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन से पता चलता है कि जब भी कोई कोरोना लहर देश में आई तो लगभग 65-70 फीसदी लोग उससे प्रभावित हुए। कई राज्यों में यह आंकड़ा 90 फीसदी तक रहा है। मोटे तौर पर देश के 80-90 फीसदी लोग कोरोना का सामना कर चुके हैं। यानी कि उनमें प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधक क्षमता आ चुकी है। इसी प्रकार 102 करोड़ से अधिक लोग कोरोना टीके की पहली खुराक और 95 करोड़ लोग दूसरी खुराक ले चुके हैं। इसका अभिप्राय यह है कि यदि पांच साल से छोटे बच्चों को छोड़ दिया जाए तो तकरीबन 95 फीसदी आबादी का टीकाकरण हो चुका है।
कोरोना संक्रमण के बचाव में प्राकृतिक रूप से हासिल प्रतिरोधक क्षमता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। कुछ अलग-अलग अध्ययन में यह दावा किया गया था कि प्राकृतिक और टीके दोनों की मिली-जुली हाइब्रीड प्रतिरोध क्षमता लंबे समय तक टिकाऊ रहती है। भारतीय आबादी ने दोनों तरीकों से यह क्षमता हासिल की है। इस हिसाब से भारतीयों में कोरोना के नए संक्रमणों का खतरा न्यूनतम हो सकता है।
अब यदि कोई नया वेरिएंट आता है और वह पहले के वेरिएंट से काफी अलग होता है तो चौथी लहर का खतरा बढ़ सकता है। यदि चीन की अनदेखी भी कर दें तो अमेरिका व फ्रांस में कोविड के मामलों का बढ़ना चिंताजनक है क्योंकि वहां पहले अधिक लोग संक्रमित हुए थे। इन देशों में ज्यादातर फाइजर के टीके इश्तेमाल हुए थे।जो एमआरएनए तकनीक पर था। यह तकनीक टीके में पहलीबार प्रयुक्त हुई, इसलिए इसकी प्रभावकारिता को लेकर भी पूराने अध्ययन नहीं हैं। वहीं भारतीय टीकों में समूचे निष्क्रिय वायरस का इस्तेमाल किया गया है जो सबसे पुरानी व प्रभावी टीका पद्धति है।

उल्लेखनीय है कि साल 2019 में दिसंबर में ही चीन में कोरोना वायरस नाम की नई महामारी ने दस्तक दी थी। इसके बाद पूरी दुनिया में इस वायरस ने तबाही मचाई। ऐसे में दुनिया को ये चिंता सताने लगी है कि क्या एक बार फिर से नए साल की खुशियों पर कोरोना वायरस नाम का ग्रहण लगने वाला है? याद दिला दें कि दिसंबर-जनवरी 2019 में कोरोना के बढ़े मामलों में क्रिसमस-न्यू ईयर पर होने वाली भीड़भाड़ का भी बड़ा योगदान था, क्योंकि यह वायरस एक-दूसरे के संपर्क में आने से फैलता है। क्रिसमस-न्यू ईयर 2022 के समय कोरोना के मामले बढ़ने से दुनिया वापस उसी जगह पर आकर खड़ी हो गई है जहां तीन साल पहले थी। एक्सपर्ट ने चिंता जताई है कि अगर दिसंबर के आखिरी सप्ताह और जनवरी में आने वाले फेस्टिवल पर सावधानी नहीं बरती गई तो कोरोना विस्फोट भी हो सकता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2022-12-23 23:16:50
हम किसी धर्म को क्यों मानते हैं?

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। धर्म परिवर्तन संबंधी दो-तीन घटनाओं ने आज मेरा ध्यान खींचा। उत्तर प्रदेश के सीतापुर गांव में तीन लोगों को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया कि वे गांव के लोगों को डंडे के जोर पर ईसाई बनाने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने लोगों को कुछ लालच भी दिये और पवित्र क्रॉस भी बांटे। धर्म परिवर्तन करवाने वाले कुछ भारतीय ईसाइयों के साथ ब्राजील के चार पादरीनुमा टूरिस्ट भी थे। उधर मध्यप्रदेश के बस्तर जिले में लगभग 60 ईसाई परिवारों को भागकर एक स्टेडियम में शरण लेनी पड़ी, क्योंकि उन पर कुछ लोगों ने हमले शुरू कर दिए थे। हमलावरों का आरोप है कि पादरी लोग आदिवासियों को गुमराह करके ईसाई बना डालते हैं। इसी तरह बड़ोदरा के पास एक गांव में एक ईसाई को लोगों ने सिर्फ इसलिए पीट दिया कि वह क्रिसमस के अवसर पर सांता क्लाज के कपड़े पहनकर लोगों को चॉकलेट बांट रहा था। 

उधर, कर्नाटक विधानसभा में एक ऐसा विधेयक लाने की तैयारी है कि मुसलमान लोग मांस के लिए पशुओं को हलाल न कर सकें। इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार की कोशिश है कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की वेशभूषा अन्य स्कूलों के बच्चों की तरह हो और उनकी छुट्टी हर हफ्ते शुक्रवार की बजाय रविवार को हो। ऊपर गिनाए गए लगभग सभी मामले ऐसे हैं, जिनका धर्म से, परमात्मा से, पुण्य से नैतिकता से कोई संबंध नहीं है। इन सब अतिवादी कार्यों का प्रेरणास्रोत मजहबी उन्माद है। जो लोग अन्य लोगों का धर्म-परिवर्तन करवाते हैं, उनसे पूछिए कि आप स्वयं जिस धर्म को मानते हैं, क्या उसे अच्छी तरह से सोच-समझकर आपने अपनाया है या आपके माता ने उसे आपको पैदा होते ही जन्मघुट्टी के साथ पिला दिया था? प्राय: सभी धार्मिक लोग, जिस धर्म के भी हों, वह उन्हें उस वक्त से पिला दिया जाता है, जब उन्हें उनका अपना नाम भी पता नहीं होता। जिस धर्म के लिए वे चिल्ला-चिल्लाकर लोगों के कान फोड़ने के लिए तैयार रहते हैं, उस धर्म का अनुयायी उन्हें उस समय बना दिया जाता है, जब उन्हें यही पता नहीं होता है कि जो मंत्र उनके कान में फूंका जा रहा है, उसका अर्थ क्या है। 

पिछले आठ दशकों में मैं लगभग 70 देशों में गया हूं और तरह-तरह के लाखों लोगों से मेरा आमना-सामना हुआ है लेकिन मैं आज तक एक भी ऐसे आदमी से नहीं मिला हूं, जो बचपन में वेद पढ़कर हिंदू बना हो, जिंदावस्ता पढ़कर पारसी बना हो, बाइबिल पढ़कर यहूदी या ईसाई बना हो, कुरान पढ़कर मुसलमान बना हो, त्रिपिटक पढ़कर बौद्ध बना हो, अगम सूत्र पढ़कर जैन बना हो या गुरु ग्रंथ साहब पढ़कर सिख बना हो। यदि पढ़-लिखकर या सोच-समझकर कोई किसी भी धर्म को अपनाना चाहे तो उसे उसकी आजादी होनी चाहिए लेकिन जन्मघुट्टी, लालच, भय, ठगी, वर्चस्व से प्रेरित होनेवाले सभी धर्म-परिवर्तन त्याज्य हैं। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2022-12-23 23:10:43
जब आप जागरूक होंगे, तभी मिलेगा इंसाफ...

  • राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस/24 दिसंबर विशेष

योगेश कुमार गोयल

एबीएन सेंट्रल डेस्क। उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के लिए देश में प्रतिवर्ष 24 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस’ मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ता अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक करना और कानून की जानकारी देना है। दरअसल आनलाइन खरीदारी हो या आॅफलाइन, ग्राहकों को कई बार सामान की गड़बड़ी अथवा अन्य प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसी तरह की समस्याओं से निजात दिलाने के लिए उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है।

2020 तक विभिन्न ई-कॉमर्स साइटों से आॅनलाइन खरीदारी को लेकर उपभोक्ताओं को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं था लेकिन उपभोक्ता संरक्षण कानून-2019 (कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट-2019) में ई-कॉमर्स को भी दायरे में लाकर उपभोक्ताओं को और मजबूती देने का प्रयास किया गया है। पुराना उपभोक्ता संरक्षण कानून करीब साढ़े तीन दशक पुराना हो चुका था, जिसमें समय के साथ बड़े बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही थी।
इसीलिए ग्राहकों के साथ अक्सर होने वाली धोखाधड़ी को रोकने और उपभोक्ता अधिकारों को ज्यादा मजबूती प्रदान करने के लिए 20 जुलाई 2020 को उपभोक्ता संरक्षण कानून-2019 (कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट-2019) लागू किया गया। 

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस वास्तव में उपभोक्ताओं को उनकी शक्तियों और अधिकारों के बारे में जागरूक करने का महत्वपूर्व अवसर है। भारत में उपभोक्ता आन्दोलन की शुरूआत मुंबई में वर्ष 1966 में हुई थी। तत्पश्चात पुणे में वर्ष 1974 में ग्राहक पंचायत की स्थापना के बाद कई राज्यों में उपभोक्ता कल्याण के लिए संस्थाओं का गठन किया गया।

इस प्रकार उपभोक्ता हितों के संरक्षण की दिशा में यह आन्दोलन आगे बढ़ता गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर 09 दिसंबर 1986 को उपभोक्ता संरक्षण विधेयक पारित किया गया, जिसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बार 24 दिसंबर 1986 को देशभर में लागू किया गया। पिछले कई वर्षों से भारत में प्रतिवर्ष इसी दिन राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस मनाए जाने का मूल उद्देश्य यही है कि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए और अगर वे धोखाधड़ी, कालाबाजारी, घटतौली इत्यादि के शिकार होते हैं तो वे इसकी शिकायत उपभोक्ता अदालत में कर सकें।
उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रत्येक वह व्यक्ति उपभोक्ता है, जिसने किसी वस्तु या सेवा के क्रय के बदले धन का भुगतान किया है या भुगतान करने का आश्वासन दिया है और ऐसे में किसी भी प्रकार के शोषण अथवा उत्पीड़न के खिलाफ वह अपनी आवाज उठा सकता है तथा क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है। 

खरीदी गई किसी वस्तु, उत्पाद अथवा सेवा में कमी या उसके कारण होने वाली किसी भी प्रकार की हानि के बदले उपभोक्ताओं को मिला कानूनी संरक्षण ही उपभोक्ता अधिकार है। यदि खरीदी गयी किसी वस्तु या सेवा में कोई कमी है या उससे आपको कोई नुकसान हुआ है तो आप उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

अगर उपभोक्ताओं का शोषण होने और ऐसे मामलों में उनके द्वारा उपभोक्ता अदालत की शरण लिए जाने के बाद मिले न्याय के कुछ मामलों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि उपभोक्ता अदालतों का उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण में क्या योगदान है। एक उपभोक्ता ने एक दुकान से बिजली का एक पंखा खरीदा लेकिन एक वर्ष की गारंटी होने के बावजूद थोड़े ही समय बाद पंखा खराब होने पर भी जब दुकानदार उसे ठीक कराने या बदलने में आनाकानी करने लगा तो उपभोक्ता ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने अपने आदेश में नया पंखा देने के साथ उपभोक्ता को हजार्ना देने का भी फरमान सुनाया। 

एक अन्य मामले में एक आवेदक ने सरकारी नौकरी के लिए अपना आवेदन अंतिम तिथि से पांच दिन पूर्व ही स्पीड पोस्ट द्वारा संबंधित विभाग को भेज दिया लेकिन आवेदन निर्धारित तिथि तक नहीं पहुंचने के कारण उसे परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया गया। आवेदक ने डाक विभाग की लापरवाही को लेकर उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया और उसे न्याय मिला। चूंकि स्पीड पोस्ट को डाक अधिनियम में एक आवश्यक सेवा माना गया है, इसलिए उपभोक्ता अदालत ने डाक विभाग को सेवा शर्तों में कमी का दोषी पाते हुए डाक विभाग को मुआवजे के तौर पर आवेदक को एक हजार रुपये की राशि देने का आदेश दिया।

ऐसी ही छोटी-बड़ी समस्याओं का सामना जीवन में कभी न कभी हम सभी को करना पड़ता है लेकिन अधिकांश लोग अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ते। इसका प्रमुख कारण यही है कि देश की बहुत बड़ी आबादी अशिक्षित है, जो अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अनभिज्ञ है। हालांकि जब शिक्षित लोग भी अपने उपभोक्ता अधिकारों के प्रति उदासीन नजर आते हैं तो हैरानी होती है। यदि आप एक उपभोक्ता हैं और किसी भी प्रकार के शोषण के शिकार हुए हैं तो अपने अधिकारों की लड़ाई लड़कर न्याय पा सकते हैं। कोई वस्तु अथवा सेवा लेते समय हम धन का भुगतान तो करते हैं पर बदले में उसकी रसीद नहीं लेते। 

शोषण से मुक्ति पाने के लिए सबसे जरूरी है कि आप जो भी वस्तु, सेवा अथवा उत्पाद खरीदें, उसकी रसीद अवश्य लें। यदि आपके पास रसीद के तौर पर कोई सबूत ही नहीं है तो आप अपने मामले की पैरवी सही तरीके से नहीं कर पायेंगे। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें उपभोक्ता अदालतों से उपभोक्ताओं को पूरा न्याय मिला है लेकिन आपसे यह अपेक्षा तो होती ही है कि आप अपनी बात अथवा दावे के समर्थन में पर्याप्त सबूत तो पेश करें। उपभोक्ता अदालतों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इनमें लंबी-चौड़ी अदालती कार्रवाई में पड़े बिना ही आसानी से शिकायत दर्ज करायी जा सकती है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2022-12-23 18:22:04
भारतीय राजनीति के भीष्म : अटल, सदैव अटल...

एनके मुरलीधर

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने के आदर्श को जीने वाले महानायक एवं शासन में सुशासन के प्रेरक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर को भारत सरकार प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाती है। भारतीय राजनीति के महानायक, अजातशत्रु, हिंदी कवि, पत्रकार, प्रखर वक्ता एवं भारतीय जनता पार्टी के 96 वर्षीय दिग्गज नेता, अटल विहारी वाजपेयी ने न केवल देश के लोगों का दिल जीता है, बल्कि विरोधियों के दिल में भी जगह बनाकर, अमिट यादों को जन-जन के हृदय में स्थापित कर हमसे जुदा हुए थे। 

उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे। वहीं शिंदे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटलजी का जन्म हुआ था। महात्मा रामचंद्र वीर द्वारा रचित अमर कृति विजय पताका पढ़कर अटलजी के जीवन की दिशा ही बदल गयी। छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही, साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलतापूर्वक करते रहे। अटलजी ने किशोर वय में ही एक अद्भुत कविता लिखी थी- हिंदू तन-मन हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय, जिससे यह पता चलता है कि बचपन से ही उनका रुझान देश हित, राष्ट्रीयता एवं हिंदुत्व की तरफ था। 

राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता, जिजीविषा, व्यापक दृष्टि आद्योपांत प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियां, राष्ट्रव्यापी आंदोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति से जुड़े विचार उनके काव्य में सदैव ही दिखाई देते थे। अटल विहारी वाजपेयी ने पांच दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, केंद्रीय विदेश मंत्री व प्रधानमंत्री- पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे, अनूठे रहे। घाल-मेल से दूर। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। भारत सरकार ने सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से उनको अलंकृत किया।  वाजपेयी बेहद नम्र इंसान थे और वह अंहकार से कोसों दूर थे। उनके प्रभावी एवं बेवाक व्यक्तित्व से पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू भी प्रभावित थे और उन्होंने कहा था कि अटलजी एक दिन भारत के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। 

आज भारतीय जनता पार्टी की मजबूती का जो धरातल बना है, वह उन्हीं की देन है। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वे इसे अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताते थे। 1980 में वे भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे। वे नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक। 1962 से 1967 और 1986 में वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वे संसद में बहुत प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं और महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके भाषण खासे गौर से सुने जाते रहे हैं, जो भारत के संसदीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है। 

अटल विहारी वाजपेयी 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वे लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साझा घोषणापत्र पर लड़े गये और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। एनडीए का नेतृत्व करते हुए मार्च 1998 से मई 2004 तक, छह साल भारत के प्रधानमंत्री रहे। 

इस दौरान उनकी सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ़ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाये गये लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊचाइयों को छुआ। उन्होंने पडौसी देश पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सौहार्दपूर्ण बनाने की दृष्टि से भी अनेक उपक्रम किये। 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। कुछ ही समय पश्चात पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया।  

दुनिया के सबसे बड़ी सड़क परियोजना स्वर्णिम चर्तुभुज का निर्माण कर पूरे देश को एक विश्व स्तरीय सड़क से जोड़ने का काम किया। आज वह सड़क देश के विकास में अहम भूमिका निभा रही है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से देश के पांच लाख गांवों के विकास को मानों पंखअटल विहारी वाजपेयी चाहे प्रधानमन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष- बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की, नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटलजी कभी नहीं चूके।

Published / 2022-12-20 22:43:46
सोलर एनर्जी से जगमगाता भारत का गांव

विनायक चटर्जी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गुजरात के मेहसाणा जिले के मोढेरा गांव में 8,000 लोग रहते हैं। यह गांव पुष्पावती नदी के किनारे बसा हुआ है। अहमदाबाद से सड़क मार्ग के जरिये दो घंटे से कम समय में इस गांव तक पहुंचा जा सकता है। अभी तक यह गांव नामचीन सूर्य मंदिर के लिए जाना जाता था। इस मंदिर को चालुक्य राजाओं ने बनाया था। अब यह भारत के पहले सौर ऊर्जा गांव के रूप में प्रसिद्ध है। यह कोई संयोग नहीं है कि सूर्य देव के मंदिर वाले इस गांव ने यह तमगा हासिल किया है।

गुजरात पावर कॉरपोरेशन ने सूर्य ग्राम परियोजना के तहत गांव के सभी घरों में नि:शुल्क सौर ऊर्जा रूफ टॉप सिस्टम स्थापित किए। बीईएसएस ने मोढेरा से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुजानपुरा गांव में 15 मेगावॉट आवर की बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली के साथ 6 मेगावॉट का ग्राउंड माउंटेड सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया।

मोढेरा के 1,400 घरों की छतों पर 1 किलोवॉट आवर के सौर पैनल स्थापित किये गये हैं। गांव के सभी सार्वजनिक व शिक्षण संस्थानों की इमारतों जैसे बस स्टैंड, पुलिस स्टेशन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और पंचायत कार्यालय में भी सौर ऊर्जा संयंत्र लगाये गये हैं। गांव में विद्युत वाहनों के चार्जिंग स्टेशन भी हैं। सौर ऊर्जा से गोधूलिका के समय सूर्य मंदिर भी जगमगाता है। दिन में मोढेरा की ऊर्जा की पूरी मांग सौरऊर्जा परियोजना से पूरी हो जाती है। रात में बीईएसएस से बिजली की आपूर्ति की जाती है।

गांव में एक दिन में सौर ऊर्जा से औसतन 30,000 यूनिट बिजली तैयार होती है। इसमें से 5,500 यूनिट का इस्तेमाल दिन में होता है और 6,000 यूनिट बीईएसएस में रखी जाती है। अतिरिक्त यूनिट बिजली की आपूर्ति रोजाना राज्य के ग्रिड को कर दी जाती है। गांव के बाशिंदों ने पुष्टि की कि उनके बिजली बिल में भारी कटौती हुई है। आमतौर पर प्रति माह 3,000 रुपये का बिजली बिल अदा करने वाले घर को अब 1,000 रुपये प्रति माह अदा करने की जरूरत है। गांव के लोग अब अधिक बिजली के उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को आरामदायक बना रहे हैं। 

इस तरह मोढेरा न केवल नेट जीरो समुदाय बन गया है बल्कि यह हरित ऊर्जा के ग्रिड का आपूर्तिकर्ता भी बन गया है। मोढेरा ने मिसाल पेश की है। लेकिन यह याद रखना होगा कि सौर ऊर्जा नि:शुल्क नहीं है। इसके लिए कीमत केंद्र और राज्य सरकार ने अदा की है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 81 करोड़ रुपये है। लिहाजा यह स्पष्ट रूप से भारत के सभी छह लाख से अधिक गांवों के लिए संभव नहीं है।

 असलियत यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर घरों की छतों पर सौर ऊर्जा के पैनल लगने का क्रियान्वयन भी कम रहा है जो निराशाजनक है। हालांकि जनवरी 2010 से सौर ऊर्जा का राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन लागू होने के बाद भी सौर ऊर्जा की वृद्धि तेजी से हो रही है। साल 2021-22 तक 20 गीगा वॉट सौर ऊर्जा को ग्रिड से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

हालांकि 2015 में इस लक्ष्य की पुनर्समीक्षा कर 100 गीगावॉट कर दिया गया था। इसमें से 40 गीगावॉट रूफ टॉप फोटोवॉलटिक (आरटीपीवी) से प्राप्त की जानी थी। शेष 60 वॉट यूटिलिटी-स्केल परियोजनाओं से प्राप्त होनी थी। हालांकि निराशाजनक यह रहा कि वित्त वर्ष 22 तक आरटीपीवी से नाममात्र की 11.8 गीगावॉट की क्षमता प्राप्त हुई।

आरपीटीवी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए अतिरिक्त जमीन पर पूंजीगत व्यय की आवश्यकता नहीं होती है। उपभोक्ता अपने आवासीय परिसर का इस्तेमाल कर बिजली पैदा कर सकता है। इस तरह उपभोक्ता ही स्वयं निमार्ता व ग्राहक प्रोज्यूमर बन जाता है। हालांकि घरेलू उपभोक्ता कई कारणों से आरटीपीवी निवेश से दूरी बनाकर रखते हैं।

इसका एक कारण संयंत्र को लगाने की लागत और उसके लिए वित्तीय संसाधन जुटाने की असमर्थता है। इसके अलावा खुदरा स्तर पर घरों में कम बिजली उपयोग करने वालों के लिए नि:शुल्क / अत्यधिक रियायत उपलब्ध होना है। इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती किराये का घर होता है। दूसरी तरफ रूफ टॉप परियोजना के डेवलपर के लिए छोटे आवासीय उपभोक्ताओं की मांग को पूरा करना महंगा सौदा साबित होता है। ऐसे में संयंत्र लगाने वाले एजेंटों को बिक्री चक्र को बंद करने में लंबी अवधि, कई स्थानों पर डिस्कॉम की अनुमति मिलने में होने वाली परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

डिस्कॉम छतों से सौर ऊर्जा के जरिये बिजली उत्पादन को हतोत्साहित करती हैं। डिस्कॉम नियम व विनियम को बदलने से परहेज कर लॉबिंग करती हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि छतों से तैयार सौर ऊर्जा की बिक्री ग्रिड को होती है और डिस्कॉम को नकदी अदा करने वाले ग्राहकों को भी खोना पड़ता है। जैसे उदाहरण के तौर पर ज्यादातर राज्यों ने मीटर वाले उपभोक्ताओं के लिए आरटीपीवी की क्षमता के आकार को अब सीमित कर दिया है।

ज्यादातर राज्यों में अब इस तरीके से तैयार होने वाले सिस्टम को 500 किलोवॉट से कम पर सीमित कर दिया गया है। ऐसे में बड़ी छत वाले वाणिज्यिक व संस्थान वाले उपभोक्ता जो बड़े संयंत्र लगा सकने में समर्थ हों, उन पर सीमाएं लगा दी गई हैं। आरटीपीवी को ट्रांसमिशन इंटरकनेक्शन के लिए कम निवेश की जरूरत होती है लेकिन इसमें डिस्कॉम की रुचि नहीं है। आरटीपीवी का अनुपात अच्छा होने पर स्थानीय ग्रिड को समुचित व स्थिर ढंग से आपूर्ति हो सकती है। 

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने आवासीय क्षेत्रों में आरटीपीवी बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राजकोषीय सह प्रोत्साहन पैकेज तैयार किया गया था। परियोजना के आकार के आधार पर एक ग्रेडेड योजना के अंतर्गत स्थानीय उपभोक्ताओं को केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसके तहत तीन किलोवॉट तक की परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 40 फीसदी तक और 3 से 10 किलोवॉट के बीच की परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 20 प्रतिशत तक का अग्रिम पूंजी अनुदान शामिल है। इसके अलावा डिस्कॉम को प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है। यह प्रोत्साहन राशि मुख्य रूप से डिस्कॉम द्वारा सहायक बुनियादी ढांचा प्रदान करने, डिस्कॉम कर्मचारियों की क्षमता निर्माण, अतिरिक्त मानवशक्ति और उपभोक्ता जागरूकता पैदा करने के किये गये अतिरिक्त व्यय की प्रतिपूर्ति करने के लिए है।

मोढेरा ने गांवों में आम भारतीयों के जीवन में संभावित परिवर्तन को स्पष्ट रूप से कर दिखाया है। वैश्विक स्तर पर आरटीपीवी को गरीबी उन्मूलन के एक साधन के रूप में मान्यता दी गयी है। यह घरों पर पड़ने वाली धूप से नि:शुल्क कमाई करता है और ग्रीन डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के रूप में कार्य करता है। आदर्श रूप से यह आंदोलन भारत के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों तक फैल जाना चाहिए। एक नई योजना तैयार किए जाने की आवश्यकता है जो अब तक की सभी जानकारियों पर आधारित हो। 

इसे व्यावहारिक तरीके से विद्युत और जल के कनेक्शनों की तरह इस मौद्रिक कमाई और गरीबी उन्मूलन के अवसर को पूर्ण शक्ति के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए। तभी भारत का हरेक गांव सूर्य गांव बन पायेगा।

Published / 2022-12-20 20:36:52
आखिर बच्चों की सुरक्षा में भूल कहां...

सुप्रिया नामदेव

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। रफ्तार, स्पीड, गति ये कुछ नाम हैं आज के मेरे विषय के। जीवन में रफ्तार का होना, हमारे प्रगतिशील होने का सूचक है। आदिकाल में मनुष्य पैदल चलता था। अपनी रफ्तार बढ़ाने के लिए घोड़े, हाथी, ऊंट, बैलगाड़ी का इस्तेमाल करने लगा। कुछ और तरक्की की और मशीनों का अविष्कार किया। आधुनिक वाहन बनाये। कई कई दिनों के बल्कि कई बार महीनों के लगने वाले यात्रा समय को चंद घंटों तक मे सीमित कर दिया। ये मनुष्य ने अपनी जीवन यात्रा को आरामदायक बनाने के लिए किया। जरूरी था। सही था। फिर गलती कहां हुई? 

चलिये, अब सिक्के के दूसरे पहलू पर चलते हैं। मैं एक मां हूं। बेटा छोटा था, 3 पहियों वाली साइकिल घर में चलाया करता था। कमरा छोटा लगने लगा तो आंगन में आ गया। थोड़ा समझदार हुआ तो 2 पहियों वाली साइकिल दिला दी गयी। आंगन से निकल कर कॉलोनी की गली में चलाने लगा। अपने बेटे की सफलता पर खुश हो रही थी मैं। पल भर भी आंखों से दूर नहीं होने देती थीं। मां हूं ना, मन घबराता था।  फिर भी घर की छत पर खड़ी हो कर दूर तक उसको सही सलामत जाते हुए देखती रहती थी। जब तक घर नहीं आ जाता, मन विचलित सा होता रहता था। ट्यूशन की टीचर को फोन कर के पुछ लेती थी। वो भी मेरे मन की दशा समझती थी, शायद। वो भी मां थी। समस्या तो अब आयी जब बेटा कॉलेज जाने लगा। किशोर वय में आधुनिक गाड़ियों को देख कर उसका भी मन ललचाने लगा अच्छे माता पिता काफर्ज निभाते हुए उसे एक अच्छी स्कूटर दिलाई गयी। अब वो पलक झपकते ही कॉलोनी की गली से निकल कर, बड़ी सड़क पर तेजी से भीड़ में गुम हो जाता है। छत पर खड़ी हो कर भी ज्यादा दूर तक नहीं देख पाती हूँ। छटपटाती हूं। कोई तो मां होगी, जो आगे के रास्ते पर उसका खयाल रख रही होगी। क्या इस समस्या को केवल मैं ही अनुभव कर रही हूं या हर मां अपने बच्चों को भगवान के भरोसे इस अंधी रफ्तार की भीड़ में भेज रही हैं? 

हमने अपने बच्चे को सारे नियम कायदे सिखाये हैं। वो उनका पालन भी करता है। मगर जिनके पास तेज रफ्तार वाहन है वो कभी कभी इन नियमों का और कायदों का पालन चाह कर भी नहीं कर पाते। कंही उनकी गलती की सजा हमारे बच्चे को ना झेलनी पडे, ये सोच कर मन अशांत हो जाता हैं। जब भी कभी कोई अनजान बच्चा गलती करता  है तो मैं उसे अपना जान कर सही गलत समझाने लगती हूं। इसी उम्मीद में कई यदि कभी मेरा बच्चा कोई गलती करें तो कोई दूसरी मां उसे सही राह दिखा दे।  आज उच्च शिक्षा के लिए बच्चे दूसरे बड़े शहरों में और दूसरे देशों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। वहां मैं, कैसे अपने बच्चे की सलामती रखूंगी? क्या वहां की मम्मियां, मेरा साथ देंगी, उनकी इस रफ्तार को नियंत्रित करने में? 

इस पूरे लेख में मैने अब तक माताओ को ही सम्मिलित किया है। क्या कोई पिता अपने बच्चों को सुरक्षित नही देखना चाहता होगा? क्या उसको अपने बच्चों की फिकर नही होती होगी? और यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है तो क्यों इतनी रफ्तार हम बना रहे है? कुछ पल में ही 100 किमी की रफ्तार और शायद इससे भी ज्यादा। इन वाहनों को बनाने वाली ंआॅटो और बाईक कंपनियां नए नए मॉडल बना कर आये गए तेज गति की गाड़ियां बाजार में ला रही है। फलां गाड़ी की रफ्तार से कई गुना तेज रफ़्तार वाली गाड़ियों के बारे में सुनकर नई  पीढ़ी अकर्षित हो रही है।  अपने घर वालों से साम, दाम , दंड , भेद, कोई भी नीति अपना कर उस वहन को प्रप्त भी कर लेती है। मेरा सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि उस वाहन की तेज गति का, परीक्षण क्या उस भीड़ भाड़ वाली बड़ी सड़क पर किया गया था... जहां हमारे बच्चों को रोजाना गाड़ी चलानी है? उन ऊंची नीची, टेढी मेढ़ी, गड्डो से भरी, अतिक्रमण से पटी और जहां सुरक्षा के नाम पर की गई चालाकियां हैं। जवाब है, नहीं। 

इन तेज रफ्तार गाड़ियों की रफ्तार मापने के लिए कम्पनियां किसी सुनसान इलाके की, हवाईजहाज के रन वे की, किसी बड़े नेशनल हाईवे की, सीधी, चिकनी, रोशनी से भरी और पूरे सुरक्षा उपकरणों की देख रेख में, पल दो पल के लिए उस रफ्तार को माप कर, उस आंकड़े को भुनाती हैं। वो रफ्तार हमारे पूरे जीवन काल में हमें कभी काम नहीं आतीं। बल्कि अब तक वह अंधी रफ्तार ना जाने कितने ही मासूम, उत्साहित और झूठी चकाचौंध में आकर्षित बच्चों का जीवन समाप्त कर चुकी हैं। रफ्तार को नियंत्रित करने के लिए दूसरे उपकरण लगाये जाते हैं। पर मनुष्य इस तेज रफ्तार का इतना दीवाना हो जाता है के ये जानते हुए भी की इस रफ्तार से जान को खतरा है, वो अपनी रफ्तार धीमी ही नहीं करना चाहता। क्या सिर्फ इस लालच के लिए पूरा दोष ग्राहक के सर मढ़ देना उचित होगा? हमारे बड़े बुजुर्ग हमेशा अपने अनुभवों से यही समझाते आये हैं कि, अति हमेशा बुरी होती हैं। हर वो चीज जो जरूरत से ज्यादा हो वो खतरनाक है। आटोमोबाइल कम्पनियां जो नयी नयी, तेज रफ्तार बना रहे हैं, वो भी अपने बच्चों को एक तरह से संकट में ही डाल रहे हैं। क्या जरूरत है ऐसी रफ्तार की? हम अपने ही बच्चों को खतरनाक, जानलेवा बारूद के ढेर पर बैढाने को आधुनिकीकरण क्यों समझ रहे हैं?

उनको एक सीमित और सुरक्षित रफ्तार का सही इस्तेमाल करना सिखाया जा सकता है। उनको 10 मिनट जल्दी घर से निकल कर धीरे धीरे और सफर का मजा लेते हुए चलना सिखाया जाये। एक ही जगह जाने के लिए अलग-अलग वाहनों पर जाने के बजाय मिल जुल कर एक ही वाहन को शेयर करना सिखाया जाये। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना सिखाया जाए। इससे एक दूसरे की सुरक्षा और साथ का मजा भी मिलने लगेगा और माता पिता को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। क्या आप मेरे इस विचार से सहमत हैं?

Published / 2022-12-18 18:59:12
कोई नया नहीं है समाज और सिनेमा का "बेशर्म रंग"

सुशील शर्मा

एबीएन डेस्क। देश में शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण पर केंद्रित फिल्म पठान के गीत बेशर्म रंग के रिलीज होते ही बवंडर आ गया है। इस गीत को भद्दा और अश्लील कहकर निशाने पर लिया गया है। पठान पर प्रतिबंध लगाने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। आधुनिकता की चादर ओढ़ चुका समाज का एक तबका आक्रामक है। सच तो यह है कि फिल्मों और धारावाहिकों में अश्लीलता परोसने का सिलसिला पुराना है। यह धारणा स्थापित की गई है कि सिनेमा अपने दौर के समाज का आईना होता है। और इसी अवधारणा के नाम पर विज्ञापनों तक में नीली फंतासियां तारी हो रही है।

मनोरंजन का यह संसार भी निराला है। अश्लील और द्विअर्थी संवादों को सफलता की गारंटी माना जा रहा है। इनको इससे मतलब नहीं कि यह सब समाज पर कितना दुष्प्रभाव डालता है। इसकी बानगी देखिये यौवन की दहलीज पर पैर रखते ही किशोरियां उन्मुक्त होकर आसमान में उड़ने लगती हैं। फिल्मों की नीली दुनिया का यह असर युवा पीढ़ी को अनैतिक भावनाओं की अंधी सुरंग में ले जा रहा है। बढ़ते यौन अपराध इसकी तसदीक करते हैं। सहजीवन की अवधारणा में हुआ श्रद्धा हत्याकांड इसकी पराकाष्ठा है।

हर कोई जानता है कि जिस्म दिखाऊ वस्त्र पहनने की शिक्षा न ही कोई माता-पिता अपने बच्चों को देता है और न ही कोई गुरु अपने शिष्य को। तब सवाल उठता है कि फिर समाज का परिदृश्य क्यों बिगड़ रहा है। इसका जवाब बहुत तक साफ है। इसके लिए बहुत हद तक बड़ा और छोटा परदा जिम्मेदार हैं। फिल्म पठान का बेशर्म रंग सोशल मीडिया में लोक-लाज की परिधि को लांघकर पसंद (लाइक्स) का रिकार्ड तोड़ने की ओर बढ़ रहा है। ऐसी फिल्मों पर सेंसर बोर्ड को गंभीर होने की जरूरत है। अश्लीलता का यह व्यापार बंद होना चाहिए।

समाज का एक हिस्सा सिनेमा और रंगमंच से उम्मीद करता है कि वह कुरीतियों के उन्मूलन में योगदान देगा। हालांकि समाज सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में भारतीय फिल्मों ने योगदान दिया भी है पर पिछले दो दशकों में इसके प्रति अपेक्षाओं को धक्का लगा है। द्विअर्थी संवाद से अश्लीलता परोसती फिल्मों से सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण हुआ है। इसके बाद आया छोटा परदा। शुरू में इसने पारिवारिक समस्याओं और रिश्तों में उलझन सुलझाने में सकारात्मक भूमिका निभाई। यह सब करते-करते यह भी अश्लीलता में कब तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला। परिवारिक धारावाहिकों में नायक-नायिकाओं के निजी पलों का प्रदर्शन तो इस समय अनिवार्य सा हो गया है। सौभाग्य से जिस परदे को समाज सुधार के एक बड़े रहनुमा के तौर पर देखा गया, अब वही पथभ्रष्ट हो गया है।

हालांकि इस संबंध में भारतीय दंड संहिता में साफ है। समाज पर गलत असर डालने पर इसमें कठोर दंड का प्रावधान है। इस संहिता की धारा 292 कहती है कि कोई भी व्यक्ति अश्लील वस्तु जैसे-पुस्तक, कागज, रेखाचित्र, रंगचित्र, आकृति, मूर्ति आदि को नहीं बेच सकता। न ही किराये पर दे सकता है, न ही वितरण कर सकता है, न ही लोक प्रदर्शित कर सकता है। अश्लील विज्ञापन को जानबूझकर पोस्ट नहीं कर सकता। न ही अश्लील माइक्रो वीडियो या फिल्म बना सकता है। इस धारा को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि ऐसा करने वाला व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत दोषी होगा। कुछ दिन पहले चर्चित मॉडल उर्फी जावेद के खिलाफ अश्लीलता फैलाने के आरोप में मुंबई में शिकायत दर्ज हुई है। अपनी शिकायत में एडवोकेट अली काशिफ खान ने आरोप लगाया है कि उर्फी जावेद अपनी पोशाक से सार्वजनिक स्थान और सोशल मीडिया पर कथित तौर पर अश्लीलता फैलाती हैं।

अब देखना बाकी है कि इस पर क्या होता है। यह सबको पता है कि भारत में अश्लीलता अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 292, 293 और 294 के तहत अश्लीलता फैलाने पर सजा हो सकती है। दोषी पाये जाने पर दो साल की सजा का प्रावधान है। अच्छी बात यह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे पर बेहद संजीदा हैं। वह बेशर्म रंग की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। पिछले साल भोजपुरी फिल्मों में दिखाये गये दृश्यों और गानों के सहारे फैलाई जा रही अश्लीलता पर कड़ा रुख अपना चुके हैं। वो ऐसी फिल्मों को अनुदान को देने से इनकार कर कड़ा संदेश दे चुके हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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