विचार

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Published / 2023-01-04 20:57:04
राहुल की भारत जोड़ो यात्रा के हर कदम पर नफरत के बीज

सुरेश हिन्दुस्थानी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह यात्रा नफरत नहीं सद्भाव के लिए है, लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस के लिए अब सद्भाव की बातें केवल नारा ही बनकर रह गई हैं। यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, ठीक वैसे ही यात्रा का उद्देश्य भी सामने आता जा रहा है। हालांकि यात्रा के प्रथम दिन से ही ऐसे लोगों को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है, जो किसी न किसी रूप में देश की संस्कृति के लिए विरोधात्मक रवैया अपनाते रहे हैं। 

भारत जोड़ो यात्रा में कभी देश तोड़ने के समर्थक शामिल होते हैं, तो कभी वामपंथी एजेंडा के तहत राजनीति करने वाले राहुल गांधी के साथ चलते दिखाई देते हैं। जहां तक सद्भाव की बात है तो यह शब्द भारत के लिए नया नहीं है और न ही इसे कांग्रेस की उपज कहा जा सकता है। लेकिन यह भी सत्य है कि कांग्रेस ने अपनी नीतियों के माध्यम से हमेशा हिन्दू समाज मानबिंदुओं पर कुठाराघात ही किया है, चाहे वह राम मंदिर का मामला हो या फिर सांप्रदायिक हिंसा अधिनियम प्रस्ताव, यह दोनों ही हिंदुओं की भावनाओं का कुचलने का एक दुस्साहसिक प्रयास ही था।
हम भली भांति जानते हैं कि भारत की संस्कृति कभी भी नफरत के वातावरण का समर्थन करने वाली नहीं रही, इसलिए सवाल यह है कि देश में नफरत के भाव का बीजारोपण किसने किया। क्या इसके लिए लंबे समय तक राज करने वाली कांग्रेस की सत्ता जिम्मेदार नहीं है? क्या टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने में कांग्रेस नेताओं की भूमिका नहीं रही? इसमें तो स्वयं राहुल गांधी ही उनका समर्थन करने पहुंचे थे। 

इन बातों से लगता है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है। वे बात कुछ और करते हैं, लेकिन उनकी बातों का असर उनकी कार्यशैली में दिखाई नहीं देता। वर्तमान में राहुल गांधी की केवल एक ही शैली दिखाई देती है, वह है केवल देश को नीचा दिखाने की शैली। सांप्रदायिक सद्भाव तो भारत का मूल है, लेकिन राहुल गांधी को आज यह बात समझ में आई है। लेकिन इसके बाद भी सवाल यह आता है कि उनकी यात्रा में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाले नेता या अन्य व्यक्ति क्यों शामिल हो रहे हैं? क्या इससे कांग्रेस के चरित्र का पता नहीं चलता? अगर कांग्रेस नेता वास्तव में सद्भाव के वातावरण का उत्थान चाहते हैं तो इसमें नफरत फैलाने वाले लोगों को शामिल नहीं करना चाहिए था। 

कांग्रेस को चाहिए कि वह अपनी यात्रा में ऐसे लोगों को शामिल करने का प्रयास करे, जिनकी पहचान शांति स्थापित करने वाली रही हो। ऐसे प्रयासों के लिए राजनीतिक विचार को तिलांजलि देना पड़े तो दे देना चाहिए। क्योंकि राजनीतिक विचार ही नफरत की भावना को बढ़ावा देने का कार्य करता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कांग्रेस नेताओं के मन में वर्तमान केंद्र सरकार के प्रति द्वेष भाव भरा हुआ है। द्वेष भाव को धारण करने वाला व्यक्ति कभी भी सद्भाव नहीं ला सकता। देश भावना यही कहती है कि हम अच्छी बातों का दिल खोलकर स्वागत करें और भारतीय संस्कृति के विरोध में उठने वाले हर कदम का विरोध करें। कांग्रेस की अवधारणा के बारे में कुछ लोगों में यह सवाल उठता है कि कांग्रेस ईसाई और मुसलमानों के बारे कभी विरोधात्मक शैली नहीं अपनाती। इनके गलत कामों पर भी कांग्रेस के नेता मौन साध लेते हैं। 

हो सकता है कि यह सहजता में होता हो, लेकिन जितने मुंह उतनी बातें तो होती ही हैं। अभी यात्रा के बारे में भी यह सवाल उठने लगा है कि कांग्रेस ने इसी समय भारत जोड़ो यात्रा को विराम क्यों दिया है? कहने वाले तो यहां तक कहने लगे हैं कि यह यात्रा केवल क्रिसमस और अंग्रेजी नया साल मनाने में कोई व्यवधान न हो, इसलिए ही रोकी गई है। यह सभी जानते हैं कि अंग्रेजी नव वर्ष प्राकृतिक त्योहार नहीं है और न ही इसका प्रकृति से कोई संबंध ही है, फिर क्यों इसको बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। यह भी सर्वविदित ही है कि हम प्रकृति का साथ देंगे तो प्रकृति भी हमारा साथ देगी। 

आज समाज का बहुत बड़ा वर्ग यह कहने का साहस जुटाने लगा कि एक जनवरी वाला नव वर्ष भारत का नहीं है। लेकिन कांग्रेस के नेता इस भारतीय धारणा को बदलने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी अगर अपने आपको हिंदू मानते हैं तो उन्हें हिन्दू होने का परिचय अपनी कृति से देना ही होगा। अगर ऐसा होगा तो वह सांप्रदायिक सद्भाव को सही मायने में समझने लगेंगे। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा निसंदेह एक तपस्या है। देश में एकता स्थापित करने के लिए ऐसी यात्राएं पहले भी हो चुकी हैं। आद्य शंकराचार्य ने भी भारत में सांस्कृतिक ज्ञान का संदेश प्रवाहित करने के लिए ऐसी ही यात्रा की थी। हम तो चाहते हैं कि राहुल गांधी अपनी यात्रा के माध्यम से देश को मजबूत करने का कार्य करें, लेकिन ऐसी यात्राओं के लिए निकलने से पहले मन में विरक्ति का भाव भी होना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी के मन में चल रहे विचारों को देखकर ऐसा लगता नहीं है कि उनके स्वभाव में विरक्ति है। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान महाराष्ट्र में वीर सावरकर का उल्लेख करते समय नफरत का ही परिचय दिया। इसलिए कहा जा सकता है कि जब नफरत के बीजों का अंकुरण उनके मन में ही हो रहा है तो सद्भाव के फूल कैसे खिलेंगे। 

कांग्रेस नेताओं के मन में जब तक ऐसा भाव रहेगा, तब तक कितनी भी यात्राएं निकाल लें, वे देश का मन नहीं जीत सकते। देश का मन जीतने के लिए भारत की संस्कृति को मन और मस्तिष्क में धारण करना होगा। तभी भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य सफल होगा। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2023-01-04 20:54:02
दो गज की दूरी, मास्क जरूरी

ऋतुपर्ण दवे

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनिया एक बार फिर कोरोना की दहशत में है। नए वेरिएंट बीएफ.7 की तबाही का मंजर डरावना है। सबसे ज्यादा खौफ चीन से आ रही तस्वीरों और वीडियो ने है। चीन की विफल जीरो कोविड पॉलिसी से सारी दुनिया में एक बार फिर गुस्सा और नफरत है। व्यापार को बढ़ाने के लिए हल्के-फुल्के, बेअसर और सस्ते उत्पादों को बनाकर इंसानियत को भी नहीं बख्शने वाले चीन ने जिस तेजी से पहले 6 वैक्सीन बनाकर खूब वाहवाही लूटी बाद में इनके धड़ाधड़ बेअसर होने की सच्चाई ने दुनिया को हैरान और परेशान कर दिया है। 

जल्दबाजी में बनी चीन की वैक्सीन जिफिवैक्स, कॉन्विडेसिया, कॉनवेक, कोविलो, वेरो सेल और कोरोनावैक दुनिया में खूब बिकी। जब ये वैसा असर नहीं दिखा पाईं तो हो हल्ला मचा। सच तो यह है कि चीन खुद अपने हल्के और घटिया उत्पादों को लेकर न केवल घिर गया बल्कि सकते में है। सबसे ज्यादा बेअसर दो वैक्सीन कोविलो और वोरो सेल रहीं। इसे एक ही कंपनी सिनोफॉर्म ने बनाया था। जीरो कोविड पॉलिसी के चलते लगातार लॉकडाउन जैसी तानाशाही भरी चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिन की सख्ती ने वहां गृह युद्ध जैसे हालात बना दिए। महीनों से घरों में कैद लोगों के सब्र का बांध भी टूटा। मौत का मंजर और लाशों का ढेर अब चीन छुपा नहीं पा रहा। वैसे चीन अपनी करतूतों को छुपाने और सच को बाहर न आने देने के लिए पहले से ही दुनिया में बदनाम है। उसने कोरोना जैसे मामलों पर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन तक को गच्चा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

साल के आखिरी दिन भी डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अदनोन गेब्रेयेसस ने चीन को फटकारते हुए सच्चाई साझा करने और भारत से सीख लेने की नसीहत दी। वुहान से निकले चीनी शैतान के इलाज की खातिर उसकी वैक्सीन के खरीदार देश बेचैन हैं। इस बीच चीन का यह अहम भी टूटा है कि कोरोना फैलाना और काबू करना उसके लिए चुटकियों का खेल है। भारत पहले भी सतर्क था और अब भी है। तब और अब में फर्क इतना है कि महामारी का खौफनाक मंजर और मौतों के सच से सीख लेकर इस बार वैसा कुछ नहीं होने देने की कवायद है जो घट चुका है। कोरोना से दुनिया भर में बीते 26 महीनों के दौरान करीब साढ़े 57 लाख लोगों की जान गई है। 

चंद आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका में 9,24,530, ब्राजील में 6,31,069, भारत में 5,30,702, रूस में 3,34,753, मैक्सिको में 3,08,829, पेरू में 2,06,646, यूके में 1,57,984, इटली में 1,48,167, इंडोनेशिया में 1,44,453, ईरान में 1,32,681 लोग जान गंवा चुके हैं। अभी भारत में दैनिक संक्रमण दर करीब 0.17 प्रतिशत है। साल के आखिरी दिन 1,57,671 टेस्ट किए गए। नए साल की शुरुआत के साथ ही भारत में ओमिक्रोन के नए सब वेरिएंट एक्सबीबी.1.5 के मिलने से चिंता बढ़ गई है। पहला मामला गुजरात में मिला है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी सीडीएस के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका भर में इसके 40 प्रतिशत से ज्यादा मामले सामने आए हैं। बहरहाल भारत में नए साल की सुबह तक कोरोना के 265 मामले सामने आए और सक्रिय मामलों की संख्या 3,653 रही। 

विदेशी हवाई यात्रियों की रैंडम जांच में संक्रमण मिलना और पहले आ चुके कुछ यात्रियों का कोरोना संक्रमित होना चिंताजनक है। शंघाई के देजी अस्पताल का वी चैट मैसेज बताता है कि केवल शहर में बीते हफ्ते 54.3 लाख पॉजिटिव मामले थे। अब यह संख्या सवा करोड़ से ज्यादा पहुंच गई होगी। यही सच छुपाना पहले भी पूरी दुनिया पर भारी पड़ा और दोबारा भारी पड़ने वाला है? ऐसे में पड़ोसी होने के चलते भारत की चिंता जरूरी है। जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका समेत कई देशों में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उच्चस्तरीय बैठक लेना गंभीरता को बताता है। भारत में एक बार फिर एहतियात का दौर शुरू होना तय है। निश्चित रूप से व्यापार जगत चिंतित है। दोबारा मास्क जरूरी होगा, सेनिटाइजर, साबुन से हाथ धोना, सामाजिक दूरी का पालन करना तथा भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचने की एडवायजरी जारी हो सकती है। हालांकि भारत में दोनों खुराक और बूस्टर डोज मिलाकर अब तक 220 करोड़ लोगों का वैक्सीन लेना रहात की बात है। भारत में बीती लहर में तेजी से संक्रमित हो चुके लोगों में हाइब्रिड इम्युनिटी के चलते खतरा कम है लेकिन सतर्कता जरूरी है। 

शायद सारी कवायद इस बार इसी पर ज्यादा है। अब भी कइयों ने बूस्टर डोज नहीं ली है जिसे विशेषज्ञ जरूरी बता रहे हैं। इसलिए क्यों न हम अभी से दो गज की दूरी, मास्क जरूरी पर अमल कर पुराने अनुभवों से कोरोना के लिए खुद ही चुनौती बन जायें। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-01-02 10:06:32
कोरोना की हकीकत : जैसे आयेगा वैसे चला भी जायेगा...

पवन पाण्डेय

एबीएन सेंट्रल डेस्क। क्या विकट शोर था साहब- आ गया रे आ गया! क्या भयानक खौफ था जी-बाप रे बाप यह तो फिर आ गया! यह तो निगल ही जाएगा! चैनल दर चैनल क्या अजब आलम था-आ गया रे, खा गया रे, लील गया रे, डस गया रे! लेकिन वह आया भी और चला भी गया। आया तो खूब शोर-शराबे के साथ था, पर गया ऐसे जैसे कोई दबे पांव निकल जाता है। 

वह आंधी की तरह आया तो जरूर, पर तूफान की तरह नहीं गया। तूफान क्या, हल्का-सा झोंका भी महसूस नहीं हुआ। उसके आने का शोर तो ऐसा था, जैसे कायनात नेस्तनाबूद हो जाएगी, जैसे कहर टूट पड़ेगा। लेकिन उसके जाने का पता ही नहीं चला। वह जो आया था, वह नहीं था, उसका नाम था। वह जो खौफ था, वह उसका नाम था। वह चीन से आ रहा था। लेकिन वह चीनी सेना नहीं थी। उसे तो कूट-पीटकर भगाया जा सकता है। वह कोई चीनी माल भी नहीं था कि उसके बायकाट का आह्वान हो जाता। वह तो कोरोना था। वह पहले भी चीन से ही आया था और पूरी दुनिया में वैसे ही छा गया था, जैसे चीनी माल छाया हुआ है। 

खौफ तो चीनी माल का भी रहता ही है न। पर कोरोना का खौफ तो आखिर कोरोना का ही था। उसके खौफ का क्या मुकाबला साहब! वह तो ऐसा खौफ है कि लोग अपनी सांसें गिनने लगे थे। अपने खोये हुए मास्क ढूंढ़ने लगे थे। अस्पतालों के बिस्तर गिनने लगे थे।

खौफ ऐसा था कि सरकार बैठकें करने लगी। अस्पताल अपने ऑक्सीजन प्लांट दुरुस्त करने लगे और कोविड वार्डों को सजाने लगे। स्वास्थ्य मंत्री ने आगाही जारी कर दी। राहुल गांधी को चिट्ठी लिख दी कि भाई अपनी यात्रा छोड़ो और घर जाओ, देखो कोराना आ रहा है। सर्दी-गर्मी जब ज्यादा सताने लगे तो बच्चे भी अपना खेल का मैदान छोड़कर घर चले जाते हैं। पर बच्चा जिद्दी निकला। मैदान छोड़ने से इनकार ही कर दिया। अकेला चलूंगा, पर चलता रहूंगा। कोरोना से नहीं डरूंगा। नफरत के बाजार में मैं तो अपनी प्यार की दुकान सजा कर रहूंगा। बस इतने भर से कोरोना का खौफ वैसे ही धराशायी हो गया, जैसे वक्त आने पर तानाशाह का खौफ धराशायी हो जाता है। 

ऐसे में कोरोना बड़ा शर्मसार हुआ होगा। उसे डूब मरने की लानत तो नहीं दी जा सकती, क्योंकि आखिर तो वह महामारी है। जब सौ साल पुरानी महामारियों का खौफ अभी तक बना हुआ है तो वह कहां डूब कर मरने वाला है। वैसे भी वह मारने वाला ठहरा। अलबत्ता एक दिन तो मारने वाले भी मरते ही हैं। कोरोना को मारने की वैक्सीन मिल भी गयी और अभी और भी मिल ही जाएगी। फिर भी उससे बचकर रहने में ही भलाई है। वो क्या कहते हैं बचाव में ही बचाव है।

Published / 2023-01-02 09:57:47
मुफ्त राशन और वर्षांत की हकीकत

टीएन नाइनन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सरकार ने कोविड संबंधी कार्यक्रम के तहत नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण योजना को बंद कर दिया और उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के माध्यम से वितरित करने की घोषणा की है। अब तक पी​डीएस के तहत चावल तीन रुपये किलोग्राम, गेहूं दो रुपये किलोग्राम और मोटा अनाज एक रुपये किलोग्राम की दर पर बेचा जाता रहा है। 

इन पर औसतन 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है। यानी यह लगभग मुफ्त बिकता है। इस आवरण के परे देखने पर पता चलता है कि नि:शुल्क या 90 फीसदी स​ब्सिडी के साथ वितरित किये जाने वाले अनाज की कुल मात्रा में कमोबेश 50 फीसदी की कमी आ रही है। केंद्र सरकार के वित्त की बात करें तो इसके आवंटन में काफी कमी आयेगी। नि:शुल्क अनाज की पेशकश करने वाले राज्यों की भी काफी बचत होगी क्योंकि पूरा बिल केंद्र चुका रहा है।

राजकोषीय अनुशासन की बात करें तो जो हो चुका उसका कुछ नहीं किया जा सकता है। केंद्र सरकार की खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी को एक साथ रखकर देखा जाये तो वह जीडीपी का 2.5 फीसदी है। यह स्तर एक दशक पहले भी था। यह आं​शिक तौर पर इसलिए है कि पेट्रोलियम स​​ब्सिडी (जो कुल सब्सिडी बिल का एक तिहाई था) बिल काफी कम हुआ है। ताजा निर्णय के बाद अगले वर्ष खाद्य स​ब्सिडी बिल भी जीडीपी की तुलना में कम होगा। उर्वरक स​ब्सिडी में कमी आयेगी या नहीं यह बात काफी हद तक यूक्रेन में चल रहे युद्ध पर निर्भर करेगी। अनुमान तो यही है कि स​ब्सिडी बिल में काफी कमी आयेगी।

सरकार के निर्णय की बात करें तो दिक्कत राजकोषीय ग​णित में नहीं ब​ल्कि इस बात में है कि यह दो हकीकतों से किस प्रकार निपटता है। एक का संबंध खेती की आ​र्थिकी से है और दूसरे का रिश्ता देश की अ​धिसंख्य कामगार आबादी के आय के स्तर से है। कृ​षि की बात करें तो अ​धिकांश किसानों को उर्वरक पर भारी स​ब्सिडी, नि:शुल्क पानी और बिजली आदि मिलते हैं। भारत कृ​षि के मामले में दुनिया में सबसे कम मेहनताना देने वाले देशों में शामिल है। इसका भी फायदा मिलता है। 

कुछ सर्वा​धिक महत्त्वपूर्ण फसलों के लिए किसानों को खरीदार और मूल्य की गारंटी भी मिलती है। ऐसे में खेती से जुड़ा स्वा​भाविक जो​खिम अपने आप समाप्त हो जाता है। इसका नतीजा यह है कि महंगे और किफायती कच्चे माल के इस्तेमाल में किफायत बरतने को खास प्रोत्साहन नहीं मिलता। कई फसलों की बात करें तो उनकी उत्पादकता अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी कम है। थोक स​ब्सिडी के कारण एक ऐसा क्षेत्र व्यवहार्य नहीं बन पा रहा है जो बहुत कम वेतन स्तर पर देश के आधे रोजगार मुहैया कराता है।

आय के स्तर की बात करें तो असंगठित क्षेत्र के जो 27.7 करोड़ श्रमिक सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत हैं, उनमें से 94 प्रतिशत की मासिक आय 10,000 रुपये से कम है। बमु​श्किल 1.5 फीसदी की मासिक आय 15,000 रुपये प्रति माह से अ​धिक है। देश की कुल श्रम श​क्ति में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत है। इनमें से दो-तिहाई कृ​षि कार्य में संलग्न हैं। वहीं सर्वे बताते हैं कि आय का स्तर गैर कृ​षि आय के स्तर के ए​क चौथाई के बराबर है। 

हकीकत में देखें तो मुद्रास्फीति समायोजित कृ​षि वेतन भत्ते बीते पांच वर्षों में काफी कम हुए हैं। मेहनताने का स्तर एक स्वघो​षित आंकड़ा होता है जो बीते चार दशकों में प्रति व्य​क्ति आय में हुए पांच गुना इजाफे से टकरा सकता है। अतिरिक्त आय में से पूरी की पूरी उच्चतम स्तर के समूह के पास तो नहीं गई होगी।

गरीबी के घटते स्तर से यह बात साबित भी होती है। खपत की आदतों और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद को लेकर भी विरोधाभासी आंकड़े हैं जो बढ़ती मध्यवर्गीय श्रेणी की ओर इशारा करते हैं। अगर हालात उतने बुरे हैं जितना बताया जा रहा है तो भी क्या मुफ्त अनाज ही समस्या का हल है? अ​धिकांश कामगारों को पीडीएस दर पर परिवार के लिए एक माह का राशन खरीदने में एक दिन से अ​धिक का मेहनताना नहीं लगता है। अनाज को नि:शुल्क करने से कोई खास बदलाव नहीं आता। नि​श्चित रूप से इससे एक लोकलुभावन चक्र अवश्य शुरू हो सकता है क्योंकि राजनीतिक दल पहले ही नि:शुल्क बिजली समेत तमाम मुफ्त चीजें दे रहे हैं।

अगर हम विकल्पों की बात करें तो हमारी खोज व्यापक आ​र्थिक नीति की दिशा में जायेगी। कृ​षि क्षेत्र के वेतन भत्तों की बात करें तो उनकी कमजोरी के कारण गैर कृ​षि आय के साथ उसके अंतर में कमी नहीं आयेगी जब तक कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में और रोजगार तैयार करके लोगों को कृ​षि से इतर रोजगार नहीं मुहैया कराया जाता। तब तक गरीबों को लिए आय समर्थन आवश्यक है। तीसरी बात, रोजगार गारंटी योजना जैसा स्वचयन वाला कार्यक्रम अपने बारे में काफी कुछ बताता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य, ​स्कूली ​शिक्षा और रोजगारपरक प्र​शिक्षण में अ​धिक निवेश पर भी यही बात लागू होती है। स​ब्सिडी और नि:शुल्क तोहफे अक्सर जरूरी कामों पर से ध्यान हटा देते हैं।

Published / 2023-01-01 17:35:56
राजधर्म निर्वाह की मिसाल मोदी-योगी

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय चिंतन में कर्मयोग और संन्यास का वृहत विश्लेषण है। इन पर अमल करने वालों की अनवरत परंपरा रही है। अनगिन शासकों और राजनेताओं ने समाज के लिए निजी हित और पारिवारिक जीवन का परित्याग किया। नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे राजनेता आज भी इस महान विरासत को चरितार्थ कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने विधिवत संन्यास ग्रहण किया है। वह संन्यास धर्म की मर्यादाओं में रहते हुए समाज सेवा के पथ पर चल रहे हैं। अपने पूर्व आश्रम पिता के निधन का समाचार सुनते हैं। लेकिन कोरोना आपदा प्रबंधन के कार्यों में लगे रहते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आध्यात्मिक रूप से संन्यास आश्रम ग्रहण नहीं किया है। वह भारतीय चिन्तन के अनुरूप सामाजिक संन्यास पर अमल करते हैं। अपनी मां की अंतिम यात्रा में जाते हैं। इसके बाद उनका राजधर्म निर्वाह शुरू हो जाता है। पहले से तय कार्यक्रमों में कोई बदलाव नहीं किया जाता है। बाईस वर्ष के संवैधानिक दायित्व निर्वाह में एक भी दिन अवकाश न लेने की परम्परा कायम रहती है।मुख्यमंत्री रहे तो पूरे गुजरात को परिवार समझा। प्रधानमंत्री बने तो उनके परिवार में पूरा भारत आ गया। वह उदार चरित्र का परिचय देते हैं।

यह मेरा है और यह पराया, इस तरह की सोच संकीर्ण विचारधारा वालों की होती है लेकिन विस्तृत विचारधारा वालों के लिए तो यह सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार के समान होती है। अच्छे जनसेवक पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। मोदी ने जब जनसेवा का मार्ग अपनाया तो उन्होंने इसी सिद्धांत का अनुसरण किया। नरेन्द्र मोदी की कार्य शैली विलक्षण है। राष्ट्र और समाज की सेवा में सम्पूर्ण समर्पण। इसी के अनुरूप परिवार भावना का विस्तार। एक बार उनकी मां ने कहा था कि हमारे परिवार ने नरेन्द्र मोदी को समाज के लिए समर्पित मान लिया था, न परिवार ने कभी उनसे कोई अपेक्षा की, न नरेन्द्र मोदी ने अपने को सीमित दायरे में रखा। मुख्यमंत्री के रूप में वहां के छह करोड़ लोगों को अपना परिवार मानते रहे, उन्हीं के हित में कार्य करते रहे। प्रधानमंत्री बने तो 130 करोड़ लोगों तक उनका परिवार विस्तृत हो गया। आठ वर्षों तक बिना विश्राम के इस परिवार की सेवा में समर्पित हैं। यह कार्यशैली और चिंतन ही उनको विशिष्ट बनाता है। बिल्कुल अलग।

नरेन्द्र मोदी के लिए जन्म दिवस और पर्व आदि भी समाज सेवा के अवसर होते हैं। नरेन्द्र मोदी दीवाली सैनिकों के बीच मनाते हैं। उनके ये आयोजन व्यक्तिगत नहीं होते। नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को प्राथमिकता दी है व गरीब कल्याण के संकल्प से असंभव कार्यों को संभव करके दिखाया है। गरीब कल्याण, सुशासन, विकास, राष्ट्र सुरक्षा व ऐतिहासिक सुधारों के समांतर समन्वय से नरेन्द्र मोदी ने मां भारती को पुनः सर्वोच्च स्थान पर आसीन करने के अपने संकल्प को धरातल पर चरितार्थ किया है। यह निर्णायक नेतृत्व जनता के अटूट विश्वास के कारण ही सम्भव हो पाया है। एक सुरक्षित, सशक्त व आत्मनिर्भर नए भारत के निर्माता मोदी का जीवन सेवा और समर्पण का प्रतीक है।

 आजादी के बाद पहली बार करोड़ों गरीबों को उनका अधिकार देकर उनमें आशा और विश्वास का भाव जगाया है। भारतीय संस्कृति के संवाहक नरेन्द्र मोदी ने देश को अपनी मूल जड़ों से जोड़ हर क्षेत्र में आगे ले जाने का काम किया है। उनकी दूरदर्शिता व नेतृत्व में नया भारत एक विश्वशक्ति बनकर उभरा है। वैश्विक नेता के रूप में उनकी विशेष पहचान और छवि है। वह दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं।

वह कहते भी हैं कि अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी विरोधाभासी नहीं है। देश की प्रगति में सभी का योगदान और महत्व होता है। पर्यावरण की रक्षा से देश की प्रगति हो सकती है। यह भारत ने दुनिया को करके दिखाया है। प्रकृति, पर्यावरण, पशु, पक्षी भारत के लिए केवल स्थिरता सुरक्षा के विषय नहीं हैं, यह हमारी संवेदनशीलता और आध्यात्मिकता का भी आधार हैं। अपने पिछले जन्मदिन पर नरेन्द्र मोदी मध्य प्रदेश के श्योपुर में स्वयं सहायता समूह सम्मेलन में सहभागी हुए। उन्होंने कहा था कि आमतौर पर वह अपने जन्मदिन पर मां से मिलते हैं। उनका आशीर्वाद लेते हैं। 

आज मैं उनके पास नहीं जा सका, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों और गांवों में कड़ी मेहनत करने वाली लाखों माताएं आज यहां मुझे आशीर्वाद दे रही हैं। यह दृश्य देखकर मेरी मां को संतोष होगा कि भले बेटा आज यहां नहीं आया, लेकिन लाखों माताओं ने आशीर्वाद दिया है। नये भारत में पंचायत भवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक नारीशक्ति का परचम लहरा रहा हैं।

विगत आठ वर्षों के दौरान देश में ग्यारह करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाये गये। नौ करोड़ से ज्यादा उज्जवला के गैस कनेक्शन प्रदान किए गए। करोड़ों परिवारों में नल से जल की सुविधा उपलब्ध कराई गई। महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण हो रहा है। पिछले आठ सालों में स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाये गये। आठ करोड़ से अधिक महिलाएं इस अभियान से जुड़ी हैं। सरकार का लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार से कम से कम एक महिला को इस अभियान से जोड़ने का है। गांव की अर्थव्यवस्था में, महिला उद्यमियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार निरंतर काम कर रही है। एक जिला एक उत्पाद के माध्यम से हर जिले के लोकल उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। 

नरेन्द्र मोदी महापुरुषों द्वारा देखे गये सपनों को साकार कर रहे हैं। ब्रिटेन को पछाड़ कर भारत आज दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था व्यवस्था वाला देश बन गया है। अपनी मां के अंतिम संस्कार से खाली होने के तुरंत बाद मोदी वर्चुअल माध्यम से सरकारी कार्यक्रम में सहभागी हुए। हावड़ा और न्यू जलपाईगुड़ी के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन को हरी झंडी दिखायी। मोदी ने कहा इस सदी में देश का तेजी से विकास करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे के बुनियादी ढांचे को विकसित करने का अभियान पूरे देश में जारी रहेगा।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इस दिन प्रधानमंत्री को कोलकाता आना था, जहां हावड़ा स्टेशन पर उनका मूल कार्यक्रम आयोजित था। इस बीच सुबह के समय जब हीरा बा के निधन की खबर आई तो इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि कार्यक्रम को टाला जा सकता है। थोड़ी देर बाद ही आधिकारिक तौर पर बताया गया कि प्रधानमंत्री वर्चुअल तरीके से कार्यक्रम में शामिल होंगे। मां के अंतिम संस्कार के बाद प्रधानमंत्री अहमदाबाद के राजभवन पहुंचे। वहां वर्चुअल माध्यम से वह कार्यक्रम में शामिल हुए। हावड़ा न्यू जलपाईगुड़ी के बीच ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के बाद अपने सम्बोधन में उन्होंने बंगाल की जनता से माफी मांगते हुए कहा कि वह निजी कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके, इसके लिए वह क्षमाप्रार्थी हैं। जिस धरती से वंदे मातरम का जय घोष हुआ वहां वंदे भारत को हरी झंडी दिखाई गई। 30 दिसंबर, 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अंडमान में तिरंगा फहराकर भारत की आजादी का बिगुल फूंका था। इसके बाद प्रधानमंत्री दूसरी राष्ट्रीय गंगा परिषद की बैठक में भी शामिल हुए।

वह अपनी मां की तबियत बिगड़ने पर देररात से ही जाग रहे थे। करीब साढ़े तीन बजे भोर में उनका निधन हुआ। नरेन्द्र मोदी ने अपनी माता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनकी माता की सीख थी कि काम करो बुदि्ध से और जीवन जियो शुद्धि से। हीरा बा का जन्म 18 जून, 1923 को मेहसाणा जिले की विसनगर तहसील में हुआ था। बचपन में ही हीरा बा की माता चल बसी थीं। बिन माता की हीरा बा का बचपन बहुत गरीबी में बिता। संघर्षों के कारण कम उम्र में ही उनके पास अनुभव का खजाना था। घर में बड़ी होने के कारण पूरे परिवार की जिम्मेदारी भी उठाती रहीं। बाद में छोटी उम्र में ही वडनगर के मोदी परिवार में उनकी शादी हो गई। वहां भी वे परिवार की सबसे बड़ी बहू थीं। यहां भी उनपर जिम्मेदारी बड़ी थी, लेकिन उन्होंने तनिक भी विचलित हुए बिना इसे उठाते हुए परिवार को एकजुट रखा। वडनगर के एक छोटे से घर में वो रहती थीं, जहां एक भी खिड़की नहीं थी। 

घर पर आर्थिक संकट के दौर में हीरा बा ने दूसरे घरों में जूठे बर्तन भी मांजे। चरखा चलाने का भी उन्होंने काम किया। वे रुई कातने का भी काम करती रहीं। उनके पांच पुत्र और एक पुत्री हैं। वे छोटे पुत्र पंकज मोदी के साथ ही रहती थीं। नरेन्द्र मोदी वर्ष 2016 में अपनी माता हीरा बा को अपने साथ दिल्ली लेकर गए थे। वह कुछ दिन यहां रहीं थीं।

Published / 2023-01-01 17:06:09
हीरा बा को ममता की श्रद्धांजलि

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मां हीरा बा के निधन पर कई देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने शोक व्यक्त किया लेकिन यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कांग्रेस से सोनिया गांधी और राहुल ने कोई एक शब्द तक नहीं कहा। यह भी हो सकता है कि उन्होंने कहा हो और अखबारों ने उसे छापा न हो। लेकिन जरा हम सोचें कि भारतीय राजनीति में आपसी कड़वाहट किस स्तर तक नीचे पहुंच गई है। 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने तो शोक व्यक्त किया है और उन्होंने अपनी श्रद्धांजलि भी दी है लेकिन हमारे कई अत्यंत मुखर विरोधी नेता बिल्कुल मौन रह गये। क्या हमारे विरोधी दलों के नेता, जहां तक मोदी का सवाल है, वे किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से भी ज्यादा खफा हैं?

राहुल गांधी का अटलजी की समाधि पर जाना मुझे अच्छा लगा। यह उदारता और राजनीतिक शिष्टाचार का परिचायक है। इंदिराजी के निधन पर अटलजी ने भी जो शब्द कहे थे, उसे मार्मिक श्रद्धांजलि ही कहा जा सकता है। लोकतंत्र की यह खूबी है कि आप चुनाव के दौरान, संसद में, प्रदर्शनों में और बयानों में अपने विरोधियों का डटकर विरोध करते रहें लेकिन शोक के ऐसे अवसरों पर आप इंसानियत का परिचय दें।

इस मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अद्भुत उदारता का परिचय दिया है। मोदी का जितना कट्टर विरोध ममता ने किया है और उनके तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ को उन्होंने जितना सताया है, किसी अन्य राज्यपाल को नहीं सताया गया है, लेकिन मोदी की माताजी के निधन पर जो वाक्य उन्होंने कहे हैं, वे अत्यंत मार्मिक हैं।

ममता ने कहा कि आपकी माताजी के निधन पर आपको कैसे सांत्वना दी जाये। आपकी मां भी तो हमारी मां हैं। मोदी ने अपनी मां की अंत्येष्टि के तुरंत बाद हावड़ा-जलपाईगुड़ी वंदे भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई। वे चाहते तो इस कार्यक्रम को स्थगित भी कर सकते थे। लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि उनकी मां ने उनको कितने पवित्र संस्कार दिये थे। उनका आचरण एक अनासक्त कर्मयोगी की तरह रहा। उन्होंने अन्य नेताओं की तरह अपनी मां और अपने भाई-बहनों को सत्ता की चाशनी को चखने का भी मौका नहीं दिया जबकि हमारे नेताओं के रिश्तेदार उस चाशनी में अक्सर लथपथ हो जाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे विरोधी नेता मोदी की खुशामद करें। मोदी का जो भी काम या भाषण उन्हें अप्रिय लगे, उसकी आलोचना वे बेखटके जरूर करें लेकिन शोक के ऐसे मौकों पर सभी नेता एक-दूसरे के प्रति सहज सहानुभूति व्यक्त करें तो उनके बीच सद्भाव तो पैदा होगा ही, भारत का लोकतंत्र भी मजबूत होगा। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2022-12-30 22:43:37
कैसे कोई बनता है मेसी या एम्बाप्पे

आरके सिन्हा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। खेल का मैदान किस तरह से देश की सीमाओं से लेकर वर्गभेद मिटा देता है, यह सारी दुनिया ने बीते रविवार को देखा। फीफा विश्व कप के फाइनल को देखने का भारत से लेकर दुनिया के कोने-कोने में रहने वाले खेल प्रेमी इंतजार कर रहे थे। जाहिर है कि जो फाइनल मैच को देख रहे थे, उनमें से अधिकतर का संबंध न तो फ्रांस से था और न ही अर्जेंटीना से। पर इन दोनों देशों के खिलाड़ियों ने अपने श्रेष्ठ खेल और खेल भावना से सबका दिल जीता। 
खेल देशों-दुनिया को जोड़ता है। एक सूत्र में पिरोता है। हमने कब मोहम्मद अली, पेले, माराडोना, लारा, रोजर फेडरर या उसेन बोल्ट को अपना नहीं माना। 

इसी तरह से हमारे सफल खिलाड़ियों जैसे दादा ध्यानचंद, मिल्खा सिंह, विश्वनाथन आनंद को देश और देश से बाहर खेल प्रेमियों का भरपूर प्यार मिलता रहा। कुछ समय पहले महान टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर ने टेनिस की दुनिया से संन्यास लिया था। तब सारी दुनिया के खेल प्रेमी उनके चमत्कारी करियर को याद कर रहे थे। उनमें भारतीय भी तो कोई कम नहीं थे।

कोई खिलाड़ी मेसी, एम्बाप्पे, रोजर फेडरर, डिएगो माराडोना, मोहम्मद अली या कपिल देव कैसे बन जाता है? इस सवाल का उत्तर तलाश करने के लिए बहुत मेहनत करने की जरूरत नहीं है। सभी खिलाड़ी मेहनत करते हैं। पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी सब महान नहीं कहे जाते। वे ही महान माने जाते हैं जो बिग मैच प्लेयर होते थे। वे बड़े और अहम मैचों में छा जाते थे। तब उनका जलवा देखते ही बनता था। बड़े खिलाड़ी का यही सबसे बड़ा गुण होता है कि वे खास मैचों या विपरीत हालात में छा जाते हैं।

 मेसी तथा किलियन एम्बाप्पे ने फीफा कप के फाइनल मैच में लाजवाब खेल का प्रदर्शन किया। मेसी और एम्बाप्पे ने कुल जमा तीन और चार गोल किये। ये गुण होता है कि किसी बड़े खिलाड़ी में जो उसे महान बनाता है। मतलब जब टीम को आपकी सर्वाधिक जरूरत होती है तब ही आप अपने जौहर दिखाते हैं। कई बेहतरीन खिलाड़ी कमजोर प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अपने जौहर नहीं दिखा पाते थे। लेकिन, ये फाइनल या अन्य खास मैचों के समय अपने जलवे बिखरते हैं।
मेसी और एम्बाप्पे जैसे खिलाड़ी विश्व नागरिक बन चुके हैं। उन्हें सारी दुनिया प्यार करती थी। बड़े प्लेयर के साथ यही होता है। वह सबका होता है और सब उसके होते हैं। अब धावक उसेन बोल्ट को लें। उन्हें भारत में उतना ही अपना माना जाता है जितना किसी अन्य देश में। वैसे वे हैं तो जमैका से। 

रोजर फेडरर दिसंबर, 2015 में दिल्ली में कुछ प्रदर्शनी मैच खेलने आये थे। भारत के टेनिस के शैदाइयों को लीजैंड बन चुके रोजर फेडरर को साक्षात देखने का मौका मिल रहा था। रोजर फेडरर को खेलते हुए देखकर दर्शक झूम रहे थे। फेडरर बार-बार दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए हाथ हिला रहे थे। हार्ड, क्ले और ग्रास तीनों कोर्ट में एक जैसा शानदार प्रदर्शन करने वाले फेडरर जब कोर्ट में उतरे तो फिटनेस का चरम लग रहे थे। उनके चेहरे पर एक सुपर स्टार वाली गरिमा को देखा जा सकता था।

मुझे याद आ रही है 1976 की गणतंत्र दिवस की वह परेड। तब वहां पर महानतम मुक्केबाज मोहम्मद अली आये थे। उस समय इमरजेंसी का दौर चल रहा था। परेड शुरू होने में कुछ पल शेष थे। तब ही लाउड स्पीकर से घोषणा हुई कि विश्व हैवीवेट मुक्केबाज चैंपियन मोहम्मद अली राजपथ पर पधार रहे हैं। यह जानकार राजपथ पर मौजूद हजारों लोग प्रसन्न हो गये थे। मोहम्मद अली तब अपने करियर के शिखर पर थे। वे विश्व नायक थे। वे परेड शुरू होने से पहले राजपथ पर आ गये थे। उनके चाहने वाले उनका नाम लेकर उनका अभिवादन कर रहे थे। लंबे-ऊंचे कद के मोहम्मद अली जवाब में अपने मुक्के को हवा में घुमा रहे थे। 

मोहम्मद अली देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ बैठे थे। दुर्भाग्य से वह दौर सेल्फी का नहीं था। बहरहाल, लियोनेल मेसी का विश्व विजेता बनने का सपना आखिरकार पूरा हो गया। 2014 में खिताब चूकने वाले मेसी की टीम ने फीफा वर्ल्ड कप इतिहास के सबसे रोमांचक फाइनल में फ्रांस को फुल टाइम में 3-3 से स्कोर बराबर रहने के बाद पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से हरा दिया। यह अर्जेंटीना का तीसरा खिताब है। इससे पहले उसने 1978 और 1986 में ट्रॉफी अपने नाम की थी। पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना के गोलकीपर मार्टिनेज ने कमाल कर दिया। उन्होंने दो मौके बचाए और मेसी का सपना पूरा कर दिया। इसके साथ ही मेसी का नाम माराडोना के साथ सुनहरे अक्षरों में लिख दिया गया है।

भारत को भी मेसी, एम्बाप्पे, फेडरर और नीरज चोपड़ा जैसे सैकड़ों विश्वास से लबरेज खिलाड़ियों की दरकार है। अभी तो बस शुरूआत है। किसी भी देश का विकास इस बात से साबित होता है कि उधर खेलों की दुनिया में किस तरह की उपलब्धियां अर्जित की जा रही हैं। भारत की पुरुष बैडमिंटन टीम का भी इस साल इतिहास रचना। आप जानते हैं कि भारत ने थामस कप के फाइनल में 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया को 3-0 के अंतर से हराकर ये उपलब्धि हासिल की। 

लक्ष्य सेन, किदांबी श्रीकांत, सात्विक साईराज और चिराग शेट्टी ने भारत को थामस कप जितवाया। इसे बैडमिंटन की विश्व चैंपियनशिप माना जाता है। थामस कप में विजय से पहले भारत के बैडमिंटन सेंसेशन लक्ष्य सेन आॅल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंच गए थे। और बात भारतीय मुक्केबाज निखत जरीन की भी। वह इस्तांबुल में महिला विश्व चैंपियनशिप के फ्लाइवेट (52 किग्रा) वर्ग के एकतरफा फाइनल में थाईलैंड की जिटपोंग जुटामस को 5-0 से हराकर विश्व चैंपियन बनीं। 

तेलंगाना की मुक्केबाज जरीन ने पूरे टूर्नामेंट के दौरान प्रतिद्वंद्वियों पर दबदबा बनाए रखा और फाइनल में थाईलैंड की खिलाड़ी को सर्वसम्मत फैसले से हराया। छह बार की चैंपियन एमसी मैरीकोम (2002, 2005, 2006, 2008, 2010 और 2018), सरिता देवी (2006), जेनी आरएल (2006) और लेखा केसी इससे पहले विश्व खिताब जीत चुकी हैं।

Published / 2022-12-30 20:35:26
सनातन हिंदू धर्म-संस्कृति के रक्षक अमर शहीद धर्म योद्धा...

  • धर्म रक्षा दिवस पर विशेष (21 से 31 दिसंबर) 

डॉ बिरेन्द्र साहू  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शुद्धि आंदोलन : शुद्धि आंदोलन में स्वामी श्रद्धानंद (1856- 1926) का स्थान अमर है। आगरा में 13 फरवरी, 1923 की क्षत्रिय उपकारिणी सभा की बैठक में उन्हें बुलाया गया था। इसमें सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, जैन भी आए थे। यहीं भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा का गठन हुआ। इसी के दस दिन बाद स्वामी जी की महत्वपूर्ण पुस्तिका ह्यसेव द डाइंग रेसह्ण प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने नव-मुस्लिमों को शीघ्र अपने पुराने कुटुम्ब में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। अगले दो महीनों में वे लगभग सौ गांवों में गए। पहले महीने में ही लगभग पांच हजार मलकानों को वापस लाया गया। 

उस वर्ष के अंत तक यह संख्या तीस हजार हो गई थी। इस कार्य पर जमीयत उलेमा और कांग्रेस के नेताओं ने आपत्ति भी की, लेकिन स्वामी जी अडिग रहे। 31 मार्च 1923 को भारत धर्म महामंडल और दरभंगा महाराज की ओर से काशी के पंडितों, पंजाब और महाराष्ट्र की विविध धर्म-सभाओं एवं जाति संगठनों ने भी स्वामी जी का समर्थन दिया। 4-5 अप्रैल 1923 को बनारस के सभाओं में भी इस विषय को रखा गया। फलत: काशी के कुछ रुढ़िवादी पंडितों ने भी मलकानों में काम करने का संकल्प लिया। मलकाना मुस्लिम राजपूतों की शुद्धि का काम पूरे हिन्दू समाज ने अपना लिया। स्वयं डॉअंबेदकर ने शुद्धि आंदोलन से अपनी सहानुभूति लिखित रूप से जताई थी। स्वामी श्रद्धानन्द ने 1924 ई. में दनकौर, बुलंदशहर में कई मुस्लिमों को शुद्ध किया। 

मेरठ, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर में वे लगभग डेढ़ सौ ईसाइयों को भी पुन: हिन्दू समाज में ले आये। उन के सहयोगी रामभज दत्त और मंगल सेन इसी कार्य के लिए अन्य स्थानों पर गए। दिल्ली में मार्च 1926 में कराची से आई हुई महिला असगरी बेगन अपने बच्चों के साथ शुद्ध हुईं और उन्हें शान्ति देवी नाम दिया गया। इस पर असगरी के परिवारवालों ने स्वामी श्रद्धानन्द पर मुकदमा भी किया, किन्तु अदालत ने स्वामी जी को निर्दोष करार दिया। इसके बाद कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों ने स्वामी जी को इस्लाम का शत्रु घोषित किया। इसी प्रचार के वशीभूत एक मतांध मुस्लिम ने 23 दिसंबर, 1926 को स्वामी जी को उन के घर में बीमार अवस्था में धोखे से मार डाला। यह निस्संदेह, शुद्धि के लिए ही स्वामी जी का बलिदान था। 30 दिसंबर, 1922 को गया (बिहार) में कांग्रेस के पंडाल में आयोजित हिन्दू महासभा के वार्षिक अधिवेशन में मोपला के पीड़ित हिंदुओं के प्रति संवेदना प्रकट की गई। मलाबार के लोगों से धर्मांतरित लोगों को पुन: हिन्दू धर्म में स्वीकार करने के लिए भी आह्वान किया गया। 

इस अधिवेशन के अध्यक्ष पंडित मदन मोहन मालवीय तथा स्वागताध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। बहरहाल, भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा के प्रयासों से सन 1923 से 1931 के बीच लगभग 18,33,422 नव-मुस्लिमों को शुद्ध किया गया। इसी दौरान लगभग साठ हजार अछूत कहलाने वाले लोगों को हिन्दू धर्म छोड़ने से भी बचाया गया। 127 शुद्धि सम्मेलन हुए, 156 पंचायतें हुईं और 81 छोटे-बड़े सहभोज किए गए। सभा की ओर से शुद्धि समाचार नामक एक मासिक पत्र भी निकलता था, जिसके चौदह हजार ग्राहक थे। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का सातवां अधिवेशन मालवीय जी की अध्यक्षता में 19-20 अगस्त 1923 को बनारस में हुआ था। उन्होंने अध्यक्षीय भाषण में शुद्धि कार्य का जोरदार समर्थन किया। वहां बाबू भगवान दास (काशी विद्यापीठ के संस्थापक, थियोसोफिस्ट, 1955 ई में भारत-रत्न से सम्मानित) ने भी शुद्धि के समर्थन में अतिविद्वतापूर्ण भाषण दिया था। सर्वसम्मति से अहिन्दुओं के हिंदू धर्म में प्रवेश संबंधी प्रस्ताव पास हुए। 

हिन्दू महासभा का आठवां अधिवेशन 11 अप्रैल, 1925 को कोलकाता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुआ था। लालाजी ने इस्लाम में बलात धर्मांतरित हिंदुओं की शुद्धि का समावेश किया। महासभा के नौ उद्देश्यों में इसे भी शामिल किया गया। बाद में भी हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से कई महापुरुषों ने शुद्धि का समर्थन किया। वीर सावरकर ने भी इस तथा अन्य मंचों से शुद्धि का समर्थन और प्रत्यक्ष शुद्धि का कार्य भी किया। वीर सावरकर ने अंडमान के भयावह सेल्यूलर जेल में अपने भाइयों गणेश तथा बाबाराव के साथ मिलकर शुद्धि कार्य किया था। वहां कुछ मुस्लिम कारापाल अल्पवयस्क हिंदू बंदियों को फुसलाकर या यातना देकर मुसलमान बनाते थे। उनमें से अनेक को सावरकर बंधुओं ने विधिपूर्वक शुद्ध कराया था। इसका पता चलने पर बाबाराव सावरकर पर जानलेवा हमला भी हुआ, किन्तु वे अडिग रहे। डॉ हेगडेवार के संपादकत्व में स्वातंत्य दैनिक में शुद्धि संबंधी लेख व एक नाटक संगीत उ: शाप भी लिखा तथा सार्वजनिक व्याख्यान भी दिए। 

वेद धर्म छोडूं नहीं, कोसिस करो हजार 
तिल-तिल काटो चाहि,गला काटो कटार 

लगभग सवा छ: सौ वर्ष पूर्व 1398 की माघ पूर्णिमा को काशी के मड़ुआडीह ग्राम में संतोख दास और कर्मा देवी के परिवार में जन्में संत रविदास यानि संत रैदास को निस्संदेह हम भारत में धर्मांतरण के विरोध में स्वर मुखर करनें वाली और स्वधर्म में घर वापसी करानें वाली प्रथम पीढ़ी के प्रतिनिधि संत कह सकतें है। संत रैदास संत कबीर के गुरुभाई और स्वामी रामानंद जी के शिष्य थे। उनकें कालजयी लेखन को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उनकें रचित 40 दोहे गुरु ग्रन्थ साहब जैसे महान ग्रन्थ में सम्मिलित किये गए हैं।  

भारतीय समाज में आजकल धर्मांतरण और हिन्दू धर्म में घर वापसी एक बड़ा विषय चर्चित और उल्लेखनीय हो चला है। यह विषय राजनैतिक कारणों से चर्चित भले ही अब हो रहा हो कि किंतु सामाजिक स्तर पर धर्मांतरण हिन्दुस्थान में सदियों से एक चिंतनीय विषय रहा है। इस देश में धर्मांतरण की चर्चा और चिंता पिछले 2 हजार एवं 14 सौ  वर्षों पूर्व प्रारम्भ हो गई थी, समय-काल-परिस्थिति के अनुसार यह चिंता कभी मुखर होती रही तो अधिकांशत: आक्रान्ताओं और आतताइयों के अत्याचार से दबे-कुचले स्वरुप में अन्दर ही अन्दर और पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रही। बारहवीं सदी में जब मुस्लिम आक्रांता भारत की ओर बढ़े तब वे धन लूटनें और धर्म के प्रचार के स्पष्ट और घोषित एजेंडे के साथ ही आये थे। इन बाहरी आक्रान्ताओं और शासकों को भारत की जनता का बहला फुसलाकर या जबरदस्ती बलात धर्मांतरण करानें में किसी प्रकार का कोई सामाजिक या सांस्कृतिक अपराध बोध नहीं लगता था, बल्कि ऐसा करके वे अपनें को गौरान्वित ही महसूस करते थे। भारतीय दर्शन से धुर विपरीत ढर्रा चलानें वाले ये मुस्लिम आक्रान्ता कभी भी भारतीय समाज में समरस और एकरस अपनें इन दो गुणों के कारण ही नहीं हो पाए। उस दौर में स्वाभावत: ही हिंदुस्थानी परिवेश में धर्मांतरण को लेकर भय, चिंता और इससे छुटकारे की प्रवृत्ति उपजने लगी थी। पुनश्च यह कि समय के साथ साथ धर्मान्तारण कारी शक्तियों से छुटकारा पानें की यह प्रवृत्ति समय-काल-परिस्थिति के अनुसार कभी उभरती और कभी दबती रही किन्तु सदैव जीवित अवश्य रही। 

संत रैदास ने जब समाज में तत्कालीन आततायी विदेशी मुस्लिम शासक सिकंदर लोदी का आतंक देखा तब वे दुखी हो बैठे। उस समय लोदी ने हिंदुस्थानी जनता को सताना-कुचलना और डराकर धर्म परिवर्तन कराना प्रारम्भ कर दिया था। हिन्दुओं पर विभिन्न प्रकार के नाजायज कर जैसे तीर्थ यात्रा पर जजिया कर, शव दाह करनें पर जजिया कर, हिंदू रीति से विवाह करनें पर जजिया कर जैसे आततायी आदेशों से देश का हिन्दू समाज त्राहि-त्राहि कर उठा था। भारतीय-हिंदू परंपराओं और आस्थाओं के पालन करनें वालों से कर वसूल करनें और मुस्लिम धर्म माननें वालों को छूट, प्राथमिकता वरीयता देनें के पीछे एक मात्र भाव यही था कि हिन्दू धर्मावलम्बी तंग आकर इस्लाम स्वीकार कर लें। उस समय में स्वामी रामानंद ने अपनें भक्ति भाव के माध्यम से देश में देश भक्ति का भाव जागृत किया और आततायी मुसलमान शासकों के विरुद्ध एक आन्दोलन को जन्म दिया था। स्वामी रामानंद ने तत्कालीन परिस्थितियों को समझकर कर विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि संतों को जोड़कर द्वादश भगवत शिष्य मण्डली स्थापित की। विभिन्न समाजों का प्रतिनिधित्व करनें वाली इस द्वादश मंडली के सूत्रधार और प्रमुख, संत रविदास जी थे। 

संत रैदास ने हिन्दू संस्कारों के पालन पर मुस्लिम शासकों द्वारा लिए जानें वाले जजिया कर का अपनी मंडली से विरोध किया और इस हेतु जागरण अभियान चला दिया। इस मंडली ने सम्पूर्ण भारत में भ्रमण कर देशज भाव और स्वधर्म भाव के रक्षण और उसके जागरण का दूभर कार्य करना प्रारम्भ किया। संत रैदास के नेतृत्व में उस समय समाज में ऐसा जागरण हुआ कि उन्होंने धर्मांतरण को न केवल रोक दिया बल्कि उस कठिनतम और चरम संघर्ष के दौर में मुस्लिम शासकों को खुली चुनौती देते हुए देश के अनेकों क्षेत्रों में धर्मान्तरित हिन्दुओं की घरवापसी का कार्यक्रम भी जोरशोर से चलाया। संत रविदास न केवल देश भर की पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार्य संत हो गए अपितु अगड़ी जातियों के शासकों और राजाओं ने भी उन्हें राजनैतिक कारणों से अपनें अपनें दरबार में सम्मानपूर्ण स्थान देना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार संत रविदास को मिलनें वाले सम्मान के कारण देश की पिछड़ी और अगड़ी जातियों एतिहासिक समरसता का वातावरण निर्मित हो चला था। संत रविदास भारतीय सामाजिक एकता के प्रतिनिधि संत के रूप में स्थापित हो गए थे क्योंकि मुस्लिम शासकों को चुनौती देनें का जो दुष्कर कार्य ये शासक नहीं कर पाए थे वह समाज शक्ति को जागृत करनें के बल पर एक संत ने कर दिया था। 

पिछड़ी जातियों में आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन के बाद भी स्वधर्म सम्मान का भाव जागृत करनें में रैदास सफल रहे और इसी का परिणाम है कि आज भी इन जातियों में मुस्लिम मतांतरण का बहुत कम प्रतिशत देखनें को मिलता है। निर्धन और अशिक्षित समाज में धर्मांतरण रोकनें और घर वापसी का जो अद्भुत, दूभर और दुष्कर कार्य उस काल में हुआ वह इस दिशा में प्रतिनिधि रूप में संत रविदासजी का ही सूत्रपात था। इससे मुस्लिम शासकों में उनकें प्रति भय का भाव हो गया। मुस्लिम आततायी शासक सिकंदर लोदी ने सदन नाम के एक कसाई को संत रैदास के पास मुस्लिम धर्म अपनानें का सन्देश लेकर भेजा। यह ठीक वैसी ही घड़ी थी जैसी कि वर्तमान काल में बोधिसत्व बाबा साहेब आंबेडकर के समय आन खड़ी हुई थी। यदि उस समय कहीं संत रैदास आततायी लोदी के दिए लालच में फंस जाते या उससे भयभीत हो जाते तो इस देश के हिंदुस्थानी समाज की बड़ी ही एतिहासिक हानि होती। यदि उस दिन संत रैदास झुक जाते तो निस्संदेह आज इतिहास कुछ और होता किन्तु धन्य रहे पूज्य संत रविदास कि वे टस से मस भी न हुए, अपितु दृढ़ता पूर्वक पुरे देश को धर्मांतरण के विरुद्ध अलख जलाए रखनें का आव्हान भी करते रहे। 

उन्होंने अपनी रैदास रामायण में लिखा : 

वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान  
फिर क्यों छोड़ इसे पढ लूं झूठ कुरआन  
वेद धर्म छोडूं नहीं कोसिस करो हजार  
तिल-तिल काटो चाहि,गला काटो कटार 
देश ने अचंभित होकर यह दृश्य भी देखा कि संत रैदास को मुस्लिम हो जानें का सन्देश लेकर उनकें पास आनें वाला सदन कसाई स्वयं वैष्णव पंथ स्वीकार कर विष्णु भक्ति में रामदास के नाम से लीन हो गया। यह वह समय था जब शक्तिशाली किन्तु निर्मम और बर्बर शास्सक सिकंदर लोदी कु्रद्ध हो बैठा और उसनें संत रैदास की टोली को चमार या चांडाल घोषित कर दिया। इनकें अनुयाइयों से जबरन ही चर्मकारी का और मरे पशुओं के निपटान का कार्य अत्याचार पूर्वक कराया जानें लगा। भारत में चमार जाति का नाम इस घटना क्रम और सिकंदर लोदी की ही उपज है। संत रविदास उस काल में हिन्दू शासकों में इतनें लोकप्रिय और सम्मानीय हुए कि प्रसिद्द मारवाड़ चित्तोड़ घरानें की महारानी मीरा ने उन्हें अपना गुरु धारण किया। महारानी मीरा से रैदास की भक्ति में वे मीरा बाई कहलानें लगी। भक्त मीरा नें स्वरचित पदों में अनेकों बार संत रैदास का स्मरण गुरु स्वरूप किया है -  

गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी। सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली। 
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै। 

इसका अर्थ है कि ईश्वर भक्ति अहोभाग्य होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशाल हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की पिपीलिका यानि चींटी इन कणों का सहजता से भक्षण कर लेती है। इस प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर भक्त हो सकता है। 

अपने सहज-सुलभ उदाहरणों वाले और साधारण भाषा में दिए जानें वाले प्रवचनों और प्रबोधनों के कारण संत रैदास भारतीय समाज में अत्यंत आदरणीय और पूज्यनीय हो गए थे। वे भारतीय वर्ण व्यवस्था को भी समाज और समय अनुरूप ढालनें में सफल हो चले थे। वे अपनें जीवन के अन्तकाल तक धर्मांतरण के विरोध में समाज को जागृत किये रहे और वैदिक धर्म में घर वापसी का कार्य भी संपन्न कराते रहे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन धर्म और राष्ट्र रक्षार्थ जिया और अत्यंत सम्मान पूर्वक चैत्र शुक्ल चतुर्दशी संवत 1584 को वे गौलोक वासी हो गये। संत रैदास ने भारतीय समाज को मन चंगा तो कठौती में गंगा जैसी कालजयी लोकोक्ति दी जिसके बड़े ही सकारात्मक अर्थ वर्तमान परिवेश में भी निकलतें हैं। आज  उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि केवल यह होगी कि इस भारत भूमि पर सभी वर्णों, जातियों, समाजों और वर्गों के मतावलंबी राष्ट्रहित में एक होकर वैदिक मार्ग अपनाएँ रहें। स्वामी विवेकानंद ने एक धर्मांतरण से एक राष्ट्र शत्रु के जन्म का जो विचार वर्तमान काल में प्रकट किया उसे संत रैदास नें 600 वर्ष पूर्व समझ लिया था और राष्ट्र को समझाने बताने हेतु देश के हर हिस्सें में जाकर जागरण भी किया था। नमन इस अद्भुत संत को, राष्ट्रभक्त को और अनुपम भविष्यदृष्टा को। 

हिंद दी चादर कहलाने वाले गुरु तेगबहादुर जी

नौवें गुरु तेगबहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनके बचपन का नाम त्यागमल था। उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह जी था। वे बाल्यावस्था से ही संत स्वरूप गहन विचारवान, उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक स्वभाव के थे। जिन्होंने धर्म व मानवता की रक्षा करते हुए हंसते-हंसते अपने प्राणों की कुबार्नी दी। गुरु तेगबहादुर जी की शिक्षा-दीक्षा मीरी-पीरी के मालिक गुरु-पिता गुरु हरिगोबिंद साहिब की छत्र छाया में हुई। इसी समय इन्होंने गुरुबाणी, धर्मग्रंथों के साथ-साथ शस्त्रों तथा घुड़सवारी आदि की शिक्षा प्राप्त की। 8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी की अकाल मृत्यु हो जाने की वजह से गुरु तेगबहादुर जी को गुरु बनाया गया था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेगबहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया। एक समय की बात है। औरंगजेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था। एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया किंतु उसे उन श्लोकों के बारे में बताना भूल गया जिनका अर्थ वहां नहीं करना था। 

उसके बेटे ने जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया जिससे औरंगजेब को यह स्पष्ट हो गया कि हर धर्म अपने आपमें एक महान धर्म है। पर औरंगजेब खुद के धर्म के अलावा किसी और धर्म की प्रशंसा नहीं सुन सकता था। उसके सलाहकारों ने उसे सलाह दी कि वह सबको इस्लाम धारण करवा दे। औरंगजेब को यह बात समझ में आ गई और उसने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दिया और कुछ लोगों को यह कार्य सौंप दिया। उसने कहा कि सबसे कह दिया जाये कि इस्लाम धर्म कबूल करो या मौत को गले लगाओ। जब इस तरह की जबरदस्ती शुरू हो गई तो अन्य धर्म के लोगों का जीना मुश्किल हो गया। इस जुल्म के शिकार कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस तरह इस्लाम धर्म स्वीकार ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और न करने वालों को तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही हैं। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत को खतरा है। जहां से हम पानी भरते हैं वहां हड्डियां फेंकी जाती है। हमें बुरी तरह मारा जा रहा है। कृपया आप हमारे धर्म को बचाइए। जिस समय यह लोग समस्या सुना रहे थे उसी समय गुरु तेगबहादुर के नौ वर्षीय सुपुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंदसिंह) वहां आए और पिताजी से पूछा- पिताजी यह लोग इतने उदास क्यों हैं? आप इतनी गंभीरता से क्या सोच रहे हैं? 

गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों की सारी समस्या बताई तो बाला प्रीतम ने कहा- इसका निदान कैसे होगा? गुरु साहिब ने कहा- इसके लिए  किसी महान व्यक्ति को बलिदान देना होगा। बाला प्रीतम ने कहा कि आपसे महान पुरुष मेरी नजर में कोई नहीं है, भले ही बलिदान देना पड़े पर आप हिन्दू धर्म को बचाइए। उसकी यह बात सुनकर वहां उपस्थित लोगों ने पूछा- अगर आपके पिता जी बलिदान दे देंगे तो आप अनाथ हो जाएंगे और आपकी मां विधवा हो जाएगी। बालक ने कहा कि अगर मेरे अकेले के अनाश होने से लाखों लोग अनाथ होने से बच सकते हैं और अकेले मेरी मां के विधवा होने से लाखों मां विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है। फिर गुरु तेगबहादुर ने उन पंडितों से कहा कि जाकर औरंगजेब से कह दो  अगर गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धारण कर लिया तो हम भी कर लेंगे और अगर तुम उनसे इस्लाम धारण नहीं करा पाए तो हम भी इस्लाम धारण नहीं करेंगे और तुम हम पर जबरदस्ती नहीं कर पाओगे। औरंगजेब ने इस बात को स्वीकार कर लिया। गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं चलकर गए। वहां औरंगजेब ने उन्हें तरह-तरह के लालच दिए। किंतु बात नहीं बनी तो उन पर बहुत सारे जुल्म किए। उन्हें कैद कर लिया गया, उनके दो शिष्यों को मारकर उन्हें डराने की कोशिश की, पर गुरु तेगबहादुर टस से मस नहीं हुए। 

उन्होंने औरंगजेब को समझा दी कि अगर तुम जबरदस्ती करके लोगों को इस्लाम धारण करने के लिए मजबूर कर रहे हो तो यह जान लो कि तुम खुद भी सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि तुम्हारा धर्म भी यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म किया जाए। औरंगजेब को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु साहिब के शीश को काटने का हुक्म दे दिया और गुरु साहिब ने हंसते-हंसते अपना शीश कटाकर बलिदान दे दिया। इसलिए गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके शहीदी स्थल पर एक गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है। हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हुए गुरु तेगबहादुरजी को प्रेम से कहा जाता है- 

हिन्द की चादर, गुरु तेगबहादुर

प्राण त्याग दिये परंतु धर्म नहीं बदला

गुरु गोबिंद सिंह के चारों साहिबजादों की शहादत का इतिहास

जिनके बलिदान पर मनाया जाएगा वीर बाल दिवस। 

मुगलों ने श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से बदला लेने के लिए जब सरसा नदी पर हमला किया तो गुरु जी का परिवार उनसे बिछड़ गया था। छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह और माता गुजरी अपने रसोईए गंगू के साथ उसके घर मोरिंडा चले गए। वजीर खां ने छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह बाबा फतेह सिंह तथा माता गुजरी जी को पूस महीने की तेज सर्द रातों में तकलीफ देने के लिए ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया। यह चारों ओर से खुला और ऊंचा था। इस ठंडे बुर्ज से ही माता गुजरी जी ने छोटे साहिबजादों को लगातार तीन दिन धर्म की रक्षा के लिए शीश न झुकाने और धर्म न बदलने का पाठ पढ़ाया था। यही शिक्षा देकर माता गुजरी जी साहिबजादों को नवाब वजीर खान की कचहरी में भेजती रहीं। 7 व 9 वर्ष से भी कम आयु के साहिबजादों ने न तो नवाब वजीर खां के आगे शीश झुकाया और न ही धर्म बदला। इससे गुस्साए वजीर खान ने 26 दिसंबर, 1705 को दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवार में चिनवा दिया था। जब छोटे साहिबजादों की कुबार्नी की सूचना माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में मिली तो उन्होंने भी शरीर त्याग दिया। 
 

इसी स्थान पर आज गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब बना है। इसमें बना ठंडा बुर्ज सिख इतिहास की पाठशाला का वह सुनहरी पन्ना है, जहां साहिबजादों ने धर्म की रक्षा के लिए शहादत दी थी। मासूम साहिबजादों की इस शहादत ने सभी को हिला कर रख दिया था। कहा जाता है छोटे साहिबजादों की शहादत ही आगे चलकर मुगल हकूमत के पतन का कारण बनी थी। श्री गुरु गोबिंद सिंह के चार साहिबजादों में दो अन्य चमकौर की जंग में शहीद हुए थे। गुरु गोबिद ने अपने दो पुत्रों को स्वयं आशीर्वाद देकर जंग में भेजा था। चमकौर की जंग में 40 सिखों ने हजारों की मुगल फौज से लड़ते हुए शहादत प्राप्त की थी। 6 दिसंबर, 1705 को हुई इस जंग में बाबा अजीत सिंह (17) व बाबा जुझार सिंह (14) ने धर्म के लिए बलिदान दिया था। (लेखक झारखंड विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री हैं।)

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