योगेश कुमार गोयल
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। युवा पीढ़ी किसी भी राष्ट्र के विकास की रीढ़ होती है। ऐसी रीढ़, जो यदि क्षतिग्रस्त हो जाए तो शरीर का सीधे खड़े रहना भी असंभव हो जाता है अर्थात रीढ़ के क्षतिग्रस्त होने पर शरीर का विकास होना भी संभव नहीं। ठीक इसी प्रकार देश के विकास के लिए विकास की रीढ़ यानी युवा वर्ग की मानसिकता का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। वर्तमान परिवेश में समाज में चारों तरफ अपराधों तथा भ्रष्टाचार का जो मकड़जाल फैल चुका है, वह घुन बनकर न सिर्फ देश को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है बल्कि युवा वर्ग भी भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के इस दूषित माहौल में हताश व निराश है।
ऐसे में युवा वर्ग सही मार्ग से न भटके, इसके लिए युवा शक्ति को जागृत कर उसे देश के प्रति कर्तव्यों का बोध कराते हुए सही दिशा में प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना और उचित मार्गदर्शन बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में राष्ट्रीय युवा दिवस की प्रासंगिकता बहुत बढ़ जाती है, जो प्रतिवर्ष स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर 12 जनवरी को मनाया जाता है।
हमें भूलना नहीं चाहिए कि देश की आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ बलिदान कर लोगों में क्रांति का बीजारोपण करने वाले अधिकांश युवा ही थे। स्वामी विवेकानंद, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि देश के अनेक युवाओं ने देश की आन-बान और शान के लिए अपने निजी जीवन के समस्त सुखों का त्याग कर दिया था और अपना समस्त जीवन देश के लिए न्यौछावर कर दिया था लेकिन आधुनिक युग में हम स्वार्थी बनकर ऐसे क्रांतिकारी युवाओं की जीवन गाथाओं को भूल रहे हैं और हम सब धीरे-धीरे भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन रहे हैं।
ऐसे ही क्रांतिकारी युवा महापुरुषों की जीवन गाथाओं के जरिये देश की युवा पीढ़ी को समाज में व्याप्त गंदगी से बचाकर देश के विकास में उसका सदुपयोग किया जा सके, इसी उद्देश्य से आधुनिक भारत के महान चिंतक, दार्शनिक, समाज सुधारक, युवा संन्यासी स्वामी विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी को ही प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो बहुत कम आयु में अपने विचारों के चलते समस्त जगत में अपनी एक विशेष पहचान बनाने में सफल हुए थे।
स्वामी विवेकानंद के वक्तव्यों का आम जनमानस और खासकर युवाओं के मन-मस्तिष्क पर कितना प्रभाव पड़ता था, इसका उनके शिकागो भाषण से बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। 11 सितम्बर, 1893 को जब शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म पर अपने प्रेरणात्मक भाषण की शुरुआत उन्होंने मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों के साथ की थी तो बहुत देर तक तालियों की गड़गड़ाहट होती रही थी। अपने उस भाषण के जरिये उन्होंने दुनियाभर में भारतीय अध्यात्म का डंका बजाया था।
विदेशी मीडिया और वक्ताओं द्वारा भी स्वामीजी को धर्म संसद में सबसे महान व्यक्तित्व और ईश्वरीय शक्ति प्राप्त सबसे लोकप्रिय वक्ता बताया जाता रहा। यह स्वामी विवेकानंद का अद्भुत व्यक्तित्व ही था कि वे यदि मंच से गुजरते भी थे तो तालियों की गड़गड़ाहट होने लगती थी। उन्होंने 01 मई 1897 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में रामकृष्ण मिशन तथा 9 दिसंबर 1898 को कोलकाता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। 04 जुलाई 1902 को इसी रामकृष्ण मठ में ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण किए वे चिरनिद्रा में लीन हो गये।
स्वामी विवेकानंद सही मायनों में युवाओं के प्रेरणास्रोत और आदर्श व्यक्त्वि के धनी थे, जिन्हें उनके ओजस्वी विचारों और आदर्शों के कारण ही जाना जाता है। विवेकानंद सदैव कहा करते थे कि उनकी आशाएं देश के युवा वर्ग पर ही टिकी हुई हैं। वे आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि थे और खासकर भारतीय युवाओं के लिए उनसे बढ़कर भारतीय नवजागरण का अग्रदूत अन्य कोई नेता नहीं हो सकता।
अपने 39 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में स्वामी जी अलौकिक विचारों की ऐसी बेशकीमती पूंजी सौंप गये, जो आने वाली अनेक शताब्दियों तक समस्त मानव जाति का मार्गदर्शन करती रहेगी। उनका कहना था कि मेरी भविष्य की आशाएं युवाओं के चरित्र, बुद्धिमत्ता, दूसरों की सेवा के लिए सभी का त्याग और आज्ञाकारिता, खुद को और बड़े पैमाने पर देश के लिए अच्छा करने वालों पर निर्भर है। उन्होंने देश को सुदृढ़ बनाने और विकास पथ पर अग्रसर करने के लिए हमेशा युवा शक्ति पर भरोसा किया। उनका कहना था कि मेरी भविष्य की आशाएं युवाओं के चरित्र, बुद्धिमत्ता, दूसरों की सेवा के लिए सभी का त्याग और आज्ञाकारिता, खुद को और बड़े पैमाने पर देश के लिए अच्छा करने वालों पर निर्भर है। युवा शक्ति का आह्वान करते हुए उन्होंने अनेक मूलमंत्र दिये। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
रमेश सर्राफ धमोरा
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजस्थान के झुंझुनू जिले के खेतड़ी नरेश राजा अजीत सिंह धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले शासक थे। गर्मी के दिनों में राजा अजीतसिंह माउंट आबू स्थित अपने खेतड़ी महल में थे। उसी दौरान 4 जून, 1891 को युवा संन्यासी विवेकानन्द से उनकी पहली बार मुलाकात हुई। इस मुलाकात में अजीत सिंह उस युवा संन्यासी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपना गुरु बना लिया और अपने साथ खेतड़ी चलने का आग्रह किया।
स्वामी विवेकानन्द 7 अगस्त, 1891 को पहली बार खेतड़ी पहुंचे। खेतड़ी में विवेकानन्द 27 अक्टूबर, 1891 तक रहे। यहीं स्वामी विवेकानन्द ने राज पण्डित नारायणदास शास्त्री के सहयोग से पाणिनी का अष्टाध्यायी व पतंजलि का महाभाष्याधायी का अध्ययन किया। स्वामीजी ने व्याकरणाचार्य और पाण्डित्य के लिए विख्यात नारायणदास शास्त्री को लिखे पत्रों में उन्हें मेरे गुरु कहकर सम्बोधित किया है।
अमेरिका जाने से पूर्व 21 अप्रैल, 1893 को स्वामी विवेकानंद दूसरी बार खेतड़ी पहुंचे। इस बार वह 10 मई, 1893 तक खेतड़ी में ठहरे। इस दौरान एक दिन राजा अजीत सिंह और स्वामीजी फतेहविलास महल में बैठे शास्त्र चर्चा कर रहे थे। तभी राज्य की नर्तकियों ने वहां आकर गायन वादन का अनुरोध किया। इस पर संन्यासी होने के नाते स्वामीजी उठकर जाने लगे। नर्तकियों की दल नायिका मैनाबाई ने स्वामी जी से आग्रह किया कि वो विराजें। उन्हें वो भजन सुनायेगी।
मैनाबाई ने महाकवि सूरदास रचित प्रसिद्ध भजन प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो, समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो... सुनाया। इस सुनकर स्वामीजी की आंखों में आंसुओं की धारा बह निकली। उन्होंने उस पतिता नारी को ज्ञानदायिनी मां कहकर सम्बोधित किया और कहा कि आपने आज मेरी आंखें खोल दी हैं।
इस भजन को सुनकर ही स्वामीजी संन्यासोन्मुखी हुए। 10 मई, 1893 को स्वामीजी ने मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में खेतड़ी से अमेरिका जाने को प्रस्थान किया। महाराजा अजीत सिंह के आर्थिक सहयोग से ही स्वामी विवेकानन्द अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में शामिल हो वेदान्त की पताका फहराकर भारत को विश्व धर्मगुरु का सम्मान दिलाया। अमेरिका जाते वक्त खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह ने अपने मुंशी जगमोहन लाल व अन्य कर्मचारियों को बम्बई तक स्वामी जी की यात्रा की तैयारियों व व्यवस्था करने के लिए भेजा था।
इस बात की बहुत कम लोगों को जानकारी है कि स्वामीजी का स्वामी विवेकानन्द नाम भी राजा अजीतसिंह ने रखा था। इससे पूर्व स्वामीजी का नाम विविदिषानन्द था। शिकागो जाने से पूर्व राजा अजीत सिंह ने स्वामीजी से कहा आपका नाम बड़ा कठिन है। उसका अर्थ नहीं समझा जा सकता है। उसी दिन राजा अजीत सिंह ने उनके सिर पर भगवा साफा बांधा व भगवा चोगा पहना कर नया वेश व नया नाम स्वामी विवेकानन्द प्रदान किया, जिसे स्वामीजी ने जीवन पर्यन्त धारण किया।
शिकागो में हिन्दू धर्म की पताका फहराकर स्वामीजी विश्व भ्रमण करते हुए 1897 में जब भारत लौटे तो 17 दिसम्बर, 1897 को खेतड़ी नरेश ने स्वामीजी के सम्मान में 12 मील दूर जाकर उनका स्वागत किया व भव्य गाजे-बाजे के साथ खेतड़ी लेकर आये। उस वक्त स्वामी जी को सम्मान स्वरूप खेतड़ी दरबार के सभी ओहदेदारों ने दो-दो सिक्के भेंट किये व खेतड़ी नरेश ने तीन हजार सिक्के भेंट कर दरबार हाल में स्वामी जी का स्वागत किया। उनके स्वागत में पूरे खेतड़ी में चालीस मण (सोलह सौ किलो) देशी घी के दीपक जलवाये थे। इससे भोपालगढ़, फतेहसिंह महल, जयनिवास महल के साथ पूरा शहर खेतड़ी जगमगा उठा था।
20 दिसम्बर, 1897 को खेतड़ी के पन्नालाल शाह तालाब पर प्रीतिभोज देकर स्वामी जी का भव्य स्वागत किया गया । शाही भोज में उस वक्त खेतड़ी ठिकाना के पांच हजार लोगों ने भाग लिया था। उसी समारोह में स्वामी विवेकानन्द ने खेतड़ी में सावजनिक रूप से भाषण दिया। भाषण सुनने वालों में खेतड़ी नरेश अजीत सिंह के साथ काफी संख्या में विदेशी राजनयिक भी शामिल हुए थे। 21 दिसम्बर, 1897 को स्वामीजी खेतड़ी से प्रस्थान कर गए। यह स्वामीजी का अन्तिम खेतड़ी यात्रा थी।
स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर स्वीकार किया था कि यदि खेतड़ी के राजा अजीतसिंह से उनकी भेंट नहीं हुई होती तो भारत की उन्नति के लिए उनके द्वारा जो थोड़ा बहुत प्रयास किया गया उसे वे कभी नहीं कर पाते। स्वामी जी, राजा अजीत सिंह को समय-समय पर पत्र लिखकर जनहित कार्य जारी रखने की प्रेरणा देते रहते थे। स्वामी विवेकानन्द ने ही राजा अजीत सिंह को खगोल विज्ञान की शिक्षा दी थी। उन्होंने खेतड़ी के संस्कृत विद्यालय में अष्ठाध्यायी ग्रंथों का अध्ययन भी किया था। स्वामी विवेकानन्द के कहने पर ही राजा अजीत सिंह ने खेतड़ी में शिक्षा के प्रसार के लिए जय सिंह स्कूल की स्थापना की थी।
राजा अजीत सिंह और स्वामी विवेकानन्द के अटूट सम्बन्धों की अनेक कथाएं आज भी खेतड़ी के लोगों की जुबान पर सहज ही सुनने को मिल जाती हैं। स्वामीजी का मानना था कि यदि राजा अजीतसिंह नहीं मिलते तो उनका शिकागो जाना संभव नहीं होता। स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी, 1863 में व मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई थी। इसी तरह राजा अजीत सिंह जी का जन्म 10 अक्टूबर 1861 और मृत्यु 18 जनवरी 1901 को हुई थी। दोनों का निधन 39 वर्ष की आयु में हो गया था व दोनों के जन्म व मृत्यु का समय में भी ज्यादा अन्तर नहीं था। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है।
स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन 12 जनवरी को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा दिवस मनाये जाने का प्रमुख कारण उनका दर्शन, सिद्धांत, आध्यात्मिक विचार और उनके आदर्श है। जिनका उन्होंने स्वयं पालन किया और भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी उन्हें स्थापित किया। स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन नामक सेवा भावी संगठन की स्थापना की थी। उसकी पहली शाखा खेतड़ी में 1958 में खोली थी।
मिशन द्वारा खेतड़ी में गरीब तथा पिछड़े बालक-बालिकाओं के लिए श्री शारदा शिशु विहार नाम से एक बालवाड़ी, सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय एवं एक मातृ सदन तथा शिशु कल्याण केन्द्र भी चलाया जा रहा है। खेतड़ी में रामकृष्ण मिशन ने करोड़ों रुपये की लागत से स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रीय संग्रहालय बनवाया है। यह देश का पांचवां और राजस्थान का पहला संग्रहालय है। (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रवासी भारतीयों की प्रतिभा विकसित देशों तक प्रतिष्ठित हो रही है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने पहली बार प्रवासी भारतीयों पर ध्यान केंद्रित किया है। नरेन्द्र मोदी अपनी प्रत्येक विदेश यात्रा में प्रवासियों से संवाद करते हैं। विगत आठ वर्षों के दौरान विदेशों में प्रवासी भारतीयों के अभूतपूर्व सम्मेलन हुए हैं।
इनमें नरेन्द्र मोदी के साथ सम्बन्धित देशों के शासक भी मंच साझा करते रहे हैं। इस नीति के दो प्रभाव हुए। पहला यह कि सम्बन्धित देश में प्रवासी भारतीयों का सम्मान और प्रभाव बढ़ा। वहां के शासन ने उन्हें विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराईं। दूसरा यह कि इन प्रवासियों ने भारत की प्रगति में योगदान देना शुरू किया। वह अपनी मातृभूमि के प्रति दायित्व का निर्वाह करने लगे हैं। नये सिरे से भारतीय सभ्यता संस्कृति से जुड़ रहे हैं।
काशी के प्रवासी सम्मेलन में प्रवासियों का संस्कृति प्रेम दिखाई दिया था। इस सम्मेलन के बाद प्रवासी भारतीय प्रयागराज कुंभ स्नान के लिये गये। उनके लिए यह भावनात्मक पल थे। यहां की व्यवस्था देख कर वह प्रभावित हुए थे। प्रयागराज कुंभ में कायम हुए अनेक वैश्विक कीर्तिमान से वह गौरवान्वित लग रहे थे। काशी, अयोध्या उज्जैन आदि के ऐतिहासिक नवनिर्माण उन्हें आकर्षित करते हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान को देख कर उनका भी आत्मविश्वास जागृत होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंदौर में प्रवासी सम्मेलन के सत्रहवें संस्करण का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र अगले 25 वर्षों के अमृत काल में प्रवेश कर चुका है।प्रवासी भारतीय समुदाय को वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को और ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। प्रवासी भारतीय को विदेशी धरती पर भारत के ब्रांड एंबेसडर है।
वह मेक इन इंडिया, योग, आयुर्वेद, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प और बाजरा के ब्रांड एंबेसडर हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत द्वारा हासिल किए गए अभूतपूर्व विकास के लिए पूरी दुनिया उत्सुकता से भारत की ओर देख रही है। आज भारत के पास न केवल दुनिया का नॉलेज सेंटर बनने का बल्कि स्किल कैपिटल बनने का भी सामर्थ्य है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इको सिस्टम है। दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा निर्माण में अग्रणी है। यही कारण हैं कि दुनिया भर के लोग भारत की गति और पैमाने के बारे में उत्सुक हैं। भारत की ये स्किल कैपिटल दुनिया के विकास का इंजन बन सकती है। सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी ने कहा कि मां और मातृभूमि स्वर्ग से बढ़कर है। प्रवासी भारतीय सम्मेलन दोनों देशों के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलेगा। प्रवासी भारतीयों के लिए कैरेबियन देशों सहित अन्य देशों में हिंदी योग, आयुर्वेद, अध्यात्म आदि पर प्रशिक्षण की व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता है l
इससे धर्म, संस्कृति और हमारी परंपराओं को प्रवासी भारतीय समुदायों में भी सुरक्षित रखने में सहायता मिलेगी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और उनकी वसुधैव कुटुंबकम के अनुरूप संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की दृष्टि महत्वपूर्ण हैं। गुयाना के राष्ट्रपति डॉ मोहम्मद इरफान अली ने अपने पूर्वजों की धरती भारत को प्रणाम तथा महात्मा गांधी का स्मरण किया। इरफान अली ने कहा कि कोविड काल में जब वैश्वीकरण की संपूर्ण व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी, तब नरेन्द्र मोदी ने देशों की सहायता कर दुनिया को प्रेम और सहयोग का संदेश दिया।
भारत, विश्व में प्रतिभा और टेक्नोलॉजी के विकास में अन्य देशों की तुलना में कहीं आगे है। नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के संकल्प के साथ देश आज दुनिया को नेतृत्व प्रदान कर रहा है। भौगोलिक दूरी की दृष्टि से भले ही दोनों देश दूर हों पर भावनात्मक रूप से निकटता बहुत अधिक है और भविष्य में हमारे संबंध अधिक प्रगाढ़ होंगे। नरेन्द्र मोदी ने प्रवासी भारतीय दिवस प्रदर्शनी का शुभारंभ किया। पहली बार आयोजित अपनी तरह की इस डिजिटल प्रदर्शनी की थीम आजादी का अमृत महोत्सव : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रवासी भारतीयों का योगदान है। यहां विदेश में चलाए गए गदर मूवमेंट का भी जिक्र है। प्रदर्शन में थ्री डी तकनीक से बना एक ऐसा सिस्टम लगाया गया है, जिससे बीस सेकेंड में आपको पता लगेगा कि आपका चेहरा देश के किस वीर सपूत से मिलता है।
स्वामी विवेकानंद के अलावा महात्मा गांधी का भी रोचक तरीके से जीवन वृतांत बताया गया है। डिजिटल प्रदर्शनी में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रवासी भारतीयों के योगदान को डिजिटली बखूबी दर्शाया गया।
इस वर्ष भारत दुनिया के जी-20 समूह की अध्यक्षता भी कर रहा है। भारत इस जिम्मेदारी को एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। ये दुनिया को भारत के बारे में बताने का अवसर है। जब हम भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् आधारित विकासपरक सोच एवं विभिन्न विकास क्षेत्रों तकनीकी आधारित विकास, डिजिटल परिवर्तन, सशक्त फार्मा सेक्टर, पर्यावरण आधारित जीवनशैली एवं विकास गतिविधियां आदि में भारत की क्षमताओं तथा गौरवशाली परंपरा, संस्कृति को वैश्विक स्वर प्रदान कर सकते हैं।
जी-20 समूह विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों का विश्व का सबसे बड़ा समूह है। जी 20 के सदस्य मिलकर पच्चासी प्रतिशत वैश्विक जीडीपी, पचहत्तर प्रतिशत वैश्विक व्यापार,नब्बे प्रतिशत पेटेंट के प्रति उत्तरदायी है एवं विश्व की साठ प्रतिशत जनसंख्या इन देशों में निवासरत है। यह वैश्विक स्थिति जी-20 को महत्वपूर्ण बनाती है। इसके अंतर्गत विभिन्न आयोजन स्थलों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, मैराथन, सेल्फ़ी विथ मान्यूमेन्ट आदि प्रतियोगिताएं एवं कार्यक्रम किए जा रहे हैं।
जी-20 के इतिहास में पहली बार यह कार्यक्रम 56 शहरों में किया जायेगा। आयोजन स्थल के शहरों को भी इसका लाभ प्राप्त होगा। साथ ही वहां की विशिष्टताओं से भी प्रतिनिधियों का परिचय कराने का अवसर प्राप्त होगा। इस कार्यक्रम से हम भारत की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विविधताओं से भी विश्व को अवगत करायेंगे। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भोपाल में करणी सेना ने एक अपूर्व प्रदर्शन आयोजित किया और मांग की कि सरकारी नौकरियों, चुनावों और शिक्षण संस्थाओं में, जहां भी आरक्षण की व्यवस्था है, वहां सिर्फ गरीबी के आधार पर आरक्षण दिया जाये। यह करणी सेना राजपूतों का संगठन है। इसने जातीय आरक्षण के विरुद्ध सीधी आवाज नहीं उठायी है, क्योंकि यह खुद ही जातीय संगठन है लेकिन इस समय देश में जहां भी आरक्षण दिया जा रहा है, वह प्रायः जातीय आधार पर ही दिया जा रहा है। यदि सिर्फ गरीबी के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बन जाये तो जाति भेदभाव के बिना भी देश के सभी कमजोर लोगों को आरक्षण मिल सकता है।
यह मांग तो भारत के कम्युनिस्टों को सबसे ज्यादा करनी चाहिए, क्योंकि कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में सबसे ज्यादा हिमायत इसी गरीब वर्ग की है। उन्होंने इसे सर्वहारा (प्रोलेटेरिएट) कहा है। कम्युनिस्टों की क्या कहें, देश की सभी पार्टियां थोक वोटों की गुलाम हैं। थोक वोटों का सबसे बड़ा श्रोत जातियां ही हैं। इसीलिए देश के किसी नेता या पार्टी में इतना दम नहीं है कि वह जातीय आरक्षण का विरोध करे। बल्कि कई अन्य जातियों के नेता आजकल अपने लिए आरक्षण के आंदोलन चला रहे हैं।
यदि करणी सेना के राजपूत लोग अपने आंदोलन में सभी जातियों को जोड़ लें (अनुसूचित जातियों को भी) तो वह सचमुच महान राष्ट्रीय आंदोलन बन सकता है। अनेक अनुसूचित लोग, जो स्वाभिमानी हैं और दूसरों की दया पर निर्भर रहना गलत मानते हैं, वे भी करणी सेना के साथ आ जायेंगे।
करणी सेना की यह मांग भी सही है कि किसी भी परिवार की सिर्फ एक पीढ़ी को आरक्षण दिया जाये ताकि अगली पीढ़ियां आत्मनिर्भर हो जायें। करणी सेना की यह मांग भी उचित प्रतीत होती है कि उस कानून को वापस लिया जाये, जिसके मुताबिक किसी भी अनुसूचित व्यक्ति की शिकायत के आधार पर किसी को भी जाँच किए बिना ही गिरफ्तार कर लिया जाता है। इसमें शक नहीं है कि देश के अनुसूचितों ने सदियों से बहुत जुल्म सहे हैं और उनके प्रति न्याय होना बेहद जरूरी है लेकिन हम भारत में ऐसा समाज बनाने की भूल न करें, जो जातीय आधार पर हजारों टुकड़ों में बंटता चला जाये।
भारत और पड़ोसी देशों के तथाकथित अनुसूचित और पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाने का उपाय जातीय आरक्षण नहीं है। उन्हें और तथाकथित ऊंची जातियों के लोगों को भी जन्म के आधार पर नहीं, जरूरत के आधार पर आरक्षण दिया जाये। यदि हम आरक्षण का आधार ठीक कर लें तो देश में समता और संपन्नता का भवन तो अपने आप ही खड़ा हो जायेगा। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)
डॉ वेदप्रताप वैदिक
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। कई देशों में लोकतंत्र खत्म हुआ और तानाशाही आ गयी लेकिन भारत का लोकतंत्र जस का तस बना हुआ है लेकिन क्या इस तथ्य से हमें संतुष्ट होकर बैठ जाना चाहिए? नहीं, बिल्कुल नहीं। भारतीय लोकतंत्र ब्रिटिश लोकतंत्र की नकल पर गढ़ा गया है। लंदन का राजा तो नाम मात्र का होता है लेकिन भारत में पार्टी-नेता सर्वेसर्वा बन जाते हैं।
सभी पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह या तो कुछ व्यक्तियों या कुछ परिवारों की निजी संपत्तियां बन गयी हैं। उनमें आंतरिक लोकतंत्र शून्य हो गया है। चुनाव से जो सरकारें बनती हैं, वे बहुमत का प्रतिनिधित्व क्या करेंगी? उन्हें कुल मतदाताओं के 20 से 30 प्रतिशत वोट भी नहीं मिलते और वे सरकारें बना लेती हैं। हमारी संसद और विधानसभाओं को पक्ष और विपक्ष के दल एक अखाड़े में तब्दील कर डालते हैं। चुनाव में खर्च होने वाले अरबों-खरबों रुपये नेताओं को भ्रष्टाचारी बना डालते हैं। तब क्या किया जाये?
पिछले दिनों मैंने इन समस्याओं पर आचार्य कृपलानी स्मारक व्याख्यान दिया था। उसके कुछ बिंदु संक्षेप में देश के सुधिजन के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं। सबसे पहले तो हम चुनाव-प्रणाली ही बंद कर दें। इसकी जगह हर पार्टी को उसकी सदस्य-संख्या के अनुपात में सांसद और विधायक भेजने का अधिकार मिले। इसके कई फायदे होंगे। चुनाव खर्च बंद होगा। भ्रष्टाचार मिटेगा।
करोड़ों लोग राजनीतिक रूप से सक्रिय हो जायेंगे। अभी सभी पार्टियों की सदस्य-संख्या 15-16 करोड़ के आसपास है। फिर वह 60-70 करोड़ तक हो सकती है। इस नई प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो भी सरकार बनेगी, उसमें सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिल जायेगा। वह सरकार राष्ट्रीय सरकार होगी, दलीय नहीं, जैसी कि आजादी के तुरंत बाद बनी थी। इस क्रांतिकारी प्रणाली की कई कमियों को कैसे दूर किया जा सकेगा, यह विषय भी विचारणीय है।
जब तक यह नई प्रणाली शुरू नहीं होती है, हमारी वर्तमान प्रणाली में भी कई सुधार किए जा सकते हैं। सबसे पहला सुधार तो यही है कि जब तक किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिलें, उसे चुना नहीं जाये। इसी प्रकार चुने हुए सांसदों की सरकार सचमुच बहुमत की सरकार होगी। उम्मीदवारों की उम्र 25 साल से बढ़ाकर 40 साल की जाये और 50 साल के होने पर ही उन्हें मंत्री बनाया जाये।
संसद सदस्यों की संख्या 1 हजार से डेढ़ हजार तक बढ़ाई जाये। सभी जन-प्रतिनिधियों की आय और निजी संपत्तियों का ब्यौरा हर साल सार्वजनिक किया जाये। देश में रेफरेन्डम और रिकाल की व्यवस्था भी लागू की जानी चाहिए। सारे कानून राजभाषा में बनें और सभी अदालतें अपने फैसले स्वभाषाओं में दें। सांसदों और विधायकों की पेंशन खत्म की जाये। उनके, अफसरों और मंत्रियों के खर्चों पर रोक लगायी जाये। अन्य सुझाव, कभी और। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)
डॉ वंदना सेन
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारी संस्कृति के कई बिन्दु हैं। इन्हें सुनकर या देखकर हम सभी को गौरव की अनुभूति होती है। इनमें से एक बिन्दु हमारी हिन्दी भाषा है। यह हमारे मूल से प्रस्फुटित है। सही मायनों में हिन्दी भारत का गौरव गान है। जिसे हम जितना आचरण में लाएंगे, उतना ही हम सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होते जायेंगे। यह सर्वकालिक सत्य है कि कोई भी देश अपनी भाषा में ही अपने मूल स्वत्व को प्रकट कर सकता है। निज भाषा देश की उन्नति का मूल होता है। निज भाषा को नकारना अपनी संस्कृति को विस्मरण करना है। जिसे अपनी भाषा पर गौरव का बोध नहीं होता, वह निश्चित ही अपनी जड़ों से कट जाता है और जो जड़ों से कट गया उसका अंत हो जाता है।
भारत का परिवेश नि:संदेह हिन्दी से भी जुड़ा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि हिन्दी भारत का प्राण है, हिन्दी भारत का स्वाभिमान है, हिन्दी भारत का गौरवगान है।आज हम जाने अनजाने में जिस प्रकार से भाषा के साथ मजाक कर रहे हैं, वह अभी हमें समझ में नहीं आ रहा होगा, लेकिन भविष्य के लिए यह अत्यंत दुखदायी होने वाला है। वर्तमान में प्राय: देखा जा रहा है कि हिन्दी की बोलचाल में अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का समावेश बेखटके हो रहा है। इसे हम अपने स्वभाव का हिस्सा मान चुके हैं, लेकिन हम विचार करें कि क्या यह हिन्दी के शब्दों की हत्या नहीं है? हम विचार करें कि जब भारत में अंग्रेजी नहीं थी, तब हमारा देश किस स्थिति में था।
हम अत्यंत समृद्ध थे, इतने समृद्ध कि विश्व के कई देश भारत की इस समृद्धि से जलन रखते थे। इसी कारण विश्व के कई देशों ने भारत की इस समृद्धि को नष्ट करने का तब तक षड्यंत्र किया, जब तक वे सफल नहीं हो गये। हमें एक बात ध्यान रखना होगा कि हम अंग्रेजी को केवल एक भाषा के तौर पर स्वीकार करें। भारत के लिए अंग्रेजी केवल एक भाषा ही है। जब हम हिन्दी को मातृभाषा का दर्जा देते हैं तो यह भाव हमारे स्वभाव में प्रकट होना चाहिए। हिन्दी हमारा स्वत्व है। इसलिए कहा जा सकता है कि हिन्दी हृदय की भाषा है।
भाषाओं के मामले में भारत को विश्व का सबसे बड़ा देश निरूपित किया जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारत दक्षिण के राज्यों में अपनी एक भाषा है, जिसे हम विविधता के रूप में प्रचारित करते हैं। कभी-कभी यह भी देखा जाता है कि राजनीतिक कारणों के प्रभाव में आकर दक्षिण भारत के कुछ लोग हिन्दी का विरोध करते हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में जो भाषा बोली जाती है, उसका हिन्दी भाषियों ने सदैव सम्मान किया है। भाषा और बोली तौर पर भारत की एक विशेषता यह भी है कि चाहे वह दक्षिण भारत का राज्य हो या फिर उत्तर भारत का, हर प्रदेश का नागरिक अपने शब्दों के उच्चारण मात्र से यह प्रदर्शित कर देता है कि वह किस राज्य का है।
प्राय: सुना भी होगा कि भाषा को सुनकर हम उसका राज्य या अंचल तक बता देते हैं। यह भारत की बेहतरीन खूबसूरती ही है। जहां तक राष्ट्रीयता का सवाल आता है तो हर देश की पहचान उसकी भाषा भी होती है। हिन्दी हमारी राष्ट्रीय पहचान है। दक्षिण के राज्यों के नागरिकों की प्रादेशिक पहचान के रूप में उनकी अपनी भाषा हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय पहचान की बात की जाए तो वह केवल हिन्दी ही हो सकती है।
हालांकि आज दक्षिण के राज्यों में हिन्दी को जानने और बोलने की उत्सुकता बढ़ी है, जो उनके राष्ट्रीय होने को प्रमाणित करता है। आज पूरा भारत राष्ट्रीय भाव की तरफ कदम बढ़ा रहा है। हिन्दी के प्रति प्रेम प्रदर्शित हो रहा है।
आज हमें इस बात पर भी मंथन करना चाहिए कि भारत में हिन्दी दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। भारत में अंग्रेजी दिवस और उर्दू दिवस क्यों नहीं मनाया जाता। इसके पीछे यूं तो कई कारण हैं, लेकिन वर्तमान का अध्ययन किया जाये तो यही परिलक्षित होता है कि आज हम स्वयं ही हिन्दी के शब्दों की हत्या करने पर उतारू हो गये हैं। ध्यान रखना होगा कि आज जिस प्रकार से हिन्दी के शब्दों की हत्या हो रही है, कल पूरी हिन्दी भाषा की भी हत्या हो सकती है। हम विचार करें कि हिन्दी भारत के स्वर्णिम अतीत का हिस्सा है। हिन्दी हमारी संस्कृति का हिस्सा है। ऐसा हम अंग्रेजी के बारे में कदापि नहीं बोल सकते।
आज हिन्दी को पहले की भांति वैश्विक धरातल प्राप्त हो रहा है। विश्व के कई देशों में हिन्दी के प्रति आकर्षण का आत्मीय भाव संचरित हुआ है। वे भारत के बारे में गहराई से अध्ययन करना चाह रहे हैं। विश्व के कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम संचालित किए जाने लगे हैं। विश्व के कई देशों के नागरिक हिन्दी के प्रति अनुराग दिखा रहे हैं। इतना ही नहीं आज विश्व के कई देशों में हिन्दी के संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। जो वैश्विक स्तर पर हिन्दी की समृद्धि का प्रकाश फैला रहे हैं।
भारत के साथ ही सूरीनाम फिजी, त्रिनिदाद, गुआना, मॉरीशस, थाईलैंड व सिंगापुर में भी हिन्दी वहां की राजभाषा या सह राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुकी है। इतना ही नहीं आबूधाबी में भी हिन्दी को तीसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता मिल चुकी है। आज विश्व के लगभग 44 ऐसे देश हैं जहां हिन्दी बोलने का प्रचलन बढ़ रहा है। सवाल यह है कि जब हिन्दी की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ रही है, तब हम अंग्रेजी के पीछे क्यों भाग रहे हैं। हम अपने आपको भुलाने की दिशा में कदम क्यों बढ़ा रहे हैं। (लेखिका, पीजीवी महाविद्यालय ग्वालियर में सहायक प्राध्यापक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कोविड ने फिर से दस्तक दे दी है। पिछले तीन हफ्तों में चीन में लगभग 25 करोड़ लोग संक्रमित हुए हैं। लाखों लोगो की मृत्यु के समाचार आ रहे हैं। हर तरफ त्राहि-त्राहि मची है। जापान, कोरिया, फ्रांस, जर्मनी आदि में भी रोज लाखों लोग संक्रमित हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि पिछले दो भयावह वर्षों की पुनरावृत्ति होने को है। पूरा विश्व सहमा हुआ है पर भारतवासी लगभग सामान्य जीवन जी रहे हैं और देशों के आंकड़ों के सामने, हमारे यहां संक्रमितों की संख्या मात्र कुछ सौ और हजार में है। यहां ऐसा लगता है जैसे कि देश में कोविड पूरी तरह से समाप्त हो गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के कोविड डैशबोर्ड के अनुसार 26 दिसंबर को देश में संक्रमित लोगों की संख्या मात्र 3428 थी। इसकी तुलना में विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में 25 दिसंबर को समाप्त हुए हफ्ते में ही 35 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए।
यह क्या संयोग मात्र है कि हम आज इतनी बेहतर स्थिति में हैं या यह भारत सरकार का कुशल प्रबंधन है, जिसने सदी की सबसे भयावह महामारी से डटकर लोहा लिया और देश को एक बड़े खतरे से बचा लिया? याद कीजिये 2020 के वे शुरुआती दिन जब बीबीसी जैसे विदेशी मीडिया संस्थान यह भविष्यवाणी कर रहे थे की भारत इस विपदा से निपट नहीं पायेगा। लाशों के अंबार लग जायेंगे। शायद उनके जहन में 2014 से पहले का भारत था। पर जिस तरह से भारत ने अपने संसाधनों को विकसित किया, अत्यंत कम समय में अत्यंत प्रभावी वैक्सीन बनायी और न केवल देश में 220 करोड़ डोज सफलतापूर्वक और कुशल प्रबंधन से लगायी बल्कि दुनिया के अनेक देशों में भी वैक्सीन-मैत्री के माध्यम से अनेक जिंदगियां बचाईं।
इसने पूरे विश्व को हतप्रभ कर दिया। देशवासियों को विश्वास हो गया कि ऐसी महामारी में भी हम सुरक्षित हैं और इसी विश्वास ने न केवल देश की सामान्य जिंदगी को बल्कि अर्थव्यवस्था को भी तेजी से पटरी पर वापस लौटाने में बड़ी भूमिका निभायी।
आज यही विश्वास है जो हमें सुरक्षित रखे हुए हैं और इस विश्वास के पीछे है भारत का असीम अनुभव और कुशल नेतृत्व। अपने पिछले तीन वर्षो के अनुभव और संघर्ष की वजह से हम पहले से कही ज्यादा तैयार हैं। हमारी वैक्सीन दुनिया की सबसे प्रभावी वैक्सीन में से एक है। अमेरिका में व्हाइट हाउस के मुख्य चिकित्सीय सलाहकार डॉ फॉची का तो यह कहना है कि भारत की कोवैक्सीन कोविड के 617 वैरिएंट को निष्क्रिय करने में सक्षम है।
ज्ञात हो कि देश के 90 फीसद लोगों को देश में बनी वैक्सीन की डबल डोज लग चुकी है। प्रसिद्ध डॉक्टर देवी शेट्टी के अनुसार देश के 90 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं जिसकी वजह से हममें अच्छी हाइब्रिड इम्यूनिटी विकसित हो गयी है, जो कि कोरोना के किसी भी रूप के विरुद्ध हमारा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। पर इसके साथ ही हमारा स्वास्थ्यगत ढांचा भी आज 2020 की तुलना में कही अधिक मजबूत है। अब देश में पहले की तुलना में अधिक हॉस्पिटल बेड, सैकड़ों गुना अधिक ऑक्सीजन युक्त बेड हैं।
महामारी के लिए चिह्नित आइसोलेशन बेड तो पहले के 10,180 की तुलना में अब 18 लाख से ज्यादा हैं। इसी तरह से आईसीयू बेड की संख्या भी सैकड़ों गुना बढ़ गई है। पीपीटी किट, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर आदि अब सभी देश में ही तैयार हो रहे हैं और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। टेस्टिंग सेंटर भी अब पहले के 30 हजार प्रतिदिन की जगह 20 लाख टेस्ट प्रतिदिन करने में सक्षम हैं।
आज भी जहां देश में लगभग 90 हजार वैक्सीनेशन और 35 हजार टेस्ट प्रतिदिन हो रहे हैं और देश भर का पूरा डेटा संभल कर रखा जा रहा है और अब ऐतिहातन भारत सरकार के निर्देशानुसार देश के सभी एयरपोर्ट और सार्वजनिक स्थानों पर यादृच्छिक (रैंडम) टेस्टिंग शुरू हो गयी है वहीं प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार संक्रमित व्यक्तियों के सैंपल की जिनोम टेस्टिंग भी करायी जा रही है जिससे नये बीएफ 7 वैरिएंट का पता चल सके।
सरकार की यह सामायिक पहल देशवासियों के लिए भी संकेत है कि जहां हम भले ही शेष दुनिया के तुलना में बहुत बेहतर स्थिति में हों, हमें फिर भी सावधानी रखने की पूरी जरूरत है। भले ही हमारी प्रतिरोधक क्षमता अब बहुत बढ़ गयी है और देश में कोरोना लगभग पूरी तरह से समाप्त हो गया है, फिर भी बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है। देशवासियों को सरकार के निर्देशों का पालन करना चाहिए, अगर बूस्टर डोज नहीं लगवाई है, तो लगवाना चाहिए। सार्वजानिक स्थानों पर मास्क का उपयोग अनिवार्यतः करना चाहिए।
हमारा तीन सालों का अनुभव, हमारे मेहनती स्वास्थ्यकर्मी, हमारा पहले से कहीं बेहतर स्वास्थ्य तंत्र और सबसे ऊपर हमारे अभिभावक स्वरूप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कुशल नेतृत्व हमें इस बात की गारंटी देता है कि अब पहले जैसे किसी भी दुःस्वप्न की पुनरावृत्ति नहीं होगी। फिर भी हमें एक बार फिर से याद रखना और दोहराना होगा- दो गज दूरी, मास्क है जरूरी...। इसके पहले भी कई प्रसंगों में मोदी जी ने मिसाल के रूप में विश्व को बता दिया है। हर संकट या चुनौतियों को अवसर में परिवर्तित करने का मादा वो रखते हैं। इस संकट से बाहर आकर पूरे विश्व को उन्होंने यही संदेश दिया है-
नहीं रुकेंगे बढ़े कदम
मंजिल पर ही लेंगे दम
(लेखक, भारतीय जनता पार्टी के निवर्तमान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्व की प्रमुख डिक्शनरियां हर साल शामिल किये गये प्रमुख शब्द जारी करती हैं। यह शब्द दुनिया की हकीकत बयां करने के लिए काफी होते हैं। इसको साल के पहले नंबर के एक शब्द से ही नहीं आंका जा सकता। साल के अन्य शब्दों को भी देखना होता है। इनसे साफ हो जाता है कि दुनिया जा किधर रही है। लोगों में क्या हलचल है। सकारात्मकता या नकारात्मकता कहां तक पहुंच रही है। इनमें भविष्य का संदेश छिपा होता है। साल 2022 के प्रमुख शब्द गैसलाइटिंग हो या परमाक्राइसिस या कीव हो या पार्टीगेट, कोविड हो या वार्महाउस यह सभी शब्द प्रमुख शब्दों के रूप में चयनित किये गये हैं। यह वैश्विक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं।
ब्रिटेन के अंग्रेजी शब्दकोष कोलिन्स द्वारा इस वर्ष के लिए घोषित वर्ड ऑफ द ईयर परमाक्राइसिस हो या अमेरिका की डिक्शनरी मेरियम वेबस्टर का गैसलाइटिंग। इन दोनों से आज की दुनिया के हालात साफ हो जाते हैं। यह कोई शब्दमात्र नहीं हैं। यह अनिश्चितता और असुरक्षा की भावना घर कर रहे लोगों की मनोदशा को दर्शाते हैं। परमाक्राइसिस परमानेंट और क्राइसिस दो शब्दों से बना लगता है। साफ है कि परमानेंट के मायने स्थाई है तो क्राइसिस का अर्थ है संकट। इसी तरह से गैसलाइटिंग भी दरअसल व्यक्ति के मानसिक रूप से कुंठाग्रस्त और हीनभावना की ओर इंगित करता है।
दोनों ही डिक्शनरियों द्वारा खोजे गये साल के प्रमुख दस शब्द हालात की गंभीरता को दर्शाते हैं। कहीं दूर-दूर तक आशा की झलक दिखायी ही नहीं देती। दुनिया के देश आज जिस हालात से दोचार हो रहे हैं, यह उसी को दर्शाते हैं। ब्रिटेनका यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला ब्रेक्जिट हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो। जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते हालात हों या दुनिया के देशों के सामने अर्थव्यवस्था का संकट। साल 2023 में भी इन संकटों से मुक्ति आसान नहीं दिख रही।
फ्रांसीसी दार्शनिक एडगर मोरिन की माने तो दुनिया इंटरलॉकिंग के दौर में जा रही है। लाख प्रयासों के बावजूद कोरोना से पूरी तरह से मुक्ति नहीं मिली है। ब्रिटेन में ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद अभी हालात ज्यादा अच्छे नहीं हैं। कोरोना के बाद संकट का जो दौर आया उसके बाद भी आतंकवाद में कोई कमी नहीं आयी है। एक-दूसरे देशों के प्रति वैमनस्यता भी कम नहीं हो रही है। लोगों को लगने लगा है कि दुनिया अब ऐसे संकट के दौर से गुजर रही है जिसका स्थायी समाधान निकट भविष्य में दिख नहीं रहा।
कोलिंस द्वारा इस साल सामने लाए गए अन्य शब्दों में कीव है। इसके अलावा दूसरा शब्द पार्टीगेट है। इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जानसन द्वारा जून 20 को कोविड पाबंदियों के बावजूद जन्मदिन की पार्टी करना और उसके बाद के हालातों से पार्टीगेट शब्द चल निकला है। इसी तरह से स्पोर्ट्सवाकिंग शब्द प्रमुख दस शब्दों में शुमार है। वार्मबैंक का चलन भी काफी रहा। यह जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में हो रहे बदलाव से चिंतित दुनिया की पीड़ा व्यक्त करता है। खास बात यह है 2022 में सामने आए दस प्रमुख शब्दों में से निराशा से आशा का संचार करता एक भी शब्द सामने नहीं आया है। इससे स्वतः ही आज की दुनिया के हालात बयां हो जाते हैं।
1938 में जब पहली बार पैट्रिक हैमिल्टन द्वारा लिखित नाटक गैसलाइटिंग खेला गया होगा तब इसकी कल्पना नहीं की गई होगी। इस नाटक पर दो फिल्में बन चुकी हैं। गैसलाइटिंग कोई गैस जलाने वाला लाइटर नहीं होकर मानसिक व मनोवैज्ञानिक रूप से अंदर तक जला देने वाली क्रिया हैं। होना तो यह चाहिए कि कोई व्यक्ति मानसिक या सामाजिक रूप से कमजोर है तो उसे संबल दिया जाए पर होने लगा उल्टा है। 21 वीं सदी में यह सब होना किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता। प्रतिस्पर्धा का दौर ऐसा चल निकला है कि दूसरे को नीचा दिखाना हमारी आदत में आ गया है।
यह सब तब है जब अभी हम कोरोना के संकट से पूरी तरह से निजात नहीं पा सके हैं। कोरोना का नया वेरियंट सामने हैं। चीन में हालात बदतर होते जा रहे हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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