विचार

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Published / 2023-01-21 10:55:28
मानस और मानसिकता

रविरंजन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारे समाज में कुछ ऐसे बहस होते हैं जो राजनीतिक इच्छाओं और लाभ को ध्यान में रखकर होते हैं। इसे आप गुलामी का असर कहें या वर्तमान संदर्भ में ज्ञान और अध्ययनशीलता में कमी लेकिन चर्चा में रामचरितमानस की पंक्तियां ही है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो अपनी संस्कृति पर गर्व न करता हो। दुर्भाग्य से देश में दूसरे देशों से अंगीकार की गयी विचारधारा, परिवेश, जीवन शैली और चर्चित होने या चर्चा में रहने की मजबूरी से ग्रसित जन ऐसा कुछ करते रहते हैं। 

तुलसीदास ने विक्रम संवत 1631 (1574 ईस्वी) में अयोध्या में रामचरितमानस लिखना शुरू किया। रामचरितमानस की रचना अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट में हुई थी। भारत इस अवधि के दौरान मुगल सम्राट अकबर (1556-1605 सीई) शासक था। मानस तुलसीदास को विलियम शेक्सपियर का समकालीन भी बनाता है। रामचरित मानस एकमात्र रचना है जो दुनिया भर के हिंदुओं, कामिल बुल्के जेसे ईसाई का आस्थाग्रंथ है इसकी पूजा की जाती है। मानस पाठ के नियम है और उसे भी पूजा की तरह किया जाता है। इस पुस्तक को अगर गंभीरता से समझा जाए तो आज के संदर्भ में दुनिया में जितनी भी समस्या है चाहे वह मानव निर्मित हो या प्राकृतिक सभी का हल रामचरितमानस में मिल जाता है। इसके रचियता तुलसीदास संस्कृति के विद्धान होते हुए भी अवधी में इसकी रचना की। क्योंकि वे एक सामाजिक वैज्ञानिक थे।

भारतीयों के आत्मबल का एक बड़ा श्रोत रामचरितमानस है जिसे आज के संदर्भ में आर्ट आफ लिविंग की सबसे उत्कृष्ट साहित्य के रुप में देख सकते हैं। यह चरित्र की समग्र गाथा है जिसके कुछ पंक्तियों पर टिप्पणी कर चर्चा में आ सकते हैं लेकिन दुनिया के हर हिंदू के मन से मानस की श्रद्धा कम नहीं कर सकते। यह जननीति, राजनीति और त्याग से समृद्धि की उत्कृष्ट रचना है। 

एक रचना रची गयी हिंदी समाज के पथ भ्रष्टक तुलसीदास। यह रचना एक विद्धान पत्रकार विश्वनाथ ने रची। वे इस आलोचना में एक अंधे भक्त बने जो हाथी को जहां से पकड़ता है उसका उसी के अनुसार वर्णन कर देता है। उनकी रचना राम के विरोधियों को बहुत अच्छा लगा। लेकिन अक्षर से बनते हैं शब्द और शब्द से वाक्य। वाक्य से अपनी अनुभूति को दिया जाता है रुप। तब रुप राम का हो या कृष्ण का उसमें मिलता है भाव। तब बनते हैं भगवान राम, भगवान कृष्ण। भारतीय संस्कृति का यह भाव की राम के चरित को मन में स्थिर करना ही रामचरित मानस है। राजाराम ही नहीं उस काल के सभी राजा उत्कृष्टता के प्रतीक थे और वे गुरु सत्ता के अधीन हो राज्य चलाते थे जिस कारण राम राज्य आज भी सर्वोत्तम सत्ता का उदाहरण है। 

गुलामी और प्रताड़ना के सात सौ साल में कुछ विकलांग मानसिकता के लोग ही आलोचना के साधक हो गये और रामचरित मानस रुपी सागर के एक बूंद उठाकर जिसकी भी उनको समझ नहीं है आलोचना करने को उद्धत हुए। राम और मानस तर्कातित हैं। तर्क उन चीजों पर हो सकती है जो समझा जा सके। रामचरित समझा नहीं जिया जा सकता है और बिना जिये समझा नहीं जा सकता है। राम के चरित को मन में स्थापित करने को ही रामचरित मानस कहते हैं। एक अलौकिक विचार धारा अलौकिक मन से निकलती है और मन चिंतन से निर्मित होता है। चिंतन जन्म जन्मातर से प्रभावित होता है।

पूरी दुनिया भारत के इसी संस्कृति का सम्मान करती है। दुर्भाग्य से हमारे देश के कुछ गिने चुने लोग अपने निहित स्वार्थवश अज्ञानवश ऐसी करतूत करते हैं जिससे देश की संस्कृति पर सवाल उठता है। मन में स्थापित मानस की अलोचना की जितनी अलोचना की जाए वह कम है लेकिन क्षमाशीलता रामचरित मानस के मूल में हैं जिन्होंने हर रुप में आदर्श प्रस्तुत किया तब जब पूरा विश्व राक्षसवृति से प्रभावित था। राष्ट्र धरोहर मानस तो अकबर काल में सुरक्षित रहा लेकिन आज चंद लोग कुछ भी बोल कर मुद्दा बना देते हैं। साहित्य के तौर पर उत्कृष्ट, भाव के तौर पर भगवत सदृश्य इस कथा से जीवन बदलता है उसकी आलोचना मात्र ही कलियुग के माध्यम से विनाशकारी होता है।

Published / 2023-01-21 06:21:08
हिमालय की पीड़ा प्रदर्शित करते जोशीमठ के आंसू...

कुलभूषण उपमन्यु

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जोशीमठ की त्रासदी ने पूरे देश को अचंभित ही नहीं किया है बल्कि हिमालय में विकास की गाड़ी की दिशा पर भी अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। सदियों पुराना शहर आखिर धंस क्यों रहा है। वैसे तो आजादी के बाद से ही हिमालय के लिए विकास योजना को इस क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरण की विशिष्टता के कारण अलग दृष्टि से देखा जाने लगा था। इसी कारण योजना आयोग में भी हिमालय का अलग सेल हुआ करता था। अब नीति आयोग में भी हिमालयन क्षेत्रीय परिषद है। इस परिषद का मकसद है कि हिमालय की विशिष्ट नाजुक स्थिति को ध्यान में रखकर विकास का खाका बनाया जा सके। 

1992 में डॉ एसजेड कासिम की अध्यक्षता में योजना आयोग ने हिमालय में विकास की दिशा और दशा को निर्धारित करने के लिए एक ग्रुप का गठन किया था। इस ग्रुप की रपट 1992 में आ गई थी। ऐसी और भी कोशिश हुईं। बावजूद इसके हिमालयी क्षेत्र में विकास के लिए कोई अलग मॉडल विकसित नहीं किया जा सका। इसका मुख्य कारण यह रहा है कि हिमालयी संसाधनों पर तो योजनाकारों की नजर रही किंतु उनके दोहन या दोहन के तरीकों के कारण कितनी विपदाएं हमें घेर सकती हैं और देश के लिए हिमालय द्वारा की जा रही पर्यावरणीय सेवाओं पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ सकता है इस ओर किसी ने नहीं सोचा।

बातें तो हुईं किन्तु जमीन पर कुछ उतर नहीं सका। इसी का नतीजा है की हिमालय में मनमानी उखाड़-पछाड़ विकास के लिए की गई। कमोबेश यह अब तक जारी है और कमेटियों या हिमालयी विकास को दिशा देने के लिए बनाए गए ग्रुपों की संस्तुतियां धूल फांक रही हैं। विडंबना यह है कि जो लोग हिमालय के साथ मनमानी छेड़छाड़ का विरोध करते हैं उनको विकास विरोधी ठहरा कर चुप करवाने के प्रयास होते रहते हैं। मामला एक जोशीमठ का नहीं है। 

हिमालय में जहां भी अंधाधुंध विकास का मॉडल लागू किया गया है वहां कमोबेश इसी तरह की समस्याएं सामने आई हैं। किन्तु उनको लीपापोती वाली भाषा से टालने का काम ही किया गया है। समाधान तलाशने की ओर देखा नहीं गया है। हिमालयवासी स्वयं भी इस मामले में ज्यादा जागरूक नहीं रहे हैं। विकास के अंधे पैरोकारों के दबदबे ने विरोध के स्वरों को दबा दिया। हालांकि पर्यावरणीय दृष्टि से कुछ सावधानियां प्रयोग करने के लिए भी छोटे-मोटे प्रावधान हुए हैं। मगर उनक लागू करने की व्यवस्था बेहद लचर रही। इसलिए प्रोजेक्ट लागू करने वालों को अंधी छूट मिलती रही। और प्रावधनों के मायने जमींदोज हो गए।

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन जनसुनवाई कभी भी लोगों को जागरूक करके नहीं होती है बल्कि कोशिश की जाति है कि लोगों को कम से कम पता लगे ताकि योजना निर्माता अपने समर्थकों को एकत्र करके योजना के हक की बातों को आगे लाकर अपना रास्ता साफ कर सकें। प्रभाव आकलन का काम परियोजना निर्माताओं द्वारा तैयार रिपोर्ट के आधार पर ही किया जाता है। जाहिर तौर पर निर्माता परियोजना से खतरों को कम करके दिखाता है। परियोजना प्रभाव आकलन रिपोर्ट स्वतंत्र एजेंसी से बनवानी चाहिए। 

मौके पर निर्माण कार्य कैसे चल रहा है, कोई नहीं देखता। यहां तक कि निर्माण कार्यों में निकलने वाले मलबे की डम्पिंग करने के प्रावधानों का खुला उलंघन होता है किन्तु कोई नहीं सुनता। हिमालय में बन रही सडकों या विद्युत् परियोजनाओं में ऐसी घटनाएं हर कहीं सामान्य बात बन गई हैं। निर्माण स्थलों पर वनों की स्वीकृत से कई गुणा ज्यादा तबाही की जाती है किन्तु कोई नहीं देखता। कुछ प्रोजेक्ट्स पर जुर्माने भी लगे हैं। फिर भी मनमानी कहां रुकती है। गढ़वाल के चंबा से भी कुछ मकान धंसने की सूचनाएं आ रही हैं, उत्तराखंड में और भी कई इलाके खासकर बिजली प्रोजेक्ट्स और बड़ी खुली फोरलेन सड़कों के कारण खतरे में आ रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश भी ऐसी त्रासदी से अछूता नहीं है। प्रदेश में 450 के करीब जल विद्युत् परियोजनाएं बन चुकी हैं। इनसे 12000 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है। सरकार की 27000 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना है। इन परियोजनाओं से जगह-जगह बस्तियों को खतरा पैदा हुआ है।

नाथपा झाकड़ी परियोजना की सुरंग के ऊपर बसे नाथपा, कंडार और निगुल्सेरी गांव धसने लगे हैं। किन्नौर से गुजर रहे राष्ट्रीय राजमार्ग पर करछम वांगतू प्रोजेक्ट सुरंगें गुजरने के कारण उर्नी ढांक में एक स्थाई भूस्खलन बन गया है। जंगी-ठोपन परियोजना का कार्य अभी चल रहा है, जिससे जंगी,रारंग, अक्पा और खदरा गांव को खतरा पैदा हो गया है। भरमौर में बन रही होली- बजोली परियोजना की टनल में दरार आने से झ्न्दौता गांव को भारी नुकसान हुआ है। जमीन धंस रही है कई मकानों में दरारें आ गई हैं। हिमाचल प्रदेश में चार फोरलेन सडकें बन रही हैं। उनके निर्माण से भी नुकसान हो रहा है जिसका कोई जायजा नहीं लिया जा रहा है।

 तात्पर्य यह है कि हिमालय में बड़े पैमाने के निर्माण कार्य बहुत सावधानी से किये जाने चाहिए और इसके लिए पर्वतीय विकास का अलग मॉडल विकसित किया जाना चाहिए जिसके लिए हिमालयी क्षेत्रों से लंबे समय से आवाजें उ रही हैं।

हिमालय में करणीय और अकरणीय गतिविधियों की सूची बननी चाहिए और निर्माण कार्यों एवं उद्योग स्थापना, खनन आदि कार्यों में उसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। हिमालयी राज्यों की सरकारें केंद्र सरकार पर दबाव डाल कर पर्वतीय विकास के लिए अलग विकास मॉडल बनवाने का प्रयास करें और केंद्र सरकार एसजेड कासिम की अध्यक्षता वाली कमेटी की रपट का अध्ययन करके इस काम में नीति आयोग की हिमालयी क्षेत्रीय परिषद को इस काम पर लगाए। विश्वव्यापी अनुभवों के आधार पर पर्वतीय विकास का पर्यावरण मित्र मॉडल विकसित किया जाए। इससे ही विकास की अंधी दौड़ में होने वाले स्थाई नुकसानों से बचा जा सकता है। साथ ही टिकाऊ विकास का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। (लेखक, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों के विश्लेषक और पर्यावरणविद् हैं।)

Published / 2023-01-21 06:02:43
भाजपा की बारी, दक्षिण की सवारी...

डॉ विपिन कुमार

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह बीते दिनों कर्नाटक दौरे पर थे। राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उनका यह दौरा बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान उन्होंने ऐलान किया कि यहां भारतीय जनता पार्टी मैदान में अकेले उतरेगी और उनका इरादा दो तिहाई बहुमत हासिल करना है। गौरतलब है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर कयास लगाए जा रहे थे कि यहां भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा। हालांकि यह माना जा रहा था जनता दल (सेक्युलर से भाजपा का गठजोड़ हो सकता है। मगर अब साफ है कि भाजपा अपने बूते जनता की अदालत में जाएगी।

अमित शाह ने भाजपा के लिए कर्नाटक को दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार घोषित किया है। उनके इस कथन के बाद दक्षिण भारत में भाजपा के दायरे को लेकर एक बार फिर से नया विमर्श शुरू हो गया है। कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में अपना पैर जमाने के लिए कई अनुभवी कार्यकर्ताओं को तैनात करने का फैसला किया है। इन राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या 50 से भी अधिक है। इस कड़ी में बीते दिनों हैदराबाद में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया था।

यह एक ऐसी योजना है, जिससे भाजपा को विधानसभा के अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में सीधा फायदा मिलेगा और यदि पार्टी वास्तव में इस चुनाव में एक नया कीर्तिमान स्थापित करना चाहती है तो उसे दक्षिण भारतीय राज्यों में उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन करना होगा। वहीं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह यह भली भांति समझते हैं कि यदि उन्हें दक्षिण भारतीय दिलों में अपनी एक चिर स्थायी जगह बनानी है, तो उत्तर भारत से सांस्कृतिक और भाषायी रूप से जोड़ना ही होगा।

एक दौर ऐसा था, जब दक्षिण भारत खुद को कटा हुआ महसूस करता था। लेकिन बीते 8 वर्ष में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने अथक प्रयासों से पूरे राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोया है और आज लोगों के दिलों में उप-राष्ट्रवाद के स्थान पर राष्ट्रवाद ने अपना घर बना लिया है। इसके हमने कई उदाहरण देखे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण भारतीय राज्यों में अपने दायरे को एक नया आयाम देने के लिए ट्रिपल सी की रणनीति अपनाई है, जिसकी व्यापक परिभाषा - सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीकों को पुनर्जीवित करना, विभिन्न क्षेत्रों के लोकप्रिय हस्तियों को पार्टी में शामिल कर जनमानस के बीच अपनी विश्वसनीयता स्थापित करना और जमीनी स्तर पर अपनी सांगठनिक क्षमता को सुदृढ़ करना है।

आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और केंद्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में कुल 130 लोकसभा सीटें हैं। यहां भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 21 सीटों पर, जबकि बीते लोकसभा चुनाव में 29 सीटों पर जीत हासिल की थी। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में भाजपा की स्वीकार्यता दिनों-दिन बढ़ रही है और पार्टी यह धारणा भी तोड़ने में सफल हो रही है, भाजपा एक उत्तर भारतीय पार्टी है।

वास्तव में, दक्षिण भारतीय राज्यों में भाजपा के सामने एक खुला मैदान है। उसके सामने संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। पार्टी मोदी-योगी मॉडल के सहारे इन राज्यों में एक नई ऊंचाई हासिल कर सकती है और अपनी जन-कल्याणकारी नीतियों से कांग्रेस और वाम दलों का अंत कर सकती है। इसके फलस्वरूप देश में परिवारवाद, जातिवाद और ध्रुवीकरण की राजनीति का भी अंत होगा। हालांकि, भाजपा के लिए यह एक अग्निपथ है। लेकिन हम जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के कुशल नेतृत्व में कुछ भी असंभव नहीं। (लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

Published / 2023-01-18 08:17:08
देश में बढ़ती गरीबी-अमीरी की खाई

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजकल हम भारतीय लोग इस बात से बहुत खुश होते रहते हैं कि भारत शीघ्र ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। लेकिन दुनिया के इस तीसरे सबसे बड़े मालदार देश की असली हालत क्या है? इस देश में गरीबी भी उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही है, जितनी तेजी से अमीरी बढ़ रही है। अमीर होने वालों की संख्या सिर्फ सैकड़ों में होती है लेकिन गरीब होनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। 

ऑक्सफॉम के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले दो साल में सिर्फ 64 अरबपति बढ़े हैं। सिर्फ 100 भारतीय अरबपतियों की संपत्ति 54.12 लाख करोड़ रुपेय है यानी उनके पास इतना पैसा है कि वह भारत सरकार के डेढ़ साल के बजट से भी ज्यादा है।

सारे अरबपतियों की संपत्ति पर मुश्किल से दो प्रतिशत टैक्स लगता है। इस पैसे से देश के सारे भूखे लोगों को अगले तीन साल तक भोजन करवाया जा सकता है। यदि इन मालदारों पर थोड़ा ज्यादा टैक्स लगाया जाए और उपभोक्ता वस्तुओं का टैक्स घटा दिया जाए तो सबसे ज्यादा फायदा देश के गरीब लोगों को ही होगा। अभी तो देश में जितनी भी संपदा पैदा होती है, उसका 40 प्रतिशत सिर्फ एक प्रतिशत लोग हजम कर जाते हैं जबकि 50 प्रतिशत लोगों को उसका तीन प्रतिशत हिस्सा ही हाथ लगता है। अमीर लोग अपने घरों में चार-चार कारें रखते हैं और गरीबों को खाने के लिए चार रोटी भी ठीक से नसीब नहीं होती।

ये जो 50 प्रतिशत लोग हैं, इनसे सरकार जीएसटी का कुल 64 प्रतिशत पैसा वसूलती है जबकि देश के 10 प्रतिशत सबसे मालदार लोग सिर्फ तीन प्रतिशत टैक्स देते हैं। इन 10 प्रतिशत लोगों के मुकाबले निचले 50 प्रतिशत लोग छह गुना टैक्स भरते हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को अपनी रोजमर्रा के जरूरी चीजों को खरीदने पर बहुत ज्यादा टैक्स भरना पड़ता है, क्योंकि वह बताए बिना ही चुपचाप काट लिया जाता है। इसी का नतीजा है कि देश के 70 करोड़ लोगों की कुल संपत्ति देश के सिर्फ 21 अरबपतियों से भी कम है।

साल भर में उनकी संपत्तियों में 121 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। अब जो नया बजट आने वाला है, शायद सरकार इन ताजा आंकड़ों पर ध्यान देगी और भारत की टैक्स-व्यवस्था में जरूर कुछ सुधार करेगी। देश कितना ही मालदार हो जाए लेकिन यदि उसमें गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ती गई तो वह संपन्नता किसी भी दिन हमारे लोकतंत्र को परलोकतंत्र में बदल सकती है। यह हमने पिछली दो सदियों में फ्रांस, रूस और चीन में होते हुए देखा है। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-17 06:44:31
धंसती जमीन और जोशीमठ...

पवन कुमार पांडेय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हिमालय के गढ़वाल इलाके में स्थित तीर्थ जोशीमठ में मिट्टी के धसकने की खबरें लगातार सामने आयीं। इसकी वजह से घरों को नुकसान पहुंचा और लोगों की जिंदगी का भी खतरा उत्पन्न हुआ है। इस विषय में प्रकाशित खबरों और टिप्पणियों में उचित ही कहा गया कि अतीत में इससे संबंधित चेतावनियों की अनदेखी की गयी।

 हिमालय के एक हिस्से में भूस्खलन का खतरा पहले से मौजूद है और वहां इसके अलावा भी कई खतरे हैं क्योंकि वनों की जमकर कटाई हुई है। ऐसे में वहां महत्त्वाकांक्षी रेल, सड़क, जलविद्युत परियोजनाओं तथा अन्य परियोजनाओं के कारण पर्यावरण को हुई क्षति के बारे में भी उचित ही बातें कही गयी हैं।

जोशीमठ के हालात तथा उसे मिली मीडिया कवरेज के साथ ही पर्यावरण को लेकर एक बड़ी चिंता उत्पन्न हुई है: उत्तर भारत के मैदानी शहरों और कस्बों में ठंड के दिनों में हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है, शहरों में बीते वर्षों के दौरान कचरे के पहाड़ खड़े हो गये हैं, पानी जैसे अहम और दुर्लभ संसाधन का जमकर दुरुपयोग, जलवायु परिवर्तन के कारण हो चुका नुकसान मसलन हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना, औद्योगिक कचरे का समुचित निपटान न होना, आदि कई समस्याएं हमारे सामने हैं।

कुल मिलाकर संदेश यही है कि उपरोक्त बातों को लेकर जो चिंता जताई जा रही है वह प्रभावी कदमों में रूपांतरित नहीं हो पा रहा है, सुधार की बात तो छोड़ ही दी जाये। इस प्रकार देश की हवा, पानी, जमीन और वन आदि प्राकृतिक संपदा तथा पानी एवं खनिज आदि को जो भी नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई बहुत मुश्किल है। कई पाठकों को यह बात चकित कर सकती है कि हरित अंकेक्षण जो टिकाऊ वृद्धि का आकलन सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी तथा जीडीपी वृद्धि को हासिल करने में प्राकृतिक पर्यावरण को हुए नुकसान के आधार पर करता है, वह दिखाता है कि भारत के समग्र हरित प्रदर्शन में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।

गत अक्टूबर में भारतीय रिजर्व बैंक के बुलेटिन में प्रकाशित एक पर्चे में यही संदेश था लेकिन मीडिया ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हकीकत में पारंपरिक जीडीपी और हरित जीडीपी के बीच का अंतर तेजी से कम हो रहा है। यानी हरित जीडीपी पारंपरिक जीडीपी की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम अपनी खोई हुई जमीन दोबारा हासिल कर रहे हैं। अगर आपको लगता है कि यह नजर के सामने दिख रही हकीकत के उलट है तो पर्चा कई सरकारी पहलों को भी रेखांकित करता है जिनकी बदौलत सुधार आया है।

उनमें शामिल हैं: नवीकरणीय ऊर्जा को महत्त्वाकांक्षी गति, जीडीपी की प्रति यूनिट के हिसाब से घटी भौतिक खपत, एलईडी बल्ब और ऊर्जा खपत वाली गतिविधियों में अनिवार्य ऊर्जा अंकेक्षण जैसी गतिविधियों की बदौलत कम ऊर्जा घनत्व हासिल करना, पदार्थों के पुनर्चक्रण में इजाफा, स्वच्छ भारत पहल के तहत ठोस कचरे का बेहतर प्रबंधन, नमामि गंगे परियोजना आदि। इस पर्चे के लेखक मानते हैं कि हाल के वर्षों में आया कुछ सुधार आंकड़ों की बेहतर उपलब्धता के कारण है।

अगर गैर विशेषज्ञ के नजरिये से देखें तो आरबीआई बुलेटिन ग्रीन जीडीपी के आकलन की दिशा में पहला कदम है। इसमें आकलन के लिए जो प्रविधि अपनायी गयी है और जिसकी बदौलत निष्कर्ष निकाले गए हैं, उनमें सुधार आएगा अगर आकलन और परिभाषाओं के क्षेत्र में और अधिक लोग काम करें। पर्चे में सकारात्मक संदेश निहित है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या हरित जीडीपी यह भी दर्शाता है कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों के साथ क्या हो रहा है। इसे बैलेंस शीट संबंधी रुख में आंकना जरूरी है। समुचित आकलन ही सुधार की दिशा में पहला कदम है। सवाल यह है कि पारंपरिक जीडीपी के अनुमानों के साथ हरित जीडीपी के आंकड़े क्यों नहीं पेश किये जा सकते हैं? तब शायद सतत विकास को सही संदर्भ में समझा जा सके और उस पर बहस की जा सके।

इस बीच कुछ चयन करने होंगे और कुछ सवालों को भी हल करना होगा। जोशीमठ के आसपास के इलाकों में फिलहाल विनिर्माण गतिविधियां बंद कर दी गई हैं लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं के दोहराव को किस प्रकार रोका जायेगा। हिमालय तथा अन्य इलाकों में पर्यावरण को पहुंच रही क्षति को लेकर दी जा रही चेतावनियों की अनदेखी के परिणामों से कैसे बचा जायेगा? क्या पानी की खपत वाली धान और गन्ना जैसी फसलें हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे पानी की कमी वाले इलाकों में उगाई जानी चाहिए?

चूंकि खेती में अभी भी सबसे अधिक पानी लगता है इसलिए क्या किसानों को समझाया जा सकेगा कि वे इस कदर भूजल का दोहन न करें या धान जैसी फसलों की खेती के लिए कम पानी की खपत वाले विकल्प आजमाएं? क्या इंजीनियरों और विनिर्माण उद्योगों के गठजोड़ को तोड़ा जा सकेगा? क्या हम मजबूत नियामकीय तथा संबद्ध संस्थान बना सकते हैं जो पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित कर सकें? अगर ऐसा नहीं किया गया तो जोशीमठ से लगा झटका एक सप्ताह से ज्यादा नहीं टिकेगा।

Published / 2023-01-15 20:08:02
योगी पर उद्योग जगत का विश्वास...

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति से सत्ता तो नसीब हो सकती है, किन्तु इसका नुकसान अंततः सम्बन्धित प्रदेश को उठाना पड़ता है। ऐसी सरकारों में समीकरण महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उनको दुरुस्त बनाये रखना सत्ता पक्ष की प्राथमिकता रहती है। इससे निवेश का मार्ग बाधित हो जाता है। उद्योग जगत की अनेक अपेक्षायें होती हैं। जिस प्रदेश में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं, वह उधर का ही रुख करते हैं। इसमें कानून-व्यवस्था की स्थिति का सुदृढ़ होना पहली शर्त होती है। इसके साथ ही सिंगल विंडों सिस्टम, इज ऑफ डूइंग बिजनेस और बिजली की पर्याप्त आपूर्ति, बेहतर कनेक्टिविटी, लैंड बैक की स्थापना आदि की आवश्यकता होती है।

 उत्तर प्रदेश में करीब छह वर्ष पहले तक इन्हीं तत्वों का अभाव था। पश्चिम बंगाल, केरल जैसे कुछ राज्य आज भी उसी दौर में हैं। भाजपा जदयू गठबंधन सरकार ने बिहार की छवि में सकरात्मक सुधार किया था। लेकिन नीतीश कुमार ने राजद से गठबंधन करके बिहार को एक बार फिर जंगल राज के दौर में पहुंचा दिया है।

दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने निवेश के अनुरूप माहौल बनाने का प्रभावी कार्य किया है। इसके लिए अपेक्षित सभी मोर्चों पर अभूतपूर्व सुधार हुआ है। यहां इनवेस्टर्स समिट और प्रस्तावों के शिलान्यास से अनेक अध्याय कायम हुए।अब उत्तर प्रदेश ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट के लिए तैयार हो रहा है। इस संबंध में योगी आदित्यनाथ की मुंबई यात्रा उल्लेखनीय रही। 

योगी आदित्यनाथ पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने दिलायी थी। तब उन्होंने विश्वास व्यक्त किया था कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी उत्तम प्रदेश बनेगा। उनका कथन साकार हो रहा है। यह संयोग था कि इस बार मुंबई में योगी आदित्यनाथ की मुलाकात राम नाईक से भी हुई। योगी ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट के संदर्भ में मुंबई गये थे। उद्योगपतियों से उनकी सार्थक बैठक हुई। सभी ने उत्तर प्रदेश में निवेश के प्रति उत्साह दिखाया।

योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा सभा में कहा था कि पहले उत्तर प्रदेश की पहचान दंगे वाले, देश के विकास में बाधक बनने वाले प्रदेश के रूप में थी। लेकिन पिछले साढ़े पांच सालों में यूपी ने खुद को विकास के साथ जोड़ा है। बेहतरीन कानून-व्यवस्था लागू करके देश को एक नया मॉडल दिया। यूपी इज ऑफ डूइंग बिजनेस में कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। राज्य बजट करीब साढ़े छह लाख करोड़ पहुंच गया है। 

छह लाख पंद्रह हजार करोड़ के बजट के बाद तैंतीस हजार करोड़ का अनुपूरक बजट पेश किया गया था। जिन राज्यों की आबादी कम है, वह घाटे का बजट पेश करते हैं। यूपी सरप्लस राजस्व वाला प्रदेश है। उत्तर प्रदेश देश की अर्थव्यवस्था का इंजन बन रहा है। आज यूपी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला प्रदेश है। एक ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी वाला प्रदेश बनाने के लिए काम किया जा रहे है। पांच सालों में साढ़े चार लाख करोड़ से अधिक के निवेश आये हैं। अगले महीने समिट का आयोजन किया जा रहा है।

योगी सही कहते हैं कि यूपी में डेढ़ लाख करोड़ से अधिक का निवेश हुआ है। पांच वर्ष पहले करीब अस्सी हजार करोड़ निवेश हुआ था। वर्तमान सरकार विकास का विजन लेकर आगे बढ़ रही है। इसमें कोई दोराय नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि यूपी डेटा सेंटर का हब बन रहा है। पहली डिस्प्ले यूनिट चीन से यूपी में आयी। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में विभिन्न सेक्टर में तमाम ऐसे कार्य शुरू होने जा रहे हैं जिनसे उत्तर प्रदेश की पहचान को नया आयाम मिलेगा। इसमें चिकित्सा, कानून व्यवस्था, पर्यटन, शिक्षा और इन्फ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट पर खासा फोकस किया गया है। 

योगी आदित्यनाथ के एजेंडे में प्रदेश की कानून व्यवस्था शुरू से ही प्रमुखता पर रही है। इसी का नतीजा है कि प्रदेश में पिछले साढ़े पांच वर्षों में कानून का राज पूरी तरह से स्थापित हुआ है और अपराध की घटनाओं में काफी गिरावट दर्ज की गयी है।

नये साल पर अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने के साथ प्रदेश में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य सरकार ने पुलिस को अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस करने को लेकर ड्रोन की खरीदारी के लिए बजट जारी कर दिया है। करीब दो हजार बॉडी वार्न कैमरे आने वाले हैं। सभी थानों को सीसीटीवी से लैस किया जाना है। यूपीसीडा ने प्रदेश को वन ट्रिलियन इकोनॉमी बनाने व इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए पंद्रह हजार एकड़ से अधिक का लैंडबैंक तैयार कर लिया है। 

इसका मकसद है कि ग्लोबल समिट में आने वाली वैश्विक कंपनियों को यहां प्लांट और अपने प्रोजेक्ट लगाने में कोई असुविधा न हो। यूपीसीडा ने लैंडबैंक से कनेक्टिविटी को बेहतर करने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिये हैं। यूपीसीडी ने अन्य लैंडबैंक के लिए स्पिनिंग मिल्स की बंद इकाइयों की भूमि, स्कूटर इंडिया लखनऊ की डेढ़ सौ एकड़, गाजियाबाद की पांच एकड़, हरदोई की ढाई सौ एकड़ एवं अन्य ग्राम समाज इत्यादि की भूमि लेने की कार्रवाई शुरू कर दी है। 

औद्योगिक क्षेत्र के श्रमिकों के रहने के लिए डोरमेट्री तथा कम्युनिटी टॉयलेट्स का निर्माण युद्धस्तर पर किया जा रहा है। मुंबई में योगी आदित्यनाथ ने बैंकों व वित्तीय संस्थाओं से प्रदेश के विकास में सहभागी बनने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मादी ने देश को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को एक ट्रिलियन डॉलर का आकार देने का निर्णय लिया है। इस सम्बन्ध में अलग-अलग सेक्टर चिह्नित करते हुए प्रदेश सरकार द्वारा सभी सेक्टरों में कार्रवाई की जा रही है। यूपी ग्लोबल समिट के सम्बन्ध में मुम्बई में विभिन्न बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारियों से योगी ने संवाद किया है।

 उन्होंने बैंक अधिकारियों को आश्वस्त किया कि प्रदेश सरकार न केवल आपके पूरे सिस्टम और पूंजी की सुरक्षा की गारंटी लेगी, बल्कि हर प्रकार का सुरक्षित वातावरण भी प्रदेश में उपलब्ध कराने में अपना योगदान देगी। प्रदेश का पर्सेप्शन बदला है। प्रदेश का राजस्व बढ़ा है। आज उत्तर प्रदेश राजस्व सरप्लस स्टेट है। इस सदी की सबसे बड़ी महामारी का सामना और वित्तीय अनुशासन का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश ने सबका ध्यान आकर्षित किया है। आज देश व दुनिया के उद्यमी और निवेशक प्रदेश में निवेश करना चाहते हैं। 

ऐसा पहली बार हुआ कि राज्य में निवेश को आकर्षित करने के लिए प्रदेश सरकार की टीम देश से बाहर विश्व के अन्य देशों में गयी। इस टीम को लगभग साढ़े सात लाख करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव प्राप्त हुए। एक बिलियन डॉलर का जापान से भी निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुआ है। करीब एक लाख एमएसएमई यूनिटों के साथ उत्तर प्रदेश में देश का सबसे बड़ा आधार मौजूद है। 

इस सेक्टर को प्रमोट करने की एक जनपद, एक उत्पाद योजना संचालित है। यह देश की एक लोकप्रिय योजना है। इंटरनेशनल एयरपोर्ट अगले साल तक क्रियाशील हो जायेंगे। दस एयरपोर्ट पर वर्तमान सरकार द्वारा कार्य किया जा रहा है। पांच एयर, पोर्ट बनकर तैयार हो गये हैं। प्रदेश के पांच शहरों का मेट्रो की सुविधा से जोड़ा गया है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-01-15 10:01:21
संविधान ब्रह्मवाक्य नहीं है...

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के बयान पर हमारे विपक्षी नेता बुरी तरह से बिफर पड़े हैं। कांग्रेस के नेता उन्हें भाजपा सरकार का भोंपू बता रहे हैं और उन्हें उपराष्ट्रपति पद की प्राप्ति ममता-विरोध के फलस्वरूप बता रहे हैं और कुछ विपक्षी नेता उन्हें आपातकाल की जननी इंदिरा गांधी का वारिस बता रहे हैं। जैसे इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय की इज्जत को 1975 में तहस-नहस कर दिया था, वैसा ही आरोप धनखड़ पर लगाया जा रहा है।

 इस तरह के आरोप लगाने वाले यह बतायें कि इंदिरा गांधी की तरह धनखड़ को क्या किसी अदालत ने कटघरे में खड़ा कर दिया है? वे अपना कोई मुकदमा तो सर्वोच्च न्यायालय में नहीं लड़ रहे हैं। वे स्वयं प्रतिभाशाली वकील रहे हैं। वे प्रखर वक्ता भी हैं। उन्होंने यदि संसदीय अध्यक्ष सम्मेलन में संसद की सर्वोच्चता पर अपने दो-टूक विचार व्यक्त कर दिए तो यह उनका हक है। यदि वे गलत हैं तो आप अपनी बात सिद्ध करने के लिए जोरदार तर्क क्यों नहीं देते? आप तर्क देने की बजाय शब्दों की तलवार क्यों चला रहे हैं? संविधान की पवित्रता और मान्यता पर धनखड़ ने प्रश्न चिह्न नहीं लगाया है। उन्होंने जो मूल प्रश्न उठाया है, वह यह है कि सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है या संसद सर्वोच्च है?

देश के सारे न्यायालयों में तो सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है। इसमें किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन वह संसद से भी ऊंचा कैसे हो गया? संसद चाहे तो एक ही झटके में सारे जजों को महाभियोग चलाकर पदमुक्त कर सकती है। संविधान ने ही उसे यह अधिकार दिया हुआ है। जहां तक संविधान के मूल ढांचे का प्रश्न है, किस धारा में उसे अमिट, अटल, और अपरिवर्तनीय लिखा है? वसंत साठे और मैंने तो लगभग 30 साल पहले देश में अध्यक्षीय शासन लाने का अभियान भी चलाया था। मैं तो आजकल चुनाव पद्धति का भी विकल्प ढूंढ रहा हूं। आप मूल ढांचे पर आंसू बहा रहे हैं, संसद चाहे तो पूरे संविधान को ही रद्द करके नया संविधान बना सकती है। क्या हमारा संविधान सर्वोच्च न्यायालय ने बनाकर संसद को थमाया है?

सर्वोच्च न्यायालय तो अपने न्यायालयों के और अपने ही कई फैसले रद्द करता रहता है। उसके अपने फैसलों में सारे जजों की सर्वानुमति नहीं होती है। मूल ढांचे के फैसले में भी सात जज एक तरफ और छह जज दूसरी तरफ थे। भारतीय संविधान का मूल ढांचा क्या है, इसे सिर्फ अदालत को तय करने का अधिकार किसने दिया है? यदि संसद चाहे तो वह एकदम नया संविधान ला सकती है, जैसा कि हमारे कई पड़ोसी राष्ट्रों में हुआ है। हिटलर के मरने के बाद जर्मनी ने डर के मारे जो प्रावधान अपने संविधान के लिए किया था, उसकी अंधी नकल हमारे नेता और न्यायाधीश क्यों करें? 

हमारे देश में हिटलरी चल ही नहीं सकती और हमारा संविधान इतना लचीला है कि पिछले सात दशकों में उसमें लगभग सवा सौ संशोधन हो चुके हैं। इसीलिए इतने उत्थान-पतन के बावजूद वह अभी तक टिका हुआ है लेकिन संविधान संविधान है, कोई ब्रह्मवाक्य नहीं है। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-13 22:53:06
अपनी गलत नीतियों कारण तबाही के कगार पर है पाकिस्तान

डॉ अनिल कुमार निगम

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शासकों की गलत नीतियों के चलते आज पाकिस्तान तबाही के मुहाने पर खड़ा है। महंगाई आसमान छू रही है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम हो रहा है। वह विदेशी कर्ज तले दबा हुआ है। जनता रोजी और रोटी के लिए न केवल तरस रही है बल्कि एक दूसरे की जान लेने पर अमादा है। पड़ोसी देश श्रीलंका की तरह ही पाकिस्तान के कंगाली में डूबने से भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं। अगर पाकिस्तान की स्थिति और खराब होती है तो यहां पर चीन सहित अन्य वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप बढ़ सकता है, और अगर ऐसा होता है तो यह भारत के लिए प्रतिकूल स्थिति होगी। इसलिए भारत को इस स्थिति से कूटनीतिक तरीके से निबटना होगा।

वास्तविकता तो यह है कि पाकिस्तान के शासकों की नीतियां अपने देश के जन्म के साथ ही विकास की जगह विध्वंसात्मक रही हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान में कभी लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सका और आजादी के बाद आधे से अधिक अवधि के दौरान पाकिस्तान पर सेना का शासन रहा है। गौरतलब है कि अंग्रेजों की चालबाजी एवं कुछ नेताओं के राजनीतिक स्वार्थ के परिणामस्वरूप अन्तत: भारत का विभाजन हुआ। विभाजन के बाद भी दोनों देशों के संबंधों में हमेशा तनाव बना रहा है। इस खटास ने दोनों देशों के बीच ऐसी खाईं पैदा कर दी है, जिसकी भरपाई होना नामुमकिन सा लगता है।

भारत के प्रति पाकिस्तान का रवैया प्रारंभ से ही कटुतापूर्ण रहा है। स्वतंत्रता वर्ष में ही पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर पर आक्रमण कर दिया था। इसमें उसकी शिकस्त हुई थी। चूंकि स्वतंत्रता के पूर्व ही अंग्रेजी हुकूमत ने यह घोषणा कर दी थी कि भारत की रियासतों को आजादी है कि वह अपने विवेकानुसार भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं अथवा वे खुद को स्वतंत्र रख सकते हैं। इसी का लाभ उठाते हुए कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत का विलय भारत व पाकिस्तान में करने की जगह खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए उस पर हमला कर दिया। इस पर महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर का विलय भारत के साथ किया और भारत ने पाकिस्तान सेना को वहां से खदेड़ दिया।

पाकिस्तान के शासकों और सत्ता में रहे तनाशाहों की विदेश नीति हमेशा भारत विरोध की ही रही है। अप्रैल, 1965 में जब पाकिस्तानी सेना की दो टुकड़ियों ने कच्छ के रन तथा कश्मीर में घुसपैठ प्रारम्भ की, तो दोनों देशों के मध्य युद्ध प्रारम्भ हो गया। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के कारण 22 सितम्बर, 1965 को युद्ध विराम हो गया। युद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत रूस के प्रयत्नों के फलस्वरूप दोनों देशों के बीच 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौता हुआ। हालांकि इस समझौते के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई, जिसके पीछे राजनीतिक षड्यन्त्र होने की बात भी कही गई।

पाकिस्तान की गलत नीतियों के चलते ही वर्ष 1971 में भारत-पाक के संबंधों की कटुता में पुन: बढ़ गई। इस वर्ष पूर्वी पाकिस्तान में याहवा खां के अत्याचारों के फलस्वरूप गृह-युद्ध छिड़ गया और लाखों की संख्या में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषी लोग अपनी जान बचाने के लिए भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए। भारत में शरणार्थियों की संख्या लगभग 1 करोड़ तक पहुंच गई। भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों के साथ मानवीय व्यवहार किया तथा उनके लिए भोजन एवं आश्रय की व्यवस्था की।

इससे क्षुब्ध होकर 2 दिसम्बर, 1971 को पाकिस्तानी वायुयानों ने भारत के हवाई अड्डों पर भीषण बमबारी शुरू कर दी। विवश होकर भारत को जवाबी हमला करना पड़ा। कई दिनों तक दोनों देशों के बीच भयंकर युद्ध चलता रहा। अन्तत: पाकिस्तान की पराजय हुई एवं भारतीय प्रयासों से पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश के रूप में अस्तित्व में आया। इसके बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष को समाप्त करने के उद्देश्य से 3 जुलाई, 1972 को शिमला समझौता हुआ।

शिमला समझौते के बाद 1976 में दोनों देशों के बीच फिर से राजनीतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध कायम होने शुरू हुए, किन्तु 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत रूस के आक्रमण के बाद स्थिति पहले जैसी हो गई, क्योंकि भारत सोवियत रूस का पक्षधर था एवं पाकिस्तान अफगानिस्तान का। इसके बाद 1985 में दोनों देशों के बीच मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के कुछ प्रयास हुए, किन्तु सफलता नहीं मिली।

फरवरी, 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐतिहासिक लाहौर बस यात्रा के माध्यम से भारत की ओर से मित्रता की पहल करने की कोशिश की, किन्तु उसी वर्ष अप्रैल में पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ कर अपनी मंशा जता दी। कारगिल में पाकिस्तान को तो उसके आक्रमण का जवाब मिल गया, किन्तु दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। पाकिस्तान ने एक साजिश के तहत 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद पर आतंकी हमला किया। इस हमले के बाद लंबे समय तक दोनों देशों के बीच सम्बन्ध अत्यन्त तनावपूर्ण रहे।

यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान कश्मीर सहित भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देता रहा है। वहां जो भी प्रशासक आया, वह पाकिस्तान की जनता का ध्यान विकास से भटकाने के लिए हमेशा भारत से खुद को खतरा बताते हुए सीमा में ही नहीं बल्कि भारत के अंदर आतंकी गतिविधियों को प्रायोजित करता रहा। यही कारण है कि वहां की अर्थव्यवस्था बद से बदतर होती गई और वहां की स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी है। आर्थिक संकट से उबरने के लिए पाकिस्तान ने 30 अरब रुपये का अतिरिक्त कर लगाने का निर्णय किया है। तेल और गैस के भुगतान में चूक से बचने के लिए सरकार 100 अरब रुपये जुटाने का प्रयास कर रही है। इस संबंध में उसने आईएमएफ से एक समझौता कर लिया है। बीते कुछ महीनों में देश के कर्ज में 15 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है।

कर्ज तले दबा पाकिस्तान अब कर्ज के लिए अपने कुछ इलाकों और कंपनियों को भी दांव पर लगाने की तैयारी में है। पाकिस्तान यूएई का दो अरब डालर का कर्जदार बना हुआ है। पाकिस्तान इसकी अदायगी नहीं कर पाया है। यूएई ने इसकी अदायगी की अवधि को मार्च 2022 में एक साल के लिए बढ़ाकर मार्च 2023 कर दिया है। दूसरी तरफ चीन द्वारा दिए गए कर्ज को पाकिस्तान को 27 जून से 23 जुलाई के बीच अदा करना था। पाकिस्तान को दो अरब डालर के कर्ज का भुगतान चीन को करना है। फिलहाल कुछ समय के लिए चीन ने इसे स्थगित कर दिया है जो पाकिस्तान के लिए राहत की बात है।

चीन ने इस धनराशि की अदायगी के लिए अतिरिक्त समय दे दिया है। विदेशी मुद्रा भंडार बचाने एवं नकदी के संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को हाल ही में चीन ने एक बार फिर 2.3 अरब डालर का ऋण मुहैया कराया है। इससे पहले भी चीन ने 4.5 अरब डालर का कर्ज दिया था। पाक की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने, आजीविका में सुधार और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए चीन पाकिस्तान का समर्थन करता है। परंतु यह रणनीति दीर्घकाल में अब पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह साबित होती दिख रही है। चूंकि पाकिस्तान भारत का निकटतम पड़ोसी है, लिहाजा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बदहाली को देखते हुए भारत की चिंता स्वाभाविक है। यहां ध्यातत्व है कि चीन सहित अन्य वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप भारतीय उप महाद्वीप में बढ़ने से पहले भारत को इस गंभीर समस्या के लिए एक सशक्त कार्य योजना तैयार कर उसे लागू करना होगा ताकि भारत की अस्मिता और संप्रभुता अक्षुण्य बनी रह सके। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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