एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जाति उन्मूलन चाहने वाले, दलित मुक्ति के लिए पूंजीवाद और जातिगत भेदभाव के खिलाफ वैचारिक संघर्ष को जरूरी मानने वाले क्रांतिकारी समाज सुधारक संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर का 14 अप्रैल को 132वां जन्मदिन मनाया जा रहा है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब जब धरती पर जुल्म बढ़ा है, तो जुल्म के खिलाफ शोषित पीड़ित लोगों ने जंग लड़ी है और जिसमें जीत भी मिली है। जिसका नेतृत्व करने वाले नायक का नाम इतिहास में अमिट है।
यह भी हकीकत है कि जुल्म अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए इंसान को कई बार यातनाएं भी मिली है और कुर्बानियां भी देनी पड़ी है, लेकिन इस सब की बदौलत ही दुनिया में क्रांतियां हुई है, बदलाव आया है। बुनियादी बदलाव बिना बदनामी और बलिदान के संभव नहीं है।
इसके लिए समर्पित संघर्षशील नेतृत्वकारी लोगों को दैवीय बनाकर, मसीहा, महामानव कहना या भगवान बना देना अज्ञानता, गैर वैज्ञानिक जनविरोधी सोच है। इससे समाज में जड़ता और रूढ़ीवादिता मजबूत होती है। इससे जन संघर्ष को कमतर कर दिया जाता है। इंसान जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है।
जनसाधारण के बीच से यदि कोई जनता के दुख दर्द को ठीक से समझे, जनता के हक और अधिकारों के लिए सार्थक और सतत प्रयास करे, भ्रष्ट और लालची नहीं बने, बदनामी सहन कर सके और जरूरत पड़ने पर बलिदान भी दे सके, तो वह व्यक्ति महान बन सकता है।
किसी नायक का पूजा करना भी उचित नहीं है। जैसा बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी कहा है कि क्योंकि इससे तानाशाही पनपती है, मिथ्या अवतारवाद को बढ़ावा मिलता है। आमलोगों में जनसंघर्षों के प्रति उदासीनता पनपती है।
ज्योतिबा फुले, अंबेडकर जैसे क्रांतिकारी नायकों ने ईश्वर अल्लाह के आदेश से नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियों में इंसान की बेहतरी और बदलाव के लिए अपने ज्ञान और विवेक का बेहतरीन इस्तेमाल किया था। संगठन बनाकर बुनियादी बदलाव का प्रयास किया था।
आज भारत को शोषणमुक्त, समतामूलक बनाने के लिए आर्थिक शोषण के साथ साथ जातिगत भेदभाव और शोषण से मुक्ति अत्यंत जरूरी है। साथ ही महिलाओं के साथ भेदभाव, धर्म के नाम पर अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत के खिलाफ भी बोलना जरूरी है। क्योंकि वोट के खातिर हिंदु मुसलमान के बीच भड़काये दंगों में दलितों का इस्तेमाल बड़े स्तर पर हो रहा है। जिसके कारण रोजी रोटी के लिए संघर्ष कमजोर पड़ रहा है।
चिंता की बात यह है कि समतामूलक भारत बनाने के लिए मार्गदर्शक हमारे समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष संविधान और लोकतंत्र पर हमले तेज हो रही हैं और कॉरपोरेट हितैषी, जातीय विषमता एवं सांप्रदायिक राजनीति और विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसलिए इन हमलों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाना भी देश की जरूरत है।
इस वर्ष देश के दो राज्यों केरल और तमिलनाडु में वाइकोम आंदोलन की 100वीं वर्षगांठ मनायी जा रही है। वाइकोम आंदोलन वह आंदोलन है, जिसके माध्यम से केरल और तमिलनाडु में पिछड़ों और दलितों ने आंदोलन किया था और मंदिरों में प्रवेश का अधिकार जीता था।
इस आंदोलन का इतना असर था कि पूरे केरल में किसी भी जाति के मंदिर में प्रवेश पर कोई रोक नहीं थी। आज वामपंथी शासन वाला राज्य केरल में दलित उत्पीड़न की घटनाएं न के बराबर हैं। लेकिन यह उत्तर, पश्चिम या पूर्वी भारत में नहीं हो सका।
उत्तर भारत के बड़े राज्यों की बात करें तो आज दलितों के खिलाफ अत्याचारों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 2018 से दलितों के खिलाफ अपराध के 1.3 लाख से अधिक मामले दर्ज किये गये हैं और यूपी, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में दलितों के खिलाफ अपराध के मामले में सबसे ऊपर हैं।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराध के अधिकतम 36,467 मामले दर्ज किये गये, इसके बाद बिहार (20,973 मामले), राजस्थान (18,418) और मध्य प्रदेश में (16,952) मामले दर्ज हुए हैं। सनद रहे कि ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्हें बाहुबलियों, सामंतों और पुलिस की धमकियों की वजह से दर्ज नहीं किया जाता है।
देश आजाद हुए 75 साल हो गया है, लेकिन चिंता की बात यह है कि महात्मा फुले, अंबेडकर, भगत सिंह, गांधी के सपनों का भारत नहीं बन पाया। आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का बेरहमी से दोहन के परिणामस्वरूप हम दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था जरूर बन गये हैं, लेकिन मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान 131वां है।
वैश्विक भूख सूचकांक में हम 94वें पायदान पर हैं। सतत विकास के मानकों में भारत का स्थान 193 देशों की सूची में 117वां है। जेंडर समानता की दृष्टि से हमारा का स्थान 156 देशों में 140वां है। डेमोक्रेसी इंडेक्स में 167 देशों की सूची में भारत का स्थान 142वां है। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के तहत 180 देशों की सूची में इंडिया का स्थान 142वां है।
निजीकरण के कारण आरक्षण पर खतरा मंडरा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य का तेजी से निजीकरण हो रहा है। आजादी के 75 वर्ष बाद भी शिक्षा पर जीडीपी का लगभग तीन प्रतिशत और स्वास्थ्य पर मात्र दो प्रतिशत ही खर्च किया जा रहा है। बेरोजगारी में दुनिया में पहले स्थान पर चल रहे हैं हम। करीब 35 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। किसान और मजदूर बदहाल है।
राजनीति में बढ़ते धनबल और अपराधीकरण ने लोकतंत्र को बुरी तरह से कमजोर कर दिया है। जाति-धर्म के नाम पर नफरत और हिंसा तेजी से बढ़ रही है।
विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे बुद्धिजीवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, छात्र-युवा, किसान-मजदूर, सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, यहां तक कि पत्रकारों को भी यूएपीए कानून लगाकर प्रताड़ित किया जा रहा है।
नागरिकों की निजता खतरे में है। क्रोनी कैप्टलिज्म एवं जाति धर्म के नाम पर विभाजन की राजनीति ने हमारी आजादी को खतरे में डाल दिया है। संविधान और लोकतंत्र को कमजोर किया है। पूंजीवादी विकास के चलते जल, जंगल, जमीन के परंपरागत हक से आदिवासी वंचित हो रहे हैं।
ज्योतिबा फुले, अंबेडकर, भगत सिंह व गांधी के वैचारिक विरासत को बचाने के लिए सांप्रदायिक कॉरपोरेट गठजोड़ के खिलाफ हमें बाबा साहेब की जयंती पर अपनी आजादी, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए साझा संघर्ष तेज करने का संकल्प लेना होगा। (लेखक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिवमंडल सदस्य हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजस्थान विधानसभा चुनाव होने में सिर्फ सात महीने का समय रह गया है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल चुनावी व्यूह रचना बनाने में लग गए हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का मानना है कि उनकी लोक हितकारी योजनाओं से इस बार के चुनाव में हर बार सत्ता बदलने का रिवाज बदल जायेगा। भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों के नेताओं का मानना है कि प्रदेश की जनता गहलोत सरकार को हटाकर राज बदलने को तैयार बैठी है। वोट पड़ेंगे तब राज बदल जायेगा।
राजस्थान में आम आदमी पार्टी ने कोटा के नवीन पालीवाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम करना प्रारंभ कर दिया है। विधानसभा चुनाव का प्रभार राज्यसभा सदस्य व पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री डॉ संदीप पाठक को पहले ही दे चुकी है। दिल्ली के द्वारका से विधायक विनय मिश्रा को राजस्थान का प्रभारी बनाया गया है।
पार्टी ने दिल्ली, पंजाब और गुजरात के सात विधायकों अमनदीप सिंह गोल्डी, नरेश यादव, चेतर वसावा, नरेंद्र पाल सिंह सवाना, हेमंत खावा, शिवचरण गोयल और मुकेश अहलावत को सह प्रभारी बनाया है है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान जयपुर में रोड शो करके चुनाव तैयारी का आगाज कर चुके हैं। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा था। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे रामपाल जाट को 628 वोट ही मिल पाये थे। यही हाल अन्य का था। 2018 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को प्रदेश में 0.38 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि अब पार्टी के नेता प्रदेश में अगली सरकार बनाने का दावा कर रह हैं।
राजस्थान में मुख्य विपक्षी दल भाजपा है। भाजपा विधानसभा चुनाव की तैयारी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 1.22 प्रतिशत यानी एक लाख 77 हजार 699 वोट अधिक प्राप्त कर 79 सीट अधिक जीत ली थी।
वही इतने वोटों के अंतर पर भाजपा की 90 सीटें कम हो गयी थी। इससे भाजपा सत्ता से बाहर हो गई थी। अपनी पिछले विधानसभा चुनाव की कमी को दूर करने के लिए भाजपा अभी से जुट गयी है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा प्रदेश की राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग के फामूर्ले पर काम कर रही है।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर ब्राह्मण समाज के सीपी जोशी को नियुक्त किया गया है। सीपी जोशी चित्तौड़गढ़ से दूसरी बार लोकसभा सदस्य हैं। जयपुर में कुछ दिनों पूर्व ही ब्राह्मण समाज ने लाखों लागों को एकत्रित कर एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया था। इसमें ब्राह्मण समाज ने प्रदेश की सभी पार्टियों से उनके समाज को सत्ता में अधिक भागीदारी देने की मांग की थी। उस सम्मेलन के कुछ दिनों बाद ही भाजपा ने सीपी जोशी की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी कर दी।
भाजपा ने राजपूत समाज के सातवीं बार विधायक बने राजेंद्र राठौड़ को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया है। प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए गए डॉक्टर सतीश पूनिया को विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष बना कर जाट समाज को भी खुश कर दिया गया है। सतीश पूनिया पहली बार आमेर से विधायक बने हैं। इसलिए उन्हें उपनेता का पद ही मिल पाया है।
चर्चा है कि मीणा समाज के राज्यसभा सदस्य डॉक्टर किरोड़ीलाल मीणा को केंद्र में मंत्री बनाया जा सकता है। राजपूत समाज के गजेंद्र सिंह शेखावत, यादव (अहीर) समाज के डॉक्टर भूपेंद्र यादव, ब्राह्मण समाज के अश्विनी वैष्णव केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। जाट समाज के कैलाश चौधरी, अनुसूचित जाति के अर्जुन राम मेघवाल केंद्र सरकार में राज्य मंत्री हैं।
बनिया समाज के ओम बिरला लोकसभा अध्यक्ष हैं। वही गुलाबचंद कटारिया को असम का राज्यपाल बनाया गया है। झुंझुनू से सांसद, केंद्र सरकार में उप मंत्री व अजमेर जिले के किशनगढ़ से विधायक रहे जगदीप धनखड़ भी उपराष्ट्रपति पद पर हैं।
गुर्जर समाज की अलका गुर्जर भाजपा के राष्ट्रीय सचिव है। ओमप्रकाश माथुर केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे या उनके किसी समर्थक को भाजपा चुनाव अभियान समिति का संयोजक बनाया जा सकता है।
आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असादुदीन ओवैसी भी अपनी पार्टी का संगठन बनाने में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का पूरा संगठन पार्टी अध्यक्ष व नागोर सांसद हनुमान बेनीवाल के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। बेनीवाल ने हाल ही में दिल्ली में अपनी पुत्री का जन्मदिन मनाया था। इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान शामिल हुए थे।
कांग्रेस की चुनाव कमान पूरी तरह मुख्यमंत्री गहलोत ने संभाल रखी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा भी संगठन के काम में लगे हैं। उन्हें अध्यक्ष बने तीन साल होने वाले हैं। ऐसे में चर्चा चल रही है कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर किसी अन्य नेता को नियुक्त किया जा सकता है।
यदि प्रदेश अध्यक्ष बदला जाता है तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का पूरा प्रयास रहेगा कि उनके समर्थक रघु शर्मा, महेश जोशी, महेंद्र चौधरी, नरेंद्र बुडानिया, लालचंद कटारिया में से किसी को अध्यक्ष बनाया जाए। ताकि चुनाव में उनके मन मुताबिक टिकटों का वितरण हो सके।
कांग्रेस के 400 में से 367 ब्लॉक अध्यक्षों की तो नियुक्तियां हो चुकी है। मगर अधिकांश जिलाध्यक्षों के पद लंबे समय से खाली हैं। इस कारण नीचे के स्तर पर संगठन पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पा रहा है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने हाल ही में तीन विधायकों अमित चाचान, इंद्राज सिंह गुर्जर, प्रशांत बैरवा सहित कुल 8 लोगों को पार्टी का प्रवक्ता नियुक्त किया है। वही सात लोगों को मीडिया पैनलिस्ट और तीन लोगों को मीडिया को-आर्डिनेटर बनाया गया है।
कांग्रेस में 25 सितंबर 2022 की घटना में दोषी नेताओं पर अभी तक कार्रवाई नहीं होने से भी सचिन पायलट खासे नाराज हैं। सचिन पायलट ने जयपुर में एक दिन का उपवास रखकर अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर मिलीभगत का खेल खेलने का आरोप लगाया है।
पायलट के अनशन को रोकने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने बहुत दबाव बनाया मगर पायलट आखिर अनशन करके ही माने हैं। हालांकि कांग्रेस प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने पायलट के अनशन को पार्टी विरोधी गतिविधि घोषित कर दिया था। मगर पायलट के खिलाफ अभी तक अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की किसी ने हिम्मत नहीं दिखायी है।
पायलट को हनुमान बेनीवाल सहित आम आदमी पार्टी का भी समर्थन मिल रहा है। कांग्रेस आलाकमान को पता है कि यदि पायलट के खिलाफ किसी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई करेंगे तो राजस्थान की स्थिति भी पंजाब की तरह हो सकती है। कुल मिलाकर चुनावी दौर में कांग्रेस आपसी गुटबाजी की शिकार हो गयी है जिसका खामियाजा उन्हें अगले विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ेगा। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्वामी सत्यानंदजी परमहंस कहते है कि बुद्ध को नास्तिक क्यों कहा जाता है? क्योंकि बुद्ध आत्मा को नहीं मानते थे। बुद्ध कहते थे मेरा जन्म नहीं हुआ है। मैं अविनाशी हूं। देश-दुनिया के विद्धान इस बात को समझ नहीं पाते हैं। मैं कई बार यूनिवर्सिटी के बुद्धिज्म पढ़ाने वाले प्रोफेसरों से पूछता हूं कि आप बुद्ध को इस प्रकार गलत ब्याख्या के साथ क्यों पढ़ाते हैं ? तब वे कहते हैं कि मेरा सिलेबस वैसा है अगर मैं जो आप समझा रहें है जो हमलोगों को सही भी लगता है लेकिन पढ़ा नहीं सकते हैं। चेतन ही आत्मा और परमात्मा है।
आप जीवन भर क्या करते हैं? आप जीवन भर क्या चाहते हैं? दुख कम हो सुख अधिक हो। सुखा बढ़े और दुख घटे। इसके लिये ही तो सब उपाय करते हैं। बुद्ध कहते हैं दुख है, दुख का कारण है, दुख का निवारण भी है। सांख्य का प्रथम सूक्त है सृष्टि परमानंद के लिए हुई।
बुद्ध जब बंधन में थे तब मृत्यु का भय था। तब जरा (बीमार) होने का डर था। तब वे सिद्धार्थ थे। वही सिद्धार्थ बोध गया में कहते हैं मेरा न जन्म है न मेरी मृत्यु है। चेतन ही जीवात्मा और परमात्मा है। अकेले आत्मा कुछ नहीं है अविनाशी है आकाश की तरह। वायु,जल और अग्णि मिलाकर ब्रह्मांड कहलाती है और इसमें गति हो जाती है।
मन, बुद्धि, चित्त और अंहकार के साथ जब आत्मा मिल जाती है तब वह जीवात्मा बन जाती है। यह जीवात्मा अगर ज्ञान में है तो वह परमात्मा हो जाती है। बुद्ध को ज्ञान हुआ। बुद्ध ने कहा कौन सिद्धार्थ न जन्म न मृत्यु। बुद्ध ने आत्मा को स्वीकार किया और उसके परमात्मा होने की दिशा में सार्थक प्रयास किया। जीवात्मा का एक ही उदेश्य है परमात्मा की प्राप्ति। अपने अत:करण में उसे स्थापित कर पाना। बुद्ध ने यही बात दुनिया को समझा दिया। लोग विशेषकर बुद्धिजीवी बुद्ध को समझ नहीं पाये और कह दिया कि बुद्ध नास्तिक थे।
कभी मत सोचिए दुनिया नहीं है। समय बराबर जीरो से हम आंरभ करते हैं। अखंडमण्डलाकारम का अर्थ ही है वह अखंड है और गोल है। जो गोल उसका छोर नहीं पकड़ा जा सकता है उसे कही भी मान कर आरंभ किया जाता है।
क्या ज्ञान में आने के बाद मनुष्य दुख पूरी तरह दुख से मुक्त हो जायेगा? नहीं ऐसा नहीं होगा। त्रिकुटी के उपर तक सत, रज और तक है। इसके उपर जाने पर दुख कम हो जाएगा समाप्त नहीं होगा। ज्ञान हो जाने की स्थिति के बाद आपको पत्ता होता है कि यह शरीर का अंत है आत्मा का नहीं।
देह धरे का दंड भुगते हर कोई।
ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोये।
क्या अभिमण्यु की मृत्यु के बाद कृष्ण को दुख नहीं हुआ होगा? अवश्य हुआ होगा लेकिन ज्ञानी ज्ञान से दुख को कम कर पाता है। अर्जुन अधिक व्याकुल होते हैं कृष्ण से कहते हैं कि आप तो ईश्वर है मेरे अभिमण्यु से मुझे मिला दिजीए। कृष्ण कहते हैं चलो। कृष्ण दिखाते हैं अर्जुन देखते हैं अभिमण्यु एक सिंहासन पर विराजमान हैं। अर्जुन कहते हैं अभिमण्यु मेरा पुत्र। अभिमण्यु कहता है कौन पुत्र कैसा पुत्र। उस शरीर को मैंने छोड़ दिया है। मैं उतने ही समय के लिए धरती पर गया था। अर्जुन समझ जाते हैं।
ब्रह्म विद्यालय आश्रम राजपुर में गुरुदेव स्वामी जी सरकार को भी महात्मा दर्शनानंद जी शरीर छोड़ें जाने का दुख हुआ होगा लेकिन वे ज्ञान में थे इसलिए उन्होंने उस भाव को नियंत्रित कर लिया। जीवन का मध्यकाल ही ज्ञान के प्रकट होने का काल है। जब जीवात्मा के पास परमात्मा के होने का अवसर मिलता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार समाप्त होता है ज्ञान से। महात्मा दर्शनानंद भक्ति के अनुपम उदाहरण थे। उनकी जीवन की एकमात्र इच्छा थी कि उनके गुरुदेव समाधि सरकार की हर इच्छा जो उनसे चाहते हो वह पूरा हो। उनकी अपनी कोई इच्छा नहीं थी।
जब इच्छा समाप्त हो गयी तो वे मुक्त हो गये। महात्मा दर्शंनानंद कहा करते थे कुटी में कुटाओं और मठिया में मढ़ाओ। स्वामी परमहंस दयाल जी भी कुटी बनाने और भक्त बनाने से भी परहेज करते थे। लेकिन जिस प्रकार एक चादर बेचने वाला साइकिल पर घूम-घूमकर चादर बचें और उसका काम हो और फिर वही व्यक्ति एक दुकान खोल ले तो उसका कार्य व्यवस्थित हो जाए यही अंतर है।
हमारे देश में सन्तों की अनेक परम्परा है। राम और कृष्ण की कोई आश्रम परम्परा नहीं है लेकिन गुरु वशिष्ठ, कबीर, नानक सहित अनेक संतो-महात्माओं की है। मठ और आश्रमों से धर्म की परम्परा व्यवस्थित और सुचारु हो जाती है।
एक वृक्ष की तरह ब्रह्मांड भी युवा और वृद्ध होता है यह समाप्त भीहोता है और इसका निमार्ण भी होता है। विग वेन थ्योरी के अनुसार विस्फोट से पृथ्वी का निर्माण हुआ लेकिन यह विस्फोट कहां हुआ। पहले से उपस्थित आकाश और 118 एलीमेंट की उपस्थित के बिना क्या विस्फोट संभव है? निश्चित रुप से यह निर्माण और विध्वंध की प्रकिया चल रही है इसके समय का अनुमान लगाना कठिन है।
कृष्ण ईश्वर थे। लेकिन एक सामान्य बेहेलिया के तीर से मृत्यु को प्राप्त हो गये। अर्जुन को द्धारिका से बासुदेव ने संदेश भेजा कि कृष्ण के जाने के बाद बड़ी संपति और रानियां द्वारिका में असुरक्षित है आप उन्हें हस्तिनापुर ले जायें। अर्जुन जैसा पराक्रमी और वीर जब द्धारिका से हस्तिनापुर चले तो रास्ते में भीलों ने उनकी संपति लूट ली। उन्हें ज्ञान हो गया कि उनका बल समाप्त हो रहा है। इसके बाद ही पांचों पाडंव हिमालय में हिम समाधि के लिये चले चले गये।
शरीर नाशवान है यह सत्य है। आप परमात्मा बनकर इसे छोड़ना चाहते हैं या व्याकुल आत्मा इसी कार्य के लिये आपको यह मानव तन मिला है। तब आपको यह मार्ग सुझाने के लिए राजपुर हो या टेरी स्वामी परमहंस दयाल हो या समाधि सरकार शिवधर्मानंदजी अपने आप को उनके इच्छा में मिलाना होगा जहां सच्चा सुख है सगुण के साथ। बुद्ध ने ऐसा ही किया था।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मदर इंडिया की कालजयी छवि प्राप्त नर्गिस को इस मुकाम पर पहुंचाने में केवल एक ही हाथ था और वह था उनकी मां जद्दनबाई का। पुरुष प्रधान समाज में उन्होंने मेहनत कर अपने बल पर अपनी बेटी को इस मुकाम तक पहुंचाया। इलाहाबाद में 1892 में पैदा हुई जद्दनबाई हिंदू मां दिलीपा और मुस्लिम पिता मियांजान की संतान थीं।
उन्होंने अपने हुनर को इतना निखारा कि वह उस समय की महफिलों की शान बन गईं। यह राजा-रजवाड़ों का दौर था जहां मनोरंजन के नाम पर संगीत और नाच की महफिलें लगा करती थीं और उसमें अमीर राजा, व्यापारी भरपूर पैसे लुटाया करते थे।
जद्दनबाई एक दबंग और खुद्दार औरत थीं और सुरीली आवाज की मालकिन थीं। उन्हें कुछ खास महफिल में गाने के निमंत्रण मिलते थे और उनकी मशहूरी दूर-दूर तक फैल गई थी। खूबसूरत चेहरे और लंबे घने काले केशों वाली जद्दनबाई बहुत दिलकश थीं। गोरा रंग उन्होंने अपनी वालिदा से विरासत में पाया था।
अपने को हुनरमंद बनाने के लिए जद्दनबाई ने ठुमरी, दादरा, गजलें और यहां तक कि पंजाबी लोकगीत सीखना भी शुरू कर दिया था।जद्दनबाई ने बनारसी ठुमरी के स्तंभ उस्ताद मोएजुद्दीन खान से संगीत की शिक्षा पायी। वह एक लाजवाब और कायदे कानून वाले उस्ताद थे क्योंकि उनकी देखरेख में जद्दनबाई चोटी की गायिका बनकर उभरीं।
उनकी आवाज परिपक्व, गहरी और सुरों पर उनकी पकड़ अदभुत थी, चाहे ब्रजभाषा का गीत गाती हों या गालिब की गजल। उनकी आवाज बेगम अख्तर के लिए प्रेरणा थी। जद्दनबाई ने अपना पहला प्रोग्राम बनारस में ही किया था और उनके सबसे पहले प्रशंसक थे बनारस के रईस नरोत्तमदास खत्री जो बच्चू भाई के नाम से जाने जाते थे।
इस शादी से उनका पहला बेटा अख्तर हुसैन पैदा हुआ। उनकी दूसरी शादी थी मास्टर इरशाद हुसैन जो मीर खान के नाम से भी जाने जाते थे और जद्दनबाई के लिए हारमोनियम बजाते थे। इनसे उनकी संतान पैदा हुई अनवर हुसैन और फिर दोनों जुदा हो गए। इसके बाद जद्दनबाई लखनऊ चली गई और फिर वहां से कलकत्ता।
लखनऊ आना उनकी जिंदगी में एक नया मोड़ साबित हुआ। यहां उनकी मुलाकात रावलपिंडी से आए और डॉक्टरी पढ़ने के लिए विदेश जाने वाले युवा से हुई जिन्होंने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा। जद्दनबाई ने इसके लिए उनके माता-पिता की अनुमति चाही तो वे वापस रावलपिंडी लौट गया। इस बीच जद्दनबाई कलकत्ता चली आयी।
यहां कुछ समय बाद फिर वह युवा पहुंचा उसका नाम था उत्तमचंद मोहन या मोहन बाबू। प्यार में अपना नाम बदलकर अब्दुल रशीद बन गया और 1928 में दोनों ने निकाह कर लिया। उनके धर्म परिवर्तन की रस्म मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने संपन्न कराई थी। तब जद्दनबाई 32 साल की थीं और मोहन बाबू उनसे 4 साल छोटे थे।
01 जून 1929 को कलकत्ता में जद्दनबाई ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसके बचपन का नाम था बेबी रानी। वैसे हिंदू और मुस्लिम रिवाजों के अनुसार उसके दो अन्य औपचारिक नाम भी रखे गए तेजेश्वरी और फातिमा। यही बालिका आगे चलकर हिंदी सिनेमा की प्रसिद्ध तारिका नर्गिस बनीं।
पहले इस परिवार ने किसी इज्जतदार धंधे में पैर जमाने की कोशिश की लेकिन विफल होने पर जद्दनबाई को अपने नाच गाने के हुनर पर ही विश्वास करके काम करना पड़ा। इस बीच हुआ यह कि मूक फिल्में बनना शुरू हो गयी थीं और ज्यादातर फिल्मों में तवायफों को ही काम मिल रहे थे। लाहौर फिल्मों का एक बड़ा केंद्र बनने लगा था।
1928 में अब्दुल रशीद करदार ने यूनाइटेड प्लेयर्स कॉरपोरेशन की स्थापना कर फिल्में बनाना शुरू किया तो जद्दनबाई को परिवार समेत लाहौर बुला लिया और उनके बेटे अनवर को भी काम-धंधे में लगाया। अभिनेत्री के रूप में जद्दनबाई की पहली फिल्म थी-राजा गोपीचंद (1933)। लाहौर में उन्होंने मोती गिडवानी की फिल्म इंसान या शैतान में भी काम किया, लेकिन बात बनी नहीं।
इस बीच इम्पीरियल स्टूडियो के मालिक आर्देशिर ईरानी ने जद्दनबाई को बंबई बुला लिया। नानूभाई वकील द्वारा निर्देशित फिल्म सेवा सदन (1934) में जद्दनबाई ने उस दौर की मशहूर तारिका जुबैदा के साथ अभिनय किया। जद्दनबाई, फातिमा बेगम और जुबैदा की जीवनशैली से बहुत प्रभावित थीं और अपनी इच्छाओं को भी वैसे ही साकार करना चाहती थीं।
1934 में जद्दनबाई ने पांच साल की बेबी रानी (नर्गिस)को फिल्म नाचवाली में प्रस्तुत किया। मैरीन ड्राइव के शानदार फ्लैट में रहने वाली जद्दनबाई के पति मोहन बाबू कोई काम नहीं करते थे, इसलिए बेटे-बेटियों का भविष्य संवारने के लिए दबंग जद्दनबाई को ही पहल करना पड़ी।
साल 1936 में उन्होंने संगीत मूवीटोन नामक कम्पनी की स्थापना की। अपने बच्चों को लेकर ही उन्होंने लगातार पांच फिल्में बनाईं और महिला फिल्मकारों की पंक्ति में अपना नाम दर्ज कराया। ये फिल्में थीं- तलाश-ए-हक, हृदय-मंथन, मैडम फैशन, जीवन-स्वप्न और मोती का हार, जिनके सारे पक्षों का काम स्वयं जद्दन ने संभाला।
कहानी और संवाद लिखे। निर्माण और निर्देशन किया। संगीत दिया और अभिनय भी किया। उन्होंने अपने बेटी को हिंदी और अंग्रेजी की तालीम दिलाई और उसे तराशकर हीरा बना दिया। उनका निधन 08 अप्रैल, 1949 को हुआ।
जद्दनबाई ने अपने घर के दरवाजे सबके लिए खोल रखे थे। हर वह आदमी जो सिनेमा में हाथ आजमाना चाहता, जद्दनबाई के घर जरूर आता था। वह बिना किसी लालच के जरूरतमंदों की मदद करती थीं। अपनी मां, तीन बच्चों और पति के अलावा उनका घर मेहमानों से भरा रहता। शातो मरीन, जिस इमारत में आखिर तक रही, जहां उनके नाती-पोते अभी तक रहते हैं, बंबई के समुद्र तट पर कला का बेजोड़ नमूना है, जो बड़े-बड़े कमरों वाले फ्लैटों का पांच मंजिला बंगला है। उनके समय में सभी कमरे भरे रहते और अगर फिर भी कोई आ जाता तो उसके सोने के लिये बरामदे में चारपाई डाल दी जाती थी। (लेखक, वरिष्ठ कला-संस्कृति एवं फिल्म समीक्षक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की प्राचीन गौरवशाली संस्कृति समस्त विश्व के सुख, समृद्धि एवं शान्ति की कामना करती है। भारतीय चिन्तन में व्यष्टि से समष्टि तक का विचार किया गया है। भारतीय पर्व इस बात का प्रतीक हैं। यहां पर प्राय: प्रतिदिन कोई न कोई लोकपर्व, व्रत, पूजा एवं अनुष्ठान का दिवस होता है, जो इस बात का प्रतीक है कि भारतीय अपने जीवन में कितने प्रसन्न रहते हैं। हमारे धर्म ग्रन्थों में भी सुख पर अनेक श्लोक एवं मंत्र हैं।
अर्थात सभी सुखी रहें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुख का भागी न बनना पड़े।
किंतु आज भारतीय प्रसन्नता के मामले बहुत पिछड़ गये हैं। अब भारतीय पूर्व की भांति प्रसन्न नहीं रहते। वे दुखी रहने लगे हैं। एक सर्वे में यह बात सामने आयी है। अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस पर जारी वार्षिक प्रसन्नता रिपोर्ट के अनुसार 137 देशों की सूची में भारत 125वें स्थान पर है।
वर्ष 2022 में भारत इस सूची में 144वें स्थान पर था तथा वर्ष 2021 में 139वें स्थान पर था। प्रसन्नता के संबंध में पड़ोसी देशों की स्थिति भारत से अच्छी है। यह अतिरेक सा लगता है। पाकिस्तान 108वें स्थान पर है, जबकि म्यांमार 72वें, नेपाल 78वें, बांग्लादेश 102वें और चीन 64वें स्थान पर है।
इस रिपोर्ट के अनुसार फिनलैंड विश्व का सर्वाधिक प्रसन्नता वाला देश है। विगत छह वर्षों से वह अपने इस स्थान पर बना हुआ है। डेनमार्क द्वितीय और आइसलैंड तृतीय स्थान पर है। इस सूची में इजरायल चौथे स्थान पर है, जबकि नीदरलैंड्स पांचवें, स्वीडन छठे, नार्वे सातवें, स्विटजरलैंड आठवें, लक्जमबर्ग नौवें और न्यूजीलैंड दसवें स्थान पर है।
सबसे कम प्रसन्न देशों की सूची में लेबनान, जिम्बॉब्वे, द डेमोक्रेटिक रिपब्लिक आॅफ कांगो आदि देश सम्मिलित हैं। इस सूची में अफगानिस्तान अंतिम स्थान पर है। उसे 137वां स्थान प्राप्त हुआ है।
उल्लेखनीय है कि विगत एक वर्ष से रूस और यूक्रेन के मध्य युद्ध चल रहा है। फिर भी इन देशों की स्थिति भारत से अच्छी बताई गई है। इस सूची में रूस 70वें स्थान पर है, जबकि यूक्रेन को 92वें स्थान पर है। यह रिपोर्ट यूएन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क द्वारा जारी की गई है। यह रिपोर्ट 150 से अधिक देशों के लोगों पर किये गये ग्लोबल सर्वे डाटा के आधार पर बनायी जाती है।
प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने जुलाई 2011 में प्रसन्नता के संबंध में एक प्रस्ताव अपनाया था। इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली ने 12 जुलाई 2012 को प्रस्ताव के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाने की घोषणा की थी।
इस संबंध में अप्रैल 2012 में भूटान की राजसी सरकार ने विश्वभर के प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलाई थी। इसमें इस बात पर चर्चा की गई कि लोगों की प्रसन्नता और कल्याण को भी आर्थिक दृष्टिकोण की तरह देखने की आवश्यकता है। बैठक में इसके लिए एक आयोग नियुक्त करने की भी अनुशंसा की गई। भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मे थिनले ने इस अनुशंसा को स्वीकार किया।
उनका कहना था कि सभी देशों की सरकारों को लोगों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के साथ-साथ उनकी प्रसन्नता और कल्याण को भी अधिक से अधिक महत्व देना चाहिए। उन्होंने बैठक में प्रस्ताव रखा कि संयुक्त राष्ट्र भी इस आयोग का सह-स्वामित्व करे और यह आयोग यूएन महासचिव के सहयोग से इस दिशा में कार्य करे।
विश्वभर के प्रसन्नता वाले नगरों में उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर सम्मिलित है। यहां के लोग प्रसन्न रहने वाले तथा मित्र बनाने वाले हैं। यह नगर समस्त भारत के लिए प्रेरणा बन गया है। इससे यह बात सामने आती है कि मित्रों के साथ रहने से व्यक्ति प्रसन्न रहता है। मित्र दुख- सुख के साथी होते हैं। मित्रों से बात करने पर मन हल्का हो जाता है। मित्र निराशा के समय आशा की किरण दिखाते हैं। मित्र प्रोत्साहित करते हैं।
मित्रों के साथ व्यक्ति अपने जीवन का बहुत अच्छा समय व्यतीत करता है। मित्रों के साथ रहने से प्रसन्नता प्राप्त होती है। प्रसन्नता एक अनुभूति है। यह मानव मस्तिष्क में पाई जाने वाली भावनाओं में सबसे सकारात्मक अनुभूति है। इस अनुभूति के उत्पन्न होने के अनेक कारण हैं। इनमें अपनी किसी इच्छा की पूर्ति होने पर होने वाली संतुष्टि की अनुभूति सर्वोपरि है।
प्राय: जीवन बहुत विशाल होता है। जीवन से सदैव सुख प्राप्त नहीं होता। मनुष्य को अनेक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है। यह अतिशय नहीं है कि जीवन में सुख कम और दुख अधिक होता है। इसके अनेक कारण है। मनुष्य जीवन में सदैव सुख की कामना करता है। वह समृद्धि प्राप्त करना चाहता है।
वह अपार धनराशि संचय करना चाहता है, अर्थात वह जीवन में सबकुछ प्राप्त करना चाहता है, परन्तु सदैव ऐसा नहीं होता। उसकी कुछ इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं तथा कुछ इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं। उसकी जो इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं, वह उसके बारे में विचार नहीं करता, अपितु उससे अधिक की कामना करने लगता है।
ऐसी परिस्थितियों में वह दुख का भागीदार बन जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी जो इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं वह उनके बारे में भी चिंता करता रहता है। इस चिंता के कारण वह मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाता है। यह मानसिक तनाव उसे अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त कर देता है। इस प्रकार के मानसिक तनाव से ग्रस्त व्यक्ति आत्महत्या करके अपना जीवन भी समाप्त कर लेता है।
उल्लेखनीय है कि आत्महत्या की सभी घटनाओं के पीछे मानसिक तनाव ही कारण होता है। यह स्थिति दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती जा रही है। वयस्क ही नहीं, अपितु बालक भी आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर रहे हैं। ऐसी अनेक घटनाएं सामने आती रहती हैं।
मानसिक तनाव के क्या कारण हैं? इस पर चिंतन-मनन किया जाना चाहिए। बाल्यकाल जीवन का सबसे उत्तम समय होता है। यह तनाव मुक्त होता है। बच्चों पर किसी भी प्रकार का कोई दायित्व नहीं होता। उन्हें केवल शिक्षा प्राप्त करनी होती है तथा अपना शेष समय खेलकूद में व्यतीत करना होता है। फिर आज के बच्चे तनाव ग्रस्त क्यों हैं? इसके अनेक कारण हो सकते हैं।
प्राय: देखने में आता है कि माता-पिता बच्चों पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव बनाते हैं। सभी बच्चे पढ़ाई में श्रेष्ठ नहीं हो सकते। बच्चे प्रात:काल में अपने विद्यालय जाते हैं। वहां से आने के पश्चात ट्यूशन के लिए जाते हैं।
वहां से आने पर विद्यालय एवं ट्यूशन का कार्य करते हैं। ऐसे में बच्चों के पास अपने स्वयं के लिए समय ही नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त बच्चों को जबरन अन्य गतिविधियों में डालना एवं उन पर श्रेष्ठ प्रदर्शन का दबाव डालना भी उन्हें मानसिक तनाव से ग्रस्त कर देता है।
माता-पिता के लिए अत्यावश्यक है कि वे अपने बच्चों की मनोस्थिति को समझें तथा उनकी पसंद एवं नापसंद का ध्यान रखें। वे बच्चों को विपरीत परिस्थितियों में भी सुख से रहने की शिक्षा दें। वे बच्चों को बताएं कि सुख और दुख दोनों ही जीवन के अभिन्न अंग हैं। हमें दुखों से घबराना नहीं चाहिए, अपितु ऐसे समय में संयम और धैर्य बनाए रखना चाहिए।
यदि हम दुखों को चुनौती मानेंगे तथा स्वयं को योद्धा मानकर उसका सामना करेंगे, तो अवश्य ही हम विजय प्राप्त कर सकेंगे तथा विजेता सिद्ध होंगे। बच्चों को धार्मिक कथाएं सुनानी चाहिए कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्टों का सामना किया।
इसी प्रकार भगवान राम का उदाहरण भी है कि किस प्रकार उन्होंने अपने पिता का वचन पूर्ण करने के लिए चौदह वर्षों का वनवास सहर्ष स्वीकार किया, किस प्रकार उन्होंने रावण का संहार किया।
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र की कथा भी प्रेरणा देने वाली है कि किस प्रकार राजा हरिश्चंद्र ने अनेक कष्टों का सामना किया, परन्तु सत्य को नहीं त्यागा। इसी प्रकार पंचतंत्र की कहानियां बच्चों के लिए बहुत ही उपयोगी हैं तथा प्रेरक प्रसंग एवं महापुरुषों की जीवनी का ज्ञान बच्चों को करानी चाहिए।
आज के वातावरण में बच्चे टीवी या मोबाइल में ही अधिक लगे रहते हैं। ऐसे में बच्चों को टीवी पर ऐसे कार्यक्रम देखने के लिए प्रोत्साहित करें, जो उनके लिए उपयोगी हैं। दूरदर्शन के अनेक चैनलों पर शिक्षा से संबंधित कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, विद्यार्थियों के लिए बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त बच्चे मोबाइल पर भी केवल शिक्षा संबंधी चीजें ही देखें।
कोरोना काल से मोबाइल भी बच्चों की शिक्षा का एक अंग बन चुका है। माता-पिता को चाहिए कि वे इस पर पूर्ण दृष्टि बनाये रखें कि उनके बच्चे मोबाइल में क्या देख रहे हैं, क्योंकि बहुत से ऐसे खेल सामने आ रहे हैं, जो बच्चों को मानसिक तनाव से ग्रस्त कर रहे हैं। इस खेलों के कारण बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के अनेक मामले में भी सामने आ चुके हैं।
इतना ही नहीं, यूट्यूब पर अनेक ऐसी चीजें हैं, जो बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं। उदाहरण के लिए हंसी-मजाक के अनेक वीडियो ऐसे हैं, जिनमें अशिष्टता के साथ-साथ अश्लीलता भी है।
मानव को बाल्यकाल से ही जीवन मूल्यों की शिक्षा देना हमारी भारतीय परंपरा का अंग रहा है। यह हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता है। विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा दी जाये, जो उन्हें अक्षर ज्ञान के साथ-साथ जीवन मूल्यों को समझने में भी सहायक सिद्ध हो।
बच्चे जीवन में प्रसन्न रहना सीखें। बच्चा विद्यालय में कम समय व्यतीत करता है, परंतु अधिक समय अपने घर में ही परिवारजनों के साथ रहता है। इसलिए यह अत्यावश्यक है कि माता- पिता स्वयं भी प्रसन्न रहें तथा अपने बच्चों को प्रसन्न रहना सिखायें। (लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल में सहायक प्रोफेसर हैं। )
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरता है जिस दिन देश के किसी ना किसी भाग में सड़क हादसा न हुआ हो और उनमें कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़े। विकास की प्रतीक मानी जाने वाली सड़कें विनाश का पर्याय बनती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में सड़क हादसों में मारे गए 10 लोगों में से कम से कम एक भारत से होता है।
भारत में सड़क हादसों के आंकड़े बताते हैं कि देश में वर्ष 2021 में सड़क दुर्घटनाओं में 1.55 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई है। यह आंकड़ा औसतन 426 लोग प्रतिदिन या हर घंटे 18 लोगों का है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार पिछले साल देशभर में 4.03 लाख सड़क दुर्घटनाओं में मौतों के अलावा 3.71 लाख लोग घायल भी हुए थे।
देश में दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों पर राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक रोड एक्सीडेंट के मामले 2020 में 3,64,796 से बढ़कर 2021 में 4,03,116 हो गये। मौतों में 16.8% बढ़ोतरी हुई है। 2020 में 1,33,201 और 2021 में 1,55,622 लोगों ने सड़क हादसे में अपनी जान गंवायी है। साथ ही 2021 में प्रति हजार वाहनों की मौत दर 2020 में 0.45 से बढ़कर 2021 में 0.53 हो गयी है। विश्लेषण से पता चलता है कि अधिकांश सड़क दुर्घटनाएं तेज गति के कारण हुई हैं।
देश में मोटर व्हीकल एक्ट में किया गया संशोधन 1 सितंबर 2019 से लागू हुआ था। इसका मकसद देश में सड़क पर यातायात को सुरक्षित बनाना और सड़क हादसों में लोगों की मौत की संख्या को कम करना था। भारत में होने वाले सड़क हादसे में करीब 26 फीसदी खतरनाक या लापरवाह ड्राइविंग या ओवरटेकिंग की वजह से होते हैं। कोविड-19 महामारी की रोकथाम के लिए देशभर में लॉकडाउन लगाया गया था। उससे सड़क हादसों में लगभग बीस हजार लोगों की जिंदगी बचायी गयी। अप्रैल से लेकर जून 2020 तक सड़क हादसों में 20 हजार 732 लोगों की मौत हुई। जबकि 2019 में अप्रैल से जून के बीच 41 हजार 32 लोगों की सड़क हादसों में जान चली गयी थी।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि भारत का राजमार्ग ढांचा 2024 तक अमेरिका के बराबर हो जायेगा। जिसके लिए समयबद्ध मिशन मोड में काम चल रहा है और ग्रीन एक्सप्रेसवे और रेल ओवर ब्रिज का निर्माण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारतमाला 2 के लिए जल्द ही कैबिनेट की मंजूरी मिलने की संभावना है और इसके बाद यह देश में एक मजबूत बुनियादी ढांचे की आवश्यकताओं को पूरा करेगा। गडकरी ने कहा मुझे विश्वास है कि भारत के राजमार्ग 2024 तक अमेरिका के बराबर हो जायेंगे। भारत की लंबाई और चौड़ाई में हरित एक्सप्रेसवे के नेटवर्क सहित एक मजबूत बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए समयबद्ध मिशन मोड में काम चल रहा है। गडकरी ने उम्मीद जताई कि 2025 तक सड़क दुर्घटनाएं और इसके कारण होने वाली मौतें 50 प्रतिशत तक कम हो जायेंगी।
गडकरी का कहना है कि जानलेवा सड़क हादसों पर लगाम लगाने के लिए राज्यों को केन्द्रीय सड़क कोष के एक हिस्से का इस्तेमाल करना चाहिये और दुर्घटना वाली जगहों को दुरुस्त करना चाहिये। उन्होंने कहा कि हम न सिर्फ राष्ट्रीय राजमार्गों पर बल्कि राज्य राज मार्गों पर भी हादसों की संख्या कम करने की कोशिश कर रहे हैं। जिलों में सड़क सुरक्षा समितियां गठित की जानी चाहिये। जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ सांसदों को करनी चाहिये और जिलाधिकारियों को इनका सचिव बनाया जाना चाहिये। यह समिति जिला स्तर पर दुर्घटना के सभी पहलुओं को देखे।
सरकार सड़क दुर्घटनाओं और मौतों को कम करने के लिए तेजी से काम कर रही है। इसके लिए नीतिगत सुधारों और सुरक्षित प्रणालियों को अपनाया जा रहा है। 2030 तक भारतीय सड़कों पर जीरो एक्सीडेंट की दृष्टिगत करने की दिशा में कई कदम उठाये गये हैं। गडकरी के अनुसार सरकार सड़क पर दुर्घटना संभावित क्षेत्र की पहचान करने और इसके समाधान के लिए 14 हजार करोड़ रुपये खर्च करेगी।
सड़कों पर बने मोड़ों जैसे टी जंक्शन और टी वाई पर सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं होती है। देश भर में हुए कुल हादसों में से 37 फीसदी हादसे उन्हीं चौराहों और मोड़ों पर होते हैं। उनमें से तकरीबन 60 फीसदी हादसे टी और टी वाई जंक्शन पर रिकॉर्ड किए गए। इनकी सबसे बड़ी वजह ड्राइवरों की गलती रहती है। स्पीड सीमा को पार करना, शराब पीकर गाड़ी चलाना, ओवरटेकिंग और मोबाइल पर बात करते हुए गाड़ी चलाना कुछ ऐसी गलतियां हैं। जिनसे बड़ी संख्या में सड़क हादसे हो रहे हैं। कुल सड़क हादसों में से 84 फीसदी हादसों के पीछे ड्राइवरों की गलती होती है।
शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से नगरीय बस सेवाओं के भरोसे है। जिनमें ज्यादातर बसें पुरानी हो चुकी हैं। कई अध्ययनों में ये बात सामने आई है कि शहरों की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए हमें इस समय सड़कों पर चल रही बसों के मुकाबले कई गुना अधिक बसों की जरूरत है। सड़क हादसों के कारण अक्सर परिवारों की आमदनी के स्रोत को नुकसान होता है व उनकी रोजी रोजगार छिन जाता है।
संबंधित परिवार को आर्थिक दिक्कतें होती हैं। जो लोग सड़क दुर्घटनाओं में बच भी जाते हैं उनके इलाज में भारी रकम खर्च करनी पड़ती है। हालांकि 2019 का मोटर व्हीकल एक्ट सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों को बीमा के जरिए आर्थिक मदद उपलब्ध कराता है। लेकिन इस कानून से सड़क हादसों के शिकार लोगों को होने वाली मानसिक क्षति की भरपाई नहीं होती। इंटरनेशनल रोड फेडरेशन के मुताबिक भारत में सड़क हादसों में सालाना करीब 20 अरब डॉलर का नुकसान होता है।
देश की सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ता जा रहा है। इस पर नियंत्रण के उचित कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही वाहनों की सुरक्षा के मानकों की समय-समय पर जांच होनी चाहिए। स्कूलों में सड़क सुरक्षा से जुड़े जागरूकता अभियान चलाये जायें। भारी वाहन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को परमिट दिये जाने की प्रक्रिया में कड़ाई बरती जाये। ड्राइविंग लाइसेंस के लिए योग्यता भी तय की जाये। साथ ही छोटे बच्चे और किशोरों के वाहन चलाने पर कड़ाई से रोक लगे। तेज रफ्तार, सुरक्षा बेल्ट का प्रयोग न करने वालों और शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। तभी देश में सडकों पर लगातार हो रही दुर्घटनाओं पर रोक लग पायेगी। (लेखक राजस्थान के झुंझनु के वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 980 के दशक का कालखंड भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइंट था, जब जनसंघ के बाद भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। स्वाधीनता मिले अभी तीन दशक ही हुए थे कि देश भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अपराधीकरण, जातिवाद, तुष्टिकरण, आतंकवाद और आपातकाल जैसे घावों से छलनी होने लगा था। किसे पता था कि आजादी के बाद जिन्होंने राजनीति का उत्तराधिकार पाया, वे अपनी स्वार्थलिप्सा में इतने कम समय में देश को बर्बादी के कगार पर पहुंचा देंगे।
वे सत्ता में बने रहने के लिए तुष्टिकरण का ऐसा भ्रमजाल फैलाएंगे कि राष्ट्रीय अस्मिता भी धूमिल हो जाये और राष्ट्र की सच्ची पहचान उनके क्षुद्र राजनीतिकनारों से नष्ट हो जायेगी। परंतु तत्कालीन राष्ट्रवादी समूहों को इसका भान हो गया था और वे भारतीय राजनीति को सही दिशा देने व एक सम्यक विकल्प देने के लिए आगे आये, तब भाजपा की स्थापना हुई।
थोड़ा गहराई में विचार करने से पता चलता है कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी राजनीतिक दलों ने वोट बैंक की गुलामी की एक विशेष चादर ओढ़ ली थी। उन दिनों भारत में भारतीयता की बात करना भी जैसे अपराध होता था। भारत में भारतीय संस्कृति, आध्यात्म, धर्म और उसके विविध विषयों की चर्चा को सांप्रदायिक ठहराया जाता था। ऐसी परिस्थिति में भारत की राजनीति को भारतीयता की ओर उन्मुख करने और उसके सांस्कृतिक सरोकारों को राजनीति का केंद्र बनाने के लिए भाजपा की नींव पड़ी।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विराट विचार को लेकर 1980 में आज ही के दिन भारतीय जनता पार्टी की विधिवत स्थापना हुई थी। जिसका एक बड़ा लक्ष्य था, भारत की एकात्मता को बचाना। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के द्वारा देश को खंडित होने से बचाने के लिए एकात्म मानववाद के मूल दर्शन पर चलना। एक ऐसा दर्शन जो मनुष्य और समाज के बीच कोई संघर्ष नहीं देखता, बल्कि मनुष्य के स्वाभाविक विकास-क्रम और उसकी चेतना के विस्तार से परिवार, गांव, राज्य, देश और सृष्टि तक उसकी पूर्णता देखता है। अन्य दलों की तरह भारत को नेशन स्टेट की तरह देखने की बजाय भाजपा ने इसे राष्ट्र माना और कहा कि इसका राष्ट्रवाद सांस्कृतिक है केवल भौगोलिक नहीं।
भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अंतर्गत गरीबी मिटाना केवल नारा नहीं, उसका संकल्प था। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण कोई भाषण नहीं, प्रतिबद्धता थी। कश्मीर में 370 की समाप्ति चुनावी जुमला नहीं, राष्ट्रीय एकात्मताका साक्षात संकल्प था। अब से चार दशक पहले बनी भाजपा के लिए अन्त्योदय स्लोगन नहीं, यह गरीबों का जीवन स्तर ऊंचा करने का सपना था, जिसे पार्टी के किसी भी नेतृत्व ने कभी भी देखना नहीं छोड़ा।
1980 से लेकर अब तकभाजपा के सभी नेतृत्वकर्ता इस सपने को पूर्ण करने में सक्रियरहे हैं। वे उन संकल्पों को साकार करने के लिए दिन-रात अपना श्रेष्ठतम समर्पित करते रहे हैं।वे भावी पीढ़ी को भी इन संकल्पों को साकार करने का सामर्थ्य देते हैं। शोषणमुक्त, समतायुक्त समाज की स्थापना भाजपा का चुनावी मुद्दा नहीं है, यह इसकी मूल दृष्टि है।
भारत के सांस्कृतिक मानबिन्दुओं की रक्षा हो, भारत की अखंडता का प्रश्न हो अथवा समाज को समरस रखने की चुनौती हो, सभी मुद्दों पर भाजपा विगत चार दशक से अबाध रूप से अपना संकल्प सिद्ध करती आ रही है। अपने सिद्धांतों पर चलते हुए पार्टी आज 43 साल की यात्रा पूरी कर रही है। इस यात्रा में अनेक बाधाएं व कठिनाइयां भी आयी हैं परन्तु पार्टी अपने सिद्धांतों व आदर्शों पर अडिग रहते हुए आगे बढ़ती रही है।
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और उसकी मूल भावना का पालन करते हुए पार्टी ने देश के सभी हिस्सों में जनता का अटूट विश्वास हासिल किया है। आज लोकसभा में 303, राज्यसभा में 93, एमएलए 1420, एमएलसी 150 सहित 16 राज्यों में भाजपा नीत सरकारें हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सारे देश ने एक दल की विचारधारा को समादृत किया है औरभाजपा के राष्ट्रवादी चिंतन से लोग जुड़ते जा रहे हैं। इसलिए स्थापना दिवस के प्रसंग में चुनावी हार जीत के आंकड़ों को दरकिनार कर भाजपा के वैचारिक विस्तार को देखना समीचीन होगा।
सन 1980 में स्थापित पाटीर्तीन दशक के अल्पकाल में ही स्वाधीनता पूर्व के दलों का राष्ट्रीय विकल्प बन गई। साथ ही उन क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व तोड़ने में भी कामयाब हुई, जिन्होंने सामाजिक न्याय की आड़ में परिवारवाद, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट और वोट बैंक की राजनीति को ही अपना धर्म बना लिया था। लोक लुभावन वादों की क्षणिक व स्वार्थ भरी राजनीति को भी नकारने में भाजपा ही विकल्प बनी है। पार्टी को जब-जब अवसर मिला है उसने समस्याओं के स्थाई समाधान पर ध्यान दिया है।
स्थापना के 34 वें साल में जब 2014 में देश ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा पर पूरी तरह भरोसा जताया, तब से भाजपा सरकार अपने सभी वादों को एक एक करके पूरा करती आ रही है। श्रीराम मंदिर निर्माण करने, कश्मीर से 370 हटाने के साथ-साथ भारत के सांस्कृतिक आध्यामिक ढांचे के युगानुकूल विकास के कार्यों को भी अमलीजामा पहना रही है। आज भारत की एकात्मता के लगभग सभी तीर्थ केंद्र विकास का नया प्रतिमान गढ़ रहे हैं।
सात दशक से उपेक्षा का दंश झेल रहे हमारे आध्यात्मिक केंद्र राष्ट्रवादी दल की सरकार की प्राथमिकता में शामिल हुए हैं और अबउनका गौरव पुनर्स्थापित हो रहा है।
दरअसल, भाजपा ने चार दशक में देश की राजनीतिक संस्कृति को बदल दिया है। एक ओर जहां परिवारवादी, तुष्टिकरण और जातिवादी राजनीति का दौर समाप्त हो गया, वहीं अब धर्म-संस्कृति की बात करना सांप्रदायिक होना नहीं है। राष्ट्रवाद की चर्चा अब संकुचित मानसिकता का परिचायक नहीं है। सरकार की ओर से देवालयों का विकास करना, अब ध्रुवीकरण नहीं है।
भारतीयता की बात करना और मातृभाषा में काम करना अब पिछड़ापन नहीं है। हिन्दुत्व का विचार अब सर्वग्राही बन गया है। अपनी प्रखर व प्रतिबद्ध कार्यशैली से भाजपा ने देश के राजनीतिक विमर्श को परिवर्तित करने में ऐतिहासिक सफलता पायी है। इस पड़ाव पर भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, एकात्म मानववाद तथा अपनी पंचनिष्ठाओं की नींव पर गर्व से खड़ी है।
आजादी के बाद भ्रष्टाचार का घुन कब दानव बन गया पता ही नहीं चला। सभी दल भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे हुए नजर आने लगे। पिछले नौ साल में भाजपा की मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने का जो अभियान चलाया है, उसका असर सारा देश देख रहा है। भ्रष्टाचार में लिप्त कोई भी व्यक्ति मोदी सरकार में बच नहीं सकता। सैकड़ों जेबों से होकर गुजरने वाला सरकारी धन अब सीधे गरीब के खाते में पहुंच रहा है। बिना कटौती अनाज का एक-एक दाना गरीब आदमी की झोली में जा रहा है।
बिना रिश्वत के गैस कनेक्शन, प्रधानमंत्री आवास, आयुष्मान कार्ड सहित अनेक योजनाएं आम नागरिक तक सीधे पहुंच रही हैं। डिजिटल इकोनॉमी में भारत दो साल में ही अव्वल हो गया है, तो इसका कारण यही है कि लाभ का सही हिस्सा हर खाते में सीधा हस्तांतरित हो रहा है।
वस्तुत: पार्टी नेतृत्व ने सुशासन की संस्कृति से पार्टी के अन्त्योदय के सिद्धांत को आदर्श रूप में जमीन पर उतारा है। पार्टी की सफलता का यही पैमाना है कि इसकी नीतियों का लाभ पंक्ति के अंतिम पड़ाव पर खड़े व्यक्ति को मिल रहा है। समाज के निचले पायदान पर मौजूद व्यक्ति के कल्याणका अर्थ है गरीब, किसान, ग्रामीण, महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों सहित सभी वर्गों को सुशासन का लाभ मिले। सबको शिक्षा, सबको स्वास्थ्य, सबको अन्न जब मिलता है तब सच्चे अर्थों में सुशासन का संकल्प परिलक्षित होता है।
सुशासन अंतत: राष्ट्र के गौरव पथ का मार्ग प्रशस्त करता है, जिस पर भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बहुत आगे निकल चुका है। (लेखक, भाजपा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष एवं खजुराहो लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। चीन ने अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न जगहों का नाम बदलने का एक ऐसा शिफूगा छोड़ा है जिसमें ना आवाज है और न चिंगारियां। फिलहाल यह पहली मर्तबा नहीं हुआ है जब उसने इन जगहों के नाम बदलने की कोशिश की हो। पूर्व में भी वह ऐसी ओछी हरकतें कर भारत को उकसाने का काम किया। उसकी इस गीदड़ भभकी को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। पर, सतर्कता बरतनी बेहद जरूरी है। दुश्मन चाहे, कमजोर हो या ताकतवर, हल्के में नहीं लेना चाहिए।
केंद्र की खुफिया एजेंसियों और अरुणाचल प्रदेश की लोकल इंटेलिजेंस को पैनी निगरानी उन क्षेत्रों पर रखनी होगी, जिनका नाम बदलने का जिक्र किया है। सैन्य पहरा भी जरूरी है क्योंकि यही वो भाग है जिसपर दुश्मन की कई दर्शकों से नजर है। चीन ने अपने सरकारी अखबार के जरिये जो ये विवादित बात कही है, उसके परिणाम दूरगामी भी हो सकते हैं। क्योंकि इस बार उनकी बाकायदा मीटिंग में नाम तय किये गये हैं। जैसे विपक्ष सालों से आरोप लगाता आया है कि चीन अरुणाचल प्रदेश के कई हिस्सों में घुस गया है। आज से दो वर्ष पूर्व यानी दिसंबर-2021 में भी चीन ने अरुणाचल के विभिन्न जगहों के नाम बदले का कोरा झूठ बोला था। तब हमारे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था कि चाइना ऐसा करके हमें दिव्य भ्रमित करना चाहता है।
अपनी नापाक हरकतों से हमारी नजरें हटाना चाहता था। सोचने वाली बात है, हमसे हजारों किलोमीटर दूर पर बैठे लोग पहले से तय हमारे स्थानों के नाम बदलने की बात करता है। इससे उनके दिमाग का दिवालियापन ही कहा जाएगा। ऐसे तो हमारी सरकार भी दिल्ली में बैठकर शंघाई का नाम संघर्ष नगर रख देगी, तो क्या उससे उसका नाम संघर्ष नगर हो जायेगा। नाम तो नहीं बदलेगा। पर, उपहास जरूर उड़ेगा, जैसा इस वक्त चीन का उड़ रहा है।
नाम बदलने का नया विवाद दरअसल है क्या? इसे आसान थ्योरी में अगर समझें, तो इसे चीन की नापाक चाल ही कहेंगे। उसने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताकर करीब हमारे 11 अधिकृत स्थानों को अपना नाम दिया है। इसके लिए बाकायदा बीते रविवार को चीनी कैबिनेट की स्टेट काउंसिल मीटिंग आयोजित हुई जिसमें ये सभी प्रस्ताव पारित हुए। अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों को बिंदुवार तरीके से नए नाम रखे गये। क्योंकि इन नामों की पहले से उनके पास सटीक भोगौलिक जानकारियां हैं ही, जिन स्थानों के नाम बदलने की ये घोषणा हुई है उनमें दो रिहायशी इलाके हैं।
पांच ऊंचे पर्वतों वाली चोटियां हैं। दो नदियां हैं और दो अन्य क्षेत्र हैं। दोनों नदियों का पानी दोनों ओर गिरता है। फिलहाल हमारे पास ये खबर अभी तक चीन सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के हवाले से आयी है। अधिकृत तौर पर उनकी सरकार ने अभी कोई कोई सूचना नहीं दी है और ना ही ऐसे कोई प्रयास किये गये हैं।
गौरतलब है, चीन ने बाकायदा उन स्थानों के अधीनस्थ प्रशासनिक जिलों की श्रेणी भी सूचीबद्ध की है। जबकि, ऐसी ही एक हिमाकत 2017 में भी की थी, जब उसने अरुणाचल के छह स्थानों को अपना बताया था। भारत सरकार ने हमेशा इन हरकतों का प्रतिवाद किया है और करना भी चाहिए। उनको पता है ये उनका मात्र चिढ़ाने वाला तरीका है। जब, कोई लिखित में चिट्ठी या कब्जे की सीधी कोशिशें होगी तो उसका प्रतिकूल और माकूल उत्तर दिया जायेगा।
फिलहाल सरकार वेट एंड वॉच की स्थिति में है। बैठक रविवार को हुई थी, दो-तीन दिन बीत जाने के बाद भी कोई सुगबुगाहट नहीं है, इसका मतलब ये है उन्होंने पहले की तरह सुरसुरी ही छोड़ी है। अभी कुछ महीने पूर्व की ही बात है जब चीन के इसी सरकारी अखबार के हवाले से ये झूठी खबर प्रकाशित हुई कि उन्होंने गलवान घाटी के आसपास से अपनी फोर्स हटाने का निर्णय ले लिया है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों से भी सेना हटायेंगे।
दरअसल, ये उनका कोरा झूठ था, भारत सरकार को भ्रमित करने का ताकि इसके बाद भारत अपनी सेना हटाए और हम चुपके से रात के अंधेरे में धावा बोल दें। देखिए ये बदला हुआ भारत है, अब यहां रात में भी चौकन्ने रहते हैं। हिंदुस्तान 1962 के मुकाबले 2023 में बहुत मजबूत खड़ा है। भारत की सरकार भी कठोर है जिसे चीन भलीभांति जानता और समझता भी है। वरना, अभी तक तो कोई ना कोई गड़बड़ी कर चुका होता। कुछ हरकतें की भी जिसका उन्हें उनकी ही भाषा में जवाब भी मिला।
चीन को लग रहा है, उनके इस निर्णय पर भारत सरकार में खलबली मचेगी लेकिन ऐसा हुआ बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि केंद्र सरकार चीनी मसले पर कोई जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहता। केंद्र सरकार अरुणाचल क्षेत्र पर आंच तक नहीं आने देना चाहती। 2017 में जब निर्वासित तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा हुई तब भी चीन ने हंगामा काटा था।
चीन ने भारत सरकार पर खूब दबाव बनाया था ताकि भारत उनकी यात्रा रोक दें। यात्रा रोकने के बजाय भारत ने उलटे दलाई लामा की कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था में यात्रा को होने दिया और उन्हें राजकीय अतिथि के रूप में प्रोटोकॉल भी दिया। इससे चीन और आगबबूला हो गया। अंदर ही अंदर मन मसोसकर रह गया। उसी दौरान उनके विदेश उप-मंत्री का भारत दौरा था, उन्हें खुन्नस में आकर निरस्त कर दिया।
बहरहाल, केंद्र सरकार चीन की प्रत्येक चाल को कुचलती आई है। नापाक हरकत करने का जरा भी मौका नहीं दे रही है। यही वजह है चीन जो भी कुछ कर रहा है, शंघाई में ही बैठकर। उसे पता है, मैदान में आकर उसे मुंह की ही खानी पड़ेगी। चीन ने भारत के खिलाफ नेपाल और पाकिस्तान को भी उकसा कर देख लिया, उससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। तालिबानियों से भी मदद मांग ली, उन्होंने भी खाली हाथ लौटा दिया।
कुल मिलाकर वह चारों तरफ से अब अकेला पड़ गया है। नेपाल की सत्ता में चीन का बढ़ता कदम आने वाले समय में नेपालियों के लिए ही भारी पड़ने वाला है। उनके साथ मिलकर हमें परेशान करने की फिराक में था। वहां भी उनकी दाल नहीं गली।
बहरहाल, भारत-चीन सीमा विवाद की एबीसीडी समझने की जरूरत है। 3500 किमी लंबी सीमा है जो तीन सेक्टरों में विभाजित है। अव्वल, पश्चिमी सेक्टर जो जम्मू-कश्मीर में 1597 क्षेत्रफल में फैला है। जहां, चीन का दखल नहीं है। दूसरा, मध्य सेक्टर है जो हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की साझा सीमाओं से सटा हुआ है जिसकी अधिकृत लंबाई 545 किमी है। यहां, भी उसकी ज्यादा कोई दखलंदाजी सीधे तौर पर नहीं है।
तीसरा, क्षेत्र जो पूर्व क्षेत्र है वो अरुणाचल प्रदेश से सटा है, बारीक-सा हिस्सा सिक्किम से लगा है जिसकी लंबाई 1346 किमी है, जिसे वह कब्जाना चाहता है। जबकि, अक्साई क्षेत्र ऐसा है जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है, जो कभी हमारा हुआ भी करता था। जिसे चीन ने 1962 युद्ध के बाद कब्जा लिया था। तभी से ये भाग उसके कब्जे में है।
वहीं, पूर्वी सेक्टर जो अरुणाचल प्रदेश में आता है, उसके पूरे भूभाग को चीन अपना बताता है, उस क्षेत्र में जितने भी भारतीय गांव-कस्बे बसे हैं उनका नाम बदल रहा है। नया विवाद यहीं से शुरू हुआ है। जबकि, ऐसी हरकतें वो एकाध दफे नहीं, बल्कि बीते एक दशक में पांचवीं बार कर चुका है। आगे भी करेगा, ऐसे में हिंदुस्तान सरकार को भी करीब 600 किमी में फैले अक्साई क्षेत्र के नामों को बदलकर अपने नाम दे देने चाहिए, क्योंकि उस क्षेत्र का पुराना नक्शा आज भी भारत सरकार के पास सुरक्षित है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
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