विचार

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Published / 2026-03-16 15:27:02
कुछ लोगों को है रोने की लाइलाज बीमारी...

कुछ लोगों को है रोने की लाइलाज बीमारी...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। LPG गैस सिलेंडर के नाम पर इन दिनों कुछ महान शख्सियत विधवा विलाप कर रहे हैं और जनता जनार्दन के नाम पर अपना सब कुछ न्योछावर कर देने के लिए उतावले हो रहे हैं। दूसरे देशों में युद्ध छिड़ा है तो भारत के लोगों का गैस के नाम पर रो-रोकर आंखें सूज गई है और हेल्थ का भयानक बुरा हाल हो गया है।

अब जाकर समझ में आ रहा है कि यदि ऑपरेशन सिंदूर दो-तीन महीना चल जाता तो भगवान जाने किस-किस चीज के लिए विधवा विलाप किया जाता।

अमेरिका, इजरायल, ईरान के बीच लड़ाई चल रही है। मिसाइल ड्रोन दागे जा रहे हैं तो ऐसे में मोदीजी क्या करें? क्या सेना लेकर कूद जाए कि हमारे किए तेल भेजो गैस भेजो क्योंकि हमारे लोगों को सिलेंडर सुलगा कर उसके ऊपर अपना सियासत सेंकना है।

जब भारत LPG का 60% हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है और वहां युद्ध छिड़ा हुआ है तो हल्की-फुल्की क्राइसिस स्वाभाविक  होगा ही, मुनाफाखोर क्राइसिस को बढ़ावा देंगे ही, विपक्षी नेता इस क्राइसिस को मुद्दा बनाएंगे ही जनता लाइन लगाएगी ही सरकार लाख सफाई दे वस्तु स्थिति को क्लियर करे मगर जिनको दहाड़ें मारकर रोना है वह रोएंगे ही।

कुछ साल पहले दिल्ली के अफ़वाह उड़ी कि नमक खत्म होने वाली तो दिल्ली वालों की किराना की दुकानों पर लंबी लाइन में लग गई थी और 50-50 किलो नमक ख़रीदकर घरों में रख लिया गया था।

हमारी रोने की आदत है। हम नमक प्याज टमाटर के लिए रोने लगते हैं, कभी संविधान के लिए रोने लगते हैं, कभी संसद में नहीं बोलते देने के लिए रोने लगते हैं, आज LPG के लिए रो रहे हैं। जनता अपनी रोजमर्रा के लिए रोती है तो कुछ सत्ता में बने रहने के लिए रोते हैं तो कुछ सत्ता से दूर होने के कारण रोते रहते हैं। भारत नंबर एक आर्थिक प्रधान बन भी जाए तो भी रोतड़ू प्रधान ही रहेगा।

गैस के लिए कुछ लोगों ने पूरे देश को पैनिक मोड में लाकर खड़ा कर दिया है। याद है न कुछ वर्षों पहले एक सिलेंडर लेना लड़ाई जीतने जैसा एहसास देता था। मोदी जी ने आसान कर दिया जो अब उन्हीं पर भारी पड़ रहा है और कुछ लोग हैं कि होने के सारे रिकॉर्ड तोड़ रहे है।

Published / 2026-03-14 18:38:56
विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस : सुरक्षित उत्पाद, जागरूक उपभोक्ता और सामाजिक दायित्व

वेंकेटेश प्रभू 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 15 मार्च को पूरी दुनिया में विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। यह दिवस आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में उपभोक्ता की भूमिका और उसके अधिकारों की रक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। इस दिवस की पृष्ठभूमि 1962 से जुड़ी है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने अमेरिकी संसद में उपभोक्ताओं के चार मूल अधिकारों—सुरक्षा, जानकारी, विकल्प और सुने जाने के अधिकार—को स्पष्ट रूप से सामने रखा। बाद में वैश्विक उपभोक्ता आंदोलन ने इन सिद्धांतों को स्वीकार किया और 15 मार्च को उपभोक्ता अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। 

वर्ष 2026 के लिए वैश्विक उपभोक्ता आंदोलन की थीम है— Safe Products, Confident Consumers अर्थात सुरक्षित उत्पाद, आत्मविश्वासी उपभोक्ता। यह विषय वर्तमान समय की एक गंभीर चुनौती की ओर संकेत करता है। वैश्विक बाजार के विस्तार, डिजिटल व्यापार के तेजी से बढ़ने और उत्पादन के जटिल तंत्र के कारण आज उपभोक्ताओं के सामने अनेक नयी समस्याएं खड़ी हो गयी हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि बाजार में उपलब्ध उत्पाद सुरक्षित, मानक के अनुरूप और पारदर्शी जानकारी के साथ उपलब्ध हों। 

आज बाजार का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। पहले उपभोक्ता स्थानीय दुकानों से सामान खरीदता था, जहां उत्पाद के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी मिल जाती थी। लेकिन अब ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं और डिजिटल मार्केटिंग ने उपभोक्ता और उत्पादक के बीच दूरी बढ़ा दी है। उपभोक्ता कई बार ऐसे उत्पाद खरीद लेता है जिनकी गुणवत्ता, निर्माण प्रक्रिया या सुरक्षा मानकों के बारे में उसे सीमित जानकारी होती है। परिणामस्वरूप नकली उत्पाद, मिलावटी खाद्य पदार्थ, निम्न गुणवत्ता वाले उपकरण और भ्रामक विज्ञापनों की समस्या बढ़ती जा रही है। 

विश्व स्तर पर कई बार यह भी देखा गया है कि जिन उत्पादों को किसी देश में असुरक्षित मानकर वापस मंगाया जाता है, वे दूसरे देशों के बाजारों या आॅनलाइन प्लेटफॉर्मों पर फिर भी बिकते रहते हैं। इससे उपभोक्ता सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यही कारण है कि इस वर्ष की थीम उपभोक्ता सुरक्षा के प्रश्न को वैश्विक चर्चा के केंद्र में लाती है। 

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण बाजार में यह विषय और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां करोड़ों उपभोक्ता प्रतिदिन खाद्य पदार्थों, दवाओं, घरेलू उपकरणों और डिजिटल सेवाओं का उपयोग करते हैं। लेकिन कई बार उपभोक्ता को उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता, उचित मूल्य या उसके संभावित दुष्प्रभावों के बारे में सही जानकारी नहीं मिलती। मिलावटखोरी, गलत माप-तौल, नकली ब्रांड और भ्रामक विज्ञापन जैसी समस्याएं लंबे समय से उपभोक्ताओं को प्रभावित कर रही हैं। 

भारत में उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी ढाँचा भी विकसित किया गया है। विशेष रूप से Consumer Protection Act 2019 2019 ने उपभोक्ताओं को कई महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किए हैं। इस कानून के माध्यम से ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों की जवाबदेही, भ्रामक विज्ञापनों पर नियंत्रण, उत्पाद उत्तरदायित्व और उपभोक्ता आयोगों की व्यवस्था को मजबूत किया गया है। राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर स्थापित उपभोक्ता आयोगों के माध्यम से उपभोक्ता अपनी शिकायतों का समाधान प्राप्त कर सकते हैं। 

फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि केवल कानून बना देने से उपभोक्ता संरक्षण का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो जाता। वास्तविक परिवर्तन तब होता है जब समाज में जागरूकता बढ़ती है और उपभोक्ता स्वयं अपने अधिकारों के प्रति सजग होता है। जागरूक उपभोक्ता ही बाजार में अनुशासन और पारदर्शिता स्थापित कर सकता है। 

इसी संदर्भ में सामाजिक संगठनों और जनआंदोलनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में उपभोक्ता जागरण के क्षेत्र में कई संगठनों ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। विशेष रूप से अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा और जागरूकता के क्षेत्र में एक सशक्त सामाजिक आंदोलन खड़ा किया है। 

ग्राहक पंचायत का दृष्टिकोण केवल शिकायत समाधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ता को समाज की एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है। इस संगठन ने वर्षों से पूरे देश में उपभोक्ता जागरण अभियान चलाए हैं, जिनके माध्यम से लोगों को उनके अधिकारों, कर्तव्यों और बाजार व्यवस्था की वास्तविकताओं के बारे में शिक्षित किया जाता है। 

ग्राहक पंचायत की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही है कि उसने उपभोक्ता मुद्दों को केवल कानूनी विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे सामाजिक चेतना का विषय बनाया। संगठन ने विभिन्न राज्यों में जागरूकता शिविर, प्रशिक्षण कार्यक्रम, जनसंवाद और अभियान चलाकर लाखों उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया है। मिलावटखोरी, गलत माप-तौल और अत्यधिक मूल्य वसूली जैसे मुद्दों के खिलाफ संगठन ने समय-समय पर जनजागरण अभियान चलाए हैं। 

इसके अतिरिक्त ग्राहक पंचायत ने उपभोक्ता नीतियों और कानूनों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। उपभोक्ता संरक्षण कानूनों को मजबूत बनाने, उपभोक्ता आयोगों की व्यवस्था को प्रभावी बनाने और बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए संगठन ने सरकार और नीति-निमार्ताओं के साथ निरंतर संवाद स्थापित किया है। उपभोक्ता शिक्षा को समाज के व्यापक आंदोलन के रूप में विकसित करने का प्रयास भी इस संगठन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 

उपभोक्ता आंदोलन की वास्तविक शक्ति तब दिखायी देती है जब समाज स्वयं इसमें भागीदारी करता है। जब आम नागरिक मिलावट के खिलाफ आवाज उठाते हैं, गलत बिलिंग पर प्रश्न करते हैं और अपने अधिकारों के लिए कानूनी रास्ता अपनाते हैं, तब बाजार व्यवस्था स्वत: अनुशासित होने लगती है। यही कारण है कि उपभोक्ता संगठनों का प्रयास केवल शिकायत दर्ज कराने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे नागरिकों में आत्मविश्वास और जागरूकता पैदा करने का कार्य भी करते हैं। 

आज के समय में उपभोक्ता अधिकारों के साथ-साथ उत्तरदायी उपभोग का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है। पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के संदर्भ में भी उपभोक्ता की भूमिका निर्णायक है। यदि उपभोक्ता पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को प्राथमिकता देता है, संसाधनों का संयमित उपयोग करता है और अनावश्यक उपभोग से बचता है, तो उत्पादन प्रणाली भी अधिक जिम्मेदार बनती है। 

विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि आर्थिक विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन और लाभ को बढ़ाना नहीं है, बल्कि उपभोक्ता को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और न्यायपूर्ण बाजार उपलब्ध कराना भी है। यदि बाजार में उपभोक्ता का विश्वास कमजोर हो जाए तो आर्थिक व्यवस्था भी अस्थिर हो जाती है। 

अंतत: यह स्पष्ट है कि सुरक्षित उत्पाद ही आत्मविश्वासी उपभोक्ता का आधार हैं। जब उपभोक्ता को यह भरोसा होता है कि बाजार में उपलब्ध वस्तुएं सुरक्षित और प्रमाणित हैं, तब वह निश्चिंत होकर आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी करता है। यही विश्वास एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था और जिम्मेदार बाजार व्यवस्था की नींव बनता है। 

विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस 2026 का संदेश भी यही है—उपभोक्ता को जागरूक बनाना, उत्पादों को सुरक्षित बनाना और समाज में उत्तरदायी बाजार व्यवस्था स्थापित करना। सरकार, उद्योग, सामाजिक संगठन और जागरूक नागरिक यदि मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो एक ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है जहाँ उपभोक्ता केवल ग्राहक नहीं बल्कि सम्मानित और सुरक्षित नागरिक के रूप में स्थापित हो। 

(लेखक : वेंकेटेश प्रभू अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत झारखंड के प्रांत संगठन मंत्री हैं।)

Published / 2026-03-07 21:52:47
महिलाओं की गरिमा के लिए समाज की साझी जिम्मेदारी

विकास रंजन 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम महिलाओं की प्रगति, अधिकारों और समानता पर विचार करें। शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व के क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन एक ऐसा विषय है जो आज भी समाज में खुले तौर पर चर्चा का हिस्सा नहीं बन पाया है- मासिक धर्म स्वच्छता। 

भारत के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मासिक धर्म को लेकर संकोच, सामाजिक वर्जनाएं और गलत धारणाएं मौजूद हैं। स्वच्छता से जुड़े साधनों की कमी के कारण हजारों किशोरियां अपने मासिक धर्म के दिनों में स्कूल जाने से वंचित रह जाती हैं। कई बार मजबूरी में वे असुरक्षित विकल्पों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सम्मान और अवसर की समानता का भी प्रश्न है। 

इस समस्या का समाधान केवल जागरूकता से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से संभव है। विशेष रूप से पुरुषों को भी इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ आगे आना होगा। जब तक हम मासिक धर्म को केवल महिलाओं का निजी विषय मानते रहेंगे, तब तक इस समस्या का व्यापक समाधान संभव नहीं होगा। 

इसी सोच के साथ NOBA GSR (Netarhat Old Boys Association – Global Social Responsibility) ने संगिनी पहल की शुरुआत की। इस पहल का उद्देश्य बिहार और झारखंड के ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्कूल जाने वाली लड़कियों के बीच सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देना है। 

मैं स्वयं आज टोक्यो, जापान में कार्यरत हूं, लेकिन मेरी जड़ें बिहार से जुड़ी हैं। विदेश में रहते हुए अक्सर यह विचार आता रहा कि हम अपने समाज और अपने राज्य के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। इसी भावना के साथ नेतरहाट विद्यालय के पूर्व छात्रों के सामाजिक मंच NOBA GSR के माध्यम से हमने इस विषय पर काम शुरू किया।

 संगिनी पहल तीन प्रमुख आधारों पर काम करती है—सुलभता, जागरूकता और गरिमा। 

पहला कदम है स्कूलों में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन और पर्यावरण अनुकूल इन्सिनरेटर की स्थापना, जिससे लड़कियां स्कूल में ही सुरक्षित तरीके से पैड प्राप्त कर सकें और उनका निस्तारण भी कर सकें। इससे उन्हें मासिक धर्म के दौरान स्कूल से अनुपस्थित रहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है जागरूकता। ग्रामीण क्षेत्रों में कई लड़कियां मासिक धर्म के बारे में सही जानकारी के अभाव में बड़ी होती हैं। संगिनी के माध्यम से स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहाँ मासिक धर्म स्वच्छता, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास से जुड़े विषयों पर खुलकर चर्चा की जाती है। 

इस अभियान में शिक्षकों, स्वयं सहायता समूहों, सामुदायिक संगठनों और स्थानीय प्रतिनिधियों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही है। इससे समाज में धीरे-धीरे वह वातावरण बन रहा है जहां मासिक धर्म पर खुले और सकारात्मक तरीके से बात की जा सके। 

आज इस पहल के माध्यम से सैकड़ों स्कूलों तक सुविधाएं पहुंचायी जा चुकी हैं और हजारों लड़कियां इससे लाभान्वित हो रही हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि समाज की सोच में बदलाव दिखाई देने लगा है। 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह याद दिलाता है कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल नीतियों या घोषणाओं से संभव नहीं है। यह उन छोटे-छोटे प्रयासों से संभव होता है जो महिलाओं को सम्मान, स्वास्थ्य और अवसर प्रदान करते हैं। सच्चा सशक्तिकरण तब होता है जब महिलाएं अकेले संघर्ष न करें, बल्कि पूरा समाज उनके साथ खड़ा हो। मासिक धर्म स्वच्छता के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयास इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं। क्योंकि जब समाज महिलाओं की मूलभूत आवश्यकताओं के साथ खड़ा होता है, तभी वास्तविक समानता और सम्मान की नींव मजबूत होती है।

Published / 2026-03-05 13:34:41
वक्त का हर शै गुलाम... नीतीश की विदाई की बस इत्ती सी कहानी है

  • वक्त का हर शै गुलाम... नीतीश की विदाई की बस इत्ती सी कहानी है

शंभु नाथ चौधरी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वक्त का हर शै गुलाम। वक्त के सामने कुछ भी स्थायी नहीं होता। न ताज। न तख्त। वक्त सबसे बड़ा खिलाड़ी है और जिसे हम-आप बड़ा खिलाड़ी मान बैठते हैं, वह भी आखिरकार वक्त का मोहरा होता है। अब बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ आया है। नीतीश कुमार ने खुद लिखा है-वे राज्यसभा जा रहे हैं। उन्होंने इसे अपनी मर्जी बताया। मगर सियासत के सिकंदर की भी हर मर्जी अपनी नहीं होती।

नीतीश का एग्जिट प्लान मोदी-शाह ने लिखा है। उसी मोदी ने, जिनके साथ कभी नीतीश ने मंच साझा करने से इनकार कर दिया था। तमाम इफ-बट के बावजूद आज की सियासत में मोदी-शाह सिकंदर हैं। अभी हर पत्ता उनकी मर्जी से खड़कता है। हर किसी को पता है कि नीतीश पाटलिपुत्र से निर्वासित नहीं होना चाहते थे, लेकिन वक्त ऐसा निर्मम है कि वह निर्वासन को भी अपनी इच्छा बता रहे हैं।

नीतीश की विदाई के साथ बिहार की सत्ता की ड्राइविंग सीट अब भाजपा के पास होगी। चुनाव के बाद भाजपा के पास ज़्यादा सीटें थीं। फिर भी स्टीयरिंग व्हील नीतीश के हाथ में रहा। वे मुख्यमंत्री बने रहे। यह पहली बार नहीं हुआ था।  अवसरों को साधने में माहिर नीतीश कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में जाते रहे, लेकिन वह सबके लिए सिरमौर बने रहे।

उनकी अदाओं पर रीझने वाले लोग कहते थे-नीतीश वक्त को मोड़ लेते हैं। लेकिन सच थोड़ा अलग है। वक्त किसी का नहीं होता। हर शख्स उसका कैदी है। नीतीश कुमार की सियासी यात्रा लंबी रही। और बेहद दिलचस्प भी। 1985 में वे पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे थे। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में। फिर धीरे-धीरे वे समाजवादी राजनीति के मजबूत चेहरे बने। 1989 में जनता दल के महासचिव बने और उसी साल लोकसभा पहुंचे।

दिल्ली की राजनीति में उनकी एंट्री यहीं से हुई। 1994 में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई। यह उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट था। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे केंद्रीय मंत्री बने। रेल मंत्री के तौर पर उनकी पहचान मजबूत हुई। रेलवे मॉडर्नाइजेशन और सेफ्टी पर उन्होंने बेहतरीन काम किया।

लेकिन उनका असली अध्याय बिहार में लिखा गया। 2000 में वे पहली बार मुख्यमंत्री बने। सरकार सात दिन चली। मगर कहानी खत्म नहीं हुई। 2005 में वे फिर लौटे और लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहे। कानून व्यवस्था सुधरी। सड़कें बनीं। स्कूल खुले। वह सुशासन बाबू कहलाने लगे।

इस बीच वह सियासत में पलटी मारने की भी अजब-गजब कहानियां लिखते रहे। 2013 में उन्होंने एनडीए छोड़ा। 2015 में राजद के साथ गए। 2017 में फिर भाजपा के साथ। फिर महागठबंधन। फिर एनडीए।  गठबंधन बदलते रहे। लेकिन कुर्सी नहीं छूटी। 

किसी ने उन्हें पलटू कुमार कहा, किसी ने कुर्सी कुमार। नीतीश दस बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह अपने आप में रिकॉर्ड है। अब सवाल है-उनके बाद उनकी पार्टी का क्या? जदयू की दूसरी कतार कमजोर है। उन्होंने कभी किसी को अपने बराबर नहीं बनने दिया। यह उनकी लीडरशिप स्टाइल का हिस्सा था या सियासी मजबूरी, वही जानें।

खबर है कि अब उनके बेटे निशांत कुमार राजनीति में आ रहे हैं। लेकिन निशांत का मिजाज अलग बताया जाता है। उनकी आध्यात्म में दिलचस्पी रही है। उन्होंने तकरीबन अपनी आधी उम्र जी ली है, लेकिन सियासत कभी उनकी जिंदगी के सिलेबस का हिस्सा नहीं रही। एकांत पसंद यह शख्स पॉलिटिकल बैटलफील्ड में कैसे उतरेगा? और उतरेगा तो कितनी दूर तक चल पाएगा-यह बड़ा सवाल है।

और उससे भी बड़ा सवाल-जदयू का भविष्य? क्या पार्टी नीतीश के बाद भी प्रासंगिक रहेगी? या वह धीरे-धीरे भाजपा की परछाईं बन जाएगी? सियासत का एक उसूल है। हर दौर का अपना किरदार होता है। कभी लालू का दौर था। फिर नीतीश का। आज पाटलिपुत्र की धरती पर एक नए चैप्टर का आगाज हो रहा है। अंजाम क्या होगा? वक्त जाने…खुदा जाने। (लेखक शंभूनाथ चौधरी द रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-02-17 21:22:36
ताकतवर गणेश जी की बाल कहानी

राजकुमारी पांडेय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गणेश जी के कान बहुत बड़े थे। उनका नाक हाथी के सूड़ जैसा था। उनका पेट बहुत बड़ा मटके जैसा था। उनको लड्डू और मोदक बहुत पसंद था। एक बार में वो एक नहीं, दो नहीं बल्कि दस लड्डू खा लेते थे। गणेश जी के पड़ोस मे गोविंद सिंह रहता था। उसके बेटे सोमदेव की शादी थी। सोमदेव गणेश जी का दोस्त था। सोमदेव की मां यमुना देवी अपने पति गोविंद सिंह से कहती है, सोमदेव की शादी में गणेश जी को साथ नहीं ले जायेंगे। 

गोविंद सिंह ने पूछा कि गणेश जी तो अच्छे बालक हैं। उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? उसे सोमदेव की बारात मे क्यों नहीं ले जाना? वो हमारे बेटे सोमदेव का दोस्त भी है। यमुना देवी कहती है, अरे, आपको पता नहीं है क्या गणेश जी कितना खाते हैं। सारी बारात का खाना वो अकेले ही खा जायेंगे। और हां, वो सुंदर भी नहीं है। उसकी सूंड़ जैसी नाक है और एक दांत टूटा हुआ है। सोमदेव की बारात को देखकर सभी हंसेंगे। नहीं, नहीं, गणेश हमारे साथ नहीं जायेगा। 

दूसरे दिन बारात रांची से रामगढ़ चल पड़ी। बारात अभी मेन रोड पार करके चर्च रोड तक पहुंची ही थी कि सोमदेव की गाड़ी का पहिया कीचड़ में फंस गया। सभी बाराती अपनी-अपनी गाड़ियों से उतरे। सब ने मिलकर गाड़ी को धक्का दिया। बहुत सारे लोगों के जूते चप्पल कीचड़ से सन गये। कुछ बारातियों के कपड़ों मे कीचड़ के छींटे लग गये। 

सभी चिंता करने लगे, अब क्या करें? शादी का मुहूर्त करीब आते जा रहा है। दोपहर भी बीत चुकी है। अब शाम हो जायेगी। सभी बहुत परेशान थे। 
सोमदेव सोच रहा था, अब पापा से अपने मन की बात बतला ही दूं। उसे पूरा विश्वास था, मेरा दोस्त गणेश सब ठीक कर देगा। उसने अपने पापा गोविंद सिंह से और माता यमुना देवी से कहा, मां मेरे दोस्त गणेश को बुला लीजिये। 

वो सब ठीक कर देगा। मां यमुना देवि को विश्वास ही नहीं हो रहा था। पर सोमदेव के बार-बार टोकने पर रमेश और गोकुल को गणेश जी के घर भेजती है। तुम दोनों जाओ और गणेश जी को समझा बुझा कर लाओ। वो भी हमारे साथ बारात में चलेंगे। रमेश और गोकुल जैसे ही घर जाने आटो में बैठे सामने से गणेश आते हुए दिखलाई दिया। वे हंसते-गाते झूमते झामते, अपनी सूंड़ हिलाते आ रहा था।

पास आकर गणेश ने यमुना देवी से पूछा, काकी, क्या बात है। बारात यहां क्यों खड़ी है। यमुना काकी ने कहा, गाड़ी का पहिया कीचड़ में धंस गया है। सब थक गये हैं। पर पहिया हिल भी नहीं रहा है। गणेश ने कहा, बस इतनी सी बात है, काकी। ये लो, मैं इसे अभी ठीक कर देता हूं। गणेश गाड़ी के सामने जाकर खड़ा हुआ और अपनी सूंड़ से गाड़ी को धक्का दिया। गाड़ी एक झटके में कीचड़ से बाहर आ गयी। सभी ने जोरों से पुकारा, गणेश जी महाराज की जय हो। 

सीख : आदमी के गुण देखे जाते हैं। उसके गुणों की पूजा होती है। किसी की ताकत और मदद करने की भावना महत्वपूर्ण है। 

Published / 2026-02-01 21:25:43
विकसित भारत की आत्मा : संत रविदास के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता

संत रविदास जयंती पर विशेष 

डॉ दीपक प्रसाद  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दहलीज पर खड़ा है। आर्थिक प्रगति, तकनीकी उन्नति, डिजिटल क्रांति और वैश्विक पहचान ये सभी उपलब्धियां गर्व का विषय हैं। किंतु इसी विकास यात्रा के साथ सामाजिक विषमता, जातिगत मानसिकता, धार्मिक असहिष्णुता, नैतिक पतन, बेरोजगारी, उपभोक्तावाद और मूल्यहीनता जैसी समकालीन चुनौतियां भी हमारे सामने खड़ी हैं। ऐसे समय में जब युवा वर्ग भ्रम, आक्रोश और अस्मिता के संकट से जूझ रहा है, संत रविदास के विचार दीपस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करते हैं। 

रविदास जयंती केवल एक संत की स्मृति नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, समानता और श्रम-सम्मान के दर्शन को पुन: समझने का अवसर है। संत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) के निकट सीर गोवर्धनपुर में माना जाता है। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो सामाजिक दृष्टि से उस समय तथाकथित निम्न वर्ग में रखा जाता था। उनके पिता संतोख दास और माता कर्मा देवी (या कालसा देवी) श्रमजीवी थे। पिता जूते-चप्पल बनाने का कार्य करते थे। यह वही पेशा था जिसे समाज ने हेय दृष्टि से देखा, पर रविदास ने इसी श्रम को साधना में बदल दिया। 

यहीं से उनका पहला संदेश निकलता है काम छोटा नहीं होता, सोच छोटी होती है। संत रविदास की औपचारिक शिक्षा सीमित थी, पर उनकी आध्यात्मिक और बौद्धिक चेतना अत्यंत प्रखर थी। उन्होंने जीवन की पाठशाला से शिक्षा ली। वे भक्ति आंदोलन की निर्गुण धारा के प्रमुख संत थे। कबीर, नामदेव, दादू, सेन, त्रिलोचन ये सभी संत एक ही सामाजिक चेतना की कड़ी थे, जो कर्मकांड, जाति-भेद और पाखंड के विरुद्ध खड़े हुए। 

रविदास के गुरु को लेकर मतभेद हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि उन्होंने स्वानुभूति को ही अपना गुरु माना। संत रविदास का दर्शन केवल भक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज-सुधार का क्रांतिकारी घोषणापत्र था। उनके प्रमुख विचार थे जाति आधारित भेदभाव का विरोध, श्रम की प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा, समता और करुणा, ईश्वर की सर्वव्यापकता। 

उनका प्रसिद्ध पद है मन चंगा तो कठौती में गंगा आज के उपभोक्तावादी और तनावग्रस्त समाज के लिए यह पंक्ति मानसिक स्वास्थ्य और आंतरिक शांति का सूत्र है। संत रविदास की सबसे मौलिक अवधारणा है बेगमपुरा। बेगमपुरा शहर को नाउं, दुख-अंदोह नाहीं तिहि ठाउं। बेगमपुरा का अर्थ है ऐसा नगर जहां किसी प्रकार का भय, दुख, भेदभाव या शोषण न हो। 

संत रविदास कहते हैं कि यह एक ऐसा शहर है जहां कोई मानसिक या सामाजिक पीड़ा नहीं है कोई कर (खिराज) या जबरन वसूली नहीं, कोई अपराध का भय नहीं, कोई जाति, ऊंच-नीच या अपमान नहीं, उस समाज में सभी लोग समान हैं, कोई पराया नहीं, हर व्यक्ति जहाँ चाहे, सम्मान के साथ रह सकता है। यह समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित समाज की परिकल्पना है। 

यह केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि समाजवादी और समतामूलक राष्ट्र की पूर्व-परिकल्पना है। आज जब हम विकसित भारत @2047 की बात करते हैं, तो बेगमपुरा उसका नैतिक खाका बन सकता है। राष्ट्र के प्रति संत रविदास का दायित्वबोध यह बताता है कि संत रविदास ने कभी सत्ता नहीं चाही, पर उन्होंने समाज को जागृत किया और जागृत समाज ही राष्ट्र की शक्ति होता है। उन्होंने लोगों को सिखाया कि राष्ट्र केवल भूमि नहीं, मानव मूल्यों का समुच्चय है। 

भक्ति का अर्थ पलायन नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व है, धर्म का अर्थ विभाजन नहीं, मानवता का विस्तार है, मीरा, जो एक राजघराने से थीं, उन्होंने भी रविदास को गुरु माना। यह तथ्य सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक उदाहरण है। संत रविदास का जीवन आसान नहीं था। जातिगत अपमान, आर्थिक तंगी, सामाजिक बहिष्कार, धार्मिक कट्टरता लेकिन उन्होंने कभी प्रतिशोध नहीं चुना। उन्होंने विरोध को करुणा से और अपमान को आत्मबल से परास्त किया। 

आज के युवाओं के लिए यह सबसे बड़ा सबक है- संघर्ष से भागना नहीं, उसे मूल्यबोध में बदलना। आज की प्रमुख समस्याएं—जातिगत राजनीति, सोशल मीडिया पर घृणा, बेरोजगार युवाओं में कुंठा, धर्म के नाम पर विभाजन, नैतिक पतन इन सबका समाधान संत रविदास के विचारों में निहित है, जाति नहीं, कर्म से पहचान, धर्म नहीं, मानवता से मूल्यांकन, भोग नहीं, संतुलन से सुख। आज का युवा प्रश्न पूछता है—मैं कौन हूं? मेरा मूल्य क्या है? 

संत रविदास उत्तर देते हैं—तुम्हारा मूल्य तुम्हारे जन्म से नहीं, तुम्हारे विचार और कर्म से तय होता है। यदि युवा श्रम को सम्मान दे, विविधता को स्वीकार करे, आत्मसम्मान को अहंकार न बनाए, तकनीक के साथ नैतिकता जोड़े तो वही युवा विकसित भारत का निमार्ता बनेगा। तात्पर्य रविदास केवल अतीत नहीं, भविष्य हैं। संत रविदास इतिहास के पन्नों में बंद कोई संत नहीं, बल्कि भारत की चेतना में प्रवाहित विचारधारा हैं। 

विकसित भारत का अर्थ केवल ऊंची इमारतें, तेज इंटरनेट, बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। विकसित भारत का अर्थ है समान अवसर, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक समरसता और मानवीय गरिमा और इन सबकी आत्मा संत रविदास के विचारों में बसती है। रविदास जयंती पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके विचारों की केवल माला नहीं, मार्ग बनायें और अपने जीवन में आत्मसात करें। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंग निर्देशक और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

Published / 2026-01-23 21:12:01
झारखंड की आध्यात्मिक विरासत टांगीनाथ

डॉ दीपक प्रसाद  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की धरती केवल खनिज, वन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह भूमि भारत की प्राचीन सनातन साधना, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना की भी जीवंत साक्षी रही है। इसी पवित्र धरती पर अवस्थित टांगीनाथ धाम न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा, सनातनी परंपरा और आध्यात्मिक इतिहास का एक मौन किंतु सशक्त घोषणापत्र है। टांगीनाथ शब्द अपने आप में गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है।

लोकमान्यता के अनुसार, यहां स्थापित शिवलिंग और उससे जुड़ी टांगी (फरसा) शक्ति, तप और त्याग की प्रतीक है। यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन साधकों की कठोर तपस्या, वैराग्य और ब्रह्मानुभूति का साक्ष्य है। यह धाम गुमला जिले के चैनपुर डुमरी प्रखंड के घने वनों और पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है, जहां प्रकृति स्वयं ध्यान और साधना की सहचरी बन जाती है। यही कारण है कि टांगीनाथ को आदिकाल से ही तपस्थली के रूप में मान्यता प्राप्त रही है। 

टांगीनाथ धाम को लेकर झारखंड सहित आसपास के क्षेत्रों में एक अत्यंत प्राचीन और सुदृढ़ मान्यता प्रचलित है कि यह स्थल भगवान परशुराम की तप:स्थली रहा है। यह मान्यता केवल लोककथा नहीं, बल्कि भारत की सनातन तपस्वी परंपरा, शैव-वैष्णव समन्वय और भौगोलिक साक्ष्यों से भी जुड़ती दिखाई देती है। भगवान परशुराम को भारतीय परंपरा में विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। जिनको त्रेता युग के प्रारंभिक काल का महापुरुष चिरंजीवी (अमर) तपस्वी योद्धा माना गया है। 

अधिकांश विद्वान परशुराम को ईसा से लगभग 3000-4000 वर्ष पूर्व के कालखंड में स्थापित करते हैं। वे केवल योद्धा नहीं, बल्कि शैव साधक, कठोर तपस्वी और ब्रह्मचारी योगी थे। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या टांगीनाथ परशुराम की तप:स्थली थी? तो ग्रंथों में टांगीनाथ नाम से सीधा उल्लेख नहीं मिलता, किंतु स्कंद पुराण, वायु पुराण, शिव पुराण में ऐसे वनांचल, पर्वतीय तपोवनों का उल्लेख है जहां परशुराम ने शिव-साधना की। 

झारखंड का यह क्षेत्र उस समय दंडकारण्य और उत्तर कोसल क्षेत्र की सीमाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। अत: भौगोलिक संगति पूरी तरह बनती है। टांगीनाथ में अवस्थित त्रिशूल/टांगी को लेकर स्थानीय जनमान्यता है कि यह स्वयं भगवान परशुराम द्वारा स्थापित है। यह उनकी तपस्या का प्रतीक है। इसी टांगी स्थानीय भाषा में (त्रिशूल) के कारण स्थान का नाम टांगीनाथ पड़ा होगा। ऐतिहासिक दृष्टि से यह त्रिशूल धातु-विशेष (लोहे/मिश्र धातु) का बना है। इसका रूप आधुनिक नहीं, बल्कि प्राचीन लौह युगीन शस्त्र शैली से मेल खाता है। 

अनुमानत: यह 2000 वर्ष से अधिक पुराना हो सकता है, हालाँकि इसकी कार्बन डेटिंग या वैज्ञानिक जांच आज तक नहीं कराई गई, यह प्रशासनिक उपेक्षा का बड़ा उदाहरण है। भगवान परशुराम को शास्त्रों में परम शिवभक्त कहा गया है। उनके जीवन का एक बड़ा भाग शिव आराधना, तप, क्षत्रिय दमन के पश्चात प्रायश्चित में व्यतीत हुआ। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार परशुराम ने एक निश्चित संकल्प संख्या के अंतर्गत शिवलिंग स्थापित किये, ये शिवलिंग प्राकृतिक शिलाओं से निर्मित हैं। पूरे टांगीनाथ पर्वत परिसर में सैकड़ों शिवलिंग बिखरे हुए हैं। 

यह संख्या संयोग नहीं, बल्कि तपस्या की गणना आधारित साधना पद्धति का संकेत देती है। स्थानीय पुजारियों और शोधकर्ताओं के अनुसार 300 से 500 के बीच शिवलिंग होने की संभावना व्यक्त की जाती है। कई अब वनस्पति और मिट्टी में दब चुके हैं, स्थानीय लोग तो यह भी बताते हैं कि कई आसामाजिक तत्वों ने शिवलिंग को यहां से उठाकर कहीं-कहीं और भी ले गये हैं जिसका पता नहीं। परिसर में जो शिवलिंग हैं वह कुछ खंडित अवस्था में हैं। यह संख्या दशार्ती है कि यह स्थल एक सामान्य तपोभूमि नहीं रहा होगा। बल्कि एक दीर्घकालीन तपोवन परिसर रहा है। 

ग्रंथीय संकेत और लोकपरंपरा दोनों के आधार पर परशुराम ने कई चरणों में तपस्या की। प्रत्येक तपस्या 12 वर्षों की मानी जाती है। कुल अवधि 36 से 60 वर्षों तक की मानी जाती है। यह तपस्या शिव-अनुग्रह, आत्मशुद्धि और लोककल्याण के लिए थी। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्तमान मंदिर संरचना परशुराम काल की नहीं है। परंतु यहां पर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े हुए मंदिर के अवशेषों से यह अनुभव होता है कि यहां संभवत: 9वीं-12वीं शताब्दी के बीच नागवंशी या किसी स्थानीय शैव शासकों द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया होगा जिसके अवशेष अभी भी परिसर में मौजूद है। 

परंतु मूल तप:स्थली उससे हजारों वर्ष पुरानी रही होगी। स्थानीय मान्यताओं में यह कथा प्रचलित है कि किसी छत्तीसगढ़ क्षेत्र के शासक ने सत्ता संघर्ष या धार्मिक अहंकार में टांगीनाथ मंदिर को आंशिक रूप से खंडित करवाया। ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन खंडित शिलाएं, टूटी मूर्तियां, पुनर्निर्माण के संकेत इस कथा को पूर्णत: असत्य भी नहीं ठहराया जा सकता। यह संभवत: मध्यकालीन सत्ता संघर्ष, धार्मिक टकराव या संसाधन लूट का परिणाम रहा हो। धर्मग्रंथों में टांगीनाथ का नाम से उल्लेख नहीं मिलता है, किंतु यह स्थल शिव तपोवन श्रेणी में आता है। 

परशुराम से जुड़ी वनस्थली साधना परंपरा का सशक्त प्रमाण है। सनातन परंपरा में कई स्थलों के नाम कालांतर में परिवर्तित हो गए, पर उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा स्थिर रही। देश के इतिहास के पन्नों में टांगीनाथ को वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी है। जबकि यह सर्वविदित है कि झारखंड क्षेत्र प्राचीन काल से ही शैव, वैष्णव और शक्ति उपासना की त्रिवेणी रहा है। टांगीनाथ इसी परंपरा की एक मजबूत कड़ी है। जनश्रुतियों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यहां सिद्ध महात्माओं और योगियों ने वर्षों तक कठोर साधना की। 

यह स्थल वैदिक और उत्तरवैदिक सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ रहा है, जहां ब्रह्म, आत्मा और प्रकृति के सामंजस्य को जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकार किया गया। यदि सनातन को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखकर उसके दार्शनिक और आध्यात्मिक मर्म को समझा जाये, तो टांगीनाथ का संबंध सीधे श्रीकृष्ण तत्व से जुड़ता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं योगस्थ: कुरु कर्माणि (अध्याय 2, श्लोक 48) अर्थात योग में स्थित होकर, आसक्ति को त्यागकर कर्म करो। टांगीनाथ की परंपरा भी कर्म, तप और ध्यान के समन्वय पर आधारित है। 

यहाँ की साधना पद्धति में निष्काम कर्म, आत्मसंयम और ईश्वर से तादात्म्य का भाव स्पष्ट दिखाई देता है, जो श्रीकृष्ण के योग-दर्शन का ही विस्तार है। झारखंड की आदिवासी सनातन चेतना भी श्रीकृष्ण के प्रकृतिझ्रकेन्द्रित दर्शन से मेल खाती है, जहां वन, पर्वत, नदी और जीव-जंतु सभी ईश्वरीय सत्ता के प्रतीक माने जाते हैं। टांगीनाथ केवल मंदिर नहीं, बल्कि झारखंड की लोक-संस्कृति, आस्था और सामूहिक चेतना का केंद्र है। यहां लगने वाले मेले, धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक आयोजन झारखंड की सांस्कृतिक निरंतरता को जीवित रखते हैं। 

यह स्थल बताता है कि झारखंड की संस्कृति किसी बाहरी प्रभाव की देन नहीं, बल्कि सनातन भारतीय संस्कृति की मूलधारा का अभिन्न अंग है। यदि टांगीनाथ का समुचित विकास किया जाए, तो यह स्थल आध्यात्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, प्रकृति एवं वन पर्यटन, शोध एवं अध्ययन पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। यहां की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा इसे झारखंड का केदारनाथ बनने की क्षमता प्रदान करती है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी समृद्ध विरासत होने के बावजूद टांगीनाथ आज भी आधारभूत सुविधाओं की कमी समुचित सड़क और परिवहन व्यवस्थाओं के अभाव से जूझ रहा है। प्रचार-प्रसार की उपेक्षा, संरक्षण और शोध की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। यह प्रशासनिक अनदेखी केवल एक स्थल की नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा की उपेक्षा है। 

यदि टांगीनाथ को केंद्र में रखकर सनातन सांस्कृतिक सर्किट, धार्मिक पर्यटन नीति, स्थानीय युवाओं को रोजगार, शोध एवं दस्तावेजीकरण जैसे प्रयास किए जायें, तो यह झारखंड की आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है। टांगीनाथ झारखंड की केवल एक धरोहर नहीं, बल्कि सनातन चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह स्थल हमें याद दिलाता है कि झारखंड की पहचान केवल खनिज से नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक आत्मबोध और सनातनी परंपरा से है। 

आज आवश्यकता है कि हम टांगीनाथ को केवल अतीत की स्मृति न बनाकर, उसे झारखंड के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और विकास का केंद्र बनायें। ठीक उसी प्रकार जैसे श्रीकृष्ण ने कर्म और चेतना के संतुलन से समाज को दिशा दी थी। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंग निर्देश सह असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

Published / 2026-01-21 13:21:16
सनकी ट्रंप का यही व्यवहार...

त्रिवेणी दास

हरियाली दिख जाए तो 
भैंस लगाए दौड़, 
राह में जो भी आ जाए 
देता सिंग से फोड़...

देता सिंग से फोड़ 
सनकी ट्रंप का यही व्यवहार,
ग्रीनलैंड की देख हरियाली 
मुंह से टपकाए लार...

मुंह से टपकाए लार
हर जगह करता घुसपैठ,
क्यों दिया जाए नोबेल पुरस्कार 
है बना हुआ बिगड़ैल लठैत...

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