एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करने का विशेष अवसर है महाशिवरात्रि, जो भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और महाशिवरात्रि का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मानसिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व इस वर्ष 26 फरवरी को मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि को भगवान शिव का सबसे पवित्र दिन माना गया है, जो सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी है। भारत में धार्मिक मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि का बहुत महत्व है। यह आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने का सुअवसर है। महाशिवरात्रि को शिव तत्व को आत्मसात करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को समाप्त करने और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त करने का सबसे उत्तम अवसर माना जाता है।
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, भांग एवं शहद अर्पित करने से विशेष फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस दिन जलाभिषेक के साथ भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सुख-शांति बनाए रखने के लिए भी यह व्रत लाभकारी माना गया है। इस रात्रि को जागरण करने वाले भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शिवपुराण के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से समस्त पापों का नाश होता है और भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्रि की रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है, जिसमें हर प्रहर में शिवलिंग का अलग-अलग द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है, पहले प्रहर में जल, दूसरे प्रहर में दही, तीसरे प्रहर में घी और चौथे प्रहर में शहद से अभिषेक करने का विधान है।
धर्मग्रंथों में भगवान शिव को कालों का काल और देवों का देव अर्थात् महादेव कहा गया है। एक होते हुए भी शिव के नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग, बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक रूप हैं। देवाधिदेव भगवान शिव के समस्त भारत में जितने मंदिर अथवा तीर्थस्थान हैं, उतने अन्य किसी देवी-देवता के नहीं।
आज भी समूचे देश में उनकी पूजा-उपासना व्यापक स्तर पर होती है। सर्वत्र पूजनीय शिव को समस्त देवों में अग्रणी और पूजनीय इसलिए भी माना गया है क्योंकि वे अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं और दूध या जल की धारा, बेलपत्र व भांग की पत्तियों की भेंट से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
वे भारत की भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता के प्रतीक हैं। भारत में शायद ही ऐसा कोई गांव मिले, जहां भगवान शिव का कोई मंदिर अथवा शिवलिंग स्थापित न हो। यदि कहीं शिव मंदिर न भी हो तो वहां किसी वृक्ष के नीचे अथवा किसी चबूतरे पर शिवलिंग तो अवश्य स्थापित मिल जायेगा।
हालांकि बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जिस प्रकार विभिन्न महापुरुषों के जन्मदिन को उनकी जयंती के रूप में मनाया जाता है, उसी प्रकार भगवान शिव के जन्मदिन को उनकी जयंती के बजाय रात्रि के रूप में क्यों मनाया जाता है? इस संबंध में मान्यता है कि रात्रि को पापाचार, अज्ञानता और तमोगुण का प्रतीक माना गया है और कालिमा रूपी इन बुराइयों का नाश करने के लिए हर माह चराचर जगत में एक दिव्य ज्योति का अवतरण होता है, यही रात्रि शिवरात्रि है।
शिव और रात्रि का शाब्दिक अर्थ एक धार्मिक पुस्तक में स्पष्ट करते हुए कहा गया है- जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव है अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करुणासागर भगवान शिव हैं। जो नित्य, सत्य, जगत आधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं।
महासमुद्र रूपी शिव ही एक अखंड परम तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं, यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से सगुण ईश्वर और निर्गुण ब्रह्म कहे जाते हैं तथा यही परमात्मा, जगत आत्मा, शम्भव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, रूद्र आदि कई नामों से संबोधित किए जाते हैं।
शिव के मस्तक पर अर्द्धचंद्र शोभायमान है, जिसके संबंध में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से विष और अमृत के कलश उत्पन्न हुए थे। इस विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि इससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था, ऐसे में भगवान शिव ने इस विष का पान कर सृष्टि को नया जीवनदान दिया जबकि अमृत का पान चन्द्रमा ने कर लिया।
विषपान करने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे नीलकंठ के नाम से जाने गये। विष के भीषण ताप के निवारण के लिए भगवान शिव ने चन्द्रमा की एक कला को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। यही भगवान शिव का तीसरा नेत्र है और इसी कारण भगवान शिव ‘चन्द्रशेखर’ भी कहलाये।
धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव के बारे में उल्लेख मिलता है कि तीनों लोकों की अपार सुन्दरी और शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और भूत-पिशाचों से घिरे रहते हैं।
उनका शरीर भस्म से लिपटा रहता है, गले में सर्पों का हार शोभायमान रहता है, कंठ में विष है, जटाओं में जगत तारिणी गंगा मैया हैं और माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल (नंदी) को भगवान शिव का वाहन माना गया है और ऐसी मान्यता है कि स्वयं अमंगल रूप होने पर भी भगवान शिव अपने भक्तों को मंगल, श्री और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसी भी सेवा प्रदाता विभाग या कंपनी की लापरवाही की वजह से जान-माल का नुकसान हो और वह उस मामले में दोषी पाया जाये तो उपभोक्ता का अधिकार उससे मुआवजा लेने का है। यदि विभाग आनाकानी करे तो नुकसान की भरपाई के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत दावा कर सकता है।
घटना 14 दिसंबर, 2015 की है। एक किशोर छत पर बैठकर पढ़ाई कर रहा था। बाहर से किसी के आवाज देने पर वह छत से नीचे की ओर झांककर देखने लगा। इस दौरान बिजली का तार ढीला होने के कारण हवा के झोंके से छज्जे पर लगी लोहे की ग्रिल से छू गया। जिससे ग्रिल पर करंट उतर आया और किशोर के दोनों हाथ बिजली के करंट से झुलस गये।
उसने बड़े अस्पतालों में इलाज कराया ,परन्तु डॉक्टरों द्वारा उसके दोनों हाथ काटने पड़े। करंट से अपने दोनों हाथ गंवाने वाले किशोर ने अपने अधिकारों की नौ साल कानूनी लड़ाई लड़ी। सिविल जज त्वरित न्यायालय ने उक्त हादसे के लिए बिजली विभाग को दोषी मानते हुए 20 लाख रुपये जुमार्ना पीड़ित को दो माह के भीतर अदा करने के आदेश दिए, साथ ही इस राशि पर मुकदमा दायर करने के समय से ही छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी।
बता दें कि पीड़ित ने नौ साल पहले न्यायालय में उक्त मुकदमा दर्ज कराया था, जिसमें पावर कारपोरेशन के चेयरमैन और अधिशासी अभियंता को प्रतिवादी बनाया था। वादी का कहना था कि उनके मकान के छज्जे से मात्र आठ से 10 इंच की दूरी पर 33 केवी लाइन गुजर रही थी। लाइन के बीच में न तो गार्डिंग की व्यवस्था थी और न ही बीच में पोल लगाकर तारों को कसा गया था।
खतरे को भांपकर उनके पिता व अन्य मोहल्लेवासियों ने उक्त दुर्घटना से कुछ माह पहले लाइन हटवाने के लिए अधिकारियों को प्रार्थना पत्र दिए परन्तु कोई कार्यवाही नहीं हुईङ्घ और यह हादसा हो गया। इस तरह के हादसे या फिर हाई वोल्टेज के कारण उपभोक्ता का कीमती सामान फुंक जाने पर की गई शिकायत के बाद यदि बिजली विभाग न तो कोई कार्रवाई करे और न ही मुआवजा दे तो उपभोक्ता विभाग पर हुए नुकसान के मुआवजे का दावा ठोक सकता है।
एक अन्य मामला ज्यादा वोल्टेज से घरेलू उपकरण जलने का है। गाजियाबाद में हाई वोल्टेज से कई घरों के लाखों रुपये के विद्युत उपकरण जैसे मोबाइल चार्जर, टीवी, कूलर, फ्रिज और पंखा आदि फूंक गये। ऐसी स्थिति में हुए नुकसान की भरपाई के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 में उपभोक्ताओं को ऐसे अधिकार प्राप्त हैं कि अगर वह उनका इस्तेमाल करें तो उसे नुकसान की भरपाई ब्याज सहित प्राप्त हो सकती है।
यानी अधिक वोल्टेज की वजह से आपका टीवी, फ्रिज या एसी फुंक गया है तो ऊर्जा निगम मुआवजा देगा। 43 इंच से अधिक के कलर टीवी, पूरी तरह आॅटोमैटिक वॉशिंग मशीन, कम्प्यूटर, एसी और 200 लीटर से अधिक का फ्रिज फूंकने पर प्रत्येक सामान के लिए 5000 रुपये तक मुआवजा मिलेगा। विद्युत नियामक आयोग ने हाल ही में मुआवजा बढ़ाया है।
पहले यह मुआवजा अधिकतम पांच सौ रुपये था। इसी श्रेणी के छोटे या कम क्षमता के उपकरणों के फूंकने पर भी कम से कम एक हजार रुपये का मुआवजा तय किया गया है। इस तरह बिजली उपकरण फूंकने पर एक हजार से पांच हजार रुपये तक मुआवजा मिलेगा। हालांकि इसके लिए तय प्रक्रिया पूरी करनी होगी तथा बिल दिखाने होंगे।
नये नियमों के अनुसार फ्यूज उड़ने पर राज्य के शहरी क्षेत्रों में चार घंटे, ग्रामीण क्षेत्रों में आठ घंटे और ऐसे पर्वतीय क्षेत्र जो सड़क से नहीं जुड़े हैं, वहां 12 घंटे के भीतर बिजली आपूर्ति सुचारु करनी होगी। ऐसा न होने पर एक उपभोक्ता के मामले में 20 रुपये प्रति घंटा और पूरे क्षेत्र के मामले में 10 रुपये प्रति उपभोक्ता प्रति घंटा मुआवजा दिया जाएगा। इसके इलावा उपभोक्ता को बिजली कनेक्शन आवेदन के 15 दिन में अनिवार्य रूप से देना होगा। समय पर कनेक्शन न मिला तो विभाग उपभोक्ता को प्रतिदिन पांच रुपये के हिसाब से मुआवजा देगा।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 उपभोक्ताओं को उन कंपनियों से भी लड़ने की ताकत देता है, जो पहले के उपभोक्ता कानून में नहीं थी। उपभोक्ताओं को न्याय के लिए उपभोक्ता अदालतों के साथ-साथ केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण भी गठित किया गया है। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना का उद्देश्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करना है।
साथ ही अनुचित व्यापारिक गतिविधियां, भ्रामक विज्ञापनों और उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों को भी प्राधिकरण देखता है और उसका निपटारा करता है। इसी तरह उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का काम है। (लेखक उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यदि कोई अपनी तेजतर्रार देशभक्ति, स्वधर्मनिष्ठा,धार्मिकता और असीम साहस को नाम देता है तो वह छत्रपति शिवाजी महाराज बन जाता है। यह वह समय था जब हमारे देश पर अलग-अलग आक्रांताओं का शासन था, जिन्होंने मंदिरों को ध्वस्त किया, माताओं का अपहरण किया और गायों को मार डाला। उन्होंने पहले ही हमारी शिक्षा प्रणाली को नष्ट कर दिया है।
हमारे षोडश संस्कारों को एवं 64 कलाओं और उनकी शिक्षण विधियों को बेरहमी से नष्ट कर दिया। वह अशांति का युग था, जब उस समय के लोग जो दिशा हीन और निराश थे, हताशा में इंतजार कर रहे थे कि कोई उन्हें बचाएगा। ऐसे समय में विदेशी सुल्तानों और मुगल शासकों को खदेड़ने वाले ऐतिहासिक पुरुष शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को हुआ था। दादाजी कोंडदेव के प्रशिक्षण के कारण उन्होंने 17 वर्ष की अल्पायु में ही घोर युद्ध लड़े। उन्होंने युद्ध में सबसे पहले तोरणदुर्गा पर कब्जा कर लिया।
अपनी मां से नैतिकता, समरद्धगुरु रामदासु से देश, धर्म, सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विषय सीखने के बाद। उन्होंने हिंदू समुदाय को खड़ा करने का एवं मुगलों, बीजापुर सुल्तानों, निजाम शाही, बहमनी सुल्तानों को बाहर निकालने और हिंदू धर्म को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्प लिया।
शिवाजी ने वेतनभोगी सैनिकों को युद्ध के लिए नियुक्त नहीं किया। उन्होंने आम लोगों में स्वाभिमान जगाया। वे लोग अपना व्यवसाय, खेती करते हुए भी जरूरत पड़ने पर देश के लिए लड़ना करते थे। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध, (मारो और भागो युद्ध) में महारत हासिल की और एक महीने तक बिना रुके लड़ने का कौशल हासिल किया। वे पानी में कम से कम तीन दिन बिता सकते थे और एक महीने तक घोड़े पर रहकर बिना उतारे लड़ने में कुशल थे।
बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी को दबाने के लिए अफजल खान के नेतृत्व में हजारों अफगान और पश्तून सैनिकों को भेजा, शिवाजी ने अफजल खान को अपने बाघ नाखून से पेट को छीर दिया। हिंदवी स्वराज्य सेना हजारों अफगानों और पश्तूनों को मारकर विजयी प्राप्त की। इस घटना से शिवाजी महाराज की प्रसिद्धि पूरे भारत में फैल गई। यह युद्ध प्रतापगढ़ में लड़ा गया था।
इसके अलावा कोल्हापुर की लड़ाई में बीजापुर के सुल्तान ने 10 हजार भाड़े के सैनिक भेजे, लेकिन कोल्हापुर में उन्हें केवल 5 हजार मराठा योद्धाओं का सामना करना पड़ा। हर-हर महादेव कहते हुए, शिवाजी युद्ध के मैदान में कूद पड़े और दुश्मनों का नरसंहार किया। एक और लड़ाई शाहिस्ता खान के साथ लड़ी गई, जिसने एक लाख से अधिक प्रशिक्षित सेना भेजी, शिवाजी ने हार का नाटक किया और पूणा के किले में प्रवेश किया, शाहिस्ता खान की उंगलियां काट दीं और वह अपनी जान बचाकर भाग गया।
एक अन्य युद्ध में उन्होंने मुगलों के मुख्य व्यापारिक केन्द्र सूरत पर आक्रमण किया और भारी धन-संपत्ति तथा हथियार एकत्र किये। कुछ ही दिनों में उन्होंने एक-एक करके मुगलों और बीजापुर के सुल्तानों के किलों को अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया। छत्रपति शिवाजी एक महान राजनेता थे जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में सिर झुकाया और अनुकूल परिस्थितियों में अपना सिर ऊंचा उठाया।
वर्ष 1674 के युद्ध में विजय के बाद शिवाजी का सात नदियों और चार समुद्रों से एकत्र किए गए पवित्र जल से अभिषेक किया गया और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शिवाजी महाराज को छत्रपति की उपाधि के साथ हिंदू सम्राट के रूप में राज्याभिषेक किया गया। इस साम्राज्य को हिंदवी साम्राज्य के रूप में हिंदू पदपादशाही घोषित किया गया था।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के बाद एक लाख घोड़ों, हथियारों सहित एक प्रशिक्षित सेना तैयार की। अपने 27 साल के शासनकाल के दौरान, छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के अग्रणी राजाओं में से एक बन गए, न केवल सैन्य रणनीति में बल्कि प्रशासन में भी, उन्होंने अपने पास मौजूद 300 किलों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया। उन्होंने अकेले निर्णय लेने के बजाय 8 प्रधानमंत्रियों की एक मंत्रिपरिषद का गठन किया।
उन्होंने एक मजबूत विदेश नीति और खुफिया तंत्र की स्थापना की। इस सिद्धांत का पालन करते हुए कि सरकार समाज के लोगों के लिए हैं, उन्होंने व्यक्तिगत विलासिता पर कोई पैसा खर्च किये बिना जन कल्याण के लिए काम किया। उन्होंने पूरे राज्य को सर्वेक्षण करके स्थानीय लोगों के बीच समस्याओं को रोकने के लिए भूमि को आवंटित किया। उन्होंने सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था बनाई। बंजर भूमि को भी फसल के लिए उपयुक्त खेतों में बदलने के लिए महान प्रयास किये गये हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज का साम्राज्य आज के भारत के दक्षिण-पश्चिम में एक छोटे राज्य के रूप में शुरू हुआ और बाद में एक महान साम्राज्य में बदल गया जो 1674 में हिंदवी स्वराज के रूप में अस्तित्व में आया और 1818 तक दक्षिण एशिया में सबसे बड़े साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ। 1680 में शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी छत्रपति और पेशवा के रूप में शासन करते रहे। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज 145 वर्षों से अधिक समय तक चला।
इस प्रकार स्वतंत्र भारत निर्माण हेतु लड़ने वाले वीरों के प्रेरणादाता एवं भारतीय जीवनशैली की रक्षा के लिए, प्राचीन हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रयास अमर और अनुकरणीय हैं। यदि कोई अपनी तेजतर्रार देशभक्ति, स्वधर्मनिष्ठा, धार्मिकता और असीम साहस को नाम देता है तो वह छत्रपति शिवाजी महाराज बन जाता है। (लेखक विश्व हिंदू परिषद और अखिल भारतीय गौ रक्षा के सहप्रमुख हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध एक वैश्विक बहस का विषय बन गया है। जबकि कुछ देशों ने स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, अन्य देशों ने इसके उपयोग को कानूनी दायरे में लाने का फैसला किया है। यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (जेम) टीम के अनुसार, कम से कम 79 शिक्षा प्रणालियों ने स्कूलों में स्मार्टफोन पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो बच्चों के शिक्षा और गोपनीयता पर इसके प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त करते हैं।
फ्रांस में वर्ष 2018 में स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था जो छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षिक प्रदर्शन पर इसके प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त करता था। इसी तरह, कुछ आस्ट्रेलियाई और ब्रिटिश स्कूलों ने भी स्कूल घंटों के दौरान स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो विचलित होने और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त करते हैं।
अन्य देशों ने भी स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए हैं। चीन के झेंगझओए शहर में, माता-पिता को अपने बच्चों को प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में स्मार्टफोन का उपयोग करने के लिए लिखित सहमति देनी होती है। इसके अलावा, कुछ देशों ने गोपनीयता की चिंताओं के कारण शैक्षिक सेटिंग्स से विशिष्ट अनुप्रयोगों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। डेनमार्क और फ्रांस ने दोनों ने गूगल वर्कस्पेस पर प्रतिबंध लगा दिया है, जबकि जर्मनी के कुछ राज्यों ने माइक्रोसॉफ्ट उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया है।
इसके विपरीत, कुछ देशों ने स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने का फैसला किया है, इसके बजाय प्रतिबंध लगाने के। यह दृष्टिकोण शैक्षिक सेटिंग्स में स्मार्टफोन के संभावित लाभों को स्वीकार करता है, जैसे कि आनलाइन संसाधनों तक पहुंच और छात्रों और शिक्षकों के बीच संचार को सुविधाजनक बनाने की क्षमता। भारत में, उदाहरण के लिए, सरकार ने स्कूलों में स्मार्टफोन के जिम्मेदार उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो शिक्षकों को इन उपकरणों को शिक्षा और सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले तरीके से अपने शिक्षण प्रथाओं में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
सिंगापुर ने भी स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने के लिए कई पहल शुरू की हैं, जिनमें मोबाइल डिवाइस प्रबंधन सॉफ्टवेयर का उपयोग शामिल है ताकि स्मार्टफोन के उपयोग पर निगरानी और नियंत्रण किया जा सके। इसी तरह, कुछ कनाडाई स्कूलों ने स्कूल घंटों के दौरान स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने के लिए नीतियां लागू की हैं, जिनमें निर्दिष्ट टेक-फ्री क्षेत्रों का उपयोग शामिल है।
स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या इसके उपयोग को विनियमित करने का निर्णय शैक्षिक समुदाय की विशिष्ट आवश्यकताओं और चिंताओं सहित विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। इसके बजाय एक समग्र प्रतिबंध लगाने के बजाय, स्कूलों और सरकारों को एक संतुलन खोजने का प्रयास करना चाहिए जो छात्रों को स्मार्टफोन के लाभों का लाभ उठाने की अनुमति देता है जबकि जोखिमों को कम करता है।
स्पष्ट नीतियों को लागू करके, छात्रों और शिक्षकों को शिक्षित करके, और स्मार्टफोन के उपयोग पर निगरानी करके, स्कूल स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने में मदद कर सकते हैं जो शिक्षा, सुरक्षा और जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, स्कूल स्मार्टफोन की लत और संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने के लिए शारीरिक गतिविधि और आउटडोर प्ले को बढ़ावा दे सकते हैं।
भारत सरकार ने स्कूली छात्रों में स्मार्टफोन की लत के मुद्दे को हल करने के लिए कई कदम उठाये हैं। मुख्य उपायों में से एक स्कूलों में जिम्मेदार स्मार्टफोन उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी करना है। ये दिशा-निर्देश शिक्षकों को अपने शिक्षण प्रथाओं में स्मार्टफोन को शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जो शिक्षा और सुरक्षा को बढ़ावा देते हैं।
स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने के लिए, कुछ भारतीय स्कूलों ने परिसर के आसपास मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। अन्य लोग दिन के विशिष्ट समय या स्कूल के क्षेत्रों में फोन के उपयोग को प्रतिबंधित करने की सिफारिश करते हैं। यह दृष्टिकोण विचलित होने को कम करता है और एक स्वस्थ शिक्षा वातावरण को बढ़ावा देता है।
स्मार्टफोन की लत बच्चों पर कई नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है, जिनमें ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी, साइबर बुलिंग का खतरा बढ़ना और शारीरिक गतिविधि में कमी शामिल है। इसके अलावा, अत्यधिक स्मार्टफोन के उपयोग को कई नकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य परिणामों से जोड़ा गया है, जिनमें चिंता, अवसाद और अकेलापन शामिल हैं। इन जोखिमों को कम करने के लिए, स्कूल और माता-पिता कई कदम उठा सकते हैं, जिनमें स्मार्टफोन के उपयोग पर सीमाएं निर्धारित करना, शारीरिक गतिविधि और आउटडोर प्ले को प्रोत्साहित करना और डिजिटल साक्षरता और जिम्मेदार प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देना शामिल है।
स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर बहस जटिल और बहुआयामी है। जबकि कुछ देशों ने स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, अन्य देशों ने इसके उपयोग को विनियमित करने का फैसला किया है। स्मार्टफोन के लाभों का लाभ उठाने की अनुमति देते हुए छात्रों को जोखिमों को कम करने के लिए एक संतुलन खोजने से, स्कूल और सरकारें छात्रों के लिए एक स्वस्थ और समर्थनकारी शिक्षा वातावरण बनाने में मदद कर सकती हैं।
अंतत:, स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या इसके उपयोग को विनियमित करने का निर्णय कई कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें शैक्षिक समुदाय की विशिष्ट आवश्यकताओं और चिंताओं शामिल हैं। स्कूल, सरकारें और माता-पिता मिलकर काम करके यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि छात्र स्मार्टफोन का उपयोग शिक्षा, सुरक्षा और जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देने वाले तरीके से करते हैं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज की युवा पीढ़ी एक अजीब सी मानसिक उलझन में फंसी हुई है। एक ओर वे अपने करियर को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं, तो दूसरी ओर उनका झुकाव भौतिकतावादी जीवनशैली की ओर बढ़ता जा रहा है। माता-पिता और बच्चों के बीच की दूरी बढ़ रही है, जिसके चलते बच्चे सही मार्गदर्शन से वंचित रह जाते हैं। नैतिक मूल्यों में गिरावट, बड़ों का सम्मान न करना, नाइट कल्चर को अपनाना, व्यवहारिक ज्ञान की कमी—ये सभी समस्याएं कहीं न कहीं हमारे पेरेंटिंग के ढांचे पर सवाल उठाती हैं।
करियर की चिंता और पैसे का बढ़ता आकर्षण, आज का युवा अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करता है। करियर बनाने की दौड़ में वे मानसिक दबाव में रहते हैं, और इसी तनाव के कारण वे अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो रहे हैं। माता-पिता भी इस स्थिति को समझने के बजाय, बच्चों को केवल आर्थिक सहायता देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं।
हालांकि, पैसों की आपूर्ति से जीवन तो चल सकता है, परंतु सही मार्गदर्शन और भावनात्मक सहयोग न मिलने से बच्चे अकेलापन महसूस करने लगते हैं। बच्चों में व्यवहारिक ज्ञान की कमी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। वे सामाजिक संबंधों को समझने में असमर्थ हो रहे हैं, आत्मकेंद्रित हो गए हैं, और केवल अपने फायदे को प्राथमिकता देने लगे हैं। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि माता-पिता स्वयं भी बच्चों के साथ कम समय बिताते हैं और उन्हें नैतिक मूल्यों की शिक्षा नहीं दे पाते।
नतीजा यह होता है कि बच्चे बड़ों का सम्मान नहीं करते, अनुशासनहीन हो जाते हैं, और अपनी इच्छाओं को ही सर्वोपरि मानने लगते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच बढ़ती दूरी के कारण पारिवारिक संबंधों में दूरियां बढ़ रही हैं। पहले जहां संयुक्त परिवारों में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची से भी सीखने का अवसर मिलता था, वहीं आज एकल परिवारों में माता-पिता अपने करियर और निजी जीवन में इतने व्यस्त हो गए हैं कि बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते।
इस वजह से बच्चों में भावनात्मक अस्थिरता बढ़ रही है और वे सोशल मीडिया, दोस्तों, या अन्य बाहरी साधनों से अपना मानसिक सहारा खोजने लगते हैं, जो हमेशा सही दिशा में नहीं होता। आजकल नाइट कल्चर का प्रभाव बढ़ रहा है। देर रात तक बाहर रहना, अनावश्यक पार्टी करना, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताना बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। माता-पिता इस पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे, क्योंकि वे या तो अधिक लिबरल बनना चाहते हैं या फिर अपनी व्यस्तता के कारण इस पर ध्यान नहीं देते।
इससे बच्चों में अनुशासन की भावना कम होती जा रही है, जो अवसाद और तनाव को और बढ़ाने का काम कर रही है। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि इन तमाम समस्याओं से निजात पाने के लिए क्या कर सकते हैं माता-पिता?,? तो बच्चों के साथ समय बिताएं: सिर्फ पैसों से ही बच्चों की जरूरतें पूरी नहीं होतीं, उन्हें माता-पिता का समय और प्यार भी चाहिए। उनके साथ नियमित रूप से बातचीत करें और उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश करें। सही मार्गदर्शन दें: करियर और पैसे की अहमियत समझाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ-साथ नैतिकता और जीवन मूल्यों का ज्ञान देना भी आवश्यक है।
व्यवहारिक शिक्षा दें: बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी दें। उन्हें सिखाएं कि कैसे दूसरों के साथ व्यवहार करना चाहिए और समाज में अच्छे संबंध कैसे बनाए रखें। संस्कारों पर जोर दें: बड़ों का सम्मान करना, अनुशासन का पालन करना, और सही-गलत में अंतर समझना बच्चों को घर से ही सीखना चाहिए। नाइट कल्चर पर नियंत्रण रखें: बच्चों को अनुशासन में रखें और समय की पाबंदी सिखाएं।
उन्हें समझाएं कि पर्याप्त नींद और दिनचर्या का सही पालन उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। अगर सभी माता-पिता पैसे देने के साथ-साथ यह भी जिम्मेदारी अगर उठाएं तो भविष्य हमारा उज्जवल होगा। समझने की बात यहां यह है कि बच्चों में बढ़ते अवसाद के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन खराब पेरेंटिंग इसमें एक प्रमुख भूमिका निभाती है। माता-पिता को केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी बच्चों का समर्थन करना चाहिए।
यदि आज की युवा पीढ़ी को सही मार्गदर्शन नहीं मिला, तो आने वाला भविष्य अंधकारमय हो सकता है। इसलिए, माता-पिता को अपने बच्चों के साथ मजबूत रिश्ता बनाना होगा, उन्हें नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिक ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान से संपन्न करना होगा, ताकि वे मानसिक रूप से मजबूत और जीवन में सफल बन सकें। (लेखक रांची विश्वविद्यालय, रांची से संबद्ध कार्तिक उरांव महाविद्यालय, गुमला के रंगकर्मी, निर्देशक सह सहायक आचार्य हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 15वीं सदी में सामाजिक विषमता, धर्म, वर्ण-वर्ग भेद, पग-पग पर व्याप्त थो अध्यात्म और सनातन संस्कृति के संवाहक संतों ने अपनी वाणी के संदेश द्वारा समसामयिक भेदभाव, जातिगत ऊंच-नीच, रूढ़िवादी परंपराओं एवं अंधविश्वासों को दूर करने के लिए कार्य किया थो भारतीय संत परंपरा में संत कबीर का नाम प्रमुखता से आता है, तो उनके समकालीन संत रविदास, मलूकदास, दादू दयाल, संतपीपा, पलटूदास, सुंदरदास आदि संतों का उल्लेख भी प्राप्त होता हैे संत रविदास ने अपनी वाणी के माध्यम से मन चंगा तो कठौती में गंगा जैसी सूक्तियों द्वारा समसामयिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध जन जागरण का कार्य कियो इसी वजह से आज भी संत रविदास का स्मरण हम सब आदर पूर्वक करते हैं।
संत रविदास के जीवन परिचय में उनके माता-पिता, जन्म स्थान, शिक्षा आदि विषय में अनेक मत प्रचलित है, लेकिन जन श्रुतियों एवं अनुमान के आधार पर संत रविदास, कबीर के समकालीन थे। उनका जन्म सन् 1388 को उत्तर प्रदेश के बनारस में मांडूर ग्राम में हुआ थो इनके पिता का नाम रघु, माता का नाम कर्मा देवी था।
संत रविदास गरीब परिवार में पैदा हुए और गृहस्थ जीवन निर्वाह करते हुए भी उच्च कोटि के संत थे उनकी अपार लोकप्रियता, अद्भुत प्रतिभा और व्यापक प्रभाव के संबंध में अनेक किवदंतियां प्रचलित हैें देश के अनेक भागों में लाखों लोग उनके अनुयाई हैं। राजपूताना के मेवाड़ की कृष्ण भक्त मीरा ने उनसे दीक्षा प्राप्त की। संत रविदास ही उनके आध्यात्मिक गुरु थे गुरुग्रंथ साहिब में उनके द्वारा रचित सांखियों का उल्लेख भी प्राप्त होता है।
रविदास चर्मकार समाज से थे तत्कालीन समय में ऊंच - नीच, छुआछूत और भेदभाव अपने चरम पर था े रविदास ने अपनी जाति का उल्लेख अपने द्वारा रचित पदों एवं सांखियों में किया हैे इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद ईश्वर के प्रति उनकी आस्था और भक्ति की प्रगाढ़ता देखने को मिलती हैे ईश्वर के प्रति उनका निश्छल प्रेम और समर्पण भाव स्वत: परिलक्षित होता है-
धैर्य, शालीनता, संयमता जैसे गुणों से पूर्ण संत रविदास ने अपने आचरण, व्यवहार, विचारों की श्रेष्ठता और गुणों से ईश्वर के भक्ति मार्ग द्वारा यह प्रतिस्थापित कर दिया कि व्यक्ति जन्म से महान नहीं होता बल्कि कर्म से महान होता है। संत रविदास ने जन समुदाय की पीड़ा को समझा और उसे ही अपनी वाणी द्वारा प्रस्तुत कियो।
उनके जीवन और काव्य का प्रमुख उद्देश्य जातिगत भेदभाव मिटाना और सामाजिक समरसता, समता, स्वतंत्रता और बंधुता की समाज में स्थापना करना थो जाति उनकी दृष्टि में एक कदली के पेड़ के समान है। जिस तरह केले के पेड़ में एक पत्ते के नीचे फिर पत्ता होता है, वही स्थिति जाति की होती है। उन्होंने कहा कि -
संत रविदास निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे निर्गुण ब्रह्म ही इस संसार के पोषणकर्ता, आधार स्तंभ, करुणा के सागर एवं कृपालु हैं, जिनके दृष्टिपात से ही अष्टादश सिद्धियां स्वयं उत्पन्न होती हैं। निर्गुण ब्रह्म का स्वरूप जो बताया उसके विवेचन में शिवरूप स्तुति तथा श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण के विराट स्वरूप का समर्थन दिखाई देता है। उनके निर्गुण ब्रह्म के चरण पाताल, सिर आसमान, नख का स्वेद सुरसरिधारा और शिव, सनकादि तथा ब्रह्मा ने भी उनका परिचय नहीं पा सके हैं।
सनातन धर्म और संस्कृति में उनकी प्रगाढ़ता बहुत थी। वे सबको बिना भेदभाव के मिलकर रहने का संदेश देते थे, लेकिन उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ते प्रभाव को देखकर मुगल शासकों ने धर्मांतरण का दबाव बनायो संत रविदास निर्भीक, साहसी, वचनों की प्रतिबद्धता, धार्मिक निष्ठा पर अडिग रहते हुए अनुयायियों को सनातन धर्म और संस्कृति की महत्ता का संदेश दिया, उन्होंने कहा है कि -
काशी में रहने वाले रूढ़िवादी धर्मावलंबियों द्वारा उनकी प्रतिष्ठा को अनेक षड्यंत्रों द्वारा धूमिल करने का प्रयास किया गया लेकिन उनका मंतव्य था की सत्य एक है और वह सनातन है, जो वेदों में निहित हैे संत रविदास मूर्ति पूजा एवं पाखंड के विरोध में थे लेकिन वेदों की प्रमाणिकता स्वीकार्यता के साथ उनमें निहित ज्ञान के प्रबल समर्थक एवं प्रचारक थे। उन्होंने कहा कि- सत्य सनातन वेद है ज्ञान धर्म मयार्दे जो न जाने वेद को वर्था करें बकवाद। (लेखक, इग्नू के सहायक क्षेत्रीय निदेशक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सनातन धर्मावलंबियों की आस्था का पवित्र महाकुंभ धार्मिक अनुष्ठानों, आध्यात्मिक जागरण और साधना का महत्वपूर्ण केंद्र है। यह पर्व आत्मशुद्धि, ध्यान और मोक्ष की साधना के लिए जाना जाता है। लेकिन आधुनिक मीडिया युग में महाकुंभ को आध्यात्मिकता के बजाय ग्लैमर-केंद्रित दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जा रहा है, जहां सेलिब्रिटी संस्कृति, बाहरी आकर्षण और दिखावे को अधिक महत्व दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप श्रद्धालु और साधक इस महान धार्मिक आयोजन के आध्यात्मिक लाभ से वंचित हो रहे हैं। इस परिवर्तन के पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :
महाकुंभ केवल बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक जागरण और मोक्ष प्राप्ति का पवित्र अवसर है, जिसका हर सनातन धर्मावलंबी को पूर्ण लाभ उठाना चाहिए। कुंभ व महाकुंभ भारतीय सनातन परंपरा की अमूल्य धार्मिक-आध्यात्मिक व सांस्कृतिक धरोहर है। इस पवित्र परंपरा की विस्तार एवं संरक्षण हेतु निम्नलिखित महत्वपूर्ण कदम उठाये जा सकते हैं : -
उपरोक्त प्रयासों से कुंभ और महाकुंभ की परंपरा न केवल सुरक्षित रहेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक इसकी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्ता भी बनी रहेगी।
महाकुंभ भारतीय सनातन-संस्कृति परंपरा के पवित्र आस्था का पर्व है। महाकुंभ धार्मिक-आध्यात्मिक पर्व के साथ-साथ वैज्ञानिक परिदृष्टि एवं वैज्ञानिक परीक्षण की कसौटी पर भी उतनी हीं खरी उतरती है। उदाहरण के लिए संक्षिप्त टिप्पणी : बृहस्पति मकर राशि में और सूर्य व चंद्रमा अन्य शुभ स्थानों पर होते हैं, तब महाकुंभ का समय बनता है और, यह संयोग प्रत्येक 144 वर्ष में एक ही बार आता है। इस संयोग को भारतीय सनातन संस्कृति परंपरा में धार्मिक-आध्यात्मिक जागरण व उन्नयन के लिए विशेष रूप से शुभ और दिव्य माना जाता है। प्रत्येक 144 वर्ष में एक दुर्लभ खगोलीय घटना होती है, जो प्रत्येक 12 वर्ष में चार स्थानों पर आयोजित होने वाले कुंभ मेले को विशिष्ट बनाकर महाकुम्भ बना देती है, और यह 2025 में प्रयागराज के पावन धरा पर आयोजित दिव्य मोक्षदाई महाकुंभ संगम का संयोग 144 वर्ष के बाद सनातन धर्मावलंबियों को प्राप्त हुआ है। (लेखक श्रीधाम वृन्दावन के सामाजिक और आध्यात्मिक चिंतक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज के ही दिन भारत की सबसे बड़ी पंचायत, लोकसभा ने भारत का संविधान पारित कर देश को एक पूर्ण संप्रभुता संपन्न गणतंत्र के रूप में नवाजा था। यह दिन समस्त देशवासियों के लिए गौरव का दिन है। भारत का संविधान समस्त देशवासियों को अधिकार और कर्तव्य की सीख प्रदान करता है। हम समस्त देशवासियों को संविधान में प्रदत्त अधिकारों की जानकारी देता है। इसके साथ ही संविधान के प्रति, देश के प्रति और देशवासियों के प्रति हमारा क्या कर्तव्य है? इसकी भी जानकारी देता है।
आज की बदली सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति स्थिति में हम सब अपने-अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संगठित होकर आवाज बुलंद करते हैं। लेकिन अपने कर्तव्य के प्रति मौन क्यों हो जाते हैं? यह बड़ा सवाल है। हम सब जितने अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट रहते हैं, उससे कहीं ज्यादा अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सचेष्ट होना चाहिए। आज गणतंत्र दिवस के दिन हम सबों को मिल जुल कर अपने अपने कर्तव्य निभाने का संकल्प लेना चाहिए।
इस गौरवमयी दिन को लाने में न जाने कितने स्वाधीनता सेनानियों ने अपना संपूर्ण जीवन भारत की आजादी के संघर्ष के नाम कर दिया था। कई स्वाधीनता सेनानियों को विभिन्न अवसरों पर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। इसके साथ ही हजारों ऐसे बेनाम स्वाधीनता सेनानी थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश की आजादी के संघर्ष के नाम कर दिया था। आज उन बेनाम स्वाधीनता सेनानियों को भी स्मरण करने का दिन है। उनके प्रति भी श्रद्धांजलि और कृतज्ञता अर्पित करने का दिन है।
देश की आजादी के संघर्ष में हजारीबाग जिले की भूमिका को कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है। हजारीबाग में सेंट्रल जेल रहने के कारण देश भर के बड़े-बड़े नेता यहां बंद थे। इस कारण यह जिला अन्य जिलों की तुलना में ज्यादा आंदोलितरत था। वे हजारीबाग सेंट्रल जेल में लगभग आठ वर्षों बंद थे। अंग्रेज अधिकारी बाबू राम नारायण सिंह के जुझारूपन से बेहद खफा रहते थे। यह हजारीबाग जिले के लिए गौरव की बात है कि बाबू राम नारायण सिंह भारतीय संविधान सभा के सदस्य के रूप में मनोनीत किये गये थे।
उन्होंने बतौर संविधान सभा के सदस्य के रूप में बहुत ही महत्वपूर्ण सुझाव संविधान सभा को दिया था। देश की आजादी के बाद अगर वे चाहते तो केंद्र अथवा प्रांत की सत्ता की राजनीति जुड़ सकते थे। वे महात्मा गांधी की तरह सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे। वे ग्राम पंचायत को अधिक से अधिक ताकतवर बनाना चाहते थे।
हजारीबाग नगर के कृष्ण बल्लभ सहाय, महात्मा गांधी का आह्वान पर आजादी के संघर्ष से जुड़े थे। वे जब तक देश को आजादी मिल नहीं गई थी,तब तक संघर्षरत रहे थे। जेल इनके लिए घर आंगन हो गया था। अंग्रेजी हुकूमत, कृष्ण बल्लभ सहाय की दहाड़ से डर से गयी थी। हजारीबाग जिले की प्रथम महिला स्वाधीनता नेत्री सरस्वती देवी भारत की आजादी के संघर्ष में खुद को शामिल कर एक इतिहास रच दिया था। इस कालखंड स्त्रियां पर्दे में रहा करती थीं। वहीं सरस्वती देवी स्वाधीनता आंदोलन का अलख जगाने के लिए गांव गांव पैदल चल रही थीं।
सरस्वती देवी के परिवार वालों ने उन्हें इस कार्य में बहुत ही मदद किया था। इस जिले में स्वाधीनता आंदोलन में स्त्रियों को जोड़ने का श्रेय सरस्वती देवी को जाता है। हजारीबाग के त्रिवेणी सहाय स्वाधीनता आंदोलन के एक जांबाज सिपाही थे। स्वाधीनता आंदोलन की गति को तेज करने के लिए देश की आजादी तक जुड़े रहे थे। देश की आजादी के बाद एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपना संपूर्ण जीवन समाजोत्थान में लगा दिया था।
महात्मा गांधी का आह्वान पर हजारीबाग नगर के दो सगे भाई कस्तूर मल अग्रवाल और केसरमल अग्रवाल स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े थे। स्वाधीनता संघर्ष की सभाओं को आयोजित करने पर दंड स्वरूप उन दोनों भाइयों को सेंट्रल जेल मैं बंद कर दिया गया था। दोनों भाई जेल में ही रह कर हजारीबाग जिले के स्वाधीनता संघर्ष का संचालन किया करते थे। इस दरमियान उनका सारा कारोबार खत्म हो गया था।
फिर भी इन दोनों भाइयों ने कदम पीछे नहीं किया था। जेल से छूटने के बाद फिर से स्वाधीनता आंदोलन गये थे। कई बार उन दोनों भाइयों को घर में ही नजरबंद कर दिया गया था। हजारीबाग जिले के इचाक, करियातपुर के मोतीराम, महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वाधीनता आंदोलन में जुड़े थे। उन्हें अपने क्षेत्र में स्वाधीनता आंदोलन की सभा करने के जुर्म में जेल में डाल दिया गया था। चतरा, हंटरगंज के सुकलाल सिंह और शालिग्राम सिंह को स्वाधीनता आंदोलन की सभाओं में भाग लेने के जुर्म में हजारीबाग केंद्रीय कारा में बंद कर दिया गया था।
जहां पहले से लोक नारायण जयप्रकाश नारायण बंद थे। यहां इन दोनों ने जयप्रकाश नारायण से स्वाधीनता आंदोलन संघर्ष संचालन की सीख ली थी। जेल से बाहर निकलने के बाद जयप्रकाश नारायण ने स्वाधीनता आंदोलन संचालन की जो हो राह बताई थी, उसको मूर्त रूप दिया था। हजारीबाग, ग्राम कदमा के बद्री सिंह एक जांबाज स्वाधीनता सेनानी थे। इन्होंने स्वाधीनता आंदोलन संघर्ष में अपने को इस तरह जोड़ दिया था कि स्वाधीनता आंदोलन ही इनका सब कुछ हो गया था।
स्वाधीनता आंदोलन के संघर्ष में युद्ध रत रहने के कारण इन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। घर बार छोड़ देने से परिवार को काफी परेशानियों का सामना सामना करना पड़ा था। हजारीबाग के सरला देवी, नरसिंह भगत, इचाक के रामेश्वर महतो, बजरंग सहाय, पुनीत राय, सदानंद प्रसाद, विश्वनाथ मोदी, भुनेश्वर दत्त सहित सैकड़ों स्वाधीनता सेनानियों ने अपने अपने मजबूत इरादे और संघर्ष के बल पर अंग्रेजी हुकूमत की ईट से ईट बजा दी थी।
चतरा, कान्हाचट्टी, टटरा ग्राम के राम प्रसाद दुबे और सीताराम दुबे सन 1930 में महात्मा गांधी द्वारा आयोजित नमक सत्याग्रह, दांडी मार्च में शामिल होकर क्षेत्र का नाम रोशन किये थे। इस आंदोलन से जुड़ने के बाद राम प्रसाद दुबे आजीवन नमक का सेवन नहीं किये थे। हजारीबाग सेंट्रल जेल में डॉ राजेंद्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खान, बाबू राम नारायण सिंह, डॉक्टर श्री कृष्ण सिंह, सरस्वती देवी, हरेकृष्ण मेहताब, रामवृक्ष बेनीपुरी, राहुल सांस्कृतायन, स्वामी सहजानंद सरस्वती, मुकुट धारी सिंह जैसे अग्रणी नेताओं के बन्द रहने के चलते इस जिले के स्वाधीनता सेनानियों को एक विशेष पंख मिल गये थे।
जेल में बंद नेतागण किसी न किसी रूप में स्वाधीनता आंदोलन के आवश्यक निर्देश जेल से बाहर भेज देते थे। बाहर रह रहे स्वाधीनता आंदोलन के सिपाही इन पत्रों के आधार पर गुप्त सभाएं आयोजित करने के साथ सूचनाएं अन्य प्रदेशों में भी भेजा करते थे। 9 नवंबर 1942, दीपावाली के दिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण अपने पांच स्वाधीनता सेनानियों के साथ सेंट्रल जेल तोड़कर भागने में सफल हुए थे। जेपी के साथ भागने वाले साथियों में क्रमश: सूरज नारायण सिंह, योगेंद्र शुक्ला, रामानंद मिश्र, शालिग्राम सिंह, गुलाबी सुनार थे।
हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद इन छ: स्वाधीनता सेनानियों ने इस योजना को बहुत ही गुप्त रखकर इस कार्य अंजाम दिया था। जेल तोड़कर भागने की खबर आग की तरह संपूर्ण देश में फैल गयी थी। जैसे ही यह हजारीबाग जिला मुख्यालय तक पहुंची थी, स्वाधीनता सेनानियों ने इस कदम का पुरजोर स्वागत किया था। लोगों ने में मिठाइयां बांटकर खुशियां व्यक्त की थी। हजारीबाग जिले का केशव हॉल, कंचन ग्राउंड, उर्दू लाइब्रेरी, हिंदू उच्च विद्यालय मैदान, जिला स्कूल मैदान आदि ऐसे स्थल रहे, जहां स्वाधीनता सेनानी जुटा करते थे।
हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने इस आजादी की बड़ी कीमत चुकाई थी। बदले में इन्होंने कुछ भी नहीं चाहा था। बस ! उनकी एक ही चाहत थी कि देश मजबूत बने। देशवासी आपस में मिलजुलकर रहें। लेकिन आजादी के 77 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारे स्वाधीनता सेनानियों का सपना साकार नहीं हुआ। सत्ता की राजनीति ने देश की अखंडता पर प्रश्नचिन्ह से लगा दिया है।
गणतंत्र दिवस पर देश के नेताओं से यह कहना चाहता हूं कि खून से लथपथ, गौरवमई स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास का एक बार अवलोकन जरुर करें। देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए जो उनसे संभव हो सकता है। अवश्य करें। यही स्वाधीनता और गणतंत्र के सच्चे सिपाहियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। (लेखक वरिष्ठ कथकार, स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
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