एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नये साल की पहली भोर ही मन को उदास कर गयी। सात जुलाई, 1967 से बिना नागा हर रोज एक कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट काक इस फानी दुनिया से अलविदा कह गये। उन्नाव के पुरा गांव के स्वतंत्रता सेनानी शोभ शुक्ल की पांचवीं संतान हरीश चन्द्र शुक्ला (दुनिया में काक नाम से पहचान) को सातवीं कक्षा में उनके पेंसिल से खौ-खौ करते बंदर के बनाये गये चित्र, जो चित्र कम कार्टून ज्यादा था, को कला अध्यापक जगदम्बा सिंह द्वारा दिये गये गुड ने उन्हें स्कैच बनाने को प्रेरित किया। फिर कापी पर पेंसिल से स्कैच करना उनके जीवन का परम सुख बन गया।
सातवीं कक्ष में बनाया गया वह बंदर और उसकी शरारतें, कारस्तानियां हरीश के मस्तिष्क में इतने गहरे पैठ गयीं कि काक बनने पर भी वह बंदर स्मृति से विस्मृत नहीं हुआ बल्कि और ज्यादा शिद्दत से उभरा। काक के कार्टूनों के प्रिय पात्र जो गली का फक्कड़ बुड्ढा रहा, जो देश-दुनिया की हर घटना पर आम आदमी के मन की बात होती है, उसे कहने में गुरेज नहीं करता।
उसे जरा गौर से देखियेगा, उसके पार्श्व में कहीं न कहीं वह बंदर दिखायी दे ही जाता है। पढ़ाई-लिखाई पूरी कर कानपुर के ही एक सरकारी प्रतिष्ठान में नौकरी मिलने और फिर दाम्पत्य जीवन में बंध जाने के बावजूद उनका कार्टून बनाने का शौक बदस्तूर जारी रहा। नित्य के दायित्वों को निभा जैसे ही फुरसत पाते, बस पेंसिल उठाकर स्कैच करने बैठ जाते। इसी से थकान उतरती थी, यही था जीवन का परम सुख।
वर्ष 1965-66 में उ.प्र. में चंदरभानु गुप्त मुख्यमंत्री थे। उन्होंने उन पर कार्टून स्कैच किया और कानपुर से प्रकाशित अखबार राम राज्य में भेज दिया। कार्टून छपा परंतु कोई विशेष रेस्पांस नहीं मिला। पहला कार्टून छपने के डेढ़ साल बाद सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान भारत आये। शुक्ला जी ने पेंसिल उठायी और कार्टून बनाया। जिसमें सीमांत गांधी की बड़ी छवि बनाते हुए उनका स्वागत करते नेताओं को बहुत छोटा-छोटा दिखाया गया था।
यह कार्टून दैनिक जागरण के संपादक नरेंद्र मोहन को दे आये। कार्टून गजब था और संपादक पारखी। उन्होंने कार्टून को 7 जुलाई, 1967 को पहले पन्ने पर प्रकाशित किया। संयोग देखिये, उसी दिन हरीश चंद्र शुक्ला के पहले बेटे का जन्म हुआ। सारा घर-परिवार खुश कि घर में नन्हा शिशु आया है लेकिन उनके लिये यह यक्ष प्रश्न अपने आप से कि वह पुत्र आगमन से खुश हैं या अपना कार्टून छपने से।
बहरहाल सात जुलाई 1967, कार्टूनों की दुनिया में ऐतिहासिक दिन बन गया, उसी दिन जाने माने कार्टूनिस्ट काक का नामकरण हुआ। उस दिन हरीशचंद्र शुक्ला नेपथ्य में चले गये और सामने थे काक, जिन्हें सारा देश इसी नाम से पहचानता हैं। स्वयं काक साहब भी इसी नाम से पुकारे जाने के हामी थे। उन्होंने खुद से संकल्प किया कि जब तक जीवन है, वह हर रोज कार्टून बनायेंगे।
इन 58 साल में एक भी दिन ऐसा नहीं जब काक साहब ने कार्टून न बनाया हो। काक की संकल्प शक्ति को क्या कहियेगा, कोरोना संकट में वे हर रोज कार्टून बनाते रहे। इस तरह काक ने कार्टूनों की दुनिया में ऊंची उड़ान भर दी। एक से एक नुकीला, चुभता हुआ, गुदगुदाता हुआ कार्टून हिंदी के तमाम अखबारों में दिखने लगा। कानपुर से दैनिक जागरण, आज, जयपुर में राजस्थान पत्रिका, चंडीगढ़ में हिंदी ट्रिब्यून में काक के कार्टून उड़ान भर रहे थे।
बात को बेहद सलीके से अपने प्रिय पात्र बुड्ढे के जरिये कहने वाले काक ने कोई नेता नहीं छोड़ा जिसका कार्टून न बनाया हो। देश भर के नेता काक को जानने-समझने लगे थे। दिनमान में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के बाद बतौर संपादक रघुवीर सहाय आये। रघुवीर सहाय की पहल पर काक ने दिनमान के लिये कार्टून बनाने शुरू किये। कई बार उनके कार्टून को ही रघुवीर सहाय ने कवर पेज बना दिया।
यह काक की काक दृष्टि का ही कमाल था कि रघुवीर सहाय के समय से दिनमान में छपने शुरू हुए कार्टून कन्हैया लाल नंदन, सतीश झा, घनश्याम पंकज के कार्यकाल में भी यथावत छपते रहे। पत्रिका के लिये काक के कार्टून अपरिहार्य हो गये थे। उन्हीं दिनों कलकत्ता से रविवार का प्रकाशन शुरू हुआ। योगेन्द्र कुमार लल्ला, एसपी सिंह, उदयन शर्मा काक को कहां छोड़ने वाले थे। रविवार के लिये भी काक अपरिहार्य हो गये थे। अपने कार्टून की बदौलत काक राजनेताओं के पंसदीदा हो गये थे।
अटल बिहारी वाजपेयी के विराट व्यक्तित्व से अवगत कराते हुए काक ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि जब बेहमई नरसंहार के बाद विभिन्न दलों के नेतागणों के दौरे हो रहे थे। इंदिरा गांधी के बाद अटल जी भी आये। उन दिनों जागरण के मुख पृष्ठ पर कार्टून छपा, शीर्षक था बेहमई की हुतात्माओं की शांति के लिए थोड़ी और धूल।
कार्टून में अटल जी बेहमई जा रहे थे, धूल उड़ रही थी। यह कार्टून कुछ ज्यादा ही तीखा हो गया था, पर वाह अटल जी, उसी दिन कानपुर की विशाल सभा में उन्होंने कार्टून का बाकायदा उल्लेख किया और उलाहना दिया कि कार्टूनिस्ट ने हमें कुछ ज्यादा ही मोटा दिखा दिया है, देख लो, मैं इतना मोटा नहीं हूं। काक दंग रह गये यह सुनकर। अपनी आलोचना को न केवल इतनी सहजता से लेना बल्कि इतना अप्रत्याशित महत्व देना, यह अटल जी की विशेषता थी।
1967 से 1983 तक कुल 15 बरस तक हर रोज कार्टून बनाने और हर रोज किसी न किसी पत्र पत्रिका में कार्टून प्रकाशित होने के फलस्वरूप कार्टूनिस्ट काक प्रतिष्ठित हो चुके थे। सभी संपादक काक को सलाह देते कि अब पूर्णकालिक रूप से अखबार ज्वाइन करो। कालांतर हरीश चन्द्र शुक्ला को उसी सरकारी प्रतिष्ठान में छोड़ उन्होंने पूर्णकालिक रूप से काक बन कर जनसत्ता में ज्वाइन किया। डेढ़ साल बाद नवभारत टाइम्स में आये और 1999 में सेवानिवृत्त हुए। लेकिन कार्टून बनाना ही उनका जीवन रहा, उनकी सांसें रहीं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कहते रहे हैं कि उनकी सरकार लोगों के हितों के लिए काम करती रहेगी और यही कारण है कि इस साल भी मोदी सरकार की ओर से कुछ बड़े घोषणाएं की गयी। 2024 समाप्त होने जा रहा है। 2025 की शुरुआत कुछ ही दिनों में हो जायेगी। देश की राजनीति के लिहाज से देखें तो 2024 बहुत खास रहा क्योंकि इसी साल देश में आम चुनाव हुए।
भाजपा अपने दम पर तो नहीं लेकिन अपने सहयोगियों के समर्थन से तीसरी बार नरेंद्र मोदी का नेतृत्व में सरकार बनाने में कामयाब हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कहते रहे हैं कि उनकी सरकार लोगों के हितों के लिए काम करती रहेगी और यही कारण है कि इस साल भी मोदी सरकार की ओर से कुछ बड़े घोषणाएं की गई। आज हम आपको 2024 में घोषित की गई कुछ सरकारी योजनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं।
पहले शुरू किये गये राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन की सफलता के आधार पर, केंद्र सरकार ने 2024 में दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों सहित भारत के सभी क्षेत्रों को कवर करने के लिए इसके विस्तार की घोषणा की। इस पहल का उद्देश्य नागरिकों को डिजिटल स्वास्थ्य सेवा, इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड और टेलीमेडिसिन तक पहुंच प्रदान करना है।
इसका उद्देश्य डिजिटल प्रौद्योगिकी को एकीकृत करके, देश भर में स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच और गुणवत्ता में सुधार करके और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में अंतराल को संबोधित करके स्वास्थ्य सेवा वितरण में क्रांति लाना है।
मोदी सरकार ने 2024 में एक प्रमुख राष्ट्रीय शिक्षा सुधार कार्यक्रम शुरू किया, जिसका उद्देश्य सभी स्तरों पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है। सुधार कौशल विकास, परीक्षा के दबाव को कम करने और नवीन शिक्षण विधियों को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित हैं।
इसमें शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग बढ़ाना, डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म को बढ़ाना और ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी ढांचे में सुधार करना शामिल है। कार्यक्रम का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक छात्र, चाहे उनका स्थान कुछ भी हो, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करे जो उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करे।
2024 में, केंद्र सरकार ने देश भर में बुनियादी ढांचे की कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान का विस्तार किया। शुरुआत में 2021 में शुरू की गई यह पहल परिवहन, लॉजिस्टिक्स और संचार जैसे क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की एकीकृत योजना पर केंद्रित है।
यह विस्तार राज्यों को कार्यान्वयन प्रक्रिया में अधिक सक्रिय रूप से भाग लेने, प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों के विकास को लक्षित करने और व्यापार और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सुचारू रसद की सुविधा प्रदान करने की अनुमति देगा। इस कदम का उद्देश्य परिवहन लागत को कम करना, नौकरियां पैदा करना और वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में भारत की स्थिति में सुधार करना है।
भारत को स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करने के लिए इस वर्ष राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शुरू किया गया था। मिशन नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा संचालित इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से हरित हाइड्रोजन, एक नवीकरणीय और टिकाऊ ऊर्जा स्रोत का उत्पादन करने पर केंद्रित है।
सरकार का लक्ष्य स्टील, सीमेंट और परिवहन जैसे उद्योगों में हरित हाइड्रोजन के उपयोग को बढ़ावा देना, कार्बन उत्सर्जन को कम करना और देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह पहल स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में निवेश को आकर्षित करेगी और बड़ी संख्या में हरित नौकरियाँ पैदा करेगी।
महिलाओं को सशक्त बनाने की अपनी प्रतिबद्धता के अनुरूप, सरकार ने 2024 में महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा पैकेज लॉन्च किया। इस योजना में महिला उद्यमियों के लिए बढ़ी हुई वित्तीय सहायता, संकट में महिलाओं के लिए एक नयी हेल्पलाइन और लिंग आधारित हिंसा से निपटने के लिए सख्त कानून के प्रावधान शामिल हैं। यह पहल सुरक्षित सार्वजनिक स्थान प्रदान करने और सरकारी और निजी क्षेत्रों में नेतृत्व की भूमिकाओं में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ाने पर भी केंद्रित है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। टिमोथी और ग्रेस गे का घर, जो क्रिसमस के समय लाखों पर्यटकों का आकर्षण बन जाता है। इस घर में जलने वाले 7,20,420 बल्ब एक जादुई माहौल तैयार करते हैं, जो संगीत और रंगों के साथ बदलते रहते हैं। शुरुआत में, इस दंपति ने अपने पहले बच्चे के जन्मोत्सव पर घर को सजाया था, लेकिन धीरे-धीरे यह शौक गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो गया। 2012 में उन्होंने रिकॉर्ड अपने नाम किया और तब से उनका नाम लगातार इसमें शामिल है।
गांव का एक घर अपनी जगमगाहट के कारण गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हो गया है। इस अनूठे प्रकाशमान घर के कारण एक छोटा-सा गांव क्रिसमस के अवसर पर चर्चित पर्यटन स्थल बन जाता है। गांव की आबादी तो वह मुश्किल 4600 लोगों की है, लेकिन क्रिसमस के दौरान यहां 60000 पर्यटकों का रेला उमड़ पड़ता है जो सिर्फ इस घर की रोशनी को देखने के लिए आते हैं।
जी हां, हम बात कर रहे हैं न्यूयॉर्क के ग्रामीण डचेज काउंटी के यूनियन वाले में मौजूद दंपति टिमोथी और ग्रेस गे के घर की। यूनियन वाले गांव की अंधेरे माहौल से दूर से किसी प्रकाश स्तंभ की तरह चमकता हुआ दिखता है उनका यह अनूठा घर। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस घर में 7,20,420 बल्ब जलते हैं। ये बल्ब एक साउंड ट्रैक से जुड़े हुए हैं और करीब ढाई सौ गीतों की धुन पर बार-बार रंग बदलते हैं। इससे माहौल पूरा जादुई और मनोरंजक हो जाता है। यहां एक तालाब है जिसके ऊपर एक बड़ा-सा ग्लोब, हार्ट, तारे और इंद्रधनुष लटकाये गये हैं। जाहिर है ये सभी रंग-बिरंगे बल्बों से बने हुए हैं। इनका प्रतिबिंब जब जल में पड़ता है तो लगता है मानो हम किसी मायालोक में आ गये हैं।
पति और पत्नी यानी टिमोथी और ग्रेस गे ने सबसे पहले अपने इस घर में को 1995 में रोशन किया था। यह मौका था उनके पहले बच्चे के जन्मोत्सव का। अपनी खुशी का इजहार करने के लिए इस दंपति ने अपने घर को 600 रंग-बिरंगे बल्बों से सजाया था। कुछ वर्षों बाद शौक-शौक में उन्होंने अपने 1.7 एकड़ में विस्तृत आवासीय परिसर के सामने तालाब के आसपास मौजूद पेड़ों और झाड़ियां को भी मिनी बल्बों की झालर से सजा दिया।
वर्ष 2011 में उन्हें पता चला कि आस्ट्रेलिया का एक दंपति भी अपने घर को लाइटों से सजाता है, जिनका नाम गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। उस दंपति से वे सिर्फ कुछ बल्बों की दूरी पर हैं। फिर क्या था टिमोथी और ग्रेस गे ने यह रिकार्ड अपने नाम करने की ठान ली। अपनी मेहनत से 2012 में उन्होंने यह रिकॉर्ड हासिल कर लिया। सन?् 2013 में 1 वर्ष के लिए वे पिछड़ गए थे मगर 2014 से अब तक उनका ही नाम गिनीज बुक में दर्ज है। अपने इस अनूठे शौक के कारण इस दंपति की ख्याति राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गई है और उनके साथ-साथ उनका गांव भी दुनिया भर में चर्चित हो गया है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज दिनांक 20/ 12 /2024 को डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण, शोध संस्थान रांची में प्रगतिशील लेखक संघ, रांची के तत्वावधान में राही डूमरचीर की प्रथम काव्य कृति गाडा टोला का लोकार्पण सह कृति परिचर्चा आयोजित की गयी। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए डॉ अशोक प्रियदर्शी ने कहा की गाडा टोला की कविताएं हमें मौन में ले जाती हैं।
इन कविताओं को पढ़ते हुए कवि की भावना के साथ हम सहज रूप से जुड़ जाते हैं। मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर रविभूषण ने कहा कि इस वर्ष प्रकाशित हिंदी के 10 अच्छे कविता संग्रहों में से गाडा टोला एक है। समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में यह काव्य कृति अपनी शानदार उपस्थित रखेगी। राही डूमरचीर नवीन दृष्टि संपन्न, गहन संवेदना के कवि हैं।
वह स्थानिकता के साथ-साथ वैश्विकता के कवि हैं। वे लोकल, नेशनल, ग्लोबल प्रश्न उनके यहां एक साथ मौजूद हैं। यथार्थ बोध, जीवनबोध, इतिहास बोध, समयबोध सब एक साथ उनके यहां दर्ज है। कम शब्दों में वे बड़े सवाल उठाते हैं। समकालीन हिंदी कविता में उनकी उपस्थिति दमदार है। राही डूमरचीर की कविताएं बदलते समय की तकलीफ को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं।
विशिष्ट वक्ता के तौर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ माया प्रसाद ने कहा कि राही डूमरचीर की कविताएं हमें प्रकृति से जोड़ती हैं। इन कविताओं में पूरे प्रदेश के दोहन की व्यथा अभिव्यक्त है। कवि की कविताएं नये सौंदर्यबोध से संपृक्त हैं और अनूठी हैं। बीज वक्तव्य देते हुए प्रसिद्ध कथाकार रणेंद्र ने कहा कि राही डूमरचीर की कविताएं जल, जंगल, जमीन, हवा और खुशबू की बात करती कविताएं हैं।
यहां के गांव- घर आदिवासी दर्शन को कहती कविताएं हैं। सहजता से अपनी बात रखना इन कविताओं की एक बड़ी खूबसूरती है। मौके पर साहित्यकार महादेव टोप्पो ने कहा कि राही डूमरचीर आदिवासी दर्शन को लेकर जिस तरह से कविताएं रच रहे हैं वह हिंदी कविता को आश्वस्त करती हैं।
इस अवसर पर युवा आलोचक डॉ जिंदर सिंह मुंडा ने कहा कि राही की कविताओं में प्रयुक्त शब्द हमें नई शब्दावली देते हैं। राही ने अपनी कविता में संताली के कई सुंदर शब्दों को सहज रूप से स्थान दिया है; वह हिंदी भाषा को समृद्ध करता है। साथ ही उनकी प्रेम की कविताएं एक नये कलेवर में सामने आती हैं, नये बिम्ब हैं-
मौके पर डॉ उर्वशी, डॉ सावित्री बडाईक, डॉ प्रज्ञा गुप्ता साहित्यकार प्रमोद झा, आलोचक -चिंतक सुधीर सुमन, कवि प्रकाश देवकुलिश, कहानीकार पंकज मित्र ने भी अपने विचार रखे।
कवि राही डूमरचीर, कहानीकार रश्मि शर्मा, कहानीकार कमल, कवयित्री सुरेंद्र कौर नीलम, चित्रकार भारती, कवि प्रेम रंजन अनिमेष, कहानीकार चंद्रिका ठाकुर, फिल्मकार निरंजन शब्द कार टीम के सदस्य, रांची विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के शोधार्थी एवं छात्र, रांची विमेंस कॉलेज की छात्राएं एवं बड़ी संख्या में साहित्य अनुरागी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन कवि चेतन कश्यप ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन कवयित्री पार्वती तिर्की ने किया। (डॉ प्रज्ञा गुप्ता, सचिव, प्रगतिशील लेखक संघ, रांची।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। काथलिक कलीसिया में ख्रीस्त जयंती का अलग ही महत्व है। यह पर्व येसु के जन्मदिन की याद दिलाता है। उनका जन्म अद्भुत था, क्योंकि उनके जन्म से एक नया युग, नयी सोच और नयी जीवन शिक्षा की शुरुआत हुई। उनका जन्म भी विशिष्ट था, क्योंकि जोसफ और गर्भवती मरियम ने अगुस्तुस सीजर के समय यहूदी जनगणना के लिए अपना नाम दर्ज करवाने के लिए नाजरेथ से बेथलेहम पहुंचने के लिए लगभग 150 किलोमीटर पैदल यात्रा की।
बेथलेहम पहुंचने पर गर्भवती मरियम दर्द से तड़प रही थीं, और जोसफ बड़े आशा और उम्मीद से मदद की गुहार लगाते हुए घर-घर जाकर शरण की याचना कर रहे थे। लेकिन जोसफ और मरियम को अपरिचित और अजनबी समझकर अधिकांश लोग अपना दरवाजा बंद कर देते थे। फिर भी, जोसफ ने अपनी पत्नी मरियम को हौसला और साहस देते हुए, आशा की किरण के साथ हर घर का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हर बार यही जवाब मिलता, हमारे यहां स्थान नहीं है, कृपया आगे जाइये। थके-हारे वे शरण की खोज में दर-दर भटकते रहे।
अंत में, बहुत मुश्किल से उन्हें एक छोटे से कोने में एक स्थान मिला, जहां घरेलू जानवरों को रखा जाता था। वहीं, मरियम ने अपने प्यारे पुत्र येसु मसीह, दुनिया के मुक्तिदाता को जानवरों के बीच जन्म दिया। इस प्रकार, बड़ी तंगी में येसु का जन्म नाजरेथ के एक साधारण परिवार में हुआ, जहां जोसफ एक बढ़ाई थे।
येसु के जन्म का पर्व हम सभी मानवता के लिए, इस दुनिया के लिए आशा का संदेश देता है। यह पर्व आशा का पर्व है, क्योंकि यह हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए हिम्मत और साहस देता है। यह पर्व येसु के जन्म के समय की सामाजिक स्थिति और वास्तविकता आज के हमारे समाज, परिवार और हर एक माता-पिता के लिए एक सच्चे दर्पण की तरह है। यह जन्म पर्व हमारे जीवन की कड़वी सच्चाई है।
इस पर्व का यही संदेश है कि हम एक दूसरे के लिए आशा बनें। हम भी एक-दूसरे के लिए आशा बनें, जैसे जोसफ ने पूरी तत्परता और लगन के साथ अपनी पत्नी का साथ दिया। मरियम ने भी बड़े प्यार से, सुख और दु:ख में, एक आशा की किरण बनकर एक आदर्श पत्नी और मां का कर्तव्य निभाया और नाजरेथ के परिवार को प्रेम और पवित्र परिवार बनाया।
दूसरी ओर, येसु के जन्म के समय दुनिया ने उन्हें शरण नहीं दी और उनका साथ नहीं निभाया। दुनिया ने येसु को उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक दु:ख, गम, अन्याय, तिरस्कार और धोखा दिया, लेकिन बदले में उन्होंने दुनिया को न्याय, प्रेम, क्षमा, विश्वास और शांति की शिक्षा दी। उन्होंने हमेशा दबे कुचले, शोषित, असहाय, जरुरतमंदों का सहारा दिया, हर कदम में उनका साथ दिया।
इसलिए येसु इम्मानुएल कहलाये जिसका अर्थ है प्रभु हमारे साथ है। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक अपने जीवन से प्रेम, साहस और आशा का एक अमिट संदेश दिया। यह पर्व हमें एक गहरा निमंत्रण देता है कि हम हर लाचार, बेबस, हताश और निराश दिलों के लिए आशा की किरण बनें। एक-दूसरे के जीवन में उम्मीदों का दीप जलायें, ताकि हर कदम में एक नयी रोशनी और विश्वास का अहसास हो। (लेखक रांची महाधर्मप्रांत हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। क्रिसमस का समय हम ख्रीस्त विश्वासियों के लिए एक अद्भुत और उल्लासपूर्ण पर्व होता है। यह वह अनमोल क्षण है, जब हम प्रभु येसु के जन्म की खुशी में डूबकर इस पर्व को श्रद्धा, आस्था और हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। परंतु, क्या आप जानते हैं कि क्रिसमस का असली अर्थ क्या है? यह सिर्फ क्रिसमस ट्री, सांताक्लाज या रंग-बिरंगे केक का पर्व नहीं है। इन प्रतीकों के माध्यम से हम उत्सव का आनंद तो लेते हैं, लेकिन क्रिसमस का सच्चा संदेश कहीं अधिक गहरा और अर्थपूर्ण है।
क्रिसमस वह दिन है जब प्रभु येसु ने स्वर्ग से पृथ्वी पर आकर मानवता का उद्धार किया, पाप से मुक्ति प्रदान की और हमें प्रेम, शांति और मुक्ति का अद्वितीय संदेश दिया। यही असली क्रिसमस है : एक दिव्य प्रेम, शांति और समर्पण की कहानी, जो आज भी हमारे दिलों को सुकून और उत्साह देती है। इस दिन का महत्व सिर्फ उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें अपने आस्थाओं, आदर्शों और दृष्टिकोणों को नई दिशा देने के लिए प्रेरित करता है।
जैसे परम पिता परमेश्वर ने अपने इकलौते पुत्र को हमारी मुक्ति के लिए हमारे बीच भेजा, वैसे ही हमें भी समाज में उपस्थित असहाय, गरीब और जरूरतमंदों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। क्रिसमस हमें यह सिखाता है कि खुशियां तब ही सच्ची होती हैं, जब हम इन्हें एक-दूसरे के साथ बांटते हैं, जैसे प्रभु ने हमें अपना सब कुछ दे दिया।
क्रिसमस के समय में, सड़कों, दुकानों, पेट्रोल पंपों, रेलवे स्टेशनों और हर जगह सजावट की एक विशेष छटा देखने को मिलती है। हर कोने में क्रिसमस के गीत गूंजते हैं और पूरा वातावरण प्रभु के जन्म का उत्सव मनाता है। ये सारी सजावट और खुशी हमें यह याद दिलाती हैं कि यह पर्व सिर्फ बाहरी उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारी आत्मा को उज्जवल बनाने और एक दूसरे के प्रति प्रेम और दया का संदेश देने का पर्व है।
हम ख्रीस्त विश्वासियों के लिए क्रिसमस सिर्फ आनंद और उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा और मदद का प्रतीक है। यह हमें मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने और सभी के लिए प्रेम और शांति का मार्ग दिखाने के लिए प्रेरित करता है। क्रिसमस के इस शुभ अवसर पर, आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं और बधाईयां...। (लेखिका प्रभात तारा स्कूल, धुर्वा की सहायक शिक्षिका हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजकल 2-3 दिनों से एक व्यक्ति की आत्महत्या की खबर को खूब तवज्जो दिया जा रहा है। उसकी आपबीती सोशल मीडिया पर बवाल मचा दिया है। ऐसा लग रहा है कि दिल्ली की निर्भया या कोलकोत्ता के आरजी कर अस्पताल की निर्भया-2 के बाद देश में ये पहला निर्भय कांड है। दहेज से संबंधित क़ानून पर सवाल उठने लगे। यहां तक की इसकी शोर सर्वोच्च न्यायालय तक सुनी गयी। उम्मीद है इस व्यक्ति को न्याय मिले।
आज के आधुनिक दुनिया में जहां भारत की पहुंच मंगल/चंद्रमा तक पहुंच गया है उसके समाज में अगर अपनी नज़र सही से दौड़ाया जाय तो कई निर्भया मिल जायेगी और शायद निर्भय जैसे एक भी नहीं। इसलिये इक्के दुक्के घटनाओं से पूरे महिला समाज पर उंगली उठाने से पहले नज़र तीन सौ साठ अंश घुमा कर देख लेना चाहिए।
कोई भी क़ानून परफ़ेक्ट नहीं होता पर जैसे-जैसे समाज विकसित होता है वैसे-वैसे क़ानून और नज़रिये में बदलाव आते रहते है। और होना भी चाहिए। पितृप्रधान समाज में एक भी चूक होने से सुभाष जैसे मामलों को बेधड़क तूल दी जाती है। देश, राज्य, शहर, जिला, गांव के हर कोने-कोने से कोई न कोई महिला के साथ ऐसा वर्ताव हो रहा है।
पर क्या सभी की खबर हम सब तक पहुंच पाती है। ये सोचने वाली बात है। दहेज/घरेलू हिंसा/बलात्कार के सभी कांड मीडिया में छपने लगे तो शायद अख़बार के लिये 50 पन्ने भी कम पड़ जाये और सोशल मीडिया में और कोई खबर ही न दिखे। इन सब के अलावा झारखंड जैसे राज्य में डायन कुप्रथा भी प्रचलित है जिसकी दास्तां अगर सोशल मिडिया पर इतनी सिद्दत से बयां की जाये तो रोंगटे खड़े हो जायेंगे। इसलिये कहते है कि कुछ की छप जाती ह तो कुछ की छूप जाती हैँ।
इसलिये जब महिला सुरक्षा से संबंधित क़ानून की ख़ामियो पर प्रश्न उठे तो ये भी देखना चाहिये कि क़ानून को और कैसे मज़बूत किया जाये ताकि पीड़ित माहिला को समय पर न्याय मिले। अभी भी बलात्कार से जुड़े अपराध में सजा ( कनविक्शन) दर तीन प्रतिशत है। उसी प्रकार दहेज के मामलों में ये दर लगभग पंद्रह प्रतिशत से भी कम है। घरेलू हिंसा और अन्य क़ानून को अगर जोड़ के देखा जाये तो भी सजा का दर बहुत कम है।
इसके लिये कई कारण हो सकते है। पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज में अभी भी इन सब क़ानून को लेकर भय नहीं है। समाज में चलता है कल्चर के कारण समाज में अभी भी इसको लेकर एकजुटता नहीं है, एक घटना से अगर महिला संबंधित क़ानून के दुरूपयोग पर सवाल उठ जाते है तो ये भी मंथन करना चाहिये की दहेज/बलात्कार/घरेलू हिंसा और अन्य महिला सुरक्षा के लिये बने क़ानून में सजा दर इतनी कम क्यों है।
क्यों लोग बरी हो जाते है। क़ानून के ख़ामियो को कैसे दूर किया जाय। पीड़ित को मूवावजा के नाम पर चंद पैसे न देकर शीघ्र न्याय कैसे दी जाय। आरोपी के ज़मानत को पीएमएलए के दर्ज पर क्यों न लाया जाय।पुलिस जाँच को न्यूनतम समय में और सटीक कैसे किया जाय। फ़ॉरेन्सिक व्यवस्था को और सुदृढ़ कैसे बनाया जाय। प्रत्येक जिला में महिला संबंधित अपराध के लिये विशेष न्यायालय जिसमें महिला जज हो, क्यों न बनाया जाय।
उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में महिला जज की संख्या क्यों न बढ़ाया जाय। जबतक ऐसे कई सवालों के जवाब नहीं मिलते हैं, तबतक महिला संबंधित अपराध के रोकथाम वाले क़ानून के दुरुपयोग पर प्रश्नचिन्ह लगते रहेंगे और ये क़तई लाज़मी नहीं है। भारत देश भले ही लोकतांत्रिक हो गया है। भले ही महिलाओं को पहले दिन से मतदान का समान अधिकार मिला। पर समाज और परिवार अभी भी लोकतांत्रिक प्रयास से दूर है। घर-समाज का समानता की परछाई से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है।
शिक्षा से लेकर पारिवारिक निर्णय लेने में सहभागिता से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता में महिला-समाज को अभी काफ़ी लंबा सफ़र करना है और जबतक ये सफ़र जारी है और देश की आधी आबादी के सुरक्षा और विकास का मुद्दा ज्वलंत है इस तरह के खबर से किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगी।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। टीवी चैनल पर महाराष्ट्र की एक महिला ने कहा कि सरकार की योजना से उसे जो पैसे मिले, उससे वह पहली बार साड़ी खरीद सकी। यह कितने अफसोस की बात है कि जब शादियों में दिखावे के रूप में पांच हजार करोड़ तक खर्च किये जा रहे हों, तब उसी प्रदेश में एक स्त्री इस बात के लिए धन्यवाद दे कि वह जीवन में पहली बार साड़ी खरीद सकी। जब पिछले दिनों मध्य प्रदेश के चुनाव में वहां के भूतपूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारी बहुमत प्राप्त किया था, तो उन्होंने कहा था कि लाड़ली बहनों ने उन्हें जीत दिलायी है। सारा श्रेय उन्हीं को दिया जाना चाहिए।
कल किसी ने जब कहा कि भारतीय जनता पार्टी रेवड़ियों का विरोध करती है और उसने महिलाओं को खूब रेवड़ियां बांटी तो एक अन्य दल की महिला नेत्री ने कहा कि इसे रेवड़ी नहीं, वुमेन एम्पावरमेंट कहते हैं। महाराष्ट्र कोई गरीब राज्य नहीं कि सरकार जरूरतमंद स्त्रियों की मदद नहीं कर सकती। स्त्री सशक्तीकरण में स्त्रियों के हाथ में पैसे हों, उनकी क्रय शक्ति बढ़े, वे अपनी जरूरतें पूरी कर सकें, इसकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। इसके अलावा स्त्री विमर्श कहता है कि स्त्रियों के नाम अक्सर चल-अचल सम्पत्ति नहीं होती।
इसलिए वे हमेशा अपने परिवार के पुरुषों के भरोसे रहती हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार ने स्त्रियों के नाम से ही पक्के घर दिए हैं। उन्हीं के नाम अगर जमीन की रजिस्ट्री हो तो स्टाम्प ड्यूटी में दो प्रतिशत की छूट मिलती है। इससे पहली बार भारत में स्त्रियों के अपने घर हो सके हैं। अक्सर स्त्रियों को हिंसा झेलते हुए, सबसे पहले घर से निकाला जाता है। अब जब घर उनके ही नाम पर है, जमीन उनकी है, तो किसकी हिम्मत है कि उन्हें घर से निकाल सके।
महाराष्ट्र में इस बार पंद्रह चुनाव क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से भी अधिक वोट दिए। 65.22 प्रतिशत महिलाओं ने वोट दिया। कुछ स्थानों पर रजिस्टर्ड महिला मतदाताओं की संख्या भी पुरुषों से ज्यादा थी। कुल 30.64 मिलियन वोटर्स में कुल महिला वोटर्स की संख्या 46.99 है। महिला मतदाताओं के बड़ी संख्या में बाहर आने के बारे में बताया जा रहा है कि इसका बड़ा कारण लाड़की (लड़की) बहणी योजना को है। जिसमें महिलाओं को पंद्रह सौ रुपये प्रतिमाह दिए गए और सरकार बनने पर इक्कीस सौ रुपये देने का वादा किया गया।
चुनाव में जीत के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शिंदे ने भी लाड़ली बहनों का धन्यवाद किया। महाराष्ट्र में स्त्रियों की शिक्षा के लिए आर्थिक मदद का भी प्रावधान किया गया था। इसी तरह झारखंड में भी हेमंत सोरेन सरकार की वापसी का श्रेय, उनकी स्त्री संबंधी योजनाओं को दिया जा रहा है। जिसमें प्रमुख थीं—स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल मुफ्त देना, एकल मां को आर्थिक सहायता प्रदान करना, बेरोजगार स्त्रियों को मासिक भत्ता, मइया योजना के अंतर्गत गरीब स्त्रियों को साल में बारह हजार रुपये की मदद।
इससे गरीब परिवारों और स्त्रियों के जीवन में कुछ खुशहाली आई। आदिवासी इलाकों में इसे विशेष रूप से महसूस किया गया। चूंकि स्त्रियों के खाते में पैसे सीधे भेजे जाते हैं, इसलिए उसका लाभ भी सीधे उन्हें ही मिलता है। इससे उनका परिवार भी लाभान्वित होता है। ऐसी योजनाएं अकेली बेसहारा माताओं, विधवाओं, स्कूल जाती लड़कियों को विशेष लाभ पहुंचाती हैं। याद होगा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने यहां की स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिलें दी थीं। सिर्फ एक साइकिल की सहायता से स्कूल जाने वाली लड़कियों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
चूंकि वे समूह में स्कूल जाती थीं, इसलिए उनकी सुरक्षा को लेकर भी माता-पिता की चिंता में कमी आई थी और स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई थी। उनका ड्रॉप आउट रेट भी कम हुआ था। और परिणामस्वरूप इन लड़कियों के माता-पिता ने अगली बार नीतीश कुमार को बहुमत से विजयी बनाया था। झारखंड में हेमंत सोरेन ने नीतीश कुमार से सीखा और महाराष्ट्र में शिवराज सिंह चौहान से सीखा गया। हेमंत की जीत में उनकी पत्नी कल्पना सोरेन की भी बड़ी भूमिका है। हेमंत सोरेन को जब जेल भेजा गया, तो उनकी पत्नी कल्पना ने मोर्चा संभाला। उन्हें स्त्रियों की खूब सहानुभूति भी मिली।
इसके अलावा केंद्र सरकार ने भी स्त्रियों के लिए कई योजनाएं चला रखी हैं। जैसे कि नमो ड्रोन दीदी स्कीम-इसमें ग्रामीण महिलाओं को कृषि कार्यों के लिए ड्रोन पायलट्स की ट्रेनिंग दी जाती है। जिससे कि वे आधुनिक तकनीकों से खेती कर सकें। इसके लिए उन्हें आर्थिक मदद भी दी जाती है। उड़ीसा में चलायी जा रही सुभद्रा योजना। जिसके अंतर्गत पांच सालों में गरीब महिलाओं को पचास हजार रुपये रक्षाबंधन और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर दिये जाते हैं। महिला सम्मान पेंशन योजना- जिसमें विधवाओं और बूढ़ी महिलाओं को मदद दी जाती है। जिससे कि वे सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें।
अल्पसंख्यक महिलाओं को बिना किसी ब्याज के पचास हजार रुपये की मदद दी जाती है। इसमें से बस पच्चीस हजार रुपये उन्हें वापस देने पड़ते हैं। इसका लाभ तलाकशुदा और अठारह साल से पचपन साल की अविवाहित महिलाएं उठा सकती हैं। इसी प्रकार दिल्ली, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक में भी महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाली बहुत-सी योजनाएं हैं। देखने की बात यह है कि औरतों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं, नेताओं को विधानसभाओं और लोकसभा में पहुंचा रही हैं। यह स्त्रियों की ताकत है, जिसे वे वोट के जरिए दिखा रही हैं। वे जानती हैं कि उनके जीवन के लिए ऐसी योजनाएं कितनी जरूरी हैं। लोकतंत्र में महिलाएं गेम चेंजर की भूमिका निभा रही हैं।
इस हिसाब से अगर अमेरिका के चुनाव पर नजर डालें तो वहां बड़ी संख्या में महिलाएं ट्रंप के खिलाफ थीं क्योंकि ट्रंप को गर्भपात का विरोधी माना जाता है। मगर वे चाहकर भी ट्रंप को हरा नहीं सकीं। अपने यहां महिलाएं आगे बढ़कर वोट दे रही हैं। यही नहीं, ऐसी खबरें भी आती रहती हैं कि वे अपने घर के आदमियों की बात भी नहीं मानतीं। वे वहां वोट देती हैं जो उनके जीवन में परिवर्तन ला सके। इनमें ग्रामीण महिलाएं बड़ी संख्या में होती हैं। अब वह समय चला गया है जब चुनाव विश्लेषक कहते थे कि औरतें वोट देने ही नहीं आतीं।
इसमें सरकारों द्वारा चलाये गये उन अभियानों का भी हाथ है जो स्त्रियों से कहते थे चूल्ह-चौका बाद में पहले वोट। क्योंकि एक बार महिला घर के काम में लग जाती हैं तो गये रात तक उन्हें दम मारने की फुर्सत नहीं होती। इसलिए पहले वोट फिर कुछ और। पिछले कुछ दशकों से भारत में राजनीतिक दलों ने महिलाओं की इस ताकत को पहचाना है। इसलिए वे अपने-अपने मेनिफेस्टो में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर विशेष ध्यान देते हैं। तरह-तरह के वादे करते हैं। और सिर्फ वादे ही नहीं जीतने के बाद उन्हें कुछ हद तक पूरे भी करते हैं। (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
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