विचार

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Published / 2025-05-10 19:38:23
प्राचीन और अवार्चीनकाल में भी युद्ध के क्षेत्र में योग के कौशल को परखा जा चुका है

स्वामी मुक्तरथ 

एबीनएन एडिटोरियल डेस्क। शनिवार को डीएवी पब्लिक स्कूल बरियातू में स्वामी मुक्तरथ के सान्निध्य में 11वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पूर्वाभ्यास कार्यक्रम चलाया गया। इसमें हजारों बच्चों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए सत्यानंद योग मिशन रांची के अध्यक्ष स्वामी मुक्तरथ ने कहा कि योग बहुत शक्तिशाली विद्या है। यह तंत्र से निकली हुई एक शाखा है जिसके प्रथम गुरु भगवान शिव हैं। 

वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ योग को सिद्ध करने वाले वर्तमान युग के प्रथम गुरु बिहार योग विद्यालय मुंगेर के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती हुए जिन्होंने संपूर्ण विश्व में योग को स्थापित किये। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस इन्हीं योगियों के प्रयास का फल है। 

योग के प्रभाव को प्राचीनकाल से हमलोग देख रहे हैं, जब भारत के सात ऋषियों के नाम पर आकाश के सात तारों का नाम पड़ा था, जिसे हम सप्तऋषि के नाम से जानते हैं। गौरव की बात यह है कि वर्तमान समय में भी नाशा ने शिवानंद गुरु-शिष्य परंपरा के तीन योगियों के नाम से आकाश के तीन तारों का नामकरण कर दिया है जो हैं स्वामी शिवानंद, स्वामी सत्यानंद और स्वामी निरंजनानंद। 

महाभारत के युद्व में जब अर्जुन विषाद में पड़ा था तो भगवान कृष्ण ने इसी योग की शिक्षा को देकर उन्हें अवसाद से मुक्ति दिये थे और युद्ध कौशल में रणविजय बनाये थे और इस काल में जब डॉ एपीजे अब्दुल कलाम डिप्रेशन में फंसे तो शिवानंद का योग उन्हें महान वैज्ञानिक बना दिया। युद्धक्षेत्र में योग के प्रभाव को कारगिल युद्ध में देखा जा चुका है। 

दानापुर मिलिट्री छावनी में बिहार योग विद्यालय के संन्यासियों के द्वारा सैनिकों का दो दल बनाकर एक को योग और दूसरे को व्यायाम कराया जाता था। संयोग से कारगिल वॉर में योग करने वाले दल को वहां भेजा गया जो बेहद ही कारगर सिद्ध हुआ। इन सैनिकों का हृदय गति, श्वांस की क्षमता बहुत अच्छी थी, इनकी मारक क्षमता यानी निशाना बहुत अच्छा था और स्टेमिना भी ज्यादा देर तक बनी रहती थी।  

आज तो योग की उपयोगिता और भी बढ़ गयी है क्योंकि अब न तो बच्चे साइकिल चलाते हैं न ही फुटबॉल खेलते हैं और न ही संतुलित भोजन करते हैं। यानि अब लगभग लोगों का शारीरिक श्रम नही होता है। शारिरिक श्रम नहीं होने से न तो लोग थकते हैं और न ही उन्हें अच्छी नींद आती है। जीवनशैली बिल्कुल खराब होते जा रही है, मोबाईल की आदत आंखों को दिमाग को और नींद को बर्बाद कर रही है। ऐसे में कुछ शारिरिक व्यायाम और प्राणायाम, मेडिटेशन, जल नेति तथा ध्यान करने की आवश्यकता है। 

डीएवी बरियातू के प्राचार्य एस के मिश्रा जी स्वामी मुक्तरथ जी को पुष्पगुछ और शॉल से स्वागत किये। श्री मिश्रा ने कहा कि शारिरिक शौष्ठव और मोरल को डेवलप किये बगैर अच्छा इंसान बनना कठिन है। बच्चों को नियमित रूप से योग करना चाहिए। हर गार्जियन का यह कर्तव्य बनता है कि बच्चों को प्रात:काल में योगाभ्यास करने की प्रेरणा को जागृत करें, उन्हें योग करने की सुविधा दें तभी आप के बच्चे में संस्कार का संवर्धन होगा और आज्ञाकारी भी बनेंगे। आप के सुख-दु:ख में खड़े उतरेंगे। श्री रोहित कुमार और केशव कुमार ने योगाभ्यास की प्रायोगिक शिक्षा का संचालन किया।

Published / 2025-05-03 21:31:58
दिमाग को उत्तेजित करने वाले हार्मोन एकाग्रता में बड़ा बाधक है इसे योग से संतुलित करने की विधि भारत के मनीषियों के पास : स्वामी मुक्तरथ

  • हार्मोन के असंतुलन से युवाओं में दिमाग की कमजोरी, अपराध वृत्ति और सामाजिक सोच की कमी बढ़ रही है। कारण है मेडिटेशन का अभाव : स्वामी मुक्तरथ 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हम ग्यारहवें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को मनाने जा रहे हैं और इस वर्ष 2025 का थीम है- मानवता। आज की सबसे बड़ी समस्या बीमारी नहीं है बल्कि सबसे बड़ी समस्या है नैतिकता का तीब्र ह्रास जिस वजह से मानवता खतरे में है। संवेदना हमारी मर रही है दिल के भीतर की भवनायें कमजोर पड़ रही है, विश्वास जो हुआ करता था वो अब मर रही है, समाज के किसी भी व्यक्ति का धौंस किसी के भी बच्चों पर रहता था, किसी भी बच्चे को समाज के अन्य व्यक्ति से अभिभावक जैसा डर रहता था, वो सब इस वर्तमान परिदृश्य से गायब हो गया। 

कारण है हमारे अंदर की मानवता सशंकित है,कमजोर हो गयी है, लोभ, नकारात्मक प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। आज मानसिक रोग के बढ़ने का भी यही कारण है। इस वर्ष के अंतर्राष्टीय योग दिवस का पूर्वाभ्यास योग कार्यक्रम रांची शहर में सत्यानन्द योग मिशन के तहत कई स्थानों में चल रहा है। आज 03 मई, शनिवार को डीएवी कपिलदेव के हजारों विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के बीच स्वामी मुक्तरथ जी अपना व्याख्यान एवं योग-ध्यान कार्यक्रम को संचालित कर रहे थे। 

मुक्तरथ जी ने कहा बिगड़ता जीवनशैली और संकीर्ण विचारधारा, सीमित सोच से दिमाग में पिट्यूटरी ग्लैण्ड पर बुरा असर होता है, उससे हार्मोन असंतुलित होने लगते हैं, एड्रिनल ग्लैण्ड का हार्मोन असंतुलित होने लगता है जिस कारण अपराध प्रवृत्ति बढ़ती है, नकारात्मकता में वृद्धि होती है और भय बढ़ता है। योग में थोड़ा आसन,कुछ प्राणायाम और दस मिनट ध्यान का ध्यान प्रतिदिन अवश्य करना चाहिये तभी हम मानवता को जिंदा रख पायेंगे। 

डीएवी कपिलदेव के प्राचार्य श्री एम के सिन्हा जी पहले स्वामी मुक्तरथ जी के साथ वैदिक हवन किये फिर योगाभ्यास को प्रारंभ किया गया। श्री सिन्हा ने कहा कि योग सबसे बड़ी शक्ति है जो विद्यार्थियों को शरीर से सबल और मन से मजबूत बनाता है। ध्यान से सारी समस्याएं समाप्त हो जाती है और विद्यार्थी को सही दिशा भी मिलता है। (लेखक सत्यानंद योग मिशन रांची के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2025-04-30 20:29:02
पोप फ्रांसिस का मानवता और दुनिया के प्रति महान योगदान

फादर सुशील टोप्पो 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पोप फ्रांसिस ने अपने पोप बनने के बाद मानवता और दुनिया के लिए कई महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं। उनके कार्य और विचार न केवल कैथोलिक चर्च के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणास्त्रोत बने हैं। यहां कुछ उनके महान योगदान दिए जा रहे हैं: 

पर्यावरण संरक्षण 

पोप फ्रांसिस ने 2015 में अपनी ऐतिहासिक एनसाइक्लिकल लौदातो सी जारी की, जिसमें उन्होंने जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने दुनिया भर के नेताओं और लोगों से अपील की कि वे पृथ्वी के संसाधनों का संरक्षण करें और अपनी गतिविधियों को प्रकृति के साथ संतुलित रखें। 

गरीबों और कमजोर वर्गों की मदद 

पोप फ्रांसिस ने हमेशा गरीबों, प्रवासियों, बुजुर्गों, बीमारों और असहाय लोगों की मदद करने की अपील की है। वे सभी के लिए समान अधिकार की बात करते हैं और समाज में असमानता के खिलाफ खुलकर बोलते हैं। उनका मानना है कि यदि हम ईश्वर के सच्चे अनुयायी हैं, तो हमें दुनिया के सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के लिए काम करना चाहिए। 

धार्मिक एकता और संवाद 

पोप फ्रांसिस ने कैथोलिक और गैर-कैथोलिक समुदायों के बीच धार्मिक एकता और संवाद को बढ़ावा दिया। उन्होंने इस्लाम, यहूदी, हिंदू और अन्य धर्मों के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकातें की और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया। उनका मानना है कि धार्मिक विविधता को समझना और सम्मान करना दुनिया के लिए शांति का रास्ता है। 

कलीसिया में सुधार 

पोप फ्रांसिस ने कैथोलिक चर्च में कई महत्वपूर्ण सुधार किए। उन्होंने चर्च के आंतरिक मामलों में पारदर्शिता बढ़ाई और कलीसिया के भीतर यौन शोषण के मामलों के खिलाफ सख्त कदम उठाए। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि चर्च का नेतृत्व और प्रबंधन सभी के लिए सुलभ हो, और विनम्रता और नम्रता का पालन किया जाए। 

विश्व शांति के लिए प्रयास 

पोप फ्रांसिस ने हमेशा दुनिया में शांति और सभी के बीच संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने युद्धों, संघर्षों और हिंसा के खिलाफ बात की है और शांति स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत की है। उन्होंने दुनिया के नेताओं से अपील की है कि वे शांति की ओर कदम बढ़ाएं और संघर्षों को समाप्त करने के लिए मिलकर काम करें। 

युवाओं के लिए प्रेरणा 

पोप फ्रांसिस युवाओं को अपने उद्देश्य के लिए समर्पित होने और समाज में बदलाव लाने के लिए प्रेरित करते हैं। वे हमेशा कहते हैं कि अपने सपनों को न खोएं और महान कार्य करने से डरें नहीं। उनका मानना है कि युवा पीढ़ी ही समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। महिलाओं की भूमिका को सशक्त 

बनाना 

पोप फ्रांसिस ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी भूमिका को बढ़ावा दिया। उन्होंने चर्च में महिलाओं की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया और उनकी आवाज को महत्वपूर्ण माना। उनका मानना है कि महिलाओं का योगदान समाज के हर क्षेत्र में होना चाहिए। 

विश्वभर में मानवाधिकारों का समर्थन 

पोप फ्रांसिस ने मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए कई बार आवाज उठाई है। उन्होंने मूलभूत अधिकारों, जैसे स्वतंत्रता, समानता और न्याय के लिए लड़ाई लड़ी है। उन्होंने शरणार्थियों, प्रवासियों और कमजोर वर्गों के अधिकारों के लिए भी कई बार संघर्ष किया है। 

पोप फ्रांसिस ने मानवता के कल्याण और दुनिया में शांति, समानता, और न्याय की स्थापना के लिए कई कदम उठाए हैं। उनका विनम्रता, सहिष्णुता, और दया का संदेश न केवल कैथोलिक चर्च तक सीमित है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणा है। उनकी कोशिशें मानवता को एक साथ लाने और दुनिया को एक बेहतर स्थान बनाने की दिशा में निरंतर जारी हैं। (लेखक रांची महाधर्मप्रांत हैं और ये उनके निजी विचार हैं।) 

Published / 2025-04-19 23:01:53
ख्रीस्तियों का पवित्र पर्व है पास्का

सुश्री अनिमा टोप्पो 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। ख्रीस्तियों के लिए पास्का का पर्व एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं पवित्र पर्व है। जो प्रभु येशु के पुनरुत्थान का उत्सव मनाता है। यह दिव्या उत्सव हमें प्रेम, आशा, बलिदान और नवजीवन का संदेश देता है। 

क्रूस पर उनके बलिदान और तीसरे दिन उनका पुनर्जीवित होना, समस्त मानव के लिए उद्वार का प्रतीक है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अंधकार के बाद प्रकाश आवश्यक आता है और प्रत्येक संघर्ष के बाद एक नई शुरुआत होती है। 

पास्का का यह पावन पर्व हम विश्वासियों के जीवन में प्रेम, विश्वास आशा का प्रकाश लाये। जिससे कि सभी खीस्त भाई -बहन अपने जीवन की कठिनाइयों पर विश्वास और प्रेम से विजय पा सके। प्रभु का पुनरुत्थान सभी खीस्त विश्वासियों में नया उत्साह, शांति, आद्यात्मिक जागृति लाये। (लेखिका प्रभात तारा स्कूल, धुर्वा, रांची की शिक्षिका हैं।)

Published / 2025-04-17 21:26:10
स्वामी अद्वैतानंद की तपस्थली रोहतास किला के समीप जोगिया मान गुफा का विकास हो : स्वामी जी

मुरलीधर 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत धम की भूमि है और यही धर्म और भक्ति देश की श्रेष्ठ सांस्कृतिक परम्परा है। आधुनिक काल में जिस प्रकार गुरु भक्ति की परंपरा आज भी देश में जीवित है उससे हमारी पांच हजार साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति की महानता प्रगट होती है। दुनिया के अनेक सभ्यता रोम, यूनान आदि नष्ट हो गयी लेकिन भारत भूमि संत मनीषियों के तप और मार्गदर्शन के कारण आज भी विश्व में श्रेष्ठ है। ऐसे ही एक श्रेष्ठ परम्परा के वाहक स्वामी अद्धैतानंदजी महाराज ने जो भक्ति का संदेश और परम्परा कायम किया वह आज भी श्रेष्ठ है।  

ज्ञान की श्रेष्ठ परम्परा को स्वामी जी ने अपनी जिंदगी में उतारकर प्रकट किया। स्वामी सत्यानंदजी परमहंस ने बताया कि ब्रम्ह विद्यालय आश्रम की लीलारी कुटी जो रोहतास जिले में है, वहां से यह गुफा 60 किलोमीटरकी कदूरी पर है। यहां जाने के लिये कोई नियमित बस या कोई दूसरी सुविधा नहीं है।  

इस संबंध में लेखक सह वरीय अधिवक्ता अवध बिहारी मितवा ने विशेष भेंट में बताया कि  रामनवमी के शुभ अवसर पर रोहतास गढ़ी पहाड़ी जंगल में स्थित जोगिया मान गुफा पवित्र स्थली पर भक्तों ने परमहंस दयाल स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज की जयंती धूमधाम से मनाई और पाठ आरती पूजन अर्चन किया। यों तो परमहंस दयाल जी की जयंती रामनवमी को देश विदेश में मनाई ही जाती है किंतु इस पवित्र गुफा पर यह प्रथम उत्सव है, जो सौभाग्यदाई और ऐतिहासिक है। 

दुर्गम मार्ग और जटिल लोकेशन वाला यह कार्यक्रम राजपुर के स्वामी जी महाराज की आज्ञा व कृपा से ही संभव हुआ है। इस प्रोग्राम में अवधविहारी मितवा, सुनील कु. सिंह, मनोज वर्मा ,गप्पू स्वर्णकार, मोहन प्रसाद, शुभम सिंह निवासी बलिया, उ.प्र. तथा ओमप्रकाश, मनोज कुमार निवासी लिलारी रोहतास बिहार एवं पृथवी उराव आदि स्थानीय भक्तगण शामिल हुए। 

वहां जाने के लिये एक रास्ता अकबरपुर से जाता है। यह स्थल स्वामी परमहंस दयाल जी महाराज के जीवन में महत्वपूर्ण स्थलों में एक है। इस स्थान पर अभी गुफा के पास रहने वाले लोग पूजा पाठ करते हैं। इसके विकास के लिए ब्रह्म विद्यालय आश्रम सजग और सक्रिय है। आज जिस प्रकार देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों का विकास हो रहा है उसमें जोगिया मान गुफा का विकास भी देश के अध्यात्मिक उन्नति के लिये अनिवार्य है।  

लेखक सह वकील अवध बिहारी मितवा ने बताया कि स्वामी सत्यानंदजी परमहंस की आज्ञा से रामनवमी के दिन मैं और मेरे कई मित्र इस गुफा में पहुंचे। रामनवमी के पुनीत अवसर पर जिस दिन स्वामी अद्वैतानंदजी महाराज का जन्म छपरा में हुआ था उसी दिन हम सब उनके तपोस्थली रोहतास के पहाड़ों के बीच स्थित तपोभूमि में पहुंचे। वहां हमने स्वामी जी के आदेश पर अदैतानंदजी महाराज की आरती की और उपस्थित लोगों के बीच प्रसाद का वितरण किया। 

श्री मितवा ने बताया कि जब वे गुफा में पहुंचे तो रोमांच से भर उठे। उन्हें अलौकिक अनुभव हुआ। श्री मितवा ब्रम्ह विदयालय आश्रम में स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज जिन्हें परमहंस दयाल के नाम से भी जाना जाता है उनके जीवन पर आधारित नाट्य के मंचन का अवसर भी मिलता है। वे परमहंस दयाल जी के जीवन पर अध्ययन भी करते हैं और उनकी तपोस्थली पर पहुंचने का अध्यात्मिक गौरव भी स्वामी जी के आर्शिवाद से प्राप्त हुआ। वे आने वाले समय में भी आश्रम के आदेश के अनुसार उस गुफा के विकास के लिए जो जबावदेही दी जायेगी वैसा काम करेंगे। 

निश्चित ही महान संत अदैतानंदजी महाराज के जीवन और उनसे जुड़े स्थानों में छपरा के साथ रोहतास का जोगिया मान गुफा का विकास भी उस परमपूज्य अनुकरणीय संत की प्रेरणा पाने का माध्यम बने यह भारतीय समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। गुरु से ज्ञान और ज्ञान से भक्ति की अकाट्य सिद्धांत और परम्परा के वाहक स्वामी परमहंस दयाल की भक्ति धारा को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान स्वामी सत्यांनदजी परमहंस विगत तीन दशकों से पूरे देश में एक दिन के भी विश्राम के बिना भक्तों को ज्ञान और भक्ति का संदेश दे रहे हैं।  

स्वामी जी अभी रांची के बसारगढ़ स्थित ब्रह्म विद्यालय आश्रम में सुबह दस से और शाम छह बजे से प्रतिदिन दो घंटै ज्ञान और भक्ति की गंगा अविरल प्रवाहित कर रहें हैं। 21 अपै्रल तक स्वामी जी रांची में प्रवास करेंगे। 22 को प्रात: गया के लिए प्रस्थान कर जायेंगे। आज भी सैकड़ों सन्यासी स्वामी के मार्गदर्शन में तत्वज्ञान की विशुद्ध शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

Published / 2025-04-13 21:15:25
खजूर रविवार : विनम्रता और आशा का प्रतीक

फा. सुशील टोप्पो 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। खजूर रविवार, जिसे पाम संडे भी कहा जाता है, ख्रीस्तीय समुदाय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन पवित्र सप्ताह—या जिसे पुण्य सप्ताह कहा जाता है—की शुरुआत होती है। यह ईस्टर या पास्का रविवार से ठीक पहले आता है। यह दिन उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति में मनाया जाता है जब प्रभु यीशु मसीह येरूशलम नगर में एक विनम्र राजा के रूप में प्रवेश करते हैं।

बाइबिल के अनुसार, जब यीशु येरूशलम पहुंचे, तो वहां के लोगों ने उनका स्वागत राजाओं की भांति किया—अपने वस्त्र बिछाकर और खजूर की डालियां लहराकर। यह दृश्य एक ओर उनके सम्मान और आदर का प्रतीक था, तो दूसरी ओर उनके विनम्र, शांतिपूर्ण स्वभाव का भी प्रतिबिंब था। 

इस दिन को दु:ख का रविवार भी कहा जाता है, क्योंकि यही वह समय है जब यीशु अपने दु:खभोग और मरण की ओर अग्रसर होते हैं। येसु के दुखभोग गाथा को सुनाया और मनन चिंतन किया जाता है। यह दिन उनके बलिदान के माध्यम से मानवता के उद्धार की शुरूआत भी दर्शाता है। 

चर्चों में इस दिन विशेष प्रार्थनाएं, मिस्सा, और खजूर की डालियों के साथ जुलूस का आयोजन होता है। चर्च के अंदर और बाहर खजूर की डालियों से सजावट की जाती है, और विश्वासी यीशु के आगमन की खुशी में गीत गाते हैं। इन डालियों का प्रयोग यीशु को एक युद्ध-वीर राजा नहीं, बल्कि शांति के दूत के रूप में स्वागत करने हेतु किया जाता है। 

यह दिन न केवल धार्मिक परंपरा का निर्वहन है, बल्कि आत्मचिंतन और आत्म-मंथन का भी अवसर है। ख्रीस्त अनुयायी इस दिन यीशु के त्याग, प्रेम, और उनके द्वारा दिए गए उद्धार के संदेश पर मनन करते हैं। 

अत:, खजूर रविवार का मूल संदेश है — विनम्रता, शांति और आशा। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सच्चा नेतृत्व सेवा और करुणा में निहित होता है, और सच्चा उद्धार बलिदान से प्राप्त होता है। खजूर रविवार न केवल एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति है, बल्कि यह हमारे जीवन में आध्यात्मिक नवीनीकरण का आह्वान भी है।  (लेखक रांची के महाधर्मप्रांत हैं।)

Published / 2025-04-11 19:41:01
खादी संवारे भविष्य : क्रिएट इन इंडिया चैलेंज से स्थायित्व को बढ़ावा

  • 750 से सर्वश्रेष्ठ तक : मेक द वर्ल्ड वियर खादी चैलेंज के लिए चयनित रचनात्मक हस्तियों से मुलाकात

धनलक्ष्मी पी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मेक द वर्ल्ड वियर खादी चैलेंज के प्रति लोगों की जबरदस्त रुचि दिखने के बाद इसके फाइनलिस्ट चुने गए हैं। इसमें दुनिया भर से 750 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए। विज्ञापन और रचनात्मक उद्योगों के एक प्रतिष्ठित निर्णायक मंडल ने मौलिकता, सांस्कृतिक प्रतिध्वनि और वैश्विक अपील के आधार पर प्रविष्टियों का मूल्यांकन किया।

चयनित उम्मीदवार: इमान सेनगुप्ता और सोहम घोष - हवास वर्ल्डवाइड इंडिया; 
कार्तिक शंकर और मधुमिता बसु - 22 फीट ट्राइबल; काजल तिरलोतकर - इंटरएक्टिव एवेन्यूज; तन्मय राउल और मंदार महादिक - डीडीबी मुद्रा समूह; आकाश मेजरी और काजोल जेसवानी - डीडीबी मुद्रा समूह
विजेताओं की घोषणा मई 2025 में विश्व ऑडियो विजुअल और मनोरंजन सम्मेलन (वेव्स) में की जाएगी।

हम एक ऐसे वस्त्र को पहनने के बारे में कल्पना करें, जो न केवल स्टाइलिश हो, बल्कि स्वतंत्रता, स्थायित्व और वैश्विक प्रभाव की गाथा को भी अभिव्यक्ति देता हो। वह खादी ही है - भारत का प्रतिष्ठित वस्त्र! अभी हम खादी के बारे में क्यों बात कर रहे हैं? क्या इसलिए कि गर्मी का मौसम है और खादी के अलावा और कौन-सा कपड़ा त्वचा और सेहत को आराम दे सकता है? बेशक, यह खादी ही है।

लेकिन इस संवाद को लाने का एक और महत्वपूर्ण कारण यह है कि उम्मीद है कि आपने मेक द वर्ल्ड वियर खादी चैलेंज के बारे में सुना होगा। यह चैलेंज 1 से 4 मई, 2025 तक मुंबई में होने वाले विश्व ऑडियो विजुअल और मनोरंजन सम्मेलन (वेव्स) के उद्घाटन के हिस्से के रूप में आयोजित किए जा रहे 32 क्रिएट इन इंडिया चैलेंजों में से एक होगा।

यह महज एक अभियान भर ही नहीं है। यह चैलेंज सिर्फ कार्रवाई के लिए आह्वान से कहीं अधिक है। यह एक ऐसी पहल है, जिसमें दुनिया भर के रचनात्मक व्यक्ति डिजिटल कला, सोशल मीडिया स्टोरीटेलिंग या विज्ञापन संबंधी अवधारणाओं के माध्यम से खादी को पारंपरिक वस्त्र से वैश्विक फैशन आइकन में बदलने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।

यह पहल दुनिया भर के रचनाकारों को किसी महान चीज पर अपनी रचनात्मक छाप छोड़ने में मदद करती है। क्रिएट इन इंडिया चैलेंज और विशेष रूप से मेक द वर्ल्ड वियर खादी सेगमेंट रचनात्मक पेशेवरों को दुनिया के खादी को देखने के तरीके को नया रूप देने का एक अविश्वसनीय अवसर प्रदान करता है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत को अत्याधुनिक रचनात्मकता के साथ मिलाकर, प्रतिभागी खादी को एक वैश्विक तौर पर फैशन की एक शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद कर सकते हैं, जो आधुनिक मूल्यों को दर्शाती है। भारत और दुनिया भर से मेक द वर्ल्ड वियर खादी चैलेंज के लिए पंजीकृत 750 से अधिक प्रतिभागियों के साथ, एक रचनात्मक प्रदर्शन के लिए मंच तैयार है, जो वैश्विक मंच पर भारत की अभिनव भावना को उजागर करता है।

प्रतिभागियों को एक प्रिंट क्रिएटिव, एक आउटडोर होर्डिंग और एक डिजिटल/सोशल मीडिया क्रिएटिव बनाने का काम सौंपा गया था। पंजीकरण 27 जनवरी को खुला, मार्च में शॉर्टलिस्टिंग हुई और कल शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की अंतिम सूची की घोषणा की गई। विज्ञापन और रचनात्मक उद्योगों के दिग्गजों से बनी एक प्रतिष्ठित जूरी ने मौलिकता, सांस्कृतिक प्रतिध्वनि, वैश्विक अपील और प्रतियोगिता के दृष्टिकोण के साथ तालमेल के आधार पर प्रस्तुतियों का मूल्यांकन किया। शॉर्टलिस्ट की गई प्रविष्टियां अपनी रणनीतिक अंतर्दृष्टि, शक्तिशाली कहानी कहने और खादी के इर्द-गिर्द वैश्विक बातचीत को बढ़ावा देने की क्षमता के लिए अलग से उभरीं।

कुल पांच उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया है: इमान सेनगुप्ता और सोहम घोष - हवास वर्ल्डवाइड इंडिया; कार्तिक शंकर और मधुमिता बसु - 22 फीट ट्राइबल; काजल तिरलोतकर - इंटरएक्टिव एवेन्यूज; तन्मय राउल और मंदार महादिक - डीडीबी मुद्रा समूह; आकाश मेजरी और काजोल जेसवानी - डीडीबी मुद्रा समूह। विजेताओं की घोषणा मई 2025 में वेव्स समिट में की जाएगी।

  • खादी: टिकाऊ फैशन का कूल फैक्टर
  • खादी सिर्फ पुराने जमाने की नहीं है; यह टिकाऊ फैशन का भविष्य है।

हाथ से बुनी हुई, पर्यावरण के अनुकूल और प्यार से बनाई गई खादी जेनरेशन जेड और मिलेनियल की हर पसंद का प्रतिनिधित्व करती है, जैसे प्रामाणिकता, स्थायित्व और नैतिक विकल्प। साथ ही, इसे कारीगरों द्वारा बनाया जाता है, जो पर्यावरण को अनुकूल रखते हुए स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाता है।

खादी सिर्फ एक फैशन ट्रेंड ही नहीं, बल्कि यह एक आंदोलन भी है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में निहित, खादी महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण का प्रतीक बन गई। आज, यह एक टिकाऊ, हस्तनिर्मित और पर्यावरण के अनुकूल कपड़ा है, जो खासकर ग्रामीण भारत में कारीगरों को सशक्त बनाता है, जबकि फास्ट फैशन के पर्यावरणीय नुकसान के खिलाफ लड़ाई में योगदान देता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद, क्योंकि उन्होंने कई साल पहले ऐसे उत्पादों के निर्माण हेतु शंखनाद किया था, जो जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट वाले हों। खादी अपनी पर्यावरण के अनुकूल प्रक्रियाओं और टिकाऊ उत्पादन के साथ पूरी तरह तालमेल रखती है, जो नैतिक फैशन की ओर वैश्विक बदलाव में अपनी भूमिका को मजबूत करती है। सरकार की मेक इन इंडिया पहल भी यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि खादी उत्पाद अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करते हैं।

बिल्कुल सही कहा गया है, हमें पृथ्वी अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं मिलती है, हम इसे अपने बच्चों से उधार लेते हैं। यह भावना खादी के लोकाचार के साथ पूरी तरह मेल खाती है, एक टिकाऊ, पर्यावरण के प्रति अनुकूल वस्त्र, जो हमारे अतीत से हमें जोड़ता है और साथ ही भविष्य की पीढ़ियों के लिए धरती की सुरक्षा करता है।

दुनिया सतत, पर्यावरण के प्रति जागरूक प्रणालियों को अपना रही है। इसके साथ ही, वैश्विक मंच पर खादी का स्थान पहले से कहीं ज़्यादा स्पष्ट होता जा रहा है। यह वस्त्र केवल अतीत का अवशेष नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए एक प्रकाश स्तंभ है। ग्रामीण कारीगरों की हस्तनिर्मित कलात्मकता से लेकर इसके कालातीत वस्त्र की वैश्विक अपील तक, खादी एक बार फिर आज की दुनिया में स्टाइलिश और टिकाऊ होने के अर्थ को फिर से निर्धारित करने के लिए तैयार है।

वीआईसी की भूमिका और सरकारी पहलखा

खादी के पुनरुत्थान के केंद्र में खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) की प्रतिबद्धता है। खादी के प्रचार के लिए नोडल एजेंसी के रूप में, केवीआईसी कौशल प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार तक पहुंच की सुविधा प्रदान करके स्थानीय कारीगरों के सशक्तिकरण का समर्थन करता है। सरकार समर्थित पहलों और कार्यक्रमों के माध्यम से, केवीआईसी ने सुनिश्चित किया है कि खादी न केवल अपनी समृद्ध परंपरा को बनाए रखे, बल्कि आज के वैश्विक फैशन बाजार की मांगों को पूरा करने के लिए विकसित हो।

वेव्स समिट सिर्फ एक और आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक रचनात्मक खेल का मैदान है। इसे मीडिया और मनोरंजन जगत का केंद्र समझें, जहां प्रसारण, गेमिंग, डिजिटल मीडिया और अन्य क्षेत्रों के उद्योग जगत के दिग्गजों के साथ कार्यशालाएं, प्रतियोगिताएं और नेटवर्किंग के अवसर उपलब्ध हैं। मेक द वर्ल्ड वियर खादी चैलेंज को दुनिया भर से नए, साहसिक विचारों को सामने लाने के लिए डिजाइन किया गया है, जो रचनात्मकता को प्रेरित करता है जो शायद दुनिया को खादी पहनने के लिए प्रेरित करे।

हम वेव्स 2025 के दौरान विजेताओं की घोषणा का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। यह चैलेंज खादी को एक आधुनिक, आकांक्षी और टिकाऊ ब्रांड के रूप में स्थापित करने के लिए नए और रचनात्मक तरीकों को सामने लाने का वादा करती है और आने वाले समय के लिए उत्साह बढ़ता जा रहा है। (लेखिका पीआईबी मुंबई में मीडिया और संचार अधिकारी हैं।)

Published / 2025-04-08 23:10:23
औरंगजेब ने दिया था हिंदू मंदिरों को गिराने का आदेश

रमेश शर्मा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लगभग सभी विदेशी आंक्राताओं ने भारतीय संस्कृति को नष्ट कर अपने रंग में रूपांतरित करने का अभियान छेड़ा है। सबका अपना-अपना तरीका रहा। अंग्रेजीकाल में भ्रम फैलाकर तो सल्तनतकाल में ताकत और तलवार के जोर पर। मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपनी सत्ता और शक्ति से पूरे भारत से सनातन धर्म को समाप्त करने का अभियान चलाया और भारत के सभी हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। यह आदेश 09 अप्रैल 1669 को निकाला गया था। 

भारत के इतिहास में औरंगजेब की गणना सबसे क्रूर शासकों में होती है। उसकी क्रूरता का अनुमान इसी से है कि उसने अपने पिता को कैद में डाला और भाइयों की हत्या करके गद्दी पर अधिकार किया था। वह केवल क्रूर ही नहीं था। उसकी क्रूरता यहीं तक नहीं रुकी थी। औरंगजेब का सबसे बड़ा भाई दारा शिकोह पिता के लिये अति प्रिय था। औरंगजेब ने दारा शिकोह का सिर काटकर पिता को तोहफे में भेजा था। उसने अपने एक बेटी को जेल में डाल दिया था और एक बेटे की मौत का फरमान जारी किया था।

औरंगजेब केवल क्रूर ही नहीं बहुत चालक और कूटनीतिक भी था। उसने अपनी क्रूरता और चालाकी को ढंकने के लिये कुछ धर्माचार्यों और लेखकों की एक टोली जमा कर रखी थी। भला कौन सा पंथ पिता को कैद में डालने और भाइयों की हत्या करने वाले को अच्छा कहेगा। लेकिन औरंगजेब की इस चाटुकार टोली ने उसके हर क्रूर कामों पर पर्दा डाला। दुनिया के सभी पंथ मानवता की बात करते हैं। अपनी विशेषताओं से समाज को प्रभावित करके अपनी राह में शामिल करते हैं। 

किन्तु औरंगजेब का अभियान इंसानियत पर नहीं, तलवार के जोर पर था।उसने पूरे भारत को रूपांतरित करने का अभियान चलाया। औरंगजेब ने न केवल मतान्तरण न करने वाले हिन्दुओं पर जजिया बढ़ाया और सख्ती से वसूली के आदेश दिये अपितु अपने साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले सभी 21 सूबों में मंदिरों को तोड़ने का आदेश भी जारी किया। हिन्दुओं को सार्वजनिक तौर पर सभी तीज त्यौहार मनाने पर रोक लगा दी। 

09 अप्रैल 1669 को जारी हुए इस आदेश का उल्लेख औरंगजेब की जीवनी पर आधारित पुस्तक आसिर-ए-आलमगीरी में है। इस पुस्तक के लेखक औरंगजेब के दरबारी साकी मुस्ताइद खान हैं। इसके अतिरिक्त इस आदेश का उल्लेख वाराणसी गजेटियर के पेज नंबर- 57 पर भी है। यह गजेटियर 1967 में प्रकाशित हुआ था।औरंगजेब के इस आदेश के बाद पूरे भारत में मंदिरों को तोड़ने का अभियान चला। 

कुल कितने मंदिर तोड़े गये इसकी संख्या कहीं नहीं मिलती। सेना जिस बड़े और प्रसिद्ध मंदिर को ध्वस्त करती तो उसकी सूचना दरबार में भेजी जाती। इन सूचनाओं का उल्लेख औरंगजेब की जीवनी में मिलता है। औरंगजेब के शासन में उन स्थानों को भी धूल धूसरित किया गया जो पहले किसी शासक ने तोड़े तो थे। लेकिन स्थानीय श्रद्धालुओं ने इन खंडहरों को थोड़ा सुधार कर भजन पूजन आरंभ कर दी थी।इनमें अयोध्या, मथुरा, काशी और सोमनाथ मंदिर भी थे। 

औरंगजेब के प्रपितामह अकबर ने अयोध्या में चबूतरा बनाकर भजन पूजन की अनुमति दे दी थी लेकिन औरंगजेब ने उस चबूतरे को भी ध्वस्त करके मस्जिद परिसर में शामिल करने का आदेश दिया। सोमनाथ मंदिर का विध्वंश 1025 में मेहमूद गजनवी ने किया था। मथुरा आदि अन्य स्थानों में भी पूर्व आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त मंदिर स्थलों में थोड़ा-बहुत सुधार करके भजन प्रार्थना आदि होने लगे थे। लेकिन औरंगजेब की सेना ने सनातन के इन सब खंडहर को भी दोबारा तोप से उड़ाया। वहाँ जितने श्रद्धालु मिले वे या तो मार डाले गये अथवा मतान्तरण करने की शर्त पर ही जीवित छोड़े गये।

औरंगजेब के इस आदेश से जिन मंदिरों को पुन: तोड़ा गया उनमें सोमनाथ के अतिरिक्त काशी विश्वनाथ मंदिर, मथुरा में केशवदेव मंदिर, अयोध्या में रामलला मंदिर, अहमदाबाद का चिंतामणि मंदिर, बीजापुर का मंदिर, वड़नगर के हथेश्वर मंदिर, उदयपुर में झीलों के किनारे बने 3 मंदिर, विदिशा का बीजामंडल, उज्जैन के सभी मंदिर, सवाई माधोपुर में मलारना मंदिर आदि थे। औरंगजेब के इस आदेश से आदेश से मथुरा का वह गोविन्द देव मंदिर भी तोड़ दिया गया जो 1590 में राजा मानसिंह द्वारा बादशाह अकबर की अनुमति से बनवाया था।

औरंगजेब के आदेश से मंदिरों का विध्वंस करने के साथ वे सभी विद्यालय भी नष्ट कर दिये गये जिनमें भारतीय पद्धति से शिक्षा दी जाती थी। ग्रंथालय जला दिये गये और शिलालेख तोड़ दिये गये थे। ताकि भारत की आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवमयी इतिहास और परंपराओं से अवगत ही न हो सकें। औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त किये गये अधिकांश मंदिर स्थलों पर मस्जिदों का निर्माण कराया। 

अयोध्या में जन्मस्थान पर बनी मस्जिद के विस्तार के साथ हनुमान गढ़ी पर भी एक मस्जिद का निर्माण कराया गया। इसके अतिरिक्त स्वर्गद्वीर मंदिर और ठाकुर मंदिर स्थल पर मस्जिद निर्माण के आदेश दे दिये गये।यद्यपि अकबर के शासन काल में भी मंदिरों का विध्वंस हुआ था किंतु कहीं-कहीं पूर्व में विध्वंस किये गये मंदिरों के खंडहरों में पूजन पाठ की अनुमति दे दी गयी थी। लेकिन औरंगजेब ने सार्वजनिक स्थलों पर सनातन परंपराओं के पूजन पाठ पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। 

औरंगजेब के पूरे शासन काल में इस आदेश का पूरी सख्ती से पालन किया गया। बाद के शासनकाल में आदेश तो यथावत रहा पर इसके क्रियान्वयन में कुछ शिथिलता रही। औरंगजेब ने भारत पर लगभग 49 वर्ष तक शासन किया। उसका पूरा शासनकाल विध्वंस और क्रूरता से भरा रहा। वह जिस स्थान पर गया वहां उसने क्रूरता का कैसा कहर बरपाया इसका विवरण स्वयं उसकी जीवनी में है। जिसका अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं में भी अनुवाद उपलब्ध है। (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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