विचार

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Published / 2025-08-19 11:35:36
वास्तविक निर्देश और इंसान

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। संसार में पैदा लेने के बाद सांसारिक वातावरण का प्रभाव विशुद्ध 100% स्वाभाविक है। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों से दो-चार होना सामान्य बात है। सांसारिक आकर्षण, वातावरण में व्याप्त अनावश्यक शोरगुल और अनंत इच्छाएं आज तनाव, उलझन, अवसाद इत्यादि से ग्रसित कर रहा है।

जिनका दुष्प्रभाव प्रभाव हमारे देह के ऊपर भी होते हुए उसे रोगी बना रहा है। समुचित निर्देशन और समाधान के लिए हम यहां-वहां भटकते रहते हैं जबकि हमारा निर्देशक स्वयं हमारे अंतःकरण में बैठा हुआ है। हम उसकी आवाज को अनसुनी कर देते हैं अथवा उसकी उपस्थिति को अस्वीकार करते रहते हैं।

ध्यान पूर्वक एकाग्रचित होकर अपने अंतःकरण में गोता लगाया जा सकता है। सतत अभ्यास से यह धीरे-धीरे सरल हो जाता है। उसके निर्देशन से हमारी अनिश्चितता तथा अनिर्णय की दुविधा समाप्त हो जाती है। हमारा व्यक्तित्व और कार्य सांसारिक जगत में अद्भुत परिणाम उत्पन्न करता है और परिष्कृत अंतस के संतुष्टि और तृप्ति के औषधि से काया और मन शक्ति-संपन्न सदैव स्वस्थ रहता है।

Published / 2025-08-17 21:58:29
मजबूत भारत, बुलंद इरादे

ऋतुपर्ण दवे 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लालकिले की प्राचीर से लगातार 12वीं बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्वाधीनता दिवस का इस बार का संबोधन कुछ अलग और कई संकेतों से भरा था। उनका 103 मिनट का भाषण न केवल अब तक का सबसे बड़ा बल्कि सख्त और साफ इरादों को दशार्ने वाला था। यह कूटनीति लिहाज से भी गहरे मायनों से भरा था। जहां एक ओर शुरुआत में ही अनुच्छेद 370 को हटाकर, एक देश एक संविधान की बात कही। वहीं, आॅपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए सेना को खुली छूट देने का सच भी सामने रखा। 

दरअसल, प्रधानमंत्री का यह संबोधन कई मायनों में बेहद अलग, सख्त और दुनिया के लिए कूटनीतिक बयानों जैसा था। साथ ही साथ देश में भी घट रही अस्वीकार्य घटनाओं से निपटने की चेतावनी भी। इसके अलावा देश की तरक्की, युवाओं को प्रोत्साहन, उपब्धियों और दुनिया के महत्वपूर्ण मिशन में भारतीय योगदान पर भी केन्द्रित था। प्रधानमंत्री ने शायद ही ऐसा कोई विषय छोड़ा हो जो जरूरी न हो। इतना ही नहीं इशारों ही इशारों में जहां अमेरिका और चीन को उसकी हैसियत बताई वहीं खुलेआम पाकिस्तान को भी लताड़ लगायी। 

पहले जानते हैं कि उन्होंने क्या-क्या कहा। पहलगाम हमले पर पाकिस्तान को आड़े हाथों लेते हुए उनके आतंकी हेडक्वार्टर्स को मिट्टी में मिलाने का जिक्र कर पाकिस्तान की नींद गायब होने की भी बात कही। लंबे समय से चल रहे न्यूक्लियर ब्लैकमेल को नहीं सहने और सेना की शर्तों पर मुंह तोड़ जवाब देने की बात भी कही। पुराने सिंधु जल समझौते को अन्याय पूर्ण बताया और कहा कि भारत की नदियां दुश्मनों के खेत सींचे और देश के किसान की धरती प्यासी रहे? सिंधु समझौते के उस स्वरूप को आगे नहीं सहा जायेगा। 

21वीं सदी टेक्नोलॉजी ड्रिवन सेंचुरी है। 50-60 साल पहले सेमीकंडक्टर पर विचार हुआ लेकिन फाइलें वहीं अटक गयीं। सेमीकंडक्टर के विचार की भ्रूण हत्या हो गयी। बाद में कई देश सेमीकंडक्टर में महारत हासिल कर दुनिया को अपनी ताकत को दिखा रहे हैं। मिशन मोड में इस काम को आगे बढ़ाने तथा 6 अलग-अलग सेमीकंडक्टर यूनिट्स लगाने जिसमें चार की स्वीकृति की जानकारी दी। वर्ष के अंत तक मेड इन इंडिया यानी भारत की बनी हुईं चिप्स बाजार में होना बड़ी उपलब्धि होगी। 

प्रधानमंत्री ने अन्य कई योजनाओं, उपलब्धियों की भी चर्चा की। 11 वर्षो में सोलर एनर्जी का उपयोग 30 गुना बढ़ना। नये-नये डैम बना जल शक्ति का विस्तार कर क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ना। 10 नये न्यूक्लियर रिएक्टर तेजी से काम करना। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करना ताकि देश की आजादी के 100 साल पर हमारी परमाणु ऊर्जा क्षमता 10 गुना से भी अधिक हो। 

उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिेए तय साल 2030 तक क्लीन एनर्जी में 50 प्रतिशत लक्ष्य 5 साल पहले ही हासिल करना हमारी प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता है। नेशनल क्रिटिकल मिशन लॉन्च कर 1200 से अधिक स्थानों पर खोज अभियान से हम क्रिटिकल मिनरल में भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं जो बहुत बड़ी उपलब्धि है। युवाओं का आह्वान किया कि क्या हमारे अपना मेड इन इंडिया फाइटर जेट्स खातिर जेट इंजन भी हमारे हों? हम फार्मा आफ द वर्ल्ड हैं। अब समय की मांग नहीं कि हम रिसर्च और डेवलपमेंट में और ताकत लगाएं। हमारे अपने पेटेंट हों। मानव कल्याण हेतु सस्ती, सबसे कारगर नयी-नयी दवाइयों पर शोध हो। संकट में बिना साइड इफेक्ट के जन कल्याण में काम आये। 

प्रधानमंत्री मोदी ने आह्वान किया कि आईटी का युग है, डेटा ताकत है। क्या समय की मांग नहीं है कि आपरेटिंग सिस्टम से लेकर के साइबर सुरक्षा, डिप टेक से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक, सारी चीजें हमारी अपनी हों। अपनी सामर्थ्य शक्ति से विश्व को परिचित कराने की बात कहते हुए कहा कि हमारा यूपीआई दुनिया को अजूबा लग रहा है। रियल टाइम ट्रांजैक्शन 50 प्रतिशत अकेला भारत यूपीआई से कर रहा है। क्रिएटिव वर्ल्ड, सोशल मीडिया जितने भी प्लेटफॉर्म्स हैं हमारे अपने क्यों ना हों? क्यों भारत का धन बाहर जाए? मुझे युवाओं के सामर्थ्य पर भरोसा है। 

प्रधानमंत्री ने ईवी बैटरी, सोलर पैनल, महिला स्वसहायता समूह, गुणवत्तापूर्ण उत्पाद में पहचान के साथ ही नेक्स्ट जनरेशन रिफॉर्म्स के लिए टास्क फोर्स गठन व समय सीमा में काम पूरा करने ताकि वर्तमान नियम, कानून, नीतियां, रीतियां 21वीं सदी के और वैश्विक वातावरण के अनुकूल हो, भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र बनाने के संदर्भ में हो। नेक्स्ट जनरेशन जीएसटी रिफॉर्म्स को दिवाली का तोहफा बताते हुए लोगों की जरूरतों पर लग रहे भारी टैक्स को बहुत कम करने से एमएसएमई, लघु उद्यमियों को लाभ मिलने और रोजमर्रा की चीजें बहुत सस्ती होने से इकॉनामी को नया बल मिलने की बात भी कही।

प्रधानमंत्री मोदी ने षड्यंत्र के तहत, सोची समझी साजिश के जरिए देश की डेमोग्राफी को बदलने को नया संकट बताया। घुसपैठिए, देश के नौजवानों का हक छीन रहे हैं, बहन बेटियों को निशाना बना रहे हैं। यह बर्दाश्त नहीं होगा। हमारे पूर्वजों ने त्याग और बलिदान से आजादी पाई है। एक हाई पावर डेमोग्राफी मिशन शुरू करने का निर्णय किया है। जो ऐसे भीषण संकट से निपटने के लिए तय समय में कार्य करेगा, उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। 
इस बार के संबोधन से इतना तो साफ हो गया कि प्रधानमंत्री ने ज्यादा फोकस बजाए दीर्घ कालिक योजनाओं के मौजूदा चुनौतियों और उनसे निपटने के मंसूबों को देश के सामने रखा। 

ब्लैकमेलिंग नहीं सहने, आपरेशन सिंदूर का जिक्र, स्वदेशी मजबूरी नहीं मजबूती सहित पाकिस्तान को खुलेआम तो अमेरिका को संकेतों में चेताया भी। पहली बार लालकिले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल की राष्ट्र की सेवा का जिक्र करना और मां भारती के कल्याण का लक्ष्य लेकर सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन की चर्चा के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दुनिया का यह सबसे बड़ा एनजीओ है बताना तथा आपातकाल का हवाला भी देने के कई राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने 12वीं बार सबसे ज्यादा देर, 103 मिनट संबोधित कर, दुनिया को अपने इरादे साफ कर दिये हैं। अब वक्त है पक्ष-विपक्ष का जो उनके भाषण के अपने-अपने, कैसे-कैसे और क्या-क्या मायने निकालता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2025-08-17 21:56:13
संवैधानिक दबावों के बीच उपराष्ट्रपति चुनाव

एनके मुरलीधर 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत के लोकतंत्र की संरचना संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती पर टिकी हुई है। ये संस्थाएं न केवल शासन के संचालन के लिए आवश्यक हैं, बल्कि वे लोकतंत्र के मूल्यों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का भी अभिन्न हिस्सा हैं। आज जब हम 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव की ओर देख रहे हैं, तो यह चुनाव केवल एक औपचारिक प्रक्रिया से कहीं अधिक, हमारे संवैधानिक तंत्र की परीक्षा बन गया है। क्योंकि देश की संवैधानिक संस्थाओं पर जो राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है, वह लोकतंत्र की आत्मा को चुनौती दे रहा है। 

संविधान के निर्माताओं ने भारत के संवैधानिक ढांचे में एक सशक्त और स्वतंत्र संस्थागत तंत्र स्थापित करने का विशेष ध्यान रखा था। यह तंत्र सुनिश्चित करता है कि लोकतंत्र का संचालन केवल राजनीतिक दलों या सत्ता समूहों की मनमानी पर निर्भर न रहे, बल्कि संविधान के अनुशासन और मयार्दाओं के भीतर हो। इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, राज्यपालों और अन्य संवैधानिक पदों की निष्पक्षता शामिल है। परंतु समय के साथ यह देखा गया है कि ये संस्थाएं राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं रह पाईं हैं। 

यह राजनीतिक दबाव कभी स्पष्ट रूप से और कभी छिपकर सामने आता है। राजनीतिक दबाव की शुरुआत सबसे पहले संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रियाओं में दिखाई देती है। संवैधानिक पदों पर नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं का प्रभाव, और कभी-कभी सीधे राजनीतिक गठजोड़ के कारण ये संस्थाएं उस स्वायत्तता से काम नहीं कर पातीं, जिसकी आवश्यकता लोकतंत्र के लिए होती है। न्यायपालिका का उदाहरण लें, तो जहां एक ओर उसकी भूमिका संविधान की अंतिम प्रहरी के रूप में है, वहीं कुछ हालिया घटनाओं में नियुक्ति प्रक्रियाओं और महत्वपूर्ण फैसलों के संदर्भ में राजनीतिक संकेतों ने इस स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। 

यह वह संवेदनशील विषय है जो बार-बार लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बजाता है। इसी प्रकार निर्वाचन आयोग की स्थिति भी चिंता का विषय रही है। निर्वाचन आयोग, जो देश में चुनावों की निष्पक्षता की गारंटी देता है, ने कई अवसरों पर अपने निर्णयों में विलंब, पक्षपात या राजनीतिक दलों के प्रति असंतुलित रवैया दिखाने के आरोप झेले हैं। राजनीतिक दलों के दबाव में आकर आयोग के निर्णयों की आलोचना जनता के बीच विश्वास की कमी पैदा करती है। लोकतंत्र का मूल आधार यदि चुनाव प्रक्रिया पर सार्वजनिक भरोसा कम हो जाये, तो उसकी नींव डगमगा जाती है।राज्यपालों के मामले में भी राजनीतिक दबाव की छाया स्पष्ट देखी जा सकती है। 

संवैधानिक पद के रूप में राज्यपालों को केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाए रखना होता है, लेकिन कई बार यह पद सत्ता पक्ष के हितों की रक्षा के लिए एक राजनीतिक हथियार बन जाता है। विधानसभा सत्र बुलाने में विलंब, बहुमत साबित करने की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी, और राजनीतिक दलों के दबाव में हस्तक्षेप जैसी घटनाएं इसे प्रमाणित करती हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के तंत्र में असंतुलन उत्पन्न करती है और संवैधानिक मयार्दाओं को कमजोर करती है। इन सभी संदर्भों में उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 विशेष महत्व रखता है। 

उपराष्ट्रपति पद न केवल राज्यसभा के सभापति का पद है, बल्कि वे राष्ट्रपति की अनुपस्थिति या असमर्थता में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का कार्यभार भी संभालते हैं। यह पद संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की गरिमा का एक प्रतीक है। इसलिए इसका चुनाव एक गहन राजनीतिक और संवैधानिक चुनौती बन गया है। इस चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य मतदान करते हैं, और गुप्त मतदान की प्रक्रिया के बावजूद दलगत राजनीति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। 

राजनीतिक दल अपने सदस्यों को आदेश देते हैं, जो उनकी पार्टी की नीति के साथ चलने के लिए बाध्य करते हैं। यह व्यवस्था संसद सदस्यों की स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सीमित करती है और संवैधानिक पदों की गरिमा को प्रभावित करती है। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल सत्ता की पीठ थपथपाना नहीं है, बल्कि निर्णयों में स्वतंत्रता और संविधान के प्रति निष्ठा होनी चाहिए।2025 के इस उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी दल भी एक संयुक्त उम्मीदवार पेश कर सकता है, जो राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर संविधान की रक्षा और लोकतांत्रिक आदर्शों की सेवा करने का वचन देता है।

दूसरी ओर सत्ताधारी दल अपने उम्मीदवार के पक्ष में पूर्ण बहुमत का उपयोग करता नजर आता है। इस परिदृश्य में यह चुनाव केवल एक पद के चयन का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह राजनीतिक संस्कृति, संवैधानिक मयार्दाओं और लोकतंत्र की दिशा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। यदि संवैधानिक पदों पर राजनीति हावी हो जाती है, तो देश के संवैधानिक तंत्र की विश्वसनीयता खत्म होने लगती है। लोकतंत्र की आत्मा संविधान और उसके तंत्रों की स्वतंत्रता में निहित है। उपराष्ट्रपति चुनाव जैसे संवेदनशील अवसरों पर यदि राजनीतिक दबाव अधिक हो, तो यह केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर चोट होगी। 

देश के संवैधानिक संस्थान कमजोर होंगे, निर्णयों में पारदर्शिता और निष्पक्षता का अभाव होगा, और जनता का विश्वास लोकतंत्र से कम होने लगेगा। ऐसे में इस चुनाव में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक मयार्दाओं का सख्ती से पालन अनिवार्य हो जाता है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे इस पद को सत्ता के साधन के रूप में न देखें, बल्कि उसे लोकतंत्र के रक्षक के रूप में स्वीकार करें। उपराष्ट्रपति का कार्यभार उन लोगों को सौंपा जाना चाहिए जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को समझें और उसे बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध हों। 

इस संघर्ष में नागरिक समाज, मीडिया और जनता की भूमिका अहम होती जा रही है। जब तक जनता संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और गरिमा के प्रति जागरूक नहीं होगी, तब तक राजनीतिक दल इस पर दबाव बनाए रखेंगे। समाचार माध्यमों को चाहिए कि वह केवल समाचार न प्रस्तुत करे, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के साथ हो रहे अन्याय और राजनीतिक हस्तक्षेप को उजागर करके लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करे। जनता की सजगता ही अंतत: संवैधानिक संस्थाओं को बचा सकती है। 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में इसीलिए न केवल राजनीतिक दलों के बीच टक्कर है, बल्कि संवैधानिक मयार्दाओं और लोकतंत्र की आत्मा के संरक्षण की लड़ाई है। 

यह चुनाव दर्शाएगा कि क्या भारत के लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाएं अपने कर्तव्यों को स्वतंत्र रूप से पूरा कर सकेंगी, या वे राजनीतिक दबावों के कारण कमजोर पड़ जाएंगी। संविधान के मूल उद्देश्यों और लोकतंत्र की सर्वोच्चता के लिए यह आवश्यक है कि इस चुनाव को राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाये। यह केवल एक व्यक्ति का चयन नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक आदर्श का चयन है। यदि हम इस अवसर को खो देते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक दुर्भाग्यपूर्ण युग का आरंभ होगा जब संवैधानिक संस्थाएं केवल सत्ता के अधीनस्थ ही रहेंगी। 

इसलिए देश की राजनीतिक शक्ति, नागरिक समाज, और समाचार माध्यमों को मिलकर इस चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष और संवैधानिक मयार्दाओं के अनुरूप संपन्न कराने के लिए काम करना होगा। तभी भारत का लोकतंत्र अपने मूल स्वरूप में जीवित और मजबूत रह सकेगा। (लेखक एबीएन के प्रधान संपादक हैं।)

Published / 2025-08-13 20:36:53
संस्कृत भाषा : संस्कृति, श्रद्धा और शुद्धता का संगम

डॉ उषा किरण 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। श्रावण पूर्णिमा के दिन संस्कृत भाषा दिवस भी मनाया जाता है। इसे विश्व संस्कृत दिवस भी कहा जाता है। यह दिवस प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत के सम्मान में मनाया जाता है। श्रावण पूर्णिमा अर्थात् रक्षाबंधन के दिन को संस्कृत दिवस के रूप में मनाने का निर्णय भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 1969 में लिया था। संस्कृत को देवों की भाषा कहा गया है और यह भारत की कई भाषाओं की जननी मानी जाती है। 

श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह केवल रक्षाबंधन का पर्व नहीं, बल्कि एक और दिव्य उद्देश्य से भी जुड़ा हुआ है — संस्कृत भाषा दिवस। हर वर्ष श्रावण पूर्णिमा के दिन संस्कृत दिवस के रूप में एक विशेष आयोजन अखिल भारतीय स्तर पर किया जाता है, जो हमें हमारी गौरवशाली भाषा, उसकी परंपराओं और उसके अमूल्य साहित्य की स्मृति दिलाता है। 

  1. संस्कृत दिवस की शुरुआत : भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने वर्ष 1969 में यह निर्णय लिया कि श्रावण मास की पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जायेगा। यह निर्णय केवल एक भाषा को सम्मान देने का नहीं था, बल्कि एक समूची विचारधारा, एक जीवनशैली और भारतीय ज्ञान परंपरा को पुन: जाग्रत करने का एक संकल्प था। संस्कृत केवल भाषा नहीं, भारतीय संस्कृति की आत्मा है। संस्कृत को यूं ही देववाणी या देवों की भाषा नहीं कहा गया। यह वह भाषा है जिसमें वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, गीता जैसे ग्रंथों की रचना हुई। यह वह माध्यम है जिसके द्वारा योग, आयुर्वेद, खगोल, गणित, दर्शन, व्याकरण और नाट्यशास्त्र जैसे विषयों ने विश्व पटल पर भारतीय सभ्यता की छवि बनायी। संस्कृतं नाम देवभाषा, संस्कृति: तस्य धारिणी। अर्थात् संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति की संवाहक भी है। 
  2. रक्षाबंधन और संस्कृत आध्यात्मिक समरसता : संयोग की बात है कि संस्कृत दिवस उसी दिन मनाया जाता है, जिस दिन रक्षाबंधन जैसा सामाजिक और भावनात्मक पर्व भी होता है। रक्षाबंधन में बहन भाई को रक्षा-सूत्र बांधती है और संस्कृत भाषा भी हमें ज्ञान की रक्षा करने का सूत्र प्रदान करती है। यह भाषा हमें आत्मा और ब्रह्म के बीच के गहरे संबंधों को समझने की शक्ति देती है। 
  3. संस्कृत की वैज्ञानिकता और वैश्विक मान्यता : संस्कृत भाषा की विशेषता उसकी संरचना, ध्वन्यात्मकता और व्याकरणिक परिपूर्णता में निहित है। नासा के वैज्ञानिकों ने स्वीकारा है कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए संस्कृत सबसे उपयुक्त भाषा है क्योंकि इसकी संरचना अत्यंत तार्किक और स्पष्ट है। विश्व के कई विश्वविद्यालयों में आज संस्कृत एक महत्वपूर्ण अध्ययन विषय बन चुका है — जैसे कि जर्मनी, अमेरिका, इंग्लैंड, जापान आदि में। आधुनिक युग में संस्कृत का महत्व उल्लेखनीय है. आज के समय में संस्कृत आम बोलचाल की भाषा नहीं रही, परंतु इसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। यह भारतीय भाषाओं की मूल जननी है — हिंदी, मराठी, बंगाली, कन्नड़, तेलुगु, उड़िया आदि सभी भाषाओं की जड़ें कहीं न कहीं संस्कृत में हैं। संस्कृत भाषा में छिपे ज्ञान को यदि आधुनिक युग के अनुरूप पुन: प्रस्तुत किया जाए, तो यह मानवता को न केवल सांस्कृतिक, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में प्रेरित करती है। 
  4. संस्कृत दिवस का उद्देश्य : संस्कृत दिवस केवल एक रस्मी आयोजन नहीं, बल्कि एक आमंत्रण है पुनर्जागरण का। इसका उद्देश्य है-  
  • युवाओं को संस्कृत के प्रति आकर्षित करना 
  • शैक्षणिक संस्थानों में संस्कृत की सक्रिय भूमिका को बढ़ावा देना 
  • वेदों और शास्त्रों के अध्ययन को पुनर्जीवित करना 

संस्कृति और भाषा को जोड़ने वाले सूत्र को पुन: जागृत करना 
उदाहरण रूप में - एक प्रेरणास्पद संस्कृत श्लोक है - 
सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियम। 
प्रियं च नानृतं ब्रूयात, एष धर्म: सनातन:॥ 
अर्थात सत्य बोलो, प्रिय बोलो। अप्रिय सत्य मत बोलो। प्रिय हो परंतु असत्य न बोलो- यही सनातन धर्म है।

Published / 2025-08-13 20:30:47
यूपी को पहला नमक सत्याग्रही देने वाला गांव बकुलिहा

गौरव अवस्थी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लालगंज-उन्नाव फोरलेन हाइवे बनने के बाद कई गांव-कस्बों के नाम लिखे दिखने लगे हैं। उनमें एक है- बकुलिहा। करीब पांच हजार की आबादी वाला गांव। आजकल गांव का रास्ता पक्का है। कुछ समय पहले यह कच्चा था। अन्य की तरह इसे साधारण गांव समझने की भूल मत कीजियेगा। स्वाधीनता संग्राम में इस गांव का खासा योगदान रहा है। हालांकि स्वाधीनता से जुड़े अन्य स्थानों की तरह यह भी अब भूला-बिसरा ही है। 
उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह के लिए पहला सत्याग्रही देने का श्रेय लालगंज से 12 किलोमीटर दूर स्थित इसी गांव के नाम दर्ज है। 

दांडी में 07 अप्रैल 1930 को समुद्र के खारे जल से नमक बनाकर ब्रिटिश हुकूमत के नमक कर के आदेश का उल्लंघन करने के बाद महात्मा गांधी ने सारे देश में नमक सत्याग्रह का आग्रह किया। उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह की सफलता के लिए कानपुर से प्रकाशित होने वाले प्रताप अखबार के प्रतापी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की अध्यक्षता में समिति गठित की गयी। इस समिति में पंडित जवाहरलाल नेहरू, रफी अहमद किदवई और मोहनलाल सक्सेना सदस्य के रूप में शामिल किये गये। 

इसी समिति ने उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह के शुभारंभ के लिए रायबरेली को चुना। तब यह सवाल उठा था कि आखिर रायबरेली ही क्यों? इस सवाल का जवाब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इन शब्दों में दिया- रायबरेली में अंगद, हनुमान, सुग्रीव जैसे कार्यकर्ता घड़ी भर की सूचना मिलते ही जान हथेली पर रखकर निकल पड़ते हैं। इसकी दूसरी वजह रायबरेली का 1921 का किसान आंदोलन भी था। रायबरेली का मुंशीगंज गोलीकांड भारतीय स्वाधीनता इतिहास में मिनी जलियांवाला बाग कांड के रूप में याद किया जाता है। 

सई नदी के तट पर ब्रिटिश हुकूमत और जमींदार सरदार वीरपाल सिंह के कारिंदों द्वारा बरसाई गई गोलियों से सैकड़ों किसान शहीद हुए। किसानों के खून से नदी का पानी लाल हो गया था। इस गोलीकांड की सूचना पर रायबरेली आए पंडित जवाहरलाल नेहरू को नजर बंद कर दिया गया था। अपनी आत्मकथा में उन्होंने इस कांड का जिक्र भी किया है। गणेश शंकर विद्यार्थी को इस कांड की विस्तार से रिपोर्ट छापने के लिए दंडित भी किया गया था। बाराबंकी में जन्मे रफी अहमद किदवई की कर्मभूमि रायबरेली ही रही। यह तीनों उत्तर प्रदेश में नमक सत्याग्रह के शुभारंभ के लिए गठित की गयी समिति के सदस्य थे। 

रायबरेली को नमक सत्याग्रह के शुभारंभ के लिए चुने जाने की एक वजह यह भी हो सकती है। समिति ने अपने इस निर्णय की सूचना महात्मा गांधी को भी भेजी। महात्मा गांधी भी मुंशीगंज गोलीकांड भूले नहीं थे। इसलिए उन्होंने फैसले पर तुरंत मोहर लगाते हुए अपने साबरमती आश्रम में रहने वाले रायबरेली के शिवगढ़ के बाबू शीतला सहाय को एक पत्र देकर रायबरेली भी भेजा। यह पत्र था, राजा अवधेश सिंह और उनके भाई कुंवर सुरेश सिंह के नाम। पत्र में इन दोनों को रायबरेली के आंदोलन को नेतृत्व देने का निर्देश दिया गया था। 

जिलास्तर पर रफी अहमद किदवई, मोहनलाल सक्सेना और कुंवर सुरेश सिंह की समिति ने 8 अप्रैल 1930 को डलमऊ के गंगा तट पर नमक बनाने का ऐलान किया और प्रथम सत्याग्रही के रूप में बकुलिहा गांव में जन्मे बाबू सत्यनारायण श्रीवास्तव को चुना गया। डलमऊ के मेहंदी हसन ने सत्याग्रह के लिए शेख सखावत अली का मकान निश्चित किया लेकिन प्रशासन ने 07 अप्रैल को ही मेहंदी हसन को गिरफ्तार कर लिया। रफी अहमद किदवई की तलाश में छापे मारे जाने लगे। 

ब्रिटिश पुलिस की सक्रियता को देखते ही बाबू सत्यनारायण श्रीवास्तव अंग्रेज हुकूमत की आंखों में धूल झोंकते हुए रफी अहमद किदवई के साथ रायबरेली आ गए। 1921 के मुंशीगंज गोलीकांड को ध्यान रखते हुए पंडित मोतीलाल नेहरू भी प्रयाग से रायबरेली पहुंच गये। ब्रिटिश पुलिस और प्रशासन की सक्रियता के चलते डलमऊ में गंगा के किनारे नमक बनाने का प्लान फेल हो गया लेकिन पंडित मोतीलाल नेहरू की उपस्थिति में 08 अप्रैल 1930 को बाबू सत्यनारायण श्रीवास्तव ने लोनी मिट्टी से नमक बनाकर नमक कानून तोड़ कर प्रथम सत्याग्रही होने का गौरव प्राप्त किया। 

बाबू सत्यनारायण 1921 के असहयोग आंदोलन में नौकरी छोड़कर शामिल हुए। कई वर्षों तक जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री रहे। नमक एवं व्यक्तिगत सत्याग्रह, लगान बंदी और भारत छोड़ो आंदोलन में करीब साढ़े 3 वर्ष से ज्यादा दिन जेल में बंद रहे। 200 रुपये जुमार्ना भी हुआ। लगानबंदी आंदोलन के दौरान बकुलिहा को बारडोली जैसा बनाने का श्रेय भी बाबू सत्यनारायण श्रीवास्तव को ही है।

Published / 2025-08-06 18:33:38
व्यक्ति के हर उम्र में आती है विचार क्रांति

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इंसान चाहे जिस भी उम्र का हो ज्ञान ही तो अर्जित करते रहता है। बचपन में ए फॉर एप्पल से शुरू होकर तीन पहिया साइकिल दोपहिया साइकिल फटफटिया कार काफी किताब स्कूली शिक्षा कॉलेज की शिक्षा मास्टर डिग्री आईएएस आईपीएस डॉक्टर इंजीनियर साइंटिस्ट बैंकर और न जाने क्या-क्या...?

कभी सोचा है व्यवहारिक जीवन में इतने सारे ज्ञान काम की वस्तु होती भी है क्या? संसार भर में फैला हुआ अर्थ तंत्र का ताना-बाना और उसमे लिपटा हुआ इंसान चैन की सांस ले पा रहा है क्या?

इंसान ने भौतिक जगत में अद्भुत क्रांति उत्पन्न तो कर दिए हैं, परंतु यदि क्रांति नहीं हुआ है तो वह है विचार जगत में क्रांति और यही कारण है कि छीना-झपटी लूट-खसोट का उत्पात हर ओर उधम मचा रहा है।

आज एक बड़ा और व्यापक विचार क्रांति की आवश्यकता है जिससे इंसान गहरी नींद ले सके, संतोष का सुख भोग सके और सहयोग करके तृप्ति की अनुभूति प्राप्त कर सके, जिसकी शुरुआत स्वयं के साथ किया जा सकता है...।

Published / 2025-08-06 16:24:09
विश्व कवि रवींद्र नाथ टैगोर और हजारीबाग

84वीं पुण्यतिथि पर विशेष

  • गुरुदेव की रचनाओं का सृजन स्थल रहा है शहर
  • अंग्रेज अगर जमीन मुहैया कराते तब हजारीबाग में ही बनता शांति निकेतन!

प्रो. प्रमोद कुमार

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर की रचनाओं का सृजन स्थल रहा है हजारीबाग। उनकी कविता की यह पंक्ति जोदी तोर डाक शुने केऊना, आसे तोबे एकला चलो रे... आज भी हर साहित्य प्रेमियों की जुबान पर अनायास ही प्रस्फुटित होते रहती है। इसकी रचना एकीकृत हजारीबाग जिले के गिरिडीह में विश्व कवि ने की थी।

हजारीबाग में गुरुदेव का आगमन होना पूरी इलाके के लिए गौरव का विषय है। एक ऐसा विराट व्यक्तित्व का स्वामी जिसने पूरी एशिया में अपनी प्रतिभा का परचम लहराते हुए नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। गुरुदेव ने विश्व के मानचित्र पर अपने देश का नाम सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करने का काम किया। 

हजारीबाग शहर इस मामले में काफी सौभाग्यशाली रहा है यहां गुरुदेव के चरण पड़े, प्रवास हुआ, सृजन की धारा प्रवाहित हुई तथा इतिहास के अध्याय में कई अविस्मरणीय पन्ने जुट गए। विश्वकवि पर पिछले 55 वर्षों से लगातार शोध कर रहे 86 वर्षीय श्री अमल सेन गुप्ता की चर्चा करना यहां लाजमी होगा। 

श्री सेनगुप्ता न तो विश्वविद्यालय,न किसी कॉलेज और न किसी स्कूल के मास्टर रहे। वे डाक विभाग में पोस्ट मास्टर थे, इसके बावजूद गुरुदेव की रचनाओं के मास्टरपीस के रूप में उनकी चर्चा बांग्ला साहित्य जगत में की जाती रही है। 

श्री सेन गुप्ता से लिए गए साक्षात्कार के अनुसार रविंद्रनाथ टैगोर 1885 ई की अप्रैल माह में पहली बार हजारीबाग पधारे थे। उनके साथ भतीजी इंदिरा देवी तथा भतीजा सुरेंद्रनाथ टैगोर थे। इंदिरा जी के स्वास्थ्य लाभ के क्रम में यहां प्रवास हुआ था।

इंदिरा जी कोलकाता के लोरेटिव कॉन्वेंट की छात्रा थी। उन्होंने अपनी स्मृति गाथा में हजारीबाग के डाक बंगला में ठहरने का वर्णन किया है। प्रवास की क्रम में उनका यदुगोपाल मुखर्जी के घर आना जाना होता था। श्री मुखर्जी स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता थे। 

प्रोफेसर प्रशांत कुमार पाल ने अपनी पुस्तक रवि जीवनी के खंड 2 के पृष्ठ संख्या 235 में रवि बाबू से जुड़ी यात्रा का उल्लेख किया है। इस पुस्तक में अमल सेनगुप्ता के बारे में उल्लेख करते हुए कहा गया है कि तमाम जानकारी उनके पुस्तक के आधार पर प्रस्तुत की गई है। उसे समय गुरुदेव अपने परिजनों के साथ हजारीबाग रोड में ट्रेन से उतरने के बाद पुश- पुश गाड़ी से हजारीबाग पहुंचे थे।
 

गुरुदेव का हजारीबाग में दूसरी बार 1903 में आगमन हुआ था। लकड़ा गोदाम के जूलु पार्क में बने डाक बंगला में प्रवास हुआ था। लकड़ा गोदाम 29 बीघा जमीन में बसा हुआ था जिसके मालिक गुरुदेव के रिश्तेदार काली कृष्ण ठाकुर थे। लोक निर्माण विभाग के इस निरीक्षण बंगला में रोशनी और हवा की सही व्यवस्था नहीं थी,परिणाम यह हुआ कि गुरुदेव समेत उनके सभी परिजन बीमार पड़ गए।
इस संबंध में अमल दा अपनी प्रकाशित पुस्तकों के पन्ने पलटते हुए बताते हैं कि शहर के नामी बंगाली सज्जन गिरेंद्र कुमार गुप्ता आग्रह पूर्वक गुरुदेव को अपनी बाड़ी  में ले गए। गुरुदेव की देखभाल करने वालों में ऋषिकेश दास गुप्ता,हेमनलिनी देवी और शीर्ष मजूमदार की साली थी। गिरेंद्र बाबू का बाड़ी अभी भी मेन रोड में पैगोड़ा होटल के पीछे अवस्थित है। 
“नौका डूबी’’ गुरुदेव की महत्वपूर्ण कृति है जिसकी रचना गिरेंद्र बाबू की बाड़ी में हुई थी और इसकी नायिका शीर्ष मजूमदार की साली हेमनलनी देवी थी।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अंग्रेज सरकार हजारीबाग में गुरुदेव को जमीन उपलब्ध अगर कराती तो शांति निकेतन की स्थापना यही होती। गुरुदेव ने अपने मित्र शिर्ष मजूमदार को पत्र लिखकर इच्छा जतायी थी कि जमीन अगर मिलती तो शांतिनिकेतन के विद्यार्थियों के लिए तपोवन एवं हेल्थ रिजॉर्ट बनाया जाता। शिर्षदा 1903 में रेलवे एक्विजिशन ऑफीसर के पद पर यहां कार्यरत थे।
गुरुदेव के हजारीबाग में आए 140 वर्ष पूरे हो गए हैं। उनकी स्मृतियों को सहेजने एवं संरक्षित करने का काम बखूबी अमल दा ने किया है। 
भोरे पाखी डाके कोथाए…….. की रचना हजारीबाग की प्राकृतिक खूबसूरती को देखकर हुई थी। इस शहर में एक ऐसे विराट व्यक्तित्व का प्रवास हुआ, जिसमें गुरुदेव का नाम सर्वोपरि है। भावी पीढ़ी को इसकी जानकारी होनी चाहिए, कि एक ऐसा कलम का संवेदनशील व्यक्ति हजारीबाग में सृजन का महाजाल फैलाकर शब्दों को कैद किया था जिसकी 28 वर्षों बाद नोबेल पुरस्कार अपने देश की झोली में आई।
                     प्रो प्रमोद कुमार
                       सहायक प्राध्यापक ( अवकाश प्राप्त)
राजनीति विज्ञान विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग

Published / 2025-08-03 20:25:15
हरिजी का जाना यानी एक स्तंभ का ढह जाना...

विनोद कुमार सिंह 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हरि भाई, यानी हरिनारायण सिंह नहीं रहे। यह एक व्यक्ति का गुजर जाना मात्र नहीं है। यह एक स्तंभ का ढह जाना है। इसलिए उनके निधन की सूचना झारखंड के लोगों के लिए एक बड़ा झटका है। जिसने भी इसे सुना, देखा या पढ़ा, भौंचक रह गया। चाहे वह पत्रकार हो, नेता हो या फिर व्यवसायी या फिर अधिकारी-कर्मचारी से लेकर आम लोग, हर कोई अपने इस प्रिय शख्सियत के अवसान से व्यथित हो गया। 

सहकर्मियों के लिए हरि भाई या हरि भैया, परिचितों के लिए हरि जी और आम लोगों के लिए हरि सर एक ऐसी हस्ती का नाम था, जिसमें मानवता कूट-कूट कर भरी थी। तभी उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए उमड़े लोग कह रहे थे, ऐसा संपादक तो हमने देखा या सुना भी नहीं था, जो हर किसी से प्रेम करता हो। चाहे निजी जीवन हो या पेशेवर जीवन, हरि भाई ने कभी भी इंसानी रिश्तों को कमतर नहीं होने दिया।  

उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के पातेपुर में पैदा हुए हरि भाई ने रांची और झारखंड को अपना घर बना लिया था। साढ़े तीन दशक से अधिक समय से रांची, एकीकृत बिहार और झारखंड की पत्रकारिता को नया आयाम देनेवाले हरि भाई ने कलकत्ता (कोलकाता) में रविवार पत्रिका से अपने करियर की शुरुआत की। फिर चौथी दुनिया और आनंद बाजार पत्रिका से होते हुए 23 अक्तूबर, 1989 को प्रभात खबर में काम करने के लिए रांची आये। 

वहां से हिंदुस्तान के रांची संस्करण में वरीय स्थानीय संपादक और फिर झारखंड के स्टेट हेड बने। फिर न्यूज 11, सन्मार्ग और खबर मन्त्र जैसे मीडिया संस्थानों में नेतृत्व की भूमिका का निर्वहन करने के बाद 2015 में अपना अखबार आजाद सिपाही निकालना शुरू किया। बिना किसी बड़ी पूंजी और कॉरपोरेट समर्थन के रांची से निकल कर आजाद सिपाही आज झारखंड के शीर्ष अखबारों की कतार में शामिल है, तो इसके पीछे हरि भाई की सोच, विजन और मेहनत है। उन्होंने अखबार को एक ऐसे परिवार के रूप में बदल दिया, जहां कोई नौकरी नहीं करता है, बल्कि घर का काम करता है। ऊर्जा, उत्साह, जानकारी और मेहनत का ऐसा अद्भुत संगम थे हरि भाई कि मीडिया जगत ही नहीं, दूसरे क्षेत्रों के लोग भी उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। 

हरि भाई ने जिस गंभीरता से पत्रकारिता की, उसी गंभीरता से इंसानी रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं को भी अनुभूति दी। वह ऐसे व्यक्ति थे, जिनको किसी से बैर नहीं था। वह किसी की निंदा नहीं करते थे और न ही किसी को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। इसलिए हर कोई उनका दोस्त था और उनसे मिलनेवाला हर व्यक्ति उनसे एक आत्मीय रिश्ता जोड़ लेता था।  

अपने पत्रकारीय जीवन में हरि भाई ने सैकड़ों लोगों को पत्रकार बनाया, रोजगार दिला कर उन्हें संभाला और एक अभिभावक की तरह उनका मार्गदर्शन किया। वह ऐसे संपादक थे, जिन्होंने आज तक किसी को भी काम से नहीं निकाला। बालसुलभ सहजता, हर समय कुछ नया सीखने और करने की ललक और हर रिश्ते से अधिक मानवीय रिश्ते को माननेवाले हरि भाई ने जो रिक्तता पैदा की है, उसे भर पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव है। (लेखक आजाद सिपाही के स्थानीय संपादक हैं।)

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