एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अपने होश संभालने के बाद से दुनिया के और खासकर के भारत के जिस समाज को मैंने देखा-जाना-समझा और महसूस किया है, उसमें ज्यादातर स्त्रियों को अपने परिवार के लिए किसी अनवरत चलती हुई चक्की की तरह घूमता हुआ ही पाया है और मजा यह कि परिवार के किसी सदस्य को इसका कदापि भान तक भी नहीं होता।
यहां तक कि एक स्त्री भी दूसरी स्त्री की स्थिति को या उसकी मानसिकता को बिलकुल नहीं समझती या फिर समझ कर भी नासमझ बनी रहती है। कुछ भी हो मगर इस प्रकार एक स्त्री के द्वारा ही स्त्री की समस्याओं और दूसरी महत्वपूर्ण बातों को बहुत ही चतुरता पूर्वक बल्कि यूं कहें कि कुटिलता पूर्वक नजरअंदाज कर दिया जाता है, इस प्रकार जो सम्मान एक स्त्री को मिलना चाहिए अपने कुटुंब में उसपर सम्मान उसी परिवार की एक अन्य सदस्य स्त्री अथवा स्त्रियां एकदम से कैंची चला देती हैं।
मैं लगातार यह महसूस करता आया हूं कि घर में काम को लेकर होने वाले लड़ाइयां या किसी एक स्त्री के पक्ष में झुका हुआ माहौल एक दूसरी स्त्री को अक्सर ईर्ष्या भाव में डाल देता है और वह स्त्री अन्य सदस्यों के साथ मिलकर अपने ऊपर भारी पड़ती स्त्री की आलोचना करने लगती है या निंदा करने लगती है।
इसी प्रकार इसका उल्टा भी कई बार सही होता है की एक भारी पड़ती स्त्री या यूं कहें कि एक मजबूत स्त्री अपनी मजबूत स्थिति का भरपूर दुरुपयोग करती है और नाजायज फायदा उठाती है और यहां तक कि वह सामने वालों को नीचा तक दिखाती रहती है, बहुत सी स्त्रियां तो परपीड़क भी हो जातीं है, जो एक प्रकार का रोग है, किंतु जिसको कोई समझ नहीं पाता, बल्कि इसे उस स्त्री-विशेष की विशेषता समझता रहता है। इस प्रकार स्त्रियां अपने ही घर में अपने निंदक पैदा कर लेती हैं।
तो इस प्रकार की जो व्यवस्थाएं घर में स्वत: पैदा हो जाती हैं, उससे घर के पुरुष सदस्य अपने-आप यह समझने लगते हैं कि स्त्रियां तो होती ही ऐसी हैं, क्योंकि अपने-अपने पुरुषों से घर की अन्य स्त्री सदस्यों की चुगली हर रोज रात को एक स्त्री ही किया करती है और इस प्रकार एक घर में दुराव-वैमनस्य होते-होते एक स्थायी फूट का वातावरण तैयार हो जाता है, किंतु चूंकि पुरुष और स्त्री दोनों ने मिलकर ही यह वातावरण तैयार किया होता है इसलिए इस खाई को दूर करने का प्रयास कोई नहीं करता, तो फूट के कारणों पर तो जाने की बात ही बहुत दूर है।
इस प्रकार हम अपनी नासमझी की वजह से या फिर अपनी आंखें बंद करने की वजह से और अपने कच्चे कानों की वजह से हर बार कुछ ऐसी बातों पर विश्वास कर लेते हैं, जो हमारे घर में फूट डालती है। मजेदार बात यह है कि ज्यादातर मामलों में हम अपने परस्पर निकट के लोगों पर भरोसा नहीं करते बल्कि दूर वालों की बात पर भरोसा कर के निकट वालों पर अविश्वास करने लगते हैं। हालांकि यह जरुरी नहीं कि निकट वाला ही सही हो या गलत हो, लेकिन यह भी तो सही नहीं कि दूर वाला सही हो।
तो जीवन में हर जगह अपनी आंखें खुली रखना बहुत न केवल जरूरी होता है, बल्कि अनिवार्य होता है और हम सब इस अनिवार्य अनिवार्यता को जानते ही नहीं। तो फिर हम लगातार गलत सूत्रों पर भरोसा करते चले जाते हैं और अपने घर में अपने ही लोगों के स्वभाव को, यानि कि उनकी विशेषताओं और खामियों तक को नजरअंदाज करते हैं। हमें कम से कम यह तो मालूम ही होना चाहिए कि कौन कैसा है और किस हद तक जा सकता है?
मेरी समझ से स्त्रियों के प्रति सम्मान में कमी का एक बहुत बड़ा कारण स्त्रियां ही रही हैं, क्योंकि स्त्रियों ने दूसरी स्त्रियों को हमेशा प्रतिद्वंद्वी और यहां तक कि शत्रु की नजर से देखा है तथा तदनुरूप ही उनसे बर्ताव करती आयी हैं और इस प्रकार सदियों से पुरुष की नजरों में स्त्री को गिराती चली आ रही है और ऐसी स्त्रियों ने कुछेक तत्कालिक लाभ के लिए जाने या अनजाने स्त्री को एक जींस में परिणत कर दिया है।
हो सकता है मेरी सोच में बहुत से लोगों को आपत्ति लगे, लेकिन मैंने हरगिज-हरगिज लगभग हर घर में यही सब देखा है और रोज देख भी रहा हूं। तो एक बार दुराव की बात शुरू हो जाने पर वह दुराव दोनों ओर से बढ़ता ही चला जाता है, कोई उस दुराव को कम करने का प्रयास बस इसलिए नहीं करता क्योंकि अंतत: सब के सब कानों के कच्चे होते हैं और इस प्रकार वे बातें एक कान से दूसरे कान तक पहुंचती चली जाती हैं, जो सामने वाले ने कभी कही ही नहीं और तब सामान्य बातों के भी मनमाने अर्थ निकाल कर यहां तक कि प्रतिद्वंद्वी के मन के भीतर की भी बातों तक का भी अंदाजा लगा लिया जाता है आपस में शत्रुता पाले बैठे लोगों द्वारा।
फिर इसका इलाज क्या है? एक इलाज तो समझ में आता है कि स्त्री के द्वारा ही स्त्री के सम्मान को इस प्रकार ठेस नहीं पहुंचायी जानी चाहिए और दूसरा है कि पुरुषों को भी अपनी आंखें कम से कम इतनी तो खुली रखनी ही चाहिए कि वह सच को सच की तरह देख सकें और अपने घर में कार्य कर रही और रह रही स्त्रियों के काम को संपूर्णतया वाजिब नजरों से देख सकें और उस पर अपना उचित निर्णय ले सके जब तक यह दोनों बातें नहीं होंगी कोई भी किसी भी स्त्री को उसका सम्मान हरगिज-हरगिज नहीं दिला सकता। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की मिट्टी और यहां की संस्कृति की आत्मा अगर किसी एक पर्व में सजीव होती है तो वह है करमा पूजा। भादो मास की एकादशी को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल पूजा-अर्चना भर नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना, सामाजिक एकजुटता और प्रकृति के साथ अटूट रिश्ते का उत्सव है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं, अगर प्रकृति सुरक्षित है तो जीवन सुरक्षित है।
करमा पर्व की विशेषता यह है कि इसमें न तो किसी मूर्ति की आवश्यकता होती है और न ही किसी भव्य मंदिर की। यह सीधा प्रकृति की पूजा है। करम डाली, मिट्टी, बीज, पानी और सूरज की किरणें ही इसके देवता हैं। यही कारण है कि करमा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन-दर्शन है, जो कहता है प्रकृति ही ईश्वर है। झारखंडी परंपरा में करमा की शुरुआत तब से मानी जाती है जब इंसान ने खेती को अपना मुख्य जीवन-धर्म बनाया। यही कारण है कि करमा पर्व को कृषि और बीजों से जोड़कर देखा जाता है।
लोकमान्यता के अनुसार करमा और धरमा दो भाई थे। दोनों हमेशा साथ रहते और धर्म-कर्म में लीन रहते। लेकिन एक बार करमा ने क्रोध में आकर करम डाली का अपमान कर दिया। इसके बाद उसके जीवन में दुख-तकलीफ आने लगी। अंतत: एक वृद्धा ने उसे समझाया कि यह सब करम देव के अपमान का परिणाम है। तब करमा ने पुन: करम डाली की पूजा की, और उसके जीवन में खुशियां लौट आयीं। यह कथा हमें यही सिखाती है कि कर्म और धर्म अलग नहीं हो सकते। धर्म बिना कर्म अधूरा है और कर्म बिना धर्म का कोई मूल्य नहीं। यही करमा का सबसे बड़ा संदेश है।
करमा पर्व का माहौल बनते ही कुंवारी लड़कियां तो घर पर रहकर इस पर्व को बड़े आनंद के साथ मनाती हैं, लेकिन इस बीच नवविवाहिताओं को विशेष तौर पर अपने मायके की याद आने लगती है। इसर दौरान उन्हें आस होती है कि अब उनके भाई लियावन कराने अवश्य आयेंगे। भाई भी पूरे सम्मान के साथ अपनी बहनों को ससुराल से मायके लाते हैं। बहनों की प्रतीक्षा और भावनाएं करमा गीतों में झलकती हैं। बहनें राह देख देखकर गुनगुनाती है।
गीत का भाव बड़ा मार्मिक है- बहन अपने बड़े और मंझले भाइयों को आने से मना करती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे जल्दी विदाई नहीं करा पायेंगे। लेकिन छोटे भाई के आने पर वह आश्वस्त होती है कि वह तो छोटा है, वह रो-धोकर भी अपनी बहन की विदाई करा लेगा, फिर वो मायके जाकर करमा पूजा कर सकेंगी। हालांकि अपना मायके नहीं जा पाने की दशा में ससुराल में भी करमा पूजा करने की मान्यताएं है।
इस पर्व में सात या नौ दिन पूर्व करमइतिन लोग नहा-धोकर गांव से दूर नदी-नाला से बांस के डाला में बालू उठाकर लाती हैं। उस डाला में गेहूं, जौ, चना, उरद, धान, कुरथी, मूंग आदि बीज बो दिये जाते हैं। अब इस डाला को प्रतिदिन पानी से सींचने और रखरखाव की जिम्मेदारी कुछ मुख्य करमइतिनों को दी जाती है, जिन्हें डलइतिन कहा जाता है। यह जावा डाला गांव के पाहन (पुजारी) या मुख्य डलइतिन के घर रखा जाता है।
जावा डाली को रोज शाम को अखरा में लाकर सभी करमइतिन एकत्र होकर जावा डाली के चारों ओर गोल घेरा बनाकर गीत गाते हुए उसे जगाती हैं, जिसे जावा जागा गीत कहते हैं। दो-चार दिनों में जब बीज अंकुरित हो जाते हैं, तब उसमें हल्दी पानी का छिड़काव किया जाता है ताकि पौधा पीला और सुंदर दिखे। यही जावा फूल कहलाता है।
करम पूजा के दिन गांव के करमइतिनों के भाई या ग्राम के पाहन सुबह-सुबह नहा-धोकर जंगल जाते हैं और वहां से करम के एक ही वृक्ष की दो डालियां काटकर लाते हैं और ढोल-मांदर बजाते हुए, गीत-नृत्य करते हुए अखरा में गाड़ देते हैं जिसे करम गोसाई कहा जाता है। फिर उन करम डालियों को फूलों और जगमगाती लाइटों से सजाया जाता है। रात को सभी उपवास की हुई करमइतिन साड़ी पहनकर पूजा की थाली में सभी सामग्री सजाती हैं और घी का दिया जलाकर प्रार्थना करती हैं। फिर करमइतिनें अपने भाई के कान में जावा फूल खोंसती हैं और हाथ में धागा बांधती है।
यह संवाद करमा पर्व की आत्मा है, जो कर्म और धर्म को अविभाज्य बताता है। जिसके बदले में भाई अपनी बहनों को उपहार और आजीवन साथ निभाने का वचन देते हैं। इसलिए करमा पर्व को भाई-बहन का पर्व भी कहा जाता है। करम पर्व में युवतियां केवल अपने भाई की ही नहीं, बल्कि पिता की लंबी उम्र और घर की सुख-शांति की भी प्रार्थना करती हैं। यह लोकभावना इन खोरठा गीतों में झलकती है-
करमा को मनौती पर्व भी कहा जाता है। इस पर्व में वैसी विवाहिताएं जिनकी शादी हो चुकी है लेकिन संतान नहीं हुआ है, जिन्हें स्थानीय बोली में डंगुवा बेटी-छऊवा कहा जाता है। वे करमा पूजा के दिन अपनी थाली में एक पुष्ट, सुडौल खीरा रखती हैं और करम राजा से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें भी वैसा ही स्वस्थ और सुडौल बेटा मिले। वहीं, अविवाहित युवतियां जिनका कोई भाई नहीं होता है, वे करम राजा से सुंदर और स्नेही भाई की मनौती करती हैं, ताकि आने वाले समय में वे भी भाई की लंबी उम्र के लिए करमा पूजा कर सकें।
करमा पर्व बिना गीत-संगीत के अधूरा है। करमा गीतों में प्रकृति की सुंदरता, उसकी रचनात्मकता और मानव जीवन के उतार-चढ़ाव का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। जावा उठाने से लेकर करम डाली विसर्जन तक, हर चरण पर गीत गाए जाते हैं। जावा जगाने के गीत, करम काटने के गीत, फूल तोड़ने के गीत, विदाई गीत और विसर्जन गीत शामिल है।
विदाई के समय गाए जाने वाले खोरठा गीत अत्यंत मार्मिक होते हैं, जैसे-
इन दोनों गीतों में पूजा का भाव, विदाई की पीड़ा और पुनर्मिलन की आशा सब कुछ झलकती है। आज जबकि डीजे और आधुनिक साधन करमा पूजा का हिस्सा बनते जा रहे हैं, पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे ढोल, मांदर, बांसुरी, तीरियो और टुहीला धीरे-धीरे गुम होते जा रहे हैं। सामूहिक अखड़ा संस्कृति, जहां मालिक से लेकर मजदूर सब साथ नाचते-गाते थे, अब मंच और दर्शक की रेखा में बंटने लगी है। करमा हमें यही सिखाता है कि अगर अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपने वाद्य को नहीं बचाया तो हमारी पहचान खो जायेगी।
करमा पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। यह भाई-बहन के अटूट प्रेम, पिता-माता की सेवा, संतान-सुख की आशा और समाज की एकजुटता का उत्सव है। जावा का हर अंकुर हमें याद दिलाता है कि जीवन नये सृजन की प्रक्रिया है, और करमा राजा का हर गीत यह सिखाता है कि बिना प्रकृति के कोई भी जीवन संभव नहीं। आज जब पूरी दुनिया आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी जड़ों को भूल रही है, करमा पर्व हमें वापस हमारी मिट्टी, हमारे लोकगीत और हमारी सामूहिक संस्कृति से जोड़ता है। यही वजह है कि करमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा है। (लेखक देवेन्द्र कुमार नयन देवघर, झारखंड के निवासी हैं।)
एबीएन हेल्थ डेस्क। 39 साल के एक युवा कार्डियोलॉजिस्ट की अस्पताल में राउंड लेते समय ही अचानक हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी। न वे मोटे थे, न इलाज मिलने में देर हुई। सब कुछ सेकेंडों की दूरी पर था, फिर भी नहीं बच पाये। हाल ही में एक डॉक्टर की कैथलैब में ही मृत्यु हुई थी। डॉ साहब को मेरी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि...।
पर ऐसे में गोल्डन आवर वाली अवधारणा पर भी भरोसा डगमगाने लगता है। आधुनिक विशेषज्ञों ने कारण बताये हैं, जिसमें क्या हुआ इसका जबाब मिल भी जाता है, पर क्यों इसका मुझे नहीं मिला। मैं आयुर्वेद की दृष्टि से अगर देखता हूं तो असली जड़ कहीं और दिखती है। आचार्य चरक और आचार्य सुश्रुत दोनों एक बात कहते हैं।
पेशाब, मल, गैस, छींंक, डकार, उल्टी, जम्हाई, आंसू, भूख, प्यास, नींद, हांफ और वीर्य। इन्हें दबाने से शरीर का प्रवाह रुकता है और रोग बनते हैं। आज का जीवन देखिये। अस्पताल या दफ्तर में बैठे-बैठे लोग गैस रोकते हैं, पेशाब रोकते हैं, भूख और नींद को टालते हैं। यही धीरे-धीरे हृदय तक असर करता है। आप खुद सोचिये आप ने कब खोल के मन से हवा खोली है?
घर पर फिर भी संभव है, आफिस वाले क्या करें? जहां दिन भर कुर्सी पर बैठना है। आप खुद महसूस कीजिये जब आप हवा की वेग को रोकते हैं, तुरंत आपके शरीर में उसका असर दिखता है, अजीब सा अनकंफर्टेबल महसूस होता है। यहीं से शुरुआत होती है, उदावर्त नामक रोग की। आचार्य चरक ने साफ कहा है कि वायु का वेग रोकने से उदावर्त होता है। उदावर्त के लक्षण रोजमर्रा में महसूस होते हैं।
पेट में भारीपन, दर्द या ऐंठन। डकार उल्टी दिशा में आना। छाती में जकड़न और दबाव। गले में अटकाव, कभी सिर तक चढ़ जाना। बार-बार गैस रोकने के बाद ऊपर की ओर उसका फील होना। यह सब वही है जिसे आयुर्वेद ने उदावर्त कहा है। इसी स्थिति में अगर तनाव और रात्रि जागरण भी जुड़ जाये तो हृदय के लिए खतरा और बढ़ जाता है।
इसलिए इन अचानक हृदयाघातों के पीछे केवल ब्लॉकेज या कोलेस्ट्रॉल नहीं, बल्कि यह भी एक गहरी सच्चाई है। नैसर्गिक वेगों को रोकना, उदावर्त की स्थिति बनना और उस पर जागरण और तनाव। यही तीन बातें हृदय के असली शत्रु हैं। गोल्डन आवर तभी काम करेगा जब शरीर को पहले से स्वाभाविक चलने दिया जाये।
नोट : मेरी बात को किसी पैथी की तारीफ और किसी की बुराई की नजर से ना देखें। मैंने केवल अपनी समझ की बात लिखी है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जल ही जीवन है और मिट्टी हमारा अस्तित्व, हमारा आधार है। जल और मिट्टी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, कुएं सूख रहे हैं, नदियों की धाराएं कमजोर हो रही हैं और भूजल पाताल में समा रहा है, तब यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जल और मिट्टी की रक्षा करें। जब हमारे खेत हरे-भरे होंगे और किसान खुशहाल होंगे, तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत-2047 के संकल्प को साकार किया जा सकेगा, क्योंकि इस संकल्प का रास्ता हमारे गांवों की पगडंडियों, उपजाऊ मिट्टी और लहलहाती फसलों से होकर ही गुजरता है। आज बिगड़ते पर्यावरण के कई जगहों पर भूजल का स्तर हजार-डेढ़ हजार फीट नीचे चला गया है।
अगर हमारी उपजाऊ मिट्टी इसी तरह बहती रही और जमीन बंजर होती रही, तो हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसा होगा? इसी दूरदर्शी सोच और भविष्य की चिंता को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने एक बीड़ा उठाया है। प्रधानमंत्री मोदी ने हमेशा दूरदृष्टि से काम किया है। वे सिर्फ आज की नहीं, आने वाले 50-100 वर्षों की सोचते हैं। उनके नेतृत्व में भारत सरकार का भूमि संसाधन विभाग, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत वॉटरशेड विकास घटक को पूरे देश में लागू कर रहा है। लेकिन यह काम अकेले सरकार नहीं कर सकती। इस महायज्ञ में सरकार के साथ समाज को भी खड़ा होना पड़ेगा।
यह धरती को बचाने का अभियान है। पानी, माटी, धरती बचेगी तो भविष्य बचेगा। यह योजना विशेष रूप से उन क्षेत्रों में लागू की जा रही है जो सूखे और वर्षा पर निर्भर हैं और इन इलाकों में बसे हमारे किसान भाई-बहनों के जीवन में समृद्धि लाने का एक महाभियान है, जहाँ कभी पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करना पड़ता था।
कई लोग मुझसे पूछते हैं कि आखिर यह वाटरशेड योजना है क्या? मैं उन्हें सरल भाषा में बताता हूं कि यह केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि लोगों की अपनी, लोगों के लिए चलाई जाने वाली एक क्रांति है। इस योजना का मूलमंत्र है- खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में। इसके तहत हम सब मिलकर खेतों की मेड़ें मजबूत करते हैं, खेत में ही छोटे तालाब बनाते हैं, और छोटे-छोटे नालों पर चेक डैम जैसी जल- संरचनाएं खड़ी करते हैं।
इससे बारिश का पानी बहकर बेकार नहीं जाता, बल्कि धीरे-धीरे धरती की प्यास बुझाता है, जिससे भूजल का स्तर बढ़ता है और मिट्टी में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। इस योजना की सबसे बड़ी शक्ति इसकी जन-भागीदारी है। गांव के लोग खुद बैठकर यह तय करते हैं कि तालाब कहा खोदना है, मेड़ कहां बनानी है और पेड़ कहां लगाने हैं। भूमिहीन परिवारों और महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को भी मुर्गीपालन और मधुमक्खी पालन जैसे कामों से जोड़कर उनकी आमदनी बढ़ाने का काम किया जा रहा है। इस योजना के बहुत सुखद परिणाम मिल रहे हैं।
इसका सबसे बड़ा लाभ हमारे किसान भाई-बहनों को मिला है, जिनकी आमदनी में 8% से लेकर 70% तक की ठोस वृद्धि हुई है। यह इसलिए संभव हुआ है क्योंकि 2015 से अब तक, सरकार ने 20,000 करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च करके देशभर में 6,382 से अधिक परियोजनाएं चलाई हैं और लगभग 3 करोड़ हेक्टेयर भूमि को फिर से उपजाऊ बनाने का काम किया है।
मध्य प्रदेश के झाबुआ में, जहां कभी सूखा एक बड़ी समस्या थी, आज आदिवासी गांवों में पानी भरपूर है और मिट्टी की उर्वरक शक्ति भी बढ़ गई है। परियोजना क्षेत्र के 22 गाँवों में भूजल स्तर एक मीटर तक बढ़ गया है। इससे खेती में भी परिवर्तन आया है। यहीं के किसान भाई बताते हैं कि गांव में चेकडैम बनने से अब वे मक्के के साथ-साथ चने की फसल भी ले रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी 50,000 से 60,000 तक बढ़ गयी है। साथ ही झाबुआ की ही परवलिया पंचायत में 12 खेतों में बने खेत तालाबों से किसानों की आमदनी 1 लाख से 1.5 लाख प्रति हेक्टेयर तक बढ़ी है।
इस योजना के तहत 9 लाख से ज्यादा चेक डैम, रिसाव तालाब, खेत तालाब, जैसी वाटरशेड संरचनाएं बनी हैं। 5.6 करोड़ से ज्यादा श्रम दिवस उपलब्ध हुए हैं, जिससे ग्रामीण रोजगार में वृद्धि हुई है। वाटरशेड विकास परियोजनाओं के लागू होने से गांवों में उल्लेखनीय बदलाव आया है। जहां पहले पानी की कमी थी, उन परियोजना क्षेत्र में अब 1.5 लाख हेक्टेयर से ज्यादा नये इलाके में जल स्रोत फैले हैं, यानी 16% का इजाफा हुआ है। साथ ही अब किसान पारंपरिक फसलों के अलावा फलों और अन्य पेड़- पौधों की खेती भी करने लगे हैं, जिससे बागवानी और पेड़-पौधों की खेती का दायरा 12% बढ़कर 1.9 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है।
राजस्थान के बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी इलाके में, जहां पानी की कमी किसानों को पलायन पर मजबूर कर रही थी, आज अनार की खेती से हरियाली लौट आयी है। योजना के अंतर्गत 120 से अधिक किसानों को अनार के पौधे उपलब्ध कराए गये, जो वहां की बालू मिट्टी और सीमित पानी जैसी कठिन परिस्थितियों में भी आसानी से पनप जाते हैं। अनार की खेती ने न केवल आमदनी बढ़ायी, बल्कि बूड़ीवाड़ा गांव के मांगीलाल परांगी का कहना है कि उनके जैसे किसान अब अरंडी छोड़कर बागवानी की ओर बढ़ गये हैं।
त्रिपुरा के दाशी रियांग और बिमन रियांग जैसे किसान योजना की मदद से अनानास की बागवानी करके अपनी बंजर भूमि को फिर से उपजाऊ बना रहे हैं और अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। इस पूरी क्रांति को जन-जन तक पहुंचाने और इसे एक जन-आंदोलन बनाने के लिए हमने वॉटरशेड यात्रा भी निकाली। इस यात्रा के माध्यम से हमने देशभर में जल संरक्षण और भूमि संवर्धन के लिए एक जनजागरण अभियान चलाया।
हमने इस योजना में तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया है। भुवन जियोपोर्टल (सृष्टि) और दृष्टि मोबाइल ऐप जैसे डिजिटल उपकरणों से योजनाओं की प्रगति की सटीक निगरानी हो रही है। किसानों की मेहनत और हमारी योजनाओं की वजह से, देशभर के फसल क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई है। सैटेलाइट से मिले आंकड़े बताते हैं कि फसल क्षेत्र में लगभग 10 लाख हेक्टेयर (5% की वृद्धि) और जल स्रोतों के क्षेत्र में 1.5 लाख हेक्टेयर (16% की वृद्धि) का इजाफा हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि 8.4 लाख हेक्टेयर से ज्यादा बंजर जमीन अब फिर से खेती के योग्य बन चुकी है।
प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व में आज अमृतकाल में हम सब मिलकर भूमि संरक्षण की एक नई गाथा लिख रहे हैं। यह सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, यह हमारे किसानों की मेहनत और उनके बेहतर भविष्य की जीती-जागती कहानी है। जब हम पानी और मिट्टी को बचायेंगे, तभी हम अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर पायेंगे। इस संकल्प को मिलकर पूरा करें और किसानों को समृद्ध तथा भारत को विकसित बनाएं। प्रधानमंत्री मोदी जी का मानना है कि केवल सरकार नहीं, समाज की भागीदारी से ही यह अभियान सफल होगा।
उसी सोच के तहत वॉटरशेड यात्रा जैसी पहल से इस योजना को जन-जन तक पहुंचाया गया है और यह एक जनांदोलन बन चुका है। यह भारतीय किसानों की मेहनत और बदलते भविष्य की कहानी है। जब जल और मिट्टी सुरक्षित होंगी, तभी भारत सुरक्षित रहेगा। 2047 तक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब गांवों की धरती समृद्ध होगी और किसान खुशहाल होंगे। आइये, मिलकर जल और माटी के इस रक्षा संकल्प को आगे बढ़ाएं। (लेखक केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री है)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अर्थव्यवस्था को लेकर अलग-अलग रुख अपनाया जा रहा है और सत्ताधारी दल की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं इतनी ज्यादा हैं कि उनकी अनदेखी करनी संभव नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के आरंभ से ही यह स्पष्ट रहा है कि सरकार के लिए राजनीति अर्थव्यवस्था से ऊपर है। आर्थिक नीति अपनाते हुए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीयकरण किया, प्रतिबंधात्मक श्रम कानून बनाए और तथा ऐसे ही अन्य कानून पारित किये। उन्होंने भू-कानूनों को भी कड़ा किया। अर्थव्यवस्था आज तक राजनीति को दी गयी उस वरीयता की कीमत चुका रही है।
क्या इतिहास अपने आपको दोहरायेगा? बड़े बदलाव टुकड़ों में नहीं आते हैं और फिलहाल काफी कुछ छिटपुट तरीके से हो रहा है। यह सब उस नयी बहस का हिस्सा हो सकता है जिसमें राष्ट्रीय नागरिक पंजी द्वारा संभावित अशांति भी शामिल है। भाजपा चाहे जितनी दबदबे वाली पार्टी बन गयी हो, घरेलू राजनीतिक हालात दर्शाते हैं कि केंद्र और राज्य के स्तर पर तस्वीर एकदम विरोधाभासी है। भाजपा के लिए चुनौतियां लगातार बरकरार हैं। इसके परिणाम का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
पूर्वोत्तर में इनर लाइन जैसी परिवर्ती व्यवस्था अब स्थायी स्वरूप ले रही है और इसका विस्तार हो रहा है। इससे देश नये तरीके से बंट रहा है। असम में नये सिरे से समस्या शुरू हो गयी है जबकि कश्मीर में आम जनता लगातार पांचवें महीने तमाम प्रतिबंधों से गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो पश्चिम के उदार लोकतांत्रिक देशों ने जिन वजहों से अधिनायकवादी चीन पर भारत को तवज्जो दी थी और उसके साथ आपसी रिश्ते कायम किये उन पर भी अब सवालिया निशान लग गये हैं। अमेरिका और यूरोप में आलोचना की जा रही है जो आगे और बढ़ेगी।
पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में प्रतिक्रिया नजर भी आने लगी है। कमजोर भारतीय अर्थव्यवस्था के चलते चीन से मिल रही चुनौती का सामना करना मुश्किल होता जायेगा, क्योंकि उसने भारत की तरह अपनी गति नहीं खोयी है। दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था के नाते भारत आकर्षक बाजार बना रहेगा लेकिन उसने जो गति खो दी उसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर आयेगा।
आर्थिक कूटनीति के मामले में हालात उलट गये हैं जिससे हम अप्रभावित नहीं रह सकते। सन 2020 में अर्थव्यवस्था में कुछ हद तक सुधार की अपेक्षा की जा सकती है लेकिन तत्काल पहले जैसी तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करने की राह में बड़ी बाधाएं हैं। वित्तीय क्षेत्र की दिक्कतें कायम हैं और छोटे और मझोले उपक्रम संघर्षरत हैं। कृषि के मोर्चे पर दिक्कत है और निर्यातक मुद्रा नीति के कारण परेशानी में हैं।
वृहद आर्थिक मोर्चे पर बात करें तो राजकोषीय स्थिति बुरी है क्योंकि केंद्र अपने बिल तक चुकाने की स्थिति में नहीं है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)में कुछ बुनियादी समस्या हैं जो कर के मोर्चे पर भी दिक्कतदेह बनी हुई हैं। चुनाव पूर्व कर दरों में कमी ने हालात और खराब किए। मौद्रिक नीति की अपनी सीमाएं हैं और बहुत अधिक गुंजाइश नजर नहीं आ रही।
जीएसटी राजस्व में कमी के कारण सरकार की निजी बेहतरी की प्रतिबद्धताएं अब मुश्किल में हैं। इनमें चुनाव पूर्व किसानों को धन राशि देने का वादा भी शामिल है। परिवहन के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश से भी अपेक्षित प्रतिफल नहीं मिला जबकि बिजली क्षेत्र में अव्यवहार्यता बरकरार है। सरकार को इस पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज के समय में समाज का चेहरा लगातार बदल रहा है। तकनीक, मनोरंजन और आधुनिक जीवनशैली के बीच युवा पीढ़ी की आदतें और सोच भी बदल रही हैं। इन्हीं बदलावों के बीच धूम्रपान और शराब का प्रचलन तेजी से युवाओं के जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है। यह केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं रह गई है, बल्कि एक प्रकार से सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है। कॉलेज कैंपस, पार्टियों, कॉर्पोरेट जगत, यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी धूम्रपान और शराब को एक कूल या स्टाइलिश छवि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इस आभासी आकर्षण के पीछे छिपे खतरों और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
युवा अवस्था जीवन का वह दौर है, जब व्यक्ति अपनी पहचान खोज रहा होता है। इस दौर में मित्रों का प्रभाव, मीडिया का असर और फैशन का दबाव काफी हद तक व्यवहार को प्रभावित करता है। कई युवा केवल सामंजस्य बैठाने के लिए या दूसरों को प्रभावित करने के लिए धूम्रपान और शराब की शुरूआत कर देते हैं। धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है और जीवन भर उनके स्वास्थ्य, करियर और रिश्तों पर असर डालती है। धूम्रपान को अक्सर एक छोटे से शौक की तरह देखा जाता है।
शुरुआत में यह महज तनाव कम करने या समय बिताने का साधन लगता है। लेकिन तंबाकू में मौजूद निकोटीन इतनी तेजी से शरीर और दिमाग पर असर डालती है कि कुछ ही दिनों में व्यक्ति इसके बिना असहज महसूस करने लगता है। युवाओं के लिए सिगरेट हाथ में पकड़ना मानो आत्मविश्वास या परिपक्वता की निशानी बन जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि यह धीरे-धीरे शरीर के प्रत्येक अंग को क्षतिग्रस्त करने वाली आदत है। धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग, श्वसन संबंधी विकार और अनेक अन्य बीमारियों का कारण है।
इसके अलावा यह त्वचा की गुणवत्ता घटाता है, समय से पहले बुढ़ापा लाता है और प्रजनन क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसी तरह शराब का सेवन भी युवाओं के जीवन में मॉडर्न लाइफस्टाइल का प्रतीक बन चुका है। जन्मदिन, पार्टी, प्रमोशन या कोई भी खुशी का अवसर अक्सर शराब के बिना अधूरा माना जाने लगा है। युवाओं के लिए यह एक सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन गया है। लेकिन शराब शरीर और मन दोनों पर गंभीर दुष्प्रभाव डालती है। लंबे समय तक शराब का सेवन करने से लिवर सिरोसिस, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक और विभिन्न प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा असर पड़ता है अवसाद, चिंता और आक्रामक व्यवहार शराब की लत के कारण आम हो जाते हैं। कई बार यह लत इतनी गहरी हो जाती है कि व्यक्ति अपने रिश्तों, शिक्षा और करियर तक को दांव पर लगा देता है। धूम्रपान और शराब की संस्कृति केवल स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि समाज पर भी गहरा प्रभाव डालती है। सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण शराब के नशे में गाड़ी चलाना है। नशे की स्थिति में लिए गए निर्णय अक्सर गलत साबित होते हैं, जिससे न केवल व्यक्ति स्वयं बल्कि उसका परिवार और समाज भी प्रभावित होता है।
इसके अलावा, यह आदतें आर्थिक बोझ भी बढ़ाती हैं। एक औसत युवा हर महीने सिगरेट और शराब पर इतनी राशि खर्च कर देता है, जिससे उसकी पढ़ाई, करियर या भविष्य की योजनाओं में निवेश किया जा सकता था।मीडिया और विज्ञापनों का योगदान भी इस संस्कृति को बढ़ावा देने में अहम रहा है। फिल्मों में नायक को सिगरेट पीते या शराब पीते दिखाना मानो एक ग्लैमरस छवि प्रस्तुत करना है। सोशल मीडिया पर भी विभिन्न ब्रांड्स अपनी मार्केटिंग रणनीति में युवाओं को लक्ष्य बनाते हैं।
इस सबके बीच एक युवा यह मान बैठता है कि अगर वह धूम्रपान या शराब नहीं करता तो शायद वह समूह का हिस्सा नहीं बन पाएगा। यह मानसिक दबाव कई बार अधिक खतरनाक साबित होता है। हालांकि, यह भी सच है कि धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है। कई स्वास्थ्य संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं और शैक्षणिक संस्थानों ने इस दिशा में प्रयास शुरू किये हैं। तंबाकू और शराब से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। कुछ स्थानों पर तो युवाओं के लिए परामर्श केंद्र भी खोले गए हैं, जहां उन्हें स्वस्थ विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
योग, ध्यान, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों को अपनाकर तनाव कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में परिवार की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। अगर माता-पिता स्वयं स्वस्थ जीवनशैली अपनाते हैं और बच्चों के साथ खुलकर संवाद करते हैं तो युवाओं को धूम्रपान और शराब जैसी आदतों से दूर रखना आसान हो सकता है। शिक्षा प्रणाली में भी जीवन कौशल आधारित पाठ्यक्रमों की आवश्यकता है, जिससे बच्चों को शुरूआत से ही यह समझाया जा सके कि असली आत्मविश्वास और आधुनिकता नशे में नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली में है।
धूम्रपान और शराब का आकर्षण भले ही क्षणिक सुख प्रदान करे, लेकिन यह शरीर और मन पर स्थायी क्षति पहुंचाता है। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि उनकी वास्तविक पहचान, उनकी प्रतिभा और उनके विचारों में है, न कि एक सिगरेट या शराब के गिलास में। यदि हम समाज को स्वस्थ, सशक्त और प्रगतिशील बनाना चाहते हैं तो युवाओं को इस लत से दूर रखना ही होगा। अंतत: यह कहा जा सकता है कि धूम्रपान और शराब संस्कृति एक सामाजिक चुनौती बन चुकी है, जो युवाओं के स्वास्थ्य, परिवार और भविष्य को गहराई से प्रभावित कर रही है।
इस चुनौती का सामना करने के लिए व्यक्तिगत जागरूकता, पारिवारिक सहयोग, सामाजिक प्रयास और सरकारी नीतियां सभी का योगदान आवश्यक है। जब तक युवा स्वयं यह संकल्प नहीं लेंगे कि वे अपने जीवन को स्वस्थ विकल्पों से भरेंगे, तब तक इस आदत से छुटकारा पाना मुश्किल होगा। लेकिन आशा की किरण यह है कि धीरे-धीरे बदलती सोच और जागरूकता से एक ऐसा समाज संभव है, जहां युवा अपनी ऊर्जा और क्षमता को सिगरेट और शराब में नहीं, बल्कि सृजन, नवाचार और प्रगति में लगायेंगे।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोकसभा में 20 अगस्त 2025 को जब इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आनलाइन खेल संवर्धन और विनियमन विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया तब इस दिशा में यह भी स्पष्ट हो गया कि यह केवल एक विधायी औपचारिकता नहीं थी, डिजिटल युग की नई चुनौतियों के प्रति सरकार के दृष्टिकोण में आए बदलाव का इसे आप पुख्ता प्रमाण मान सकते हैं।
इस विधेयक में रियल मनी गेमिंग और उसके विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने, उल्लंघन करने वालों के लिए जेल और जुमार्ने जैसी कठोर सजा का प्रावधान करने और साथ ही ई-स्पोर्ट्स, शैक्षणिक तथा सामाजिक खेलों को बढ़ावा देने का प्रावधान करता है। विधेयक में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि इस कदम का उद्देश्य समाज, विशेषकर युवाओं और कमजोर वर्गों को डिजिटल व्यसन के दुष्प्रभावों से बचाना है।
भारत में एक तरह से देखा जाए तो आनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री पिछले एक दशक में अप्रत्याशित रफ्तार से बढ़ी है। आज इसका आकार 32,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और अनुमान था कि 2029 तक यह उद्योग 80,000 करोड़ रुपये के स्तर को छू लेगा। लेकिन इस वृद्धि की असल नींव रियल मनी गेमिंग यानी पैसों के लालच और जुए जैसे खेलों पर आधारित रही। आंकड़े बताते हैं कि इंडस्ट्री का 86 प्रतिशत राजस्व इन्हीं खेलों से आता रहा है। यह वही खेल हैं, जिनमें किशोर और युवा अपनी मेहनत की कमाई, यहां तक कि उधार लिए पैसे भी गंवाते रहे।
परिवार टूटे, सामाजिक रिश्ते बिगड़े, अवसाद और आत्महत्या के मामले बढ़े। अब तक हजार से कई अधिक की संख्या में लोग गेम के चक्?कर में मौत को गले लगा चुके हैं। ऐसे में सवभाविक है कि देश भर में सरकार का यह कदम ऐसे हालात में न केवल उचित है बल्कि यह समय की माँग भी है। लेकिन इसके साथ ही जिम्मेदारीपूर्ण यह मांग भी उठना स्वाभाविक है कि यदि सरकार डिजिटल व्यसन की इस समस्या को आॅनलाइन गेमिंग के संदर्भ में गंभीरता से देख सकती है तो क्या वही तर्क सोशल मीडिया पर लागू नहीं होना चाहिए?
इससे जुड़े तथ्य दुनिया के सामने आज मौजूद है, फिर अनुभव भी यही बताता है कि सोशल मीडिया का असर कहीं अधिक व्यापक और कहीं अधिक गहरा है। यह न केवल आर्थिक नुकसान का कारण बनता है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक ताने-बाने और लोकतांत्रिक विमर्श के लिए भी गंभीर खतरा है। आस्ट्रेलिया का हालिया निर्णय इस संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है। वहां संघीय सरकार ने ऐलान किया है कि 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब, स्नैपचैट, रेडिट और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर किसी भी रूप में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं होगी।
यह कानून आने वाले चार महीनों में लागू होगा और सोशल मीडिया कंपनियों को 10 दिसंबर तक सभी नाबालिग खातों को हटाना होगा। केवल इतना ही नहीं, इन कंपनियों को आयु सत्यापन की ऐसी प्रणाली लागू करनी होगी जिससे भविष्य में नाबालिग नए खाते न बना सकें। यह प्रतिबंध इतना कठोर है कि माता-पिता की अनुमति से भी बच्चों को इन प्लेटफॉर्म्स तक पहुंचने की छूट नहीं दी जायेगी।
आस्ट्रेलिया में यह निर्णय एकाएक नहीं लिया गया है, सोशल मीडिया ने बच्चों और किशोरों को जिस तरह की लत में जकड़ा है, उसने मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को कहीं अधिक बढ़ा दिया है। आत्महत्या के मामलों में वृद्धि, अवसाद और चिंता जैसी बीमारियों का फैलाव और नींद के गंभीर संकट अब विश्व स्तर पर दर्ज किए जा रहे हैं। स्वाभाविक है आस्ट्रेलिया में यही सब कुछ बड़े स्तर पर देखा गया, जिसके बाद आस्ट्रेलियाई सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची कि बच्चों को वास्तविक जीवन और डिजिटल जीवन के बीच संतुलन बनाना सिखाना होगा और इसके लिए कठोर कानून ही कारगर उपाय है। भारत के संदर्भ में स्थिति और भी गंभीर है।
यहां युवाओं की संख्या सबसे अधिक है और इंटरनेट तक पहुंच अब गांव-गांव तक हो चुकी है। रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय किशोर प्रतिदिन औसतन चार से पांच घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं। यह समय उनके अध्ययन, परिवार के साथ बिताए जाने वाले पलों और वास्तविक सामाजिक संबंधों से छीन लिया जाता है। जिस दौर में शिक्षा और कौशल विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए, उसी समय उनका मन टिकटॉक, इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसी सतही चीजों में उलझा रहता है। सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव केवल समय की बबार्दी तक सीमित नहीं हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अनेक मानसिक स्वास्थ्य अध्ययनों ने स्पष्ट किया है कि इन प्लेटफॉर्म्स का अत्यधिक प्रयोग अवसाद, चिंता और नींद की कमी का कारण बन रहा है। किशोरावस्था में यह मानसिक असंतुलन और भी खतरनाक रूप ले लेता है। भारत जैसे देश में, जहां मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है, वहां यह समस्या एक राष्ट्रीय संकट से किसी भी स्तर पर कम नहीं मानना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया बच्चों के लिए आर्थिक शोषण का कारण भी बन रहा है। इन-ऐप परचेज और वर्चुअल गिफ्टिंग जैसी व्यवस्थाओं ने नाबालिगों को पैसे खर्च करने की आदत डाल दी है। कई बार यह खर्च उनकी आर्थिक क्षमता से कहीं अधिक होता है, जिससे परिवारों पर बोझ पड़ता है। सांस्कृतिक दृष्टि से भी यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। हिंसा, अश्लीलता और असंस्कारी कंटेंट ने किशोरों के मन-मस्तिष्क को गहराई से प्रभावित किया है और पारंपरिक भारतीय मूल्यों से उन्हें दूर कर दिया है।
यदि भारत ने आनलाइन गेमिंग पर सख्ती दिखाते हुए रियल मनी गेमिंग को पूरी तरह प्रतिबंधित किया है तो अब समय है कि वही दृष्टिकोण सोशल मीडिया पर भी अपनाया जाए। इसके लिए सरकार को सबसे पहले आयु-आधारित प्रतिबंध लागू करना चाहिए। 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण रोक लगायी जाये और 16 से 18 वर्ष तक के किशोरों के लिए प्रतिदिन अधिकतम एक घंटे की सीमा तय की जाये। कंपनियों पर यह जिम्मेदारी डाली जाये कि वे आयु सत्यापन और स्क्रीन टाइम नियंत्रण सुनिश्चित करें।
साथ ही, हानिकारक सामग्री के प्रसार पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। एल्गोरिद्म आधारित डोपामीन ट्रैप यानी बार-बार दिखाए जाने वाले शॉर्ट वीडियो, रील्स और ट्रेंड्स को सीमित किया जाना चाहिए क्योंकि ये युवाओं को लगातार स्क्रीन से चिपकाये रखते हैं। इस दिशा में यूरोप और अमेरिका में भी बहस चल रही है, लेकिन भारत को आस्ट्रेलिया की तरह ठोस कदम उठाने होंगे।
शिक्षा और जागरूकता का पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और सोशल मीडिया व्यसन पर अध्याय जोड़े जाने चाहिए ताकि बच्चों को छोटी उम्र से ही इन खतरों की समझ हो। साथ ही युवाओं को विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। कला, खेल, संगीत, हस्तशिल्प और सामुदायिक गतिविधियां इसका अच्छा विकल्प हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा सुरक्षित भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को प्रोत्साहित करना चाहिए जो ज्ञान, संवाद और रचनात्मकता पर आधारित हों।
यदि भारत समय रहते इस दिशा में कदम उठाता है तो इसके दूरगामी लाभ होंगे। युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होगा, वे पढ़ाई और करियर पर अधिक ध्यान देंगे, परिवार और समाज में वास्तविक संबंध मजबूत होंगे और राष्ट्र की सांस्कृतिक दिशा सुरक्षित रहेगी। फेक न्यूज और नफरत की राजनीति का असर भी कम होगा और लोकतंत्र अधिक स्वस्थ बनेगा।
यहां कहना यही है कि जैसे भारत ने आनलाइन गेमिंग पर सख्ती दिखाकर यह संकेत दिया है कि वह युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है। अब आवश्यकता है कि यही दृष्टिकोण सोशल मीडिया पर भी अपनाया जाये। युवा पीढ़ी राष्ट्र की रीढ़ है। यदि उसे डिजिटल गुलामी, व्यसन और मानसिक असंतुलन की ओर धकेल दिया गया तो यह केवल परिवारों का नहीं, पूरे राष्ट्र का संकट होगा।
इसलिए भारत सरकार को आस्ट्रेलिया के उदाहरण से प्रेरणा लेकर, अपने संदर्भ के अनुसार, कठोर और स्पष्ट नीति तुरंत लागू करनी चाहिए। यही समय की मांग है और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है। (लेखिका, मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्य हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सब कुछ स्थायी नहीं होता। विचारधाराएं भी अक्सर परिस्थिति के अनुसार बदल जाती हैं, रिश्ते भी बदल जाते हैं और सहयोगी भी। जनता कभी-कभी सोचती है कि दलों के बीच दीवारें बहुत ऊंची होंगी, लेकिन अचानक किसी घटना से वही दीवारें गिर जाती हैं और जिनके बीच खाई दिखाई देती थी, वे हाथ मिलाते नजर आते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति तो इस संदर्भ में और भी दिलचस्प है, क्योंकि यह राज्य भारतीय लोकतंत्र का प्रयोगशाला रहा है, जहां जाति, वर्ग, अपराध, धर्म और नेतृत्व सभी एक साथ राजनीति के ताने-बाने को बुनते हैं।
ऐसी ही एक ताजा घटना हाल ही में देखने को मिली जब समाजवादी पार्टी से निष्कासित विधायक पूजा पाल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके लखनऊ स्थित सरकारी आवास पर मुलाकात की। यह एक साधारण औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि एक ऐसा प्रसंग था जिसने राजनीति की जमीन को हिला दिया और सत्ता तथा विपक्ष दोनों में हलचल मचा दी। पूजा पाल का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया नहीं है। वे लंबे समय से प्रयागराज की राजनीति से जुड़ी रही हैं और उनका राजनीतिक सफर कई तरह की त्रासदियों और संघर्षों से होकर गुजरा है।
राजनीति में उनका प्रवेश व्यक्तिगत जीवन की पीड़ा के साथ हुआ। पति रंजन पाल की हत्या के बाद उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। इस चुनाव के पीछे न तो कोई महत्त्वाकांक्षा थी और न ही सत्ता की कोई स्वप्निल तस्वीर, बल्कि यह पीड़ा थी जिसने उन्हें राजनीतिक मंच पर ला खड़ा किया। समाजवादी पार्टी ने उन्हें अवसर दिया और उन्होंने पार्टी के सहारे अपने क्षेत्र में पैठ बनाई। वे धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनीं और विधानसभा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन राजनीति का मैदान बहुत कठोर होता है।
यहाँ केवल जनाधार ही काफी नहीं होता, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, नेतृत्व की नीतियों से सामंजस्य और पार्टी लाइन पर चलना भी अनिवार्य होता है। इसी कसौटी पर पूजा पाल फंस गयीं। विधानसभा सत्र में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस नीति की प्रशंसा की जिसके अंतर्गत अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि योगी सरकार के कारण ही अतीक अहमद जैसे अपराधियों को कानून के शिकंजे में लाया जा सका। यह वक्तव्य विधानसभा की कार्यवाही में दर्ज तो हुआ ही, मीडिया के जरिए व्यापक चर्चा में भी आ गया।
यही वह क्षण था जब समाजवादी पार्टी की नेतृत्व टीम असहज हो गयी। एक विधायक, जो विपक्षी पार्टी से चुनी गयी हो, अगर सत्ता पक्ष की नीति की सार्वजनिक सराहना करे तो यह पार्टी की केंद्रीय रणनीति के खिलाफ माना जाता है। अखिलेश यादव ने इसे अनुशासनहीनता के रूप में देखा और तत्काल प्रभाव से पूजा पाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इस निर्णय ने सबको चौंका दिया। जनता को यह महसूस हुआ कि सपा अब उस लोकतांत्रिक परंपरा को जगह नहीं देना चाहती जहाँ विधायक अपनी अंतरात्मा की आवाज भी बुलंद कर सके।
यहाँ पर एक गहरी विडंबना छुपी है। समाजवादी पार्टी का इतिहास बताता है कि यह पार्टी हमेशा हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज रही है। मुलायम सिंह यादव के समय में यह पार्टी पिछड़े वर्गों, किसानों और अल्पसंख्यकों की आकांक्षाओं को आवाज देने के लिए पहचानी जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे संगठन सत्ता के इर्द-गिर्द केंद्रित होता गया, आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होता गया। पार्टी में अब वैचारिक बहस की जगह कम होती जा रही है।
पूजा पाल के निष्कासन ने इस विडंबना को उजागर कर दिया कि पार्टी अब अपने विधायकों की स्वतंत्र राय को जगह देने में सक्षम नहीं रही। दूसरी तरफ भाजपा की राजनीति को देखिये। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया है जिसमें अपराध और माफियागिरी के खिलाफ कठोर कार्रवाई को जनता के बीच सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जनता की स्मृति में दशकों तक अपराध-राजनीति का गठजोड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश में माफिया डॉन और अपराधी लंबे समय तक चुनाव जीतते रहे, सत्ता के गलियारों में पैठ बनाते रहे और प्रशासन को चुनौती देते रहे। अतीक अहमद जैसे नाम तो मानो इस स्याह दौर के प्रतीक बन गए। योगी आदित्यनाथ ने जब इस पूरी परंपरा को तोड़ने का अभियान शुरू किया और माफिया राज को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाये, तो जनता को लगा कि सरकार पहली बार गंभीरता से अपराधमुक्त शासन का सपना साकार कर रही है।
पूजा पाल ने जब मुख्यमंत्री की इसी नीति की सराहना की, तो वस्तुत: उन्होंने जनता की भावना को ही अभिव्यक्त किया। लेकिन उनकी यह अभिव्यक्ति उनकी पार्टी को नागवार गुजरी। भाजपा ने इस अवसर को तुरंत पहचाना। निष्कासन के अगले ही दिन पूजा पाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँचीं। यह मुलाकात महज संयोग नहीं थी, बल्कि राजनीति की दूरगामी रणनीति का हिस्सा थी। इस भेंट से भाजपा को यह कहने का अवसर मिला कि उनकी नीतियाँ इतनी स्पष्ट और प्रभावी हैं कि विपक्ष के नेता भी उन्हें नकार नहीं सकते।
भाजपा इस घटना को अपने पक्ष में भुनाने में देर नहीं करेगी। आने वाले चुनावों में भाजपा यह तर्क रख सकती है कि जब विपक्ष के विधायक भी सरकार की अपराध-विरोधी नीतियों को सही मान रहे हैं, तो जनता को अब संदेह करने की आवश्यकता ही नहीं है। इससे भाजपा के राजनीतिक नैरेटिव को और बल मिलेगा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी इस घटना से कमजोर होती दिख रही है। पार्टी का संदेश यह जा रहा है कि वह असहमति बर्दाश्त नहीं कर सकती।
जनता के बीच यह छवि बन सकती है कि सपा अब लोकतांत्रिक संवाद की बजाय केवल नेतृत्व की हाँ में हाँ मिलाने वाली पार्टी बन गई है। इस पूरी घटना में महिला नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य की राजनीति लंबे समय तक पुरुष नेताओं और दबंग छवियों पर केंद्रित रही। महिलाओं की भागीदारी सीमित रही और जब रही भी तो अक्सर उन्हें किसी राजनीतिक वंश या पुरुष नेता की छाया में देखा गया। पूजा पाल ने इस धारणा को चुनौती दी।
उन्होंने विधानसभा में स्वतंत्र रूप से अपनी राय रखी और मुख्यमंत्री की नीति का खुलेआम समर्थन किया। इस साहसिक कदम ने उन्हें अन्य महिला नेताओं से अलग पहचान दी। भाजपा के लिए यह भी एक अवसर है, क्योंकि पार्टी लंबे समय से महिला सशक्तिकरण को अपने एजेंडे में प्रमुखता देती रही है। अगर पूजा पाल भाजपा के साथ जुड़ती हैं, तो यह भाजपा को महिला मतदाताओं के बीच एक नया संदेश देने का मौका देगा।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराध और सत्ता का गठजोड़ इतना गहरा रहा है कि वह राजनीति की छवि को हमेशा कलंकित करता रहा है। जनता बार-बार यही चाहती रही है कि अपराधियों का राजनीति से सफाया हो। योगी आदित्यनाथ ने इस दिशा में कदम उठाकर एक नई परंपरा शुरू की है। पूजा पाल ने जब इस परंपरा की प्रशंसा की, तो यह जनता की भावना का प्रतिनिधित्व था। लेकिन विडंबना यह रही कि उनकी पार्टी ने इस परंपरा की बजाय अनुशासन के चश्मे से देखा और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।
भविष्य की राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह घटना निर्णायक साबित हो सकती है। भाजपा इसे अपने पक्ष में भुनाने में सफल होगी।
भाजपा का यह कहना आसान होगा कि हमारे शासन की ताकत इतनी है कि विपक्षी भी इसकी सराहना करने से खुद को रोक नहीं पाते। दूसरी ओर, सपा के लिए यह संकट का संकेत है। पार्टी पहले ही लगातार चुनावी पराजयों से जूझ रही है। यदि उसके विधायक और नेता धीरे-धीरे पार्टी से अलग होने लगते हैं, तो जनता में यह संदेश जाएगा कि पार्टी अब विकल्प के रूप में मजबूत नहीं रही। पाल का भविष्य चाहे जिस दिशा में जाए वे भाजपा में शामिल हों या स्वतंत्र राजनीतिक राह चुनें इतना निश्चित है कि उनका यह कदम उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर चुका है।
अब वे केवल एक विधायक नहीं रहीं, बल्कि वे उस बहस का केंद्र बन चुकी हैं जिसमें यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या राजनीतिक दल अपने नेताओं को स्वतंत्र राय रखने देंगे या नहीं, क्या राजनीति अब भी विचारों और नीतियों की प्रतिस्पर्धा का मंच है या केवल नेतृत्व के आदेशों का पालन करने की मशीन? पूजा पाल का निष्कासन और योगी से मुलाकात लोकतंत्र की उस गहरी सच्चाई को उजागर करता है कि राजनीति में असहमति को दबाने के बजाय उसका स्वागत करना चाहिए। क्योंकि असहमति ही लोकतंत्र की आत्मा है।
यदि असहमति को जगह नहीं मिलेगी तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा।समाजवादी पार्टी ने इस असहमति को दबाकर अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है, जबकि भाजपा ने इस असहमति को अवसर बनाकर अपनी राजनीति को और मजबूत कर लिया है। जनता सब देख रही है। जनता यह भी देख रही है कि एक महिला विधायक ने अपने साहस से पार्टी लाइन को तोड़ा और जनता की भावना को व्यक्त किया। जनता यह भी देख रही है कि सत्ता पक्ष ने इस अवसर को अपने पक्ष में कैसे बदल लिया। और जनता यह भी देख रही है कि विपक्षी पार्टी ने अपने ही विधायक को निकालकर अपनी कमजोरी उजागर कर दी।
आने वाले चुनावों में जनता इन सब बातों का हिसाब करेगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह घटना आने वाले वर्षों तक याद रखी जाएगी। क्योंकि यह केवल एक विधायक का निष्कासन और मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह लोकतंत्र, असहमति, अपराध-राजनीति और महिला नेतृत्व इन सबका संगम था। राजनीति में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ होती हैं जो एक नया विमर्श खड़ा करती हैं। पूजा पाल का यह प्रसंग भी वैसा ही है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर राजनीति किस दिशा में जा रही है और लोकतंत्र में असली ताकत किसके पास है नेताओं के पास, जनता के पास, या पार्टी के अनुशासन के पास?
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