एबीएन डेस्क, रांची। योग भारतीय जीवन पद्धति का एक महत्वपूर्ण अंग है भारतीय विज्ञान के अनुसार योग की उत्पत्ति हजारों वर्ष पहले हुई। सिंधु घाटी सभ्यता को योग विद्या का प्रारंभिक उद्गम माना जाता है। यह भारत की प्रथम शहरी सभ्यता है। योग शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में हुआ। ऋग्वेद एक प्राचीन भारतीय पाठ संग्रह है जो चार वेदों में सबसे ज्यादा प्रचलित है। आज के समय में अगर योग की बात करें तो योग का अर्थ आसन प्राणायम करना है। लेकिन अगर ग्रंथों में उल्लेखित योग की परिभाषा या अर्थ को देखते हैं, तो किसी भी परिभाषा में आसन प्राणायम का जिक्र नहीं है। योग शब्द संस्कृत के युज धातु से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना अर्थात किसी वस्तु से अपने को जोड़ना। अंग्रेजी का योक शब्द भी उसी धातु से बना है। योग का आध्यात्मिक अर्थ है, वह साधन जिसके द्वारा योगी को जीवात्मा और परमात्मा के साथ ज्ञान पूर्वक संयोग होता है या संयोग कराने की प्रक्रिया बतलाई है। योग का अर्थ सभी आचार्यों ने आत्मदर्शन तथा ब्रह्म साक्षातपूर्वक स्वरूप स्थिति एवं मोक्ष की प्राप्ति से किया है। वेदांतिक शास्त्रों में भी आत्मदर्शन तथा ब्रह्म साक्षात्कार होने की बात कही है। गणित शास्त्र में योग शब्द का अर्थ है जोड़ होता है। रसायन शास्त्र में योग दो विभिन्न पदार्थों को अपना अपना स्वरूप खोकर एक अद्भुत पदार्थ में परिणत होने का ज्ञान भी योग है उदाहरण के लिए एक अनुपात नाइट्रोजन, तीन अनुपात हाइड्रोजन के योग के फलस्वरूप दो अनुपात अमोनिया प्राप्त होता है। महर्षि व्यास ने योग को समाधि बतलाया है, जिसका भाव यह है कि जीवात्मा इस उपलब्ध समाधि के द्वारा सच्चिदानंद (सत + चित + आनंद) स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करें। पुरुष प्रकृत्योतियोगेपि योग इत्यभिधीयते- सांख्य शास्त्र अर्थात प्रकृति पुरुष पृथ्कतव स्थापित कर अर्थात् दोनों का वियोग करके पुरुष के स्वरूप में स्थिर हो जाना योग है। कैवल्योपनिषद मे कहा है, श्रद्धा भक्तियोगावदेहि (1/2) अर्थात् श्रद्धा भक्ति और ध्यान के द्वारा आत्मा को जानना योग है। अग्नि पुराण ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रैक चित्तता। चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनी: पर: ।। अग्निपुराण 183/ 1-2 अर्थात ज्ञान का प्रकाश पड़ने पर चित्त ब्रह्म मे एकाग्र हो जाता है, जिससे जीव का ब्रह्म मिलन हो जाता है। ब्रह्म में चित्त की एकाग्रता ही योग है। स्कंद पुराण जीवात्मा परमार्थोऽयमविभाग: परमतप: स: एव परोयोग: समासा कथितस्तव। अर्थात जीवात्मा और परमात्मा का अलग अलग होना ही दुख का कारण है और इसका अपृथक तक भाव ही योग है (एकत्व की स्थिति ही योग हैं)। लिंग पुराण: योग निरोधो वृत्तेस्तु चितस्य द्विज सत्तमा।अर्थात चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाना उसे पूर्ण समाप्त कर देना योग है । उसी से परमगति अर्थात ब्रह्म की प्राप्ति होती है विष्णुपुराण के अनुसार - योग: संयोग इत्युक्त: जीवात्म परमात्मने, अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है। कठोषनिषद् में योग के विषय में कहा गया है : यदा पंचावतिष्ठनते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहु: परमां गतिम।। तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभावाप्ययौ।। कठो.2/3/10-11, अर्थात जब पांचों ज्ञानेन्द्रियां मन के साथ स्थिर हो जाती है और मन निश्चल बुद्धि के साथ आ मिलता है. उस अवस्था को ‘परमगति’ कहते है। इंद्रियों की स्थिर धारणा ही योग है। जिसकी इंद्रियां स्थिर हो जाती हैं, अर्थात् प्रमाद हीन हो जाता है। उसमें शुभ संस्कारो की उत्पत्ति और अशुभ संस्कारो का नाश होने लगता है। यही अवस्था योग है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से आध्यात्मिक चर्चा के दौरान योग को कई तरह से परिभाषित किया। योगस्थ: कुरू कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय:। सिद्ध्यसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। गीता ( 2/48 ) अर्थात योग में स्थित हुआ कर्म फल को त्याग कर और सिद्धि असिद्धि में सम होकर तू कर्मों को कर, यह समता ही योग है।जब किसी कार्य में अशक्ति होती है तभी उसके भले या बुरे फल का प्रभाव हमारे दिल दिमाग पर पड़ता है और उसके अनुसार ही संस्कार बन जाता है ।फिर वही संस्कार पाप और पुण्य के रूप में कर्म के परिपक्व अवस्था में उदय होते है। योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है। योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:ह्ण यो.सू.1/2, अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है। चित्त का तत्पर अंतरण से है। बाहयकरण ज्ञानेन्द्र जब विषयों को ग्रहण करती है, मन ज्ञान को आत्मा तक पहुँचता है। आत्मा साक्षी भाव से देखता है बुद्धि अहंकार विषय का निश्चय करके उसमें कर्तव्य भाव लाते है। इस संपूर्ण क्रिया से चित्त में जो प्रतिबिंब बनता है। वही वृत्ति कहलाता है। यह चित्त का परिणाम है। अत: विषयाकार उसमें आकर प्रतिबिंबित होता है अर्थात चित्त का विषयाकार हो जाता है। महर्षि कहते हैं कि योग के आठ अंगों के अनुष्ठान करने से अर्थात उनको आचरण में लाने से चित्त के मल का अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है। उस समय योगी के ज्ञान का प्रकाश विवेकख्याति तक हो जाता है, अर्थात उसे आत्मा का स्वरूप, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियों से सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखाई देता है। योग के आठ अंगों को अष्टांग योग की संज्ञा दी गई है। इसका उल्लेख महर्षि पतंजलि योग सूत्र के साधन पाद के 29 श्लोक में किया है उन्होंने कहा है यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, ये योग के आठ अंग है और हर अंग का अपना महत्व है। निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि योग केवल आसन प्राणायम ही नहीं है उससे भी अधिक है आसन प्राणायम तो मात्र उसकी सीढ़ियां हैं।
एबीएन डेस्क, रांची। कोरोना महामारी की चुनौतियों से इस वक्त भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व लड़ रहा है। वैश्विक महामारी के चलते दुनियाभर के देशों में रोजगार सृजन एक प्रमुख समस्या उभरकर सामने आई है। इस समस्या को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपने भाषणों में आत्मनिर्भर भारत बनाने की बात कर रहे हैं। जिसका उद्देश्य कोरोना महामारी से लड़ना नहीं बल्कि भविष्य के भारत का निर्माण करना है। कई दशकों तक भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए बंद थी। लेकिन आर्थिक संकटों से जुझ रहे भारत ने अपने बाजार को 1991 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए दुनिया के लिए खोल दिया। ऐसे वक्त में जब विदेशी कंपनियों ने भारत को अपने आगोश में ले रखा है। उस स्थिति में स्वदेशी वस्तुओं के जरिए बाहरी कंपनियों के उत्पादों को टक्कर देना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। भारत को आत्मनिर्भर बनाने का मतलब दुनिया से नाता तोड़ने जैसा नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं उसे निभाना आसान नहीं होगा। मौजूदा समय में अमेरिका और चीन हमारे जीवन से जुड़ी वस्तुओं के जरिए सीधा दखल दे रहे हैं। इसके अलावा सरकार को स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण के लिए निमार्ताओं को आर्थिक सहायता भी मुहैया करानी होगी, जिससे विश्व व्यपार संगठन के साथ भारत का सीधा मुकाबला हो। मार्च 2020 से ही विश्व की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएं परिणामी स्वास्थ्य व आर्थिक क्षेत्र में हो रही गिरावट के चलते तनाव में हैं। इसके परिणामस्वरूप कई उद्योग और संगठन या तो बंद हो गए हैं या न्यूनतम क्षमता पर काम कर रहे हैं और इसका प्रभाव अब वैश्विक स्तर पर दिखाई दे रहा है। एनआईपी के रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया में जनसंख्या के मामले में दूसरे, अर्थव्यवस्था में 5वें और इंफ्रास्ट्राक्चर के मामले में 70वें स्थान पर है। जो एक तरह से चिंताजनक स्थिति है। इस रिपोर्ट में अलग-अलग क्षेत्रों की प्राथमिकताओं और उनकी चुनौतियों की पहचान की गई तथा इसके समाधान के लिये एक रूप रेखा तैयार की गई है। देश में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के क्षेत्र में तीव्र सुधार हेतु विभिन्न क्षेत्रों से 7000 परियोजनाओं को चिन्हित किया गया है। पिछले कई वर्षों में यह देखा गया है कि अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं बहुत ही सहायक रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 2001 में प्रारंभ किये गए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरूआत के दौरान भी देश की आर्थिक स्थिति बहुत ठीक नहीं थी। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं के लंबित होने के कारण अधिकांश बैंक ऐसी परियोजनाओं के लिये ऋण उपलब्ध कराने से बचती नजर आ रही हैं। वर्तमान परिस्थिति में अधिक लागत वाली बड़ी परियोजनाओं को शुरू करना और उनके लिए धन जुटाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है। अधिकांश बड़ी परियोजनाओं को पूरा होने में समय लग जाता है। जिससे सरकारों के बदलने और सरकार की नीतियों में बदलाव के कारण निजी क्षेत्रों की भागीदारी पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। महामारी के कारण बेहाल अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए केद्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम में ऐसी योजनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए जिसे कम समय में पूरा किया जा सके। ताकि इन परियोजनाओं से अर्थव्यवस्था को आसानी से पटरी पर लाने में मदद मिल सके। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं में आर्थिक संकटो का सामना करना पड़ता है। जिससे के निजी क्षेत्र के कंपनियों को तय समय सीमा के अंदर काम को पूरा करना कठिन होता है। सरकार को विकास वित्तीय संस्थान की स्थापना के लिए कदम उठाना चाहिए जिससे ऐसी परियोजनाओं के लिए निर्धारित ब्याज दर पर 20-25 वर्षों के लिए ऋण उपलब्ध करा सके। ऐसे संस्थानों के स्थापना से परियोजना से जुड़ी कंपनियों को बैंकों के दरवाजे को खटखटाना नहीं पड़ेगा और एनपीए की समस्या से निजात मिलेगा। दिल्ली मेट्रो जैसी बड़ी परियोजनाओं को इस लिए शुरू किया जा सका था क्योंकि इनके लिए जापान से लंबी अवधि का ऋण उपलब्ध कराया गया था। गौरतलब है कि आम बजट 2021 में सरकार की ओर से भारत की आर्थिक विकास दर स्थिर रखने के लिए लंबे समय तक चलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर विशेष बल दे रही है। इस योजना के साथ सरकार ने विकास वित्तीय संस्थान (डीएफआइ) की स्थापना पर पुन: विचार करने का प्रस्ताव किया है। आजादी के बाद से देश के विकास को तेज गति देने के लिए डीएफआई 1948 में भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आइएफएसआइ) की स्थापना के साथ प्रारंभ हुआ था। लेकिन 1970-80 के दशक के दौरान डीएफआई में राजनीति हस्तक्षेप के कारण लाभ पहुंचाने के लिए प्रभाव वाले निजी क्षेत्र की कंपनियों को ऋण दिया गया। परिणति के रुप में संस्थान एनपीए हो गया। मामला सामने आने के बाद 1991 में नरसिंहम समिति की सिफारिश के बाद डीएफआई को भंग कर दिया गया और तत्कालीन सक्रिय विकास वित्तीय संस्थानों को वाणिज्य बैंको में बदल दिया गया था। कोरोना के कारण उपजी हुई परिस्थितियों में आत्मनिर्भर भारत अभियान में तमाम चुनौतियों होने के बावजूद मजबूती के लिए औद्योगिक निवेश की आवश्यकता है। जिससे रोजगार सृजन के साथ वैश्विक ताकत के साथ देश को उभारने में मददगार साबित हो। मनरेगा जैसी रोजगार परक योजनाओं में पारदर्शिता लाने, 100 दिन के कार्य दिवस और मजदूरी दर को बढ़ाने पर सरकार को बल देना चाहिए। जिससे गांव के लोगों को असानी से गांव में ही रोजगार मिल सके। भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद कई क्षेत्रों में अपनी उत्पाद क्षमता में वृद्धि की है। परंतु अन्य कई अन्य कई क्षेत्रों में भी जहां बेहतर संभावनाएं हैं। भारतीय कंपनियां उत्पादन से हटकर व्यापार में अधिक सक्रिय रही हैं। पूर्व में भारत को स्टील उत्पाद, सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार में आत्मनिर्भर के लिए किये गए प्रयास में काफी सफलताएं मिली हैं।
एबीएन डेस्क, रांची। भारत कोविड-19 से बचाव के लिए आंशिक एवं पूर्ण टीकाकरण के असर पर तेजी से मिल रहे तथ्यों एवं आंकड़ों का का अध्ययन कर रहा है। इस बीच, मई के मध्य से इस बात पर भी चर्चा चल रही है कि कोविशील्ड टीके की खुराक के बीच चार से आठ हफ्तों का अंतर दोबारा बहाल किया जाए या नहीं। टीकाकरण कार्यक्रम पर गठित राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजी) के कोविड-19 कार्यशील समूह के चेयरमैन एन के अरोड़ा ने यह बात कही। यह चर्चा उन खबरों के बाद जोर पकड़ रही है जिनमें कहा गया है कि ब्रिटेन में एस्ट्राजेनेका की एक खुराक कोविड-19 के प्रति केवल 33 प्रतिशत तक असरदार रहा है, जबकि दो खुराक के बाद 60 प्रतिशत तक सुरक्षा मिल जाती है। भारत ने जब कोविशील्ड की दो खुराक के बीच अंतर बढ़ाकर 12 से 16 हफ्ते कर दिया था तब उसके दो-तीन दिन बाद ये आंकड़े सामने आए थे। डीडी न्यूज पर बातचीत में अरोड़ा ने कहा कि कोविड-19 और इसे बचाव के लिए टीकाकरण गतिशील प्रक्रिया है और अगर दो खुराक के बीच अंतराल कम करने से अधिक कारगर नतीजे मिलते हैं तो तकनीकी समिति इस विषय पर अवश्य विचार करेगी। उन्होंने कहा, कल अगर हमें यह बताया जाता है कि पहली और दूसरी खुराक के बीच अंतर कम रखना अधिक कारगर है, भले ही इसका लाभ 5 से 10 प्रतिशत ही अधिक क्यों न हो, समिति तथ्यों पर विचार करने के बाद इस पर निर्णय जरूर लेगी। हां, अगर मौजूदा अंतर ठीक लगा तो हम इसे जारी रखेंगे। दो खुराक के बीच अंतराल बढ़ाने के सरकार के निर्णय पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इस पर स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर पारदर्शी तरीके से दो यह निर्णय (अंतराल बढ़ाने का) लिया गया था। मंत्रालय ने कहा कि इस निर्णय पर तकनीकी विशेषज्ञों के बीच कोई मतभेद नहीं था। स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्द्धन ने कहा, आंकड़ों का अवलोकन करने के लिए भारत में मजबूत ढांचा उपलब्ध है। यह अफसोस की बात है कि ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय पर राजनीति हो रही है। अरोड़ा ने सीएमसी वेलूर और पीजीआई चंडीगढ़ के अध्ययन का भी हवाला दिया जिनमें कहा गया था कि एक खुराक के साथ टीकाकरण से संक्रमण का खतरा चार प्रतिशत और दो खुराक के साथ करीब पांच प्रतिशत रहता है। उन्होंने कहा, मोटे तौर पर बहुत अंतर नहीं है। टीकाकरण कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं पर विभिन्न स्रोतों से जानकारियां जुटाई जाएंगी और उनके अध्ययन के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाएगा। कोविशील्ड की दो खुराक के बीच अंतर 6-8 हफ्तों से बढ़ाकर 12-16 हफ्ते करने के भारत के निर्णय को पब्लिक हेल्थ इंगलैंड के अध्ययन से भी बल मिला है। इस अध्ययन के नतीजे अप्रैल के अंतिम सप्ताह में सामने आए थे। इस अध्ययन के अनुसार दो खुराक में 12 हफ्तों का अंतर रखने से टीका 65 से 88 प्रतिशत तक असरदार रहता है। वैज्ञानिकों के अनुसार दो खुराक के बीच इतना अंतर रखने की बदौलत ही ब्रिटेन कोविड-19 के अल्फा स्वरूप के फैलने पर अंकुश लगा पाया था। अरोड़ा ने कहा, हमें यह भी लगा कि अंतर अधिक रखना एक अच्छी सोच है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि दो खुराक के बीच अंतर अधिक रखने से एडिनोवेक्टर टीके अधिक असरदार साबित होते हैं। इससे लोगों को भी आसानी होती है क्योंकि सभी लोगों के लिए ठीक 12 हफ्तों के अंतर पर आना संभव भी नहीं होता। कनाडा, श्रीलंका और कुछ दूसरे देश एस्ट्राजेनेका के टीके की खुराक के बीच 12-16 हफ्तों का अंतर रख रहे हैं। पहले चार हफ्तों का अंतराल रखने के निर्णय पर अरोड़ा ने कहा कि वह संक्षिप्त परीक्षण के आंकड़ों पर आधारित था। उन्होंने कहा, हमें लगा कि अंतर चार हफ्तों से बढ़ाकर आठ हफ्ते करना चाहिए क्योंकि अध्ययनों में पता चला था कि चार हफ्तों का अंतर रखने से टीका 57 प्रतिशत असरदार रहता है जबकि अंतर आठ हफ्ते करने पर यह 60 प्रतिशत तक कारगर होता है। भारत ने दो खुराक के बीच समय अंतराल बढ़ाने से पहले ब्रिटेन से आंकड़े आने तक इंतजार करने का निर्णय किया था। सरकार ने कहा है कि खुराक के बीच अंतर बढ़ाने की कोविड-19 कार्यशील समूह की सिफारिश पर एनटीएजीआई स्टैंडिग टेक्निकल सब-कमिटी की 13 मई को हुई 31 बैठक में चर्चा हुई थी। जब दो खुराक के बीच समय अंतराल बढ़ाने के समय यह भी निर्णय लिया गया था कि टीकाकरण कार्यक्रम के असर पर नजर रखने के लिए एक व्यवस्था भी तैयार की जाए। मंत्रालय ने कहा कि इस निर्णय पर तकनीकी विशेषज्ञों के बीच कोई मतभेद नहीं था। स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्द्धन ने कहा, आंकड़ों का अवलोकन करने के लिए भारत में मजबूत ढांचा उपलब्ध है। यह अफसोस की बात है कि ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय पर राजनीति हो रही है। इस व्यवस्था के जरिये न केवल टीकाकरण कार्यक्रम के प्रभाव पर नजर रखी जा सकेगी, बल्कि टीके के प्रकार और दो खुराक के बीच अंतर रखने के असर का भी अध्ययन हो सकेगा। इससे यह भी पता चल पाएगा कि जब कोई आंशिक या पूरी खुराक लेता है तो किस तरह के नतीजे मिलते हैं। कोविड-19 और इसे बचाव के लिए टीकाकरण गतिशील प्रक्रिया है और अगर दो खुराक के बीच अंतराल कम करने से अधिक कारगर नतीजे मिलते हैं तो तकनीकी समिति इस विषय पर अवश्य विचार करेगी। उन्होंने कहा, कल अगर हमें यह बताया जाता है कि पहली और दूसरी खुराक के बीच अंतर कम रखना अधिक कारगर है, भले ही इसका लाभ 5 से 10 प्रतिशत ही अधिक क्यों न हो, भारत में ऐसी व्यवस्था बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अब तक 17 से 18 लोगों को केवल एक खुराक दी गई है। चार करोड़ लोगों को दो खुराक लगाई जा चुकी है।
एबीएन डेस्क, रांची। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रभारी रहे नेता जितिन प्रसाद के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने पर न तो कांग्रेस विचलित दिखी और न ही उसमें कोई बेचैनी देखने को मिली। तमिलनाडु के एक कांग्रेस सांसद कहते हैं, वह लगातार तीन चुनाव हारे। अंतिम चुनाव में तो उनकी जमानत तक जब्त हो गई। इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपा। उनका बाहर जाना बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन उन्होंने कहा कि पार्टी के चिंतित होने की दूसरी बड़ी वजह है। वह पूछते हैं, मुकुल रॉय भाजपा से तृणमूल कांग्रेस में एक चुंबकीय शक्ति की वजह से लौटे। वह चुंबक हैं ममता बनर्जी। हमारा चुंबक कहां है? लगभग इसी समय पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव होना था (इसकी तय मियाद 30 जून तक थी)। कोविड-19 संकट के बीच यह कवायद अनियतकाल के लिए टाल दी गई और कांग्रेस कार्य समिति ने भी प्रक्रिया रोकने पर मुहर लगा दी। नेतृत्व परिवर्तन चाहने वाले कांग्रेस के 23 नेताओं के समूह की मुख्य मांग अब तक लंबित पड़ी है। समूह में शामिल एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, हमें एक निर्वाचित कांग्रेस कार्य समिति की तत्काल जरूरत है, न कि मौजूदा की तरह नामित समिति की। हमने कभी अध्यक्ष को बदलने की बात नहीं की, हम केवल एक पूर्णकालिक नेतृत्व चाहते हैं जो दिखाई दे। यही कारण है कि पार्टी मनमाने निर्णयों की शिकार है और जवाबदेही पूरी तरह अनुपस्थित है। उदाहरण के लिए पार्टी सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में भारी हार के बावजूद किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया। अधीर रंजन चौधरी अभी भी पीसीसी प्रमुख और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने हुए हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस की हार की एक वजह यह भी थी कि प्रचार अभियान में शीर्ष नेतृत्व अनुपस्थित था। उन्होंने कहा, दो रैलियों के बाद राहुल गांधीजी ने पश्चिम बंगाल आना बंद कर दिया क्योंकि कोविड के कारण हालात बिगड़ रहे थे। दूसरी ओर पार्टी नेता और केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रमेश चेन्निथला ने वीडी सतीशन को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद शिकायत की कि उन्हें पीठ पीछे पद से हटा दिया गया और शमिंर्दा किया गया। हालिया चुनाव के बाद विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की तादाद कम हुई है। परंतु चेन्निथला पीसीसी प्रमुख नहीं थे, वह केवल नेता प्रतिपक्ष थे। उन्हें एक कद्दावर और प्रभावशाली कांग्रेस नेता माना जाता है जिसे कांग्रेस की राजनीति के मौजूदा दौर में अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मेन चांडी का भी समर्थन हासिल है। चांडी ने नेता प्रतिपक्ष बने रहने के उनके दावे का समर्थन किया था। पार्टी पर्यवेक्षकों को इसमें राहुल गांधी के सहयोगी केसी वेणुगोपाल का हाथ नजर आता है जो स्वयं केरल से ताल्लुक रखते हैं। ठीक एक वर्ष पहले राजस्थान के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया था और वह लगभग भाजपा में जाने ही वाले थे। यदि ऐसा होता तो गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का गिरना तय था। हालात तब संभले जब उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी चिंताओं को दूर किया जाएगा और उनके समर्थकों को मंत्रिपरिषद में जगह दी जाएगी। 10 महीने बाद अब पायलट दिल्ली में हैं और पार्टी से कह रहे हैं कि उनसे किए गए वादे निभाए जाएं। गहलोत मंत्रिमंडल में नौ जगह खाली हैं और पायलट उनमें से ज्यादातर मांग रहे हैं। जबकि खबरों के अनुसार गहलोत ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कहा है कि वह स्वतंत्र विधायकों और उन अन्य लोगों की अनदेखी नहीं कर सकते जिन्होंने गत वर्ष पायलट की बगावत के समय उनका साथ दिया था। दूसरे शब्दों में कहें तो जुलाई 2020 का घटनाक्रम दोहराया जा सकता है। गहलोत को लगता है कि पार्टी के बाहर के लोग उनके प्रति पार्टी के लोगों से अधिक वफादार हैं। पायलट और उनके समर्थक इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे। कांग्रेस की राजस्थान इकाई के प्रमुख गोविंद सिंह डोटासरा ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, पायलट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी में कोई समस्या नहीं है। पार्टी के राजस्थान प्रभारी अजय माकन ने कहा है कि प्रदेश में जल्दी ही मंत्रिमंडल परिवर्तन होगा। परंतु हाल ही में एक सप्ताह से दिल्ली में डेरा डाले पायलट कहते हैं, 10 महीने बीत चुके हैं। मुझे यही कहा गया कि कदम उठाए जाएंगे लेकिन अब आधा कार्यकाल तो बीत चुका है और मुद्दे जस के तस हैं। बहुत खेद की बात है कि ढेर सारे पार्टी कार्यकर्ता जिन्होंने काम किया और जनादेश दिलाने में मदद की उनमें से अधिकांश की सुनवाई नहीं हो रही है। पंजाब का किस्सा भी ऐसा ही है। नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे नाराज नेता नवजोत सिंह सिद्धू के क्षेत्र अमृतसर में रातोरात ऐसे पोस्टर लग गए जिनमें उनकी मांग को खारिज करते हुए लिखा है: पंजाब दा इक ही कैप्टन यानी पंजाब का एक ही कैप्टन है। इन पोस्टर में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का जिक्र करते हुए लिखा है: हैशटैग कैप्टन फॉर 2022। इस बीच सिंह के प्रभाव वाले पटियाला में सिद्धू समर्थकों के पोस्टर नजर आए जिन पर लिखा है: सारा पंजाब सिद्धू दे नाल यानी सारा पंजाब सिद्धू के साथ और किसाना दी आवाज मांगदा है पंजाब गुरु दी बेअदबी दा हिसाब यानी किसानों की आवाज पंजाब गुरु की बेअदबी का हिसाब मांगता है। आलाकमान द्वारा नियुक्त राज्य सभा के नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के नेतृत्च वाली समिति जिसमें वरिष्ठ नेता जेपी अग्रवाल और पंजाब के प्रभारी महासचिव हरीश रावत शामिल हैं, वह अब तक दिक्कतों को दूर नहीं कर सकी है और न ही उसने रिपोर्ट सार्वजनिक की है। पंजाब में अगले वर्ष फरवरी/मार्च में चुनाव होने हैं। जी 23 के एक नेता कहते हैं, यह हालत उन राज्यों में है जहां हम सत्ता में हैं या मजबूत हैं। हमें सोचना होगा कि हम कहां जा रहे हैं।
एबीएन डेस्क, रांची। हमने जल को अमृत माना नदियों को भगवान का दर्जा दिया। पानी की महत्ता स्वीकार की। यानी हमें हर वह काम करना होगा जो करने की जरूरत है। वर्षा-जल की हरेक बूंद को जमा कर पानी की उपलब्धता बढ़ानी है, इसका इस्तेमाल इतने कारगर ढंग से करना है कि वर्षा-जल की हरेक बूंद का इस्तेमाल हमारे भोजन या फ्लश होने वाले पानी में हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस्तेमाल पानी की हरेक बूंद का पुनर्चक्रण हो और प्रदूषण से वह खराब न हो। हम यह बात पहले से जानते हैं और अमल में भी लाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में इतना ही काफी नहीं होगा। हमें ये सारे काम कहीं अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर अलग ढंग से करने होंगे। हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का ताल्लुक गर्मी और कम-ज्यादा बारिश से है। इन दोनों का जल चक्र से सीधा सह-संबंध है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए पानी एवं उसके प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। हमें पता है कि हर नया साल इतिहास का सर्वाधिक गरम साल बनता जा रहा है और पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता जा रहा है। भारत में ओडिशा के कुछ हिस्सों में तापमान फरवरी की शुरूआत में ही 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था। उत्तर भारतीय राज्य बढ़ती गर्मी एवं सामान्य से अधिक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब ला नीना के साल में हो रहा है। ला नीना प्रशांत महासागर की वे जल धाराएं हैं जो दुनिया का तापमान कम करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। लेकिन भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक ताप वृद्धि ने ला नीना के इस शीतकारी प्रभाव को कम कर दिया है। बढ़ती हुई गर्मी का जल सुरक्षा के लिहाज से कई मायने हैं। पहला, इसका मतलब है कि जल इकाइयों से अधिक वाष्पीकरण होगा। यानी हमें न सिर्फ लाखों जल निकायों में पानी जमा करने पर ध्यान देने की जरूरत है बल्कि वाष्पन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भी योजना बनानी होगी। एक विकल्प भूमिगत जल भंडारण यानी कुओं पर काम करने का है। भारत लंबे वक्त से भूमिगत जल प्रणालियों के प्रबंधन को कम तवज्जो देता रहा है क्योंकि सिंचाई विभाग की समूची अफसरशाही ही नहरों एवं अन्य सतही जल प्रणालियों पर आधारित है। लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं पानी की भारी किल्लत के इस दौर में इसे बदलने की जरूरत होगी। हमें तालाबों, पोखरों एवं नहरों से होने वाले नुकसान की भरपाई के तरीके तलाशने होंगे। ऐसा नहीं है कि वाष्पीकरण से पहले नुकसान नहीं होता था लेकिन तापमान बढ?े के साथ इसकी दर बहुत ज्यादा हो गई है। हमें योजना बनाने और अधिक काम करने की जरूरत है। दूसरा, बढ़ती गर्मी का मतलब है कि मिट्टी में नमी कम होती जाएगी जिससे जमीन में धूल की मात्रा बढ़ जाएगी और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जाएगी। भारत जैसे देश में जहां भोजन का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा-सिंचित इलाकों में ही पैदा होता है, वहां पर मिट्टी की नमी कम होने से भूमि अपरदन तेज होगा और धूल का बनना भी बढ़ जाएगा। जल प्रबंधन को वनस्पति नियोजन के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा ताकि मिट्टी में पानी को रोके रखने की क्षमता बेहतर हो, अधिक देर तक चलने वाली तीव्र गर्मी के दौर में भी। तीसरा, साफ है कि गर्मी बढ़ने से पानी का इस्तेमाल बढ़ जाएगा क्योंकि पीने एवं सिंचाई के साथ ही जंगलों या इमारतों में लगी आग बुझाने के लिए भी ज्यादा पानी की दरकार होगी। हम दुनिया के कई हिस्सों एवं भारत में भी जंगलों में भीषण आग लगने के डरावने दृश्य देख चुके हैं। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, यह सिलसिला भी तेज होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन से पानी की मांग बढ़ेगी लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम पानी के साथ अपशिष्ट जल को भी बरबाद न करें। सच यह है कि अत्यधिक बारिश होने की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। हम बारिश के एक बाढ़ के तौर पर आने की भी अपेक्षा करें। इस तरह बाढ़ों का एक चक्र पूरा होने के बाद सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो। भारत में पहले से ही साल में बारिश कम दिन होती है। साल भर में औसतन सिर्फ 100 घंटे की ही बारिश होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश वाले दिनों की संख्या और कम करेगा। वैसे भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ जाएगी। इसका जल प्रबंधन की हमारी योजनाओं पर बड़ा असर होगा। हमें बाढ़ प्रबंधन पर अधिक शिद्दत से गौर करने की जरूरत है, नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही बाढ़ के पानी को भूमिगत एवं सतहीय जलभंडार निकायों-कुओं एवं तालाबों में जमा किया जा सके। लेकिन हमें वर्षाजल को इकट्ठा करने के बारे में अलग तरह से योजना बनाने की जरूरत है। फिलहाल मनरेगा के तहत लाखों की संख्या में बन रहे तालाब एवं पोखर सामान्य बारिश के हिसाब से डिजाइन हैं। लेकिन अब भारी बारिश की बात आम होने के साथ ही ये जल भंडार संरचनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि वे लंबे समय तक लबालब रहें। मूल बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पानी की हर बूंद बचानी होगी, चाहे बारिश का पानी हो या बाढ़ का पानी। हमें पानी एवं उसके प्रबंधन को लेकर पहले जुनूनी होना था लेकिन अब तो सेहत एवं दौलत के आधार पानी को लेकर हमें संकल्पित एवं सुविचारित रवैया अपनाना होगा। यह अपने भविष्य को बनाने- बिगाड़ने की बात है।
एबीएन डेस्क, रांची। संकट काल में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है। जब कोरोना महामारी के दूसरे लहर से पूरा देश संकटग्रस्त है ऐेसे समय में चिकित्सकों से लेकर सारे मेडिकल स्टाफ के समर्पण और उनके दिन रात के प्रयास की सराहना हुयी। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के अलावा एक और तबके ने पिछले दो महिनों में इस त्रासदी में करोड़ो लोगों की मदद की और खुद अपनी जान देकर लोगों की जान बचायी। ये तबका उन पत्रकारों का था जो भयावह परिस्थिति में भी कमजोर ,वंचितों और लाचार लोगों की मदद किसी न किसी रूप में करते रहा। मीडिया पर यह आरोप तो लगते हैं कि इन्होंने चरम संक्रमण के वक्त इस तरह से कोरोना के भयावहता को परोसा कि लोगों में भय हताशा का संचार हुआ, पर इसके इतर एक दूसरा पक्ष भी है कि फिल्ड रिपोर्टरों के प्रयास उनके कवरेज के चलते त्वरित सरकारी मदद आवश्यक अस्पतालों तक पहुंचायी जा सकी। एक अनुभवी पत्रकार सिर्फ सतही खबरों का संदेशवाहक नहीं होता बल्कि खामियों के खिलाफ उसकी निर्भिकता और मुखरता बढ जाती है, उसकी बातें सुनी जाती है। बहुतों की नजर में यह रसूखदार होना लगता है, पर कोराना संकट में इस कथित रसूख का एक धवल पक्ष दिखा। मैने देखा कि कई कमजोर और लाचार लोगों के लिये अस्पताल में बेड, आॅक्सीजन, वेंटिलेटर, दवा तक की उपलब्धता पत्रकारों की मुखरता के कारण ही हुयी। पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डाल कर हताश निराश लोगों को चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करवायी। यहां तक कि कुछ निजि अस्पतालों ने बीमार संक्रमित लोगों से लाखो रुपए इलाज के नाम पर ले लिये। पत्रकारों को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया और इन निजी अस्पतालों को पैसे वापस तक करने पड़े। जिन कुछेक अस्पतालों में आॅक्सीजन सिलिंडर से लेकर, दवाओं की कालाबाजारी और जमाखोरी हो रही थी उसे भी इन्होंने उजागर किया और प्रशासन को इस पर नकेल कसनी पड़ी। मैंने देखा कि रांची में परेशान कोरोना मरीजों के परिजन पत्रकारों को ही मदद की उम्मीद में फोन लगा रहे थे। एक नजर में यह पहुंच पैरवी सी हरकत लग सकती है। दूसरा पक्ष है कि पत्रकारों से इलाज में मदद के लिये आस लगाने वालों में ज्यादतर निरीह और आम हताश लोग ही थे और प्रेस लॉ पत्रकारों को अलग से कोई कानूनी शक्ति नहीं देता। यह सद्प्रयास पत्रकारों पत्रकारों की पेशागत मददगार फितरत का नतीजा रहा। इन सबके बीच सबसे भी दुखद कि सिर्फ झारखंड में ही तीस से ज्यादा पत्रकारों को कोरोना ने हमसे छीन लिया। सोंचिये ये पत्रकार चाहते तो हम आप की तरह घर में छुपे रह कर अपनी जान भी बचा सकते थे। लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया। दिल्ली के टीवी चैनल के प्रसिद्ध पत्रकार रोहित सरदाना से लेकर रांची प्रेस क्लब के सुनील सिंह सहित झारखंड में ही दर्जनों युवा पत्रकारों का पत्रकारिता जगत से चला जाना बहुत पीड़ादायी है। इसकी भरपाई कहीं से भी संभव नहीं है, पर इससे भी दुखद है कि पत्रकारों के इस योगदान को अनदेखा किया गया। कुछेक राज्यों में पत्रकारों को कोरोना वॉरियर बता कर उनकी आर्थिक मदद की घोषणा की गयी, । मीडिया पर सैकड़ो आरोप भी लगते हैं, पर यह हकीकत है कि आज भी आम जन सच्चाई के लिये, दबाये जा रहे तथ्यों और वाकयों को जानने के लिये, घोर संकट में अपनी बात को उचित मंच पर पहुंचाने के लिये पत्रकारों पर ही भरोसा रहता है। मैने पत्रकारिता के छात्रों को अपने विभाग में देखा है कि जैसे-जैसे पुराने होते जाते हैं उनकी सोच व्यापक होने लगती है। अवश्य ही इस पेशे में कुछ ऐसा है जो फितरतन पत्रकारों को वंचितो और आम लोगों की आवाज बना देती है। अपने कार्य में खुद कई तरह के तनाव झेलने वाले, आरोपों से हलकान और अक्सर आर्थिक संकट के पीड़ा व्यथा को चुपचाप सहने वाले पत्रकार कोरोना संकट में भी वंचितों और जरूरतमंदों के मददगार बने, शहीद भी हुये, पर अफसोस उनके कार्यों को कमतर करके आंका गया। आलोचना का एक सिद्धांत है कि सदैव मुखर की ही आलोचना होती है। आज मीडिया में श्रेष्ठ का ही चयन किया जाएगा उसे ही सुना जाएगा और समझा जाएगा। आम लोगों के मंच पर पत्रकारों की सूचनाधर्मिता अन्य प्रोफेशन से अलग है। इस कोरोना काल में हर एक मौत के साथ बचें जीवन की पूरी धारदार और प्रमाणिक सूचना देकर जीवन बचाने का काम किया। चाहे आॅक्सीजन की कमी की बात हो या वैक्सीन की कठिनाई की आज शासन-प्रशासन को सजग करने का काम मीडिया ही करता है और उसके माध्यम होते हैं हमारे देश के सजग पत्रकार जो हर व्यक्ति को अब इन पर विश्वास करने को प्रेरित कर रहा है। अबतक सैकड़ों पत्रकारों की जान कोविड महामारी के कारण जा चुकी है? स्विट्जरलैंड की मीडिया अधिकार और सुरक्षा से जुड़ी संस्थाय प्रेस एम्बलम कैम्पेन (पीएसी) ने कोरोना वायरस के चलते पत्रकारों की हुई मौत पर दुख जताते हुए एक बयान जारी किया है और बताया है कि दुनिया भर में हजार से ज्यादा पत्रकार कोरोना वायरस का शिकार हो चुके हैं और कुल 75 देशों के बीच भारत इस मामले में दूसरे नंबर पर है। पीईसी के महासचिव ब्लेतस लेम्पेयन ने कहा, यह इस पेशे को हुआ अप्रत्याशित नुकसान है और कत्लेआम है। इसलिए प्रेस आजादी दिवस पर आह्वान करते हैं कि उन सभी प्रतिष्ठित पत्रकार साथियों को हम श्रद्धांजलि दें जो महामारी का शिकार हो गए। पीईसी के मुताबिक दुनिया में हर दिन चार पत्रकारों की मौत हुई। मौत से सबसे ज्यादा प्रभावित चार देश हैं- ब्राजील (189), भारत (151), पेरू (140) और मेक्सिको (109)अच्छी बात ये है कि इस बीच यूरोप और अमेरिका में पत्रकारों की मौत की दर कम हुई है, जिसका श्रेय वहां टीकाकरण और सुरक्षा उपायों को जाता है। लैटिन अमेरिका सबसे अधिक प्रभावित है। (लेखक पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग रांची विश्वविद्यालय रांची के उपनिदेशक हैं।)
एबीएन डेस्क, रांची। आजादी के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। आरंभ में आरक्षण की व्यवस्था 10 वर्ष के लिए होनी थी लेकिन हर 10 वर्ष के बाद उसे आगे बढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। फिलहाल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी रोजगार, सरकारी कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों में नौकरी तथा सीटों के मामले में 49.5 फीसदी आरक्षण प्राप्त है। जनवरी 2019 में यानी अप्रैल-मई 2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले संसद ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण को मंजूरी दे दी। इसके अलावा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं। यह संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए घोषित 10 फीसदी का आरक्षण शायद कुल आरक्षण को बढ़ाकर 59.5 फीसदी नहीं करे क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण उसका अतिव्यापन कर सकता है। बहरहाल यदि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण लागू होता है तो संभव है कि वह सन 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों वाले पीठ के उस निर्णय का उल्लंघन कर दे जिसमें उन्होंने सभी प्रकार के आरक्षण के लिए कुल मिलाकर 50 फीसदी की सीमा तय की थी। फिलहाल 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण के पहले भी तमिलनाडु विधानसभा ने कुल मिलाकर 69 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी थी। अप्रैल 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तमिलनाडु की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने राज्य के निवासियों के लिए 75 फीसदी आरक्षण का वादा किया है। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा पहले ही रोजगार में स्थानीय लोगों के आरक्षण की नीतियां बना चुके हैं। देश भर में कई याचिकाएं दायर कर 50 फीसदी के ऊपर के आरक्षण को समाप्त करने की मांग की गई है। खासतौर पर 8 फरवरी को खबर आई कि सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है जो तमिलनाडु में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण को चुनौती देती है। परिणामस्वरूप अब तक राज्यों में मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण के क्रियान्वयन का कानूनी दर्जा अस्पष्ट है। ऐसे आरक्षण के स्तर के पक्ष में दलील यह है कि देश में अभी भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचितों की तादाद बहुत अधिक है। शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का पारदर्शी और निष्पक्ष क्रियान्वयन जटिल है जिसके चलते कई कानूनी विवाद पैदा हुए। यदि आरक्षण कोटा विश्वविद्यालय स्तर पर होता है तो व्यक्तिगत विभागों में यह 50 फीसदी का स्तर पार कर सकता है। एक अन्य मुद्दा यह है कि किसे क्रीमी लेयर का हिस्सा होने के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लायक नहीं माना जाए। फिलहाल क्रीमी लेयर में वे लोग आते हैं जिनकी सालाना पारिवारिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है। गैर पिछड़ा वर्ग के लोगों को लगता है कि यदि पिछड़ा वर्ग के लोग स्वरोजगार में हैं तो उनकी आय का आकलन आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी श्रमिक दशकों से मुंबई, दिल्ली या बेंगलूरु में किराये के मकानों में रहते हैं। उनके लिए खुद को वहां का निवासी साबित करना मुश्किल है। परिणामस्वरूप राज्यस्तरीय आरक्षण भारतीय श्रम बाजार को आर्थिक रूप से अक्षम बना सकता है। खबरों के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय को 15 मार्च, 2021 से 50 फीसदी सीमा के मामले पर सुनवाई करनी थी। शीर्ष न्यायालय को स्पष्ट करना चाहिए कि देश में आरक्षण के अलग-अलग स्तर नहीं हो सकते और अलग-अलग राज्य ऐसे कानून नहीं बना सकते कि रोजगार वहां के निवासियों के लिए आरक्षित होंगे। समाचार पत्रों में 19 मार्च, 2021 को प्रकाशित खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र में राज्य के विशिष्ट आरक्षण से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने चुटीले अंदाज में यह तक पूछ डाला कि क्या आजादी के बाद से कोई सामाजिक-आर्थिक प्रगति हासिल नहीं हुई? यह बात शायद सबसे जानकार भारतीयों पर भी लागू होती है। केंद्र सरकार को संसद में श्वेत पत्र पेश करना चाहिए ताकि आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टता आ सके। हालांकि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि आरक्षण मतदाताओं और ज्यादातर राजनीतिक दलों के लिए बहुत संवेदनशील मसला है। आरक्षण में इजाफे के खिलाफ या मौजूदा स्तर का आरक्षण जारी रखने के विरोध में कुछ कहा जाए तो यह भावनात्मक दलील दी जाती है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ हजारों साल के भेदभाव को कुछ दशकों में पूरा नहीं किया जा सकता। हालिया अतीत का एक उदाहरण है करीब दो सौ वर्ष के ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की गरीबी। लब्बोलुआब यह कि अतिरिक्त आरक्षण शासन मानकों को शिथिल करेगा तथा केंद्र, राज्यों और नगर निकाय स्तर के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा। शैक्षणिक संस्थान भी अप्रभावित नहीं रह सकेंगे। मिसाल के तौर पर नैशनल एसोसिएशन आॅफ सॉफ्टवेयर ऐंड सर्विस कंपनीज ने संकेत दिया है कि उससे संबद्ध कंपनियों में से 80 प्रतिशत को लगता है कि हरियाणा के नागरिकों की पक्षधर आरक्षण नीतियां उनके कारोबार और भविष्य की निवेश योजनाओं को प्रभावित करेंगी। देश की राष्ट्रीय और राज्य सरकारें न केवल आरक्षण की मदद करती हैं बल्कि अतिरिक्त आरक्षण की मांग को प्रोत्साहन देती हैं। देश में हर प्रकार के आरक्षण को खत्म करने की जरूरत है और इस दौरान उन लोगों को उचित वित्तीय सहायता मुहैया कराई जानी चाहिए जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं। (लेखक पूर्व भारतीय राजदूत एवं विश्व बैंक के ट्रेजरी प्रोफेशनल हैं)।
एबीएन डेस्क, रांची। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने शुक्रवार को नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया और अपना उदार रवैया बरकरार रखा है। हालांकि इस बार केंद्रीय बैंक ने यथास्थिति कायम रखने के साथ ही कुछ बदलावों की ओर इशारा किया है। इस संदर्भ में यह जानना जरूरी है कि आरबीआई उदार नीति बरकरार रखने के साथ-साथ किन बदलावों की ओर संकेत दे रहा है। पहली बात तो यह कि आरबीआई की मौद्रिक नीति निर्धारिक समिति ने उदार मौद्रिक नीति आगे भी जारी रहने की बात कही है। एमपीसी ने एकमत होकर कहा है कि आवश्यकता महसूस होने तक बिना किसी रुकावट के उदार मौद्रिक नीति जारी रहेगी। समिति ने मुख्य नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया। समिति अब किसी समय सीमा में नहीं बंधकर आंकड़ों के आधार पर भविष्य के लिए अनुमान व्यक्त करने की बात कर रही है। हालांकि एक शब्द एक बड़े बदलाव का द्योतक बन गया है। इस बार आरबीआई ने कहा है कि आर्थिक वृद्धि दर टिकाऊ बनाए रखने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उदार नीति दीर्घ अवधि तक जारी रहेगी। केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में महंगाई दर निर्धारित लक्ष्य के भीतर थामने की पूरी कोशिश की जाएगी। अप्रैल में एमपीसी ने कहा था कि वृद्धि दर में निरंतरता बनाए रखने के लिए उदार नीति जारी रहेगी और महंगाई भी नियंत्रण में रखी जाएगी। जून मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई ने न केवल वृद्धि दर को मजबूती देने की बात कही है, बल्कि इसे दोबारा पटरी पर लाने का भी जिक्र किया है। इस तरह, आरबीआई फरवरी में घोषित अपनी नीति पर दोबारा अमल करने में जुट गया है। कुल मिलाकर केंद्रीय बैंक मान चुका है कि अप्रैल तक अर्थव्यवस्था में सुधार के जो संकेत दिखने लगे थे वे अब लुप्त हो गए हैं। कोविड-19 की दूसरी लहर ने अर्थव्यवस्था पर घातक प्रहार किया है। मार्च तक ऐसा लग रहा था कि परिस्थितियां सामान्य हो गई हैं और अर्थव्यवस्था अब बिना किसी रुकावट के साथ रफ्तार से आगे बढ़ पाएगी लेकिन मध्य अप्रैल के बाद सूरत पूरी तरह बदल चुकी है। दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि मौद्रिक नीति समिति में वृद्धि दर का अनुमान भी संशोधित किया गया है। फरवरी में एमपीसी की बैठक के बाद आरबीआई ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का अनुमान 10.5 प्रतिशत रहने की बात कही थी। कोविड-19 की दूसरी लहर से आर्थिक गतिविधियां एक बार फिर थमने के बावजूद आरबीआई ने पिछले महीने जारी अपनी सालाना रिपोर्ट में भी 10.5 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बरकरार रखा था। इसके उलट दूसरी एजेंसियों ने अपने अनुमानों में कमी करना शुरू कर दिया था। हालांकि अब आरबीआई ने भी आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 9.5 प्रतिशत कर दिया है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में वृद्धि दर शून्य से 18.5 प्रतिशत निचले स्तर पर रहने का अनुमान जताया गया है। अब सारा दारोमदार टीकाकरण की रफ्तार पर है, लेकिन आरबीआई ने राजकोषीय और मौद्रिक नीति दोनों स्तरों पर अर्थव्यवस्था को राहत देने की जरूरत बताई है। तीसरी अहम बात यह है कि वृद्धि के अनुमान में पूरे एक प्रतिशत अंक की कमी की गई है, लेकिन महंगाई दर का अनुमान मात्र 10 आधार अंक बढ?े का जिक्र किया गया है। अब यह 5 प्रतिशत के बजाय 5.10 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अप्रैल में थोक महंगाई दर 11 प्रतिशत के उच्चतम स्तर 10.49 प्रतिशत पर पहुंच गई थी और इससे पहले मार्च में यह 7.39 प्रतिशत के साथ आठ महीने के उच्चतम स्तर पर थी। हालांकि खुदरा महंगाई दर अप्रैल में कम होकर 4.29 प्रतिशत रह गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कमी से ऐसा हुआ। मार्च में खुदरा महंगाई दर 5.52 प्रतिशत थी। आरबीआई खुदरा महंगाई पर नजर रखता है और इसका दायरा 2 से 6 प्रतिशत के बीच रखने का प्रयास करता है। महंगाई दर बढ़ने की आशंका जरूर है और कच्चे तेल के दाम बढ़ने से थोड़ा जोखिम है लेकिन मांग कम होने से महंगाई दर ऊपर नहीं भागेगी। मौद्रिक नीति समीक्षा की एक और महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि आरबीआई सरकारी प्रतिभूति खरीद कार्यक्रम (जी-सैप) आगे भी जारी रखेगा। अप्रैल में केंद्रीय बैंक ने पहली तिमाही में 1 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियां खरीदने की बात कही थी। दूसरी तिमाही में भी यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आरबीआई ने तो दूसरे चरण के जी-सैप में 1.2 लाख करोड़ रुपये मूल्य की प्रतिभूतियां खरीदने का लक्ष्य रखा है। हालांकि इसके बावजूद बॉन्ड बाजार में शुक्रवार को उत्साह नहीं दिखा। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसकी वजह यह है कि 17 जून को जी-सैप के 40,000 करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड खरीदारी कार्यक्रम में 10,000 करोड़ रुपये मूल्य के राज्य विकास ऋणों के मद में जारी बॉन्ड शामिल होंगे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दूसरे जी-सैप में राज्य विकास ऋणों की हिस्सेदारी बढ़ेगी। इस तरह, केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों की खरीदारी 1.2 लाख करोड़ रुपये से कम रहेगी। बॉन्ड खरीदारी कार्यक्रम में राज्यों के बॉन्ड भी शामिल करने होंगे नहीं तो केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिभूतियों के प्रतिफल के बीच अंतर और भी अधिक हो जाएगा। अंत में, प्रोत्साहन एवं लचीली मौद्रिक नीति वापस लेने की फिलहाल कोई योजना नहीं दिख रही है। निकट भविष्य में तो ऐसा होता नहीं दिख रहा है। मौजूदा वर्ष में आरबीआई ऐसा करने का जोखिम नहीं उठा सकता है जब दूसरी एजेंसियां नियमित अंतराल पर देश की वृद्धि दर का अनुमान कम कर रही हैं। (लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं)।
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