विचार

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Published / 2021-12-23 13:05:27
मोदी अजेय हैं? लेकिन जय तो आवाम की हो...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। काशी की कायाकल्प में लगे प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में विकास की गंगा को भी नमन किया। आधारभूत संरचना के विकास से देश का सबसे अधिक भला होता है। युवाओं में मोदी का जबरदस्त क्रेज है मोदी-मोदी करती युवाओं की भीड़ काशी की सड़कों पर प्रसन्नता से लवरेज दिखी। लेकिन जब एक युवा से संवाददाता ने पूछा कि आप मोदी जी के विकास यात्रा से कितना खुश है तो उसने कहा कि विकास तो ठीक है लेकिन सरकारी नौकरियां भी दें मोदी जी। एचईसी हटिया में हड़ताल 20 दिन पूरा कर चुका है। मात्र एक हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था न कर पाने के कारण एक पूरा हटिया शहर की व्यवस्था छिन्न-भिन्न है। कोरोना की मार में मोदी जी की कंपनी के मजदूर मारे-मारे फिर रहें हैं संदेश तो यही जाता है। लूटा और बर्बाद किसने किया यह तो चुनावी भाषण का विषय है लेकिन गरीबी से कराहते कामगार क्या उत्पादन करेंगे यह यक्ष प्रश्न हैं। संकेत साफ है कि यूपी, बिहार और झारखंड में जॉब का अर्थ ही है सरकारी नौकरियां। आखिर देश के लगभग 25 करोड़ परिवार में लगभग 5 करोड़ ही तो हैं जो सर्व सुविधा संपन्न है। कुल मिलाकर 30 करोड़ लोगों का देश संपन्न भारत। मोदी ने निजीकरण की जो गति तेज की है उससे बिहार, झारखंड और यूपी सहित पूरे उत्तर भारत की राज्यों में जहां औद्यागिक विकास की गति धीमी रही है जॉब नहीं मिले हैं। निजीकरण का लाभ देश में असमान रहा है। आज भी युवाओं को सरकारी नौकरी ही पहली पसंद है। झारखंड सहित उत्तर भारत के राज्यों में न निजीकरण तेज हुआ न उद्योग लगा साथ ही सरकारी नौकरियां नीतिगत तौर पर कम कर दी गयी। बिहार के चुनाव में सबसे हिट नारा था दस लाख नौकरियों का जो तेजस्वी ने दिया और जीते भी, सबसे बड़ी पार्टी बनी लालू यादव के जंगलराज युक्त राष्टÑीय जनता दल (कथित रूप से) आखिर क्यों? क्योंकि बिजली, पानी सड़क के बाद अब सबसे अधिक आवश्यक जॉब है जो महाराष्टÑ गुजरात और दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में कम है। क्या यूपी में यह नारा काम नहीं करेगा? मोदी कांग्रेस से न हारें लेकिन महंगाई से कराहती भारतीय आबादी है लगभग 100 करोड़ से हार सकते हैं। राष्टÑवाद का नारा क्षणिक प्रभाव छोड़ता है। उस वर्ग के लिये बहस का विषय है जो वर्तमान समय में आर्थिक रुप से मजबूत है। इनकी संख्या कुल संख्या में दो करोड़ परिवार तक सीमित है। कंपनियां अरबों के निवेश से विनिर्माण इकाइयां लगाएं, हजारों की संख्या में बढ़िया वेतन वाले रोजगार पैदा हों और संपन्नता का एक पनाहगाह बनकर उभरे, ताकि यह पिछड़ा राज्य आगे बढ़ सके। आलोचकों ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी की उपलब्धियों पर जो सवाल उठाए उसका मुख्य आधार यही रहा है कि उन्होंने इस राज्य में दशकों से कायम संपन्नता एवं सक्षमता का फायदा उठाया। भारत के नेता के तौर पर मोदी आर्थिक एवं बदलावकारी प्रतिभा दशार्ने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं और कोविड-19 महामारी के समय उनके कमजोर प्रदर्शन से पहले ही यह बात उजागर हो चुकी थी। मोदी के लिए बिहार अपनी विकासपरक क्षमताएं दर्शाने के लिए एकदम साफ स्लेट है। बिजली, सड़क, पानी देने और कानून व्यवस्था की हालत सुधारने से जुड़ी अपनी उपलब्धियों के लिए तीन बार से मुख्यमंत्री पद पर आसीन नीतीश को सुशासन का खिताब दिया जाता रहा है। अगर बिजली देने के मामले में ही उनकी उपलब्धियां देखें तो बेहतर काम हुआ है। नीतीश के दौर में बिहार में बिजली खपत 700 मेगावॉट से बढ़कर 6,000 मेगावॉट हो गई और लालटेन युग का खात्मा हो गया। लेकिन आज राजद सबसे बड़ा दल क्यों है? यह सवाल बिहारका महत्वपूर्ण सवाल है लेकिन निश्चित रूप से बिहार के लोगों ने इस बदलाव को खुद महसूस किया है। फिर भी यह विडंबना ही है कि सुशासन के बावजूद बिहार अब भी बीमारू राज्यों में बना हुआ है और विकास के तमाम मानदंडों पर होने वाली रैंकिंग में अक्सर निचले पायदानों पर मौजूद रहता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक कार्यालय के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त गोविंद भट्टाचार्य ने इकनॉमिक सर्वे आॅफ बिहार का हवाला देते हुए कई विसंगतियों को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के एक-तिहाई से भी कम है, सकल राज्य घरेलू उत्पाद में विनिर्माण की हिस्सेदारी 2015-16 और 2018-19 के दौरान एक फीसदी अंक गिरी है और राज्य के 38 में से 13 जिले देश के सर्वाधिक पिछड़े 117 जिलों में शामिल हैं। बिहार के निराशाजनक प्रदर्शन के इन संकेतकों को सामने रखने के साथ ही भट्टाचार्य यह भी कहते हैं कि इस स्थिति के लिए अकेले नीतीश को जिम्मेदार ठहराना अनुचित होगा। भारत में जनसेवा में लगा कोई भी व्यक्ति सुधारों की राह में खड़े संस्थागत अवरोधों से बखूबी परिचित होगा। जहां तक बिहार का सवाल है तो वह सामाजिक पिछड़ेपन एवं भ्रष्टाचार के अतीत में इस कदर फंसा हुआ है कि वहां पर बड़े सुधार ला पाना कोई छोटी चुनौती नहीं है। बिहार राज्य की 75 फीसदी से अधिक आबादी के खेती पर ही निर्भर होने से कारखानों के लिए बड़े पैमाने पर जमीन तलाशना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। बिहार उन राज्यों में से एक है जहां जमीन का अधिग्रहण करना बहुत कठिन है क्योंकि यहां पर भूमि स्वामित्व के रिकॉर्ड गड़बड़ हैं। हाल में शुरू की गई स्वामित्व योजना बिहार में जमीन के मालिकाना हक संबंधी रिकॉर्ड की समस्या को काफी हद तक दूर कर सकती है। पहले हर संसदीय क्षेत्र में और अब हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज खोलने का दावा करने वाले पीएम मोदी का यह समझ बेहतरीन है लेकिन इसमें झारखंड कहां है? खस्ताहाल स्वास्थ्य देखभाल ढांचे को दुरुस्त करने के लिए केंद्रीय फंड देने के साथ ही केंद्र की स्वास्थ्य बीमा योजना का विस्तार भी कर सकते हैं। उनके सामने बेशुमार मौके हैं। काशी प्रतीक है कायाकल्प का लेकिन दिल्ली का रास्ता झारखंड बिहार और काशी (यूपी)होकर ही जाता है। वैसे युवाओं का काम या स्वरोजगार दोनों एक चुनौती भी है।

Published / 2021-12-21 15:40:17
भारतीय क्रिकेट के अप्रिय दौर की वापसी...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय क्रिकेट और विवादों का अटूट रिश्ता है। ऐतिहासिक रूप से इनकी वजह पराजय और बेइज्जती रही। इसमें तब्दीली तब आई जब 14 मार्च, 2001 को सौरभ गांगुली के नेतृत्व वाली टीम के बल्लेबाजों वीवीएस लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ ने पूरा दिन बल्लेबाजी करके बुनियाद रखी और दिन के आखिरी घंटे में आॅस्ट्रेलिया को पराजित किया। उसके साथ ही भारत के दबदबे वाले दो दशकों का दौर शुरू हुआ। खासतौर पर टेस्ट क्रिकेट में। भारत का उभार इतना जबरदस्त रहा कि वह ग्रेग चैपल के कार्यकाल वाले अप्रिय दौर से भी सहजतापूर्वक निपट सका। बीच की अवधि में महेंद्र सिंह धोनी नजर आए लेकिन विराट कोहली गांगुली के वास्तविक उत्तराधिकारी बनकर उभरे। उनमें गली क्रिकेट वाली आक्रामकता भी थी और आॅस्ट्रेलिया को उसी की शैली में मात देने का माद्दा भी। यह विडंबना ही है कि भारतीय क्रिकेट को गौरवपूर्ण ऊंचाई पर ले जाने वाले ही अब उसे नीचे लाते दिख रहे हैं। गांगुली अब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के प्रमुख हैं। द्रविड़ राष्ट्रीय टीम के कोच हैं और लक्ष्मण राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) के प्रमुख। जबकि सर्वविजेता (कम से कम टेस्ट में) कप्तान विराट कोहली निशाने पर हैं। हम यहां तक कैसे पहुंचे, यह बताना क्रिकेट रूपी धर्म के बड़े से बड़े जानकार के लिए भी मुश्किल है। प्रशंसकों के लिए तो यह नाराजगी का सबब है ही। पहली बात तो यह कि मौजूदा विवाद खेलों को लेकर लाखों लोगों की एक भ्रामक धारणा को चुनौती देता है। लोग यह मानते थे कि खेलों में और खासकर क्रिकेट में बागडोर ऐसे लोगों के हाथ में है जो खिलाड़ी नहीं हैं। पहली बार एक शीर्ष और प्राय: समकालीन क्रिकेटर को क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था का मुखिया बनाया गया। नतीजा क्या निकला? दक्षिण अफ्रीका दौरे के ऐन पहले तमाम गड़बड़ियांं सामने आईं। हाल के वर्षों में भारत ने आॅस्ट्रेलिया से लगातार दो क्रिकेट शृंखलाओं में जीत हासिल की, इंगलैंड में एक शृंखला जीती और हर घरेलू शृंखला में विपक्षियों का सफाया किया। वेस्ट इंडीज अब श्रेष्ठ टीम नहीं रह गई है, न्यूजीलैंड का हम अक्सर दौरा करते हैं। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में हम अब तक कोई शृंखला नहीं जीत सके हैं। इस समय दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट अपने ही संकट से गुजर रहा है। वहां नस्ली विवाद, चोट और प्रतिभाओं के पलायन की समस्या है। कोहली की टीम के लिए वहां जीत हासिल करने का यह सुनहरा अवसर था। लेकिन बीसीसीआई ने क्या किया? टीम के दक्षिण अफ्रीका प्रस्थान से एक सप्ताह पहले कोहली पर हमला हुआ और आगे चलकर उन्हें और शमिंर्दा किया गया। मीडिया में भी कुछ अटकलबाजी हुई जो काफी हद तक गलत थी। ऐसी ही एक बेतुकी अफवाह यह थी कि उन्होंने एकदिवसीय शृंखला खेलने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि उसी समय उनकी बेटी का जन्मदिन था। पहली बात, विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक उन्होंने बोर्ड से ऐसा कुछ नहीं कहा था। बोर्ड के सूत्रों ने कहा कि भले ही उन्होंने बोर्ड से ऐसा कुछ नहीं कहा लेकिन ड्रेसिंग रूप में अपने साथियों से इस बारे में बात की थी। हमें नहीं पता बोर्ड क्या ड्रेसिंग रूम की जासूसी करता है या उसने खिलाड़ियों के फोन में पेगासस डाला है। परंतु तथ्यों और तारीखों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह बचाव जिसने भी चुना था वह तारीखों से परिचित नहीं था। विराट की बेटी का जन्मदिन उन तारीखों के दरमियान नहीं पड़ता जब एकदिवसीय शृंखला होनी है बल्कि वह कोहली के 100वें टेस्ट के दौरान पड़ेगा (बशर्ते कि वह फिट रहें और चुने जाएं)। बोर्ड के पदाधिकारियों ने ऐसी गलती कैसे कर दी? इसलिए कि उन्होंने तैयारी नहीं की थी। ओमीक्रोन के कारण दौरे की तारीख बदल दी गईं। डालमिया, बिंद्रा, ललित मोदी, श्रीनिवासन या अनुराग ठाकुर के दौर में कई शमिंर्दा करने वाली घटनाएं घटी होंगी लेकिन ऐसा तब भी नहीं हुआ था। आईपीएल के बाद भारतीय क्रिकेट बोर्ड की छवि सर्वाधिक सक्षम प्रबंधन वाले बोर्ड की बनी थी। इसके बाद भारतीय परंपरा के मुताबिक कुछ कुछ छेड़छाड़ शुरू की। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर एक नई व्यवस्था लागू की गई। आखिरकार शुचितावादियों की प्रार्थनाओं का जवाब दिया गया। एक बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी को बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। अब कम से कम खेल और कारोबारियों के बीच हितों का टकराव नहीं होगा। इसके बाद बोर्ड के प्रमुख को उन मैचों में एक क्रिकेट गेमिंग ऐप के विज्ञापन में देखा जिनमें उनकी टीम खुद खेल रही थी। दुनिया में यह अपनी तरह का अनूठा मामला है। उसके बाद ताजा गड़बड़ी सामने आई मानो विराट कोहली 2021-22 के लिए वही हैं जो ग्रेग चैपल 2005-06 के लिए थे। टीम के चयनकर्ता और बोर्ड यह दलील दे सकते हैं कि कोहली तीनों प्रारूपों के कप्तान नहीं बने रह सकते। उन्होंने टी-20 की कप्तानी छोड़ने की घोषणा करके उनके लिए रास्ता खोल दिया। तब चयनकर्ताओं का यह तर्क सही है कि सफेद गेंद से खेले जाने वाले दोनों प्रारूपों यानी एकदिवसीय और टी-20 के लिए एक कप्तान रखना सही होगा। विश्व क्रिकेट में अलग-अलग कप्तान रखना एक मानक है। केवल भारत और न्यूजीलैंड इसके अपवाद रहे क्योंकि विराट कोहली और केन विलियमसन के कद तथा उनके और टीम के प्रदर्शन ने उन्हें निर्विवाद नेतृत्वकर्ता बनाया। भारत के लिए यह कारगर नहीं रहा और एक कप्तान के अधीन रहते टीम 2013 के बाद कोई आईसीसी ट्रॉफी नहीं जीत पाई। चयनकतार्ओं का यह सोचना सही है कि रवि शास्त्री और विराट कोहली के रूप में दो लोगों की तानाशाही (हम यह जुमला हल्के में नहीं प्रयोग कर रहे, रविचंद्रन आश्विन से पूछिए) समाप्त होनी चाहिए। कोहली द्वारा टी-20 की कप्तानी छोडने के बाद सफेद गेंद के दो प्रारूपों के अलग कप्तान रखना भी बेतुका था।

Published / 2021-12-20 14:31:30
यूपी सहित पांच राज्यों के चुनाव का देश पर असर...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम से वैसे तो प्रदेशों में सरकारों का गठन होना है लेकिन यह नतीजे केंद्र की राजनीति की दशा-दिशा भी तय करेंगे। साल 2014 से केंद्र में भाजपा का राज उत्तर प्रदेश के बलबूते ही बना हुआ है इसलिए भाजपा हर हाल में यह प्रदेश दोबारा जीतना चाहेगी। यही नहीं उत्तर प्रदेश में यदि योगी आदित्यनाथ दोबारा सत्ता में वापसी करते हैं तो भविष्य में केंद्रीय राजनीति के द्वार भी उनके लिए खुल जायेंगे। इन चुनावों में वर्तमान मुख्यमंत्रियों का राजनीतिक भविष्य तो दांव पर लगा ही है साथ ही विपक्ष के कई नेताओं के लिए अपना आधार बचाये रखने के लिए भी यह चुनाव महत्वपूर्ण हैं। इन चुनावों में गठबंधन राजनीति के उन नये प्रयोगों की भी परख होगी जो भाजपा को हराने के लिए बनाये गये हैं। इन चुनावों के परिणाम इस सवाल का भी कुछ हद तक जवाब तलाशेंगे कि साल 2024 में होने वाले आम चुनावों में किन नेताओं के बीच होगा मुकाबला ? ममता बनर्जी ने अन्य राज्यों में तृणमूल कांग्रेस का आधार बढ़ाने के लिए और विपक्ष का नेतृत्व हासिल करने के लिए जो अभियान चलाया है यदि उसमें उन्हें सफलता मिली तो आगे के लिए उनका हौसला बुलंद हो जायेगा और विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ से खिसक जायेगा। सिर्फ उत्तर प्रदेश की राजनीति की ही बात कर लें तो यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष सत्ता में वापसी की तगड़ी और मुश्किल चुनौती है। यदि वह सत्ता में वापसी करते हैं तो इतिहास रच देंगे और भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में शुमार हो जायेंगे। हो सकता है आगे चल कर उनको पीएम उम्मीदवार भी बना दिया जाये लेकिन यदि उनके नेतृत्व में पार्टी सत्ता में नहीं लौटी तो वह राजनीतिक रूप से एकदम किनारे किये जा सकते हैं। वहीं अखिलेश यादव के लिए भी खुद को साबित करने का अहम मौका है। अखिलेश यादव ने पिता मुलायम सिंह यादव की इच्छा के विपरीत समाजवादी पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और एक के बाद एक ऐसे फैसले किये जिससे पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। इस बार यदि उनके नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया तो यकीनन उनका राजनीतिक कद बढ़ जायेगा और यदि वह एक बार फिर विफल रहे तो घर से ही उनके खिलाफ बगावत खड़ी हो सकती है। यही नहीं अखिलेश के नेतृत्व वाला गठबंधन अगर हारा तो आगामी चुनावों में राजनीतिक दल उनके साथ गठबंधन के लिए राजी नहीं होंगे। इसी तरह कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीतिक कॅरियर के लिए भी यह चुनाव बड़ी चुनौती हैं क्योंकि लोकसभा चुनावों में गांधी परिवार का गढ़ अमेठी भी बचाने में नाकामयाब रहीं प्रियंका गांधी वाड्रा यदि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को नहीं उबार पाईं तो आगे के लिए मुश्किलें और बढ़ जायेंगी। राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष रहे चौधरी अजित सिंह के निधन के बाद अब पार्टी की कमान उनके बेटे जयंत चौधरी के हाथ में आ गयी है। जयंत के समक्ष अपने राजनीतिक कॅरियर को और पार्टी को बचाये रखने की तगड़ी चुनौती है। देखना होगा कि क्या समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर जयंत अपनी पार्टी का खाता विधानसभा में खोल पाते हैं। अन्य राज्यों की पार्टियां जैसे पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस, दिल्ली से आम आदमी पार्टी, तेलंगाना से एआईएमआईएम जैसे दल भी उत्तर प्रदेश में अपने लिये संभावनाएं तलाशने पहुँचे हैं। इन पार्टियों के नेता अपने आप को यूपी के लोगों का सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं और बड़े-बड़े वादे भी कर रहे हैं। देखना होगा कि प्रदेश की जनता इनके बारे में क्या फैसला करती है। वहीं बात अगर उत्तराखण्ड की करें तो जबसे इस राज्य का गठन हुआ है तबसे एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस सत्ता में आती रही है। यहां अधिकतर मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये लेकिन राजनीतिक रूप से कभी बड़ी अस्थिरता का सामना इस राज्य ने नहीं किया। इस समय भाजपा सरकार का नेतृत्व पुष्कर सिंह धामी के हाथ में है। धामी जिस स्टाइल में काम कर रहे हैं उसने राज्य सरकार के प्रति नकारात्मक भाव को कुछ हद तक कम जरूर किया है लेकिन देखना होगा कि क्या वह उत्तराखण्ड का राजनीतिक इतिहास बदल पाने में सक्षम हो पाएंगे जिसमें किसी पार्टी की सरकार लगातार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है। उत्तराखंड में भाजपा के समक्ष नेतृत्व का संकट तो नहीं है लेकिन कांग्रेस जरूर इस मुद्दे को लेकर परेशान है। वहीं गोवा राज्य की बात करें तो जिस तरह की राजनीतिक उठापटक यहां देखने को मिल रही है वह चुनाव करीब आते-आते और बढ़ेगी। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर की पसंद थे। यकीनन वह साफ छवि के मुख्यमंत्री साबित हुए हैं लेकिन पार्टी को सत्ता में लाने की चुनौती पर विजय यदि वह पा लेते हैं तो उनका कद बढ़ जायेगा। दूसरी ओर कांग्रेस में जिस तरह की भगदड़ मची है वह ऐन चुनावों से पहले पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। राहुल गांधी ने कुछ क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस के साथ गठबंधन तो करा दिया है लेकिन वहां कांग्रेस ही नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के समक्ष पंजाब में सिर्फ अपनी सत्ता बचाने की चुनौती नहीं है बल्कि गांधी परिवार के फैसले को भी सही साबित करने की चुनौती है। गांधी परिवार के निर्देश पर ही कैप्टन अमरिंदर सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बनाये गये। यदि कांग्रेस पंजाब हारी तो गांधी परिवार के फैसलों पर जी-23 के नेता बड़े सवाल फिर से खड़े कर सकते हैं। दूसरी ओर पंजाब में सरकार और कांग्रेस का बरसों तक नेतृत्व करने के बाद अब कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी पार्टी बना चुहके हैं और वह भाजपा के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरने वाले हैं। देखना होगा कि इस गठबंधन को राष्ट्रवाद का मुद्दा कितना चुनावी लाभ दिला पाता है। भाजपा को उम्मीद है कि कृषि कानून वापस लेने के बाद अब उसके खिलाफ नकारात्मक माहौल नहीं रह गया है। वहीं शिरोमणि अकाली दल के सामने भी चुनौती है कि यदि इस बार उसके गठबंधन की सरकार नहीं बनी तो पार्टी को संभाले रखना मुश्किल हो जायेगा। मणिपुर की 40 सदस्यीय विधानसभा के लिए भी चुनाव कराये जाने हैं। वहां इस समय पहली भाजपा सरकार है। मणिपुर में भाजपा शासन में विकास के कार्य तो कई हुए हैं साथ ही प्रदेश में शांति भी स्थापित हुई है। वरना पहले हड़तालें आदि ही चलती रहती थीं। पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में विकास कार्यों को जिस तरह से केंद्र सरकार वरीयता दे रही है उसका लाभ यहां भाजपा को मिल सकता है। लेकिन नगालैंड की हाल की घटना के बाद अफ्सपा वापसी की मांग जोर पकड़ रही है। ऐसे में यहां रैलियां करने के लिए जब भाजपा के आला नेता आयेंगे तो उसने जनता जरूर सवाल करेगी। प्रदेश कांग्रेस ने तो आगे बढ़ कर वादा भी कर दिया है कि यदि वह सत्ता में आई तो कैबिनेट की पहली बैठक में पूरे प्रदेश से अफ्सपा हटाने का फैसला लिया जायेगा। कांग्रेस ने यहां हाल ही में पार्टी में कुछ बदलाव कर संगठन में जान फूंकने की कोशिश की है लेकिन पार्टी में चल रही उठापटक उसे नुकसान पहुँचा सकती है। पिछले चुनावों में भी सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद कांग्रेस यहां सरकार नहीं बना पाई थी जबकि भाजपा ने कुछ सहयोगी दलों को साथ लेकर पूरे पाँच साल सरकार चला कर दिखा दिया। मणिपुर में यदि मुख्यमंत्री एन. बीरेंद्र सिंह दोबारा सत्ता में लौटते हैं तो भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार हो सकते हैं। बहरहाल, पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश को जीतना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। विपक्ष के अनेक दल भी इस बात को समझ रहे हैं कि यदि साल 2024 में देश में होने वाले आम चुनावों में भाजपा का मुकाबला करना है तो उत्तर प्रदेश में भाजपा के विजय रथ को रोकना होगा। देखना होगा कि सारे दलों का यह संयुक्त प्रयास क्या इस बार कोई रंग लाता है या पाँचों राज्यों में भगवा फहराता है। वैसे यदि पाँचों राज्यों में भाजपा की जीत हुई तो इतना तय है कि 2024 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला करना विपक्ष के लिए और कठिन हो जायेगा। लेकिन इसके उलट यदि भाजपा सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही सरकार बनाने से चूकती है तो उसको आगे के लिए अपनी रणनीति नये सिरे से तय करनी होगी।

Published / 2021-12-18 15:18:32
शैक्षणिक माहौल से बढ़ती है युवाओं की क्षमता...

एबीएन डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। एक कथन है कि अगर यह निश्चित हो जाए कि माता-पिता के जीवन दान से बच्चे का करियर बन सकता है, भवष्यि सुधर सकता है तो माता-पिता अपने बच्चों के लिए प्राण भी दे सकते हैं। पर ऐसा होता नहीं है। उनको अपना कैरियर स्वयं बनाना होता है। माता-पिता उसमें उनका सहयोग कर सकते हैं। प्राय: देखा गया है कि बच्चों के कैरियर को बनाने के उत्साह में बच्चों पर अतिरक्ति दबाव बना देते हैंजो बच्चों के भवष्यि के लिए ज्यादा घातक हो जाता है। माता-पिता को चाहिए कि वे उसका ध्यान रखें वे कुछ महत्वपूर्ण ंिवदुओं पर अमल करने का प्रयास करें। 1. एक काम काजी व्यक्ति का 70 प्रतिशत समय उसके कार्य स्थल पर लग जाता है। अगर व्यक्ति करियर से खुश नहीं होगा औरअपना काम ठीक से नहीं कर पाएगा तो नश्चिति रुप से खुश नहीं रहेगा और तनाम में रहेगा। जीवन में यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने करियर को पंसद करें। इसमें माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। वे बच्चोें को प्रात्साहित करेें कि वे अपने पंसद को अपना कैरियर बनाए। इससे बच्चों का भवष्यि खुशनुमा रहेगा। 2. माता-पिता को कभी अपने बच्चों की तुलना किसी अन्य बच्चों या सगे संबंधियों से नहीं करना चाहिए। हर बच्चा दूसरों से अलग होता है साथ ही हर सफल व्यक्ति दूसरे सफल व्यक्ति से कम या अधिक हो सकता है। मेरे एक परिचित सदैव अपने बच्चे को अपना उदाहरण देते रहते थे कि हम एक बडे़ कंपनी के वाईस प्रेंिसडेंट है। एक दिन बच्चें ने कहा कि आप वाईस प्रेंसिडेंट हैं, न बिल गेटस तो नहीं बन सके न। 3. माता-पिता बच्चों के रोल मॉडल होते हैं। बच्चें बचपन में उनकी नकल करते हैं। माता-पिता को कोई ऐसी हरकत नहीं करना चाहिए कि बच्चों पर बुरा असर पड़े। 4. बच्चों से सदैव संवाद बनाए रखना आवश्यक है। उन्हें करियर कोर्स और भवष्यि की योजनाएं समझाया जाना चाहिए। अगर माता-पिता से ये जानकारी मिल जाए तो बच्चों को बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। बच्चे गलत सलाह पर वश्विास कर सकते हैं इसलिए उन्हें गलत सलाह से बचाया जाना चाहिए। बच्चों से संवाद यहां तक की फल्मि, समाज और देश दुनियां की बात करनी चाहिए। 5. गलतियां सबसे होती है। गलती सफलता की पहली सीढ़ी है यह मानकर उन्हें माफ किया जाना चाहिए। बच्चों को ज्यादा फटकार नहीं लगाना चाहिए। गलतियों पर उनको नई राह दिखाएं। बच्चे सुधर जाएंगें। 6. बच्चे की हां में हां भी करना उचित नहीं है। कभी-कभी उनकी बातों पर न भी करना चाहिए। इससे वे जीवन की सच्चाई भी समझेंगे। विशेषकर कैरियर से संबंधित बातों पर हर बात में हां न करें उन्हें उचित सलाह देने का प्रयास करें। सदैव माता-पिता से हां सुनने के आदि बच्चे जीवन में घोखा खाते हैं। शिक्षकों पर बच्चों को शैक्षणिक भार डालकर आप जिस प्रकार असहयोग करते हैं उससे बच्चे की शैक्षणिक स्थिति में गिरावट आती है। शिक्षको का सहयोग करें जिससे आपका बच्चा शिक्षकों का सम्मान करेगा। (लेखिका उर्सूलाइन इंटर कॉलेज की प्राचार्या हैं।)

Published / 2021-12-18 13:46:48
तेरी गलियां... गलियां.., मुझको भाये तेरी गलियां...

एबीएन डेस्क (मनोज शर्मा)। मैं किशोर उम्र में बैडमिंटन का अच्छा खिलाड़ी था। हालांकि अभी मीडिया कप बैडमिंटन में मेरी धुलाई हो गयी। तब हम सभी खिलाड़ी खुद कोर्ट तैयार करते थे। 22 गुणा 44 फिट का और लकीर खींच कर चूना डालते थे। तब कुछ भी कर लें, नेट के दोनों ओर का कोई एक हाफ अच्छा दूसरा उबड़-खाबड़ ही होता था। अच्छे हाफ के दौरान उधर से खेलने वाला ज्यादा जीतता था। उस अच्छे कोर्ट से खेलने के लिये लड़ाई झगड़ा सब होता था। अपुन भी जिद्दी और लड़ाकू था। सो मैंने खराब सिरे वाले कोर्ट से खेलना शुरू किया और जीतने लगा। अब मेरे साथ अलग समस्या हो गयी कि अच्छे कोर्ट से खेलने पर हारने लगा। मेरे पैरों और दिमाग को खराब उबड़ खाबड़ कोर्ट की आदत पड़ गयी थी। मेरे पैर दौड़ते और शॉट मारते समय गड्ढे और उंचे जगहों पर बैलेंस बनाने के आदी हो गये थे। चिकने और सही कोर्ट में मैं दिमागी तौर पर असहज होने लगता था। अब कुछ ऐसी ही समस्या काशी में बाबा विश्वनाथ परिसर के संवरने से कुछ तबके को हो रही है। उनका कहना है कि बाबा विश्वनाथ परिसर के संवरने से गलियां खत्म हो गयीं, जिसे देखने सैलानी आते थे। यह बनारस की खुबसूरती थी। कमबख्तों को जब तक इन गलियों में सांड़ रास्ता रोके न दिखे। बस्ता लादे दो व्यक्ति रगड़ा न खायें। इन गलियों में सैलानियों को ठगने घुमाने वाले न रहें, तब तक इन असंतुष्ट लोगों को मन नहीं लगता। अफसोस कि इन गलियों के पक्ष में दबी जुबान में ही एनडीटीवी के कमाल खान भी बोलते नजर आये। अरे विघ्नसंतोषियों काशी के बारे में एक कहावत है कि .. रांड़, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी इनसे बचो तो सेवो काशी। ये चार चीजें वहां रहेंगी ही। तो जाओ घाट पर बैठ कर चिलम टानो...(लेखक पत्रकारिता विभाग रांची विश्वविद्यालय से जुड़े हैं।)

Published / 2021-12-16 15:23:15
ऐसे ही दुर्गा नहीं कही गयी थीं इंदिरा गांधी...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह इंदिराजी की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष मानिकशॉ की सैन्य रणनीति और आमलोगों की दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति से संभव हुआ था। 16 दिसंबर, 1971! शाम के साढ़े चार बजे थे। भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे।अरोडा़ और पाकिस्तान सेना के जेनरल एएके नियाजी एक मेज के सामने बैठे और दोनों ने पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सेना के समक्ष आत्म-समर्पण के दस्तवेज पर हस्ताक्षर किए। नियाजी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाजी की आंखों में आंसू थे। इसके साथ ही, आधुनिक हथियारों और सैन्य साजोसामान से लैस पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने भारतीय सेना के अदम्य साहस और वीरता के आगे घुटने टेक दिए थे। इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ्तर में एक टीवी इंटरव्यू दे रही थीं। तभी जनरल मानिकशॉ ने उन्हें बांग्लादेश में मिली शानदार जीत की खबर दी।इंदिरा गांधी ने लोकसभा में शोर-शराबे के बीच घोषणा की कि युद्ध में भारत को विजय मिली है। इंदिरा गांधी के बयान के बाद पूरा सदन जश्न में डूब गया। भीड़ नियाजी को मार डालना चाहती थी, लेकिन भारतीय सेना ने उन्हें जीप पर बैठाया और सुरक्षित जगह पर ले गई।इसके बाद 17 दिसंबर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया। 17 दिसंबर, 1971 को भारत और भूटान द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में बांग्लादेश को राजनयिक मान्यता दिए जाने से दुनिया के मानचित्र में नए राष्ट्र बांग्लादेश का अभ्युदय हुआ। इसकी पटकथा पिछले एक वर्ष से लिखी जा रही थी। 7 दिसंबर, 1970 को पहली बार पाकिस्तान में संसद-(मजलिस-ए-शूरा)-के लिए आम चुनाव हुए थे। तब पाकिस्तान दो हिस्सों में बंटा था-पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान। मुख्य मुकाबला था-जुल्फिकार अली भुट्टो की नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग में। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जेनरल याह्या खान और भुट्टो की उम्मीदों के खिलाफ अवामी लीग ने बहुमत हासिल कर लिया। स्वाभाविक है, अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर्रहमान ने सरकार बनाने का दावा पेश किया। जिसे खान ने स्वीकार नहीं किया। नतीजा, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गई। पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया खां ने 25 मार्च,1971 को शेख मुजीब को गिरफ़्तार कर पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया। अगले ही दिन, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने मुजीबुर्रहमान की ओर से बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। आज भी बांग्लादेश अपना स्वतंत्रता दिवस समारोह प्रति वर्ष 26 मार्च को ही मनाता है। बांग्लादेशियों ने मुक्ति बाहिनी का गठन किया और पश्चिमी पाकिस्तान की सेना का मुकाबला किया।पूर्वी पाकिस्तान में मुक्तिबाहिनी गुरिल्लाओं ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ लड़ने के लिए भारतीय बलों के साथ हाथ मिलाया। उन्होंने भारतीय सेना से हथियार और प्रशिक्षण प्राप्त किया।सैन्य कार्यवाही में बेतहाशा कत्लेआम हुआ। पाक सेना द्वारा किए जा रहे जुल्मों के चलते लाखों शरणार्थियों ने भारत की ओर रुख किया। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें भारत आने लगीं तो जनभावना के दबाव में भारत ने बंगाली शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएं खोल दी। अप्रैल, 1971 में बांग्लादेश से भारत आने वाले शरणार्थियों की तादाद इतनी बढ़ गई कि सीमावर्ती राज्यों ने अपने हाथ खड़े कर दिए। तब भारत सरकार पर यह दबाव पड़ने लगा कि वह वहां पर सैन्य हस्तक्षेप करे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अप्रैल में आक्रमण करने का मन बना लिया था। उन्होंने थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय ली। 3दिसंबर, 1971 को इंदिरा गांधी तत्कालीन कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। इसी दिन शाम के वक्त पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैनिक हवाईअड्डों पर बम गिराना शुरू कर दिया। इंदिरा गांधी ने उसी वक्त दिल्ली लौटकर मंत्रिमंडल की आपात बैठक की।भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की और कई हजार वर्गकिलोमीटर पाकिस्तानी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। भारतीय नौसेना के पश्चिमी नौसेना कमान ने 4-5 दिसंबर की रात कोडनाम ट्राइडेंट के तहत कराची बंदरगाह पर एक आश्चर्यजनक हमला किया, जिसे आॅपरेशन त्रिशूल नाम दिया गया। भारत की ओर से पाकिस्तान की इतनी भारी-भरकम फौज का आत्मसमर्पण कराना इतना सहज भी नहीं था। पाकिस्तानी फौज के कमांडर जनरल नियाजी को मनाने की तैयारी भारतीय सेना के पूर्वी कमान के स्टाफ आॅफिसर मेजर जनरल जेएफआर जैकब को दी गई थी।जैकब के नेतृत्व में भारतीय सेना ढाका की तरफ आगे बढ़ी।13दिसंबर को सेना प्रमुख जनरल मानेकशॉ के आदेश के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के सभी शहरों पर भारतीय सेना ने कब्जा कर लिया था। 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं। भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं।बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी। गवर्नर मलिक ने लगभग कांपते हाथों से अपना इस्तीफा लिखा। जैकब ढाका पहुंचे तो उनकी कार पर मुक्तिवाहिनी के सैनिकों ने हमला बोल दिया क्योंकि वह पाकिस्तानी सेना के अधिकारी की कार में सवार थे। लेकिन जब उन्होंने उतरकर अपना परिचय दिया,तब वे चले गए।ढाका में मौजूद पाकिस्तानी सेना के जनरल नियाजी ने पहले तो आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया। पाकिस्तानी जेनरल नियाजी आत्मसमर्पण को तैयार हो गए थे। वर्ष 1971के युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे,जबकि 9,851 घायल हुए थे। इस युद्ध की सफलता का श्रेय पूरी तरह इंदिरा गांधी, भारतीय सेना और बांग्लादेश की मुक्तिबाहिनी को जाता है। सोवियत संघ ने युद्ध में भारत के साथ पूर्वी पाकिस्तानियों का पक्ष लिया। दूसरी ओर, रिचर्ड निक्सन की अध्यक्षता में संयुक्त राज्य अमेरिका ने आर्थिक और भौतिक रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया। अमेरिका और चीन द्वारा भारी दबाव में भी इंदिरा गांधी जरा भी नहीं डरी और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। इस अदम्य संकल्प और साहस को देख दुनियाभर ने इंदिरा गांधी को आयरन लेडी का खिताब दिया था। तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा की संज्ञा देते हुए उनका सम्मान भी किया था।

Published / 2021-12-13 15:13:44
श्रीलंका, नेपाल और मालदीव से सुधरते संबंध

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्ष 2021 समाप्त होने जा रहा है, इसलिए कई मुद्दों पर चर्चा हो रही है। इनमें सबसे प्रमुख कोविड है। लेकिन एक अन्य मुद्दा जो बीते एक साल में भारत की अवचेतना में प्रमुख रहा, वह चीन है। चीन बहुत से तरीकों से अपनी धौंस दिखा रहा है। निस्संदेह सीमा का घटनाक्रम पूरी तरह बाहर नहीं आया है, जिस पर अभी भारतीय संसद ने भी चर्चा नहीं की है। सरकार ने इस मुद्दे पर बजट सत्र में चर्चा का वादा किया था। साल खत्म होने को है, लेकिन देश को अभी सरकार की तरफ से यह नहीं बताया गया है कि चीन ने कितने क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। क्या भारत के कुछ ऐप पर रोक लगाने की जवाबी कार्रवाई चीन सरकार को अपने आक्रामक सैन्य रुख से रोक पाई है और भारत को आरसेप से बाहर रहने से कितना फायदा हुआ है। लेकिन एक चीज साफ है। श्रीलंका, मालदीव या नेपाल के मामले में भारत धीरे-धीरे ही सही मगर लगातार वह जमीन हासिल कर रहा है, जो उसने चीन को गंवा दी थी। यह दो रणनीतियां अपना रहा है- टेलीविजन एंकरों की अनुचित सलाह की अनदेखी कर रहा है और न केवल भारत के निकट पड़ोसी देशों की सरकारों बल्कि वहां के लोगों का भी दिलो-दिमाग जीतने के लिए ईमानदारी से कोशिश कर रहा है। वर्ष 2015 हाल के वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में सबसे खराब वर्ष रहा है। उस समय प्रधानमंत्री ने पदभार संभाला ही था और उनकी काठमांडू की पहली यात्रा के दौरान जन प्रतिनिधियों को उनके संबोधन ने नेपाली जनता को मंत्रमुग्ध कर दिया था। हालांकि उसके बाद सब कुछ ठीक नहीं रहा। वर्ष 2015 में आर्थिक नाकेबंदी और भारत के 2015 के संविधान को स्वीकार करने में दृढ़ निश्चय के अभाव ने वहां के जनमत को भारत के खिलाफ बना दिया। यह चीन के लिए फायदेमंद था। लेकिन उसके बाद चीन ने भी नेपाली राजनीति में ज्यादा दखल देकर ठीक वही गलती की, जो भारत ने की थी। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने 2019 में नेपाल की अपनी पहली यात्रा में नेपाल को बताया कि उसके बारे में उनका देश क्या सोचता है। वह भी उस देश (नेपाल) को, जिसे कोई अपना उपनिवेश नहीं बना पाया। खबरों के मुताबिक शी ने कहा कि जो कोई चीन को विभाजित करने की कोशिश करेगा, उसे कुचल दिया जाएगा और जो कोई चीन विरोधी गतिविधियों की कोशिश करेगा, उसकी हड्डियां चकनाचूर कर दी जाएंगी। कहने का मतलब यह है कि एक समय था, जब चीन के लोग नेपाल के बहुत से स्कूलों में देखे जा सकते थे। वे स्थानीय लोगों के साथ रहते थे और बच्चों को मंदारिन सिखाते थे। वे लोग अब नेपाल से चले गए हैं। पूरे नेपाल में भोटे (तिब्बती मूल के बौद्धों को कहा जाता है) चुपके-चुपके जमीन खरीद रहे हैं और गुंबा (पूजा स्थल) बना रहे हैं। बाद में वे देश में मधेशियों की तरह एक शक्तिशाली चीन विरोधी ताकत बन जाएंगे। वर्ष 2017 में नेपाल में 18 घंटे बिजली कटौती होती थी। लेकिन अब वह भारत को बिजली का निर्यात (केवल 39 मेगावॉट लेकिन यह शुरूआत है) करने और पारेषण लाइनों के विकास से अपनी बिजली क्षमता को बढ़ाने की स्थिति में है। यह सही है कि भारत के कालापानी क्षेत्र को नेपाल के नक्शे में शामिल करने को लेकर तनाव है, जिसे पूरे सदन ने मंजूरी दी थी। नेपाल उस क्षेत्र में अपनी 12वीं राष्ट्रीय जनगणना करने के तरीके के बारे में विचार कर रहा है, लेकिन अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किए बिना। अच्छी बात यह है कि भारतीय न्यूज एंकरों को अभी इसकी जानकारी नहीं है। कारोबारी-योगी बाबा रामदेव पिछले महीने काठमांडू में थे और प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा ने योग के लिए समर्पित पतंजलि टीवी स्टेशन का उद्घाटन किया। अगर नेपाल के हिंदू राष्ट्र बनने की चर्चा हो रही है तो ऐसा केवल कुछ नेपाली कह रहे हैं। इस सप्ताह सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस के सम्मेलन में शरीक होने का आमंत्रण न केवल रामदेव बल्कि हिंदू राष्ट्र के विचार की कटु आलोचक ममता बनर्जी को भी मिला है, जो इसमें शामिल होने के लिए यह आलेख लिखे जाने तक सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रही थीं। श्रीलंका में चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी नहीं बल्कि अदाणी समूह वेस्ट कंटेनर टर्मिनल बनाएगा और पवन एवं नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में अहम निवेश करेगा। कोलंबो में भारत के राजदूत हर उस बैठक में मौजूद रहे, जो गौतम अदाणी ने श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ की। इसके बाद कुशीनगर हवाई अड्डे के उद्घाटन हुआ, जिसमें सांसद और प्रधानमंत्री के बेटे नमल राजपक्षे मुख्य अतिथि थे। इसके बाद लंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे ने चुपके से दिल्ली की यात्रा की। जब श्रीलंका के पास महज तीन सप्ताह के आयात की विदेशी मुद्रा थी तो उसने चीन या आईएमएफ के बजाय भारत का रुख किया। इतिहास में पहली बार भारतीय सेना की एक यूनिट ने श्रीलंकाई सेना की गजाबा रेजिमेंट की एक यूनिट की सह-बटालियन बनने के लिए करार किया है। संयोग से गजाबा रेजिमेंट राष्ट्रपति की रेजिमेंट है। मालदीव की एक अदालत द्वारा विपक्षी नेता अब्दुल्ला यामीन (जो चीन का पथ प्रदर्शक थे) को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त किए जाने के बाद भारत इस पड़ोसी देश के घटनाक्रम पर नजर रखेगा। भाजपा में बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनका मानना है कि वे विदेश मंत्री एस जयशंकर का काम ज्यादा बेहतर तरीके से कर सकते थे। जयशंंकर भाजपा में आने वाले नए व्यक्ति हैं। विदेश मंत्री ने अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान प्रचलित विनम्रता को छोड़कर भारत की मानवाधिकार नीति के डेमोक्रेटिक आलोचकों को आड़े हाथ लेते समय शायद महसूस किया होगा कि इसका ज्यादा हजार्ना चुकाना पड़ रहा है। लेकिन कम से कम उपमहाद्वीप में शांति और संतुलन है।

Published / 2021-12-11 13:13:54
बढ़ता प्रदूषण और खतरे में हमारी भावी पीढ़ी...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। चेन्नई और मुंबई का नियतकालीन जल-प्लावन और दिल्ली की जहरीली हवा सरकारों के समक्ष ऐसी चुनौती है, जिसका समाधान कर पाने की लगन न तो राजनेताओं के पास है और न ही क्रियान्वयन के उत्तरदायी नौकरशाहों ने अपेक्षित क्षमता अभी तक दिखाई है। लेकिन समाधान तो निकालना ही पड़ेगा, उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित करने होंगे और अपनी जिम्मेवारी अन्य पर टालने को अस्वीकार्य अक्षमता मानना होगा। सांस लेने का कोई विकल्प किसी के पास उपलब्ध नहीं है। मीडिया में लगभग प्रतिदिन दोहराया जाता है कि दिल्ली की हवा खतरनाक स्तर तक प्रदूषित है, जहरीली है। यह कुछ इस प्रकार से प्रस्तुत होता है कि जैसे अन्य शहरों में ऐसी कोई समस्या हो ही नहीं। विश्व के सबसे अधिक प्रदूषित पहले दस शहरों में दिल्ली सबसे ऊपर है, कोलकता चौथे और मुंबई छठे स्थान पर है। अभी कुछ दिन पहले ही गाजियाबाद की हवा दिल्ली से अधिक जहरीली आंकी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय डांट-फटकार के अतिरिक्त ऐसा कुछ नहीं कर पा रहा, जिससे सरकारें और नौकरशाह अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व को गंभीरता से स्वीकार करें और उनका निष्पादन करें। सर्वोच्च न्यायालय तक को यह कहना पड़ा है कि नौकरशाही चाहती है कि अदालत निर्णय करे, और वही उसे क्रियान्वित करे! माननीय न्यायाधीशों की पीठ ने यह भी कहा कि टेलीविजन की बहसें अधिक प्रदूषण फैला रही हैं, हर किसी का अपना एजेंडा होता है। और इसी कारण विभिन्न सरकारें और पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न पक्षों से जुड़ी संस्थाएं आपस में एक जीवंत कार्यकारी संवाद स्थापित नहीं कर पाती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि दिल्ली के वायु प्रदूषण के लिए कोई जिम्मेवार नहीं है। इससे बड़ी आवश्यकता यह होगी कि इसमें उत्तरदायित्व निर्वहन को चुनावों से जोड़ कर न देखा जाए, जो आज के वातावरण में अत्यंत कठिन है, किन यह असंभव नहीं है, क्योंकि इन प्रयासों में शिथिलता कोई कैसे कर सकता है, जब वह स्वयं और उसका परिवार भी इससे पीड़ित है। इस समय उस सिविल सोसाइटी- सभ्य समाज- की आवश्यकता है, जो बिना किसी वैचारिक/ राजनीतिक प्रतिबद्धता के सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक आचरण को बड़े पैमाने पर प्रेरित कर सके। दुर्भाग्य से ऐसा कोई वर्ग उपस्थित नहीं है। अगर प्रबुद्ध वर्ग इस प्रकार के विकल्प पर विमर्श नहीं करेगा, तो निश्चिंत रहें, अगले वर्ष फिर से पूरी प्रक्रिया का पुनर्मंचन होगा। जहरीली हवा में दिल्लीवासियों तथा अनेक अन्य शहरों के रहवासियों को साल-दर-साल रहने को मजबूर होना व्यवस्था की शिथिल कार्य संस्कृति, सामजिक उत्तरदायित्व अवहेलना और मानवीय मूल्यों को आत्मसात न कर पाने को ही मानना होगा। इक्कीसवीं सदी में परिवर्तन की तेजी से सभी नागरिक तथा जनहित में सक्रिय सरकारें भली भांति परिचित हैं। जिनके पास दूरदृष्टि है, वही अपनी गतिशीलता बनाए रख पाते हैं और समय के साथ चल सकते हैं। यह भी स्पष्ट है कि सच्चे प्रजातंत्र में राष्ट्रहित के ऐसे अनेक कार्य होंगे, जिन पर राजनीति को अलग रख कर केवल जनहित को प्राथमिकता देनी होगी। जहरीली हवा के प्रकरण में यह सभी को पिछले साल से ही ज्ञात था कि 2021 के अक्तूबर-नवम्बर में विकट स्थिति पुन: एक बार बनेगी, मगर सितंबर-अक्तूबर तक भी कोई सक्रियता दिखाई नहीं दी। पराली के स्वीकृत उपयोग के लिए मशीनों पर अस्सी प्रतिशत सबसिडी केंद्र सरकार देती है तथा बीस प्रतिशत पंचायत से अपेक्षित है। राज्य सरकारें अगर ईमानदारी से चाहतीं, तो उचित संख्या में किसानों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ न डालते हुए अपेक्षित संख्या में ये मशीनें उपलब्ध करा सकती थीं। लेकिन निष्क्रियता, उदासीनता और चलता है की संस्कृति में यह नहीं हो सका। ऐसे कोई आसार दिखाई नहीं देते हैं कि अगले साल तक इस समस्या का समाधान हो जाएगा। चेन्नई और मुंबई का नियतकालीन जल-प्लावन और दिल्ली की जहरीली हवा सरकारों के समक्ष ऐसी चुनौती है, जिसका समाधान कर पाने की लगन न तो राजनेताओं के पास है और न ही क्रियान्वयन के उत्तरदायी नौकरशाहों ने अपेक्षित क्षमता अभी तक दिखाई है। लेकिन समाधान तो निकालना ही पड़ेगा, उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित करने होंगे और अपनी जिम्मेवारी अन्य पर टालने को अस्वीकार्य अक्षमता मानना होगा। वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन वैश्विक समस्याएं बन चुके हैं। विश्व भर में सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने इन दोनों क्षेत्रों में समग्र रूप से अनेक कार्य किए, कदम उठाए, उपलब्धियां अनेक हैं, लेकिन संमस्याओं के परिमाण अब भी चिंता बढ़ा रहे हैं। आज से पचास साल पहले पर्यावरण को लेकर 5-16 जून, 1972 में स्टाकहोम में पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन हुआ था। जलवायु परिवर्तन पर पहला विश्व सम्मलेन 12-23 फरवरी, 1979 को जिनेवा में आयोजित हुआ था। भारत इनमें महत्त्वपूर्ण भागीदार रहा है। देश के पास अपेक्षित बौद्धिक संपदा, विशेषज्ञता और संसाधन उपलब्ध हैं। दुर्भाग्य से तिबद्धता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के प्रति पूर्ण समर्पण की कार्य संस्कृति की कमी है। इसके लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण का सहारा लेना होगा। दीर्घकालीन दृष्टि विकसित करने के लिए शिक्षा का सहारा लेना होगा, क्योंकि व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण का आधार वहीं पर पनपता और स्वरूप लेता है। 13 जुलाई, 2004 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय दिया था कि कक्षा एक से बारह तक पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाए। इसके लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर एनसीइआरटी ने पाठ्यक्रम की रूपरेखा मार्च, 2004 को न्यायालय को प्रस्तुत की थी। यह सभी राज्यों को भेजी गई तथा प्रत्येक राज्य सरकार ने उसे स्वीकृति प्रदान की, लेकिन मई, 2004 में केंद्र में सरकार बदलने के बाद इसे लागू नहीं किया गया। अगर किया गया होता तो आज युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी शासन-प्रशासन चला रही होती, जो पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के सभी पक्षों की समझ के साथ कार्य कर रही होती। नई शिक्षा नीति-2020 के आधार पर जो नया पाठ्यक्रम बनने वाला है, उसके निर्माण के समय इस तथ्य पर ध्यान देना उपयोगी रहेगा।

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