एबीएन डेस्क। 26 मई 2014 की शाम राष्ट्रपति भवन में दूधिया रंग के सफेद कुरते-पायजामे पर घी के रंग की सदरी पहने जिस व्यक्ति ने नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली उसने कभी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने का काम किया था। यह तथ्य भारत के लोकतंत्र की मजबूती को बयान करने के साथ-साथ इस शख्सियत के कठोर परिश्रम, राजनीतिक कौशल और जन प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। श्री नरेंद्र मोदी उस नेता को बेदखल करके आए थे, जो अपनी शानदार शैक्षणिक और अकादमिक उपलब्धियों के लिए जाने जाते थे। मगर ऐसा क्या था, जो लोगों ने उन्हें हटा कर एक ऐसे नेता को बड़ा बहुमत देकर चुना जो शैक्षणिक-अकादमिक उपलब्धियों के लिए नहीं जाना जाता था। दरअसल इस नेता का सेवाभाव और जवाबदेही लेने के लिए आगे खड़ा होना उसे खास बनाता था। 2014 की उस शाम से लेकर अब तक यह यात्रा लगातार जारी है और एक के बाद एक फैसले लेकर मोदी ने अपने मतदाताओं को आश्वस्त किया है कि उन्हें जिस कार्य के लिए चुना गया है वे उसे तत्परता से कर रहे हैं। हालांकि इसके बहुत पहले श्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा शुरू हो चुकी थी। 2001 में जब गुजरात में एक बड़ा भूकंप आया था और पूरा गुजरात पस्त हुआ पड़ा था, तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए। लेकिन उन्होंने अपनी प्रशासनिक कुशलता दिखाते हुए विश्वकर्मा की तरह बेहद कम समय में गुजरात को दोबारा से खड़ा किया। मुख्यमंत्री बने कुछ ही महीने हुए थे कि गुजरात दंगों की आग में बुरी तरह से झुलस गया। यह कोई पहली बार नहीं था अपितु गुजरात में सांप्रदायिक झड़पों का लंबा इतिहास रहा था। यह उसी की एक कड़ी थी। लेकिन उनके कड़े प्रशासन ने इसके बाद किसी दंगे की पुनरावृत्ति नहीं होने दी। दंगों के दौर से निकाल कर उन्होंने गुजरात को शानदार बिजनेस समिट दिए। वे पहले भारतीय मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने विदेशों में बसे भारतवंशियों की ताकत को पहचाना और राज्य के विकास में उनकी एक सक्रिय भूमिका तय की। वाइब्रेंट गुजरात समिट से वे प्रवासी भारतीयों को आकर्षित करते रहे। आज जबकि वे प्रधानमंत्री हैं उनकी यह ताकत बनी हुई है और विदेशों में बसे भारतीय वहां नए भारत के दूत बने हुए हैं। यही नहीं, जिन मुद्दों पर भारत का राजनीतिक वर्ग में डर कर बात भी नहीं करता था, उन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने निर्भय होकर काम किया और उनके हर साहसिक काम के लिए जनता से पुरस्कार भी मिला। उन्होंने धारा 370 जैसे देश विरोधी अनुच्छेद को समाप्त किया। तो सदियों से अटके पड़े राम-मंदिर के मुद्दे के भी समाधान में बड़ी भूमिका निभाई। सबसे बड़ी बात है कि बिना किसी हिंसा के यह दोनों कार्य संपन्न हुए। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने विकास सबका, तुष्टिकरण किसी का नहीं की नीति का अनुसरण किया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद तीन तलाक पर कानून इसी की एक कड़ी थी, जिसके कारण मुस्लिमों के एक बड़े तबके का विशेषकर महिलाओं का विश्वास और वोट उन्हें मिला। इस प्रकार उन्होंने भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में एक समावेशी सरकार दी और सबका साथ सबका विकास का नारा बुलंद किया, जो अब सबका विश्वास और सबका प्रयास से आगे बढ़ेगा। मोदी की दृष्टि ऐसी रही है जिसमें हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ है। वे जहां पूंजी का सृजन कर रहे हैं, तो वहीं समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों को सीधे आर्थिक लाभ, जनकल्याणकारी योजनाएं और सुविधाएं देकर उन्हें भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे श्री नरेंद्र मोदी एक देश के रूप में भारत के उन अधूरे सपनों को पूरा कर रहे हैं जो हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने कभी देखे थे। स्वच्छता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सपना था। डॉ राममनोहर लोहिया देश की महिलाओं को धुआं रहित जीवन देना चाहते थे। स्वच्छ भारत, उज्ज्वला योजना, मुद्रा लोन देश की किस्मत संवर रही है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौरान जिस तरह से उन्होंने गरीब वर्ग की रोजी-रोटी का ध्यान रखा है वह आपदा को अवसर में बदलने की तरह था। जब श्रमिक शहर छोड़ कर गांवों की ओर पलायन कर रहे थे, तब उनके श्रम का रचनात्मक प्रयोग करते हुए रिकॉर्ड संख्या में प्रधानमंत्री आवास योजना के घर बनाए गए। महामारी आई और कई देशों की समृद्धि लेकर चली गई, लेकिन मोदी के नेतृत्व में भारत ने न केवल कम समय में टीका बनाया बल्कि इसे सबके लिए मुफ्त और सुलभ भी किया। सबको अहसास हुआ कि इस मुश्किल घड़ी में सरकार उनके साथ मजबूती से खड़ी है। पिछड़ा वर्ग आयोग को संविधानिक दर्जा, राज्यों को ओबीसी पहचान का अधिकार, मेडिकल-नीट के अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण और केंद्रीय मंत्रिमंडल में ओबीसी के मंत्रियों की अभूतपूर्व सर्वाधिक संख्या देकर प्रधानमंत्री मोदी ने इनकी भागीदारी सुनिश्चित की। उधर, इक्कसवीं सदी के भारत को अपने सपनों और जरूरतों को पूरा करने के लिए जिस तरह के शिक्षा नीति की आवश्यकता थी, उसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लाकर पूरा कर दिया है। कौशल विकास पर जोर, भारतीय भाषाओं के विकास पर ध्यान देकर भारत की शिक्षा व्यवस्था पर लगे मैकाले के शाप का शमन भी कर दिया है। माननीय प्रधानमंत्री जी का झारखंड से गहरा लगाव रहा है। श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिया गया, तो आज मोदी जी उस झारखंड को संवारने का काम कर रहे हैं। उनके शासनकाल से पहले शायद ही झारखंड को इतना महत्व मिला हो। वे प्रधानमंत्री बनने के बाद 12 बार (चुनावी सभाओं को छोड़कर) झारखंड के दौरे पर आयें हैं। झारखंड से उन्होंने देश को कई बड़ी योजनाओं की सौगात दी। इसमें सबसे प्रमुख है आयुष्मान भारत। स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए मील का पत्थर साबित हो रही इस योजना का शुभारंभ उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा की पावन धरा से ही किया। इसके अलावा प्रधानमंत्री मानधन योजना, खुदरा व्यापारिक एवं स्वरोजगार पेंशन योजना की शुरुआत भी झारखंड से की गयी। ग्राम स्वराज योजना के तहत ग्राम उदय से भारत उदय अभियान का समापन जमशेदपुर से किया। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए भी उन्होंने रांची को चुनकर विश्व पटल पर पहचान दिलायी। उन्होंने झारखंड को दोनों हाथों से सौगातें दी। झारखंड के हर गांव-घर में शौचालय हो या 70 सालों से सुदूर गांवों में बिजली पहुंचानी हो। मोदी जी ने हमेशा झारखंड को प्राथमिकता दी। इसके अलावा स्वास्थ्य क्षेत्र में उपेक्षित झारखंड को पांच मेडिकल कॉलेज, देवघर में एम्स समेत अन्य सौगातें दीं। वहीं आइआइटी, सिपेट, इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट, केंद्रीय विद्यालय, एकलव्य विद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय, खेल यूनिवर्सिटी, रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय आदि से शैक्षणिक व्यवस्था मजबूत की। संथाल के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए साहेबगंज में गंगा नदी पर मल्टीमॉडल टर्मिनल शुरू कर झारखंड को दुनिया से सीधा जोड़ दिया। अब झारखंड से बंग्लादेश व अन्य पड़ोसी देशों के लिए जलमार्ग से यातायात शुरू हो गया है। पवित्र नगरी देवघर में जल्द ही हवाई अड्डा, मलूटी के मंदिरों का कायाकल्प, सिंदरी खाद कारखाने का पुनरुद्धार, राज्य में वर्षों से अटकी पड़ी रेल परियोजनाओं को गति भी मोदी जी के कारण ही मिली है। 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल जी के द्वारा शिलान्यास किये गये एनटीपीसी के उत्तरी कर्णपुरा पावर प्लांट 16 वर्षों के बाद लोकार्पण हो या वर्ष 1970 से फाइलों में बन रहे मंडल डैम का 2019 में शिलान्यास का काम यह साबित करता है कि वे कितना रम कर काम करते हैं। उनके झारखंड के प्रति स्नेह की सूची काफी लंबी है। मोदी के नेतृत्व में सरकार ने मीलों का सफर तय किया है। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने देश में मूलभूत सुविधाओं पर जोर दिया, तो दूसरे कार्यकाल में देश व देशवासियों को आर्थिक रूप से समृद्ध करने का काम कर रहे हैं। लेकिन देश हित और जनहित में कई लक्ष्य छूना बाकी है। इस नरेंद्र का आदर्श एक अन्य नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद जी) का यह प्रेरक वचन है, उठो, जागो और तब तक नहीं रुको, जब तक कि लक्ष्य न प्राप्त हो जाए। ये लक्ष्य है भारत को विश्व गुरु बनाना। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि भारत की जनता इस महान विजन वाले मजबूत प्रधानमंत्री को अपना समर्थन जारी रखे। (लेखक झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
एबीएन डेस्क। राष्ट्रभाषा के विकास के मूल्यांकन का दिन है। हिंदी बेचारी न हो वैचारिक विमर्श में बनी रहे यह आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी के कठोर प्रहार से अंग्रेजी को बचाने का सार्थक प्रयास का भी दिन है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक तथ्य यह भी है कि 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा व्यौहार राजेन्द्र सिंह का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए। बोलने वालों की संख्या के अनुसार अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। लेकिन उसे अच्छी तरह से समझने, पढ़ने और लिखने वालों में यह संख्या बहुत ही कम है। यह और भी कम होती जा रही। इसके साथ ही हिन्दी भाषा पर अंग्रेजी के शब्दों का भी बहुत अधिक प्रभाव हुआ है और कई शब्द प्रचलन से हट गए और अंग्रेजी के शब्द ने उसकी जगह ले ली है। जिससे भविष्य में भाषा के विलुप्त होने की भी संभावना अधिक बढ़ गई है। इस कारण ऐसे लोग जो हिन्दी का ज्ञान रखते हैं या हिन्दी भाषा जानते हैं, उन्हें हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है जिससे वे सभी अपने कर्तव्य का पालन कर हिन्दी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचा सकें। लेकिन लोग और सरकार दोनों ही इसके लिए उदासीन दिखती है। हिन्दी तो अपने घर में ही दासी के रूप में रहती है। हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन क्या नहीं जुटाया जा सकता? इसके ऐसे हालात आ गए हैं कि हिन्दी दिवस के दिन भी कई लोगों को ट्विटर पर हिन्दी में बोलो जैसे शब्दों का उपयोग करना पड़ रहा है। मैं हिंदी माध्यम से पढ़ी। अंग्रेजी सहित भाषाओं के महत्व को समझती हूं। क्षेत्रिय भाषाओं का भी सम्मान मेरे दिल में है। इसके अलावा जो वर्ष भर हिन्दी में अच्छे विकास कार्य करता है और अपने कार्य में हिन्दी का अच्छी तरह से उपयोग करता है, उसे पुरस्कार द्वारा सम्मानित किया जाता है। कई लोग अपने सामान्य बोलचाल में भी अंग्रेजी भाषा के शब्दों का या अंग्रेजी का उपयोग करते हैं, जिससे धीरे धीरे हिन्दी के अस्तित्व को खतरा पहुंच रहा है। यहां तक कि वाराणसी में स्थित दुनिया में सबसे बड़ी हिन्दी संस्था आज बहुत ही खस्ता हाल में है। इस कारण इस दिन उन सभी से निवेदन किया जाता है कि वे अपने बोलचाल की भाषा में भी हिन्दी का ही उपयोग करें। इसके अलावा लोगों को अपने विचार आदि को हिन्दी में लिखने भी कहा जाता है। चूंकि हिन्दी भाषा में लिखने हेतु बहुत कम उपकरण के बारे में ही लोगों को पता है, इस कारण इस दिन हिन्दी भाषा में लिखने, जाँच करने और शब्दकोश के बारे में जानकारी दी जाती है। हिन्दी भाषा के विकास के लिए कुछ लोगों के द्वारा कार्य करने से कोई खास लाभ नहीं होगा। इसके लिए सभी को एक जुट होकर हिन्दी के विकास को नए आयाम तक पहुँचाना होगा। हिन्दी भाषा के विकास और विलुप्त होने से बचाने के लिए यह अनिवार्य है। राष्ट्रभाषा सप्ताह या हिन्दी सप्ताह 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस से एक सप्ताह के लिए मनाया जाता है। इस पूरे सप्ताह अलग अलग प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन विद्यालय और कार्यालय दोनों में किया जाता है। इसका मूल उद्देश्य हिन्दी भाषा के लिए विकास की भावना को लोगों में केवल हिन्दी दिवस तक ही सीमित न कर उसे और अधिक बढ़ाना है। इन सात दिनों में लोगों को निबंध लेखन, आदि के द्वारा हिन्दी भाषा के विकास और उसके उपयोग के लाभ और न उपयोग करने पर हानि के बारे में समझाया जाता है। हिन्दी दिवस पर हिन्दी के प्रति लोगों को उत्साहित करने हेतु पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है। जिसमें कार्य के दौरान अच्छी हिन्दी का उपयोग करने वाले को यह पुरस्कार दिया जाता है। यह पहले राजनेताओं के नाम पर था, जिसे बाद में बदल कर राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार और राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार कर दिया गया। राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार लोगों को दिया जाता है जबकि राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार किसी विभाग, समिति आदि को दिया जाता है। यह पुरस्कार तकनीकी या विज्ञान के विषय पर लिखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को दिया जाता है। इसमें दस हजार से लेकर दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार होते हैं। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को 2 लाख रुपये द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को डेढ़ लाख रुपये और तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को पचहत्तर हजार रुपये मिलता है। साथ ही दस लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में दस-दस हजार रुपये प्रदान किए जाते हैं। पुरस्कार प्राप्त सभी लोगों को स्मृति चिह्न भी दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाना है। इस पुरस्कार योजना के तहत कुल 39 पुरस्कार दिये जाते हैं। यह पुरस्कार किसी समिति, विभाग, मण्डल आदि को उसके द्वारा हिन्दी में किए गए श्रेष्ठ कार्यों के लिए दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिन्दी भाषा का उपयोग करने से है। हिंदी कई माध्यमों से विश्व में फैल भी रही है और समझी भी जा रही है। सात सुरों की महक और धमक का प्रवाह जारी ही रहेगा। कम से कम हम हिन्दुस्तानी हिंदी में हस्ताक्षर करने का कष्ट तो उठा ही सकते हैं एक निष्ठा के साथ। (लेखिका डॉ मेरी ग्रेस उर्सूलाइन इंटर कॉलेज, रांची की प्राचार्या हैं।)
एबीएन डेस्क। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देशवासियों से मूल कार्यों में अपनी मातृभाषा के साथ-साथ हिंदी का प्रयोग करने का संकल्प लेने की अपील की। शाह ने हिंदी दिवस के मौके पर मंगलवार को देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए एक ट्वीट किया कि हिंदी दिवस के अवसर पर मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि मूल कार्यों में अपनी मातृभाषा के साथ राजभाषा हिंदी का उत्तरोत्तर प्रयोग करने का संकल्प लें। मातृभाषा व राजभाषा के समन्वय में ही भारत की प्रगति समाहित है। आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। बता दें कि संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया था और इसके बाद से हर वर्ष इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
एबीएन डेस्क। काल के कपाल पर नई लकीर खींचने के लिए लंबी उम्र की नहीं बल्कि बड़े हौसले की आवश्यकता होती है। आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह और हिंदी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन छोटा रहा। वह मात्र 35 सालों तक ही जीवित रहे । बहुत ही कम समय मिलने के बावजूद उन्होंने हिंदी साहित्य की बड़ी सेवा की और उसे नई राह पर लाकर खड़ा कर दिया। भक्ति काल के बाद हिंदी साहित्य का रीतिकाल आया, जिसमें जनता से जुड़ी बातें हाशिए पर डाल दी गईं और राजा-महाराजाओं की कपोल कल्पित दस्तानों पर कविताएं लिखी जा रही थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने साहित्य को रीतिकाल की कपोल कल्पना से बाहर निकाला और साहित्य को समाज सुधार एवं राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाए जाने पर जोर दिया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, भारतेंदु का पूर्ववर्ती काव्य साहित्य संतों की कुटिया से निकलकर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुंच गया था। उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मंदाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ उसे दरबारीपन से निकालकर लोकजीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 बनारस के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनका मूल नाम हरिश्चन्द्र था और भारतेन्दु उनकी उपाधि थी। भारतेन्दु आधुनिक हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी थियेटर के भी पितामह कहे जाते हैं। उनके पिता गोपाल चंद्र एक कवि थे। वह गिरधर दास के नाम से कविता लिखा करते थे। भारतेन्दु जब 5 वर्ष के हुए तो मां का साया सर से उठ गया और जब 10 वर्ष के हुए तो पिता का भी निधन हो गया। भारतीय नवजागरण की मशाल थामने वाले भारतेंदु ने अपनी रचनाओं के जरिए गऱीबी, गुलामी और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। सिर्फ पैंतीस वर्ष की उम्र पाने वाले भारतेंदु की अनेक विधाओं पर पकड़ थी। वे एक गद्यकार, कवि, नाटककार, व्यंग्यकार और पत्रकार थे। उन्होंने बाल विबोधिनी पत्रिका, हरिश्चंद्र पत्रिका और कविवचन सुधा पत्रिकाओं का संपादन किया। भारतेन्दु ने सिर्फ 18 वर्ष की उम्र में कविवचनसुधा पत्रिका निकाली, जिसमें उस वक्त के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं प्रकाशित होती थीं। हिंदी में नाटकों की शुरूआत भारतेन्दु हरिश्चंद्र से मानी जाती है। नाटक भारतेन्दु के समय से पहली भी लिखे जाते थे, लेकिन बाकायदा तौर पर खड़ी बोली में नाटक लिखकर भारतेन्दु ने हिंदी नाटकों को नया आयाम दिया। भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरूआत बांग्ला के विद्यासुंदर (1867) नाटक के अनुवाद से हुई। तेज याददाश्त और स्वतंत्र सोच रखने वाले भारतेन्दु कई भारतीय भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने अपनी मेहनत से संस्कृत, पंजाबी, मराठी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती भाषाएं सीखीं। हालांकि, अंग्रेजी उन्होंने बनारस में उस दौर के मशहूर लेखक राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द से सीखी। एक दौर में भारतेन्दु की लोकप्रियता शिखर पर थी, जिससे प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने उन्हें 1880 में भारतेंदु की उपाधि दी। भारतेन्दु के विशाल साहित्यिक योगदान के कारण 1857 से 1900 तक के काल को भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है। 6 जनवरी 1885 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज करवट ले रहा था। यूरोपीय लोगों के संपर्क और सामंती व्यवस्था से मुक्ति की प्रक्रिया एक साथ चल रही थी। राजा राममोहन राय, रामकृष्ण परमहंस, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले सहित अनेक समाज सुधारक स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह आदि की वकालत कर रहे थे तो सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध भी कर रहे थे। समाज में आ रहे बदलाव की आहट साहित्यिक क्षेत्र में भी सुनाई देना स्वाभाविक था। भारतेंदु हरिश्चंद्र नई चेतना के अग्रदूत के रूप में सामने आए और उन्होंने सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्व से युक्त रचनाएं की। आर्थिक असमानता, ग्रामीण समाज में गरीबी, पराधीनता, अमानवीय शोषण आदि को उन्होंने अपनी साहित्यिक रचनाओं का विषय बनाया। स्वयं तो लगातार लिखा ही, सैंकड़ों दूसरे लोगों को भी लिखने और सांस्कृतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए प्रेरित किया। जब वह 18 वर्ष के थे तो उन्होंने कवि वचन सुधा पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। 23 वर्ष की अवस्था में उन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन और 24 वर्ष की अवस्था में स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बाला बोधिनी पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। पूरे देश के लोगों को इन पत्रिकाओं में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होंने तदीय समाज की स्थापना की। नाटक हो, निबंध हो, कहानी हो या आलोचना, सर्वत्र उन्होंने पुराने ढांचे के अवयवों के खिलाफ काम किया जो समय के अनुकूल नहीं रह गए थे। राजनीतिक स्वाधीनता की चाहत तो वह रखते ही थे, मनुष्य की एकता, समानता और भाईचारा को भी उन्होंने समान महत्व दिया। अपने समकालीन साहित्यकारों को प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने साहित्य को सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना से युक्त किया। अंधेर नगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, भारत दुर्दशा, जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने प्रगतिशील आधुनिक समाज की परिकल्पना करते हुए दुर्भावना एवं भेदभाव आधारित व्यवस्था की समाप्ति की कामना की। 9 सितंबर को भारतेंदु हरिश्चंद्र की 171वीं जयंती है। उनको याद करना एक ऐसे मनीषी को याद करना है, जिन्होंने हिंदी साहित्य को नए भाव बोध की जमीन पर उतारते हुए लोक को राजसत्ता से अधिक महत्व दिया, जिन्होंने बढ़ते ब्रिटिश आभामंडल को चुनौती देते हुए पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं का नारा बुलंद किया, जिन्होंने दकियानूसी विचारों को चुनौती दी और पाश्चात्य जगत के सुंदर विचारों को साहित्य एवं समाज में स्थान दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र एक ऐसे महामानव थे जिन्होंने साहित्य और संस्कृति के माध्यम से बेहतर समाज की रचना के लिए अपना पूरा जीवन और पुरखों का लगभग पूरा धन समर्पित कर दिया।
एबीएन डेस्क। पूरा देश हर साल पांच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाता है। यह दिन भारत के पहले उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उन्होंने ने ही इस दिन को शिक्षकों को समर्पित करने की इच्छा जाहिर की थी। भारत में 5 सितंबर का दिन शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जा रहा है। इस मौके पर देशभर में बच्चे अपने शिक्षकों के प्रति अलग-अलग तरह से अभिवादन प्रकट कर रहे हैं। एक शिक्षक का अर्थ आमतौर पर किसी ऐसे व्यक्ति से लगाया जाता है, जिसके पास अपने क्षेत्र में ज्ञान का भंडार हो या वह अनुभवी हो। इसका सीधा सा अर्थ है कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने उम्र के कई पड़ावों में ज्ञानर्जन किया है, वही असली शिक्षक है। हालांकि, धीरे-धीरे यह धारणा या तो बदल रही है या इसे चुनौती दी जा रही है। अमर उजाला पेश कर रहा है ऐसे ही छह युवाओं के नाम जिन्होंने कम उम्र के बावजूद अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और पूरी दुनिया को सीख देकर खुद को शिक्षक के तौर पर पेश किया।
एबीएन डेस्क। विश्व हिंदू परिषद ने पूज्य संतो के आदेश से विश्व का सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा अहिंसक जनांदोलन प्रारंभ की। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के अनतर्गत देश के साढ़े तीन लाख गांवों में श्रीरामशिला पूजन हुई। 9 नवंबर 1989 को श्री कामेश्वर चौपाल जी के हाथों राम मन्दिर का शिलान्यास किए। 30 अक्टूबर,1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री की गर्वोक्ति को चूर कर हजारों कारसेवकों ने रामजी की नगरी में प्रवेश किया परन्तु अवध की इस पावन धरती पर रामभक्त्तों ने जल्लाद सरकार के द्वारा चलाए गए गोली खाकर अपने पवित्र रक्त से लाल करते हुए हिंदू समाज के लिए सैकड़ों कारसेवक सर्वोच्च बलिदान दे दिए। गीता जयंती (6 दिसंबर,1992) को देशभर से एकत्रित कारसेवक के आंखों में मन्दिर निर्माण का संकल्प ने न्यायालय का अवरोध को परवाह किए बगैर 1528 से हिन्दू पौरुष को चुनौती दे रहा कलंक का प्रतीक ढांचा कारसेवकों के कोप से ढह गया। यह हिंदू समाज का शौर्यावतार था। उसी दिन से टाट के मन्दिर में विराजमान रामलला, प्रस्तावित मंदिर के 60 प्रतिशत पत्थर और गांव-गांव से पूजित शिलाएं भव्य राममंदिर निर्माण की प्रतीक्षा श्रीअयोध्या जी में कर रहीं थीं। परिषद ने जागरण के महाभियान के साथ साथ कानूनी लड़ाई भी लड़ी। 30 सितम्बर, 2010 को न्यायालय ने भी रामलला की जन्मभूमि यही है यह मान तो लिया लेकिन जन्मभूमि का विभाजन कर दिया। हिंदू समाज को नैतिक विजय तो मिली लेकिन जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सका। देश की सर्वोच्च अदालत में अपील हुई। 6 वर्ष तक मामला जस का तस। एक बार तो न्यायालय ने यह तक कह दिया यह विषय हमारी प्राथमिकता में नहीं है। पूज्य संतो ने एक बार पुन: आह्वान किया हिन्दू समाज को। देश में 5 विराट सहित सैकड़ों हिन्दू सम्मेलन हुये। 25 नवम्बर 2018 को रामलला की नगरी में एक बार फिर आन्दोलन के प्रारंभिक काल का दृश्य दिखाई पड़ा। जनज्वार उमड़ा। हिन्दू ने अपनी प्राथमिकता बता दी राम जी के जन्मस्थान पर ही भव्य मंदिर बने। अंतत: वह शुभ घड़ी आ ही गयी मुख्य न्यायाधीश गोगोई जी की अध्यक्षता में खण्ड पीठ ने सर्वसम्मत निर्णय सुनाया जहां रामलला टाट के मन्दिर में विराजमान हैं, वही रामलला की जन्मभूमि है। मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया। 76 लड़ाइयों में हमारे लाखों पुरखों के बलिदान का सुफल हिंदू हृदय सम्राट माननीय अशोक सिंघल जी के प्रेरक नेतृत्व, महंथ अवैद्यनाथ जी,परमहंस रामचन्द्र दास जी जैसे हजारों पूज्य संतो के मार्गदर्शन का सुफल हिन्दू समाज के त्याग, साधना व बलिदान का सुफल 5 अगस्त, 2020 को भव्य मंदिर का भूमिपूजन से हुई। विगत 1000 वर्ष में हिंदू समाज के सबसे बड़ी विजय का महापर्व और हिंदू के स्वर्ण युग का पुनरारंभ हुआ। हमारी पीढ़ी भाग्यवान है, हम इस सुदिन के साक्षी रहे। विहिप के अह्वान पर 1996 में काश्मीर के आतंकवादियों की विरोध के चुनौतियों को स्वीकार कर लाखों हिंदुओं की अमरनाथ यात्रा, 2007 में श्रीरामसेतु को बचाने हेतु सड़क पर उतरना, बुढ़ा अमरनाथ यात्रा करना इत्यादि कई बड़े जनआंदोलन हुआ है। महर्षि देवल, परशुरामाचर्य, स्वामी रामानंद तथा स्वामी दयानन्द की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए विश्व हिंदू परिषद अपने स्थापना काल से ही धर्मांतरित बंधुओं के घर वापसी के सत्कार्य में लगा है। मठ मंदिर,अर्चक-पुरोहित तीर्थ और संस्कृत की पुनर्प्रतिष्ठा का कार्य भी परिषद् सफलता पूर्वक कर रहा है। गिरिवासी वनवासी अंचलों में अपने बंधुओं के बीच 1 लाख से अधिक एकल विद्यालयों के माध्यम से सेवा कार्य में निरंतर लगा हुआ ह। प्रतिवर्ष हजारो गोवंश की रक्षा, जेहादियों के चंगुल से हिंदू बहनों को मुक्त कराने सहित अनेक धर्मिक व सांस्कृतिक जनजागरण का कार्य निरन्तर चलाया जा रहा है। कर्नाटक स्थित हिंदू सम्मेलन में पूज्य संतगणों और पूज्य श्री गुरुजी की उपस्थिति में पूज्य संतों द्वारा हिंदू समाज में पराधीनता के लंबे कालखंड के दुष्परिणाम से व्याप्त अश्पृश्यता के विरुद्ध प्रस्ताव पारीत किए गए जो हिन्दू समाज के लिये ऐतिहासिक क्षण था। पूज्य संतो ने घोषणा की कि छुआछूत शास्त्रसम्मत नहीं, जन्म के आधार पर कोई बड़ा अथवा छोटा नहीं, कोई पावन नहीं, कोई अपवित्र नहीं, हम सब ऋषिपुत्र हैं, भारतमाता की सन्तान हैं व सहोदर भाई हैं। यहां हम हिंदू समाज को हिंदव: सोदरा: सर्वे,न हिन्दू पतितो भवेत। मम दीक्षा हिन्दू रक्षा,मम मन्त्र समानता।। एवं धर्मो रक्षति रक्षित: ध्येयवाक्य मिला। विश्व भर में निवास कर रहे हिन्दू समाज को जाति, मत, पंथ, भाषा, भौगोलिकसीमा से ऊपर उठकर आग्रही, संगठित, सशक्त, श्रद्धालु, अपने पूर्वज परम्परामान्यता - मानबिन्दुओं पर गौरव रखने वाले तथा इनकी पुनर्प्रतिष्ठा करने के लिये सर्वस्व न्योछावर करने का संकल्प लेने वाले हिन्दू को खड़ा करना विश्व हिन्दू परिषद मुख्य उद्देश्य है। विहिप के द्वारा गोवंशरक्षा, अपने ही देश में हिन्दू शरणार्थी, बांग्लादेशी घुसपैठिये, जेहादी आतंकवाद, लव जेहाद, नक्सलवाद, विदेशी धन से ईसाईकरण, सिमटती पतिपावनी गंगा तथा पर्यटन केंद्र में बदलता देवतात्मा हिमालय , मुस्लिम तुष्टिकरण, एक ही देश में दो विधान आदि विषयों पर निरन्तर चिन्तन कर समाधान के मार्ग ढुंढे जा रहे है तथा चुनौतियों का सामना करने के लिए अनथक श्रम कर गिरिवासी, वनवासी, नगरवासी,ग्रामवासी हिन्दू समाज में से लक्षाधिक कार्यकर्त्ता खड़ा कर गांव- गांव तक संगठन के तंत्र को फैला रहा है। झारखंड प्रांत के सभी पंचायतों में विहिप स्थापना दिवस कार्यक्रम 6 सितम्बर, 2021 तक मनाया जायेगा।
एबीएन डेस्क। भले ही चुनावों को लेकर औपचारिक प्रावधान बरकरार हैं लेकिन भारतीय लोकतंत्र राजनीतिक संस्कृति के एक बड़े संकट का सामना कर रहा है। इस संकट में सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच के संवाद, एक विविधतापूर्ण समाज में बहुसंख्यकवाद की बढ़ती वैधता, मूल अधिकारों और कानून प्रवर्तन के प्रावधानों के प्रभाव को लेकर भरोसा कम होना, केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के अधिकारों के अतिक्रमण के साथ संघवाद का क्षय, विकास संबंधी नीतियों का चुनावी नतीजों को लक्ष्य कर बनाया जाना आदि बातें शामिल हैं। भारतीय संविधान ने देश को धर्मनिरपेक्ष, उदार लोकतांत्रिक मूल्यों वाला बनाया और इसकी वजह थी विभाजन के सांप्रदायिक आधार को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया। संविधान सभा की बहसों को पढ़ने से भी यह बात प्रमाणित होती है। नेहरू युग में इसका बचाव एक ऐसे नेता ने किया जो दिल से धर्मनिरपेक्ष था, संसदीय परंपरा की इज्जत करता था और लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका की भी। सच तो यह है कि सत्ताधारी दल स्वयं विविध हितों वाले लोगों का समूह था और इसलिए विचारधारा आधारित शासन रोकने में मदद मिली। आज जिस दल का सत्ता पर कब्जा है वह विचारधारा आधारित राजनीतिक शक्ति है। ऐसा नहीं है कि संसदीय परंपरा और विपक्ष का यह सम्मान नेहरू युग की खासियत रही। बहुत बाद में पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी यह देखने को मिला। परंतु इन दिनों विपक्ष और सरकार के साथ रिश्तों की जो स्थिति है और कानून तथा नीतियां बनाने के पहले मशविरों के न होने ने भी उस विश्वास को कमजोर किया है जिसके आधार पर एक लोकतांत्रिक सरकार काम करती है। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है एक धर्मनिरपेक्ष और उदार लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारे भविष्य में आस्था बहाल करना और विविधता को लेकर व्यापक सहिष्णुता। यह बात संविधान की बुनियाद में अंतर्निहित है जिसके तहत सार्वभौमिक मताधिकार से शासन चलता है। इसका अर्थ है धर्म, जातीय पहचान, भाषा, लिंग और अन्य विविधता वाली बातों की भरपूर इज्जत करना। सन 1940 के दशक में सार्वभौमिक मताधिकार के कारण समाज में समता की भावना पैदा हुई जबकि हमारा समाज ऐसा जहां पदसोपानिक असमानता सामाजिक ढांचे और व्यक्तिगत मनोविज्ञान में गहरे तक धंसी हुई है। इससे संबंधित निर्देश विभिन्न जिलों में पदस्थ सभी अफसरशाहों तक पहुंचाए गए कि ऐसी सार्वभौमिक मतदाता सूची तैयार की जाए। पहले से मौजूद मतदाता सूचियां प्राय: सार्वभौमिक नहीं होती थीं और समुदायों द्वारा तैयार की जाती थीं। अफसरशाहों ने इस आदेश को गंभीरता से लिया। उदाहरण के लिए तत्कालीन बंबई के जिला कलेक्टर ने पूछा कि सड़कों पर रहने वालों को कैसे छोड़ा जा सकता है जबकि उनका तो कोई स्थायी पता भी नहीं होता। मेरा मानना है कि अफसरशाहों ने तय किया कि उनकी सोने की जगह को ही उनका पता माना जाए। यह नियम अब भी जारी है। आज जरूरत इस बात की है कि हमारी अफसरशाही शासन के हर स्तर पर ऐसी ही प्रतिबद्धता दिखाए। सार्वभौमिक मताधिकार जैसा सिद्धांत तब कारगर नहीं है जब समाज के किसी एक समूह की वैचारिकी हावी हो। लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ा खतरा बहुसंख्यकवादी अधिनायकवाद है। इससे बचने के लिए हमें ऐसी राजनीतिक संस्कृति और मीडिया की जरूरत है जो लोगों के बीच विश्वास बढ़ाए। सबसे पहले इस बात को चिह्नित करना होगा कि हम सब समान हैं और एक व्यक्ति का एक मत है। भले ही बहुसंख्यक वर्ग को जीत हासिल हो लेकिन अल्पसंख्यकों को भी अपने मतांतर के बचाव और संरक्षण का पूरा अधिकार है। यह भरोसा एक सक्रिय लोकतंत्र में पैदा होता है। दूसरी बात, इससे आगे यह भी कहा जा सकता है कि हर व्यक्ति अपना नजरिया पेश करने को स्वतंत्र है। इसका व्यावहारिक उदाहरण है लोकतंत्र में अल्पसंख्यक नजरिये को अभिव्यक्त करना। तीसरा, चरण एक कदम आगे का है जहां कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि अगर मैं आपकी जगह रहूं तो ऐसा कहूंगा। ऐसी बातें एक लोकतांत्रिक देश में अल्पसंख्यकों के नजरिये को व्यवहार में जगह देती हैं। मिसाल के तौर पर विद्यालयों में माथे पर स्कार्फ लगाने की इजाजत देना। हमें आज ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें सच्चाई, सम्मान, सभ्यता और संयम हों। यदि पुलिस कानून के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं द्वारा तय नियमों का पालन करेगी तो ऐसा नहीं होगा। बहुसंख्यक वर्ग के निगरानी दस्ते अल्पसंख्यक प्रदर्शनकारियों को जिस प्रकार प्रताड़ित करते हैं और उन्हें जो बचाव प्राप्त है वह स्तब्ध करने वाला है। पुलिस की कार्यप्रणाली को निष्पक्ष बनाने के अलावा हमें गैर सरकारी संस्थानों के अहम तत्त्वों में भी नई ऊर्जा का संचार करना होगा ताकि लोग साथी नागरिकों के साथ नैतिक बंधन महसूस कर सकें। देश में विविधता के सम्मान का एक अर्थ संघवाद का सम्मान करना भी होना चाहिए। संविधान में केंद्र सरकार शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। इसके लिए संघीय सरकार का इस्तेमाल किया गया है जो संविधान में संघवाद पर जोर को उजागर करता है। संभवत: संघवाद का सबसे अहम पहलू जिसमें सुधार की जरूरत है वह है राज्यपालों की नियुक्ति। सरकारिया आयोग ने इसे लेकर कुछ अनुशंसाएं कीं लेकिन उनका पालन नहीं किया गया और हम एक ऐसी व्यवस्था में उलझ गए हैं जहां केंद्र सरकार अपने दल के वफादारों को राज्यपाल बनाकर राज्य सरकारों के कामकाज में बाधा डाल सकती है। परंतु ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां सुधार की जरूरत है। मसलन राज्य सूची के विषयों में केंद्र समर्थित योजनाओं का विस्तार। इसकी वजहों में से एक वह विकास नीति भी है जो चुनावी लोकलुभावनवाद पर केंद्रित है। जो लोगों की पसंद के मुताबिक उन्हें घरेलू गैस, बिजली, खाने-पीने की वस्तुएं, स्वास्थ्य सेवा (खासकर मौजूदा कोविड महामारी जैसी आपात स्थितियों में) जैसी सुविधाएं देती है। इसमें कुछ भी अवांछित नहीं है और यह वह तरीका है जिसका इस्तेमाल अमीरों ने हमेशा अपने हितों के बचाव में किया है। अच्छी दीर्घकालिक कल्याण नीति एक कदम आगे की होगी।
एबीएन डेस्क। इन दिनों भारत और अफगानिस्तान के बीच गतिविधियां तेज हो गई हैं। साफ नजर आ रहा है कि तालिबान उभार पर है। इससे भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या इस बात से भारत का दिल टूट जाना चाहिए कि अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस तरह वापस हटने का निर्णय लिया? या इस बदलाव में भी अवसर हैं? क्या तालिबान के साथ शत्रुता का रिश्ता रखना अपरिहार्य है? क्या हम यह मानकर चलें कि यह पाकिस्तान नियंत्रित इस्लामिक लड़ाकू संगठन बना रहेगा? जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान पर आक्रमण करके और मुशर्रफ को साझेदार बनाकर इस क्षेत्र को एक नया नाम दिया: अफ-पाक। क्या भारत अब इसे ऐसे ही स्वीकार कर ले? सन 2011 में मैंने एक आलेख लिखकर कारण बताया था कि क्यों भारत को अफ को पाक के लिए छोड़ देना चाहिए। तब से अब तक हम किस दिशा में बढ़े हैं? पहली बात, क्या ऐसा कोई प्रमाण है कि तालिबान निर्भरता या आभार जताने के लिए हमेशा पाकिस्तान का अनुचर बना रहेगा? एक ऐसा अटूट साझेदार जिसके लिए अगर पाकिस्तान-चीन शिखर बैठकों में इस्तेमाल होने वाला जुमला इस्तेमाल किया जाए तो जिसके साथ पहाड़ों से ऊंची और सागर से गहरी दोस्ती है? आप सोच सकते हैं, क्यों नहीं? क्या पहली पारी में तालिबान और पाकिस्तान के बीच ऐसा ही रिश्ता नहीं था? परंतु जैसा कि म्युचुअल फंड्स पर लिखी वैधानिक चेतावनी में कहा जाता है: अतीत का प्रदर्शन भविष्य के प्रदर्शन का मानक नहीं है। क्या यह कहावत भू-सामरिक हितों पर भी लागू होती है? विभिन्न देशों और समाजों की वैचारिक स्थिति चाहे जो भी हो, अंतत: वे अपने हित में काम करते हैं। क्या ऐसा कोई संकेत है कि इस बार तालिबान अलग साबित हो सकता है? उनके तौर तरीके, इस्लाम की उनकी व्याख्या, महिलाओं, शिक्षा और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर उनका नजरिया आदि आधुनिक समाज को बुरे लग सकते हैं। परंतु क्या जरूरी है कि इसके चलते वे भारत के शत्रु बन जाएं? क्या वे भारत से जंग छेड़ सकते हैं या हमारे खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान का साथ दे सकते हैं? इसमें उनका क्या फायदा? क्या वे भारत को इस्लामी राष्ट्र बना देंगे और हमें किसी खिलाफत का अंग बना देंगे? तालिबान बर्बर, मध्ययुगीन, स्त्री-विरोधी, गैर भरोसेमंद, दकियानूस हो सकते हैं या शायद इससे भी बुरे। परंतु वे मूर्ख या आत्मघाती नहीं हैं। वरना वे अमेरिका से दो दशक तक जूझने और उसे परास्त करने में कामयाब न हो पाते। अतीत के मुजाहिदीन के उलट उन्हें हथियारों से समर्थन देने वाले भी नहीं थे। बस पाकिस्तान ही चोरी छिपे उनकी मदद करता रहा। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान के रणनीतिक नजरिये से देखने में नुकसान भी हैं। हम यह सोच कर परेशान हो जाते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान को एक प्रसिद्ध जीत सौंपकर जा रहा है। पाकिस्तान के पास अब कुछ ऐसा है जो वह हमेशा से चाहता था: एक सामरिक गहराई। परंतु यह जीत कितनी भ्रामक है यह समझने के लिए फॉरेन अफेयर्स में हुसैन हक्कानी का लेख पढ़ा जरूरी है। इस क्षेत्र के मानचित्र पर एक नजर डालने पर पता चल जाएगा कि ऐसी कल्पना केवल रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय में बैठे बुद्धिमान ही कर सकते हैं जिनके बारे में माना जाता है कि उनका दिमाग सर में नहीं बल्कि कहीं और होता है। वे सन 1986-87 से ही ऐसे स्वप्न देख रहे हैं। इसलिए क्योंकि जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी के आॅपरेशन ब्रासटैक्स ने यह दु:स्वप्न पैदा कर दिया था कि भारतीय टैंक पाकिस्तान के संकरे इलाकों में वारसा संधि शैली में तेजी से पैठ बना सकते हैं। ऐसे में उसे रणनीतिक गहराई की जरूरत थी। पैंतीस वर्ष बाद दुनिया बदल चुकी है और रणनीतिक और सामरिक तस्वीर भी। इसके अलावा अब परमाणु हथियार भी हैं। यदि पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी अभी भी सोच रहे हैं कि हिंदुकुश पर्वत होते हुए अफगानिस्तान पहुंच सकते हैं या वहां कोई सामरिक बदलाव ला सकते हैं तो वे बहुत मासूम हैं। बीते 75 वर्ष से अधिक समय में दुनिया ने पाकिस्तानी सेना के बारे में एक बात सीखी है। सामरिक दृष्टि से वह शानदार है लेकिन रणनीतिक नजरिये से भ्रमित है। लेकिन क्या वह तालिबान के मित्र होने के नाते अपने परमाणु हथियार या एफ-16 लड़ाकू विमानों के दो बेड़े अफगानिस्तान भेज सकती है? हम तटस्थ आकलन कर सकते हैं कि अफगानिस्तान में कौन जीता और कौन हारा। यकीनन तालिबान जीते और अमेरिका और उसके सहयोगी हारे। लेकिन पाकिस्तान? तालिबान ने गत दो दशक में एक बात साबित की है कि वे उससे अधिक होशियार हैं। पाकिस्तान उनके देश को रणनीतिक गहराई हासिल करने के लिए इस्तेमाल करने की कल्पना कर रहा था लेकिन इन वर्षों में उन्होंने यह समीकरण उलट दिया। उन्होंने पाकिस्तान का इस्तेमाल अपनी रणनीतिक गहराई के लिए किया। ऐसा करके उन्होंने अमेरिका को हराया। बाइडन का जीत का दावा उतना ही खोखला है जितनी जॉर्ज डब्ल्यू बुश की यह आलोचना कि यह वापसी हड़बड़ी में की गई। बाइडन ने उस शर्मनाक हकीकत को स्वीकार किया जिसे बुश नहीं कर सके। अमेरिका वहां से बाहर निकल रहा है और उसने यह घोषणा भी कर दी है कि अफगानिस्तान में नए राष्ट्र का निर्माण कभी अमेरिका का लक्ष्य नहीं था। साफ कहें तो इस्तेमाल करो और फेंको। अमेरिका ने एक निर्वात छोड़ा है। तालिबान की पकड़ दिनबदिन मजबूत हो रही है। देखना है कि पाकिस्तान का क्या होता है? यदि लड़ाई लंबी चली तो तात्कालिक लाभ की आशा समाप्त हो जाएगी। डूरंड रेखा के आरपार घायल, बेघर, शरणार्थी नजर आएंगे। यदि तालिबान इसे जल्द निपटाने में कामयाब रहा तो भी उसे पाकिस्तानियों को कितना नियंत्रण सौंपना होगा? खासतौर पर तब जबकि उन्हें रणनीतिक गहराई की जरूरत नहीं होगी?आप कह सकते हैं कि वे चीन और पाकिस्तान के बीच फंस जाएंगे और एक अधीनस्थ देश के दर्जे में रहेंगे। परंतु अफगानिस्तान का इतिहास ऐसा नहीं बताता। वह इस क्षेत्र में रुचि रखने वाली अन्य शक्तियों मसलन ईरान और रूस के साथ सुलह कर सकता है।
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