एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। महंगाई शब्द मानव जीवन से हमेशा जुड़ा रहा है। हमारे देश में इस शब्द का अर्थ हमेशा महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि आज भी हमारे देश में मध्यम, निम्न मध्यम व गरीब वर्ग की जनसंख्या लगभग 100 करोड़ है। अब गुजरात के गरीब और झारखंड के गरीब का अंतर इतना समझ लें कि गुजरात का गरीब मासिक 20 हजार कमाता है झारखंड का पांच हजार यह उदाहरण समझने के लिये हैं। इसलिए यह वर्ग प्रभावित होने का अर्थ देश का प्रभावित होना माना जाता है। हाल में महंगाई की वजह से जनता परेशान हैं और इस बार लगातार बढ़ते दामों और गिरती आय का डबल डोज एक साथ लग रहा है। कोरोना के संकट से हमारे सिस्टम या सिस्टम संचालनकर्ताओं यानि नेताओं को शायद ही कोई फर्क पड़ा हो या न पड़ा हो लेकिन जनता की कमर टूट चुकी है। जैसा कि कोरोना के पहले कालखंड के बाद ही छोटी-बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह आधी या उससे भी कम कर दी थी जो अब तक भी पूरी नहीं हुई, चूंकि उसके बाद जैसे ही बाजार उठ रहा था, वैसे ही दूसरी लहर ने सब बर्बाद कर दिया था और अब हम तीसरी लहर में प्रवेश कर चुके हैं और स्थिति वैसी ही है। और यदि अब व्यापारी वर्ग की बात करें तो व्यापार की हालात भी पहले से बहुत नाजुक बनी हुई हैं। बाजार में काम इतने कम हो चुके हैं कि कंपनी के खर्च भी निकल नहीं पा रहे और कई व्यापारी ने अपने धंधे तक बंद कर दिए। वे अब बेरोजगारों की श्रेणी में आ चुके हैं। देश का गणित जो आज आप भी अंदाज लगा सकते हैं ऐसे समझिये। सवा करोड़ ड्राइवर परिवार समेत छह करोड़ पच्चीस लाख लोग सरकारी ड्राइवर छोड़ सब परेशान, एक करोड़ सिक्यूरिटी मैन पांच करोड़ परिवार के लोग, दस करोड़ किसान सरकार आकड़ा पचास करोड़ परेशान क्या मैंने सौ करोड़ भारतीय को परेशान बताया तो गलत कहां है? यह गणित मेरे जैसा सामान्य बुद्धि का व्यक्ति समझ सकता है तब देश के मंत्री, प्रशासनिक अमला फैला और नीति निर्धारकों ने क्या आख पर पट्टी बांध रखा है। हां, रखा है कैसे समझते हैं। इसके अलावा एक फील्ड ब्वॉय ने बताया मुझे तनख्वाह के अलावा कंपनी से दो रुपये लीटर प्रति किलोमीटर के हिसाब से पेट्रोल खर्च मिलता है, लेकिन जब से लेकर अब तक पेट्रोल का भाव तीस रुपये लीटर बढ़ चुका लेकिन कंपनी अधिक पैसे बढ़ाने को तैयार नही हैं और जो कंपनी के काम से बाहर जाता हूं उस वजह से मेरी तनख्वाह से पेट्रोल लग जाता है। अब बच्ची का एक किलो दूध जिसमें 16 सौ रुपये लगते थे उसे आधा किलो किया है। यह सौ करोड़ की पीड़ा है। ईंधन के दाम बढ़ने से सबसे ज्यादा महंगाई बढ़ती है यदि इसे सरल भाषा में एक उदाहरण के रूप में समझें तो हिमाचल से दिल्ली किसी सब्जी के ट्रक का किराया पच्चीस हजार हैं और डीजल के दाम बढ़ने से वह किराया तीस हजार रुपये हो जाता है तो जो सब्जी 50 रुपये किलो थी वह सीधा 60 रुपये किलो हो गई। एक चीज से ही बहुत सारी चीजें प्रभावित होती हैं। ईंधन का दो बढ़ने से खाने पीने की आपूर्ति का खर्च बढ़ता है जिससे अन्तत: महंगाई बढ़ती है। भारत हाल ही में बेंट क्रूड का भाव कम है जिसकी वजह से पेट्रोल-डीजल के मौजूदा रेटों में लगभग 8 से 10 रुपये तक का भाव कम हो सकता है लेकिन इस ओर सरकार न जाने किस वजह से ध्यान नही दे पा रही। बता दें कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तय करने में अहम भूमिका इंटरनेशनल मार्केट में बेंट कू्रड के भाव के आधार पर तय होती है। यदि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड के दाम कम हो जाते हैं तो पेट्रोल-डीजल के दाम पर भी गिर जाते हैं। हालांकि बेंट क्रूड की कीमतों कम होने का बाद उस देश की मर्जी पर भी तय होता है कि वह दाम कम करें या न करें। हमारे देश में केंद्र के बाद राज्य सरकारें भी अपना टैक्स लगाते हुए रेट में बदलाव कर सकती हैं। इस ही वजह से हमारे देश में हर राज्य में पेट्रोल व डीजल का रेट अलग-अलग होता है। सरकार को त्वरित प्रभाव से पेट्रोल व डीजल के दामों में कटौती करनी चाहिए। जिन देशों में पेट्रोल सबसे महंगा है, उन देशों की सूची में हमारा देश 58वें नंबर पर आता है हालांकि कभी-कभी एक-दो पायदान ऊपर नीचे होता रहता है। बीते वर्ष मई तक भारत में पेट्रोल की कीमत 1.31 डॉलर प्रति लीटर पहुंच गई थी जिससे कई शहरों में सौ रुपये प्रति लीटर तक रेट पहुंच गया था। यदि हम अपने पडोसी देशों पाकिस्तान,नेपाल और भूटान में पेट्रोल हमारे यहां से सस्ता बिकता है। भारत सरकार इस पर गौर करे। बीते दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टेक्सटाइल पर जीएसटी 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की घोषणा की थी लेकिन बाद में कई राज्यों और इंडस्ट्री के आग्रह करने के बाद फैसला वापस लेना पड़ा। चूंकि क्लोदिंग आवश्यक वस्तु में शामिल है और इस पर होजरी मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन ने जीएसटी बढ़ाने के फैसले पर चिंता जताई थी। होजरी मैन्युफैक्चरर अनुसार कपड़ों पर जीएसटी बढ़ने आम आदमी प्रभावित होता और एमएसएमई सेक्टर को भी इससे नुकसान होता चूंकि देश के कपड़ा उत्पादन में असंगठित क्षेत्र का 80 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान है। इससे बुनकर सबसे ज्यादा प्रभावित होत सकते थे। पहले से ही कोरोना की वजह से बीते दो वर्षों में बहुत नुकसान हुआ है। पुलिस रिकार्ड के अनुसार अधिकतर छिनैत व चोर अच्छे परिवार और शिक्षित थे। एक राजा था उसकी प्रजा अकाल से पीड़ित थी और कर भी कसाई की तरह लेता। खूब मारता राजा क्रूर और राक्षस था। प्रजा त्रस्त थी। यह कहानी आज पुरानी है क्या? ज्यादा महंगाई के चलते बेरोजगारी बढ़ने पर कहीं गृह युद्ध जैसा माहौल न हो जाए। सरकार को आर्थिक विशेषज्ञों के पैनल के साथ इस बार गरीब व मध्यम वर्ग की सुध लेते हुए बजट बनाना होगा। मोदी सरकार को भ्रम है कि राष्ट्रवाद का मुददा काम करेगा लेकिन महंगाई की चोट उन्हें कई बार लग चुकी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (वरुण गांधी)। आज युवा दिवस है। देश स्वामी विवेकानंद जी को याद कर रहा है। लेकिन देश की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आकांक्षा वास्तव में कभी फलीभूत नहीं हुई। ऐसे में ऊंचे लक्ष्य तय करना जरूरी है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने 2014 में प्रति छात्र सालाना 12,500 रुपये खर्च किए, जो कि जीडीपी का करीब तीन-चार फीसदी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 चाहती है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपना खर्च बढ़ाकर जीडीपी के करीब छह फीसद तक लाएं। 1960 के दशक से यह वांक्षित लक्ष्य रहा है, लेकिन अब जाकर सरकार ने इसे वास्तविक लक्ष्य बनाया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में वर्ष 2035 तक उच्च शिक्षा में कुल पंजीकरण का अनुपात 50 फीसदी बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इधर, शिक्षा के क्षेत्र में दूसरी समस्याएं भी हैं। संगीता कश्यप मध्य प्रदेश की 46 वर्षीय स्कूल शिक्षिका हैं, जो इंदौर और आसपास के इलाके के मशहूर सरकारी अहिल्या आश्रम स्कूल में पढ़ाती हैं। पीटीआई की अगस्त, 2014 की खबर के अनुसार, अपने 24 साल लंबे करियर में पिछले 23 वर्षों से वह ड्यूटी से अनुपस्थित हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली की ऐसी दुसाध्य बीमारियों को भी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति दुरुस्त करना चाहती है। ग्रामीण भारत में आमतौर पर शिक्षक किसी विषय के विशेषज्ञ नहीं होते हैं, उनके पास अक्सर सिर्फ स्नातक की डिग्री होती है, और कुछ के पास थोड़ा-बहुत शिक्षण-प्रशिक्षण का अनुभव भी। हमें शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण विधा में प्रशिक्षित करने की जरूरत है, जिससे उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा परिणाम देने के काबिल बनाया जा सके, जबकि मौजूदा शिक्षकों को अपने कौशल को उन्नत बनाने का मौका दिया जाना चाहिए। उनके काम की निगरानी के लिए एक मूल्यांकन प्रणाली बनानी होगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं- इसमें प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में बदलाव पर ध्यान दिए जाने के साथ ढेरों संस्थागत सुधार शामिल हैं। नई शिक्षा नीति में अध्यापन के लिए जरूरी न्यूनतम डिग्री बी.एड. है। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अब विद्यालय पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए चार हिस्सों में बांट दिया गया है। जो शिक्षक जिन विषयों में पढ़ाना चाहते हैं, उन्हें टीईटी या एनटीए में उन विशिष्ट विषयों में अंकों के आधार पर काम पर रखा जाएगा। इसके साथ ही टीईटी पास करने वालों का साक्षात्कार में स्थानीय भाषा का ज्ञान भी परखा जाएगा। शिक्षकों से अब हर साल करीब 50 घंटे के नियमित प्रोफेशनल डेवलपमेंट कोर्स में शामिल होने की अपेक्षा होगी। इसके अलावा एनसीटीई द्वारा शिक्षकों के लिए गाइडलाइंस के रूप में राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक बनाए जाएंगे। और अंत में कार्यकाल, पदोन्नति तथा वेतन संरचना के लिए एक योग्यता-आधारित ढांचा विकसित किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने विज्ञान व कला और शैक्षणिक व व्यावसायिक प्रशिक्षण के बीच कठोर बंटवारे को खत्म कर दिया है। विद्यार्थी अब दोनों तरह के पाठ्यक्रमों में से चुनाव कर सकते हैं- यह हमारे नागरिकों को हर तरह की जरूरत के लिए तैयार करने में मददगार होगा। कला संकाय (मानविकी) को लेकर हमारी लंबी उपेक्षा आखिरकार सुधर जाएगी। नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषाओं पर भी ध्यान दिया गया है। हमारे देश के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए स्कूल बोर्डों को तीन भाषाओं (राज्य और क्षेत्र के हिसाब से) के विकल्प का अधिकार दिया जाएगा, जबकि संस्कृत विश्वविद्यालयों को बहु-विषयक संस्थानों में बदल दिया जाएगा। (लेखक भाजपा के सांसद हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। 12 जनवरी मंगलवार को युवा दिवस है। स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिन। स्वामी जी ने शिक्षा के सात उद्देश्य निश्चित किए-शारीरिक विकास, मानसिक एवं बौद्धिक विकास, समाज सेवा की भावना का विकास, नैतिक एवं चारित्रिक विकास, व्यावहारिक विकास, राष्ट्रीय एकता एवं विश्वबंधुत्व का विकास और आध्यात्मिक विकास पर पता नहीं भारतीय संस्कृति के पोषक होते हुए भी इन्होंने सांस्कृतिक विकास पर बल क्यों नहीं दिया। सम्भवत: ये धर्म और संस्कृति को अभिन्न समझते थे। उस समय अपना देश परतन्त्र था इसीलिए शासनतन्त्र और नागरिकता की शिक्षा का प्रश्न इनके मस्तिष्क में कैसे आता अन्तर्राष्ट्रीय भी इस युग का नारा है। इनके युग में यह विश्वबंधुत्व के रूप में जाना समझा जाता था। शिक्षा की पाठ्यचर्या के संदर्भ में स्वामी जी का दृष्टिकोण बहुत व्यापक था। इस सन्दर्भ में इन्होंने पहली बात यह कही कि शिक्षा की पाठ्यचर्या में वे सब विषय एवं क्रियाएं सम्मिलित की जाएं जो मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक हैं। दूसरी बात यह कही कि देश-विदेश, जहां से भी जो अच्छा मिले उसे पाठ्यचर्या में स्थान दिया जाए और तीसरी बात यह कही कि मनुष्य, समाज अथवा राष्ट्र के भौतिक विकास के लिए पाश्चात्य विज्ञान एवं तकनीकी को मुख्य स्थान दिया जाए और उन्हें समझने के लिए अंग्रेजी भाषा को स्थान दिया जाए और मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के लिए भारतीय धर्म-दर्शन को पाठ्यचर्या का अनिवार्य विषय बनाया जाए। इन्होंने मनुष्य के भौतिक विकास की दृष्टि से मातृ भाषा, प्रादेशिक भाषा, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं को कला, संगीत, इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि विज्ञान, गणित, तकनीकी, और उद्योग शिक्षा विषयों को और खेल-कूद, व्यायाम, योगासन और समाज सेवा क्रियाओं को और उसके आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से साहित्य, धर्म, दर्शन, और नीतिशास्त्र विषयों को तथा भजन, कीर्तन, सत्संग एवं ध्यान की क्रियाओं को पाठ्यचर्या में स्थान देने पर बल दिया। इन्होंने उस समय भारत में उच्च शिक्षा की व्यवस्था पर बल दिया और उसकी पाठ्यचर्या में देश-विदेश के उच्चतम् ज्ञान एवं कौशल और विज्ञान एवं तकनीकी को ध्यान देने पर बल दिया। शिक्षण विधियों के क्षेत्र में स्वामी जी की अपनी कोई देन नहीं हैं। इन्होंने कुछ परम्परावादी शिक्षण विधियों (अनुकरण, व्याख्यान, स्वाध्याय, तर्क और योग) और कुछ आधुनिक विधियों (निर्देशन, परामर्श और प्रयोग) का समर्थन किया है। इन सब में भी इन्होंने योग विधि को सर्वोत्तम विधि बताया है और जिस योग विधि का स्वामी जी ने समर्थन किया है, उसे उसी रूप में आज की परिस्थितियों में प्रयोग नहीं किया जा सकता। स्वामी जी के अनुसार अनुशासन का अर्थ है आत्मा द्वारा निर्दिष्ट होना। इस संदर्भ में हमारा निवेदन है कि जब तक मनुष्य आत्म तत्व की अनुभूति नहीं करता तब तक उसके द्वारा निर्दिष्ट होने का प्रश्न नहीं उठता और आत्म तत्व की अनुभूति करने में उसे पूरा जीवन लग सकता है। स्पष्ट है कि विद्यालय अनुशासन की बात स्वामी जी नहीं कर पाए। विद्यालय अनुशासन का हमारी दृष्टि से यह अर्थ होना चाहिए कि अध्यापक और बच्चे सभी अपने प्राकृतिक स्व पर नियंत्रण कर सकें, सामाजिक नियम एवं आदर्शों के अनुकूल आचरण करने के लिए अंदर से प्ररित हों और आत्मा की अनुभूति करने के लिए निरन्तर अग्रसर रहें। आज के युग में न शिक्षक से आत्माज्ञानी होने की आशा की जा सकती है और न शिष्ट से ब्रह्मचर्य व्रत पालन की। दोनों संयमी, ईमानदार और कर्मनिष्ठ हों, इतना ही पर्याप्त होगा। स्वामी जी विद्यालयों को जन कोलाहल से दूर स्थापित करने के पक्ष में थे। एक ओर जन शिक्षा, स्त्री शिक्षा, और उद्योग शिक्षा की बात और दूसरी ओर जन कोलाहल से दूर विद्यालयों की स्थापना। जहां तक जन शिक्षा, स्त्री शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, धार्मिक शिक्षा, और राष्ट्रीय शिज्ञक्षा की बात है, इन सभी क्षेत्रों में स्वामी जी ने हामारा मार्ग दर्शन किया है। जन शिक्षा के सन्दर्भ में इनका दृष्किटकोण बड़ा व्यापक था। वे देश के सभी बच्चों, युवकों प्रौढ़ों और वृद्धों को साक्षर देखना चाहते थे, उन्हें सामान्य जीवन जीने योग्य बनाना चाहते थे, उन्हें अपनी रोजी रोटी कमाने में दक्ष करना चाहते थे। इनके इन विचारों ने हमें सामान्य अनिवार्य एवं नि:शुल्क और प्रौढ़ शिक्षा दोनों की व्यवस्था करने की प्रेरणा दी। इसमें दो मत नहीं कि स्वामी जी ने स्त्रियों को मातृशक्ति के रूप में सम्मान देकर भारतीय संस्कृति और उसकी अस्मिता की रक्षा की है और स्त्री शिक्षा की अनिवार्यता पर बल देकर हमारा बड़ा उपकार किया है। परन्तु स्त्री शिक्षा के संदर्भ में इनके ये विचार कि उन्हें आदर्श गृहिणी आदर्श मातायें और आदर्श शिक्षिकायें ही बनाया जाए, संकीर्ण ही कहे जायेंगे। देश में बेरोजगारी समाप्त करने हेतु व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष जोर देकर पाश्चात्य विज्ञान और तकनीकी शिक्षा का प्रमुख स्थान दिया। आज इसी शिक्षा के बल पर हम विकास के पथ पर आगे हैं। स्वामी विवेकानंद ने स्वंय मनुष्य के ज्ञान और सीख पर भी काफी विचार लिखे हैं। पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान, ध्यान से ही हम इंद्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है। उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तमु अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते। जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। पवित्रता, धैर्य और उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूं। लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्य तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहांत आज हो या युग में, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो। क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं हैं। बुद्धिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढ़तापूर्वक खड़ा होकर कार्य करना चहिए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुधीर शर्मा)। कल्पना कीजिये वो क्या वीभत्स दृश्य रहा होगा? जब तकरीबन 500 की उन्मादी भीड़ सपना के पति संजू को घर से निकाल कर पिटाई शुरू करती है। पुलिस उस उन्मादी भीड़ के साथ आती है, सबकुछ पुलिस के सामने होता है। सपना पुलिस वालों के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाती है। संजू को बचाने की गुहार लगाती है, लेकिन कोई नहीं सुनता। भीड़ सपना और उसके परिवार वालों को भी पीट कर उससे अलग कर देती है। पुलिस के जवान छिपकर अपने मोबाइल में वीडियो बनाते रहते हैं। अधमरा संजू अपने प्राणों की भीख मांगता है लेकिन उन्माद दया की बोली नहीं सुनती। संजू को सपना के सामने जला दिया जाता है, चंद मिनट में संजू राख के ढेर में तब्दील हो जाता है। जले हुए मोबाइल, खून से सने जूते और कोयले के रूप में तब्दील हो चुके संजू के अवशेष, ये उस क्षेत्र की कहानी है, जिसकी ख्याति सैकड़ों हॉकी खिलाड़ी देने के लिए होती थी। रांची से तकरीबन 150 किलोमीटर की दूरी पर कोलेबिरा से चाईबासा के मध्य बम्बलकेरा पंचायत का बसराजारा गांव आज इस क्रूरतम कहानी की गवाही दे रहा है। 4 जनवरी को घटे इस घटना के बाद पुलिस सादे कागज पर सपना से सिग्नेचर करा कर लौट जाती है। रोते बिलखते परिवार को न कोई ढाढ़स देता है, न कोई सुरक्षा। अखबार में आधी-अधूरी ख़बर छपती है और संजू को पूर्व नक्सली और पेड़ काटने का अपराधी साबित कर एक नरेटिव सेट कर इस मॉब लींचिंग को जस्टिफाई करने की कोशिशें भी शुरू हो जाती है। पेड़ काटने के नाम पर अपराध का यह क्रूरतम दृश्य शायद ही देश में कभी सुना होगा। इस मॉब लींचिंग के बाद न राज्य के मुखिया सपना की सुध लेते हैं न कोई अधिकारी। दूसरे दिन डीसी और एसपी लाव लश्कर के साथ पहुंचते हैं और सपना को एक बोरी चावल, 2 किलो दाल और एक लीटर सरसों का तेल दे जाते हैं, बस किसी की जान की यही कीमत है। मीडिया के लोग वहां जाने से भी डरते हैं, आधी-अधूरी जानकारी से ख़बरें चलाते हैं। लेकिन आज सपना ने अपनी चुप्पी तोड़ी है, हरेक बातों को खुल कर बताया है। बताया है कि कैसे गांव में लगने वाले हाट-बाजार में गोकशी कर गोमांस बेचने वालों का विरोध इस षड्यंत्र का मुख्य कारण रहा है। कैसे पुलिस और राजनेताओं के संरक्षण में सुनियोजित तरीके से इस घटना को अंजाम दिया गया।सपना की बातें झारखंड की उस सच्चाई को बताती है, उसे स्वीकारना आसान नहीं है, लेकिन सच तो यही है। आज संजू तो कल कोई और निशाने पर होगा। पहचानिए उन साजिशकर्ताओं को, जो अब तय कर रहे हैं कि किसे जिंदा छोड़ना है और किसे उस भयावह तरीके से मारना है कि आगे कोई संजू विरोध तक करने की हिम्मत न करें। राज्य के मुखिया हेमन्त सोरेन जी, संजू और सपना भी इसी माटी के हैं। उनका भी यहां के जल-जंगल-जमीन पर बराबर का हक था। न्याय कीजिये, दोषियों को कठोरतम दंड दीजिए; ताकि ऐसी हिम्मत कोई न कर सके। इस घटना के बाद एक झारखंडी होने के नाते सबका सिर शर्म से झुक गया है। झारखंडी अस्मिता की रक्षा अब आपके हाथों में है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (बाबूलाल मरांडी)। किसी समाज या राज्य की समृद्धि का पैमाना केवल आर्थिक उन्नति या सुविधा संपन्न होने को ही नहीं माना जा सकता। बल्कि समाज के लिए भयमुक्त और सुरक्षायुक्त वातावरण एक आदर्श परिकल्पना है। असुरक्षा की भावना लोगों के आत्मविश्वास को कम करता है, जो समाज और राज्य के उन्नति में सबसे बड़ा बाधक है। 21 वर्ष पूर्व विश्व मानचित्र में आया एक नया राज्य झारखंड आज अपनी तरूणाई अवस्था को पार कर अपनी परिपक्वता की ओर अग्रसर है। अब इस परिपक्व अवस्था वाले राज्य से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ना स्वभाविक है। आर्थिक शब्दावली और आंकड़ों के जाल को अगर दूर भी रखा जाए तो मोटे शब्दों में यहां के लोग कितने खुश है, कितने सुरक्षित और कितने समृद्ध हैं, इन सवालों पर तो पूर्वाग्रह की भावना त्याग कर वैचारिक विमर्श आवश्यक है।निश्चित रूप से कोरोना महामारी के बाद सरकार के सामने चुनौतियां है, इस महामारी ने काफी नुकसान पहुंचाया है। केन्द्र सरकार की टीकाकरण और सामाजिक सुरक्षा के तहत राशन और आर्थिक मदद कहीं न कहीं लोगों के मन में आत्मविश्वास बढ़ाने वाला ही है। अब हमें यह स्वीकार करना होगा कि आनेवाला कुछ वर्ष कोरोना के साथ ही बीतेगा। अब इन चुनौतियों के बीच ही अन्य सारे काम करने होंगे। इस महामारी के बाद अपने राज्य झारखंड की बात करें तो लोगों को सिवाय निराशा और असुरक्षा के कुछ नहीं मिला। कोरोना महामारी सरकार को अपनी अकर्मण्यता और नाकामियों को छिपाने के लिए एक दिव्य अस्त्र मिल गया। विगत 2 वर्षों में जिस प्रकार हत्या, लूट और बलात्कार के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई, वो आज किसी से छिपी हुई नहीं है। विगत दो सालों में 3451 हत्याएं, 3154 बलात्कार और 654 नक्सली घटनाएं ये बताने के लिए काफी है कि आज राज्य की कानून व्यवस्था सबसे कमजोर अवस्था में है। अपराधी बेलगाम हो चुके हैं, प्रशासन राज्य सरकार के टूल के रूप में काम कर रही है। कई मामलों में अपराधियों को पकड़ने के बजाय पुलिस निर्दोषों को ही पकड़कर जेल भेजने की खबरें सामने आती रही है। अपराधों के इन आंकड़ों पर गौर करना इसलिए भी आवश्यक है कि अगर स्थितियां ऐसी ही बनी रहे तो हम लोगों के मन में सुरक्षा की भावना के विकास की कल्पना ही नहीं कर सकते। साहिबगंज की होनहार महिला दारोगा रूपा तिर्की हत्या का मामला हो, धनबाद के जज की हत्या या हालिया सिमडेगा में मॉब लिंचिंग का मामला। सारे प्रकरणों में राज्य सरकार की भूमिका और जांच के प्रति उदासीनता कहीं न कहीं संदेह पैदा करती है। वर्ष 2022 के शुरूआती दिनों में जिस प्रकार से मनोहरपुर के पूर्व विधायक गुरूचरण नायक के ऊपर नक्सली घटना हुई और उनके दो अंगरक्षकों को निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया वो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन उससे कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण इस घटना के बाद राज्य सरकार की नक्सलियों पर कार्रवाई करने के बजाय उल्टे पूर्व विधायक को दोषी ठहराना कहीं न कहीं नक्सलियों को ही संरक्षण देने के समान है। नक्सलियों की हिम्मत आज इतनी बढ़ी हुई है कि वो पुलिस के हथियार छिनकर ले जा रहे हैं और पूरा का पूरा प्रशासनिक तंत्र इसके सामने लाचार सा नज़र आता है। जब मैं गुरूचरण नायक जी से मिलकर वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए चक्रधरपुर से सोनुवा के रास्ते आगे बढ़ा तो पुलिस ने यह कहकर रोक दिया कि आगे जाना सुरक्षित नहीं है। अब कल्पना कीजिए कि स्थिति कितनी खराब है कि दिन के उजाले में मुख्य सड़क तक भी जाने में पुलिस डर रही है। मुझे रोकने के पीछे कारण राजनैतिक भी हो सकता है, लेकिन ये स्वीकारोक्ति अपने आप में प्रशासन का असहाय होने का बोध कराता है। ठीक उसी दिन सिमडेगा जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर कोलेबिरा थानार्न्तगत बसराजारा गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, संजू प्रधान नामक एक दलित युवक को 500 की उन्मादी भीड़ ने पीट पीटकर अधमरा कर दिया और फिर उसे आग के हवाले कर दिया। इस मॉब लिंचिंग के पहले गांव में ही लोगों ने बैठक की और हत्या की पूरी योजना बना ली थी। प्रत्यक्षदर्शियों और मृतक के परिजनों की माने तो पुलिस भी भीड़ के साथ आई थी और वो घटना को रोकने के बजाय मूकदर्शक बनी रही। लोग संजू को पीटते रहे, उसकी पत्नी और मां सबके सामने गिड़गिड़ाती रही, पुलिसवालों के पैर पकड़कर संजू को बचाने की गुहार लगाती रही, लेकिन पुलिसवालों ने कुछ नही किया उल्टे पूरे घटनाक्रम की वीडियो बनाती रही। शुक्रवार की रात गुमला के गुरदरी थानांतर्गत एनकेसीपीएल के बॉक्साइट माइंस के प्लांट में नक्सली धावा बोलकर 27 वाहनों को जला डाला और कर्मियों के साथ पिटाई भी की। हर बार की तरह पुलिस देर से आई और जांच के नाम पर खानापूर्ति कर दी जाएगी। अब सवाल उठता है कि आज राज्य में पुलिस इतनी लाचार क्यों है? क्यों अपराधियों और नक्सलियों के सामने नतमस्तक होकर उसके ही संरक्षक की भूमिका में क्यों है? पुलिसवाले अगर चाहते तो संजू की जान बच सकती थी, लेकिन उसके बाद पुलिस के द्वारा सादे कागजों में मृतक की पत्नी से हस्ताक्षर कराकर उनके ही परिजनों को मामले में फंसाकर जेल भेज देना कई सवाल पैदा करता है। ऐसी कौन सी ताकतें है, जो मुख्य आरोपियों को बचा रही है जबकि उसके परिजन खुलकर आरोपियों के बारे में बता रहे हैं। बात केवल संजू, गुरूचरण या रूपा तिर्की तक ही सीमित नहीं है। इन दो वर्षों में जिस प्रकार से अपराधियों की हिम्मत में बढ़ोत्तरी हुई है, जेल से अपराधियों के रंगदारी का तंत्र, अवैध उत्खनन माफिया का साम्राज्य, बलात्कारियों की हिम्मत और नक्सलियों की बढ़ती ताकत को रोकने में सरकार विफल ही रही है। जबतक राज्य इन सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता तो हम लोगों के मन में सुरक्षा की भावना का विकास कैसे कर सकते हैं? (लेखक झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री सह नेता विधायक दल, भारतीय जनता पार्टी झारखण्ड प्रदेश हैं।)
प्रमोद भार्गव, एबीएन न्यूज। सूर्य नमस्कार का विरोध ठीक नहीं सूर्य नमस्कार योग की क्रियाएं हैं, इनका किसी धर्म से कोई वास्ता नहीं है। हम जिम जाते हैं, वहां अनेक शारीरिक क्रियाएं ऐसी होती हैं, जिनसे लगता है कि हम सिजदे में जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। सूर्य नमस्कार को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। देशभर में हजारों शिक्षक योग और संस्कृत के अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। इनके पाठों में सूर्य नमस्कार से लेकर प्रकृति की प्रार्थनाएं श्लोकों के उच्चारण के साथ पढ़ाई जाती हैं, तब क्या इस्लाम प्रभावित नहीं होता? समरसता विरोधी यह मानसिकता तो अलगाववाद का प्रतिनिधित्व करने वाली है। धर्म की आड़ में ऐसी आपत्तियां स्वंयभू झंडाबरदार मुस्लिम समाज की छवि कट्टर बनाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे। सूर्य ब्रह्मांड का एक ग्रह है। यह दुनिया को प्रकाश देने के साथ जीवन भी देता है। इसके बावजूद सूर्य की ये देनें, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की बजाय, धर्म के आधार पर आपात्ति बन रही हैं। आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने फतवा जारी किया है कि सूर्य की उपासना करना इस्लाम धर्म के अनुसार उचित नहीं है, इसलिए सरकार को इससे जुड़े विद्यालयों को दिए दिशा-निर्देश वापस ले लेने चाहिए, जिससे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का आदर बना रहे। रहमानी ने कहा है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश है। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर हमारा संविधान बना है। संविधान हमें इसकी अनुमति नहीं देता कि सरकार शिक्षण संस्थानों में किसी धर्म विशेष की शिक्षाएं देने का उपाय करे या किसी धर्म विशेष समूह की मान्यताओं के आधार पर उत्सव आयोजित किए जाएं। अतएव यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान सरकार देश के सभी वर्गों पर बहुसंख्यक समुदाय की सोच और परंपरा को थोपने का प्रयास कर रही है। दरअसल भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तीस राज्यों के सूर्य नमस्कार की परियोजना को जमीन पर उतारने का फैसला किया है। इसमें देश के तीस हजार विद्यालयों को पहले चरण में शामिल किया जाएगा। 1 से 7 जनवरी तक यह कार्यक्रम स्कूलों में होना है। तत्पश्चात 26 जनवरी को सूर्य नमस्कार प्रक्रिया के साथ बड़े पैमाने पर संगीत कार्यक्रम भी प्रस्तावित है। सूर्य की इस स्तुति के दौरान सूर्य के सम्मान में योग की कुछ आसनों का भी प्रयोग किया जाता है, जो मानव शरीर के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से विशेष रूप से लाभदायी हैं। मौलाना रहमानी इन्हीं आसनों को सनातन हिंदू धर्म और परंपराओं से जुड़ी होने के कारण आपत्ति जता रहे हैं। इस नाते सूर्य नमस्कार की विधि इतर संप्रदाय पर थोपने के अलावा कुछ नहीं है? हालांकि मौलाना की इस आपत्ति के विरोध में इस्लाम के अनुयायी ही मुखर होने लगे हैं। रांची के एक विद्यालय की योग शिक्षिका राफिया नाज ने बोर्ड को तर्कसंगत सीख देते हुए कहा है कि सूर्य नमस्कार का अर्थ यह नहीं होता कि हम सूर्य की पूजा करें, बल्कि ये बारह ऐसे आसन हैं, जो योग के माध्यम से शरीर को स्वस्थ रखने का काम करते हैं। यदि किसी को योग से जुड़े मंत्र नहीं पढ़ने हैं तो यह बाध्यकारी नहीं है कि आप मंत्रोच्चार के साथ ही योगासन और सूर्य नमस्कार करें। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (महिला प्रकोष्ठ) की संयोजिका शालिनी अली, शिया स्कॉलर रजा हुसैन रिजवी और उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष बिलाल रहमान ने भी मौलाना रहमानी के बयान को खारिज किया है। मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्व-विद्यालय, हैदराबाद के कुलाधिपति फिरोज बख्त अहमद ने तो दो टूक शब्दों में यहां तक कह दिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मुस्लिमों का ठेकेदार नहीं है। सूर्य नमस्कार योग की क्रियाएं हैं, इनका किसी धर्म से कोई वास्ता नहीं है। हम जिम जाते हैं, वहां अनेक शारीरिक क्रियाएं ऐसी होती हैं, जिनसे लगता है कि हम सिजदे में जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। सूर्य नमस्कार को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। देशभर में हजारों शिक्षक योग और संस्कृत के अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। इनके पाठों में सूर्य नमस्कार से लेकर प्रकृति की प्रार्थनाएं श्लोकों के उच्चारण के साथ पढ़ाई जाती हैं, तब क्या इस्लाम प्रभावित नहीं होता? यह नहीं भूलना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ के आह्वान पर 177 से भी ज्यादा देश प्रति वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाते हैं। इनमें दर्जनों इस्लाम धर्मावलंबी देश भी हैं। सूर्य की मान्यता केवल भारत में हो ऐसा नहीं है। प्राचीन मिस्र में रे, रा या एमोन रे आदि रूपों में सूर्य की बड़ी प्रतिष्ठा थी। सुमेरिया की सभ्यता में वह उतु नाम से पूजा जाता है। बेबीलोन के धर्म में शम्स के रूप में सूर्य की मान्यता है। असीरियावासी अश्शुर नाम के सूर्यदेव के उपासक थे। ईरानी सूर्य को मित्रा के रूप में मानते थे। यूनान में हेलिओस और एपेलो नामक देवता सूर्य का प्रतिनिधत्व करते थे। पेरू और मैक्सिको में भारत की तरह ही सूर्य मंदिर बनाए जाने की परंपरा थी। पेरू में इंका जाति के लोग खुद को सूर्यवंशी मानते हैं। मध्य अमेरिकी की मय-सभ्यता सूर्य को अह-किंचिल के प्रतीक के रूप में देखती थी। मसलन सूर्य की मान्यता और महिमा विश्वव्यापी है। दरअसल योग को किसी धार्मिक नहीं स्वास्थ्य-लाभ के एजेंडे में शामिल करके योग दिवस के रूप में मान्यता दी गई है। इसकी प्रस्तावना में कहा है कि योग स्वास्थ्य लाभ की आवश्यकता पूर्ति के लिए सभी प्रकार की ऊर्जाओं की आपूर्ति करता है। इन ऊर्जाओं की शरीर में आपूर्ति तभी संभव है, जब सूर्य नमस्कार से जुड़ी योगासनों को अमल में लाया जाए। अतएव योग को किसी संप्रदाय को आहत करने की मंशा के रूप में नहीं देखना चाहिए। योगासन का विरोध केवल इस्लाम धर्मावलंबी करते हों, ऐसा भी नहीं है, एक समय अमेरिका, ब्रिटेन और कैलिफोर्निया के धर्मगुरुओं ने भी इसे अस्वीकार किया था। तब उन्हें योग ईसाइयत को प्रभावित करने वाला लगा था, किंतु अब इसे ईसाई धर्मावलंबी स्वीकार कर आत्मसात कर रहे हैं। आजकल उत्तर-प्रदेश के एहसान राव पुलिस सुरक्षा में इसलिए रह रहे हैं, क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और गृहमंत्री अमित शाह के जुलूस में जय श्रीराम और भारत माता के नारे लगाए थे। इस पर आपत्ति जताते हुए देवबंद के आलिम और मदरसा शेखुल हिंद के मुफ्ती कासमी ने राव की नारेबाजी पर कहा था कि इस्लाम में इसकी कतई गुजांइश नहीं है। कुछ समय पहले राष्ट्रगीत वंदे मातरम महाराष्ट्र व तमिलनाडु के विद्यालयों में अनिवार्य करने के कारण चर्चा में आए थे। तब वंदे मातरम को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग और राजनीतिक दलों ने विरोध जताया था। राष्ट्रगीत का बहिष्कार संसद और विधानसभाओं में होना कोई नई बात नहीं है, जबकि संविधान के इस प्रावधान का अपमान अलगाववादी मानसिकता का प्रतीक है। यह मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब निर्वाचित सांसद और विधायक राष्ट्रगान की जानबूझकर अवहेलना करते है, जबकि कोई भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि न केवल बहुधर्मी और बहुजातीय मतदाताओं के बहुमत से संसद में पहुंचता है, बल्कि धर्म व जातीयता से ऊपर उठकर संविधान, देश व जनहित की शपथ लेकर अपने कर्तव्य का पालन शुरू करता है। सूर्य नमस्कार को लेकर मौलाना रहमानी संविधान व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए आपत्ति जताते हैं, लेकिन जब इसी संविधान की शपथ लेकर भारतमाता और राष्ट्रगान की अवहेलना मुस्लिम सांसद व विधायकों द्वारा की जाती है तो होंठ सिल लेते हैं। तब यह कैसे बहु-धर्मिकता और बहु-सांस्कृतिकता का सम्मान हुआ? समरसता विरोधी यह मानसिकता तो अलगाववाद का प्रतिनिधित्व करने वाली है। धर्म की आड़ में ऐसी आपत्तियां मुस्लिम समाज के स्वंयभू झंडाबरदार मुस्लिम समाज की छवि कट्टर और रूढ़िवादी बनाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)
अलका आर्या, एबीएन न्यूज। नव वर्ष में सबको नल से मिले जल जल जीवन मिशन अब जन आंदोलन के रूप में चलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के सबका साथ, सबका विकास, सब का विश्वास, सब का प्रयास विजन के सिंद्धांत का पालन करते हुए इस मिशन का आदर्श वाक्य है कि कोई भी छूटे नहीं और मुल्क में हर ग्रामीण परिवार को नल के पानी का कनेक्शन दिया जाए। सिर्फ पानी ही उपलब्ध नहीं कराया जाए बल्कि पानी की गुणवत्ता पर निगरानी रखने की भी व्यवस्था की गई है। फील्ड टेस्ट किट का इस्तेमाल करके पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने क लिए 8.5 लाख से अधिक महिला स्ंवयसेवकों को प्रशिक्षित किया गया है। जल जीवन मिशन का लक्ष्य 2024 तक मुल्क के हर ग्रामीण घर में नल से शुद्व पेय जल पहुंचाना है। अलका आर्य पानी की समस्या को अक्सर एक सामाजिक समस्या के तौर पर देखा जाता है, जिसके स्वास्थ्य पर तात्कालिक व दूरगामी प्रभाव की पुष्टि कई अध्ययन भी करते हैं। मुल्क में पानी की कमी की समस्या एक गंभीर संकट है और इसके समाधान के लिए भारत सरकार न केवल मुल्क के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस मुद्दे को उठाने के लिए पहल करती नजर आ रही है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2019 को जल जीवन मिशन (जेजेएम) की घोषणा की थी, इस मिशन के तहत मुल्क के सभी ग्रामीण घरों में यानी 19.22 करोड़ घरों में 2024 तक नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, मगर साथ ही साथ जल-स्त्रोतों की निरंतरता बनाए रखना भी इसका अनिवार्य हिस्सा है। इसके अंतगर्त वर्षाजल संचयन और जल संरक्षण के जरिए जल-स्त्रोतों के पुनर्भरण को सुनिश्चित किया जाता है तथा ग्रेवॉटर प्रबंधन के द्वारा गंदले पानी का पुनरुपयोग किया जाता है। नव वर्ष 2022 सरकार की प्राथमिकता है कि सबको नल से जल मिले। वर्ष 2019 में मिशन की शुरूआत में मुल्क के 19.22 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से केवल 3.23 करोड़ (17 फीसदी) के पास नल जल की आपूर्ति थी। कोविड-19 महामारी और उसके कारण लगने वाले लॉकडाउन का असर तकरीबन हरेक गतिविधि पर पड़ा। जल जीवन मिशन का कार्य भी कुछ हद तक प्रभावित हुआ, लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद इस मिशन के तहत बीते 28 महीनों में 5.44 करोड़ से अधिक ग्रामीण घरों में नल से जल आपूर्ति शुरू हो चुकी है। आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि आंकड़े सुधार करने के साथ-साथ कार्यक्रमों के प्रदर्शन को आंकने का एक मौका मुहैया कराते हैं। बहरहाल जे.जे.एम के आंकड़ों बावत अपर सचिव व जल जीवन मिशन के निदेशक भरत लाल के अनुसार-वर्तमान में 8.67 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल जल उपलब्ध कराया गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मुल्क के तीन राज्य तेलंगाना, हरियाणा व गोवा और तीन केंद्र शसित प्रदेशों अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादरा और नगर हवेली और दमन दीव, पुडुचेरी के सभी ग्रामीण घरों में नल जल की आपूर्ति की गई है शेष राज्यों व केंद्रशसित प्रदेशों में भी कार्य प्रगति पर है। वैसे भारत के मानचित्र पर ग्रामीण इलाकों के घरों में नल जल आपूर्ति को लेकर निगाह डालें तो 15 अगस्त 2019 की स्थिति व 30 नवंबर 2021 की स्थिति के फर्क को रंगों के जरिए समझा जा सकता है। इस दिशा में हो रही प्रगति साफ पता चलती है, लेकिन फिर भी चिंता बनी हुई है। घरेलू नल कनेक्शन प्रदान करने के मामले में विभिन्न राज्यों की 30 नवंबर 2021 तक तुलनात्मक स्थिति बोलती है कि मुल्क का सबसे बड़ा राज्य जिसकी आबादी करीब 23 करोड़ है, वह जल जीवन मिशन में सबसे पीछे है। यहां ग्रामीण घरों में नल जल आपूर्ति का आंकड़ा दस प्रतिशत से थोड़ा ही ऊपर है। छत्तीसगढ़, प.बंगाल, झारखंड उत्तरप्रदेश से थोड़ा बेहतर प्रदर्शन करते दिखाए गए हैं। राजस्थान में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत को छू गया है। उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान को लाल रंग में दशार्या गया है। बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी 16 नवंबर को उत्तरप्रदेश में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के मौके पर कहा कि सिर्फ दो साल ही में यूपी सरकार ने करीब-करीब 30 लाख ग्रामीण परिवारों को नल से जल पहुंचा दिया है और इस वर्ष लाखों बहनों को अपने घर पर ही शुद्व पेयजल देने के लिए डबल इंजन की सरकार पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। 19 नवंबर को ही प्रधानमंत्री ने उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में महोबा में एक कार्यक्रम में राज्य के इस सूखे इलाके में पानी की कमी की चिंता पर वहां की जनता को यह आश्वासन दिया यहां की माताओं-बहनों की सबसे बड़ी मुश्किल को दूर करने के लिए, बुंदेलखंड में जल जीवन मिशन के तहत भी तेजी से काम हो रहा है। बुंदेलखंड और साथ-साथ विंध्यांचल में, पाइप से हर घर में पानी पहुंचे, इसके लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। संभवत: इस अभियान के सकारात्मक नतीजे आने वाले कुछ महीनों में नजर आएं। गुजरात, बिहार और हिमाचल प्रदेश करीब 90 फीसदी लक्ष्य को छूने वाले राज्य हैं। पंजाब इनसे आगे खड़ा नजर आता है। पंजाब ने 90 फीसदी ग्रामीण घरों में नल जल आपूर्ति कर दी है। पंजाब का पड़ोसी हरियाणा 100 फीसदी नल जल आपूर्ति के साथ पंजाब से आगे निकल गया है। वैसे जल जीवन मिशन जैसे सामाजिक आंदोलन के तहत बच्चों के स्वास्थ्य और उनकी देखभाल पर ध्यान केंद्रित करते हुए स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों मे नल से शुद्व जल की आपूर्ति को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जा रहा है। इसके तहत अब तक 8.33 लाख यानी 81.33 प्रतिशत स्कूलों और 8.76 लाख यानी 78.48 प्रतिशत आंगनबाड़ी केंद्रों में नल से जल की व्यवस्था कर दी गई है, जिसमें शौचालयों में नल से जल की सुविधा भी शमिल है। यूनिसेफ इंडिया के वॉश के प्रमुख निकोलस ओस्बर्ट का मानना है कि जल जीवन मिशन विशेष तौर पर दूषित जल से होने वाली बाल मौतों को कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसमें बच्चों व महिलाओं की जिंदगी को बेहतर बनाने की संभावना है जल जीवन मिशन अब जन आंदोलन के रूप में चलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के सबका साथ, सब का विकास, सब का विश्वास, सब का प्रयास विजन के सिंद्धांत का पालन करते हुए इस मिशन का आदर्श वाक्य है कि कोई भी छूटे नहीं और मुल्क में हर ग्रामीण परिवार को नल के पानी का कनेक्शन दिया जाए। सिर्फ पानी ही उपलब्ध नहीं कराया जाए बल्कि पानी की गुणवत्ता पर निगरानी रखने की भी व्यवस्था की गई है। फील्ड टेस्ट किट का इस्तेमाल करके पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने क लिए 8.5 लाख से अधिक महिला स्ंवयसेवकों को प्रशिक्षित किया गया है। वे नमूने इकट्ठे कर पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आपूर्ति किया जा रहा जल निर्धारित मानकों के अनुसार है या नहीं। आज, मुल्क में 2,000 से अधिक जल परीक्षण प्रयोगशालाए हैं जो पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने के लिए मामूली कीमत पर जनता के लिए उपलब्ध हैं। जल जीवन मिशन के तहत सरकार का लक्ष्य 2024 तक मुल्क के हर ग्रामीण घर में नल से शुद्व पेय जल पहुंचाना है। मुल्क के सुदूर-दुर्गम गांवों तक नल पेय जल पहुंचाने के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। हाल ही में लेह के जिला प्रशासन ने जिले के ऊंचे पर्वतीय दुर्गम और सुदूर से सुदूर इलाकों में स्थित गांवों में जल जीवन मिशन के कार्यों के वास्ते इस्तेमाल होने वाले पानी के पाइपों और अन्य सामग्री को पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टर की मदद ली। जैसे-जैसे जल जीवन मिशन की रफ्तार और तेज होगी, वैसे-वैसे इस मिशन का आदर्श वाक्य कोई भी छूटे नहीं चरितार्थ होने के करीब पहुंचता नजर आएगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनायक चटर्जी)। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने हाल ही में अपने देश के ध्वस्त हो रहे रेलवे नेटवर्क की व्यापक जांच और मरम्मत की घोषणा करते हुए कहा, ब्रिटेन के विफल होते ट्रेन नेटवर्क को सरकार के नियंत्रण में लाया जाएगा। उनका यह कदम सन 1980 और 1990 के दशक में कंजरवेटिव पार्टी की सरकारों द्वारा शुरू की गई निजीकरण की विवादास्पद नीति को पलट देगा। ग्रेट ब्रिटिश रेलवेज (जीबीआर) नामक एक नई सार्वजनिक संस्था गठित की जाएगी। जीबीआर में समूचा रेलवे तंत्र शामिल होगा। यानी बुनियादी ढांचे से लेकर समय सारणी बनाने और टिकट से होने वाली आय संग्रहित करने तक का सारा काम। यह नई संस्था रेलवे नेटवर्क के पूंजीगत कार्य की योजना बनाने और उसका क्रियान्वयन करने के लिए भी उत्तरदायी होगी। फिलहाल बुनियादी ढांचे यानी ट्रैक, सिग्नल और बड़े स्टेशनों का प्रबंधन कर रही नेटवर्क रेल को इसमें समाहित कर लिया जाएगा। नई कंपनी निजी ट्रेन संचालकों को अनुबंधित करने का काम भी करेगी। ज्यादातर ट्रेनों के संचालन का काम उनके हवाले ही होगा। गत 20 मई को घोषित इन प्रस्तावों को बीते 25 वर्ष में ब्रिटेन के रेलवे उद्योग के इतिहास की सबसे बड़ी घटना माना जा रहा है। रेलवे एक बार फिर सरकार के हाथ में आ रही है। हालांकि इस दौरान निजी क्षेत्र का सहयोग लिया जाएगा। 30 वर्षीय योजना का मसौदा परिवहन मंत्री ग्रांट शैप्स और ब्रिटिश एयरवेज के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी कीथ विलियम्स ने तैयार किया है। इस योजना को 2023 तक पूरी तरह क्रियान्वित करना है। सन 1979 में जब तत्कालीन थैचर प्रशासन ने ब्रिटिश रेलवे का निजीकरण करने का निर्णय लिया था तब मिजाज बिल्कुल अलग था। उस वक्त कहा गया था कि प्रबंधन कौशल, उद्यमिता की भावना हासिल करने और जनता को बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए रेलवे का निजीकरण किया जाएगा। चार वर्ष बाद 1993 में रेलवे अधिनियम लागू हो गया। ट्रैक अथॉरिटी मॉडल अपनाया गया जबकि यात्री रेल सेवाओं को निजी कंपनियों को सौंप दिया गया। स्थायी परिसंपत्तियों मसलन रेलवे ट्रैक, स्टेशन, सुरंगें, पुल, सिग्नल और डिपो आदि जो पुरानी सरकारी कंपनी ब्रिटिश रेल के आधिपत्य में थे उन्हें एक स्वतंत्र कंपनी रेलट्रैक के हवाले कर दिया गया। सन 1995 में रेलटै्रक ने यात्री रेल सेवाओं की फ्रैंचाइज निजी यात्री रेल परिचालन कंपनियों को देनी शुरू की। अब इस फ्रेंचाइजी मॉडल में दिक्कतें देखी जा रही हैं क्योंकि इससे पूरा नेटवर्क बहुत हद तक विखंडित हो गया है। ऐसे में फ्रैंचाइज का संचालन कर रही कंपनी के पास परिचालन को लेकर बहुत सीमित अधिकार रह जाते हैं और ट्रैक और ट्रेन परिचालकों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है। ऐसा भी प्रतीत होता है कि ब्रिटेन में हर दो में से एक यात्री ट्रेन का संचालन फ्रांस और इटली की विदेशी कंपनियों द्वारा किए जाने के कारण ब्रिटेन के राष्ट्रीय गौरव को भी ठेस पहुंची। वर्ष 2016 से ही यह बहस शुरू हो गई थी कि रेलवे को एक बार फिर राष्ट्रीयकृत किया जाए या नहीं। दोबारा राष्ट्रीयकरण करने की इस पहल का सतर्कतापूर्वक स्वागत किया गया है। कुछ धड़े, खासकर श्रम संगठन इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं कि दक्षिणपंथी झुकाव रखने वाली कंजरवेटिव सरकार मौजूदा ढांचे को ध्वस्त करके दोबारा राष्ट्रीयकरण की व्यवस्था करेगी। भारत के लिए इसमें क्या सबक हैं? नेटवर्क वाले बुनियादी ढांचे में तयशुदा बुनियादी ढांचे पर राज्य का स्वामित्व ही सही तरीका है। निजीकृत रेल नेटवर्क के विभाजित ढंग से काम करने को ही ब्रिटिश रेल के निजीकरण की नाकामी की वजह माना जाता है। भारत को रेल, तेल एवं गैस पाइपलाइन तथा बिजली पारेषण लाइनों का मुद्रीकरण करते हुए इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। यदि भारत इस बात को ध्यान में रखे तो बेहतर होगा कि कुछ ही विकसित देशों ने उपयोगी नेटवर्क्स को निजी क्षेत्र को बेचने के तरीके का अनुसरण किया है। यूरोप में आमतौर पर ऐसा मॉडल अपनाया गया है जहां परिसंपत्ति स्वामित्व को सेवा प्रावधानों से अलग रखा गया और निजी नेटवर्क्स को परिचालन रियायत प्रदान की गईं। उस तरह देखें तो नियमित जरूरत का पूंजीगत व्यय संप्रभु संस्थान ने किया जबकि निजी क्षेत्र को परिचालन क्षमता से भरपाई की गई। भारत में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) के प्रबंधन की संस्थागत क्षमता की कमी है। दस से अधिक केंद्रीय मंत्रालय और 28 राज्य तथा आठ केंद्रशासित प्रदेश अपने-अपने तरीके से पीपीपी का संचालन कर रहे हैं और इस बीच औपचारिक रूप से ज्ञान की साझेदारी नहीं की जा रही। ब्रिटेन सन 1990 के दशक में पीपीपी की अवधारणा आने के बाद से ही उसके बेहतरीन व्यवहार का अगुआ रहा है और उसने कई समर्थक संस्थान विकसित किए जिनका दुनिया भर में अनुकरण किया गया। निजी फाइनैंस इनीशिएटिव, निजी फाइनैंस पैनल, इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस यूनिट और पाटर्नरशिप्स यूके आदि इसके उदाहरण हैं। भारत को पीपीपी के संस्थानीकरण को गंभीरता से लेना होगा और 3पी इंडिया के रूप में उस पीपीपी थिंकटैंक की स्थापना करनी होगी जिसकी घोषणा अरुण जेटली ने जुलाई 2014 के बजट में की थी। देश के पीपीपी कार्यक्रम में जो तनाव व्याप्त है उसके लिए नियामकीय आजादी की कमी भी एक वजह है। साहसी निर्णयों के लिए ऐसी आजादी आवश्यक है। पीपीपी को नियामकीय सहारे की आवश्यकता है। भारत की खुद की जरूरतें नवंबर 2019 की केलकर समिति की पीपीपी रिपोर्ट में शामिल की गई हैं। शायद भारत के नीति निमार्ताओं के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि दुनिया के सर्वाधिक परिपक्व बाजारों में भी निजी पूंजी को शामिल करने का प्रारूप अभी भी उभर रहा है और अनुभवों के आधार पर नया आकार ग्रहण कर रहा है। इसके लिए जरूरी है कि उच्च गुणवत्ता वाली संस्थागत क्षमता विकसित की जाए।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse