विचार

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Published / 2022-03-29 15:17:53
हिजाब पहनने पर अड़ने वाले को पहनने दीजिये, वे खुद बनेंगे मजाक

एबीएन डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। पैगंबर मोहम्मद के जमाने में श्रेष्ठी महिलाओं को दुष्कर्मियों से बचाने के लिए और चालू औरतों से अलग दिखाने के लिए हिजाब का चलन शुरू किया गया था। अब उसी परंपरा को डेढ़ हजार साल बाद दुनिया के सभी देशों की मुसलमान औरतों पर थोप देना कहां तक उचित है? कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्कूल-कालेजों में हिजाब पर प्रतिबंध को सही ठहरा दिया है। मेरी राय में हिजाब पहनना और हिजाब पर प्रतिबंध, दोनों ही गैर-जरूरी हैं। हमें उससे आगे की सोचना चाहिए। मुसलमान औरतें हिजाब पहनें, हिंदू चोटी-जनेऊ रखें, सिख पगड़ी-दाढ़ी-मूंछ रखें और ईसाई अपने गले में क्रास लटकाएं- ये निशानियां धर्म का अनिवार्य अंग कैसे हो सकती हैं? धर्म तो शाश्वत और सर्वकालिक होता है और इस तरह की ये बाहरी निशानियाँ देश-काल से बंधी होती हैं। आप जिस देश में जिस काल में रहते हैं, उसकी जरूरतों को देखते हुए इन बाहरी चीजों का प्रावधान कर दिया जाता है। इन्हें सार्वकालिक और सार्वदेशिक बना देना तो बड़ा ही हास्यास्पद है। यदि कनाडा की भयंकर ठंड में कोई पुरोहित सिर्फ धोती या लुंगी पहनकर पूजा-पाठ कराए या विवाह-संस्कार करवाए तो उसे ढेर होने से उसका परमात्मा भी नहीं बचा सकता। कनाडा में सिख पगड़ी पहनें तो वहां के मौसम में वह धक सकती है लेकिन अरब देशों में वह आरामदेह रहेगी क्या? इसी तरह पैगंबर मोहम्मद के जमाने में श्रेष्ठी महिलाओं को दुष्कर्मियों से बचाने के लिए और चालू औरतों से अलग दिखाने के लिए हिजाब का चलन शुरू किया गया था। अब उसी परंपरा को डेढ़ हजार साल बाद दुनिया के सभी देशों की मुसलमान औरतों पर थोप देना कहां तक उचित है? दुनिया के कई मुस्लिम और यूरोपीय देशों ने हिजाब पर प्रतिबंध लगा रखा है, क्योंकि चेहरे को छिपाने के पीछे दो गलत कारण काम करते हैं। एक तो अपराधियों को शै मिलती है और दूसरा सामूहिक अलगाव प्रकट होता है। सांप्रदायिकता पनपती है। मैं तो सोचता हूं कि हिंदू पर्दा और मुस्लिम हिजाब, दोनों ही औरतों के अधिकारों का हनन भी है। ऐसी असामयिक और अनावश्यक प्रथाओं का त्याग करवाने का अभियान धर्मध्वजियों को आगे होकर चलाना चाहिए। स्कूल-कालेजों में यदि विशेष वेश-भूषा का प्रावधान है तो उसे सबको मानना चाहिए लेकिन यदि कोई छात्रा हिजाब पहनकर कक्षा में आना चाहती है तो वह अपने आप को खुद मजाक का केंद्र बनाएगी। उसका हिजाब अपने आप उतर जाएगा। उसकी अक्ल पर पड़े हिजाब को आप अपने आप क्यों नहीं उतरने देते? तीन-चार हजार छात्र-छात्राओं के कालेज में पांच-छह लड़कियां हिजाब पहनकर आती रहें तो उससे क्या फर्क पड़ना है? यह हिजाबबाजी घोर सांप्रदायिकता, घोर अज्ञान और घोर पोंगापंथ के कारण भी हो सकती है। हमारी मुसलमान माँ-बहनें स्कूलों में ही नहीं, सर्वत्र इससे बचें, इसके लिए कानून से भी ज्यादा जिम्मेदारी है, हमारे मुल्ला मौलवियों की। वे यदि इस्लाम को आधुनिक बनाने और उसके बुनियादी सर्वहितकारी सिद्धांतों को मुसलमानों में लोकप्रिय करने का जिम्मा ले लें तो किसी कानून की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

Published / 2022-03-29 12:26:08
मध्यम आय वर्ग की आमदनी में हुए नुकसान की हुई भरपाई

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (महेश व्यास)। भारत में जून 2021 से उपभोक्ताओं की धारणा लगातार मजबूत हो रही है। जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच उपभोक्ता धारणा सूचकांक (आईसीएस) 31.9 प्रतिशत ऊपर चढ़ा है। मार्च में समाप्त हुए पहले तीन सप्ताहों में सूचकांक में 8.2 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इस तरह कोविड महामारी की दूसरी लहर के बाद उपभोक्ताओं की धारणा को पहुंची चोट के बाद सूचकांक में शानदार तेजी आई है। दूसरी लहर के दौरान मार्च और जून 2021 के बीच उपभोक्ताओं की धारणा में 15.5 प्रतिशत की कमी आई थी। जून के बाद जारी तेजी ने नुकसान की भरपाई कर ली है। उपभोक्ता धारणा में तेजी वैसे परिवारों की वजह से आई है जिनकी आय में एक वर्ष पहले की तुलना में इजाफा हुआ है। उन परिवारों का भी योगदान रहा है जिन्हें लगता है कि आने वाले वर्ष में उनकी आय बढ़ जाएगी। उन परिवारों की संख्या में भी इजाफा हुआ है जिन्हें लगता है कि एक वर्ष पहले की तुलना में उपभोक्ता वस्तुएं (कंज्यूमर ड्यूरेबल्स) खरीदने का यह बेहतर समय है। मगर चिंता की एक बात यह रही है कि यह आशावाद देश के सभी परिवारों के विचार में एक समान रूप से परिलक्षित नहीं हुआ। लोग अल्प एवं दीर्घ अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच उपभोक्ताओं की धारणा गरीब परिवारों में अधिक सुधरी है। वास्तव में इन परिवारों में धारणा में सुधार का महत्त्व थोड़ा इसलिए फीका पड़ जाता है क्योंकि कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के बीच गरीब परिवारों की धारणा पर सबसे अधिक चोट पड़ी थी। यानी में उनकी धारणा में सुधारा काफी निचले स्तर से हुआ है। सालाना 1 लाख रुपये से कम आय वाले परिवारों में उपभोक्ता धारणा 49.5 प्रतिशत मजबूत हुई। इससे पहले इसमें 28.7 प्रतिशत की गिरावट आई थी। वैसे तो यह एक शानदार सुधार है मगर भारत में कुल परिवारों की धारणा के लिहाज से यह बहुत मायने नहीं रखता है। इन परिवारों का अनुपात कम है और भारतीय उपभोक्ता बाजार में इनकी हिस्सेदारी छोटी है। महामारी से पहले 2019-20 में इन परिवारों के समूह की कुल परिवारों की संख्या में हिस्सेदारी 9.8 प्रतिशत और सभी परिवारों की कुल आय में हिस्सेदारी 3.1 प्रतिशत थी। 2020-21 में कोविड महामारी के दौरान इस समूह की हिस्सेदारी बढ़ गई क्योंकि इस दौरान वृहद पारिवारिक स्तर पर आर्थिक स्थिति बिगड़ गई थी। कुल परिवारों और उनकी आय में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर क्रमश: 16.6 प्रतिशत और 5.7 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2020-21 में इन अनुपातों में कोई खास बदलाव नहीं देखा गया। वर्ष 2021-22 में 1 लाख से 2 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवारों की संख्या घटती प्रतीत हो रही है। इससे पहले 2017-18 और 2020-21 में ऐसे परिवारों की हिस्सेदारी देश के कुल परिवारों में 44-45 प्रतिशत हुआ करती थी। मगर 2021-22 की पहली छमाही में उनकी हिस्सेदारी कम होकर 25 प्रतिशत रह गई। कुल आय में उनकी हिस्सेदारी भी 31 प्रतिशत से कम होकर 14 प्रतिशत रह गई। इस समूह की उपभोक्ता धारणा जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच 31 प्रतिशत तक बढ़ गई। ऐसा लग रहा है कि कई परिवार अब 1-2 लाख रुपये आय के दायरे से ऊंची आय वाले दायरे में आ रहे हैं। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि 2021-22 की पहली छमाही में इस दायरे में परिवारों की संख्या में कमी आई है मगर कम आय श्रेणी में आने वाले परिवारों की संख्या अपरिवर्तित रही है जबकि ऊंची आय श्रेणी में परिवारों की संख्या बढ़ी है। इस वर्ष की पहली छमाही में परिवारों की आय में सुधार के संकेत स्पष्ट थे। शेष महीनों के आंकड़े अभी नहीं आए हैं। मगर उपभोक्ताओं की धारणा में लगतार सुधार से संकेत मिलते हैं कि पारिवारिक आय में 2021-22 की दूसरी छमाही में भी सुधार जारी रह सकता है। सालाना 2 लाख से 5 लाख आय वाले परिवारों की उपभोक्ता धारणा जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच 28.3 प्रतिशत बढ़ गई। यह आय दायरा भारतीय उपभोक्ता बाजार का सबसे महत्तवपूर्ण खंड बन गया है। देश में कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है और कुल परिवारों की आय में इनका हिस्सा 56 प्रतिशत है। हाल तक कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 33 प्रतिशत और कुल आय में 45 प्रतिशत हुआ करती थी। पूर्ण रूप से कहें तो उपभोक्ता धारणा सूचकांक इस आय समूह में दूसरे आय समूहों की तुलना में सबसे ऊंचे स्तर पर है। सालाना 5 लाख से 10 लाख रुपये अर्जित करने परिवारों में उपभोक्ता धारणा सूचकांक जून 2021 के बाद 8.1 प्रतिशत तक बढ़ गई। कोविड महामारी की दूसरी लहर में इस आय वर्ग में आने वाले परिवार प्रभावित नहीं हुए थे। उनकी धारणा स्थिर हो गई थी मगर दूसरे समूहों की तरह नीचे नहीं गई थी। ऐसे परिवारों का अनुपात अपेक्षाकृत छोटा है। सभी परिवारों में इनकी हिस्सेदारी केवल 7.1 प्रतिशत है मगर कुल परिवारों की आय में इनकी हिस्सेदारी 19.7 प्रतिशत है। भारत के कुल उपभोक्ता बाजार में सालाना 10 लाख से अधिक आय अर्जित करने वाले परिवारों की संख्या छोटी है। 2021-22 की पहली छमाही में देश के कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 0.9 प्रतिशत और कुल आय में हिस्सेदारी 5.2 प्रतिशत थी। दूसरी लहर में ऐसे परिवारों की उपभोक्ता धारणा में 3.9 प्रतिशत की कमी आई थी। तब से इनमें सुधार 1.2 प्रतिशत के साथ उत्साजनक नहीं रहा है। दिसंबर 2021 में इस समूह की उपभोक्ता धारणा शिखर पर पहुंच गई थी मगर जनवरी और फरवरी 2022 दोनों में इनमें गिरावट आई है। ऐसे समूह की आय का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा बचत मद में चला जाता है। ऐसा लगता है कि शेयर बाजार में गिरावट की वजह से इस समूह की धारणा पर असर हुआ है। मध्य-आय वर्ग वाले लोगों की आय में सुधार हो रहा है और यह बात उनकी मजबूत होती धारणा में भी परिलक्षित होती है।

Published / 2022-03-26 13:02:47
हालात में सुधार के बाद होटल उद्योग के लिए खुला आसमान

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शैली सेठ मोहिले)। शनिवार मध्य रात से भारत से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शुरू हो जाएंगी, ऐसे में गर्मी की छुट्टियों में लोग घरेलू बाजार के बजाय विदेश में छुट्टियां मनाने जा सकते हैं। लेकिन इसकी वजह से घूमने वाली कोई भी जगह कम आकर्षक नहीं होगी। पर्यटन और होटल कारोबार के लोगों के लिए इस वक्त काफी गर्मजोशी का माहौल है क्योंकि देश और विदेश की यात्रा में मांग बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि लोग गर्मी के महीने में ठंडी जगहों पर जाएंगे। एक अति लक्जरी होटल ब्रांड पोस्टकार्ड होटल के संस्थापक कपिल चोपड़ा का कहना है कि घरेलू पर्यटन बाजार, विदेशी बाजार की तुलना में 10 गुना बड़ा है। उनका कहना है कि पोस्टकार्ड के नियमित मेहमान निश्चित तौर पर यूरोप जैसी जगहों पर छुट्टियां मनाने के लिए जाएंगे लेकिन इसका असर कारोबार पर नहीं पड़ेगा क्योंकि प्रॉपर्टी की मांग अधिक रही है। पोस्टकार्ड को उम्मीद है कि घरेलू पर्यटकों से फायदा मिलेगा। वह दावा करते हैं, घरेलू पर्यटकों के लिए लोग हमें चुनेंगे। मांग से उत्साहित पोस्टकार्ड होटल ने इस गर्मी में सालाना 35 फीसदी वृद्धि की उम्मीद की है। लीजर होटल ग्रुप के निदेशक विभास प्रसाद का कहना है कि घरेलू पर्यटक काफी लंबे समय तक घरों में बंद थे ऐसे में वे बड़ी तादाद में मशहूर जगहों पर इक_ा हो रहे हैं और उन्होंने एक नया ट्रैवल सर्किट तैयार किया है। उन्होंने कहा, हमारा पूरा जोर पहाड़ों में प्रायोगिक लक्जरी पर रहा है जिसके चलते यह बात सुनिश्चित हुई कि ज्यादा रकम चुकाने वाले ग्राहकों के लिए यह तरजीही होटल चेन है। ईजमाईट्रिप के सह संस्थापक प्रशांत पिट्टी के मुताबिक पिछले दो सालों में घरेलू पर्यटन की हिस्सेदारी महामारी से पहले के दौर के 66 फीसदी से बढ़कर 96 फीसदी हो गई है। वह कहते हैं, हम यह मानते हैं कि मई, जून और जुलाई महीने में मांग में भारी बढ़ोतरी होगी। पर्यटकों की तादाद अधिक बढ़ने पर हवाई किराये में भी बढ़ोतरी होगी। ज्यादा मांग और सीमित आपूर्ति के चलते औसत रोजाना दर में तेजी रहेगी और पर्यटकों को अधिक प्रीमियम का भुगतान उसी तरह करना पड़ेगा जिस तरह सर्दी की छुट्टियों के दौरान उन्होंने किया था। चोपड़ा और प्रसाद की तरह रोजिएट होटल्स ऐंड रिजॉर्ट्स के मुख्य कार्याधिकारी अधिकारी खुश कपूर भी इस गर्मी में मांग में बढ़ोतरी देख रहे हैं। हालांकि उन्हें घरेलू लोकेशन की मांग बढ़ने की उम्मीद है। उनका कहना है, यूक्रेन के युद्ध के चलते और महामारी के डर से आशंका की स्थिति बनी हुई है। कोई भी अपने परिवार और घर को छोड़कर विदेश यात्रा नहीं करना चाहता है। ऐसे में घरेलू यात्रा के रुझान में ही तेजी आएगी। रोजिएट ने अप्रैल और मई महीने के लिए खूब बुकिंग की है। कपूर का कहना है, ऋषिकेश में हमारी प्रॉपर्टी पहले ही बेची जा चुकी है। विदेशी यात्रियों के लिए कॉरपोरेट बुकिंग की शुरूआत हो चुकी है। करीब 160,000 ब्रांडेड होटल रूम में से लीजर होटल की हिसस्सेदारी केवल 4 फीसदी है। नोएसिस कैपिटल ऐंड एडवाइजर्स के सीईओ नंदीवर्धन जैन का कहना है, मांग-आपूर्ति में असंतुलन बने रहने की उम्मीद है जब तक कि पाइपलाइन की सभी नई इन्वेंट्री तैयार है। नतीजतन ब्रांडेड प्रॉपर्टी महंगी बनी रहेगी। देश भर में पोस्टकार्ड की 23 निर्माणाधीन प्रॉपर्टी है। चोपड़ा का कहना है, प्रत्येक तीन महीने में एक नए पोस्टकार्ड की ओपनिंग हो रही है। उत्तर भारत में लीजर होटल्स की 29 प्रॉपर्टी है और इसने चार और प्रॉपर्टी उत्तराखंड, भीमताल, नौकुचियाताल और मसूरी में प्रॉपर्टी तैयार करने की योजना बनाई है। इसके अलावा इसने गोवा और राजस्थान में भी नई प्रॉपर्टी स्थापित करने के लिए बातचीत की है। रोजिएट ने भी परिसंपत्ति डेवलपरों के साथ बातचीत करनी शुरू कर दी है और यह विस्तार की योजना बना रही है। भारत में सरकार ने रेल नेटवर्क और सड़क में निवेश की योजना के साथ-साथ छोटे शहरों में हवाईअड्डे के निजीकरण पर जोर दिया है जिससे कई क्षेत्रीय पर्यटन स्थलों तक संपर्क स्थापित होगा। थॉमस कुक इंडिया और इसकी समूह कंपनी एसओटीसी ट्रैवल ने अल्ट्रा फ्लेक्सीबल हॉलिडे की योजना बनाई है जिसकी लागत 99,000 रुपये है। आठ दिनों के टूर पैकेज में पांच दिन स्विटजरलैंड के साथ तीन दिन फ्रांस, इटली या आॅस्ट्रेलिया में बिताने का विकल्प है। इसके अलावा दक्षिण पूर्व एशिया के लोकप्रिय स्थानों जैसे कि सिंगापुर और थाईलैंड में पर्यटन बोर्ड भी रोडशो का आयोजन कर रहे हैं और वे भारतीय पर्यटकों के लिए आकर्षक ट्रैवल पैकेज की शुरूआत कर रहे हैं।

Published / 2022-03-25 13:32:06
डूबती सरकारी दूरसंचार कंपनियों का कड़वा सच...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्याम पोनप्पा)। यह भारत में दूरसंचार क्षेत्र और मोबाइल फोन की विकास कहानी शुरू होने के पहले की बात है। उस समय दूरसंचार क्षेत्र अटकी हुई हालत में था। करीब 15 दूरसंचार आॅपरेटर ऊंचे लाइसेंस शुल्क के बोझ, उपभोक्ताओं की सीमित संख्या और तगड़ी प्रतिद्वंद्विता में फंसे हुए थे। भारी कर्ज तले दबे आॅपरेटरों के पास अधिक राजस्व कमाने के लिए नेटवर्क स्थापित करने के पैसे भी नहीं बचे थे। उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी टीम ने उद्योग जगत एवं पेशेवरों के साथ मिलकर साहसिक कदम उठाया और उसका जादुई नतीजा निकला। कुछ रचनात्मक नीतियां लागू करने से दूरसंचार जगत में जबरदस्त वृद्धि का रास्ता खुला और बाजार एवं व्यवहार में व्यापक बदलाव भी आए। इस दिशा में घटनाक्रम की शुरुआत 1998 में हुई जब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने दूरसंचार क्षेत्र की समस्याओं पर गौर करने का निर्णय लिया। आईसीआईसीआई और औद्योगिक लागत एवं कीमत ब्यूरो की तरफ से किए गए अध्ययनों पर गौर करने के बाद पीएमओ ने सरकार के भीतर और बाहर के पेशेवरों, उद्योग जगत के हितधारकों और वित्तीय संस्थानों से सलाह-मशविरा किया। इस तरह एनटीपी-99 का खाका तैयार हुआ। भले ही ये नीतियां सर्वोत्कृष्ट नहीं थीं क्योंकि उद्देश्य-उन्मुख प्रक्रियाओं के साथ राजनीतिक अनुकूलन का भी मेल था लेकिन एक बुनियादी प्रगति यह थी कि सरकार ने लाइसेंस के लिए लगाई बोली पर अग्रिम भुगतान के बजाय अर्जित राजस्व के हिस्से के तौर पर आॅपरेटरों से ही शुल्क एकत्रित किए। यह एक मुश्किल राजनीतिक निर्णय था क्योंकि लोगों के बीच यह गलत धारणा थी इसे आॅपरेटरों को मुफ्त में ही दे दिया गया। लेकिन अदालत में घसीटे जाने के बावजूद सरकार अपने फैसले पर अडिग रही और नतीजों ने साबित कर दिया कि यह फैसला पूरी तरह से सार्वजनिक हित में लिया गया था। वैसे राजस्व में सरकारी हिस्सेदारी काफी अधिक रखे जाने से शुरूआत में उतनी सफलता नहीं मिली। लेकिन वर्ष 2004 में हुई दो घटनाओं ने हालात बदल दिए। अर्जित राजस्व में सरकार की हिस्सेदारी को घटाकर आठ फीसदी कर दिया गया और किसी कॉल के लिए कॉलर एवं रिसीवर दोनों को भुगतान करने के बजाय सिर्फ कॉलर पर ही उसका बोझ डालने का फैसला लिया गया। इस कदम से मांग एवं आपूर्ति दोनों को ही बढ़ावा मिला और मोबाइल फोन की संख्या में विस्फोटक वृद्धि का रास्ता तैयार हो गया। नतीजा यह हुआ कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते एवं सबसे आकर्षक बाजारों में से एक बन गया। आगे चलकर सरकार ने नीलामी को बोली से कहीं अधिक राजस्व हिस्सेदारी के जरिये इकट्ठा कर लिया। ऐसा होने के बावजूद यह बात समझ से बाहर है कि आगे की सरकारों ने अपना राजस्व बढ़ाने के लिए दूरसंचार क्षेत्र पर ध्यान नहीं दिया और इसे पतन की राह पर डाल दिया। आज का दूरसंचार संकट काफी कुछ 1998 जैसा ही है। हमारी नियामकीय नीतियों का परिणाम शुल्क दरों को लेकर जंग छिड़े एवं अपने पड़ोसी को गरीब बनाने की रणनीति के रूप में सामने आया। ऐसा तब है जब अधिकतर लोगों को अच्छी एवं भरोसेमंद सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस तरह भारत में दूरसंचार सेवाओं की दरें बेहद कम होने की वजह से लंबे समय तक नहीं टिक सकती हैं। उच्चतम न्यायालय के उस फैसले ने दूरसंचार आॅपरेटरों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं जिसमें स्पेक्ट्रम धारकों पर पिछली तारीख से समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) लगाने के सरकारी रुख को सही बताया है। मौजूदा सरकार को वाजपेयी सरकार की तरह कदम उठाने के लिए संकल्प जुटाने की जरूरत है। दूरसंचार क्षेत्र एवं अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए सरकार को एक क्रांतिकारी हस्तक्षेप करना होगा। स्पेक्ट्रम उपयोग के लिए नीलामी शुल्क के बजाय राजस्व-हिस्सेदारी का तरीका अपनाया जाए। वर्ष 1999 में भी स्पेक्ट्रम लाइसेंस शुल्क के लिए राजस्व हिस्सेदारी का रास्ता अपनाया गया था। ऐसा होने पर स्पेक्ट्रम का महज सरकारी राजस्व के बजाय संपर्क एवं प्रगति के एक सार्वजनिक संसाधन के तौर पर अधिक तर्कसंगत उपयोग हो सकेगा। अतिरिक्त स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क खत्म कर देने से विकास एवं वृद्धि के लिए संचार सेवाएं मुहैया कराई जा सकेगी और बाकी दुनिया की तुलना में भारत में क्षमता की खामी भी सुधार सकेगी। अगर अत्यधिक लाभ होता है या फंड को अनुचित राह पर डाला जाता है तो एक अप्रत्याशित लाभ का प्रावधान भी रखा जा सकता है। नई तकनीकों को लागू करने वाली नीतियां लागू हों। मसलन, गूगल पिक्सल फोन का नवीनतम संस्करण भारत में इसलिए नहीं जारी किया जा सका है कि यहां पर 60 गीगाहर्ट्ज सीमित बैंडविड्थ पर ही उपलब्ध है। इसी तरह 5जी तकनीक के मामले में भारत पहले ही पिछड़ चुका है और स्पेक्ट्रम संपर्क में बड़ा बदलाव लाए बगैर उसे 5जी का लाभ उठाने में वर्षों लगेंगे। बढ़े हुए उत्पादन के लिए ब्रॉड बैंड मुहैया कराने के लिए स्पेक्ट्रम पूलिंग की जाए। इसे भू-स्थिति डेटाबेस चालित साझा स्पेक्ट्रम के जरिये अंजाम दिया जा सकता है जैसा कि यूरोप में लाइसेंसशुदा साझा स्पेक्ट्रम (एलएसए) या अमेरिका में प्राधिकृत साझा स्पेक्ट्रम (एएसए) के दौरान हुआ है। संभवत: स्पेक्ट्रम साझेदारी को ढांचागत क्षेत्र के प्रति कंसोर्टियम नजरिया और डिलीवरी के लिए बिना बंडल एवं उपयोग-आधारित लागत अपनाया जाए। नेटवर्क विकास एवं प्रबंधन जैसे आधारभूत ढांचे को सेवा से अलग कर ऐसा किया जा सकता है। एक और संभावना यह है कि दो-तीन एकीकृत कंसोर्टियम मौजूद हों जिसमें से हरेक के पास अपना आधारभूत ढांचा हो। इसके लिए अधिक पूंजी निवेश की जरूरत होगी।दूरसंचार कारोबार में विविध सरकारी एजेंसियां शामिल होती हैं, मसलन दूरसंचार विभाग, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, ट्राई, वित्त और कानून मंत्रालय के अलावा राज्य सरकारें भी इसका हिस्सा होती हैं।मोबाइल टेलीफोनी के बगैर काम करना आज अविश्वसनीय नजर आता है। अपने लाभ के लिए दूरसंचार का इस्तेमाल करने वाले नेताओं के बजाय मौजूदा संदर्भों में ये मौके वर्षों तक छूट जाने की संभावना है, जब तक कि सरकार ठोस कार्रवाई का साहस एवं संकल्प न दिखाए।

Published / 2022-03-22 17:32:30
ऊर्जा का मूल्य बढ़ाकर खपत घटाइये...

एबीएन डेस्क (भरत झुनझुनवाला)। यूक्रेन के युद्ध ने ईंधन तेल की समस्या को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। कुछ माह पूर्व विश्व बाजार में कच्चे तेल का दाम 80 रुपए प्रति बैरल था जो बढ़कर वर्तमान में 110 रुपये हो गया है। आगे इसके 150 डॉलर तक चढ़ने की संभावना बन रही है। ऐसी परिस्थिति में वर्तमान में पेट्रोल का दाम 100 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 130 रुपये प्रति लीटर तक होने की संभावना है। हमारे लिए यह संकट है; क्योंकि हम अपनी खपत का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात करते हैं। यूक्रेन युद्ध अथवा ऐसे ही अन्य संकट के कारण यदि तेल की सप्लाई कम हो गई और इसके दाम बढ़ गए तो हमारी पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। हमारे पास ऊर्जा के दूसरे स्रोत भी नहीं हैं। तेल यूं ही कम है। कोयला हमारे पास लगभग आने वाले 150 वर्ष की सामान्य जरूरत के लिए है परंतु जैसे-जैसे हम कोयले का खनन करते हैं वैसे-वैसे उसकी गुणवत्ता कम होती जाती है और इसलिए हम वर्तमान में ही कोयले का भारी मात्रा में आयात कर रहे हैं। यूरेनियम भी अपने देश में कम है, जिसके कारण हम परमाणु ऊर्जा नहीं बना सकते हैं। हमारे पास केवल दो स्रोत बचते हैं- सोलर एवं हाइड्रो पॉवर। सोलर के विस्तार के लिए सरकार ने प्रभावी कदम उठाए हैं और इसमें तेजी से वृद्धि भी हुई है परंतु आकलनों के अनुसार इस तीव्र वृद्धि के बावजूद 2050 में सोलर ऊर्जा से हम केवल अपनी 14 प्रतिशत जरूरतों की पूर्ति कर सकेंगे। इसलिए सोलर पॉवर हमारी ऊर्जा सुरक्षा का स्तंभ नहीं बन सकता है। हाइड्रो पॉवर की भी सीमा है क्योंकि तमाम नदियों के ऊपर बंपर से बंपर जुड़े हुए हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट पहले ही लग चुके हैं। बची हुई नदियों के ऊपर हम हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट लगा भी दें तो भी इनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भारी हैं। जैसे पाया गया है कि हाइड्रो पावर के बड़े तालाबों में मच्छर पैदा होते हैं और उन क्षेत्रों में मलेरिया का प्रकोप अधिक होता है। पानी की गुणवत्ता का ह्रास होता है। नदी का सौंदर्य जाता रहता है। मछलियां मरती हैं और जैव विविधता समाप्त होती है। अतः जब हम हाइड्रो पॉवर बनाते हैं तो हमारे जीवन स्तर पर एक साथ दो विपरीत प्रभाव पड़ते हैं। एक तरफ हमें बिजली उपलब्ध होती है, जिससे जीवन स्तर में सुधार होता है तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य, पानी और सौंदर्य का ह्रास होता है जिससे हमारे जीवन स्तर में गिरावट आती है। अंतत: हाइड्रो पॉवर से कोई विशेष लाभ होता है ऐसा नहीं दिखता। फर्क सिर्फ इतना है कि हाइड्रो पॉवर से बनी हुई ऊर्जा का उपयोग अमीर ज्यादा करते हैं जबकि पर्यावरणीय दुष्प्रभाव आम आदमी पर अधिक पड़ता है। इसलिए देश के लिए हानिप्रद होते हुए भी हाइड्रो पॉवर को बढ़ाया जा रहा है परंतु इससे हमारी ऊर्जा सुरक्षा स्थापित नहीं होती क्योंकि इसकी सीमा है। एक और घरेलू स्रोत बायो डीजल अथवा एथेनॉल का है। यहां संकट खाद्य सुरक्षा का है। जब हम खेती की जमीन पर बायो डीजल बनाने के लिए गन्ने का उत्पादन बढ़ाते हैं तो उसी अनुपात में गेहूं, चावल और अन्य फल, सब्जी का उत्पादन घटता है जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है। पानी का भी संकट बनता है क्योंकि गन्ने के उत्पादन में गेहूं की तुलना में लगभग 10 गुना पानी अधिक प्रयोग होता है। लगभग संपूर्ण देश में भूमिगत जल का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है जिसके कारण हम बायो डीजल का उत्पादन भी नहीं बढ़ा सकेंगे। परमाणु ऊर्जा की भी समस्या है क्योंकि यूरेनियम अपने देश में है ही नहीं। इसका एक विकल्प थोरियम है। लेकिन थोरियम से यूरेनियम बनाने में हम फिलहाल बहुत पीछे हैं। चीन इसी वर्ष थोरियम से चलने वाले एक प्रायोगिक परमाणु रिएक्टर को शुरू करने जा रहा है जबकि हम केवल अभी ड्राइंग बोर्ड पर ही सीमित हैं। इसलिए अगले 20-30 वर्षों में हम थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा बनाएंगे इसकी संभावना नहीं के बराबर है। इस परिस्थिति में हम ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाकर किसी भी तरह से अपनी ऊर्जा सुरक्षा स्थापित नहीं कर सकते हैं। हमारे पास केवल एक उपाय है कि हम अपनी खपत को कम करें। नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में बताया गया कि विश्व के ऊपरी 10 प्रतिशत लोग 50 प्रतिशत ऊर्जा की खपत करते हैं। अतः यदि हम ऊर्जा के दाम में भारी वृद्धि करें तो इसका अधिक प्रभाव ऊपरी वर्ग पर पड़ेगा और यदि इस पर लगाए गए टैक्स का उपयोग हम आम आदमी के हक में करें तो आम आदमी के जीवन स्तर पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। जितना अधिक खर्च उसके द्वारा महंगी ऊर्जा की खरीद में किया जाएगा उससे ज्यादा लाभ उसे सार्वजनिक सुविधाओं जैसे बस की उपलब्धता से हो सकता है। इसलिए सरकार को तेल और बिजली दोनों पर भारी "ऊर्जा सुरक्षा" टैक्स आरोपित करना चाहिए। इनके दाम में भारी वृद्धि करनी चाहिए। तेल पर प्रति लीटर और बिजली पर प्रति यूनिट का ऊर्जा सुरक्षा टैक्स लागू कर देना चाहिए। साथ-साथ जिस प्रकार आम आदमी पार्टी ने जनता को 300 यूनिट तक की बिजली की खपत मुफ्त करा दी है उसे सम्पूर्ण देश में लागू करना चाहिए जिससे आम आदमी पर तेल और बिजली के बढ़े हुए दाम का प्रभाव न पड़े। ऊर्जा सुरक्षा स्थापित करने का दूसरा उपाय है कि हम मैन्युफैक्चरिंग के आधार "मेक इन इंडिया" को बढ़ाने के स्थान पर सेवा क्षेत्र के आधार पर "सर्वड फ्रॉम इंडिया" के विस्तार पर ध्यान दें। बताते चलें कि 100 रुपये की आय बनाने में जितनी ऊर्जा मैन्युफैक्चरिंग में लगती है उसका केवल दसवां हिस्सा सेवा क्षेत्र में लगता है। सेवा क्षेत्र में सॉफ्टवेयर, संगीत, ट्रांसलेशन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि आते हैं जहां पर कम ऊर्जा में अधिक उत्पादन किया जाता है। यदि हम अपनी आय को सेवा क्षेत्र से हासिल करें तो हम कम ऊर्जा में अधिक आय हासिल कर सकते हैं। अतः सरकार को उत्पादित माल जैसे कार, एल्यूमीनियम, स्टील आदि के निर्यात पर भी भारी निर्यात टैक्स लगाना चाहिए, जिससे इनका उत्पादन कम हो और देश में ऊर्जा की खपत कम हो। साथ-साथ सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहन देना चाहिए जिससे कि हम कम ऊर्जा में भी पर्याप्त आय को हासिल कर सकें। ऊर्जा का संकट आगे गहराने की स्थिति है। इस दिशा में सरकार को शीघ्र कदम उठाने चाहिए। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)

Published / 2022-03-22 14:00:21
बिहार की गौरवमयी गाथा : 110वीं जयंती पर अपने गौरव की ओर लौटता बिहार...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुधीर शर्मा)। 22 मार्च 2022 को, जब बिहार राज्य अपनी स्थापना की 110वीं जयंती को बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाने जा रहा है, तब लगभग 12.88 करोड़ बिहारियों की आंखों के सामने कई अच्छी यादों का पिटारा, सफलता की गाथा और विकास की दुर्लभ यात्रा का इतिहास होगा, जिसके लिए वे जश्न मना सकते हैं, साझा कर सकते हैं और गर्व महसूस कर सकते हैं। लेकिन, इन सबके बीच लगभग 12.88 करोड़ जीवंत बिहारियों और बिहार सरकार के सामने करोड़ों डॉलर का यह अहम सवाल होगा कि- ज्ञान की यह पवित्र भूमि कब अवसरों और समाधान की भूमि बनेगी? बिहार दिवस हर साल 22 मार्च को ब्रिटिश शासन द्वारा राज्य को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग करने के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। 21 मार्च, 1912 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी गवर्नर थॉमस गिब्सन कारमाइकल द्वारा बंगाल को चार प्रांतों- बंगाल, उड़ीसा, बिहार और असम में विभाजित करने की घोषणा की गई थी। बाद में 1936 में, ओडिशा को बिहार से अलग कर दिया गया था और पुनः वर्ष 2000 में झारखंड राज्य बनाया गया था। 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सुशासन बाबू नीतीश कुमार के पदभार संभालने के बाद फिर से यह दिन बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा और इसे सबसे पहले वर्ष 2010 में बड़े पैमाने पर मनाया गया था। बिहार दिवस का उत्सव, केवल बिहार राज्य और भारत में ही सीमित नहीं है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोप, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमरीका और त्रिनिदाद जैसे अन्य देशों में रहने वाले बिहारी प्रवासी भी इस दिन को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। इस वर्ष बिहार दिवस का थीम (विषय) बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी योजना, जल जीवन हरियाली और नल-जल योजना पर केंद्रित है। यह थीम बिहार सरकार द्वारा लोगों में वार्षिक वर्षा की घटती दर, कई जिलों में घटते जल स्तर, जल सुरक्षा के लिए खतरा और राज्य भर में हरियाली के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए रखा गया है। सोशल मीडिया के युग में, जहां लगभग हर कोई हर विषय पर विशेषज्ञ बन गया है और एक राष्ट्र के रूप में हम आभासी जगद-गुरु के सुनहरे दौर से गुजर रहे हैं। यह मुझे याद दिलाता है, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार हरिशंकर परसाई (1924-1995) जी के एक प्रचलित उद्धरण का, हम मानसिक रूप से दोगले नहीं तिगले हैं। संस्कारों से सामन्तवादी हैं, जीवन मूल्य अर्द्ध-पूंजीवादी हैं और बातें समाजवाद की करते हैं। बिहार को समझने के लिए, हमें "द बिहार फाइल्स" को समझना होगा, जो विभिन्न आयामों के माध्यम से बिहार के आख्यानों के इर्द-गिर्द घूमती है। यह उसी तर्ज पर है, जैसे अभी पूरा भारत "द कश्मीर फाइल्स" की लहर से गुजर रहा है, और सबका अपना आख्यान और सत्य है, जो धारणा और प्रकाशिकी की राजनीति के बीच छिपा हुआ है। कुछ बुद्धिजीवियों ने बिहार को रुकतापुर की संज्ञा दे दी, यानि ऐसी जगह जहां विकास के पहिये जाम हो गए। हालांकि, यह लगभग हर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विकास सूचकांकों में बिहार राज्य के साल दर साल खराब या सबसे खराब प्रदर्शन के अनुरूप भी है- फिर चाहे वह सतत विकास लक्ष्य सूचकांक हो, भोजन, कपड़े, आवास, स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं से संबंधित सूचकांक हों, प्रशासन के सभी स्तरों में मौजूद बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, प्रशासन और शासन और सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में जवाबदेही, नैतिकता, सत्यनिष्ठा और जवाबदेही का अभाव, व्यापार करने में आसानी में चुनौतियां, आम बिहारियों की सुरक्षा और आबादी के हाशिए पर रहने वाले वर्ग- जैसे कि महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, एलजीबीटी की भलाई। इन सभी ने अंततः राज्य को बीमारू श्रेणी या तथाकथित रुक्तापुर में में धकेल दिया। बॉलीवुड के सिल्वर स्क्रीन, मीडिया और गैर-सूचित कथाओं ने भी पिछले कुछ वर्षों में बिहार के बारे में कई नकारात्मक धारणाएं पैदा की हैं। भगवान बुद्ध, भगवान महावीर और गणितज्ञ आर्यभट्ट की पवित्र और ज्ञानी भूमि के रूप में बिहार, भारतीय सभ्यता की पालना, माता सीता की जन्मभूमि, भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू की जन्मभूमि ये सभी अच्छे और सकारात्मक पहलू छिपे हुए हैं। और इसकी जगह भारत का सबसे पिछड़ा राज्य, बेरोजगार युवाओं की फौज वाला प्रांत, भूखे और कुपोषित बच्चों वाला राज्य जैसे आख्यानों ने ले लिया। अधिकांश भारतीयों की नज़र में आधुनिक बिहार का एकमात्र सकारात्मक पहलू यह है कि बिहार सबसे अधिक संख्या में सिविल सेवा अधिकारियों, वैज्ञानिकों और अभियंता का घर भी है। अब आगे क्या और कैसे बने बिहार : अपने 110वें जन्मदिन के मौके पर, बिहार को कई सवालों के जवाब देने और शासन और प्रशासनिक घाटे और विकासात्मक असमानताओं से जुड़ी चुनौतियों को हल करने के लिए कई विकासात्मक आयामों में आगे बढ़ना है। फिर चाहे, वो आर्थिक हल, युवाओं को बल या युवा शक्ति-बिहार की प्रगति, नीति की आकांक्षा हो, जो सरकारी और निजी क्षेत्र की भागीदारी के मिश्रित दृष्टिकोण से ही संभव है। इस दिशा में, बिहार उद्योग संघ के साथ उद्योग विभाग, बिहार सरकार द्वारा हाल ही में संपन्न बिहार स्टार्ट अप कॉन्क्लेव (12 मार्च 2022) का आयोजन एक स्वागत योग्य कदम है और इसमें बिहार को स्टार्ट-अप कैपिटल में बदलने की क्षमता है, यदि इस प्रक्रिया में शामिल प्रत्येक हितधारक अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम प्रयास करते हैं और इसके बाद प्रत्येक स्तर पर लगातार और उचित अनुवर्ती कार्रवाई करते हैं। जब भारत ने 2016 में अपनी स्टार्ट-अप नीति लागू की, तो बिहार देश का पहला राज्य था, जिसने 10 लाख रुपये के सिड कोष (फंड) के साथ शुरुआत की। इसके अलावा, एक विशेष आर्थिक क्षेत्र के निर्माण पर ध्यान देना, प्रवासी भारतीयों (बिहारी) को निवेश बोर्ड में रखते हुए, नौकरशाही लालफीताशाही को दरकिनार करने के लिए एक जवाबदेह और पारदर्शी फास्ट ट्रैक अनुमोदन तंत्र भी ब्रेन-ड्रेन (प्रतिभा पलायन) को रोकेगा और रिवर्स ब्रेन-ड्रेन की संस्कृति को चालू करेगा। राज्य में अनछुए और कम ज्ञात पर्यटन स्थलों को ध्यान में रखते हुए पर्यटन क्षेत्र में निवेश पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कदम, वैश्विक महामारी कोविड -19 के पहली और दूसरी लहरों से सबक लेते हुए स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे (प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल) में निवेश, शिक्षा प्रणाली का एक पूर्ण ओवरहाल, प्रवास और प्रवासी श्रमिकों के लिए स्थायी एंटी-डॉट तैयार करना ताकी उन्हे देश के दूसरे राज्यों से बार बार धक्का और गाली खाकर घर आना न पडे़, अन्य सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए शराबबंदी जैसी मजबूत नीति, और महत्वाकांक्षी सात निश्चय योजनाओं (2.0) के वास्तविक कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना, आदि से हीं आत्मनिर्भर बिहार बनाया जा सकता है।

Published / 2022-03-21 14:56:04
हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार की दर अधिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (महेश व्यास)। कोविड-19 महामारी का प्रसार रोकने के लिए 2020 में लगी पाबंदी (लॉकडाउन) के बाद भारतीय श्रम बल में शिक्षा स्तर के आधार पर काफी बदलाव आया है। कम पढ़े-लिखे लोगों के समूह को रोजगार का अधिक नुकसान हुआ है। अधिक पढ़े-लिखे लोगों की भी नौकरियां गईं। स्नातक एवं स्नातकोत्तर उत्तीर्ण लोग अब भी रोजगार छिनने की त्रासदी से उबर नहीं पाए हैं। दूसरी तरफ उच्चतर माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त लोगों को अधिक रोजगार मिले हैं। कम और अधिक पढ़े-लिखे दोनों तरह के लोगों को नुकसान हुआ है, मगर इन दोनों श्रेणियों के बीच आने वाले लोगों को लाभ हुआ है। कोविड महामारी आने तक स्नातक एवं स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त लोगों की नौकरियां बनी रहीं। ऐसे लोगों की संख्या 2016-17 में 5.15 करोड़ थी जो 2017-18 में बढ़कर 5.29 करोड़ हो गई। वर्ष 2018-19 में यह संख्या और बढ़कर 5.43 करोड़ हो गई। 2019-20 में इनकी संख्या कम जरूर हुई थी मगर वर्ष के अंत में ऐसे लोगों की संख्या 5.4 करोड़ हो गई। श्रम बल में स्नातकोत्तर तक पढ़े लोगों की संख्या 2016-17 में 12.5 प्रतिशत से बढ़कर 2018-19 में 13.4 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2019-20 में यह कम होकर 13.2 प्रतिशत रह गई। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियां बढ़कर 5.56 करोड़ हो गई। कोविड महामारी के दस्तक देने से ठीक पहले का यह आंकड़ा था। लॉकडाउन के तत्काल प्रभाव के रूप में 1 करोड़ से अधिक स्नातक एवं स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियां चली गईं। इनकी नौकरियों की संख्या जून 2020 में समाप्त तिमाही में 4.49 करोड़ हो गई। मगर शुरू में स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियों पर असर नहीं हुआ इसलिए कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी थोड़ी अधिक बढ़कर 13.7 प्रतिशत हो गई। मगर यह बढ़त अस्थायी ही थी। लॉकडाउन का पूर्ण और दीर्घ असर सितंबर 2020 में समाप्त हुई तिमाही में नजर आया। स्नातकोत्तर पास लोगों के रोजगार कम होकर 4.37 करोड़ रह गए और कुल श्रमबल में इनकी हिस्सेदारी इस तिमाही के दौरान कम होकर 11.1 प्रतिशत रह गई। यह वास्तव में भारत में श्रमबल का हिस्सा रहे लोगों की शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ी गिरावट थी। हालांकि इसमें धीरे-धीरे सुधार हो रहा है मगर यह पर्याप्त नहीं है। दिसंबर 2021 की तिमाही तक 12.2 प्रतिशत स्तर पर भारत के कार्यबल में स्नातकोत्तर पास लोगों की हिस्सेदारी अप्रैल 2020 से पूर्व के 13.7 प्रतिशत से काफी खराब थी। फरवरी 2022 तक भारतीय श्रम बल में 5.03 करोड़ स्नातक और स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त लोग थे। यह फरवरी 2020 के 5.73 करोड़ स्नातकोत्तर पास लोगों की संख्या में 70 लाख कम है। दूसरी तरफ श्रमबल में ऐसे लोग हैं जिनकी शिक्षा उच्चतर माध्यमिक से भी कम है। उन्होंने दसवीं की परीक्षा भी उत्तीर्ण नहीं की थी। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में श्रम बल में उनकी हिस्सेदारी 54.5 प्रतिशत थी। दिसंबर 2021 की तिमाही तक उनकी हिस्सेदारी कम होकर 49 प्रतिशत रह गई। सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के इस समूह के लिए जोखिम भी अधिक हैं। जून 2020 तिमाही में इन लोगों की नौकरियों में 30 प्रतिशत की तेज गिरावट आ गई। इसके बाद जब अगली तिमाही में लॉकडाउन लगभग पूरी तरह हटा लिया गया तो इस समूह में रोजगार में 31 प्रतिशत तेजी आई। इस समूह में रोजगार अनौपचारिक होता है इस वजह से इनती तेजी आई। मगर चुनौतियां अब भी कायम हैं। सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के इस समूह में रोजगार में लगातार गिरावट आई है। फरवरी 2022 में जिन लोगों ने अपनी दसवीं परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी उनमें रोजगार की संख्या 19.28 करोड़ थी। फरवरी 2020 की तुलना में यह 11.6 प्रतिशत कम थी। यह गिरावट इसी अवधि के दौरान आई 2.2 की कुल गिरावट की तुलना में कहीं अधिक है। रोजगार में लगातार आई कमी के दौर में फायदा उन लोगों को हुआ जिन्होंने 10वीं या 12वीं की परीक्षा पास की थी। इस समूह में रोजगार और कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी महामारी से पहले भी लगातार बढ़ रही थी। वर्ष 2016-17 में उनकी हिस्सेदारी कुल रोजगार में 27.9 प्रतिशत थी। 2017-18 में यह बढ़कर 29.7 प्रतिशत हो गई। 2018-19 में यह 30.5 प्रतिशत और 2019-20 में यह 31.3 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2020-21 में उच्च माध्यमिक उत्तीर्ण लोगों की संख्या 38 प्रतिशत हो गई। यह बढ़ोतरी अचानक एवं तेज थी। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी 31.8 प्रतिशत थी। अप्रैल-जून 2020 के दौरान यह हिस्सेदारी 39 प्रतिशत हो गई। तब से यह हिस्सेदारी 37 से 39 प्रतिशत के बीच रही है। पाबंदी जब चरम पर थी तो उच्च विद्यालय उत्तीर्ण लोगों में रोजगार बरकरार रहने की दर अधिक रही। अप्रैल 2020 में सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों (जिन्होंने दसवीं कक्षा की परीक्षा भी पास नहीं की थी) के समूह में रोजगार दर 38 प्रतिशत कम हो गई और स्नातकोत्तर पास लोगों के मामले में यह 20 प्रतिशत तक फिसल गई। उच्च विद्यालय (हाई स्कूल) पास लोगों के मामले में यह गिरावट 17 प्रतिशत के साथ थोड़ी कम रही। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि हाई स्कूल तक शिक्षा रखने वाले लोगों ने रोजगार के मामले में अधिक तेजी से वापसी की। जून 2020 में समाप्त हुई तिमाही में सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के बीच रोजगार 30 प्रतिशत कम हो गया और स्नातकोत्तर तक शिक्षा रखने वाले लोगों में यह 19 प्रतिशत कम हो गया। मगर हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार में केवल 1 प्रतिशत गिरावट आई। फरवरी 2022 में हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार फरवरी 2020 की तुलना में रोजगार 18 प्रतिशत अधिक था। दूसरी तरफ, सबसे कम पढ़े-लिखे और स्नातकोत्तर पास लोगों में फरवरी 2020 के स्तर की तुलना में रोजगार का स्तर 12 प्रतिशत कम था। स्नातक पास लागों में बेरोजगारी दर सबसे अधिक यानी 19 प्रतिशत से अधिक रही है। अगर इस तथ्य को ऊपर के विश्लेषण के संदर्भ में देखें तो हाई स्कूल से अधिक शिक्षा के बाद नौकरी मिलने की संभावना कम हो जाती है। (लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी हैं)

Published / 2022-03-15 12:43:26
आजादी के 75 साल बाद बढ़ती उम्मीद...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। आजादी की पचहरवीं वर्षगांठ मनाने की ओर अग्रसर होते हुए नया भारत बनाने, भारत को नये सन्दर्भों के साथ संगठित करने, राष्ट्रीय एकता को बल देने की चचार्एं सुनाई दे रही है। इसकी आवश्यकता इसलिये महसूस की जा रही है क्योंकि हम आजाद हो गये, लेकिन हमारी मानसिकता एवं विकास प्रक्रिया अभी भी गुलामी की मानसिकता को ओढ़े हैं। शिक्षा से लेकर शासन व्यवस्था की समस्त प्रक्रिया अंग्रेजों की थोपी हुई है, उसे ही हम अपनाये जा रहे हैं। जीवन का उद्देश्य इतना ही नहीं है कि सुख-सुविधापूर्वक जीवन व्यतीत किया जाये, शोषण एवं अन्याय से धन पैदा किया जाये, बड़ी-बड़ी भव्य अट्टालिकाएं बनायी जाये और भौतिक साधनों का भरपूर उपयोग किया जाये। उसका उद्देश्य है- निज संस्कृति को बल देना, उज्ज्वल आचरण, सात्विक वृत्ति एवं स्व-पहचान। भारतीय जनता के बड़े भाग में राष्ट्रीयता एवं स्व-संस्कृति की कमी महसूस हो रही है। राष्ट्रीयता के बिना राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिये आजादी की पचहरवें वर्ष के आयोजनों का लक्ष्य है नया भारत-सशक्त भारत निर्मित करना। अपनी पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: स्वर्णिम भारत के दिशा-सूत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक, संघ के प्रचारक एवं शिक्षाविद् सुनील अंबेडकर ने नया भारत निर्मित करने की आवश्यकता उजागर करते हुए उसके इतिहास में सच्चाई के प्रतिबिम्बों को उभारने पर बल दिया है। भारत के इतिहास को धूमिल किया गया, धुंधलाया गया है, अन्यथा भारत का इतिहास दुनिया के लिये एक प्रेरणा है, अनुकरणीय है। क्योंकि भारत एक ऐसा शांति-अहिंसामय देश है जिसका न कोई शत्रु है और न कोई प्रतिद्वंद्वी। सम्पूर्ण दुनिया भारत की ओर देख रही है, उसमें विश्व गुरु की पात्रता निरन्तर प्रवहमान रही है, हमने कोरोना महामारी के एक जटिल एवं संघर्षमय दौर में दुनिया के सभी देशों के हित-चिन्तन का भाव रखा, सबका साथ, सबका विकास एवं सबका विश्वास मंत्र के द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबित किया कि वसुधैव कुटुम्बकम- दुनिया एक परिवार है, का भारतीय दर्शन ही मानवता का उजला भविष्य है। इसी विचार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आगे बढ़ रहा है, वह एक अनोखा और दुनिया का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है। यह भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे मुखर, सबसे प्रखर आवाज है। देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता उसका मूल उद्देश्य है। जैसे-जैसे संघ का वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रभाव देश और दुनिया में बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हिंदुत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पित इस संगठन के बारे में जानने और समझने की ललक लोगों के बीच बढ़ती जा रही है। इस विशाल संगठन के विभिन्न विषयों पर विचार तथा इसकी कार्यप्रणाली से आमजन परिचित होना चाहते हैं। अंबेडकर की पुस्तक संघ से जुड़ी जिज्ञासाओं का प्रभावी, प्रासंगिक एवं तथ्यपरक विवेचन करती है। एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होते हुए भी संघ ने भारतीय राजनीति की दिशा को राष्ट्रीयता की ओर कैसे परिवर्तित किया है, यह समझने के लिए भी यह पुस्तक पढ़ना आवश्यक है। भारत की हिंदू अस्मिता, हिंदू समाज की उत्पत्ति व संघटन, विवाह, माता-पिता द्वारा संतान का पालन-पोषण, आपसी सौहार्द, सामाजिकता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता, आर्थिक स्थितियां, कृषि, जीवनशैली तथा ऐसे ही अन्य अनेक विषयों पर इसमें मुक्त भाव से चर्चा की गई है। भारत का विश्वगुरु के रूप में अभ्युदय एक महत्वपूर्ण प्रश्न रहा जिसकी विवेचना लेखक ने समग्र रूप से प्रस्तुत पुस्तक में की है, जो आजादी के पचहरवें वर्ष की आयोजना का मूल केंद्र है। राष्ट्रीयता एवं हिंदुत्व का अभियान लोकव्यापी बना और उसके वैचारिक पक्ष को समृद्ध बनाने में जिन लोगों का योगदान रहा उनमें डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार, एमएस गोलवाकर, वीर सावरकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय प्रमुख हंै। जो नये भारत के आदर्श पात्र एवं कर्णधार हैं। राजनीतिक स्वार्थों एवं संकीर्णताओं के चलते अब तक उनको उचित सम्मान नहीं मिला, अब संघ एवं भाजपा इसके लिये प्रयासरत है, जो नये भारत की बुनियाद को मजबूती देने के लिये आवश्यक है। न केवल व्यक्ति, परिवार बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व के संदर्भ में इन भारत निमार्ताओं ने आरएसएस का गहन और विस्तृत विश्लेषण करते हुए जो विचार दिए, उन्हीं विचारों को इस पुस्तक में संकलित कर हिंदुत्व अस्मिता एवं सुदृढ़ भारत का नया आलोक बिखेरा गया है। इस पुस्तक में सुनील आंबेकर ने हिंदुत्व की विशद् विवेचना करते हुए आरएसएस का विभिन्न संदर्भों- व्यक्ति, समाज, धर्म, शिक्षा एवं संस्कृति के साथ तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक संघ को परम प्रतिष्ठा देती है क्योंकि संभवत: इतनी सहज और सरल अभिव्यक्ति में संघ की गूढ़ एवं गहन विवेचना का यह अपना एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत पुस्तक में संघ के प्रति जन दृष्टिकोण एवं संघ का राष्ट्र निर्माण में योगदान का समन्वित प्रस्तुतीकरण है। भारत के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में संघ अनुभव करता है कि यहां बहुत से राजनीतिक दल होंगे किंतु वे सब प्राचीन भारतीय परंपरा एवं आध्यात्मिक धरोहर का सम्मान करेंगे। आधारभूत मूल्य तथा हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं के संबंध में एकमत होंगे। मतभेद तो होंगे लेकिन ये केवल देश के विकास के प्रारूपों के संदर्भ में ही होंगे। वहीं संघ के भविष्य के बारे में पुस्तक कहती है कि जब भारतीय समाज समग्र रूप में संघ के गुणों से युक्त हो जाएगा, तब संघ तथा समाज की दूरी समाप्त हो जाएगी। उस समय संघ संपूर्ण भारतीय समाज के साथ एकाकार हो जाएगा और एक स्वतंत्र संगठन के रूप में इसके अस्तित्व की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। संघ देश के समक्ष चुनौतियों को लेकर भी अत्यंत गंभीर है। इनमें इस्लामी आतंकवाद, नक्सलवाद अवैध घुसपैठ, हिंदुओं की घटती जनसंख्या, हिंदुओं का धर्मांतरण जैसे विषय शामिल हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह पुस्तक, जो संघ से परिचित हैं उनकी समझ एवं सोच को परिष्कृत करेगी।

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