एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आदिति फडणीस)। श्रीलंका लगातार एक के बाद दूसरे संकट से जूझ रहा है। अपनी कई समस्याओं के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। परंतु कोविड-19 के प्रभाव तथा रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी बाहरी घटनाओं ने भी उसे प्रभावित किया है। एक बात एकदम स्पष्ट है कि जहां भी सत्ता के दो केंद्र रहे हैं, वहां अंत:स्फोट की स्थितियां बनी हैं। चाहे मामला राजनीति का हो या आर्थिक नीति निर्माण का। हाल के वर्षों में श्रीलंका की मुश्किलों की शुरूआत सन 2014-15 में हुई थी, जब प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों का एक गठजोड़ तैयार हुआ था। वाम झुकाव वाली श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) और मुक्त बाजार समर्थक यूनाइटेड नैशनल पार्टी (यूएनपी) का यह गठजोड़ तैयार करने में पूर्व राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना और प्रधानमंत्री राणिल विक्रमसिंघे की अहम भूमिका थी। नैशनल यूनिटी फ्रंट (एनयूजी) की पहली सरकार ने महिंदा राजपक्षे की श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) की सरकार को पराजित किया था। लेकिन अगले दो ही वर्षों में हालात बदल गए। विवाद और सत्ता को लेकर संघर्ष उस समय चरम पर पहुंच गया जब सिरीसेना ने एक संवैधानिक तख्तापलट के जरिये विक्रमसिंघे को हटा दिया और 2018 में महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना दिया। इस बीच देश के सर्वोच्च न्यायालय ने दखल दिया और दिसंबर 2018 में विक्रमसिंघे को बहाल करने का आदेश दिया। अब तक सरकार में सत्ता के दो प्रतिद्वंद्वी केंद्र सामने आ चुके थे। अफसरशाही को भी दो में से किसी एक को चुनने में मुश्किल हो रही थी। श्रीलंका का यह दावा कि वहां सन 2009 से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है, 21 अप्रैल, 2019 को गलत साबित हो गया जब ईस्टर के दिन वहां बम विस्फोट हुए। इसके बावजूद सत्ता के शीर्ष पर आपसी लड़ाई ने खत्म होने का नाम नहीं लिया। सिरीसेना ने अपने रक्षा सचिव से कहा कि वह प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) की बैठक में आमंत्रित न करें। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने बम विस्फोट की घटनाओं को लेकर दो समांतर जांचों के आदेश जारी कर दिए। श्रीलंका इस समय अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 के असर तथा रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव के रूप में दोहरे संकट का सामना कर रहा है। विदेशों से कम धन आने तथा पर्यटकों के न आने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है। ये दोनों श्रीलंका के राजस्व के दो प्रमुख स्रोत हैं। उस पर बकाया कर्ज भी बहुत बड़ी मात्रा में है। ऐसी स्थिति में केवल दो ही विकल्प नजर आते हैं: मित्र देशों से मदद की प्रार्थना की जाए या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास जाकर कर्ज चुकाने तथा अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए कर्ज की मांग की जाए। केंद्रीय बैंक के गवर्नर अजित निवार्ड कबराल ने बार-बार आईएमएफ के पास जाने से इनकार किया है। उन्होंने कैबिनेट की ऐसी सलाह भी ठुकरा दी। वित्त मंत्री बेसिल राजपक्षे ने 2021 का सालाना बजट पेश करते समय भी यह स्वीकार किया कि उनके देश को आईएमएफ के पास जाना पड़ सकता है। कबराल ने जोर देकर कहा कि विदेशी मुद्रा की समस्या अस्थायी हैऔर देश की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है। श्रीलंका के कुलीनों (श्रीलंका एक लोकतांत्रिक समाजवादी गणराज्य है) ने कबराल के पूर्वग्रह को स्पष्ट किया : आईएमएफ के पास जाने का अर्थ होता मुद्रा का अवमूल्यन, ब्याज दरों में इजाफा, सरकारी वाणिज्यिक उपक्रमों का निजीकरण और कर्ज में और डूब जाना। राष्ट्रपति के छोटे भाई बेसिल राजपक्षे को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उनकी बनायी रणनीतियों पर चलकर ही राजपक्षे सत्ता में वापस लौटे। परंतु वह देश के केंद्रीय बैंक के गवर्नर से सार्वजनिक रूप से असहमत दिखे। जब चीन ने श्रीलंका के लिए दरवाजे बंद कर लिए और वित्त मंत्री को भारत से एक नहीं बल्कि अनेक बार मदद मांगनी पड़ी तब राष्ट्रपति ने दखल दिया। राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने व्यक्तिगत रूप से दखल दिया और स्पष्ट किया कि मुद्रा का अवमूल्यन करने तथा मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास जाने के बाद कबराल से पद छोड़ने को नहीं कहा गया था। यदि आर्थिक नीति को लेकर व्यवस्थित ढंग से विचार किया गया होता तो शायद श्रीलंका की आम जनता को इतनी मुश्किलों का सामना न करना पड़ता। कई विपक्षी नेता मानते हैं कि अगर पहले आईएमएफ की मदद ली जाती तो श्रीलंका को 12-12 घंटे की बिजली कटौती और खाने की कमी से बचाया जा सकता था। तब खुद पर गर्व करने वाला यह देश इस कदर शक्तिहीन नहीं महसूस करता। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि श्रीलंका आईएमएफ से कितनी मदद चाहता है। कबराल भी इस वार्ता में शामिल हैं। वह कड़ा मोलतोल करना चाह रहे हैं। उनकी दलील है कि श्रीलंका ने आईएमएफ के पास जाने के पहले अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया और उसने कभी किसी ऋण को चुकाने में चूक नहीं की। उनके मुताबिक यह वित्तीय हालत बेहतर रखने की उनकी देश की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। हकीकत यह है कि श्रीलंका आईएमएफ के पास तब गया है जब वह डिफॉल्ट के कगार पर है। इन हालात में एक भारतीय के रूप में देखा जाए तो भारत के ताजा कदमों से राहत मिलती है। श्रीलंका ने अपने अस्पताल संचालित रखने के लिए भारत से मदद नहीं मांगी। भारत ने मदद की पेशकश की। भारत सैकड़ों अन्य छोटे-मोटे हस्तक्षेप भी कर सकता है जिनका भारत पर कोई खास बोझ नहीं पड़ेगा। ऐसा करके वह श्रीलंकाई कुलीनों के मन की वह आशंका दूर कर सकता है जिसके तहत वे अपनी सरकार से पूछ रहे हैं कि इसके बदले में क्या दिया जाएगा? भारत इतना अच्छा व्यवहार क्यों कर रहा है? भारत के पास अवसर है कि वह एक मददगार पड़ोसी की भूमिका निभाकर तथा ऐसी समस्याएं सुधारकर उपमहाद्वीप में अपनी छवि सुधार सके जिन्हें पैदा करने में उसकी कोई भूमिका नहीं रही। उसे इस अवसर का पूरा लाभ लेना चाहिए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। विश्व जल दिवस इस लिहाज से भी अलग था कि जलवायु परिवर्तन अपने शबाब पर है। यानी हमें हर वह काम करना होगा जो करने की जरूरत है। वर्षा जल की हरेक बूंद को जमा कर पानी की उपलब्धता बढ़ानी है, इसका इस्तेमाल इतने कारगर ढंग से करना है कि वर्षा जल की हरेक बूंद का इस्तेमाल हमारे भोजन या फ्लश होने वाले पानी में हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस्तेमाल पानी की हरेक बूंद का पुनर्चक्रण हो और प्रदूषण से वह खराब न हो। हम यह बात पहले से जानते हैं और अमल में भी लाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में इतना ही काफी नहीं होगा। हमें ये सारे काम कहीं अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर अलग ढंग से करने होंगे। हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का ताल्लुक गर्मी और कम-ज्यादा बारिश से है। इन दोनों का जल चक्र से सीधा सह-संबंध है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए पानी एवं उसके प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। हमें पता है कि हर नया साल इतिहास का सर्वाधिक गरम साल बनता जा रहा है और पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता जा रहा है। भारत में ओडिशा के कुछ हिस्सों में तापमान फरवरी की शुरूआत में ही 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था। उत्तर भारतीय राज्य बढ़ती गर्मी एवं सामान्य से अधिक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब "ला नीना" के साल में हो रहा है। ला नीना प्रशांत महासागर की वे जल धाराएं हैं जो दुनिया का तापमान कम करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। लेकिन भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक ताप वृद्धि ने ला नीना के इस शीतकारी प्रभाव को कम कर दिया है। बढ़ती हुई गर्मी का जल सुरक्षा के लिहाज से कई मायने हैं। पहला, इसका मतलब है कि जल इकाइयों से अधिक वाष्पीकरण होगा। यानी हमें न सिर्फ लाखों जल निकायों में पानी जमा करने पर ध्यान देने की जरूरत है बल्कि वाष्पन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भी योजना बनानी होगी। एक विकल्प भूमिगत जल भंडारण यानी कुओं पर काम करने का है। भारत लंबे वक्त से भूमिगत जल प्रणालियों के प्रबंधन को कम तवज्जो देता रहा है क्योंकि सिंचाई विभाग की समूची अफसरशाही ही नहरों एवं अन्य सतही जल प्रणालियों पर आधारित है। लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं पानी की भारी किल्लत के इस दौर में इसे बदलने की जरूरत होगी। हमें तालाबों, पोखरों एवं नहरों से होने वाले नुकसान की भरपाई के तरीके तलाशने होंगे। ऐसा नहीं है कि वाष्पीकरण से पहले नुकसान नहीं होता था लेकिन तापमान बढ़ने के साथ इसकी दर बहुत ज्यादा हो गई है। हमें योजना बनाने और अधिक काम करने की जरूरत है। दूसरा, बढ़ती गर्मी का मतलब है कि मिट्टी में नमी कम होती जाएगी जिससे जमीन में धूल की मात्रा बढ़ जाएगी और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जाएगी। भारत जैसे देश में जहां भोजन का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा-सिंचित इलाकों में ही पैदा होता है, वहां पर मिट्टी की नमी कम होने से भूमि अपरदन तेज होगा और धूल का बनना भी बढ़ जाएगा। जल प्रबंधन को वनस्पति नियोजन के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा ताकि मिट्टी में पानी को रोके रखने की क्षमता बेहतर हो, अधिक देर तक चलने वाली तीव्र गर्मी के दौर में भी। तीसरा, साफ है कि गर्मी बढ़ने से पानी का इस्तेमाल बढ़ जाएगा क्योंकि पीने एवं सिंचाई के साथ ही जंगलों या इमारतों में लगी आग बुझाने के लिए भी ज्यादा पानी की दरकार होगी। हम दुनिया के कई हिस्सों एवं भारत में भी जंगलों में भीषण आग लगने के डरावने दृश्य देख चुके हैं। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, यह सिलसिला भी तेज होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन से पानी की मांग बढ़ेगी लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम पानी के साथ अपशिष्ट जल को भी बरबाद न करें। सच यह है कि अत्यधिक बारिश होने की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। हम बारिश के एक बाढ़ के तौर पर आने की भी अपेक्षा करें। इस तरह बाढ़ों का एक चक्र पूरा होने के बाद सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो। भारत में पहले से ही साल में बारिश कम दिन होती है। साल भर में औसतन सिर्फ 100 घंटे की ही बारिश होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश वाले दिनों की संख्या और कम करेगा। वैसे भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ जाएगी। इसका जल प्रबंधन की हमारी योजनाओं पर बड़ा असर होगा। हमें बाढ़ प्रबंधन पर अधिक शिद्दत से गौर करने की जरूरत है, नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही बाढ़ के पानी को भूमिगत एवं सतहीय जलभंडार निकायों-कुओं एवं तालाबों में जमा किया जा सके। लेकिन हमें वर्षा जल को इकट्ठा करने के बारे में अलग तरह से योजना बनाने की जरूरत है। फिलहाल मनरेगा के तहत लाखों की संख्या में बन रहे तालाब एवं पोखर सामान्य बारिश के हिसाब से डिजाइन हैं। लेकिन अब भारी बारिश की बात आम होने के साथ ही ये जल भंडार संरचनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि वे लंबे समय तक लबालब रहें। मूल बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पानी की हर बूंद बचानी होगी, चाहे बारिश का पानी हो या बाढ़ का पानी। हमें पानी एवं उसके प्रबंधन को लेकर पहले जुनूनी होना था लेकिन अब तो सेहत एवं दौलत के आधार पानी को लेकर हमें संकल्पित एवं सुविचारित रवैया अपनाना होगा। यह अपने भविष्य को बनाने- बिगाड़ने की बात है। अगर हम आज गंभीर न हुए तो पानी सबसे बड़ा संकट बन सामने आयेगा। (लेखिका सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (जैमनी भगवती)। आजादी के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। आरंभ में आरक्षण की व्यवस्था 10 वर्ष के लिए होनी थी लेकिन हर 10 वर्ष के बाद उसे आगे बढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। फिलहाल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी रोजगार, सरकारी कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों में नौकरी तथा सीटों के मामले में 49.5 फीसदी आरक्षण प्राप्त है। जनवरी 2019 में यानी अप्रैल-मई 2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले संसद ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण को मंजूरी दे दी। इसके अलावा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं। यह संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए घोषित 10 फीसदी का आरक्षण शायद कुल आरक्षण को बढ़ाकर 59.5 फीसदी नहीं करे क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण उसका अतिव्यापन कर सकता है। बहरहाल यदि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण लागू होता है तो संभव है कि वह सन 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों वाले पीठ के उस निर्णय का उल्लंघन कर दे जिसमें उन्होंने सभी प्रकार के आरक्षण के लिए कुल मिलाकर 50 फीसदी की सीमा तय की थी। फिलहाल 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण के पहले भी तमिलनाडु विधानसभा ने कुल मिलाकर 69 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी थी। अप्रैल 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तमिलनाडु की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने राज्य के निवासियों के लिए 75 फीसदी आरक्षण का वादा किया है। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा पहले ही रोजगार में स्थानीय लोगों के आरक्षण की नीतियां बना चुके हैं। देशभर में कई याचिकाएं दायर कर 50 फीसदी के ऊपर के आरक्षण को समाप्त करने की मांग की गई है। खासतौर पर 8 फरवरी को खबर आई कि सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है जो तमिलनाडु में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण को चुनौती देती है। परिणामस्वरूप अब तक राज्यों में मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण के क्रियान्वयन का कानूनी दर्जा अस्पष्ट है। ऐसे आरक्षण के स्तर के पक्ष में दलील यह है कि देश में अभी भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचितों की तादाद बहुत अधिक है। शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का पारदर्शी और निष्पक्ष क्रियान्वयन जटिल है जिसके चलते कई कानूनी विवाद पैदा हुए। यदि आरक्षण कोटा विश्वविद्यालय स्तर पर होता है तो व्यक्तिगत विभागों में यह 50 फीसदी का स्तर पार कर सकता है। एक अन्य मुद्दा यह है कि किसे क्रीमी लेयर का हिस्सा होने के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लायक नहीं माना जाए। फिलहाल क्रीमी लेयर में वे लोग आते हैं जिनकी सालाना पारिवारिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है। गैर पिछड़ा वर्ग के लोगों को लगता है कि यदि पिछड़ा वर्ग के लोग स्वरोजगार में हैं तो उनकी आय का आकलन आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी श्रमिक दशकों से मुंबई, दिल्ली या बेंगलूरु में किराये के मकानों में रहते हैं। उनके लिए खुद को वहां का निवासी साबित करना मुश्किल है। परिणामस्वरूप राज्यस्तरीय आरक्षण भारतीय श्रम बाजार को आर्थिक रूप से अक्षम बना सकता है। खबरों के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय को 15 मार्च, 2021 से 50 फीसदी सीमा के मामले पर सुनवाई करनी थी। शीर्ष न्यायालय को स्पष्ट करना चाहिए कि देश में आरक्षण के अलग-अलग स्तर नहीं हो सकते और अलग-अलग राज्य ऐसे कानून नहीं बना सकते कि रोजगार वहां के निवासियों के लिए आरक्षित होंगे। समाचार पत्रों में 19 मार्च, 2021 को प्रकाशित खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र में राज्य के विशिष्ट आरक्षण से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने चुटीले अंदाज में यह तक पूछ डाला कि क्या आजादी के बाद से कोई सामाजिक-आर्थिक प्रगति हासिल नहीं हुई? यह बात शायद सबसे जानकार भारतीयों पर भी लागू होती है। केंद्र सरकार को संसद में श्वेत पत्र पेश करना चाहिए ताकि आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टता आ सके। हालांकि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि आरक्षण मतदाताओं और ज्यादातर राजनीतिक दलों के लिए बहुत संवेदनशील मसला है। आरक्षण में इजाफे के खिलाफ या मौजूदा स्तर का आरक्षण जारी रखने के विरोध में कुछ कहा जाए तो यह भावनात्मक दलील दी जाती है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ हजारों साल के भेदभाव को कुछ दशकों में पूरा नहीं किया जा सकता। हालिया अतीत का एक उदाहरण है करीब दो सौ वर्ष के ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की गरीबी। लब्बोलुआब यह कि अतिरिक्त आरक्षण शासन मानकों को शिथिल करेगा तथा केंद्र, राज्यों और नगर निकाय स्तर के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा। शैक्षणिक संस्थान भी अप्रभावित नहीं रह सकेंगे। मिसाल के तौर पर नैशनल एसोसिएशन आॅफ सॉफ्टवेयर ऐंड सर्विस कंपनीज ने संकेत दिया है कि उससे संबद्ध कंपनियों में से 80 प्रतिशत को लगता है कि हरियाणा के नागरिकों की पक्षधर आरक्षण नीतियां उनके कारोबार और भविष्य की निवेश योजनाओं को प्रभावित करेंगी। देश की राष्ट्रीय और राज्य सरकारें न केवल आरक्षण की मदद करती हैं बल्कि अतिरिक्त आरक्षण की मांग को प्रोत्साहन देती हैं। देश में हर प्रकार के आरक्षण को खत्म करने की जरूरत है और इस दौरान उन लोगों को उचित वित्तीय सहायता मुहैया कराई जानी चाहिए जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं। (लेखक पूर्व भारतीय राजदूत एवं विश्व बैंक के ट्रेजरी प्रोफेशनल हैं)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिवशंकर उरांव)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कल अपना 41वां स्थापना दिवस मनायेगी। 6 अप्रैल, 1980 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में जनसंघ से निकले लोगों ने भारतीय जनता पार्टी बनाई। वाजपेयी और लंबे अरसे तक पार्टी में उनकी परछाई बनकर रहे पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मिलकर पार्टी को 1984 में दो सीट से 1998 में 182 सीटों तक ला खड़ा कर दिया था। हिंदुत्व और राम जन्मभूमि के एजेंडे पर आगे बढ़ी बीजेपी ने 2014 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत का स्वाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चखा। 2014 में बीजेपी ने 282 सीटों पर जीत दर्ज की थी तो वहीं 2019 में उसकी सीटों का आंकड़ा 300 पार चला गया था। भारत को एक समर्थ राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ भाजपा का गठन 6 अप्रैल, 1980 को नई दिल्ली के कोटला मैदान में आयोजित एक कार्यकर्ता अधिवेशन में किया गया, जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री अटल बिहारी वाजपेयी निर्वाचित हुए। आज तीन दशक बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में किसी एक पार्टी को देश की जनता ने पूर्ण बहुमत दिया है तथा भारी बहुमत से भाजपा नीत राजग सरकार केन्द्र में विद्यमान है। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर देश में एक नया राजनीतिक षड्यंत्र रचा जाने लगा। सरदार पटेल के देहावसान के पश्चात कांग्रेस में नेहरू का अधिनायकवाद प्रबल होने लगा। गांधी और पटेल दोनों के ही नहीं रहने के कारण कांग्रेस नेहरूवाद की चपेट में आ गई तथा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, राष्ट्रीय सुरक्षा पर लापरवाही, राष्ट्रीय मसलों जैसे कश्मीर आदि पर घुटनाटेक नीति, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारतीय हितों की अनदेखी आदि अनेक विषय देश में राष्ट्रवादी नागरिकों को उद्विग्न करने लगे। नेहरूवाद तथा पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर भारत के चुप रहने से क्षुब्ध होकर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ स्वयंसेवकों ने भी प्रतिबंध के दंश को झेलते हुए महसूस किया कि संघ के राजनीतिक क्षेत्र से सिद्धांतत: दूरी बनाये रखने के कारण वे अलग-थलग तो पड़े ही, साथ ही संघ को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा था। ऐसी परिस्थिति में एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की आवश्यकता देश में महसूस की जाने लगी। फलत: भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर, 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या उच्च विद्यालय में हुई। नेहरू के अधिनायकवादी रवैये के फलस्वरूप डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी को कश्मीर की जेल में डाल दिया गया, जहां उनकी रहस्यपूर्ण स्थिति में मृत्यु हो गई। एक नई पार्टी को सशक्त बनाने का कार्य पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गया। भारत-चीन युद्ध में भी भारतीय जनसंघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर नेहरू की नीतियों का डटकर विरोध किया। 1967 में पहली बार भारतीय जनसंघ एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में भारतीय राजनीति पर लम्बे समय से बरकरार कांग्रेस का एकाधिकार टूटा, जिससे कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय हुई। सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निरंकुश होती जा रही कांग्रेस सरकार के विरूद्ध देश में जन-असंतोष उभरने लगा। गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन के साथ बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हो गया। कांग्रेस ने इन आंदोलनों के दमन का रास्ता अपनाया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया तथा देशभर में कांग्रेस शासन के विरूद्ध जन-असंतोष मुखर हो उठा। 1971 में देश पर भारत-पाक युद्ध तथा बांग्लादेश में विद्रोह के परिप्रेक्ष्य में बाह्य आपातकाल लगाया गया था जो युद्ध समाप्ति के बाद भी लागू था। उसे हटाने की भी मांग तीव्र होने लगी। जनान्दोलनों से घबराकर इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने जनता की आवाज को दमनचक्र से कुचलने का प्रयास किया। परिणामत: 25 जून, 1975 को देश पर दूसरी बार आपातकाल भारतीय संविधान की धारा 352 के अंतर्गत आंतरिक आपातकाल के रूप में थोप दिया गया। देश के सभी बड़े नेता या तो नजरबंद कर दिये गए अथवा जेलों में डाल दिए गये। समाचार पत्रों पर सेंसर लगा दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक राष्ट्रवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर एक नये राष्ट्रीय दल जनता पार्टी का गठन किया गया। विपक्षी दल एक मंच से चुनाव लड़े तथा चुनाव में कम समय होने के कारण जनता पार्टी का गठन पूरी तरह से राजनीतिक दल के रूप में नहीं हो पाया। आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई तथा जनता पार्टी एवं अन्य विपक्षी पार्टियां भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। पूर्व घोषणा के अनुसार 1 मई, 1977 को भारतीय जनसंघ ने करीब 5000 प्रतिनिधियों के एक अधिवेशन में अपना विलय जनता पार्टी में कर दिया। जनता पार्टी का प्रयोग अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। दो-ढाई वर्षों में ही अंतर्विरोध सतह पर आने लगा। भारतीय जनसंघ से जनता पार्टी में आये सदस्यों को अलग-थलग करने के लिए दोहरी-सदस्यता का मामला उठाया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध रखने पर आपत्तियां उठायी जानी लगीं। यह कहा गया कि जनता पार्टी के सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य नहीं बन सकते। 4 अप्रैल, 1980 को जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति ने अपने सदस्यों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य होने पर प्रतिबंध लगा दिया। पूर्व के भारतीय जनसंघ से संबद्ध सदस्यों ने इसका विरोध किया और जनता पार्टी से अलग होकर 6 अप्रैल, 1980 को एक नये संगठन भारतीय जनता पार्टी की घोषणा की। इस प्रकार भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। आज भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है। विश्व में भारत को सम्मान दिला हम सब के दिलों पर राज कर रही है। भारतीय जनता पार्टी एक सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध, समर्थ एवं स्वावलम्बी भारत के निर्माण हेतु निरंतर सक्रिय है। पार्टी की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र की है जो आधुनिक दृष्टिकोण से युक्त एक प्रगतिशील एवं प्रबुद्ध समाज का प्रतिनिधित्व करता हो तथा प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति तथा उसके मूल्यों से प्रेरणा लेते हुए महान ह्यविश्वशक्तिह्ण एवं ह्यविश्व गुरूह्ण के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हो। इसके साथ ही विश्व शांति तथा न्याययुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिए विश्व के राष्ट्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखे। भाजपा भारतीय संविधान में निहित मूल्यों तथा सिद्धांतों के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित राज्य को अपना आधार मानती है। पार्टी का लक्ष्य एक ऐसे लोकतान्त्रिक राज्य की स्थापना करना है जिसमें जाति, सम्प्रदाय अथवा लिंगभेद के बिना सभी नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय, समान अवसर तथा धार्मिक विश्वास एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो। भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म-मानवदर्शन को अपने वैचारिक दर्शन के रूप में अपनाया है। साथ ही पार्टी का अंत्योदय, सुशासन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास एवं सुरक्षा पर भी विशेष जोर है। पार्टी ने पांच प्रमुख सिद्धांतों के प्रति भी अपनी निष्ठा व्यक्त की, जिन्हें पंचनिष्ठा कहते हैं। ये पांच सिद्धांत (पंच निष्ठा) हैं-राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय अखंडता, लोकतंत्र, सकारात्मक पंथ-निरपेक्षता (सर्वधर्मसमभाव), गांधीवादी समाजवाद (सामाजिक-आर्थिक विषयों पर गांधीवादी दृष्टिकोण द्वारा शोषण मुक्त समरस समाज की स्थापना) तथा मूल्य आधारित राजनीति। उपलब्धियां : श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अपनी स्थापना के साथ ही भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गई। बोफोर्स एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पुन: गैर-कांग्रेसी दल एक मंच पर आये तथा 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। वी.पी. सिंह के नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया। इसी बीच देश में राम मंदिर के लिए आंदोलन शुरू हुआ। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए रथयात्रा शुरू की। राम मंदिर आंदोलन को मिले भारी जनसमर्थन एवं भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर आडवाणी जी की रथयात्रा को बीच में ही रोक दिया गया। फलत: भाजपा ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। और वीपी सिंह सरकार गिर गई तथा कांग्रेस के समर्थन से चन्द्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री बने। आने वाले आम चुनावों में भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ता गया। इसी बीच नरसिम्हाराव के नेतृत्व में कांग्रेस तथा कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मोर्चे की सरकारों का शासन देशपर रहा, जिस दौरान भ्रष्टाचार, अराजकता एवं कुशासन के कईं कीर्तिमान स्थापित हुए। 1996 के आम चुनावों में भाजपा को लोकसभा में 161 सीटें प्राप्त हुईं। भाजपा ने लोकसभा में 1989 में 85, 1991 में 120 तथा 1996 में 161 सीटें प्राप्त कीं। भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा सरकार ने 1996 में शपथ ली, परन्तु पर्याप्त समर्थन के अभाव में यह सरकार मात्र 13 दिन ही चल पाई। इसके बाद 1998 के आम चुनावों में भाजपा ने 182 सीटों पर जीत दर्ज की और श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने शपथ ली। परन्तु जयललिता के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के कारण सरकार लोकसभा में विश्वासमत के दौरान एक वोट से गिर गई, जिसके पीछे वह अनैतिक आचरण था, जिसमें उड़ीसा के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिररिधर गोमांग ने पद पर रहते हुए भी लोक सभा की सदस्यता नहीं छोड़ी तथा विश्वासमत के दौरान सरकार के विरूद्ध मतदान किया। कांग्रेस के इस अवैध और अनैतिक आचरण के कारण ही देश को पुन: आम चुनावों का सामना करना पड़ा। 1999 में भाजपा 182 सीटों पर पुन: विजय मिली तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 306 सीटें प्राप्त हुईं। एक बार पुन: श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा-नीत राजग की सरकार बनी। भाजपानीत राजग सरकार ने श्री अटल बिहारी के नेतृत्व में विकास के अनेक नये प्रतिमान स्थापित किये। पोखरण परमाणु विस्फोट, अग्नि मिसाइल का सफल प्रक्षेपण, कारगिल विजय जैसी सफलताओं से भारत का कद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ऊंचा हुआ। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य में नयी पहल एवं प्रयोग, कृषि, विज्ञान एवं उद्योग के क्षेत्रों में तीव्र विकास के साथ-साथ महंगाई न बढ़ने देने जैसी अनेकों उपलब्धियां इस सरकार के खाते में दर्ज हैं। भारत-पाक संबंधों को सुधारने, देश की आंतरिक समस्याओं जैसे नक्सलवाद, आतंकवाद, जम्मू एवं कश्मीर तथा उत्तर पूर्व के राज्यों में अलगाववाद पर कईं प्रभावी कदम उठाए गये। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को सुदृढ़ कर सुशासन एवं सुरक्षा को केन्द्र में रखकर देश को समृद्ध एवं समर्थ बनाने की दिशा में अनेक निर्णायक कदम उठाये गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राजग शासन ने देश में विकास की एक नई राजनीति का सूत्रपात किया। 10 साल पार्टी ने विपक्ष की सक्रिय और शानदार भूमिका निभाई। 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी, जो आज ह्यसबका साथ, सबका विकासह्ण की उद्घोषणा के साथ गौरव सम्पन्न भारत का पुनर्निर्माण कर रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा लगभग 11 करोड़ सदस्यों वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन गयी है। 26 मई, 2014 को श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की। मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने कम समय में ही अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने विश्व में भारत की गरिमा को पुन:स्थापित किया, राजनीति पर लोगों के विश्वास को फिर से स्थापित किया। अनेक अभिनव योजनाओं के माध्यम से नए युग की शुरूआत की। अन्त्योदय, सुशासन, विकास एवं समृद्धि के रास्ते पर देश बढ़ चला है। आर्थिक और सामाजिक सुधार सुरक्षित जीवन जीने का मार्ग उपलब्ध करा रहे हैं। किसानों के लिये ऋण से लेकर खाद तक की नयी नीतियां जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, आदि ने कृषि के तीव्र विकास की अलख जगायी है। ये नया युग है सुशासन का। चाहे आदर्श ग्राम योजना हो, स्वच्छता अभियान या फिर योग के सहारे भारत को स्वथ्य बनाने का अभियान, इन सभी कदमों से देश को एक नयी ऊर्जा मिली है। भाजपा की मोदी सरकार ने ह्यमेक इन इंडियाह्ण, ह्यस्किल इंडियाह्ण, अमृत मिशन, दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं से भारत को आधुनिक और सशक्त बनाने की दिशा में मजबूत कदम उठाया है। जनधन योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी अनेक योजनाएं देश में एक नयी क्रांति का सूत्रपात कर रही हैं। भाजपा सरकार ने देशवासियों को विश्व की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना का उपहार दिया है। (लेखक अनुसूचित जन जाति मोर्चा झारखंड भाजपा के अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अशोक लाहिड़ी)। पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने 2022-23 का आम बजट पेश कर दिया है और यह उपयुक्त समय है जब हम राज्य की अर्थव्यवस्था की स्थिति, वित्तीय सेहत तथा सरकार के नीतिगत रुझान पर नजर डालें। प्रति व्यक्ति आय की रैंकिंग के हिसाब से देखें तो पश्चिम बंगाल सन 1980 में 25 राज्यों के बीच सातवें स्थान से फिसलकर 2018-19 में 29 राज्यों में 21वें स्थान पर आ गया था। सन 1950 और 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल की तुलना महाराष्ट्र और तमिलनाडु से होती थी, अब आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्य उसके समतुल्य हैं। पश्चिम बंगाल की तट रेखा लंबी है और उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा भूटान और बांग्लादेश से मिलती है।औद्योगिक और कारोबारी केंद्र के रूप में भी उसका समृद्ध इतिहास रहा है। ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल की सरकार तात्कालिक खपत की वस्तुओं के लिए खरीद और व्यय की नीति को जारी रखे हुए है। मार्च के अंत में उसका बकाया कर्ज 2021 के 4.82 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2022 में 5.29 लाख करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। 2023 में यह और अधिक बढ़कर 5.86 लाख करोड़ रुपये हो सकता है। राज्य का कर्ज-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात भी राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम में उल्लिखित 25 फीसदी की सीमा से काफी अधिक है। पंजाब के साथ-साथ राजस्व व्यय में उसकी ब्याज भुगतान की हिस्सेदारी भी उच्चतम में है। सन 2022-23 के बजट अनुमान में अपनी 48 फीसदी प्राप्तियों के लिए पश्चिम बंगाल केंद्र सरकार से मिलने वाली कर अंतरण राशि तथा अनुदान पर निर्भर रहेगा। शेष 33 फीसदी हिस्सा उधारी से आएगा। यह अनुपात बहुत ज्यादा है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में कर अंतरण तथा अनुदान पर निर्भरता केवल 21 फीसदी है जबकि उधारी 27 फीसदी है। व्यय के मोर्चे पर महामारी के साथ राज्य सरकार ने पूंजीगत आवंटन पर सब्सिडी और हस्तांतरण को तरजीह दी। सरकार ने इस सब्सिडी और हस्तांतरण को यह कहते हुए उचित ठहराया कि इससे मांग बढ़ी और जरूरतमंदों और वंचितों की मदद की गई। 2022-23 (बजट अनुमान) में महामारी के धीमा पड?े के साथ व्यय के हिस्से के रूप में सब्सिडी के गति वर्ष के 2021-22 (संशोधित अनुमान) के सात फीसदी से घटकर चार फीसदी रह जाने का अनुमान है। जबकि पूंजीगत व्यय में ऐसा ही इजाफा होगा। सब्सिडी 2021-22 में 10,955 करोड़ रुपये (बजट अनुमान) से बढ़कर 2021-22 में 18,720 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) तक पहुंच गई थी। उसके भी 2022-23 में घटकर 10,935 करोड़ रुपये (बजट अनुमान) रहने का अनुमान है। सरकार ने रूपश्री, शिल्पसाथी और आनंदधारा आदि नामों से करीब 50 सब्सिडी और हस्तांतरण योजनाएं शुरू की हैं। यह जानना उपयोगी होगा कि सरकार कौन सी योजनाओं को बंद करना या संक्षिप्त करना चाहती है ताकि 2021-22 का अनुभव दोहराने से बचा जा सके। उस वक्त सब्सिडी आवंटन में बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में 70 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ था। सरकार के पूंजीगत व्यय में अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता बढ़ाने वाले आवंटन तथा कर्ज को दोबारा चुकाना शामिल है। आर्थिक नजरिये से देखें तो पूंजीगत आवंटन एक अहम चर है। 2021-22 में बजट अनुमान तथाा संशोधित अनुमान के बीच के चरण में सब्सिडी में इजाफे के बीच पूंजीगत आवंटन में कमी आई और यह 32,774 करोड़ रुपये के बजट अनुमान से घटकर संशोधित अनुमान मेंं 19,355 करोड़ रुपये रह गया। पूंजीगत आवंटन के बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में कटौती की बात करें तो इसमें भारी कमी आई और सामाजिक सेवाओं के लिए यह 12,818 करोड़ रुपये से कम होकर 8,245 करोड़ रुपये रह गया। जबकि कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों तथा ग्रामीण विकास एवं विशेष क्षेत्रों के कार्यक्रम में यह 6,183 करोड़ रुपये से कम होकर 1,744 करोड़ रुपये रह गया। इतने कम पूंजीगत आवंटन के साथ इस बात में संदेह ही है कि सरकार के पास भौतिक और सामाजिक अधोसंरचना के लिए जरूरी पूंजी है भी या नहीं। सन 2012-13 और 2018-19 के बीच 2013-14 और 2015-16 को छोड़ दिया जाए तो हर वर्ष प्रदेश का जीएसडीपी देश की तुलना मेंं धीमी गति से बढ़ा। जीएसडीपी 12.8 फीसदी बढ़ने की आशा है जबकि शेष देश का जीडीपी केवल 9.2 फीसदी बढ़ रहा है। यहां तीन बुनियादी प्रश्न हैं। पहला, विकसित देशों के उलट क्या पश्चिम बंगाल मांग की बाधा या आपूर्ति की दिक्कतों से जूझ रहा है? दूसरा, मांग में इजाफे का कितना हिस्सा देश के अन्य राज्यों को जाता है और कितना राज्य के लिए लाभदायक होता है? तीसरा, राज्य में आबादी के उच्च घनत्त्व को देखते हुए जीएसडीपी तेजी से कैसे बढ़ रहा है जबकि औद्योगिक गतिविधियों में कोई बढ़ोतरी नहीं दिख रही? समस्या तब पैदा होती है जब ऐसी राहत राजनीतिक लाभ और वोट खरीदने के लिए गैर जरूरतमंद लोगों को दी जाती है। यह काम दीर्घावधि के विकास की लागत पर तथा राज्य के सामाजिक और भौतिक ढांचे की अनदेखी करके किया जाता है। सब्सिडी और हस्तांतरण के नाकाबिल लोगों के पास जाने की समस्या पर नियंत्रण केवल तभी आ सकता है जब लाभार्थी चयन में पारदर्शिता बरती जाए। सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे में अहम निवेश किया जाना चाहिए ताकि औद्योगीकरण की गति बढ़ाई जा सके। केवल उसके माध्यम से ही राज्य में लोगों को सार्थक रोजगार दिलाया जा सकेगा। ध्यान रहे देश के प्रति वर्ग किलोमीटर 382 के जनसंख्या घनत्व की तुलना में पश्चिम बंगाल में प्रति वर्ग किलोमीटर 1,082 लोग रहते हैं। औद्योगीकरण के लिए किफायती बुनियादी ढांचे की जरूरत है और सन 1990 के दशक में प्रदेश की वाम मोर्चा सरकार के नई आर्थिक नीति पेश करने के बाद एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मशविरा कंपनी ने इस विषय में संकेत किया था। परंतु हस्तांतरण और सब्सिडी की नीतियों के साथ और तेज औद्योगीकरण की बुनियाद के बिना स्थायित्व नहीं हासिल होगा और अनचुकता बिलों और अधूरे वादों के साथ राजकोषीय संकट ही सामने आएगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। उत्तराखंड के पुन: मुख्यमंत्री बने पुष्कर सिंह धामी ने जिस तरह राज्य में एक समान नागरिक आचार संहिता को लागू करने के अपनी पार्टी भाजपा के चुनावी फैसले को लागू करने का इरादा जाहिर किया है उसका देश के सभी राज्यों में बिना आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह के स्वागत किया जाना चाहिए। समान नागरिक आचार संहिता का मुद्दा आज एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल, यह मुद्दा आज का नहीं है, यह अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है। इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के नजरिये से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित में चिन्तन, निर्णय एवं क्रियान्वयन की अपेक्षा है। भले ही भाजपा के लिये यह चुनावी मुद्दा रहा हो, लेकिन इसको लागू करने की अपेक्षा सभी जाति, धर्म, वर्ग, भाषा के लोगों के हित में है। हां, इसे लागू करने का साहस एवं दूरदर्शिता भाजपा और उसके नेता प्रदर्शित कर रहे हैं, यह स्वागतयोग्य है। इसे मजहब या साम्प्रदायिकता की राजनीति से ऊपर उठ कर पूरे देश की सामाजिक समरसता के नजरिये से देखा जाना चाहिए। संवैधानिक दृष्टि से भी यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है क्योंकि भारत का संविधान धर्म या जाति-बिरादरी अथवा स्त्री-पुरुष या क्षेत्रीय पहचान की परवाह किये बिना प्रत्येक नागरिक को एक समान अधिकार देता है। उत्तराखंड के पुन: मुख्यमन्त्री बने पुष्कर सिंह धामी ने जिस तरह राज्य में एक समान नागरिक आचार संहिता को लागू करने के अपनी पार्टी भाजपा के चुनावी फैसले को लागू करने का इरादा जाहिर किया है उसका देश के सभी राज्यों में बिना आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह के स्वागत किया जाना चाहिए। भारत विविधताओं से भरा देश है। यहाँ विभिन्न पंथों व पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग रहते हैं। इन सबके शादी करने, बच्चा गोद लेने, जायदाद का बंटवारा करने, तलाक देने व तलाक उपरांत तलाकशुदा महिला के जीवनयापन हेतु गुजारा भत्ता देने आदि के लिए अपने-अपने धमार्नुसार नियम, कायदे व कानून हैं। इन्हीं नियमों, कायदे व कानूनों को पर्सनल लॉ कहते हैं। अंग्रेज जब भारत आए और उन्होंने यह विविधता देखी, तो उस समय उन्हें लगा पूरे देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक समान नागरिक आचार संहिता बनानी आवश्यक है। जब उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की तो हर धर्मों के लोगों ने इसका विरोध किया। ऐसे में उन्होंने लम्बे समय तक यहां अपने पांव जमाये रखने के लिए किसी से उलझना ठीक नहीं समझा। इन परिस्थितियों में 1860 में उन्होंने इंडियन पैनल कोड तो लागू किया पर इंडियन सिविल कोड नहीं। यानि एक देश-एक दंड संहिता तो लागू की, लेकिन एक देश-एक नागरिक संहिता लागू करने का जिम्मेदारी एवं साहसपूर्ण काम नहीं किया। उसके बाद बनी सरकारों ने तो अंग्रेजों की सोच एवं नीतियों का ही अनुसरण किया, इसलिये उन्होंने भी अपने राजनीतिक हितों के लिये इसे लागू नहीं किया। जबसे नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने हैं उन्होंने साहसिक निर्णय लेते हुए राष्ट्र को नया उजाला एवं सांसें दी हैं। भले ही वह कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने का साहसिक एवं सूझबूझ भरा निर्णय हो या तीन तलाक का मुद्दा। कांग्रेस सरकारों ने हिन्दू एवं अन्य धर्मों को कमजोर करने एवं मुस्लिमों को संख्याबहुल बनाने के लिये अपने हित को सर्वोपरि माना। अपनी इन्हीं गलत नीतियों एवं संकीर्ण राजनीति के कारण कांग्रेस लगातार कमजोर होते होते अब एकदम रसातल में जा चुकी है। आजादी के बाद जिस तरह मुस्लिम सम्प्रदाय के लोगों को उनकी मजहब की पहचान के आधार पर उनके धार्मिक कानूनों को मान्यता देने का प्रावधान किया गया वह देश की आन्तरिक एकता व समरसता में व्यवधान पैदा करने वाला था। सभी मत-मजहब वालों के लिए तलाक, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार, विवाह की आयु, बच्चों को गोद लेने और विरासत संबंधी नियम एक समान बनाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि इन सभी मामलों में एक जैसे नियम बन जाते हैं तो समान नागरिक संहिता का उद्देश्य पूरा हो जाएगा। इसकी शुभ शुरुआत देवभूमि से हो रही है, यह सुखद संकेत है। तथ्य यह भी है कि गोवा में समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है और वहां सभी समुदायों के लोग रहते हैं। आखिर जो व्यवस्था गोवा में बिना किसी बाधा के लागू है, वह शेष देश में क्यों नहीं लागू हो सकती? प्रश्न यह भी है कि जब अन्य कई लोकतांत्रिक देशों में तुर्की, सूडान, इंडोनेशिया, मलेशिया, बांग्लादेश, इजिप्ट और पाकिस्तान में समान नागरिक संहिता लागू है तो भारत में उसका विरोध क्यों होता है? देश के अनेक मुस्लिम संगठनों ने आजादी के आन्दोलन में सहयोग एवं सहभागिता ही नहीं की, बल्कि भारत के बंटवारे का विरोध भी किया था। लेकिन आजाद भारत में इन संगठनों ने भी कभी मुसलमानों को भारत की राष्ट्रीय धारा में मिलने की प्रेरणा नहीं दी और उनकी मजहबी पहचान को खास रुतबा दिये जाने की ही कोशिशें करते हुए सर्वाधिक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी को इसके उपाय सुझाये। सबसे दुखद यह है कि 1947 में मजहब के आधार पर ही मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र पाकिस्तान बनाये जाने के बावजूद हमने अपनी राष्ट्रीय नीति में परिवर्तन नहीं किया और इसके उलट उन्हीं प्रवृत्तियों व मानसिकता को मुल्ला-मौलवियों व मुस्लिम उलेमाओं की मार्फत संरक्षण दिया गया जिन्होंने भारत के बंटवारे तक में अहम भूमिका निभाई थी। जिसकी वजह से भारत में मुसलमानों की राजनैतिक पहचान एक वोट बैंक के रूप में बनती चली गई और मुस्लिम तुष्टीकरण का अघोषित एजेंडा चल पड़ा।देश में बहुसंख्य हिंदू लगातार अल्पसंख्य होने की कगार पर अग्रसर होता रहा। सोचने वाली बात तो यह है कि कांग्रेस ने भी मुसलमानों को वोट बैंक से अधिक नहीं समझा और अपने स्वार्थ के लिये उनका इस्तेमाल किया। इससे इस समुदाय के लोगों का आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक परिवेश हमेशा पिछड़ा ही रहा। अब मोदी सरकार न केवल इस वर्ग के लोगों का जीवनस्तर ऊपर उठाने की कोशिश कर रही है, बल्कि उन्हें उन्नत जीवनशैली भी दे रही है। इंडियन पैनल कोड 1860 की धारा 494 के अनुसार कोई भी स्त्री या पुरुष एक विवाह के रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकता। दूसरी ओर मुस्लिम पुरुष 4 शादियां कर सकता है। सीआरपीसी 1973 की धारा 125 के अनुसार तलाकशुदा पत्नी पति से आजन्म गुजारा भत्ता लेने की हकदार है। मुस्लिम महिलाओं के लिए ऐसा नहीं है। शाहबानो केस इसका उदाहरण है। इसी तरह बाल विवाह निषेध अधिनियम 1929 के अनुसार बाल विवाह अपराध है, परन्तु मुस्लिम समाज के लिए यह अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। ईसाई विवाह अधिनियम 1872, ईसाई तलाक अधिनियम 1869 भी पुराने हैं व हिन्दू विवाह अधिनियम से अलग हैं। ये विषमताएं देश की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्नचिन्ह हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत का समान आचार संहिता पर बहुत ही तर्कसंगत दृष्टिकोण है। इस मुद्दे को लेकर संघ और भाजपा पर अत्यंत संकीर्ण, सांप्रदायिक और समाज-विरोधी दृष्टिकोण का आरोप लगता रहा है। जबकि मोहन भागवत का दृष्टिकोण एकदम स्पष्ट है कि जो भारत में पैदा हुआ और जो भी भारत का नागरिक है, वह हिंदू है। हिंदू होने और भारतीय होने में कोई फर्क नहीं है। समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर भी मोहन भागवत की राय है कि सर्वसम्मति के बिना इसे लागू करना उचित नहीं होगा। उत्तराखंड पूरे देश में देवभूमि के नाम से जाना जाता है, यह अध्यात्म की अलौकिक भूमि है, जहां सद्भावना एवं सौहार्द इंसानों में ही नहीं, जीव-जंतुओं एवं पशु-पक्षियों तक में व्याप्त है। संकीर्णता से ऊपर उठ कर जो किसी भी व्यक्ति में ईश्वर की सर्व व्यापी निरंकार सत्ता का बोध कराती है। ईश्वर की पृथ्वी पर इस निकटता को केवल सनातन या हिन्दू दर्शन अथवा इस धरती से उपजे अन्य धर्म दर्शन ही बताते हैं। अत: बहुत आवश्यक है कि इस देवभूमि में सभी नागरिकों का आचरण एक समान ही हो और सभी के लिए सामाजिक नियम एक समान हों। वैसे गौर से देखा जाये तो 2000 में उत्तराखंड बनने से पहले और बाद में भी इसकी पर्वतीय जनसंख्या में खासा परिवर्तन आया है और पहाड़ों पर मुस्लिम जनसंख्या में खासा इजाफा हुआ है। उत्तराखंड में मदरसों की संख्या तक में अभिवृद्धि हो रही है। जब धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होगा तो देश सही मायने में धर्मनिरपेक्ष बनेगा। विभिन्न समुदायों के बीच एकता की भावना पैदा होगी। एक ही विषय पर कम कानून होने से न्यायतंत्र को भी फैसले देने में आसानी होगी। कई मुस्लिम देशों जैसे टर्की व ट्यूनिशिया आदि ने भी शरीयत से हटकर नागरिक कानून बनाये हैं। मुस्लिम समाज को मुख्य धारा में आने व अपने सामाजिक उत्थान के लिए सरकार पर समान नागरिक आचार संहिता लागू करने के लिए दबाव बनाना चाहिए। राजनीतिक दलों एवं विभिन्न राज्य सरकारों को भी मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक ना मानते हुए तुष्टीकरण की नीतियों से ऊपर उठ कर सामाजिक समरसता व हर वर्ग के उत्थान के लिए काम करना चाहिए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (जीबीएस शास्त्री)। कोविड-19 के कारण गत छह माह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्रालय के चुनिंदा अधिकारी उद्योग जगत के लोगों से वर्चुअल कॉन्फ्रेंस के जरिये ही रूबरू हुए हैं। अधिकारियों ने 2014 के बाद किए गए रक्षा नीति सुधारों के बारे में बात की। उनका कहना है कि ये सुधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के नारे के अनुरूप रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने वाले हैं। अधिकारी रक्षा क्षेत्र की 101 वस्तुओं की नकारात्मक आयात सूची, नई रक्षा अधिग्रहण नीति 2020 (डीएपी 2020) का जिक्र करते हुए स्वदेशीकरण पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि नई रक्षा उत्पादन एवं निर्यात संवर्द्धन नीति (डीपीईपीपी 2020) की मदद से सालाना रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर 26 अरब डॉलर पहुंचाया जाएगा और हर वर्ष 5 अरब डॉलर के हथियार निर्यात किए जाएंगे। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा उद्योग कॉरिडोर दो स्थापित किए जाएंगे। वे देश के रक्षा उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के उदारीकरण का भी जिक्र करते हैं। गत 17 सितंबर को उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग ने रक्षा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा को उन कंपनियों के लिए 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी (स्वचालित रास्ते के जरिये) कर दिया जो नए लाइसेंस चाहती हैं। महज 13 दिन बाद 30 सितंबर को रक्षा मंत्रालय ने नई रक्षा खरीद नीति 2020 (डीएपी 2020) जारी कर दी जिसमें संशोधित एफडीआई सीमा का जिक्र नहीं था। नई नीति में कहा गया कि किसी कंपनी को भारतीय नागरिक के स्वामित्व वाला माना जाएगा जब उसमें 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिक या भारतीय कंपनी के पास होगी। यानी एफडीआई की अधिकतम सीमा 49 फीसदी होगी। डीएपी 2020 में कंपनी अधिनियम 2013 में परिभाषित उपायों का भी हवाला दिया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विभिन्न श्रेणियों में रक्षा निविदाओं में भाग लेने वाली कंपनियों का नियंत्रण भारतीय नागरिकों के हाथ में ही रहे। नीति में कहा गया है, नियंत्रण में अधिकांश निदेशकों की नियुक्ति का अधिकार या प्रबंधन पर नियंत्रण या नीतिगत निर्णयों पर नियंत्रण जिसमें उनकी अंशधारिता या प्रबंधन अधिकार अथवा अंशधारक समझौते या वोटिंग समझौते शामिल होंगे। इस विरोधाभास से कुछ सवाल उठते हैं : एफडीआई की सीमा को बढ़ाकर 74 फीसदी करने के पीछे इरादा क्या था? क्या 49 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली भारतीय कंपनियों के साथ अलग व्यवहार होगा और 74 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के साथ अलग? अंतरराष्ट्रीय रक्षा कंपनियां भारतीय रक्षा क्षेत्र में 74 फीसदी निवेश क्यों करेंगी जबकि कंपनी को भारतीय माना भी नहीं जाएगा और वे भारतीय कंपनियों के लिए आरक्षित श्रेणी में बोली भी नहीं लगा सकेंगी। रक्षा एफडीआई नीति सन 2001 में निजी क्षेत्र को मंजूरी के समय से ही उद्देश्य विहीन नजर आती है। रक्षा और विमानन क्षेत्र में 2001 से अब तक कुल एफडीआई बमुश्किल 3,454 करोड़ रुपये है। इसमें से 2,133 करोड़ रुपये की राशि वित्त वर्ष 2014-15 के बाद आई। रक्षा मंत्रालय ने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि रक्षा क्षेत्र में एफडीआई को उदार बनाकर क्या हासिल किया जाना है। सन 2001 में 26 फीसदी से 2016 में इसे 49 फीसदी किया गया और फिर यह 74 फीसदी तक पहुंचा। एक ओर इसे आधुनिक सैन्य तकनीक को भारत लाने के तरीके के रूप में देखा गया (मंत्रालय ने कहा भी है कि उच्च तकनीक वाली परियोजनाओं में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत होगी) तो दूसरी ओर एफडीआई को उदार बनाने को रक्षा उत्पादन बढ़ाने के तरीके के रूप में भी देखा जा रहा है। भले ही यहां सस्ते और मंझोले तकनीकी उपकरण बनें जिन्हें वैश्विक उपकरण निमार्ता भारत में श्रम सस्ता होने के कारण बनाएं। रक्षा एफडीआई को 100 फीसदी तक बढ़ाने को लेकर दी गई दलील इस गलत धारणा पर आधारित है कि रक्षा उद्योग बाजार संचालित है। बल्कि सरकार उच्च गुणवत्ता वाले सैन्य उपकरणों के निर्माण पर कड़ा नियंत्रण रखती है। बल्कि जब कोई रक्षा कंपनी विनिर्माण को भारत स्थानांतरित करने में बेहतरी देखती है तो यह निर्णय भी उसका बोर्ड नहीं भारत सरकार की मंजूरी पर निर्भर है। उन्नत रक्षा क्षमताओं वाले देशों में विधायी ढांचा मसलन अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय शस्त्र व्यापार नियमन आदि रक्षा तकनीक से जुड़े मसले देखते हैं। रक्षा एफडीआई की सीमा बढ़ाने और उसे 100 फीसदी करने के पीछे दलील यह है कि इससे विनिर्माण को बढ़ाया जा सकता है, रोजगार उत्पन्न किए जा सकते हैं और उत्पादन कौशल में सुधार किया जा सकता है। यह कौशल मध्यम तकनीक वाले उत्पाद मसलन इलेक्ट्रॉनिक सर्किटरी, फ्यूज बॉक्स या विमानों का लैंडिंग गियर बनाने के काम आता है। हम अपनी रक्षा जरूरत का 55-60 फीसदी आयात करते हैं जिसमें अधिकांश रूस, अमेरिका, फ्रांस और इजरायल से खरीदा जाता है। यदि इन देशों की कंपनियों को भारत में पूर्ण क्षमता वाली उत्पादन इकाइयां स्थापित करने दिया जाए तो बड़े आॅर्डर का अहम हिस्सा यहीं बन सकता है। इससे देश में उच्च गुणवत्ता वाली विनिर्माण इकाइयां तैयार होंगी, भले ही स्वामित्व विदेशियों का हो। आॅफसेट करारों के माध्यम से इस विकल्प को टटोला गया है लेकिन भविष्य की सभी प्रत्यक्ष विदेशी खरीद में यह शर्त जोड़ी जा सकती है कि वे भारत में पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई स्थापित करेंगे। देश के रक्षा बाजार में पहुंच को सशर्त बनाया जा सकता है। यानी केवल उनके लिए जो देश में लंबी अवधि तक टिक सकें। वैश्विक कंपनियों को पूर्ण स्वामित्व वाली या 74 फीसदी स्वामित्व वाली विनिर्माण इकाइयां भारत में स्थापित करने से उच्च प्रतिस्पर्धा का माहौल बनेगा और भारतीय निजी और सरकारी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी। शायद इससे देश के रक्षा उद्योग में तेजी आए और सामान्य से अलग उत्कृष्ट उत्पाद तैयार हों। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
एबीएन डेस्क (तमाल बंद्योपाध्याय)। भारतीय बैंकिंग जगत की शीर्ष हस्तियों में शामिल के वी कामत ने कुछ दिनों पहले कहा था कि भारतीय बैंकिंग उद्योग पिछले 50 वर्षों में परिसंपत्ति गुणवत्ता एवं पंूजी की मात्रा के लिहाज से बेहतरीन स्थिति में है। कई दूसरे लोग एवं रेटिंग एजेंसियों का भी यही आकलन है। फरवरी में इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च ने वित्त वर्ष 2023 के लिए देश के बैंकिंग क्षेत्र के परिदृश्य में संशोधन किया। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि पिछले कई दशकों में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र इस समय सर्वाधिक अच्छी स्थिति में है। एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष 2020 से बैंकिंग क्षेत्र में शुरू हुआ सुधार का सिलसिला अब भी जारी है। इस रेटिंग एजेंसी के अनुसार अप्रैल की शुरूआत से मुख्य वित्तीय मानदंडों में और सुधार होगा। वास्तव में नकदी की उपलब्धता कम होगी और ब्याज दरें बढ़ेंगी जिनसे बैंकों के ट्रेजरी लाभ पर असर होगा मगर ब्याज दरें बढ़ने से इस नुकसान की भरपाई हो जाएगी। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि निगमित ऋण बैंकों का कारोबार बढ़ाएंगे और वे इस मामले में खुदरा ऋणों की जगह ले लेंगे। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों का क्या कहना ह : मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र का परिदृश्य संशोधित कर नकारात्मक से स्थिर कर दिया है। इस रेटिंग एजेंसी का मानना है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी से ऋण आवंटन में 10-13 प्रतिशत इजाफा हो सकता है और परिसंपत्ति गुणवत्ता में भी सुधार होगा। इसके अनुसार बैंकों की पूंजी कोविड-19 महामारी से पूर्व की स्थिति से भी अधिक हो जाएगी। एजेंसी के अनुसार इन सभी अनुकूल बातों से बैंकों का मुनाफा बढ़ेगा। एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने नवंबर 2021 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र एक बार फर मुनाफे में आ गया है और उनकी स्थिति पूंजी के लिहाज से मजबूत हो गई है। एक अन्य रेंटिंग एजेंसी एसऐंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलीजेंस (वित्तीय सूचना सेवा इकाई) का कहना है कि भारत के बैंकिंग उद्योग में पर्याप्त पूंजी है और फंसे ऋणों में खासी कमी आई है। इस एजेंसी ने आरबीआई के एक सर्वेक्षण का हवाला दिया है जो निवेशकों में बढ़ते आत्मविश्वास और आने वाली तिमाहियों में उत्पादन में तेजी आने का संकेत देता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जून 2020 में परिसंपत्तियों पर प्रतिफल और सरकार नियंत्रित बैंकों की पूंजी में सुधार हुआ है। इससे पहले पिछले चार वर्षों से मुनाफा अनुपात नकारात्मक रहा था। इन सभी बातों से लगता है कि बैंकिंग क्षेत्र के लिए अब संभावनाएं कई गुना मजबूत लग रही हैं। सभी कह रहे हैं कि भारतीय बैंकिंग उद्योग इतनी अच्छी हालत में कभी नहीं था। क्या वाकई ऐसा है? मगर भारतीय बैंकिंग उद्योग को लेकर मेरी राय कुछ अलग है। इसमें कोई शक नहीं कि कुछ बैंकों को छोड़कर बैंकिंग प्रणाली की स्थिति में खासा सुधार हुआ है। कुछ ऐसे बैंक जरूर हैं जिन्होंने सूक्ष्म ऋण खंड में अधिक ऋण आवंटित किए हैं मगर फंसी परिसंपत्तियां नियंत्रण में हैं और पूंजी की भी कोई कमी नहीं है। इसके साथ ही ऋण की मांग में भी इजाफा हो रहा है। बैंकों के पास काफी नकदी है इसलिए वे ऋण देना चाह रहे हैं। मगर समस्या यहीं खड़ी हो जाती है। चालू वित्त वर्ष समाप्त होने ही वाला है और दौरान कई बैंक कंपनियों को बंद लिफाफा भेज रहे हैं। ये ऐसी कंपनियां हैं जो अपना मौजूदा ऋण किसी दूसरे बैंक या वित्तीय संस्थान में सस्ती ब्याज दरों पर स्थानांतरित कराना चाहती हैं। हाल में ही सार्वजनिक क्षेत्र की एक इकाई ने 10 वर्ष की परिपक्वता अवधि वाले बॉन्ड पर मिलने वाले प्रतिफल की तुलना में करीब 1.5 प्रतिशत अंक कम दर पर 15 वर्ष के लिए रकम जुटाई है। एक दूसरी इकाई ने 4 प्रतिशत से कुछ अधिक दर पर एक वर्ष के लिए रकम जुटाई है। कुछ बड़ी ऋण परियोजनाएं महंगे ऋण हटाकर दीर्घ अवधि के लिए ऋण ले रही हैं। वे करीब 7 प्रतिशत ब्याज दर पर 15 वर्षों के लिए ऋण ले रही हैं। बैंक ऐसे अवसरों पर दांव लगाने के लिए तैयार हैं क्योंकि निर्माण कार्य पूरा होने की वजह से नकदी प्रवाह में किसी तरह की बाधा आने की आशंका नहीं है। इस समय भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रीपो रेट 4 प्रतिशत और रिवर्स रीपो रेट 3.5 प्रतिशत हैं। मगर बैंक वैरिएबल रेट रविर्स रीपो नीलामी के तहत करीब 4 प्रतिशत ब्याज कमा सकते हैं। 4 प्रतिशत से अधिक ब्याज की पेशकश करने वाला कोई भी ऋण बैंकों को स्वीकार्य है। बैंकों से ऋण लेने वाली कंपनियां सस्ती दरों पर ऋण दूसरी जगह स्थानांतरित कर रही हैं। बैंकों के पास ऋण पर ब्याज के मसले पर मोल-भाव में शिरकत करने के आलवा कोई दूसरा विकल्प नहीं हैं। पहले कम दरों की पेशकश कर निजी बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से ग्राहक छीन लेते थे मगर अब स्थिति बदल चुकी है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बीच भी एक दूसरे के ग्राहक अपनी ओर खींचने की शुरूआत हो चुकी है। पहले ऐसी होड़ नहीं दिखी थी। बैंकिंग उद्योग को लेक इस नए उत्साह का नतीजा क्या होगा? बचतकर्ताओं को नुकसान हो रहा है क्योंकि कर कटौती के बाद महंगाई को मात देने के लिए पर्याप्त ब्याज वे नहीं अर्जित कर पाते हैं। बैंकों को भी नुकसान हो रहा है क्योंकि उनका ब्याज मार्जिन कमजोर हो रहा है। केवल उधार लेने वालों को लाभ मिल रहा है। मगर यह भी सच है कि जब किसी को सस्ती रकम मिलती है तो जोखिम लेने की उसकी क्षमता भी बढ़ जाती है। वे उत्साह में आकर वे निवेश के लिहाज से कमजोर परियोजनाओं में निवेश कर बैठते हैं जिन्हें लेकर उन्हें पछतावा होता है। सस्ती रकम बेजा इस्तेमाल का भी कारण बनती है। क्या हम बैंकिंग उद्योग को लेकर समय से पहले ही अति उत्साह का शिकार हो गए हैं?
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse