विचार

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Published / 2022-08-05 16:33:22
बैंकों की सबसे बड़ी समस्या है ‘एनपीए’

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ अश्विनी महाजन)। पिछले लंबे समय से एनपीए (नॉन परफार्मिंग एस्सेट्स) की समस्या से जूझ रहे बैंकों की मुश्किलों को आसान करने के तमाम प्रयास चल रहे हैं। फरवरी माह में केन्द्रीय बजट में सुझाया गया एस्सेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (एआरसी), यानी बैड बैंक का प्रावधान भी उसी श्रृंखला में इस समस्या के समाधान का एक और प्रयास कहा जा सकता है। सबसे पहले सरकार इन्सालवेंसी एवं बैंकरप्सी (आईबीसी) एक्ट लेकर आई और पहली बार दिवालियापन के लिए कोई ठोस कानूनी पहल की गई। माना गया कि इससे ईज आफ डूईंग बिजनेस में सुधार होगा, क्योंकि नुकसान के कारण देनदारिया चुका नहीं पाने की स्थिति में परिसंपत्तियों को आसानी से बेचकर व्यक्ति छुटकारा पा सकता है, लेकिन साथ ही इसका लाभ यह था कि बैंकों के लिए भी अपनी बैलेंस शीट साफ रखना संभव हो पाएगा। उसके उपरांत देखा गया कि पिछली सरकारों के समय दिए गए कर्ज की अदायगी में कोताही होने के कारण बैंकों की आर्थिक हालत बिगड़ने के कारण उन्हें पूंजीगत मदद की भी जरूरत है। ऐसे में अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में होने के कारण उनकी पूंजीगत जरूरतों की पूर्ति हेतु भी सरकार को ही मदद देनी जरूरी थी। केन्द्र ने पिछले वर्षों में अपने खजाने से अभी तक 2.5 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है ताकि बैंकों के घाटे की भरपाई हो सके। हालांकि इन सभी प्रयासों से बैंकों को डूबने से तो बचा लिया गया, लेकिन उनकी एनपीए की समस्या बदस्तूर बनी रही। हालांकि बैंकों के एनपीए जो 2017-18 तक आते-आते 11.2 प्रतिशत तक पहुंच गए थे, सितंबर 2020 तक वे 7.5 प्रतिशत तक कम हो गए थे, लेकिन पिछले वर्ष में कोविड महामारी के कारण व्यवसायों को नुकसान के चलते ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि सितंबर 2021 तक वे फिर से बढ़ जाएंगे। रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के हवाले से पता चलता है कि वे 13.5 प्रतिशत तक भी बढ़ सकते हैं। हालांकि कोर्ट के आदेश के अनुसार जिन ऋणों की अदायगी कोरोना के चलते आगे बढ़ा दिया गया था, उच्चतम न्यायालय ने उन ऋणों को एनपीए घोषित करने के लिए रोक लगा दी थी, लेकिन अब चूंकि न्यायालय ने इस रोक को हटा दिया है, अब बैंकों को उन ऋणों जिनकी वापसी नहीं हो रही, को एनपीए घोषित करना पड़ेगा। इससे एनपीए की प्रमाण में भारी वृद्धि हो सकती है। जानकारों का मानना है कि कोविड के कारण उत्पन्न अन्य समस्याओं का भी प्रभाव एनपीए पर पड़ सकता है। वर्ष 2021-22 का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकों की एनपीए की समस्या से निपटने के लिए एआरसी यानी बैड बैंक का प्रस्ताव रखा है। बैंकों की विषम एनपीए स्थिति के चलते पहले से ही बैड बैंक का प्रस्ताव आर्थिक जगत से जुड़े लोगों की ओर से आ रहा था। चूंकि भविष्य में एनपीए की समस्या बढ़ सकती है, ऐसे में बैड बैंक की अवधारणा और उससे जुड़े अन्य पहलुओं की जांच जरूरी हो जाती है कि क्या बैड बैंक बैंकों को उनकी समस्याओं से निजात दिला सकेगा। बैड बैंक की अवधारणा विदेशों से आई है। गौरतलब है कि जब अमेरिका में 2007-08 में बैंक धराशायी हो रहे थे, उस समय अमेरिका के राजस्व विभाग ने बैंकों के उन ऋणों को खरीद लिया, जिनकी वापसी नहीं हो पा रही थी। बाद में बाजार स्थितियां ठीक होने के बाद उन्हें बाजार में बेहतर कीमत पर बेच दिया। पूर्ण लॉकडाउन की तरफ न बढ़े देश लगभग वैसा ही कदम भारत सरकार भी उठाने जा रही है, जिसे एआरसी का नाम दिया गया है। यह कंपनी सेक्यूरटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन एंड एनफोर्समेंट और सेक्यूरिटीज इंटरेस्ट एक्ट (सरफायेसी एक्ट) 2002 के अंतर्गत स्थापित होगी। इस एआरसी की स्थापना हेतु उस कंपनी के पास स्वयं स्वामित्व की 100 करोड़ की राशि का फंड होना जरूरी है। जिन दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को यह कंपनी खरीदेगी, उसके 15 प्रतिशत के बराबर उसके पास पूंजी अनुपात का होना जरूरी होगा। यह एआरसी बैंकों के पास दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को उचित कीमत पर खरीदेगी। बैंकों को उस परिसंपत्ति के मूल्य का 15 प्रतिशत नकद प्राप्त होगा और शेष 85 प्रतिशत राशि उसे बॉन्ड और ऋण पत्र के रूप में प्राप्त होगी, जिसकी देयता अधिकतम 6 वर्ष की होगी। अपने कार्य को करने हेतु एआरसी डिबेंचर और बॉन्ड तो जारी कर ही सकता है, इसके साथ वह प्रतिभूति (सिक्योरिटी) रसीद भी जारी कर सकता है। सिक्योरिटी रसीद धारक के पास उस वित्तीय परिसंपत्ति का अधिकार होगा। वित्त की मदद से बैड बैंक (एआरसी) दबावग्रस्त ऋणों को खरीद सकेगा। इन दबावग्रस्त ऋणों को बट्टे पर खरीदने के बाद एआरसी के पास वो तमाम अधिकार होंगे जो बैंक के पास थे। यानी वह उन ऋणों का पुनर्गठन या पुननिर्धारण कर सकता है, समाधन कर सकता है, ऋणी के व्यवसाय को बेच सकता है या लीज पर दे सकता है अथवा प्रबंधन को बदल सकता है, लेकिन इस प्रकार की कार्यवाही को अंजाम देने के लिए ऋण दाताओं के 75 प्रतिशत और एआरसी की सहमति जरूरी होगी। यदि ऋण प्रतिभूति रहित है तो ऐसी हालत में ऋणी पर मुकदमा करने का भी अधिकार एआरसी के पास रहेगा। यह भी प्रश्न उठता है कि इंसोलवेंसी और बैकरप्सी कोड और एआरसी में अंतर क्या है? दोनों में ही अंतोत्गत्वा उद्देश्य एनपीए से छुटकारा पाना ही है, लेकिन समझना होगा कि आईबीसी उधारी के समाधान के लिए बनाया गया है। गौरतलब है कि आईबीसी से पहले इस काम को वर्षों लग जाते थे। दूसरी तरफ एआरसी का मकसद एनपीए ऋणों को बेचकर बैंकों की बैलेंस शीट को जल्द साफ करने का है, लेकिन देखा जाए तो दोनों के माध्यम से बैंकों की समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि बैड बैंक से भी एनपीए की समस्या का समाधान नहीं होने वाला। अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में हैं और एआरसी भी सरकारी स्वामित्व में होंगे। लेकिन समझना होगा कि बैंकों के आत्मविश्वास को बढ़ाने हेतु उनके एनपीए का हस्तांतरण दूसरी संस्था को करना एक अच्छा कदम हो सकता है।

Published / 2022-07-31 14:53:39
हौसले की उड़ान... पीवी सिंधु

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुधांशु कुमार)। हाथ में रैकेट लेकर जब वह बैडमिंटन कोर्ट में उतरती हैं तो सवा सौ करोड़ लोगों की निगाहें उन पर होती हैं। जोश, जज़्बा और जुनून का वह पर्याय हैं। ओलंपिक खेलों में भारतीय टीम बड़ी-बड़ी उम्मीदों के साथ उतरती रही हैं। टोक्यो ओलंपिक में कई बड़े नामों ने निराश किया पर उन्होंने आशा के दीप को जलाए रखा। अपनी आक्रामक शैली से प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों को मात देती हुई जब वह सेमीफाइनल तक पहुंचीं तो करोड़ों देशवासियों की निगाहों में सोने की चमक दिखने लगी। रियो ओलंपिक में उन्हें रजत मिला था। ऐसे में यदि इस बार सोना की चाहत सब रख रहे थे तो वह गलत भी नहीं था। लेकिन, सेमीफाइनल मैच में चीनी ताइपे की खिलाड़ी तायी जू यिंग की आक्रामकता ने पीवी सिंधु के स्वर्णिम इरादों पर पानी फेर दिया। वह निराश हुईं। करोड़ों भारतीय भी निराश हुए। लेकिन, पिता पी रमन्ना के लिए सब कुछ खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने अपनी विश्व चैंपियन बेटी से लंबी बातचीत की। उन्हें प्रेरित किया कि इतिहास रचने का मौका अब भी है। ओलंपिक मेडल के लिए तरसते भारत देश की यदि वह कांस्य पदक भी जीत लेती हैं, तो सारा देश उनको सिर आंखों पर बिठाएगा। पिता के शब्दों से उपजी प्रेरणा लेते हुए उन्होंने अपनी ताकत को फिर से बटोरा। कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में उन्होंने अपने आक्रमण को और तीक्ष्ण किया। जोरदार स्मैश लगाए। दक्षिण कोरिया के कोच पार्क ताइ सेंग के कुशल मार्गदर्शन में पीवी सिंधु ने कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में चीन की खिलाड़ी हे बिंग जियाओ को पराजित करते हुए इतिहास रच दिया। ओलंपिक खेलों में दो पदक जीतने वाली वह भारत की प्रथम महिला खिलाड़ी बन गई हैं। यही नहीं व्यक्तिगत स्पधार्ओं में दो ओलंपिक पदक जीतने वाले भारतीय खिलाड़ियों की सूची में उनका नाम तीसरे स्थान पर अंकित हो गया है। उनसे पहले नॉर्मन प्रिचार्ड और सुशील कुमार को ओलंपिक खेलों में भारत के लिए दो पदक जीतने का गौरव प्राप्त हुआ है। पीवी सिंधु टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय खिलाड़ी बनी हैं। भारतीय रेल में कार्यरत उसके माता-पिता वॉलीबॉल के नामी खिलाड़ी रहे हैं। उनके पिता पी रमन्ना ने सियोल एशियाड में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व भी किया। विरासत में मिले खेल में पहचान बनाना पीवी सिंधु के लिए आसान था। लेकिन, आॅल इंग्लैंड चैंपियनशिप में पुलेला गोपीचंद की सफलता ने पूरे परिवार को बैडमिंटन की ओर आकर्षित किया। माता-पिता की सहमति से पीवी सिंधु ने 5 वर्ष की उम्र में ही रैकेट थाम लिया और हैदराबाद स्थित भारतीय रेल सिग्नल एवं दूरसंचार अकादमी के स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में खेलने लगी। नैसर्गिक प्रतिभा, माता-पिता के कुशल निर्देशन और पीवी सिंधु की लगन से सकारात्मक संदेश मिलने लगे कि यह लड़की आगे चलकर बड़ा खिलाड़ी बन सकती है। फिर क्या था? पूरे परिवार ने अपने सपनों के आकार को बड़ा कर लिया जिससे बड़े संघर्ष की भूमिका तैयार हुई। जरूरत को देखते हुए मां ने सरकारी सेवा छोड़ दी तो पिता ने लंबे-लंबे अवकाश लिए। पुलेला गोपीचंद का ट्रेनिंग सेंटर उसके घर से करीब 50 किलोमीटर दूर था। प्रतिदिन सिंधु को उस ट्रेनिंग सेंटर तक समय से पहुंचाने की जिम्मेदारी पिता ने अपने कंधों पर ली। छोटी सी सिंधु को स्कूटर पर बैठाने के बाद वह उसे अपनी पीठ के साथ कपड़े से बांध देते थे ताकि सिंधु स्कूटर से गिर न पड़े। तमाम मुश्किलों के बाद भी उन्होंने सुनिश्चित किया कि सिंधु प्रतिदिन समय पर प्रशिक्षण के लिए मौजूद रहे। प्रशिक्षण के दौरान सिंधु ने भी मेहनत से कभी भी मुंह नहीं मोड़ा। लगातार अपने आप को मजबूत बनाती चली गईं। 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों में साइना नेहवाल ने जब कांस्य पदक जीता तो पीवी सिंधु के बाजूओं में भी फौलादी ताकत आ गई। उन्हें विश्वास हो गया कि बैडमिंटन के कोर्ट में भारत के सुनहरे दिनों की शुरूआत हो चुकी है। अधिकारियों और स्पॉन्सरों ने भी जब इस ओर अपनी निगाहें घुमाईं तो पीवी सिंधु की ताकत और बढ़ गई। पूरी दुनिया का बैडमिंटन कोर्ट उनके लिए खुल गया। एक के बाद एक लगातार वह सभी महत्वपूर्ण टूर्नामेंट जीतती चली गईं। 14 वर्ष से पहले जूनियर वर्ग की सभी प्रमुख भारतीय प्रतियोगिताओं में अपनी चमक बिखेरने के बाद पीवी सिंधु ने इंटरनेशनल सर्किट में कदम रखा। जीवन में अत्यंत सहज रहने वाली पुसर्ला वेंकट सिंधु जब बैडमिंटन कोर्ट पर उतरती हैं तब अपनी शानदार सर्विस और आक्रमक अंदाज से सबका मन मोह लेती है और प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को घुटने टेकने पर बाध्य कर देती हैं। ओलंपिक में दो पदक जीतने के अलावा वह विश्व चैंपियनशिप में भी पाँच पदक जीत चुकी हैं। 2019 के बासेल विश्व चैंपियनशिप में पीवी सिंधु ने स्वर्ण पदक जीता था। 2017 के ग्लासगो विश्व चैंपियनशिप तथा 2018 के नानजिंग विश्व चैंपियनशिप में उन्हें रजत पदक मिला था। 2013 के कोपनहेगन विश्व चैंपियनशिप तथा 2014 के ग्वांगझू विश्व चैंपियनशिप में उन्हें कांस्य पदक मिला। ओलंपिक तथा विश्व चैंपियनशिप मिलाकर सात पदक जीतने वाली वह विश्व की तीसरी खिलाड़ी हैं। पीवी सिंधु ने एशियाई खेलों में भी दो पदक जीते हैं। जकार्ता एशियाई खेलों में उन्हें रजत पदक और इचियोन एशियाई खेलों में कांस्य पदक मिला था। गोल्ड कोस्ट में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में पीवी सिंधु ने मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक और एकल स्पर्धा में रजत पदक प्राप्त किया जबकि ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल में उन्हें कांस्य पदक मिला। उन्होंने चीन, इंडोनेशिया,हांगकांग, ब्रिटेन सहित कई देशों में सफलता के झंडे गाड़े हैं। उनके नेतृत्व में भारत में उबेर कप की टीम स्पर्धा में कांस्य पदक भी जीता है। बैडमिंटन कोर्ट पर सिंधु की उपलब्धियां अपार हैं। एक व्यक्ति के रूप में पीवी सिंधु भारतीय सभ्यता और संस्कृति की प्रतिनिधि हैं। अपने माता-पिता का खूब सम्मान और उनके हर आदेश का पालन, खेल के प्रति पूरी निष्ठा, अनुशासन, गुरु के निर्देशों के प्रति समर्पण तथा भारतीय परंपराओं और तीज-त्योहारों का अंगीकरण पीवी सिंधु को विशिष्ट बनाता है। बैडमिंटन कोर्ट पर वह एक स्टार खिलाड़ी होती हैं जिसकी चीख सुन सामने वाले खिलाड़ी की कंपकंपी छूट जाती है।

Published / 2022-07-30 16:46:20
आज भी कराह रहे हैं प्रेमचंद के पात्र...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मुरलीधर)। हमारी कसौटी पर वह साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो, जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है। साल 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में प्रेमचंद द्वारा दिए थे। देश में प्रेमचंद ही ऐसे पहले शख्स थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य को रोमांस, तिलिस्म, ऐय्यारी, जासूसी कथानकों से बाहर निकालकर आम जन की जिंदगी से जोड़ा। दलित, अल्पसंख्यक और महिलाओं के अफसानों, जज्बात को अपनी कहानियों में ढाला। उन्हें अपनी आवाज दी। साहित्य को यथार्थ से जोड़ने और समाजोन्मुखी बनाने में प्रेमचंद का अहम योगदान है। पूस की रात, सद्गति, कफन, ईदगाह, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दरोगा आदि उनकी अनेक कहानियों में सामाजिक यथार्थ के दृश्य बहुतायत में मिलते हैं। घीसू, होरी, अमीना बी, जुम्मन, सूरदास, बूढ़ी काकी हमारे अपने समाज की देन और बेलाग चरित्र हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी कहानियों का मुख्य किरदार बनाया। वरदान, सेवा सदन, रंगभूमि, प्रेमाश्रम और कर्मभूमि वगैरह उनके कई उपन्यासों की कहानी किसानों की जिंदगानी और उनके संघर्षों के ही इर्द-गिर्द घूमती है। भारतीय गांवों का जो सजीव, मार्मिक चित्रण प्रेमचंद ने अपने उपन्यास गोदान में किया है, हिन्दी साहित्य में वैसी कोई दूसरी मिसाल हमें ढूंढे नहीं मिलती। साल 1917 में रूस की अक्टूबर क्रांति से प्रेमचंद भी बेहद प्रभावित थे। अपने दोस्त के नाम एक खत में उन्होंने इसका साफ जिक्र किया है- मैं बोल्शेविकों के मतामत से कमोबेश प्रभावित हूं। वर्गविहीन समाज का सपना प्रेमचंद का सपना था। ऐसा समाज जहां वर्ण, वर्ग, लिंग, रंग, जाति, भाषा और धर्म का कोई भेद न हो। शुरुआत में गांधीजी के आंदोलन में अपार श्रद्धा रखने वाले प्रेमचंद का आदर्शवाद उनके आखिरी काल में लिखे हुए साहित्य में टूटता दिखता है। यही नहीं आगे चलकर अपने उपन्यास के एक पात्र के मुंह से जब वे यह वाक्य बुलवाते हैं कि-शिकारी से लड़ने के लिए हथियार का सहारा लेना जरूरी है, शिकारी के चंगुल में आना सज्जनता नहीं कायरता है। तब हम यहां उपन्यास सेवासदन, रंगभूमि, कायाकल्प, कर्मभूमि के लेखक से इतर एक दूसरे ही प्रेमचंद को साकार होता देखते हैं। गोया कि इसके बाद ही प्रेमचंद गोदान जैसा एपिक उपन्यास, कफन जैसी कालजयी कहानी और दिल को झिंझोड़ देने वाला अपना आलेख महाजनी सभ्यता लिखते हैं। उनकी इन रचनाओं से पाठक पहली बार भारतीय समाज की वास्तविक और कठोर सच्चाईयों से सीधे-सीधे रु-ब-रु होता है। प्रेमचंद का युग हमारी गुलामी का दौर था। जब हम अंग्रेजों के साथ-साथ स्थानीय जागीरदारों, सामंतों की दोहरी गुलामी भी झेल रहे थे। वे दोनों को ही एक समान अवाम का दुश्मन समझते थे। प्रेमचंद घर में उपरोक्त किताब के एक अंश में वे अपनी पत्नी शिवरानी देवी से कहते हैं कि शोषक और शोषितों में लड़ाई हुई, तो वे शोषित, गरीब किसानों का पक्ष लेंगे। बिला शक प्रेमचंद की कहानी, उपन्यासों में यह पक्षधरता और प्रतिबद्धता हमें साफ दिखलाई देती है। उपन्यास प्रेमाश्रम में वे जहां सामूहिक खेती और वर्गविहीन समाज की वकालत करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर विदेशी शासन और शोषणकारी जमींदारी गठबंधन का असली चेहरा बेनकाब करते हैं। उनकी नजरों में आजादी का मतलब दूसरा ही था, जो शोषणकारी दमनचक्र से सर्वहारा वर्ग की मुक्ति के बाद ही मुमकिन था। साल 1933 में समाचार पत्र जागरण के अपने एक संपादकीय में प्रेमचंद लिखते हैं- अधिकांश भारतीय स्वराज इसलिए नहीं चाहते कि अपने देश के शासन में उनकी ही आवाज, बहसें सुनी जाएं बल्कि स्वराज का अर्थ उनके प्राकृतिक उपज पर नियंत्रण, अपनी वस्तुओं का स्वच्छंद उपयोग और अपनी पैदावार पर अपनी इच्छा अनुसार मूल्य लेने का स्वत्व। स्वराज का अर्थ केवल आर्थिक स्वराज है। यानी उनके मतानुसार आर्थिक आजादी के बाद ही वास्तविक आजादी मुमकिन है। उपन्यास प्रेमाश्रम में अपने पात्रों से प्रेमचंद कहलाते हैं- रूस देश में कास्तकारों का ही राज्य है, वह जो चाहते हैं, करते हैं। और कादिर कौतूहल से कहता है- चलो ठाकुर उसी देश में चलें। यही नहीं उपन्यास रंगभूमि में उनका एक पात्र कहता है- ईर्ष्या की व्यापकता ही साम्यवाद का सर्वप्रिय कारण है। प्रेमचंद ने अपनी छोटी सी जिंदगानी में बेशुमार लेखन किया। साहित्य की शायद ही कोई ऐसी विधा बची, जिसमें उन्होंने अपना लेखन नहीं किया हो। कहानी और उपन्यासों के अलावा उन्होंने कर्बला, रूहानी शादी, संग्राम, प्रेम की वेदी जैसे नाटक और कुछ विचार, कलम, महात्मा शेख सादी, दुगार्दास, त्याग और तलवार आदि सैंकड़ों निबंध लिखे। टालस्टाय की कहानियों का अनुवाद किया। साहित्यिक पत्रिका हंस और समाचार-पत्र जागरण के संपादन का जिम्मा संभाला। गोया कि हर क्षेत्र में वे कामयाब रहे। प्रेमचंद ने भारतीय समाज का गहन और व्यापक अध्ययन किया था। विश्व की प्रमुख घटनाओं, साहित्य से भी वे अछूते नहीं थे। साम्राज्यवाद, सामंतवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता को वे इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन समझते थे। मौजूदा दौर में जिस तरह से देश की कुछ सियासी पार्टियां और कट्टरपंथी संगठन धर्म और संस्कृति का इस्तेमाल अपने निजी फायदे के लिए करने में बाज नहीं आते, प्रेमचंद इसके बरखिलाफ थे। उनका ख्याल था, धर्म को राजनीति से गडमड न कीजिए, क्योंकि धर्म ईश्वर और मनुष्य के सम्बंध की वस्तु है।

Published / 2022-07-30 16:24:36
राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की उम्मीद...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। संकेत सरगर द्वारा असाधारण प्रयास! उनका प्रतिष्ठित रजत जीतना राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए एक शानदार शुरुआत है। इनको बधाई और भविष्य के सभी प्रयासों के लिए शुभकामनाएं। 73 वर्षों में पहली बार भारत ने थामस कप बैडमिंटन का खिताब जीता, पीवी सिंधु ने सिंगापुर ओपन में जीत का परचम लहराया, विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में श्रीशंकर(लंबी कूद) अन्नु रानी और रोहित यादव (जेवलीन थ्रो) ने अच्छे प्रदर्शन से प्रशंसा बटोरी और नीरज चोपड़ा ने रजत पदक जीत कर अपनी श्रेष्ठता बरकरार रखी। लेकिन महिला हाकी विश्व कप में खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलंपिक जैसा शानदार नहीं रहा और भारतीय महिला टीम 9 वें स्थान में रही। भारतीय पुरुष हाकी टीम को भी एशिया कप में सिर्फ कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। उधर इंग्लैंड से पांचवां और अंतिम टेस्ट हारने के कारण भारत विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की रैंकिंग में चौथे स्थान पर खिसक गया है। इन उतार चढ़ावों के बीच अब खेल प्रेमियों का ध्यान इंग्लैंड के बर्मिंघम की ओर खींचा चला गया है, जहां 28 जुलाई से 8 अगस्त तक राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होने जा रहा है। जहां 72 देशों के 4500 ज्यादा खिलाड़ी पदक के लिए संघर्ष करेंगे और 283 पदकों के लिए 19 तरह के खेलों में हिस्सा लेंगे। राष्ट्रमंडल खेलों में 215 खिलाड़ियों का भारतीय दल भी अपना दमखम दिखलाने के लिए तैयार है। जिसमें 108 पुरुष और 107 महिला हैं। एथलेटिक्स की स्पर्धाओं में 37 खिलाड़ी भाग लेंगे। राष्ट्रमंडल खेल जिसे पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था की शुरुआत 1930 में हुई थी, कनाडा के हैमिल्टन शहर में। 1978 में इन खेलों का नाम राष्ट्रमंडल खेल अर्थात कामनवेल्थ गेम्स पड़ा। इसका आयोजन प्रत्येक 4 वर्ष में होता है। ब्रिटेन और उसके द्वारा पूर्व में शासित देश राष्ट्रमंडल देश कहलाते हैं। ओलंपिक और एशियाई खेलों के बाद सबसे बड़ा खेल उत्सव राष्ट्रमंडल खेल ही माने जाते हैं। 1934 के बाद भारत लगातार (1950,1962एवं 1986 को छोड़कर) राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेता रहा है।1934 में भारत ने केवल दो खेलों कूश्ती और एथलेटिक्स में हिस्सा लिया और एक कांस्य पदक जीता। कुश्ती में कांस्य पदक जीतकर राशिद अनवर ब्रिटिश एम्पायर गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने। 1934 से लेकर 2018 तक भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में कुल 503 पदक जीते हैं। जिनमें 181 स्वर्ण,173 रजत तथा 149 कांस्य पदक हैं। सबसे अधिक पदक (135) निशानेबाजी में मिले हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे सफल भारतीय खिलाड़ी 9 स्वर्ण सहित कुल 15 पदक जीतने वाले जशपाल राणा रहे हैं। वैसे भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक धावक मिल्खा सिंह ने कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में 440 यार्ड इवेंट में प्राप्त किया था। भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2010 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में रहा था , जहां भारत ने 101पदक जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले ही भारत के दो खिलाड़ी फरार्टा धाविका धनलक्ष्मी और ट्रिपल जंपर ऐश्वर्य बाब डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए हैं। लेकिन विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीत कर नीरज चोपड़ा ने राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में उत्साह का संचार कर दिया है। आगामी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को अपने 37 एथलीटों से पदक की उम्मीद तो है ही, पुरुष और महिला हाकी टीम से भी कम उम्मीद नहीं है। इस बार ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हाकी टीम आस्ट्रेलिया को पछाड़ कर स्वर्ण जीत ले तो कोई आश्चर्य नहीं। इसके अलावा जैवलीन थ्रो में नीरज चोपड़ा, रोहित यादव और अन्नु रानी से, बैडमिंटन में पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन, के श्रीकांत, चिराग शेट्टी और सात्विक साईराज से, लंबी कूद में श्री शंकर और मो अनीश याहिया से,3000 मीटर स्टीपल चेज में अविनाश साबले से, त्रिकूद में प्रवीण चित्राबेल, अब्दुल्ला अबुबाकर से, चक्का फेंक में सीमा पुनिया और नवजीत कौर से, मैराथन रेस में नितेंद्र रावत से, कूश्ती में सागर अहलावत, दीपक पुनिया, बजरंग पुनिया, रवि दाहिया, विनेश फोगाट, साक्षी मलिकऔर अंशु मलिक से, मुक्केबाजी में अमित पंघाल और निकहत जरीन से, भारोत्तोलन में मीराबाई चानू से और टेबल टेनिस में अचंता शरत कमल और मोनिका बत्रा से पदक की उम्मीद है। इस बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रही है और इनसे भी खेलप्रेमियों को काफी उम्मीदें हैं।

Published / 2022-07-25 18:11:10
राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की उम्मीद...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। पिछले दिनों खेल के मैदान से कुछ अच्छी तो कुछ निराश करने वाली खबरें आईं। 73 वर्षों में पहली बार भारत ने थामस कप बैडमिंटन का खिताब जीता, पीवी सिंधु ने सिंगापुर ओपन में जीत का परचम लहराया, विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में श्रीशंकर (लंबी कूद) अन्नु रानी और रोहित यादव (जेवलीन थ्रो) ने अच्छे प्रदर्शन से प्रशंसा बटोरी और नीरज चोपड़ा ने रजत पदक जीत कर अपनी श्रेष्ठता बरकरार रखी। लेकिन महिला हाकी विश्व कप में खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलंपिक जैसा शानदार नहीं रहा और भारतीय महिला टीम 9 वें स्थान में रही। भारतीय पुरुष हाकी टीम को भी एशिया कप में सिर्फ कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। उधर इंग्लैंड से पांचवां और अंतिम टेस्ट हारने के कारण भारत विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की रैंकिंग में चौथे स्थान पर खिसक गया है। इन उतार चढ़ावों के बीच अब खेल प्रेमियों का ध्यान इंग्लैंड के बर्मिंघम की ओर खींचा चला गया है, जहां 28 जुलाई से 8 अगस्त तक राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होने जा रहा है। जहां 72 देशों के 4500 ज्यादा खिलाड़ी पदक के लिए संघर्ष करेंगे और 283 पदकों के लिए 19 तरह के खेलों में हिस्सा लेंगे। राष्ट्रमंडल खेलों में 215 खिलाड़ियों का भारतीय दल भी अपना दमखम दिखलाने के लिए तैयार है। जिसमें 108 पुरुष और 107 महिला हैं। एथलेटिक्स की स्पर्धाओं में 37 खिलाड़ी भाग लेंगे। राष्ट्रमंडल खेल जिसे पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था की शुरुआत 1930 में हुई थी, कनाडा के हैमिल्टन शहर में। 1978 में इन खेलों का नाम राष्ट्रमंडल खेल अर्थात कामनवेल्थ गेम्स पड़ा। इसका आयोजन प्रत्येक 4 वर्ष में होता है। ब्रिटेन और उसके द्वारा पूर्व में शासित देश राष्ट्रमंडल देश कहलाते हैं। ओलंपिक और एशियाई खेलों के बाद सबसे बड़ा खेल उत्सव राष्ट्रमंडल खेल ही माने जाते हैं। 1934 के बाद भारत लगातार (1950,1962 एवं 1986 को छोड़कर)-राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेता रहा है।1934 में भारत ने केवल दो खेलों कूश्ती और एथलेटिक्स में हिस्सा लिया और एक कांस्य पदक जीता। कूश्ती में कांस्य पदक जीतकर राशिद अनवर ब्रिटिश एम्पायर गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने।1934 से लेकर 2018 तक भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में कुल 503 पदक जीते हैं। जिनमें 181 स्वर्ण,173 रजत तथा 149 कांस्य पदक हैं। सबसे अधिक पदक (135) निशानेबाजी में मिले हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे सफल भारतीय खिलाड़ी 9 स्वर्ण सहित कुल 15 पदक जीतने वाले जशपाल राणा रहे हैं। वैसे भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक धावक मिल्खा सिंह ने कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में 440 यार्ड इवेंट में प्राप्त किया था। भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2010 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में रहा था , जहां भारत ने 101पदक जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले ही भारत के दो खिलाड़ी फर्राटा धाविका धनलक्ष्मी और ट्रिपल जंपर ऐश्वर्य बाब डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए हैं। लेकिन विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीत कर नीरज चोपड़ा ने राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में उत्साह का संचार कर दिया है। आगामी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को अपने 37एथलिटों से पदक की उम्मीद तो है ही, पुरुष और महिला हाकी टीम से भी कम उम्मीद नहीं है। इस बार ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हाकी टीम आस्ट्रेलिया को पछाड़ कर स्वर्ण जीत ले तो कोई आश्चर्य नहीं। इसके अलावा जैवलीन थ्रो में नीरज चोपड़ा, रोहित यादव और अन्नु रानी से, बैडमिंटन में पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन, के श्रीकांत, चिराग शेट्टी और सात्विक साईराज से, लंबी कूद में श्री शंकर और मो अनीश याहिया से,3000 मीटर स्टीपल चेज में अविनाश साबले से, त्रिकूद में प्रवीण चित्राबेल, अब्दुल्ला अबुबाकर से, चक्का फेंक में सीमा पुनिया और नवजीत कौर से, मैराथन रेस में नितेंद्र रावत से, कूश्ती में सागर अहलावत, दीपक पुनिया, बजऱंग पुनिया, रवि दाहिया, विनेश फोगाट, साक्षी मलिकऔर अंशु मलिक से, मुक्केबाजी में अमित पंघाल और निकहत ज़रीन से, भारोत्तोलन में मीराबाई चानू से और टेबल टेनिस में अचंता शरत कमल और मोनिका बत्रा से पदक की उम्मीद है।इस बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रही है और इनसे भी खेलप्रेमियों को काफी उम्मीदें हैं।

Published / 2022-07-19 17:20:37
रिटायरमेंट के बाद का दर्द...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। छत्तीसगढ़ के शहर कोरबा में बसे नेहरू नगर में एक आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। ये बड़े वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान-परेशान से रोज शाम को पास के पार्क में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नजरों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे। एक दिन एक बुजुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था - मैं रायपुर में इतना बड़ा आईएएस अफसर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं। मुझे तो बिलासपुर में बसना चाहिए था- और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे। परेशान होकर एक दिन जब बुजुर्ग ने उनको समझाया- आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं? बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है कि बल्ब किस कम्पनी का बना? हुआ था या कितने वाट का था या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी? बल्ब के फ्यूज होने के बाद इनमें से कोई भी बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है। लोग ऐसे बल्ब को कबाड़ में डाल देते हैं कि नहीं! फिर जब उन रिटायर्ड आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति में सिर हिलाया तो बुजुर्ग फिर बोले - रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो जाती है। हम कहां काम करते थे?, कितने बड़े/छोटे पद पर थे, हमारा क्या रुतबा था, यह सब कुछ भी कोई मायने नहीं रखता। मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं। वो जो सामने ठाकुर जी बैठे हैं, एस .सी .सी.एल .के महाप्रबंधक थे। वे सामने से आ रहे मरकाम साहब सेना में ब्रिगेडियर थे। वो देवांगन.. जी इसरो में चीफ थे। ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज बल्ब करीब - करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो। कोई रोशनी नहीं तो कोई उपयोगिता नहीं। उगते सूर्य को जल चढ़ा कर सभी पूजा करते हैं। पर डूबते सूरज की कोई पूजा नहीं करता। कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते हैं कि रिटायरमेंट के बाद भी उनसे अपने अच्छे दिन भुलाए नहीं भूलते। वे अपने घर के आगे नेम प्लेट लगाते हैं - रिटायर्ड आइएएस/रिटायर्ड आईपीएस/रिटायर्ड पीसीएस/ रिटायर्ड जज आदि - आदि। अब ये रिटायर्ड आइएएस/ आइपीएस/ पीसीएस/ तहसीलदार/ पटवारी/ बाबू/ प्रोफेसर/ प्रिंसिपल/डाक्टर / अध्यापक.. कौन.. कौन-सी पोस्ट होती है भाई माना कि आप बहुत बड़े आफिसर थे, बहुत काबिल भी थे, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती थी पर अब क्या अब यह बात मायने नहीं रखती है बल्कि मायने रखती है कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे थे... आपने कितनी जिन्दगी को छुआ... आपने आम लोगों को कितनी तवज्जो दी... समाज को क्या दिया, जाति बंधुओं के कितने काम आएं लोगों की मदद की..या सिर्फ घमंड मे ही सूजे हुए रहे... पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो बस याद कर लीजिए कि एक दिन सबको फ्यूज होना है। यह खबर उन लोगों के लिए आईना है जो पद और सत्ता होते हुए कभी अपनी कलम से समाज का हित नहीं कर सकते। और रिटायरमेंट होने के बाद समाज के लिए बड़ी चिंता होने लगती है। अभी भी वक्त है इस पोस्ट को पढ़िए और चिंतन करिए तथा समाज का जो भी संभव हो हित करिए... और अपने पद रूपी बल्ब से समाज देश को रोशन करिए।

Published / 2022-07-05 13:24:07
ब्रिटिश रेल का सरकारीकरण और भारत की नीति...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनायक चटर्जी)। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने हाल ही में अपने देश के ध्वस्त हो रहे रेलवे नेटवर्क की व्यापक जांच और मरम्मत की घोषणा करते हुए कहा, ब्रिटेन के विफल होते ट्रेन नेटवर्क को सरकार के नियंत्रण में लाया जाएगा। उनका यह कदम सन 1980 और 1990 के दशक में कंजरवेटिव पार्टी की सरकारों द्वारा शुरू की गई निजीकरण की विवादास्पद नीति को पलट देगा। ग्रेट ब्रिटिश रेलवेज (जीबीआर) नामक एक नई सार्वजनिक संस्था गठित की जाएगी। जीबीआर में समूचा रेलवे तंत्र शामिल होगा। यानी बुनियादी ढांचे से लेकर समय सारणी बनाने और टिकट से होने वाली आय संग्रहित करने तक का सारा काम। यह नई संस्था रेलवे नेटवर्क के पूंजीगत कार्य की योजना बनाने और उसका क्रियान्वयन करने के लिए भी उत्तरदायी होगी। फिलहाल बुनियादी ढांचे यानी ट्रैक, सिग्नल और बड़े स्टेशनों का प्रबंधन कर रही नेटवर्क रेल को इसमें समाहित कर लिया जाएगा। नई कंपनी निजी ट्रेन संचालकों को अनुबंधित करने का काम भी करेगी। ज्यादातर ट्रेनों के संचालन का काम उनके हवाले ही होगा। गत 20 मई को घोषित इन प्रस्तावों को बीते 25 वर्ष में ब्रिटेन के रेलवे उद्योग के इतिहास की सबसे बड़ी घटना माना जा रहा है। रेलवे एक बार फिर सरकार के हाथ में आ रही है। हालांकि इस दौरान निजी क्षेत्र का सहयोग लिया जाएगा। 30 वर्षीय योजना का मसौदा परिवहन मंत्री ग्रांट शैप्स और ब्रिटिश एयरवेज के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी कीथ विलियम्स ने तैयार किया है। इस योजना को 2023 तक पूरी तरह क्रियान्वित करना है। सन 1979 में जब तत्कालीन थैचर प्रशासन ने ब्रिटिश रेलवे का निजीकरण करने का निर्णय लिया था तब मिजाज बिल्कुल अलग था। उस वक्त कहा गया था कि प्रबंधन कौशल, उद्यमिता की भावना हासिल करने और जनता को बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए रेलवे का निजीकरण किया जाएगा। चार वर्ष बाद 1993 में रेलवे अधिनियम लागू हो गया। ट्रैक अथॉरिटी मॉडल अपनाया गया जबकि यात्री रेल सेवाओं को निजी कंपनियों को सौंप दिया गया। स्थायी परिसंपत्तियों मसलन रेलवे ट्रैक, स्टेशन, सुरंगें, पुल, सिग्नल और डिपो आदि जो पुरानी सरकारी कंपनी ब्रिटिश रेल के आधिपत्य में थे उन्हें एक स्वतंत्र कंपनी रेलट्रैक के हवाले कर दिया गया। सन 1995 में रेलटै्रक ने यात्री रेल सेवाओं की फ्रैंचाइज निजी यात्री रेल परिचालन कंपनियों को देनी शुरू की। अब इस फ्रेंचाइजी मॉडल में दिक्कतें देखी जा रही हैं क्योंकि इससे पूरा नेटवर्क बहुत हद तक विखंडित हो गया है। ऐसे में फ्रेंचाइज का संचालन कर रही कंपनी के पास परिचालन को लेकर बहुत सीमित अधिकार रह जाते हैं और ट्रैक और ट्रेन परिचालकों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है। ऐसा भी प्रतीत होता है कि ब्रिटेन में हर दो में से एक यात्री ट्रेन का संचालन फ्रांस और इटली की विदेशी कंपनियों द्वारा किए जाने के कारण ब्रिटेन के राष्ट्रीय गौरव को भी ठेस पहुंची। वर्ष 2016 से ही यह बहस शुरू हो गई थी कि रेलवे को एक बार फिर राष्ट्रीयकृत किया जाए या नहीं। दोबारा राष्ट्रीयकरण करने की इस पहल का सतर्कतापूर्वक स्वागत किया गया है। कुछ धड़े, खासकर श्रम संगठन इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं कि दक्षिणपंथी झुकाव रखने वाली कंजरवेटिव सरकार मौजूदा ढांचे को ध्वस्त करके दोबारा राष्ट्रीयकरण की व्यवस्था करेगी। भारत के लिए इसमें क्या सबक हैं? नेटवर्क वाले बुनियादी ढांचे में तयशुदा बुनियादी ढांचे पर राज्य का स्वामित्व ही सही तरीका है। निजीकृत रेल नेटवर्क के विभाजित ढंग से काम करने को ही ब्रिटिश रेल के निजीकरण की नाकामी की वजह माना जाता है। भारत को रेल, तेल एवं गैस पाइपलाइन तथा बिजली पारेषण लाइनों का मुद्रीकरण करते हुए इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। यदि भारत इस बात को ध्यान में रखे तो बेहतर होगा कि कुछ ही विकसित देशों ने उपयोगी नेटवर्क्स को निजी क्षेत्र को बेचने के तरीके का अनुसरण किया है। यूरोप में आमतौर पर ऐसा मॉडल अपनाया गया है जहां परिसंपत्ति स्वामित्व को सेवा प्रावधानों से अलग रखा गया और निजी नेटवर्क्स को परिचालन रियायत प्रदान की गईं। उस तरह देखें तो नियमित जरूरत का पूंजीगत व्यय संप्रभु संस्थान ने किया जबकि निजी क्षेत्र को परिचालन क्षमता से भरपाई की गई। भारत में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) के प्रबंधन की संस्थागत क्षमता की कमी है। दस से अधिक केंद्रीय मंत्रालय और 28 राज्य तथा आठ केंद्रशासित प्रदेश अपने-अपने तरीके से पीपीपी का संचालन कर रहे हैं और इस बीच औपचारिक रूप से ज्ञान की साझेदारी नहीं की जा रही। ब्रिटेन सन 1990 के दशक में पीपीपी की अवधारणा आने के बाद से ही उसके बेहतरीन व्यवहार का अगुआ रहा है और उसने कई समर्थक संस्थान विकसित किए जिनका दुनिया भर में अनुकरण किया गया। निजी फाइनैंस इनीशिएटिव, निजी फाइनैंस पैनल, इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस यूनिट और पाटर्नरशिप्स यूके आदि इसके उदाहरण हैं। भारत को पीपीपी के संस्थानीकरण को गंभीरता से लेना होगा और 3पी इंडिया के रूप में उस पीपीपी थिंकटैंक की स्थापना करनी होगी जिसकी घोषणा अरुण जेटली ने जुलाई 2014 के बजट में की थी। देश के पीपीपी कार्यक्रम में जो तनाव व्याप्त है उसके लिए नियामकीय आजादी की कमी भी एक वजह है। साहसी निर्णयों के लिए ऐसी आजादी आवश्यक है। पीपीपी को नियामकीय सहारे की आवश्यकता है। भारत की खुद की जरूरतें नवंबर 2019 की केलकर समिति की पीपीपी रिपोर्ट में शामिल की गई हैं। शायद भारत के नीति निमार्ताओं के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि दुनिया के सर्वाधिक परिपक्व बाजारों में भी निजी पूंजी को शामिल करने का प्रारूप अभी भी उभर रहा है और अनुभवों के आधार पर नया आकार ग्रहण कर रहा है। इसके लिए जरूरी है कि उच्च गुणवत्ता वाली संस्थागत क्षमता विकसित की जाए।

Published / 2022-07-01 13:36:33
बैंकों के निजीकरण के बीच उठते सवाल...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्री निवास राघवन)। क्या भारत में बहुत अधिक बैंक हैं? क्या भारत में बैंकों की संख्या बहुत कम है? आखिर एक देश में कितने बैंक होने चाहिए? भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को असल में इन सवालों पर गौर करना चाहिए, न कि किसी बैंक के स्वामित्व को लेकर फिक्रमंद होना चाहिए। लेकिन हम सब तो भारतीय हैं, लिहाजा आसानी से ध्यान भटकने की गुंजाइश बनी रहती है। शुरूआत दो महत्त्वपूर्ण आंकड़ों से करते हैं। उम्मीद है कि इन्हें देखने के बाद दिमाग को केंद्रित करने में मदद मिलेगी। पहला, भारत में ऋण एवं सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात 50 फीसदी के दयनीय स्तर पर है। भारत की समतुल्य अर्थव्यवस्थाओं में यह अनुपात 200 फीसदी से भी अधिक है। दूसरा, इस अनुपात का सीधा संबंध किसी भी देश में मौजूद बैंको की संख्या से है। इस तरह आखिरी बार गिनती के समय अमेरिका एवं चीन दोनों ही देशों में कार्यरत बैंकों की संख्या 4,000 से भी अधिक थी। लिहाजा न केवल ग्रामीण भारत में बैंकों की उपलब्धता कम है बल्कि समूची भारतीय अर्थव्यवस्था ही बैंकों की कमी का सामना कर रही है। वित्तीय क्षेत्र की हालत पर विचार के लिए गठित रघुराम राजन समिति ने वर्ष 2008 में ही कहा था कि हमें सैकड़ों नए बैंकों की जरूरत है। लेकिन यह राय 12 साल पहले की है। आज मेरी यही राय है कि भारत को कम-से-कम 1,000 नए बैंकों की जरूरत है। यह सुनकर गश खाने की जरूरत नहीं है। आज अर्थव्यवस्था का जो आकार है उसका दसवां हिस्सा रहते समय भी भारत में करीब 400 बैंक सक्रिय थे लिहाजा 1,000 बैंकों का आंकड़ा सुनकर अचरज करने की जरूरत नहीं है। इतने बैंक नहीं हुए तो अर्थव्यवस्था कभी भी उस तरलता स्तर को नहीं हासिल कर पाएगी जो हमारी सरकारों के स्वप्निल जीडीपी वृद्धि आंकड़ों को हासिल करने के लिए जरूरी होगा। इसी के साथ अर्थव्यवस्था सही तरह से औपचारिक ढांचा भी नहीं हासिल कर पाएगी। इसमें पैसे का प्रवाह तो होगा लेकिन वह अनौपचारिक क्षेत्र से होगा। इस वजह से अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी तमाम अंतर्निहित समस्याएं एवं कारण भी बने रहेंगे। दो बड़े सवाल : यह मुद्दा दो सवाल भी खड़े करता है। पहला सवाल यह है कि इन नए बैंकों का आकार कितना बड़ा होना चाहिए और दूसरा सवाल है कि इनका स्वामित्व किनके पास होना चाहिए? रघुराम राजन समिति ने इन दोनों ही सवालों के जवाब अपनी रिपोर्ट में दिए थे। समिति ने कहा था कि हमारे पास कुछ सौ छोटे बैंक होने चाहिए और उनमें से किसी भी बैंक का स्वामित्व किसी औद्योगिक घराने के पास तब तक नहीं होना चाहिए जब तक संबद्ध पक्ष (यानी उस औद्योगिक घराने से जुड़ी किसी संस्था) के साथ लेनदेन रोकने के सख्त सुरक्षा उपाय नहीं किए गए हों। दो वजहों से ऐसी अनुशंसा करना एकदम सही था। पहला, वर्ष 1969 में राष्ट्रीयकरण के पहले देश में 600 से अधिक बैंक मौजूद थे और उनमें से तमाम बैंक छोटे आकार के थे और वे मुख्यत: जिंसों के बदले स्थानीय स्तर पर उधारी बांटते थे। उस समय तमाम बैंकों का स्वामित्व बड़े औद्योगिक घरानों के पास हुआ करता था और वे अपने इस्तेमाल के लिए जमाकतार्ओं की रकम आसानी से इस्तेमाल कर सकते थे। इस तरह जमाकतार्ओं के लिए बहुत अधिक जोखिम होता था लेकिन इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला इन वजहों से नहीं किया था। राजन समिति ने यह नहीं बताया कि नए बैंकों का स्वामित्व औद्योगिक घरानों और सरकार के पास नहीं तो किसके पास होना चाहिए? सच तो यह है कि हमें अब भी इसका जवाब नहीं मालूम है। जब कोई समाज एवं सरकार वाणिज्यिक गतिविधि में किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती है तो यह सवाल बहुत मुश्किल हो जाता है। बेमानी शून्य-जोखिम : इससे एक सियासी सवाल भी खड़ा होता है जो आर्थिक क्रियाकलाप से भी जुड़ा है। हम जोखिम से बचने की राजनीतिक फितरत से कैसे छुटकारा पा सकते हैं? इसका संक्षिप्त उत्तर है कि वोटों के बेहद प्रतिस्पर्द्धी चुनावी बाजार में हमें इस छुटकारा मिला तो धीरे-धीरे ही मिलेगा। मसलन, एफडीआईएल विधेयक में जोखिम को करदाताओं से हटाकर जमाकतार्ओं पर लादने की कोशिश की गई लेकिन इसका पुरजोर ढंग से विरोध हुआ। अब उसका कोई नामलेवा नहीं है। वास्तव में यह एकदम वैसा ही है जैसा मुखर विरोध इन दिनों कृषि कानूनों का हो रहा है। किसान एक ऐसी आर्थिक गतिविधि में न्यूनतम मूल्य का आश्वासन चाहते हैं जो कि बैंकिंग की ही तरह मूल रूप से जोखिम भरी है। सार्वजनिक क्षेत्र अलग नहीं : हमें सबसे पहले यह बात याद रखनी होगी कि कांग्रेस शैली वाली फोन बैंकिंग यानी मंत्री जी का फोन आने पर बिना जांच-पड़ताल मोटा कर्ज देना बेहद जोखिम वाला काम था। बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का पुलिंदा बढ़ने से यह नजर भी आता है। इनमें से लगभग सारे कर्ज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बांटे हैं। यह बताता है कि स्वामित्व भी जमाकर्ताओं की लूट रोकने की गारंटी नहीं देता है। सार्वजनिक बैंकों को चलाने के नेताओं के तौर-तरीके और राष्ट्रीयकरण के पहले औद्योगिक घरानों के स्वामित्व वाले कुछ निजी बैंकों को चलाने के तरीके के बीच इकलौता फर्क यह है कि निजी बैंक के डूबने पर उसे बचाने के लिए करदाता नहीं थे। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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