एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिव कुमार मिश्रा)। भारत में बहुसंख्यक आबादी अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है लिहाजा ग्रामीण विकास को भारत की प्रगति की कहानी का पर्याय माना जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों का विकास हमेशा से हमारी प्राथमिकता में रहा है डिजिटलीकरण की शुरुआत के बाद ग्रामीण क्षेत्र समावेशी और संवहनीय विकास के दौर से गुजर रहे हैं। जन धन योजना जैसी योजनाएं ग्रामीण भारत में अत्यंत सफल रही हैं। कृषि की गतिविधियों का आधुनिकीकरण हो रहा है और इनमें पर्यावरण के अनुकूल तौर तरीके अपनाए जा रहे हैं। प्रौद्योगिकी से ग्रामीण विकास को बल मिला है। प्रौद्योगिकी समर्थित ग्रामीण विकास के लिए सरकारी योजनाएं:- 1. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी उन्नयन(तारा) - इस योजना को कौशल संवर्धन शिक्षा और विकास कार्यक्रम के तहत चलाया गया है ग्रामीण और अन्य पिछड़े क्षेत्रों में विज्ञान आधारित स्वयंसेवी संगठनों और क्षेत्रीय संस्थाओं को दीर्घकालिक बुनियादी समर्थन मुहैया कराने में इसकी अहम भूमिका है। यह योजना इन संस्थाओं को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी भवन केंद्रों और सक्रिय क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं के तौर पर बढ़ावा देती और पारितोषिक करती है ताकि यह आजीविका सृजन और सामाजिक लाभ के लिए प्रौद्योगिकीए समाधान और प्रौद्योगिकियों की प्रभावी डिलीवरी मुहैया करा सकें। 2. आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन - इसका उद्देश्य भारत की समेकित डिजिटल स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना के लिए जरूरी ढांचे का विकास है। यह स्वास्थ्य सेवा उद्योग में विभिन्न पक्षों के बीच दूरी को खत्म करने के लिए डिजिटल हाईवे का इस्तेमाल करती है। 3. आयुष्मान भारत स्वच्छ खाता (आभा) - इसके जरिए भागीदार स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के बीच सुरक्षित और ज्यादा प्रभावी ढंग से डिजिटल स्वास्थ्य कार्ड का आदान प्रदान किया जा सकता है। एबीडीएम में शामिल होने और डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड रखने के इच्छुक भी व्यक्ति को सबसे पहले अपना आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता बनाना होगा। व्यक्ति की पहचान और प्रमाणन के बाद उसकी सहमति से ही उसके स्वास्थ्य कार्ड को विभिन्न प्रणालियों और हित धारकों को मुहैया कराया जाता है। 4.ई श्रम - इस प्लेटफार्म को श्रम और रोजगार मंत्रालय ने उन असंगठित कामगारों के लाभ के लिए बनाया है। जो कर्मचारी राज्य बीमा निगम या कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के सदस्य नहीं हैं श्रमिक योजना में शामिल होने और ई श्रम कार्ड हासिल करने के अनेक लाभ हैं इसके जरिए सरकार के सामाजिक सुरक्षा के उपायों से कामगारों की मदद की जाती है। 5. राष्ट्रीय ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क - सभी राज्यों में राजधानियों जिला मुख्यालयों और प्रखंड स्तर तक ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी मुहैया कराई गई है। यह काम भारत संचार निगम लिमिटेड रेलटेल और पावर ग्रिड जैसे सार्वजनिक उपक्रमों के फाइबर ओके उपयोग से किया जा रहा है। 6. सार्वजनिक सेवा केंद्र - या डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत मिशन के तौर पर चलाई जा रही एक परियोजना है सीएससी आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के लिए पहुंच के बिंदु के तौर पर काम करता है गांवों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले नागरिक इसके जरिए समाज कल्याण स्वास्थ्य वित्त शिक्षा कृषि और व्यवसाय से संबंधित कार्यक्रमों और उपभोक्ता सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। इसको देशव्यापी नेटवर्क क्षेत्रीय भौगोलिक भाषाई और सांस्कृतिक विविधताओं की जरूरतों को पूरा करता है। 7. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम - यह देश को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और डिजिटल तौर पर सशक्त समाज में बदलने के लिए प्रमुख पहल है। इसमें तीन आवश्यक क्षेत्र सभी नागरिकों के लिए उपयोगिता के रूप में डिजिटल अवसंरचना मांग पर सेवाएं तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी के माध्यम से नागरिकों का सशक्तिकरण शामिल हैं। 8. डिजिटल इंडिया भूमिका रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम किस केंद्रीय योजना का उद्देश्य से जमीन के रिकार्डों की मौजूदा समानता ओं का इस्तेमाल कर एक शाम उचित है। समेकित भूमि सूचना प्रबंधन प्रणाली विकसित करना है इसमें विभिन्न राज्य अपनी विशेष आवश्यकताओं को भी जोड़ सकते हैं। (लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता व पलामू जिला प्रभारी हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ए. सानी)। वेदांता ग्रुप ने घोषणा की है कि वह भारत में सेमीकंडक्टर, डिस्पले उत्पादन इकाई और सेमीकंडक्टर असेंबलिंग-कम-टेस्टिंग सुविधा गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थापित करेगा। इस घोषणा ने दो वजहों से ध्यान खींचा है। निवेश की मात्रा (1.54 लाख करोड़ रुपये) और नई इकाई लगाने के लिए गुजरात का चुनाव, जबकि पहले महाराष्ट्र में लगाने के संकेत थे। तथापि, अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वेदांता ने ताईवान के हॉन हाइ टेक्नोलॉजी ग्रुप (फॉक्सकॉन) को बतौर साझीदार जोड़ा है। फिलहाल ताईवान दुनियाभर में सेमीकंडक्टर उत्पादन का धुरा है और कोविड महामारी से चिप्स आपूर्ति व्यवधान ने वैश्विक स्तर पर अनेकानेक उद्योगों का उत्पादन ठप कर दिया था। इस आपूर्ति शृंखला भंग और विभिन्न क्षेत्रों पर इसके असर ने दुनिया को सेमीकंडक्टर आपूर्ति में केवल एक-दो स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता की हकीकत से जगा डाला, चाहे यह कार हो या वॉशिंग मशीन में प्रयुक्त सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट। इसलिए मुख्य उपभोक्ता वस्तु निर्माताओं ने ताईवानी इकाइयों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने का मन बनाया। मौजूदा चिप डिजाइनिंग के डिसएग्रिगेटेड मॉडल और फैब्रिकेशन पर पुनर्विचार किया जा रहा है। जुलाई माह में, अमेरिका सरकार ने चिप्स (क्रिएटिंग हेल्पफुल इन्सेंटिव टू प्रोड्यूस सेमीकंडक्टर्स) एक्ट से अमेरिकी कंपनियों को 52 बिलियन डॉलर की सब्सिडी देकर सेमीकंडक्टर निर्माण, अनुसंधान एवं विकास प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया है। यूरोपियन यूनियन भी चिप उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना बना रही है। उधर दक्षिण कोरिया ने 540 बिलियन डॉलर सब्सिडी योजना से दुनिया में सेमीकंडक्टर निर्माण का मुख्य केंद्र बनाने की शुरुआत की है। भारत के सेमीकंडक्टर मिशन में सरकार चिप एवं डिस्पले निर्माण इकाइयों को 10 बिलियन डॉलर (76000 करोड़ रुपये) सब्सिडी देगी। निजी कंपनियों को उत्पादन इकाई स्थापित करने में आए खर्च का 50 फीसदी तक अनुदान मिल सकता है। भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण की यात्रा वर्ष 1974 में पंजाब से शुरू हुई थी, जब इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग ने महसूस किया कि देश के अंदर सेमीकंडक्टर डिजाइन और निर्माण होना चाहिए, पहले-पहल विदेशी मदद से सही। केंद्रीय मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बाद सेमीकंडक्टर कॉम्पलैक्स लिमिटेड (एससीएल) बनाना स्वीकृत हुआ। 1976 में विशेषज्ञ पैनल ने दो संभावित जगहें सुझाईं झ्र मोहाली और मद्रास। इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की तरजीह हवाई अड्डे की सुविधा वाले मद्रास पर थी। किंतु पंजाब के मुख्यमंत्री जैल सिंह को भनक लगी और उन्होंने प्रधानमंत्री पर जोर डालकर निर्णय मोहाली के पक्ष में करवा लिया। हालांकि इंदिरा गांधी ने इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अधिकारी अशोक पार्थसारथी को मुख्यमंत्री जैल सिंह को यह समझाने का काम सौंपा कि इस इकाई से पंजाब के स्थानीय लोगों को शायद ही रोजगार मिले क्योंकि इसमें बहुत अधिक प्रवीणता की जरूरत होती है। लेकिन जैल सिंह अड़े रहे और मोहाली को देश की पहली सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई मिली। इस परियोजना पर 15 करोड़ रुपये लगे थे और 1983 में उत्पादन शुरू हुआ, अमेरिका की माइक्रोसिस्टम्स इन्कॉपोर्रेशन से प्राप्त तकनीक से चिप्स बनने लगीं। लगभग उसी समय, एससीएल की तरह, किंतु स्वतंत्र सेमीकंडक्टर डिजाइन गतिविधियां भारत में शुरू हुईं। इसकी अगुवाई आईआईटी कानपुर से पढ़े प्रभाकर गोयल ने की थी, जिन्होंने अमेरिका में बतौर चिप डिजाइनर अच्छा-खासा नाम कमाया था। उनके स्टार्टअप गेटवे डिजाइन आॅटोमेशन (जीडीए) की विशेषज्ञता चिप्स उत्पादन में प्रयुक्त टेस्टिंग टूल वेरीलॉग बनाने में थी। इसने करोड़ों डॉलर्स की आमदनी करवाई और गोयल के ग्राहकों में जापान और ताईवान के उच्चतम चिप निर्माण उद्योग थे। चूंकि वेरीलॉग बनाने में कुछ कामों जैसे कि लाइब्रेरीज में बहुत श्रम खपता था, इसलिए उन्होंने इकाई भारत में स्थानांतरित करने की सोची और इंजीनियरों की एक छोटी टीम बनाकर 1985 में नोएडा में उत्पादन शुरू किया। चार साल बाद सिलिकॉन वैली, अमेरिका की कंपनी काडेन्स डिजाइन सिस्टम्स ने जीडीए का अधिग्रहण कर लिया, इसमें नोएडा वाली इकाई भी थी। इस तरह भारत में काडेन्स के रूप में अग्रणी कंपनी का आगमन हुआ। इसके बाद दो और सेमीकंडक्टर डिजाइन कंपनियों, टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स और एसटी माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स ने 1980 के दशक के आखिर में भारत में अपने दफ्तर खोले। आगे लगभग एक दशक में इंटेल समेत उच्चतम कोटि की 25 चिप्स डिजाइन कंपनियों में 17 ने भारत में केंद्र खोले और देश चिप्स डिजाइनिंग क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति बन गया। बढ़ती मांग पूरी करने हेतु अमेरिकी और यूरोपियन सेमीकंडक्टर कंपनियों ने भारतीयों की डिजाइन प्रतिभा और ताईवान में व्यापक स्तर की उत्पादन क्षमता का फायदा लेकर चिप्स निर्माण किया। लेकिन दूसरी ओर, भारत चिप्स उत्पादन में पिछड़ता गया क्योंकि एससीएल में उत्पादन तकनीक को अपग्रेड करने की प्रक्रिया के दौरान भयंकर आग लग गई। नए सिरे से सबकुछ बनाने में लंबा वक्त लगा और कंपनी पूरी तरह उबर नहीं पाई। हालांकि भारत पर लगे तकनीक-हस्तांतरण प्रतिबंध वाले काल के दौरान सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे कि अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में प्रयुक्त सेमीकंडक्टरों की आपूर्ति करती रही। अब भारत ने एससीएल को व्यावसायिक इकाई की तरह से चलाने का फैसला लिया है। किंतु इसके लिए धन, तकनीक और नेतृत्व प्रदान करने की जरूरत है। शुरुआत काफी पहले करने के बावजूद भारत सेमीकंडक्टर लहर का पूरी तरह फायदा उठाने से चूक गया। गैरवाजिब निवेश, कमजोर स्वदेशी मांग, वैश्विक धंधे की बदलती गतिशीलता इत्यादि से हम पिछड़ते गए। इस क्षेत्र में तकनीक बहुत तेजी से बदलती है और इससे कदम मिलाना एक सामरिक जरूरत है। वेदांता की प्रस्तावित इकाई 28 नैनो नॉड्स तकनीक पर आधारित होगी। इससे सीपीयू, ग्राफिक प्रोसेसर्स, नेटवर्क चिप्स, स्मार्टफोन्स, कार और इंटरनेट में प्रयुक्त होने वाली चिप्स बनाई जा सकेंगी। हालांकि ताईवान और दक्षिण कोरियाई कंपनियां पहले ही कहीं ज्यादा सूक्ष्म नॉड्स यानि 3 नैनोमीटर पर काम कर रही हैं। एससीएल ने काम 5 माइक्रॉन्स (5000 नैनोमीटर) से शुरू किया था और स्वदेशी संवर्धन तकनीक से 1.2 माइक्रॉन (1200 नैनोमीटर) करने की प्रक्रिया चली हुई थी, जब आग लगी। उस समय विश्व की अग्रणी चिप्स निर्माण इकाई केवल एक पीढ़ी आगे यानी 0.8 माइक्रॉन (800 नैनोमीटर) पर काम कर रही थी। अगले एक दशक से कम समय में एससीएल ने विदेशी तकनीक अपनाई और तकनीक-अंतर कम होता गया क्योंकि आरंभ से ही इसका अपना अनुसंधान एवं विकास विभाग बहुत सुदृढ़ था। इस विधा में किसी इकाई का खुद की तकनीकी क्षमता के बिना बाजार की दौड़ के मुताबिक चाल बनाए रखना संभव नहीं है। इसके लिए बहुत बड़े स्तर पर अनुसंधान एवं विकास पर निवेश की आवश्यकता होती है। फिलहाल वेदांता का प्रस्तावित संयुक्त उपक्रम अनुसंधान एवं विकास को लेकर खामोश है। अभी यह ज्ञान नहीं है कि क्या इसमें किसी तरह का तकनीक-हस्तांतरण है या नहीं। उम्मीद करें कि भारत दूसरी बार मौका नहीं चूकेगा। (लेखक विज्ञान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। आजादी के अमृतोत्सव पर युवाओं से ‘देश के अतीत और वर्तमान’ विषय पर संवाद कार्यक्रम में उर्सूलाइन इंटर कॉलेज के सभागार में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुरलीधर नंदकिशोर ने हमारी ढाई हजार से अधिक छात्राओं को आजादी के अमृत उत्सव पर जिस प्रकार से देश की स्थिति से अवगत कराया, इसके लिए मैं abnnews24.com का शुक्रगुजार हूं। श्री मुरलीधर ने बताया कि पुणे के एक स्कूल को जिस प्रकार विश्व श्रेष्ठ स्कूल में चयनित किया गया है, उससे मेरा भी मन प्रसन्नचित हुआ। उन्होंने जानकारी दी कि नयी शिक्षा नीति बच्चों को विशेष क्षेत्रों के विशेषज्ञ ने विमर्श और उद्बोधन को शामिल किया है। लेकिन मैं विगत 20 वर्षों से अधिक से विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को बुलाकर छात्राओं को हर क्षेत्र की जानकारी के लिये प्रयास करती रही हूं। इसी क्रम में आजादी के अमृत उत्सव पर हमने पूरे साल ऐसे कार्यक्रम को आयोजित कर 75 साल पर 75 कार्यक्रम का एक संकल्प लिया है। इस कार्यक्रम में देश के अतीत से लेकर अबतक के उतार चढ़ाव की पूरी जानकारी छात्रों को दी गयी। एनके मुरलीधर ने इस कार्यक्रम में बच्चों को पूरे मनोयोग और उनके सवाल का जवाब भी दिया। कार्यक्रम में श्री मुरलीधर ने कहा कि आज देश जहां है उससे आगे ले जाने की जवाबदेही हमारे युवाओं की ही है। देश में 30 वर्ष से कम उम्र के 50 फीसदी लोग है जो पूरी दुनिया में भारत को सबसे युवा आबादी के तौर पर साबित करता है। एक युवा देश आजादी के 75 साल बाद तमाम कठिनाईयों से जूझते हुए जहां खड़ा है उसके आगे एक भव्य भारत का दृश्य उपस्थित होता है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद देश ने जिस प्रकार बाहरी आक्रमण को झेला और एक जुट रहते हुए विकास के रास्ते पर बढ़ता गया उससे हमारी निष्ठा से दुनिया कायल हो गयी। भारत दुनिया का सबसे समृद्ध देश था इस बात को मानने में कोई कठिनाई नहीं है लेकिन आज फिर से उस स्थान को पाने का संघर्ष कर रहा है यह बात भी सही है। आजादी और सेक्यूलर राष्टÑ के रुप में जिस प्रकार भारत ने अपनी गरीबी से लड़ाई लड़ी वह पूरे दुनिया के लिये अध्ययन का विषय है। ऐसा नहीं है कि यह आर्थिक स्थिति हमें सहजता से मिल गयी। आजादी के समय हमारा पहला बजट मात्र दौ सो करोड़ का था जबकि रक्षा पर 50 करोड़ खर्च करना होता था। हमारी चीन से शर्मनाक हार से हमारा मनोबल गिर गया लेकिन 1971 कि पाकिस्तान पर जीत के बाद भारत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हर दशक हम कुछ न कुछ विकास करते रहें लेकिन हमारी मिश्रत अर्थव्यवस्था का प्रयोग 1990 में बुरी तरह से विफल हो गया। फिर हमारी देश की सरकार ने नयी आर्थिक नीति अपनाकर देश को मात्र दस साल में एक आर्थिक शक्ति में बदल दिया। हमने दुनिया की सबसे बड़ी सड़क परियोजना स्वर्णिम चतुर्भुज आरंभ किया गया। बैंकिंग सेवा को विश्व स्तरीय बना दिया गया। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, व्यापार, रक्षा, आइटी सहित हर क्षेत्र में विकास की गति तेज की गयी। आज का भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रुप में स्थापित हो चुका है। एक लंंबे समय तक देश गरीबी, युद्ध, हिंसा और अतंरराष्टÑीय षडयंत्र में उलझें रहने के बाद आज विश्व शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। आज हमारे युवाओं के लिये जो देश बना है उसमें सुपर पॉवर बनने की पूरी क्षमता है। इस कारण आज युवा पहले से अधिक दायित्वबोध वाले बुद्धिमान होने चाहिए। युवा छात्राओं के मन में उठते सवाल : सवाल : बेरोजगारी की सबसे लगातार बढ़ती जा रही है? जवाब : हम बेरोजगारी की बात क्यों करते हैं? हम रोजगार की बात करें। यह सही है कि एक बड़ी संख्या ऐसी है जो काम नहीं कर रही है लेकिन दूसरी ओर देश में योग्य लोगों का भी अभाव है जो संकेत कर रहा है बेरोजगारी से ज्यादा परेशानी हमें स्किल्ड युवाओं की कमी का है। आज बंगलूरं में 88 हजार युवाओं को एक शहर में 60 लाख से अधिक पैकेज मिला है अगर हम अपने करियर की तैयारी पूरी मेहनत से करते हैं तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया में भारतीय युवाओं की संभावना लगातार बढ़ रही है। सवाल : भ्रष्टाचार से पीड़ा होती है? जबाव- हां यह पीड़ा दायक है। लेकिन विकासशील देश में भ्रष्टाचार कैसे कम हो इस पर अतंरराष्टÑीय स्तर पर रिसर्च हो रहा है और काम हो रहा है। भ्रष्टाचार से समाज और देश कमजारे होता है। जैसे-जैसे समाज जागरुक होगा यह कम होता जा रहा है साथ ही आइटी के प्रयोग, सीधे पैसों के हंस्तातरण से भी स्थिति सुधरी है। सवाल : क्या धार्मिक उन्माद सही है? जवाब : नहीं धार्मिक उन्माद सही नहीं है। यह केवल एक राजनैतिक हथकंडा है। भारत की संस्कृति और समाज सहयोग की रही है। राजनीति में चुनाव जीतने के हथकंडा ही धार्मिक उन्माद को हवा देता है। लेकिन यह लगातार कम होता जा रहा है यह अलग बात है कि मीडिया में अधिकांश समय नकरात्मकता को महत्व दिया जाता है जिससे यह समस्या हमारे दिमाग में बैठ जाती है। अपराध एक मानसिकता है जिसे ्रकिसी धर्म से जोड़ा जाना गलत है। अपराधी किसी भी धर्म जाति या समुदाय का हो उसे सजा हो, समाज उसे सामाजिक दंड दे कानून उसे कानूनी दंड दे। सवाल : देश की राजनीति में अच्छे लोगों का अभाव है? जवाब : हां ऐसा है। लेकिन अब राजनीति में समाज के हर तबके के उच्च शिक्षा प्राप्त, अनुभवी और योग्य लोग आ रहें हैं साथ ही वे अनुभवी भी है। जैसे हमारे देश के रेल मंत्री अश्विणी वैष्णव आइआइटीयन हैं, प्रशासनिक अधिकारी रहे और अब फिर राजनेता बने वर्तमान में देश के रेल मंत्री है। देश में नयी शिक्षा नीति आ रही है जिससे हम कुछ बेहतर होने की उम्मीद कर सकते हैं। अशिक्षा तुलनात्मक कम हुई है। सकरात्मक सोच को बढ़ाने और नकरात्मक चिंता को कम करने समाप्त करने का एक बेहतर और सार्थक प्रयास। आजादी के अमृत काल पर सभी को शुभकामनाएं। (लेखिका उर्सूलाइन इंटर कॉलेज, रांची की प्राचाार्या हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नन्दकिशोर)। भारत की आबादी अभी भी बहुत युवा है और करीब 55 प्रतिशत लोग 30 वर्ष से कम आयु के जबकि 25 फीसदी आबादी 15 वर्ष से कम उम्र की है। देश की एक अरब से अधिक की श्रम योग्य आयु की आबादी के पास रोजगार और आर्थिक वृद्धि को लेकर जबरदस्त क्षमता और संभावना है। मैंने 19 वर्ष पहले आगाह किया था कि यह जनांकीय लाभ सही नीतियों के अभाव में विफल हो सकता है। तब से अब तक तमाम सरकारों की नीतियां और क्रियान्वयन के तरीके गलत या कमजोर रहे। इनमें एक कमजोर सार्वजनिक शिक्षा और कौशल व्यवस्था शामिल है। श्रम कानून जटिल हैं और रोजगार निर्माण के लिए मददगार नहीं हैं, विदेशी व्यापार और विनिमय दर नीतियां श्रम आधारित निर्यात और आयात प्रतिस्पर्धी घरेलू उत्पादन को हतोत्साहित करती हैं। बुनियादी ढांचा भी कमजोर है और वह उत्पादकता तथा संचार और नोटबंदी जैसे टाले जा सकने वाले नीतिगत झटकों को प्रभावित करता है। इस बात के प्रमाण बहुत बढ़ रहे हैं कि लाभांश का क्षय हो रहा है और यह युवा भारत के लिए खराब परिणाम ला सकता है। इसी समाचार पत्र में प्रकाशित एक आलेख में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के प्रमुख महेश व्यास ने कहा था कि विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 15 से 24 आयु वर्ग के युवाओं के लिए रोजगार दर 2020 में 23.2 फीसदी थी जबकि उत्तरी अमेरिका में यह 50.6 फीसदी, ओईसीडी देशों में 42 फीसदी, पाकिस्तान में 38.9 फीसदी और बांग्लादेश में 35.3 फीसदी थी। इन्हीं आंकड़ों से पता चला कि 15 से 24 की आयु के युवाओं की रोजगार दर भी 1994 के 43.4 प्रतिशत से कम होकर 2005 में 40.5 प्रतिशत और 2020 में 23.2 प्रतिशत हो गई। व्यास के मुताबिक विश्व बैंक राष्ट्रीय, आधिकारिक आंकड़ों पर भरोसा करता है और इन आंकड़ों में रोजगार की परिभाषा भी काफी शिथिल होती है। सीएमआईई के अपने आंकड़े कहीं अधिक सख्त परिभाषा पर यकीन करते हैं जो बताते हैं कि सभी आयु वर्ग के लिए रोजगार दर तेजी से गिरी और वह 2016-17 के 20.9 फीसदी से घटकर 2021-22 में 10.4 फीसदी रह गई। आइये अब बात करते हैं आधिकारिक आंकड़ों की जो राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय से लिये गये हैं। इस कार्यालय की स्थापना 2019 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय तथा केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के विलय से की गई थी। 2017-18 तक ये सर्वे हर पांच-सात वर्ष पर किये जाते थे। तब से इन्हें सालाना कर दिया गया। इस स्रोत से जारी ताजा आंकड़े 2020-21 के हैं तथा वे 15-29 वर्ष के लोगों का जिक्र करते हैं जो वास्तव में युवाओं की कहीं अधिक व्यापक परिभाषा है। इन आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार युवाओं में रोजगार की दर ने समय के साथ ऐसा ही रुझान दर्शाया है। यह 2004-05 के 53.3 फीसदी से गिरकर 2017-18 में और उसके बाद 30 फीसदी या उससे भी कम हो गई। कोविड से प्रभावित वर्ष 2020-21 में अवश्य इसमें थोड़ा सुधार नजर आया। इन्हीं आंकड़ों में खुली बेरोजगारी के आंकड़ों में परेशान करने वाली तेजी भी नजर आई और यह 2004-05 के पांच-छह प्रतिशत से बढ़कर 2017-18 और 2018-19 में 17-18 फीसदी हो गई। हालांकि 2019-20 और 2020-21 में इसमें कुछ कमी आई जिसकी वजह स्वरोजगार और कभी कभार श्रम करने वालों की तादाद में इजाफा मानी जा सकती है। यह बात शहरों की खुली बेरोजगारी से ग्रामीण इलाकों की छिपी बेरोजगारी को भी दर्शाती है क्योंकि कोविड के कारण लगे लॉकडाउन के बाद लाखों लोग अपने घरों को लौटे। इस जानकारी का श्रेय मेरी सहयोगी राधिका कपूर को है। इस बात पर जोर देना आवश्यक है कि युवाओं के लिए तेजी से बिगड़ते रोजगार संकेतकों में महिला श्रमिकों की स्थिति और भी खराब है। उदाहरण के लिए महिला श्रमिकों की रोजगार दर 2004-05 के 34.9 फीसदी से बिगड़कर 2017-18 में 13.5 फीसदी रह गई। शहरी महिला युवाओं में खुली बेरोजगार भी 2004-05 के 14.9 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 27.2 फीसदी हो गई। अगर आज के युवाओं के सामने रोजगार के अवसर नहीं हैं तो क्या भविष्य में बेहतर शिक्षा, कौशल और प्रशिक्षण के साथ रोजगार बाजार में आने वाले बच्चे-बच्चियों के लिए रोजगार के बेहतर अवसर हैं? आशा करना तो हमेशा बेहतर होता है लेकिन हमें एक नजर अपने सरकारी स्कूलों में शिक्षा की स्थिति पर भी डालनी होगी। प्रथम शिक्षा फाउंडेशन द्वारा जारी की जाने वाली सालाना शिक्षा रिपोर्ट सर्वे (असर) में भी यह जानकारी सामने आती है। हर वर्ष जारी की जाने वाली यह 500 से अधिक जिलों के 15,000 से ज्यादा गांवों के पांच लाख से अधिक बच्चों पर आधारित होती है। ऐसी पहली रिपोर्ट 2005 में जारी की गई थी और नवीनतम सर्वे कोविड के कारण स्कूल बंद होने के पहले यानी 2018 में की गई थी। 2019 में यह रिपोर्ट केवल युवा बच्चों की शिक्षा पर केंद्रित थी। साक्षरता को मापने के लिए असर ने एक सामान्य परीक्षा यह तय की थी कि कक्षा पांच के कितने बच्चे कक्षा दो की किताब पढ़ सकते हैं। 2008 में सरकारी स्कूलों में यह आंकड़ा 53.1 फीसदी था लेकिन 2018 में यह स्तर और अधिक गिरकर 44.2 फीसदी हो गया। यानी आधे से अधिक बच्चे इसमें नाकाम रहे। यह विडंबना ही है कि शिक्षा का अधिकार कानून के लागू होने के बाद इसमें और गिरावट आई। हालांकि बाद में कुछ स्थानों पर सुधार भी हुआ जिसमें हिमाचल प्रदेश, केरल, पंजाब और महाराष्ट्र आदि का प्रदर्शन बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से बेहतर है। इसी प्रकार बुनियादी गणित की परीक्षा में पांचवीं के बच्चों से सामान्य भाग करने को कहा गया। यहां भी सफल होने वालों का अनुपात 2008 के 34.4 फीसदी से घटकर 2018 में 22.7 फीसदी हो गया। इसका मतलब यह हुआ कि 2018 में सरकारी स्कूलों में कक्षा पांच के तीन चौथाई से अधिक बच्चे सही ढंग से सामान्य विभाजन को अंजाम नहीं दे पा रहे थे। यहां तक कि कक्षा सात के बच्चों में भी सफलता का प्रतिशत केवल 40 फीसदी था जबकि 2008 में यह 65 प्रतिशत था। तेजी से डिजिटलीकृत होते अलगोरिद्म, रोबोटिक्स, थ्रीडी प्रिंटिंग और कृत्रिम मेधा के इस दौर में भारत के युवाओं के सामने क्या संभावनाएं हैं? संक्षेप में कहा जाये तो हालात मुश्किल हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बात उन दिनों की है जब गीत, डायलॉग आदि सुनने के लिए टेपरिकॉर्डर पर कैसेट चलते थे। मेरे पास एक टेपरिकॉर्डर था और नए कैसेट खरीदने का शौक था। एक दिन जब मैं कुछ नये कैसेट खरीदने दुकान पर गया तो वहाँ टेपरिकॉर्डर पर फ़िल्मी कलाकारों की आवाज में कुछ डायलॉग वाला कैसेट प्ले हो रहा था। अशोक कुमार की आवाज में #चलो_झुमरीतिलैया....सुनाई दिया। मैंने दुकानदार से पूछा- अंकल, यह कौन सा कैसेट आया है, जिसमें हमारे शहर का नाम है? उन्होंने कहा- पूरा सुनो। फिर आवाज आई- तुमलोग मुझे वहां ढूंढ रहे हो और मैं तुम्हारा यहां इंतजार कर रहा हूं। अमिताभ की आवाज में दीवार का संवाद सुनकर मैं दंग रह गया। चूंकि अमिताभ की दीवानगी सर चढ़कर बोलती थी और एकदम हूबहू आवाज सुना तो चकित रह गया। दुकानदार ने कहा- ये राजू श्रीवास्तव हैं, किसी भी हीरो की आवाज निकाल लेते हैं। मैंने कैसेट खरीद ली और लगातार सुनता रहता था। फिर आया ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेन्ज। सिद्धू और शेखर सुमन के सामने राजू जी की कॉमेडी देखी। उनकी एक कॉमेडी शेयर करना चाहूंगा। उन्होंने कहा कि मान लीजिए आज से सौ दो सौ साल बाद जब धरती की खुदाई होगी तो आज की उपयोग वाली चीजें मिलेंगी। तब केवल सीडी मिलेंगे। लोग आपस में बात करेंगे, यह क्या है भाई? तो पुरातत्व वाले कहेंगे, यह उस ज़माने की थाली थी, लोग इसी में खाते थे। तब बाकी लोग पूछेंगे, इसके बीच में छेद क्यों है? तो पुरातत्व का अधिकारी बतायेगा कि उस समय का आदमी ऐसा ही था, जिस थाली में खाता था, उसी में छेद करता था। एक हास्य कलाकार की इतनी शानदार सोच के साथ हंसाने की अदा ने मुझे उनका मुरीद बना दिया। फिर मुझे उनकी स्टैंडअप कॉमेडी देखने का नशा छा गया। चाहे वह शोले के विभिन वर्जन की कॉमेडी हो, राजनेताओं की मिमिक्री हो या विवाह के दृश्य पर मस्ती या फिर बुफे पर उनकी कल्पनाशीलता। वे मेरी दिनचर्या में शामिल हो गये। जब यूट्यूब का दौर आया तो फिर कहना क्या, रोज उनकी एक कॉमेडी देखकर चार्ज होना आदत- सी हो गई। मैं देखता था, वे जब भी माइक पकड़ते, उनके हाथ कांपते थे। मैं कहता था, शायद कुछ कमजोर हो गये हैं। मगर यह नहीं जानता था, कमजोर वे नहीं, हम थे। क्योंकि उनकी नई कॉमेडी की हंसी के बिना रहना मुश्किल लग रहा है। पिछले डेढ़ महीने तक जब वे कोमा में रहे, कभी नहीं लगा रिकवर नहीं होंगे। कल दिनभर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती रही, मैं हिम्मत न जुटा पाया कुछ लिखने का। अटैच था उनसे। कल से आज तक मैंने अमिताभ का ट्वीट ढूंढा, मुझे मिला नहीं। पीएम सहित कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, अमिताभ का नहीं दिखा। हालांकि राजू जी हमारी रिप से बहुत ऊपर थे, मगर जिनकी नकल करके वे ख्यात हुए, उनकी श्रद्धांजलि तो बनती ही है। अफ़सोस कहीं दिखा नहीं। राजू जी एक कलाकार ही नहीं, हम सबके जीवन के खास अंग थे क्योंकि गमों पर उनकी कॉमेडी की गुदगुदाहट कैप्सूल का काम करती थी। हम उन्हें कोरम पूरा करने के लिए भावुक होकर श्रद्धा पुष्प अर्पित कर रहे हैं, मगर सच यह है कि राजू कभी मरा नहीं करते। नमन राजू भाई, आपकी हंसी के सत्य का प्रकाश सदैव फैला रहेगा। (साभार : मनोहर रुद्र पांडेय के फेसबुक वॉल से)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विष्णुदयाल राम)। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी ने नारी शक्ति एवं उसके महत्व को पहचानने का कार्य किया है और यही काल है कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने आठ साल के कार्यकाल में महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में कई कदम उठाया है और महिलाओं की आत्मनिर्भरता के लिए कई सौगात दी है। जन धन योजना से लेकर उज्जवला योजना तक महिलाओं को सशक्त कर रही हैं। तीन तलाक को खत्म करना महिला सशक्तिकरण की दिशा में क्रांतिकारी कदम माना जाता है। केन्द्र सरकार महिलाओं के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक उत्थान के लिए अनेक योजनाएं चला रही है। किन्तु बहुधा महिलाओं को इनके बारे में जानकारी नहीं हो पाती, ऐसे में तमाम महिलाएं इन योजनाओं का लाभ नहीं ले पा पाती हैं। इसी कारण सरकार ने एक नया कदम उठाया है, ताकि सभी महिलाओं को उनसे संबंधित योजनाओं की जानकारी मिल सके। उसके लिए "नारी" नामक एक पोर्टल बनवाया गया है। यह पोर्टल मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही बना था। तत्कालीन केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने 2 जनवरी, 2017 को नई दिल्ली में इसका शुभारंभ किया था। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से विकसित इस पोर्टल में केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा चलायी जा रही योजनाओं की पूरी जानकारी दी गयी है। इस पोर्टल में महिलाओं के कल्याण के लिए 350 सरकारी योजनाओं से संबंधित तथा अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध करायी गयी हैं, जिससे महिलाओं को लाभ होगा। सरकार महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर है। विकट परिस्थितियों में महिलाओं की सहायता के लिए 168 जिलों में वन स्टॉप सेंटर उपलब्ध हैं। संकट के समय महिलाएं इन केन्द्रों में जाकर अपने लिए सहायता की मांग कर सकती हैं। मोदी सरकार ने महिलाओं की प्रगति के लिए हर क्षेत्र का दरवाजा खोले रखा है। उनको उनकी प्रतिभा के अनुसार हर क्षेत्र में मौके दे रही है। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज न करायी हो। शिक्षा, खेलकूद, अंतरिक्ष, प्रशासनिक सेवा, व्यवसाय, रक्षा, विज्ञान, राजनीति आदि हर क्षेत्र में महिलाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। भारतीय सेना में महिलाओं की अब दमदार उपस्थिति दर्ज हो रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महिला सशक्तीकरण को लेकर प्रतिबद्ध हैं। वे मानते हैं कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता से ही देश आत्मनिर्भर बनेगा। महिलाओं के सुदृढ़ होने से ही मानवता को बल मिलेगा तथा समाज मजबूत होगा। मोदी सरकार ने महिलाओं के विकास को ही नहीं, बल्कि महिलाओं में नेतृत्व क्षमता के विकास का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस सरकार ने महिलाओं को यह मौका दिया है कि वे अपनी शक्ति को समझें तथा अपने बल पर आगे बढ़ें। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समय-समय पर महिलाओं को इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं। दरअसल, वे महिलाओं की शक्ति को समझते हैं तथा उसे बाहर निकाल कर देश के विकास में महिलाओं का योगदान चाहते हैं। हालांकि भारतीय संस्कृति में महिलाओं की भूमिका शुरू से ही रही है। कई महिलाओं ने अपनी क्षमता से हर क्षेत्र में प्रभावित किया है तथा देश को दिशा देने में अपनी भूमिका निभायी है। इस कारण भारतीय समाज के महिलाओं पर गर्व है। अब मोदी सरकार ने महिलाओं को स्वयं के संबंध में फैसले लेने के लिए प्रेरित किया है, ताकि नारी सशक्तिकरण का सही अर्थ सार्थक हो सके। नारी सशक्तिकरण में आर्थिक स्वतंत्रता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चाहे वो शोध से जुड़ी गतिविधियां हों या फिर शिक्षा क्षेत्र, महिलाएं काफी अच्छा काम कर रही हैं। कृषि के क्षेत्र में भी महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत पंजीयन में महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है। सरकार कन्या भ्रूण हत्या रोकने और महिला शिक्षा के लिए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना चला रही है। इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। कामकाजी महिलाओं के लिए नया मातृत्व लाभ संशोधित अधिनियम 1 अप्रैल, 2017 से लागू कर दिया है। इसके अंतर्गत कामकाजी महिलाओं के लिए वैतनिक मातृत्व अवकाश की अवधि 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दी गई है। साथ ही 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले संस्थान में एक निश्चित दूरी पर क्रेच सुविधा उपलब्ध कराना भी अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि महिलाएं अपने छोटे बच्चों को वहां छोड़ सकें। महिलाओं को मातृत्व अवकाश के समय घर से भी काम करने की छूट दी गयी है। सरकार गरीब परिवारों की महिलाओं को चूल्हे के धुएं से मुक्ति दिलाने और स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना चला रही है। इसके अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की महिलाओं को एलपीजी गैस कनेक्शन और चूल्हा निशुल्क दिया जाता है। सरकार, सुकन्या समृद्धि योजना के माध्यम से बालिकाओं के भविष्य को सुरक्षित करने का कार्य भी कर रही है। इस योजना के अंतर्गत जन्म से लेकर 10 साल तक की कन्याओं के खाते डाकघर में खोले जाते हैं। इन खातों में जमा राशि पर 8.1 प्रतिशत की दर से वार्षिक ब्याज देने का प्रावधान है। बेटियों की शिक्षा और समृद्धि की यह योजना अभिभावकों के लिए वरदान सिद्ध हो रही है। इतना ही नहीं, सरकार ने स्टैंड-अप इंडिया के अंतर्गत अपना व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए एक महिला को 10 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराने का नियम भी बनाया है। हर बैंक शाखा को महिलाओं को ऋण देना होगा। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत महिलाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए 11 लाख से अधिक महिलाओं को अलग-अलग तरह के कौशल में प्रशिक्षित किया गया है। सरकार महिलाओं को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए भी कार्य कर रही है। महिला सुरक्षा की दिशा में कई कदम सरकार ने उठाया है। यदि हम मोदी सरकार के आठ वर्षों की प्रगति रिपोर्ट पर नजर डालें, तो महिलाओं से जुड़ी कई नयी योजनाएं बनायी गयी हैं, जिसका सीधा लाभ समाज को मिल रहा है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह बड़ा कदम है। मोदी सरकार का यह कदम आधी आबादी को बराबरी का दर्जा दिलाने के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता को सिद्ध करता है। (लेखक पलामू लोकसभा क्षेत्र से भाजपा सांसद हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। बिल्ली प्रजाति के सभी जानवरों को जूलॉजिकली "फेलिस" या "पैंथेरा" कहते हैं। जैसे घरेलु बिल्ली को ल फेलिस डोमेस्टिकस, बाघ को पैंथेरा टाइग्रिस, तेंदूए को पैंथेरा पारडस, सिंह को पैंथेरा लियो, जगुआर को पैंथेरा ओंका। लेकिन चीता बेचारा विडालवंशी होते हुये भी जूलॉजिकल नाम के मामले में भी अलग थलग पड़ गया चीते को एसाइनोनिक्स जुबेटस कहा जाता है इसके नाम में न फेलिस है न पैंथेरा।ये आरक्षण से वंचित रहा। इनकी एक और रेयर किस्म की प्रजाति भी है जो गोल चित्ती के बजाय चौकोर गाढे, स्टाइलिश चित्ती वाली भी होती है ,पर इसे बहुत कम लोग जानते हैं ये खतियानी नहीं हो पाये। जहांगीर ने अपने किताब में नीली चित्तीदार चीते का भी उल्लेख किया है वो नस्ल होता तो आज परग्रही श्रेणी में आता? उसे भारतीय भी नहीं माना जाता। चीते के पास न 32 का खतियान था न कोई आरक्षण। इस पर आरोप लगा कि ये सबसे तेज दौड़ता है इसलिये इसे खतियान और आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। इस कारण से इसका शिकार लकड़बग्घे, शेर, जंगली कुत्ते और तो और गिद्ध ,सियार भी छीन लेते हैं। क्योंकि तेज दौड़ कर किसी को भी यह मार गिराता है, पर हांफ कर थक जाता है। अब उन नासपीटे राजा महाराजाओं को भी गरियाना चाहिये जिन्होंने निरीह शेर, चीते, बाघ को अपने लाव लश्कर समेत घेर कर बंदूक से मार मार कर खत्म कर दिया। इनके शवों के साथ फोटो खिंचवा कर महल के दीवारों पर तो ऐसे टांगे जैसे अकेले निहत्थे इन जानवरों को कुश्ती लड़ कर मार गिराये हों? अगर अकेले खाली हाथ इन शेर चीतों बाघों यहां तक कि सियारों से भी निबटते तो ढेरे राजा महाराजा लोगों की तस्वीरें दिवंगत होकर दीवार पर टंग जाती इस कैप्शन के साथ कि .... फलां जगल में गीदड़ से लड़ते हुये आदमचिल्ली बना कर फलां सियारों का निवाला बने। एक फोटू आजकल टीवी में देखते हैं कि फलां राजा ने भारत के आखिरी तीन चीतों का शिकार किया उसके बाद भारतमें चीते विलुप्त हो गये। राजा महाराजा भी विलुप्त हो गये पर मोदी जी के लिये एक एतिहासिक मौका भी बना गये। आज मोदी जी इन गैर खतियानी गैर आरक्षित चीतों को भारत में अफ्रिका से लाकर पुनर्वास करा रहे हैं। मैं बतौर एक संरक्षणवादी और प्रकृति प्रेमी मोदी जी के इस कदम से प्रसन्न हूं। मैं समझता था कि पीएम को कूटनीति, देश के विकास, देशी विदेशी शत्रुओं से निबटने में ही इतना ऊर्जा लगता होगा कि जंगल, प्रकृति, जीव जंतुओं, पर्यावरण के ऊपर उनका ध्यान कहां जाता होगा? पर मैं गलत था। अब विपक्ष और विरोधियों को वो राग अलापना शुरू करना चाहिये कि देश महंगाई, बेरोजगारी से परेशान है और ये अफ्रिका से तेज सबसे तेज दौड़ने वाला खादु चीता लाकर इवेंट करवा रहे हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्रीनिवास-राघवन)। मुफ्त उपहारों अर्थात ‘रेवड़ियों’ को लेकर चल रही मौजूद हल्की और राजनीतिक बहस मुझे सन 1992-1993 की याद दिलाती है जब सुधारों के बाद के शुरुआती वर्षों में भी ऐसी ही चर्चा उठी थी। राजीव गांधी द्वारा सन 1985-89 के दौरान किए गए भारी भरकम खर्च के बाद नरसिंह राव-मनमोहन सिंह की जोड़ी के पास खर्च को एकबारगी रोकने के लिए और कोई विकल्प ही नहीं बचा था। उन्होंने विभिन्न प्रकार की सब्सिडी में भारी कटौती की और तब कांग्रेस संकट में थी। उसके दो प्रमुख सदस्यों अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी ने तो पार्टी छोड़कर अपनी अलग पार्टी भी बना ली थी। उस वक्त वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि अगर समस्या उनकी वजह से है तो वह इस्तीफा देने को तैयार हैं। इस पर राव ने उनसे कहा था कि वह ऐसी मूर्खतापूर्ण बात न कहें। उस समय सुधारों को लेकर आये दिन संगोष्ठियां भी आयोजित होती रहती थीं। मुझे नहीं पता क्यों लेकिन ऐसे ही एक आयोजन में मुझसे मेरा विचार पूछा गया। मैंने कहा कि जवाब इस बात में निहित है कि जिन चीजों पर सब्सिडी दी जाती है उनमें कितनी पूंजी और तकनीकी गहनता है। मैंने कहा कि पूंजी और तकनीक की गहनता जितनी अधिक होगी सब्सिडी उतनी ही कम हो सकती है। भारत जैसे पूंजी की कमी वाले देश में जहां उत्पादन में बहुत अधिक पूंजी लगती है वहां चीजें आसानी से मुफ्त में नहीं दी जा सकती हैं। बिजली इसका उदाहरण थी। किसी चीज को मुफ्त या लगभग मुफ्त देना दिवालिया होने की दिशा में बढ़ाया गया कदम ही माना जा सकता है। मैंने कहा कि भारत दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहां उच्च पूंजी संसाधन वाली वस्तुओं पर सब्सिडी प्रदान की जाती है और कम पूंजी वाली वस्तुओं पर शुल्क वसूल किया जाता है। हालांकि किसी ने मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि यह एक पत्रकार की ओर से आई अजीबोगरीब सलाह थी। परंतु राजनेताओं की बात करें तो बीते 25 वर्षों के दौरान अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं पर से गैर जरूरी सब्सिडी कम करने की बात को व्यापक तौर पर स्वीकार कर लिया गया। यहां तक कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी जैसा दल भी थोड़ी बहुत हिचकिचाहट के बाद इस पर तैयार हो गया। सब्सिडी को उचित तरीके से कम करने की बात करें तो इस विषय में युवा स्तंभकार राजेश कुमार ने हाल ही में एक बहुत अच्छा लेख लिखा। उनका आलेख सुदीप्त मंडल और शताद्रु सिकदर द्वारा 2019 में पेश किए गये एक पर्चे पर आधारित था। कुमार ने कहा है कि खाद्य, प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, जलापूर्ति और सफाई जैसी चीजों पर सीमित सब्सिडी दी जा सकती है जबकि अन्य सभी सब्सिडी को अवांछित करार दिया गया। लेकिन अगर त्रासदी ही नहीं घटित हो तो भला लोकतंत्र कैसा? सन 2015 में अरविंद केजरीवाल का प्रादुर्भाव हुआ। उनका राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी अर्थव्यवस्था के लिए वही साबित हो रहा है जो भारतीय जनता पार्टी देश के सामाजिक सद्भाव के लिए। दोनों ने जानबूझकर सामान्य समझ को धता बताया है और राजनीतिक शक्ति का निर्मम इस्तेमाल किया है। इस दौरान उन्होंने दीर्घावधि में होने वाले संभावित असर के बारे में भी नहीं सोचा। वित्त मंत्री ने कुछ सप्ताह पहले संसद में कहा कि उनकी सरकार हर प्रकार की रेवड़ियों के खिलाफ नहीं है। क्योंकि शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसी चीजें हैं जो गरीब लोगों को नि:शुल्क मुहैया करानी होती हैं। मेरा सोचना है कि काश उन्होंने सब्सिडी कम करने की अपनी नीति के बचाव में दो और तत्त्व शामिल किए होते। कुछ ऐसा जो बीते 30 वर्षों से चल रहा है। उनमें से एक है तकनीक आधारित मानक और दूसरा पूंजी तैयार करने वाला मानक। पूंजी के निर्माण से मेरा तात्पर्य है ऐसी सामाजिक पूंजी जो नि:शुल्क शिक्षा और स्वास्थ्य से तैयार हो। यह कोई संयोग नहीं है कि उत्तर प्रदेश और बिहार को छोड़कर देश के सभी अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्य नि:शुल्क या बहुत सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य की आपूर्ति पर केंद्रित रहे हैं। यहां तक कि पश्चिम बंगाल भी बेहतर स्थिति में है। केजरीवाल ने दिल्ली में स्वास्थ्य और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करके एकदम ठीक किया है। परंतु उनके बजट को केंद्र से बहुत अधिक मदद मिली है। पंजाब में उनका प्रदर्शन कैसा रहता है इस पर नजर रखनी होगी।पूर्ण राज्यों की बात करें तो उनकी स्थिति एकदम अलग है। उनके पास इतना पैसा नहीं है और इसलिए वे कम खर्च करते हैं। उन्हें अफसरों और सब्सिडी पर भी खर्च करना होता है। उस लिहाज से देखा जाए तो मैंने जो दो रास्ते सुझाये उनमें भी विरोधाभास नजर आता है। यहां एक बात यह भी है कि क्या शिक्षण का काम उन शिक्षकों से कराया जाना चाहिए जिन्हें सरकार द्वारा अन्य काम भी सौंपे जाते हैं। उदाहरण के लिए वे चुनाव के दौरान चुनावी सेवा देते हैं उसके बाद सत्ताधारी दल के लिए काम करते हुए नजर आते हैं। इस विषय पर चर्चा करने की आवश्यकता है। आदर्श स्थिति में तो ऐसा नहीं होना चाहिए और शिक्षण का काम अनुबंधित शिक्षकों को सौंपा जाना चाहिए। अगर आप इस विषय में विचार करेंगे तो आप देखेंगे कि तकनीकी शिक्षा में भारी भरकम पूंजी लगती है और इसी से पूरे विषय को अच्छी तरह समझा जा सकता है क्योंकि कई ऐसी चीजें हैं जो अन्यथा काफी पूंजी की जरूरत वाली हो सकती हैं लेकिन सामाजिक पूंजी के कारण नि:शुल्क या भारी सब्सिडी वाले प्रावधान भी उपयोगी नजर आते हैं। विभिन्न आईआईटी इसके उदाहरण हैं। देश के आईआईटी संस्थानों में शिक्षा नि:शुल्क नहीं है, लेकिन अन्य देशों की तुलना में वहां पढ़ना फिर भी काफी सस्ता है। इसका नतीजा क्या रहा है? इन संस्थानों ने देश को बहुत गर्व का अनुभव कराया है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय)। भूपेंद्र चौधरी 1989 से 1991 में राम जन्मभूमि आंदोलन में विश्व हिंदू परिषद में सक्रिय रहे। 1991 में भाजपा में शामिल होने के बाद सक्रिय राजनीति शुरू की तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। चौधरी बीते 31 सालों से लगातार संगठन और सरकार में किसी ना किसी दायित्व पर रहे हैं। उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी हालांकि अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही चुनौतियों का सामना करते रहे हैं लेकिन मिशन-2024 को सफल बनाने की जिम्मेदारी उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि भूपेन्द्र चौधरी की काबलियत को आलाकमान ने पहचान कर ही उन्हें यह पद सौंपा है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को नया अध्यक्ष मिला यह तो औपचारिकता थी, लेकिन सबसे खास बात यह रही कि भाजपा आलाकमान की सोच तक कोई नेता या मीडिया कर्मी पहुंच नहीं सका। संभवतः मीडिया में जो नाम चल रहे थे, उसमें से कोई भी या तो शीर्ष नेतृत्व की कसौटी पर खरा नहीं उतरा अथवा आलाकमान की लिस्ट में यह नाम होगा ही नहीं। दिल्ली के तख्त पर 2024 में तीसरी बार मोदी की ताजपोशी करने के लिए यह जरूरी था कि उत्तर प्रदेश में सियासी गोटियां कायदे से बिछाई जाएं। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मोदी को दो-दो बार पीएम बनाने में उत्तर प्रदेश की बड़ी भूमिका रही थी। तीसरी बार भी यूपी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। 80 लोकसभा सीट वाले उत्तर प्रदेश में 2014 और उसके बाद जितने भी चुनाव हुए जनता ने बीजेपी की झोली वोटों से भर दी थी। 2024 के आम चुनाव में भाजपा अपना सौ फीसदी परफॉरमेंस देना चाहती है। वैसे पार्टी के लिए 2014 के बाद से यूपी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी साबित हो रही है, लेकिन उसे चिंता इस बात की भी है कि कहीं वोटों का अंडा देने वाली मुर्गी वोट रूपी अंडे देना बंद नहीं कर दे। ऐसा न हो इसीलिए भाजपा आलाकमान ने काफी सोच विचार के बाद योगी सरकार के पंचायतीराज मंत्री और पश्चिमी यूपी के बड़े जाट नेता भूपेंद्र सिंह चौधरी को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। चौधरी की नियुक्ति से ना केवल पश्चिमी यूपी में भाजपा को मजबूती मिलेगी बल्कि इसके अलावा उसके इस फैसले से जाट वोट बैंक का रुझान भी भाजपा की तरफ बढ़ सकता है। शीर्ष नेतृत्व ने लगातार दूसरी बार पिछड़े वर्ग से प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर पश्चिम से पूर्वांचल तक पिछड़े और अति पिछड़े वोट बैंक को भी साधे रखने की कोशिश की है। चौधरी भले ही भाजपा के 14वें प्रदेश अध्यक्ष हों, लेकिन पहले ऐसे जाट नेता जरूर बन गए हैं जिसने यूपी में भाजपा की कमान संभाली है। भाजपा ने पहली बार किसी जाट नेता को संगठन की कमान सौंपी है। 54 वर्षीय भूपेंद्र चौधरी का जन्म मुरादाबाद के महेंद्री सिकंदरपुर गांव में हुआ था। चौधरी की जाट समाज के साथ पश्चिमी यूपी में गुर्जर, ब्राह्मण, त्यागी समाज में मजबूत पकड़ है। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले जाटों के आरक्षण आंदोलन और कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन के समय चौधरी ने पश्चिमी यूपी में जाट समाज के साथ किसानों के बीच सरकार की बात पहुंचाकर संकट मोचक की भूमिका भी निभाई थी। जानकारों का मानना है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के करीबी भूपेंद्र चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से पार्टी को लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में जाट वोट बैंक को साधने में आसानी होगी। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी को प्रदेश अध्यक्ष के रूप में एक अनुभवी और कद्दावर नेता के साथ ऐसे नेता की तलाश थी जो वोट बैंक के लिहाज से भी मुफीद हो। साथ ही सरकार और संगठन में तालमेल बनाने के साथ आरएसएस और विचार परिवार के संगठनों की अपेक्षाओं पर भी खरा उतर सकता हो। प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर विभिन्न दावेदारों के बीच तीन चार महीने से चलती अध्यक्ष पद की दौड़ के बीच पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और संघ ने चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए सबसे उपयुक्त माना। उल्लेखनीय है कि भाजपा के निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह का तीन वर्ष का कार्यकाल 16 जुलाई को समाप्त हो गया था। स्वतंत्र देव ने 27 जुलाई को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद से ही प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर लखनऊ से दिल्ली तक चर्चाओं और अटकलों का दौर चल रहा था। भूपेंद्र चौधरी 1989 से 1991 में राम जन्मभूमि आंदोलन में विश्व हिंदू परिषद में सक्रिय रहे। 1991 में भाजपा में शामिल होने के बाद सक्रिय राजनीति शुरू की तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। चौधरी बीते 31 सालों से लगातार संगठन और सरकार में किसी ना किसी दायित्व पर रहे हैं। 1993 में मुरादाबाद में भाजपा की जिला कार्यकारिणी के सदस्य बनाए गए। 1996 में भाजपा के जिला कोषाध्यक्ष और 1998 में मुरादाबाद के जिलाध्यक्ष बनाए गए। चौधरी ने 1999 के लोकसभा चुनाव में संभल सीट से सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के सामने चुनाव भी लड़ा था। 2006 में चौधरी भाजपा के पश्चिम क्षेत्र के क्षेत्रीय मंत्री बने। 2012 से 2017 तक उन्हें लगातार तीन बार पश्चिम क्षेत्र का क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया गया। उल्लेखनीय है कि पार्टी में जिलाध्यक्ष, क्षेत्रीय अध्यक्ष या प्रदेश अध्यक्ष पद का दायित्व अधिकतम दो बार मिलता है लेकिन चौधरी को तीन बार क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया गया। 2016 में भूपेंद्र चौधरी विधान परिषद सदस्य निर्वाचित हुए। 2017 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने पर उन्हें योगी मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाते हुए पंचायतीराज विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। 2019 में उन्हें पदोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 2022 विधानसभा चुनाव के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार 2.0 में चौधरी को पुनः कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 13 जून 2022 को चौधरी पुनः विधान परिषद सदस्य निर्वाचित हुए हैं। भाजपा में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत है। लिहाजा प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद उन्हें प्रदेश सरकार के पंचायतीराज मंत्री के पद से इस्तीफा देना होगा। भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी ने अपनी रणनीति का खुलासा करते हुए कहा कि वह पार्टी और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के अनुसार काम करेंगे। उत्तर प्रदेश में भाजपा का संगठन बूथ स्तर तक खड़ा है इसलिए 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों पर भाजपा जीतेगी। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चौधरी ने कहा कि बहुत से ऐसे कार्यकर्ता थे जो उनसे ज्यादा अच्छा काम कर सकते थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें मौका दिया है, विश्वास जताया है। उन्होंने कहा कि वह पार्टी नेतृत्व की अपेक्षाओं के अनुसार काम करेंगे। उन्होंने कहा कि 2014, 2017, 2019 और 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपार सफलता मिली है। भाजपा को ओर आगे ले जाने के लिए काम करेंगे। उन्होंने कहा कि भाजपा में असंख्य कार्यकर्ता हमेशा चुनाव के मोड़ में रहते हैं। कार्यकर्ताओं ने मेहनत से अच्छे परिणाम दिए हैं।
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