श्याम कुमार पाण्डेयएबीएन एडिटोरियल डेस्क। कोविड ने फिर से दस्तक दे दी है। पिछले तीन हफ्तों में चीन में लगभग 25 करोड़ लोग संक्रमित हुए हैं। लाखों लोगो की मृत्यु के समाचार आ रहे हैं। हर तरफ त्राहि-त्राहि मची है। जापान, कोरिया, फ्रांस, जर्मनी आदि में भी रोज लाखों लोग संक्रमित हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि पिछले दो भयावह वर्षों की पुनरावृत्ति होने को है। पूरा विश्व सहमा हुआ है पर भारतवासी लगभग सामान्य जीवन जी रहे हैं और देशों के आंकड़ों के सामने, हमारे यहां संक्रमितों की संख्या मात्र कुछ सौ और हजार में है। यहां ऐसा लगता है जैसे कि देश में कोविड पूरी तरह से समाप्त हो गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के कोविड डैशबोर्ड के अनुसार 26 दिसंबर को देश में संक्रमित लोगों की संख्या मात्र 3428 थी। इसकी तुलना में विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में 25 दिसंबर को समाप्त हुए हफ्ते में ही 35 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए।यह क्या संयोग मात्र है कि हम आज इतनी बेहतर स्थिति में हैं या यह भारत सरकार का कुशल प्रबंधन है, जिसने सदी की सबसे भयावह महामारी से डटकर लोहा लिया और देश को एक बड़े खतरे से बचा लिया? याद कीजिये 2020 के वे शुरुआती दिन जब बीबीसी जैसे विदेशी मीडिया संस्थान यह भविष्यवाणी कर रहे थे की भारत इस विपदा से निपट नहीं पायेगा। लाशों के अंबार लग जायेंगे। शायद उनके जहन में 2014 से पहले का भारत था। पर जिस तरह से भारत ने अपने संसाधनों को विकसित किया, अत्यंत कम समय में अत्यंत प्रभावी वैक्सीन बनायी और न केवल देश में 220 करोड़ डोज सफलतापूर्वक और कुशल प्रबंधन से लगायी बल्कि दुनिया के अनेक देशों में भी वैक्सीन-मैत्री के माध्यम से अनेक जिंदगियां बचाईं।इसने पूरे विश्व को हतप्रभ कर दिया। देशवासियों को विश्वास हो गया कि ऐसी महामारी में भी हम सुरक्षित हैं और इसी विश्वास ने न केवल देश की सामान्य जिंदगी को बल्कि अर्थव्यवस्था को भी तेजी से पटरी पर वापस लौटाने में बड़ी भूमिका निभायी।आज यही विश्वास है जो हमें सुरक्षित रखे हुए हैं और इस विश्वास के पीछे है भारत का असीम अनुभव और कुशल नेतृत्व। अपने पिछले तीन वर्षो के अनुभव और संघर्ष की वजह से हम पहले से कही ज्यादा तैयार हैं। हमारी वैक्सीन दुनिया की सबसे प्रभावी वैक्सीन में से एक है। अमेरिका में व्हाइट हाउस के मुख्य चिकित्सीय सलाहकार डॉ फॉची का तो यह कहना है कि भारत की कोवैक्सीन कोविड के 617 वैरिएंट को निष्क्रिय करने में सक्षम है।ज्ञात हो कि देश के 90 फीसद लोगों को देश में बनी वैक्सीन की डबल डोज लग चुकी है। प्रसिद्ध डॉक्टर देवी शेट्टी के अनुसार देश के 90 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं जिसकी वजह से हममें अच्छी हाइब्रिड इम्यूनिटी विकसित हो गयी है, जो कि कोरोना के किसी भी रूप के विरुद्ध हमारा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। पर इसके साथ ही हमारा स्वास्थ्यगत ढांचा भी आज 2020 की तुलना में कही अधिक मजबूत है। अब देश में पहले की तुलना में अधिक हॉस्पिटल बेड, सैकड़ों गुना अधिक ऑक्सीजन युक्त बेड हैं। महामारी के लिए चिह्नित आइसोलेशन बेड तो पहले के 10,180 की तुलना में अब 18 लाख से ज्यादा हैं। इसी तरह से आईसीयू बेड की संख्या भी सैकड़ों गुना बढ़ गई है। पीपीटी किट, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर आदि अब सभी देश में ही तैयार हो रहे हैं और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। टेस्टिंग सेंटर भी अब पहले के 30 हजार प्रतिदिन की जगह 20 लाख टेस्ट प्रतिदिन करने में सक्षम हैं।आज भी जहां देश में लगभग 90 हजार वैक्सीनेशन और 35 हजार टेस्ट प्रतिदिन हो रहे हैं और देश भर का पूरा डेटा संभल कर रखा जा रहा है और अब ऐतिहातन भारत सरकार के निर्देशानुसार देश के सभी एयरपोर्ट और सार्वजनिक स्थानों पर यादृच्छिक (रैंडम) टेस्टिंग शुरू हो गयी है वहीं प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार संक्रमित व्यक्तियों के सैंपल की जिनोम टेस्टिंग भी करायी जा रही है जिससे नये बीएफ 7 वैरिएंट का पता चल सके।सरकार की यह सामायिक पहल देशवासियों के लिए भी संकेत है कि जहां हम भले ही शेष दुनिया के तुलना में बहुत बेहतर स्थिति में हों, हमें फिर भी सावधानी रखने की पूरी जरूरत है। भले ही हमारी प्रतिरोधक क्षमता अब बहुत बढ़ गयी है और देश में कोरोना लगभग पूरी तरह से समाप्त हो गया है, फिर भी बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है। देशवासियों को सरकार के निर्देशों का पालन करना चाहिए, अगर बूस्टर डोज नहीं लगवाई है, तो लगवाना चाहिए। सार्वजानिक स्थानों पर मास्क का उपयोग अनिवार्यतः करना चाहिए।हमारा तीन सालों का अनुभव, हमारे मेहनती स्वास्थ्यकर्मी, हमारा पहले से कहीं बेहतर स्वास्थ्य तंत्र और सबसे ऊपर हमारे अभिभावक स्वरूप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कुशल नेतृत्व हमें इस बात की गारंटी देता है कि अब पहले जैसे किसी भी दुःस्वप्न की पुनरावृत्ति नहीं होगी। फिर भी हमें एक बार फिर से याद रखना और दोहराना होगा- दो गज दूरी, मास्क है जरूरी...। इसके पहले भी कई प्रसंगों में मोदी जी ने मिसाल के रूप में विश्व को बता दिया है। हर संकट या चुनौतियों को अवसर में परिवर्तित करने का मादा वो रखते हैं। इस संकट से बाहर आकर पूरे विश्व को उन्होंने यही संदेश दिया है-नहीं रुकेंगे बढ़े कदममंजिल पर ही लेंगे दम(लेखक, भारतीय जनता पार्टी के निवर्तमान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
डॉ राजेन्द्र प्रसाद शर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्व की प्रमुख डिक्शनरियां हर साल शामिल किये गये प्रमुख शब्द जारी करती हैं। यह शब्द दुनिया की हकीकत बयां करने के लिए काफी होते हैं। इसको साल के पहले नंबर के एक शब्द से ही नहीं आंका जा सकता। साल के अन्य शब्दों को भी देखना होता है। इनसे साफ हो जाता है कि दुनिया जा किधर रही है। लोगों में क्या हलचल है। सकारात्मकता या नकारात्मकता कहां तक पहुंच रही है। इनमें भविष्य का संदेश छिपा होता है। साल 2022 के प्रमुख शब्द गैसलाइटिंग हो या परमाक्राइसिस या कीव हो या पार्टीगेट, कोविड हो या वार्महाउस यह सभी शब्द प्रमुख शब्दों के रूप में चयनित किये गये हैं। यह वैश्विक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं।ब्रिटेन के अंग्रेजी शब्दकोष कोलिन्स द्वारा इस वर्ष के लिए घोषित वर्ड ऑफ द ईयर परमाक्राइसिस हो या अमेरिका की डिक्शनरी मेरियम वेबस्टर का गैसलाइटिंग। इन दोनों से आज की दुनिया के हालात साफ हो जाते हैं। यह कोई शब्दमात्र नहीं हैं। यह अनिश्चितता और असुरक्षा की भावना घर कर रहे लोगों की मनोदशा को दर्शाते हैं। परमाक्राइसिस परमानेंट और क्राइसिस दो शब्दों से बना लगता है। साफ है कि परमानेंट के मायने स्थाई है तो क्राइसिस का अर्थ है संकट। इसी तरह से गैसलाइटिंग भी दरअसल व्यक्ति के मानसिक रूप से कुंठाग्रस्त और हीनभावना की ओर इंगित करता है। दोनों ही डिक्शनरियों द्वारा खोजे गये साल के प्रमुख दस शब्द हालात की गंभीरता को दर्शाते हैं। कहीं दूर-दूर तक आशा की झलक दिखायी ही नहीं देती। दुनिया के देश आज जिस हालात से दोचार हो रहे हैं, यह उसी को दर्शाते हैं। ब्रिटेनका यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला ब्रेक्जिट हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो। जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते हालात हों या दुनिया के देशों के सामने अर्थव्यवस्था का संकट। साल 2023 में भी इन संकटों से मुक्ति आसान नहीं दिख रही।फ्रांसीसी दार्शनिक एडगर मोरिन की माने तो दुनिया इंटरलॉकिंग के दौर में जा रही है। लाख प्रयासों के बावजूद कोरोना से पूरी तरह से मुक्ति नहीं मिली है। ब्रिटेन में ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद अभी हालात ज्यादा अच्छे नहीं हैं। कोरोना के बाद संकट का जो दौर आया उसके बाद भी आतंकवाद में कोई कमी नहीं आयी है। एक-दूसरे देशों के प्रति वैमनस्यता भी कम नहीं हो रही है। लोगों को लगने लगा है कि दुनिया अब ऐसे संकट के दौर से गुजर रही है जिसका स्थायी समाधान निकट भविष्य में दिख नहीं रहा।कोलिंस द्वारा इस साल सामने लाए गए अन्य शब्दों में कीव है। इसके अलावा दूसरा शब्द पार्टीगेट है। इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जानसन द्वारा जून 20 को कोविड पाबंदियों के बावजूद जन्मदिन की पार्टी करना और उसके बाद के हालातों से पार्टीगेट शब्द चल निकला है। इसी तरह से स्पोर्ट्सवाकिंग शब्द प्रमुख दस शब्दों में शुमार है। वार्मबैंक का चलन भी काफी रहा। यह जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में हो रहे बदलाव से चिंतित दुनिया की पीड़ा व्यक्त करता है। खास बात यह है 2022 में सामने आए दस प्रमुख शब्दों में से निराशा से आशा का संचार करता एक भी शब्द सामने नहीं आया है। इससे स्वतः ही आज की दुनिया के हालात बयां हो जाते हैं।1938 में जब पहली बार पैट्रिक हैमिल्टन द्वारा लिखित नाटक गैसलाइटिंग खेला गया होगा तब इसकी कल्पना नहीं की गई होगी। इस नाटक पर दो फिल्में बन चुकी हैं। गैसलाइटिंग कोई गैस जलाने वाला लाइटर नहीं होकर मानसिक व मनोवैज्ञानिक रूप से अंदर तक जला देने वाली क्रिया हैं। होना तो यह चाहिए कि कोई व्यक्ति मानसिक या सामाजिक रूप से कमजोर है तो उसे संबल दिया जाए पर होने लगा उल्टा है। 21 वीं सदी में यह सब होना किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता। प्रतिस्पर्धा का दौर ऐसा चल निकला है कि दूसरे को नीचा दिखाना हमारी आदत में आ गया है। यह सब तब है जब अभी हम कोरोना के संकट से पूरी तरह से निजात नहीं पा सके हैं। कोरोना का नया वेरियंट सामने हैं। चीन में हालात बदतर होते जा रहे हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
डॉ वेदप्रताप वैदिकएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत से अंग्रेजों को विदा हुए तो 75 वर्ष हो गये लेकिन भारत के भद्रलोक पर आज भी अंग्रेजी सवार है। देश का राज-काज, संसद का कानून, अदालतों के फैसलों और ऊंची नौकरियों में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। ज्यों ही इंटरनेट, मोबाइल फोन और वेबसाइट का दौर चला, लोगों को लगा कि अब हिंदी और भारतीय भाषाओं की कब्र खुद कर ही रहेगी।ये सब आधुनिक तकनीकें अमेरिका और यूरोप से उपजी हैं। वहां अंग्रेजी का बोलबाला है। ये तकनीकें भारत में भी तूफान की तरह फैल रही थीं। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे लेकिन मोबाइल फोन, इंटरनेट या वेबसाइटों का इस्तेमाल करना चाहते थे, उन्हें मजबूरन अंग्रेजी (कामचलाऊ) सीखनी पड़ती थी लेकिन भारत के भद्रलोक को अब पता चला है कि उल्टे बांस बरेली पहुंच गये हैं। हिंदी के एक अखबार ने जो ताजातरीन सर्वेक्षण छापा है, वह भारतीय भाषा प्रेमियों को गदगदायमान कर रहा है। उसके अनुसार देश के 89 प्रतिशत लोग स्वभाषाओं का प्रयोग करते हैं।अंग्रेजी लिखने, बोलने, समझनेवालों की संख्या देश में सिर्फ 12.85 करोड़ यानी मुश्किल से 10 प्रतिशत है। सिर्फ ढाई लाख लोगों ने अपनी मातृभाषा अंग्रेजी बता दी है। कितने शर्म की बात है कि हमारे देश में इन ढाई लाख लोगों की मातृभाषा भारत के 140 करोड़ लोगों की दादीभाषा बनी हुई है? लेकिन खुशी की बात यह है कि 90 के दशक में इंटरनेट की 80 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में होती थी, अब वह 50 प्रतिशत के आस-पास लुढ़क गई है यानी लोग स्वभाषाओं का इस्तेमाल बड़ी फुर्ती से बढ़ाने लगे हैं।इंटरनेट ने अनुवाद को इतना सरल बना दिया है कि आप दुनिया की प्रमुख भाषाओं की सामग्री कुछ क्षणों में ही अपनी भाषा में बदल सकते हैं। अनुवाद का उद्योग आजकल अकेले भारत में 4.27 लाख करोड़ रुपये का हो गया है। जाहिर है कि भारत में सिर्फ विदेशी भाषाओं से ही देशी भाषाओं में अनुवाद नहीं होता, स्वदेशी भाषाओं में भी एक-दूसरे का अनुवाद होता है। भारत में दर्जनों भाषाएं हैं, इसीलिए यह दुनिया का सबसे बड़ा अनुवाद उद्योग घराना शीघ्र ही बन जायेगा। इससे भारत की एकता सबल होगी और पारस्परिक भाषाई विद्वेष भी घटेगा।भारत की फिल्में भारत में ही नहीं, पड़ोसी देशों में भी बड़े उत्साह से देखी जाती हैं। यदि उनका रूपांतरण भी उनकी भाषाओं में सुलभ होगा तो इन सब देशों की एकता और सांस्कृतिक समीपता में वृद्धि होगी। भारतीय जनता को भी पड़ोसी देशों के अखबारों और फिल्मों का लाभ इस अनुवाद प्रक्रिया के जरिए जमकर मिलता रहेगा। यदि संपूर्ण दक्षिण और मध्य एशिया के देशों में हम भाषाई सेतु खड़ा कर सकें तो कुछ समय में ही हम संपूर्ण आर्यावर्त्त क्षेत्र को यूरोप से अधिक संपन्न और शक्तिशाली बना सकते हैं। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)
सुरेश हिन्दुस्थानीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह यात्रा नफरत नहीं सद्भाव के लिए है, लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस के लिए अब सद्भाव की बातें केवल नारा ही बनकर रह गई हैं। यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, ठीक वैसे ही यात्रा का उद्देश्य भी सामने आता जा रहा है। हालांकि यात्रा के प्रथम दिन से ही ऐसे लोगों को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है, जो किसी न किसी रूप में देश की संस्कृति के लिए विरोधात्मक रवैया अपनाते रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा में कभी देश तोड़ने के समर्थक शामिल होते हैं, तो कभी वामपंथी एजेंडा के तहत राजनीति करने वाले राहुल गांधी के साथ चलते दिखाई देते हैं। जहां तक सद्भाव की बात है तो यह शब्द भारत के लिए नया नहीं है और न ही इसे कांग्रेस की उपज कहा जा सकता है। लेकिन यह भी सत्य है कि कांग्रेस ने अपनी नीतियों के माध्यम से हमेशा हिन्दू समाज मानबिंदुओं पर कुठाराघात ही किया है, चाहे वह राम मंदिर का मामला हो या फिर सांप्रदायिक हिंसा अधिनियम प्रस्ताव, यह दोनों ही हिंदुओं की भावनाओं का कुचलने का एक दुस्साहसिक प्रयास ही था।हम भली भांति जानते हैं कि भारत की संस्कृति कभी भी नफरत के वातावरण का समर्थन करने वाली नहीं रही, इसलिए सवाल यह है कि देश में नफरत के भाव का बीजारोपण किसने किया। क्या इसके लिए लंबे समय तक राज करने वाली कांग्रेस की सत्ता जिम्मेदार नहीं है? क्या टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने में कांग्रेस नेताओं की भूमिका नहीं रही? इसमें तो स्वयं राहुल गांधी ही उनका समर्थन करने पहुंचे थे। इन बातों से लगता है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है। वे बात कुछ और करते हैं, लेकिन उनकी बातों का असर उनकी कार्यशैली में दिखाई नहीं देता। वर्तमान में राहुल गांधी की केवल एक ही शैली दिखाई देती है, वह है केवल देश को नीचा दिखाने की शैली। सांप्रदायिक सद्भाव तो भारत का मूल है, लेकिन राहुल गांधी को आज यह बात समझ में आई है। लेकिन इसके बाद भी सवाल यह आता है कि उनकी यात्रा में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाले नेता या अन्य व्यक्ति क्यों शामिल हो रहे हैं? क्या इससे कांग्रेस के चरित्र का पता नहीं चलता? अगर कांग्रेस नेता वास्तव में सद्भाव के वातावरण का उत्थान चाहते हैं तो इसमें नफरत फैलाने वाले लोगों को शामिल नहीं करना चाहिए था। कांग्रेस को चाहिए कि वह अपनी यात्रा में ऐसे लोगों को शामिल करने का प्रयास करे, जिनकी पहचान शांति स्थापित करने वाली रही हो। ऐसे प्रयासों के लिए राजनीतिक विचार को तिलांजलि देना पड़े तो दे देना चाहिए। क्योंकि राजनीतिक विचार ही नफरत की भावना को बढ़ावा देने का कार्य करता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कांग्रेस नेताओं के मन में वर्तमान केंद्र सरकार के प्रति द्वेष भाव भरा हुआ है। द्वेष भाव को धारण करने वाला व्यक्ति कभी भी सद्भाव नहीं ला सकता। देश भावना यही कहती है कि हम अच्छी बातों का दिल खोलकर स्वागत करें और भारतीय संस्कृति के विरोध में उठने वाले हर कदम का विरोध करें। कांग्रेस की अवधारणा के बारे में कुछ लोगों में यह सवाल उठता है कि कांग्रेस ईसाई और मुसलमानों के बारे कभी विरोधात्मक शैली नहीं अपनाती। इनके गलत कामों पर भी कांग्रेस के नेता मौन साध लेते हैं। हो सकता है कि यह सहजता में होता हो, लेकिन जितने मुंह उतनी बातें तो होती ही हैं। अभी यात्रा के बारे में भी यह सवाल उठने लगा है कि कांग्रेस ने इसी समय भारत जोड़ो यात्रा को विराम क्यों दिया है? कहने वाले तो यहां तक कहने लगे हैं कि यह यात्रा केवल क्रिसमस और अंग्रेजी नया साल मनाने में कोई व्यवधान न हो, इसलिए ही रोकी गई है। यह सभी जानते हैं कि अंग्रेजी नव वर्ष प्राकृतिक त्योहार नहीं है और न ही इसका प्रकृति से कोई संबंध ही है, फिर क्यों इसको बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। यह भी सर्वविदित ही है कि हम प्रकृति का साथ देंगे तो प्रकृति भी हमारा साथ देगी। आज समाज का बहुत बड़ा वर्ग यह कहने का साहस जुटाने लगा कि एक जनवरी वाला नव वर्ष भारत का नहीं है। लेकिन कांग्रेस के नेता इस भारतीय धारणा को बदलने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी अगर अपने आपको हिंदू मानते हैं तो उन्हें हिन्दू होने का परिचय अपनी कृति से देना ही होगा। अगर ऐसा होगा तो वह सांप्रदायिक सद्भाव को सही मायने में समझने लगेंगे। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा निसंदेह एक तपस्या है। देश में एकता स्थापित करने के लिए ऐसी यात्राएं पहले भी हो चुकी हैं। आद्य शंकराचार्य ने भी भारत में सांस्कृतिक ज्ञान का संदेश प्रवाहित करने के लिए ऐसी ही यात्रा की थी। हम तो चाहते हैं कि राहुल गांधी अपनी यात्रा के माध्यम से देश को मजबूत करने का कार्य करें, लेकिन ऐसी यात्राओं के लिए निकलने से पहले मन में विरक्ति का भाव भी होना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी के मन में चल रहे विचारों को देखकर ऐसा लगता नहीं है कि उनके स्वभाव में विरक्ति है। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान महाराष्ट्र में वीर सावरकर का उल्लेख करते समय नफरत का ही परिचय दिया। इसलिए कहा जा सकता है कि जब नफरत के बीजों का अंकुरण उनके मन में ही हो रहा है तो सद्भाव के फूल कैसे खिलेंगे। कांग्रेस नेताओं के मन में जब तक ऐसा भाव रहेगा, तब तक कितनी भी यात्राएं निकाल लें, वे देश का मन नहीं जीत सकते। देश का मन जीतने के लिए भारत की संस्कृति को मन और मस्तिष्क में धारण करना होगा। तभी भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य सफल होगा। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
ऋतुपर्ण दवेएबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनिया एक बार फिर कोरोना की दहशत में है। नए वेरिएंट बीएफ.7 की तबाही का मंजर डरावना है। सबसे ज्यादा खौफ चीन से आ रही तस्वीरों और वीडियो ने है। चीन की विफल जीरो कोविड पॉलिसी से सारी दुनिया में एक बार फिर गुस्सा और नफरत है। व्यापार को बढ़ाने के लिए हल्के-फुल्के, बेअसर और सस्ते उत्पादों को बनाकर इंसानियत को भी नहीं बख्शने वाले चीन ने जिस तेजी से पहले 6 वैक्सीन बनाकर खूब वाहवाही लूटी बाद में इनके धड़ाधड़ बेअसर होने की सच्चाई ने दुनिया को हैरान और परेशान कर दिया है। जल्दबाजी में बनी चीन की वैक्सीन जिफिवैक्स, कॉन्विडेसिया, कॉनवेक, कोविलो, वेरो सेल और कोरोनावैक दुनिया में खूब बिकी। जब ये वैसा असर नहीं दिखा पाईं तो हो हल्ला मचा। सच तो यह है कि चीन खुद अपने हल्के और घटिया उत्पादों को लेकर न केवल घिर गया बल्कि सकते में है। सबसे ज्यादा बेअसर दो वैक्सीन कोविलो और वोरो सेल रहीं। इसे एक ही कंपनी सिनोफॉर्म ने बनाया था। जीरो कोविड पॉलिसी के चलते लगातार लॉकडाउन जैसी तानाशाही भरी चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिन की सख्ती ने वहां गृह युद्ध जैसे हालात बना दिए। महीनों से घरों में कैद लोगों के सब्र का बांध भी टूटा। मौत का मंजर और लाशों का ढेर अब चीन छुपा नहीं पा रहा। वैसे चीन अपनी करतूतों को छुपाने और सच को बाहर न आने देने के लिए पहले से ही दुनिया में बदनाम है। उसने कोरोना जैसे मामलों पर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन तक को गच्चा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साल के आखिरी दिन भी डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अदनोन गेब्रेयेसस ने चीन को फटकारते हुए सच्चाई साझा करने और भारत से सीख लेने की नसीहत दी। वुहान से निकले चीनी शैतान के इलाज की खातिर उसकी वैक्सीन के खरीदार देश बेचैन हैं। इस बीच चीन का यह अहम भी टूटा है कि कोरोना फैलाना और काबू करना उसके लिए चुटकियों का खेल है। भारत पहले भी सतर्क था और अब भी है। तब और अब में फर्क इतना है कि महामारी का खौफनाक मंजर और मौतों के सच से सीख लेकर इस बार वैसा कुछ नहीं होने देने की कवायद है जो घट चुका है। कोरोना से दुनिया भर में बीते 26 महीनों के दौरान करीब साढ़े 57 लाख लोगों की जान गई है। चंद आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका में 9,24,530, ब्राजील में 6,31,069, भारत में 5,30,702, रूस में 3,34,753, मैक्सिको में 3,08,829, पेरू में 2,06,646, यूके में 1,57,984, इटली में 1,48,167, इंडोनेशिया में 1,44,453, ईरान में 1,32,681 लोग जान गंवा चुके हैं। अभी भारत में दैनिक संक्रमण दर करीब 0.17 प्रतिशत है। साल के आखिरी दिन 1,57,671 टेस्ट किए गए। नए साल की शुरुआत के साथ ही भारत में ओमिक्रोन के नए सब वेरिएंट एक्सबीबी.1.5 के मिलने से चिंता बढ़ गई है। पहला मामला गुजरात में मिला है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी सीडीएस के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका भर में इसके 40 प्रतिशत से ज्यादा मामले सामने आए हैं। बहरहाल भारत में नए साल की सुबह तक कोरोना के 265 मामले सामने आए और सक्रिय मामलों की संख्या 3,653 रही। विदेशी हवाई यात्रियों की रैंडम जांच में संक्रमण मिलना और पहले आ चुके कुछ यात्रियों का कोरोना संक्रमित होना चिंताजनक है। शंघाई के देजी अस्पताल का वी चैट मैसेज बताता है कि केवल शहर में बीते हफ्ते 54.3 लाख पॉजिटिव मामले थे। अब यह संख्या सवा करोड़ से ज्यादा पहुंच गई होगी। यही सच छुपाना पहले भी पूरी दुनिया पर भारी पड़ा और दोबारा भारी पड़ने वाला है? ऐसे में पड़ोसी होने के चलते भारत की चिंता जरूरी है। जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका समेत कई देशों में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उच्चस्तरीय बैठक लेना गंभीरता को बताता है। भारत में एक बार फिर एहतियात का दौर शुरू होना तय है। निश्चित रूप से व्यापार जगत चिंतित है। दोबारा मास्क जरूरी होगा, सेनिटाइजर, साबुन से हाथ धोना, सामाजिक दूरी का पालन करना तथा भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचने की एडवायजरी जारी हो सकती है। हालांकि भारत में दोनों खुराक और बूस्टर डोज मिलाकर अब तक 220 करोड़ लोगों का वैक्सीन लेना रहात की बात है। भारत में बीती लहर में तेजी से संक्रमित हो चुके लोगों में हाइब्रिड इम्युनिटी के चलते खतरा कम है लेकिन सतर्कता जरूरी है। शायद सारी कवायद इस बार इसी पर ज्यादा है। अब भी कइयों ने बूस्टर डोज नहीं ली है जिसे विशेषज्ञ जरूरी बता रहे हैं। इसलिए क्यों न हम अभी से दो गज की दूरी, मास्क जरूरी पर अमल कर पुराने अनुभवों से कोरोना के लिए खुद ही चुनौती बन जायें। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
पवन पाण्डेयएबीएन सेंट्रल डेस्क। क्या विकट शोर था साहब- आ गया रे आ गया! क्या भयानक खौफ था जी-बाप रे बाप यह तो फिर आ गया! यह तो निगल ही जाएगा! चैनल दर चैनल क्या अजब आलम था-आ गया रे, खा गया रे, लील गया रे, डस गया रे! लेकिन वह आया भी और चला भी गया। आया तो खूब शोर-शराबे के साथ था, पर गया ऐसे जैसे कोई दबे पांव निकल जाता है। वह आंधी की तरह आया तो जरूर, पर तूफान की तरह नहीं गया। तूफान क्या, हल्का-सा झोंका भी महसूस नहीं हुआ। उसके आने का शोर तो ऐसा था, जैसे कायनात नेस्तनाबूद हो जाएगी, जैसे कहर टूट पड़ेगा। लेकिन उसके जाने का पता ही नहीं चला। वह जो आया था, वह नहीं था, उसका नाम था। वह जो खौफ था, वह उसका नाम था। वह चीन से आ रहा था। लेकिन वह चीनी सेना नहीं थी। उसे तो कूट-पीटकर भगाया जा सकता है। वह कोई चीनी माल भी नहीं था कि उसके बायकाट का आह्वान हो जाता। वह तो कोरोना था। वह पहले भी चीन से ही आया था और पूरी दुनिया में वैसे ही छा गया था, जैसे चीनी माल छाया हुआ है। खौफ तो चीनी माल का भी रहता ही है न। पर कोरोना का खौफ तो आखिर कोरोना का ही था। उसके खौफ का क्या मुकाबला साहब! वह तो ऐसा खौफ है कि लोग अपनी सांसें गिनने लगे थे। अपने खोये हुए मास्क ढूंढ़ने लगे थे। अस्पतालों के बिस्तर गिनने लगे थे।खौफ ऐसा था कि सरकार बैठकें करने लगी। अस्पताल अपने ऑक्सीजन प्लांट दुरुस्त करने लगे और कोविड वार्डों को सजाने लगे। स्वास्थ्य मंत्री ने आगाही जारी कर दी। राहुल गांधी को चिट्ठी लिख दी कि भाई अपनी यात्रा छोड़ो और घर जाओ, देखो कोराना आ रहा है। सर्दी-गर्मी जब ज्यादा सताने लगे तो बच्चे भी अपना खेल का मैदान छोड़कर घर चले जाते हैं। पर बच्चा जिद्दी निकला। मैदान छोड़ने से इनकार ही कर दिया। अकेला चलूंगा, पर चलता रहूंगा। कोरोना से नहीं डरूंगा। नफरत के बाजार में मैं तो अपनी प्यार की दुकान सजा कर रहूंगा। बस इतने भर से कोरोना का खौफ वैसे ही धराशायी हो गया, जैसे वक्त आने पर तानाशाह का खौफ धराशायी हो जाता है। ऐसे में कोरोना बड़ा शर्मसार हुआ होगा। उसे डूब मरने की लानत तो नहीं दी जा सकती, क्योंकि आखिर तो वह महामारी है। जब सौ साल पुरानी महामारियों का खौफ अभी तक बना हुआ है तो वह कहां डूब कर मरने वाला है। वैसे भी वह मारने वाला ठहरा। अलबत्ता एक दिन तो मारने वाले भी मरते ही हैं। कोरोना को मारने की वैक्सीन मिल भी गयी और अभी और भी मिल ही जाएगी। फिर भी उससे बचकर रहने में ही भलाई है। वो क्या कहते हैं बचाव में ही बचाव है।
टीएन नाइननएबीएन एडिटोरियल डेस्क। सरकार ने कोविड संबंधी कार्यक्रम के तहत नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण योजना को बंद कर दिया और उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के माध्यम से वितरित करने की घोषणा की है। अब तक पीडीएस के तहत चावल तीन रुपये किलोग्राम, गेहूं दो रुपये किलोग्राम और मोटा अनाज एक रुपये किलोग्राम की दर पर बेचा जाता रहा है। इन पर औसतन 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है। यानी यह लगभग मुफ्त बिकता है। इस आवरण के परे देखने पर पता चलता है कि नि:शुल्क या 90 फीसदी सब्सिडी के साथ वितरित किये जाने वाले अनाज की कुल मात्रा में कमोबेश 50 फीसदी की कमी आ रही है। केंद्र सरकार के वित्त की बात करें तो इसके आवंटन में काफी कमी आयेगी। नि:शुल्क अनाज की पेशकश करने वाले राज्यों की भी काफी बचत होगी क्योंकि पूरा बिल केंद्र चुका रहा है।राजकोषीय अनुशासन की बात करें तो जो हो चुका उसका कुछ नहीं किया जा सकता है। केंद्र सरकार की खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी को एक साथ रखकर देखा जाये तो वह जीडीपी का 2.5 फीसदी है। यह स्तर एक दशक पहले भी था। यह आंशिक तौर पर इसलिए है कि पेट्रोलियम सब्सिडी (जो कुल सब्सिडी बिल का एक तिहाई था) बिल काफी कम हुआ है। ताजा निर्णय के बाद अगले वर्ष खाद्य सब्सिडी बिल भी जीडीपी की तुलना में कम होगा। उर्वरक सब्सिडी में कमी आयेगी या नहीं यह बात काफी हद तक यूक्रेन में चल रहे युद्ध पर निर्भर करेगी। अनुमान तो यही है कि सब्सिडी बिल में काफी कमी आयेगी।सरकार के निर्णय की बात करें तो दिक्कत राजकोषीय गणित में नहीं बल्कि इस बात में है कि यह दो हकीकतों से किस प्रकार निपटता है। एक का संबंध खेती की आर्थिकी से है और दूसरे का रिश्ता देश की अधिसंख्य कामगार आबादी के आय के स्तर से है। कृषि की बात करें तो अधिकांश किसानों को उर्वरक पर भारी सब्सिडी, नि:शुल्क पानी और बिजली आदि मिलते हैं। भारत कृषि के मामले में दुनिया में सबसे कम मेहनताना देने वाले देशों में शामिल है। इसका भी फायदा मिलता है। कुछ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण फसलों के लिए किसानों को खरीदार और मूल्य की गारंटी भी मिलती है। ऐसे में खेती से जुड़ा स्वाभाविक जोखिम अपने आप समाप्त हो जाता है। इसका नतीजा यह है कि महंगे और किफायती कच्चे माल के इस्तेमाल में किफायत बरतने को खास प्रोत्साहन नहीं मिलता। कई फसलों की बात करें तो उनकी उत्पादकता अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी कम है। थोक सब्सिडी के कारण एक ऐसा क्षेत्र व्यवहार्य नहीं बन पा रहा है जो बहुत कम वेतन स्तर पर देश के आधे रोजगार मुहैया कराता है।आय के स्तर की बात करें तो असंगठित क्षेत्र के जो 27.7 करोड़ श्रमिक सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत हैं, उनमें से 94 प्रतिशत की मासिक आय 10,000 रुपये से कम है। बमुश्किल 1.5 फीसदी की मासिक आय 15,000 रुपये प्रति माह से अधिक है। देश की कुल श्रम शक्ति में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत है। इनमें से दो-तिहाई कृषि कार्य में संलग्न हैं। वहीं सर्वे बताते हैं कि आय का स्तर गैर कृषि आय के स्तर के एक चौथाई के बराबर है। हकीकत में देखें तो मुद्रास्फीति समायोजित कृषि वेतन भत्ते बीते पांच वर्षों में काफी कम हुए हैं। मेहनताने का स्तर एक स्वघोषित आंकड़ा होता है जो बीते चार दशकों में प्रति व्यक्ति आय में हुए पांच गुना इजाफे से टकरा सकता है। अतिरिक्त आय में से पूरी की पूरी उच्चतम स्तर के समूह के पास तो नहीं गई होगी।गरीबी के घटते स्तर से यह बात साबित भी होती है। खपत की आदतों और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद को लेकर भी विरोधाभासी आंकड़े हैं जो बढ़ती मध्यवर्गीय श्रेणी की ओर इशारा करते हैं। अगर हालात उतने बुरे हैं जितना बताया जा रहा है तो भी क्या मुफ्त अनाज ही समस्या का हल है? अधिकांश कामगारों को पीडीएस दर पर परिवार के लिए एक माह का राशन खरीदने में एक दिन से अधिक का मेहनताना नहीं लगता है। अनाज को नि:शुल्क करने से कोई खास बदलाव नहीं आता। निश्चित रूप से इससे एक लोकलुभावन चक्र अवश्य शुरू हो सकता है क्योंकि राजनीतिक दल पहले ही नि:शुल्क बिजली समेत तमाम मुफ्त चीजें दे रहे हैं।अगर हम विकल्पों की बात करें तो हमारी खोज व्यापक आर्थिक नीति की दिशा में जायेगी। कृषि क्षेत्र के वेतन भत्तों की बात करें तो उनकी कमजोरी के कारण गैर कृषि आय के साथ उसके अंतर में कमी नहीं आयेगी जब तक कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में और रोजगार तैयार करके लोगों को कृषि से इतर रोजगार नहीं मुहैया कराया जाता। तब तक गरीबों को लिए आय समर्थन आवश्यक है। तीसरी बात, रोजगार गारंटी योजना जैसा स्वचयन वाला कार्यक्रम अपने बारे में काफी कुछ बताता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्कूली शिक्षा और रोजगारपरक प्रशिक्षण में अधिक निवेश पर भी यही बात लागू होती है। सब्सिडी और नि:शुल्क तोहफे अक्सर जरूरी कामों पर से ध्यान हटा देते हैं।
डॉ दिलीप अग्निहोत्रीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय चिंतन में कर्मयोग और संन्यास का वृहत विश्लेषण है। इन पर अमल करने वालों की अनवरत परंपरा रही है। अनगिन शासकों और राजनेताओं ने समाज के लिए निजी हित और पारिवारिक जीवन का परित्याग किया। नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे राजनेता आज भी इस महान विरासत को चरितार्थ कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने विधिवत संन्यास ग्रहण किया है। वह संन्यास धर्म की मर्यादाओं में रहते हुए समाज सेवा के पथ पर चल रहे हैं। अपने पूर्व आश्रम पिता के निधन का समाचार सुनते हैं। लेकिन कोरोना आपदा प्रबंधन के कार्यों में लगे रहते हैं।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आध्यात्मिक रूप से संन्यास आश्रम ग्रहण नहीं किया है। वह भारतीय चिन्तन के अनुरूप सामाजिक संन्यास पर अमल करते हैं। अपनी मां की अंतिम यात्रा में जाते हैं। इसके बाद उनका राजधर्म निर्वाह शुरू हो जाता है। पहले से तय कार्यक्रमों में कोई बदलाव नहीं किया जाता है। बाईस वर्ष के संवैधानिक दायित्व निर्वाह में एक भी दिन अवकाश न लेने की परम्परा कायम रहती है।मुख्यमंत्री रहे तो पूरे गुजरात को परिवार समझा। प्रधानमंत्री बने तो उनके परिवार में पूरा भारत आ गया। वह उदार चरित्र का परिचय देते हैं।यह मेरा है और यह पराया, इस तरह की सोच संकीर्ण विचारधारा वालों की होती है लेकिन विस्तृत विचारधारा वालों के लिए तो यह सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार के समान होती है। अच्छे जनसेवक पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। मोदी ने जब जनसेवा का मार्ग अपनाया तो उन्होंने इसी सिद्धांत का अनुसरण किया। नरेन्द्र मोदी की कार्य शैली विलक्षण है। राष्ट्र और समाज की सेवा में सम्पूर्ण समर्पण। इसी के अनुरूप परिवार भावना का विस्तार। एक बार उनकी मां ने कहा था कि हमारे परिवार ने नरेन्द्र मोदी को समाज के लिए समर्पित मान लिया था, न परिवार ने कभी उनसे कोई अपेक्षा की, न नरेन्द्र मोदी ने अपने को सीमित दायरे में रखा। मुख्यमंत्री के रूप में वहां के छह करोड़ लोगों को अपना परिवार मानते रहे, उन्हीं के हित में कार्य करते रहे। प्रधानमंत्री बने तो 130 करोड़ लोगों तक उनका परिवार विस्तृत हो गया। आठ वर्षों तक बिना विश्राम के इस परिवार की सेवा में समर्पित हैं। यह कार्यशैली और चिंतन ही उनको विशिष्ट बनाता है। बिल्कुल अलग।नरेन्द्र मोदी के लिए जन्म दिवस और पर्व आदि भी समाज सेवा के अवसर होते हैं। नरेन्द्र मोदी दीवाली सैनिकों के बीच मनाते हैं। उनके ये आयोजन व्यक्तिगत नहीं होते। नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को प्राथमिकता दी है व गरीब कल्याण के संकल्प से असंभव कार्यों को संभव करके दिखाया है। गरीब कल्याण, सुशासन, विकास, राष्ट्र सुरक्षा व ऐतिहासिक सुधारों के समांतर समन्वय से नरेन्द्र मोदी ने मां भारती को पुनः सर्वोच्च स्थान पर आसीन करने के अपने संकल्प को धरातल पर चरितार्थ किया है। यह निर्णायक नेतृत्व जनता के अटूट विश्वास के कारण ही सम्भव हो पाया है। एक सुरक्षित, सशक्त व आत्मनिर्भर नए भारत के निर्माता मोदी का जीवन सेवा और समर्पण का प्रतीक है। आजादी के बाद पहली बार करोड़ों गरीबों को उनका अधिकार देकर उनमें आशा और विश्वास का भाव जगाया है। भारतीय संस्कृति के संवाहक नरेन्द्र मोदी ने देश को अपनी मूल जड़ों से जोड़ हर क्षेत्र में आगे ले जाने का काम किया है। उनकी दूरदर्शिता व नेतृत्व में नया भारत एक विश्वशक्ति बनकर उभरा है। वैश्विक नेता के रूप में उनकी विशेष पहचान और छवि है। वह दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं।वह कहते भी हैं कि अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी विरोधाभासी नहीं है। देश की प्रगति में सभी का योगदान और महत्व होता है। पर्यावरण की रक्षा से देश की प्रगति हो सकती है। यह भारत ने दुनिया को करके दिखाया है। प्रकृति, पर्यावरण, पशु, पक्षी भारत के लिए केवल स्थिरता सुरक्षा के विषय नहीं हैं, यह हमारी संवेदनशीलता और आध्यात्मिकता का भी आधार हैं। अपने पिछले जन्मदिन पर नरेन्द्र मोदी मध्य प्रदेश के श्योपुर में स्वयं सहायता समूह सम्मेलन में सहभागी हुए। उन्होंने कहा था कि आमतौर पर वह अपने जन्मदिन पर मां से मिलते हैं। उनका आशीर्वाद लेते हैं। आज मैं उनके पास नहीं जा सका, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों और गांवों में कड़ी मेहनत करने वाली लाखों माताएं आज यहां मुझे आशीर्वाद दे रही हैं। यह दृश्य देखकर मेरी मां को संतोष होगा कि भले बेटा आज यहां नहीं आया, लेकिन लाखों माताओं ने आशीर्वाद दिया है। नये भारत में पंचायत भवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक नारीशक्ति का परचम लहरा रहा हैं।विगत आठ वर्षों के दौरान देश में ग्यारह करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाये गये। नौ करोड़ से ज्यादा उज्जवला के गैस कनेक्शन प्रदान किए गए। करोड़ों परिवारों में नल से जल की सुविधा उपलब्ध कराई गई। महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण हो रहा है। पिछले आठ सालों में स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाये गये। आठ करोड़ से अधिक महिलाएं इस अभियान से जुड़ी हैं। सरकार का लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार से कम से कम एक महिला को इस अभियान से जोड़ने का है। गांव की अर्थव्यवस्था में, महिला उद्यमियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार निरंतर काम कर रही है। एक जिला एक उत्पाद के माध्यम से हर जिले के लोकल उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी महापुरुषों द्वारा देखे गये सपनों को साकार कर रहे हैं। ब्रिटेन को पछाड़ कर भारत आज दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था व्यवस्था वाला देश बन गया है। अपनी मां के अंतिम संस्कार से खाली होने के तुरंत बाद मोदी वर्चुअल माध्यम से सरकारी कार्यक्रम में सहभागी हुए। हावड़ा और न्यू जलपाईगुड़ी के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन को हरी झंडी दिखायी। मोदी ने कहा इस सदी में देश का तेजी से विकास करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे के बुनियादी ढांचे को विकसित करने का अभियान पूरे देश में जारी रहेगा।पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इस दिन प्रधानमंत्री को कोलकाता आना था, जहां हावड़ा स्टेशन पर उनका मूल कार्यक्रम आयोजित था। इस बीच सुबह के समय जब हीरा बा के निधन की खबर आई तो इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि कार्यक्रम को टाला जा सकता है। थोड़ी देर बाद ही आधिकारिक तौर पर बताया गया कि प्रधानमंत्री वर्चुअल तरीके से कार्यक्रम में शामिल होंगे। मां के अंतिम संस्कार के बाद प्रधानमंत्री अहमदाबाद के राजभवन पहुंचे। वहां वर्चुअल माध्यम से वह कार्यक्रम में शामिल हुए। हावड़ा न्यू जलपाईगुड़ी के बीच ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के बाद अपने सम्बोधन में उन्होंने बंगाल की जनता से माफी मांगते हुए कहा कि वह निजी कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके, इसके लिए वह क्षमाप्रार्थी हैं। जिस धरती से वंदे मातरम का जय घोष हुआ वहां वंदे भारत को हरी झंडी दिखाई गई। 30 दिसंबर, 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अंडमान में तिरंगा फहराकर भारत की आजादी का बिगुल फूंका था। इसके बाद प्रधानमंत्री दूसरी राष्ट्रीय गंगा परिषद की बैठक में भी शामिल हुए।वह अपनी मां की तबियत बिगड़ने पर देररात से ही जाग रहे थे। करीब साढ़े तीन बजे भोर में उनका निधन हुआ। नरेन्द्र मोदी ने अपनी माता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनकी माता की सीख थी कि काम करो बुदि्ध से और जीवन जियो शुद्धि से। हीरा बा का जन्म 18 जून, 1923 को मेहसाणा जिले की विसनगर तहसील में हुआ था। बचपन में ही हीरा बा की माता चल बसी थीं। बिन माता की हीरा बा का बचपन बहुत गरीबी में बिता। संघर्षों के कारण कम उम्र में ही उनके पास अनुभव का खजाना था। घर में बड़ी होने के कारण पूरे परिवार की जिम्मेदारी भी उठाती रहीं। बाद में छोटी उम्र में ही वडनगर के मोदी परिवार में उनकी शादी हो गई। वहां भी वे परिवार की सबसे बड़ी बहू थीं। यहां भी उनपर जिम्मेदारी बड़ी थी, लेकिन उन्होंने तनिक भी विचलित हुए बिना इसे उठाते हुए परिवार को एकजुट रखा। वडनगर के एक छोटे से घर में वो रहती थीं, जहां एक भी खिड़की नहीं थी। घर पर आर्थिक संकट के दौर में हीरा बा ने दूसरे घरों में जूठे बर्तन भी मांजे। चरखा चलाने का भी उन्होंने काम किया। वे रुई कातने का भी काम करती रहीं। उनके पांच पुत्र और एक पुत्री हैं। वे छोटे पुत्र पंकज मोदी के साथ ही रहती थीं। नरेन्द्र मोदी वर्ष 2016 में अपनी माता हीरा बा को अपने साथ दिल्ली लेकर गए थे। वह कुछ दिन यहां रहीं थीं।
डॉ वेदप्रताप वैदिकएबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मां हीरा बा के निधन पर कई देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने शोक व्यक्त किया लेकिन यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कांग्रेस से सोनिया गांधी और राहुल ने कोई एक शब्द तक नहीं कहा। यह भी हो सकता है कि उन्होंने कहा हो और अखबारों ने उसे छापा न हो। लेकिन जरा हम सोचें कि भारतीय राजनीति में आपसी कड़वाहट किस स्तर तक नीचे पहुंच गई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने तो शोक व्यक्त किया है और उन्होंने अपनी श्रद्धांजलि भी दी है लेकिन हमारे कई अत्यंत मुखर विरोधी नेता बिल्कुल मौन रह गये। क्या हमारे विरोधी दलों के नेता, जहां तक मोदी का सवाल है, वे किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से भी ज्यादा खफा हैं?राहुल गांधी का अटलजी की समाधि पर जाना मुझे अच्छा लगा। यह उदारता और राजनीतिक शिष्टाचार का परिचायक है। इंदिराजी के निधन पर अटलजी ने भी जो शब्द कहे थे, उसे मार्मिक श्रद्धांजलि ही कहा जा सकता है। लोकतंत्र की यह खूबी है कि आप चुनाव के दौरान, संसद में, प्रदर्शनों में और बयानों में अपने विरोधियों का डटकर विरोध करते रहें लेकिन शोक के ऐसे अवसरों पर आप इंसानियत का परिचय दें।इस मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अद्भुत उदारता का परिचय दिया है। मोदी का जितना कट्टर विरोध ममता ने किया है और उनके तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ को उन्होंने जितना सताया है, किसी अन्य राज्यपाल को नहीं सताया गया है, लेकिन मोदी की माताजी के निधन पर जो वाक्य उन्होंने कहे हैं, वे अत्यंत मार्मिक हैं।ममता ने कहा कि आपकी माताजी के निधन पर आपको कैसे सांत्वना दी जाये। आपकी मां भी तो हमारी मां हैं। मोदी ने अपनी मां की अंत्येष्टि के तुरंत बाद हावड़ा-जलपाईगुड़ी वंदे भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई। वे चाहते तो इस कार्यक्रम को स्थगित भी कर सकते थे। लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि उनकी मां ने उनको कितने पवित्र संस्कार दिये थे। उनका आचरण एक अनासक्त कर्मयोगी की तरह रहा। उन्होंने अन्य नेताओं की तरह अपनी मां और अपने भाई-बहनों को सत्ता की चाशनी को चखने का भी मौका नहीं दिया जबकि हमारे नेताओं के रिश्तेदार उस चाशनी में अक्सर लथपथ हो जाते हैं।इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे विरोधी नेता मोदी की खुशामद करें। मोदी का जो भी काम या भाषण उन्हें अप्रिय लगे, उसकी आलोचना वे बेखटके जरूर करें लेकिन शोक के ऐसे मौकों पर सभी नेता एक-दूसरे के प्रति सहज सहानुभूति व्यक्त करें तो उनके बीच सद्भाव तो पैदा होगा ही, भारत का लोकतंत्र भी मजबूत होगा। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)
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