भाजपा के 43वें स्थापना दिवस 6 अप्रैल पर विशेषविष्णु दत्त शर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। 980 के दशक का कालखंड भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइंट था, जब जनसंघ के बाद भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। स्वाधीनता मिले अभी तीन दशक ही हुए थे कि देश भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अपराधीकरण, जातिवाद, तुष्टिकरण, आतंकवाद और आपातकाल जैसे घावों से छलनी होने लगा था। किसे पता था कि आजादी के बाद जिन्होंने राजनीति का उत्तराधिकार पाया, वे अपनी स्वार्थलिप्सा में इतने कम समय में देश को बर्बादी के कगार पर पहुंचा देंगे। वे सत्ता में बने रहने के लिए तुष्टिकरण का ऐसा भ्रमजाल फैलाएंगे कि राष्ट्रीय अस्मिता भी धूमिल हो जाये और राष्ट्र की सच्ची पहचान उनके क्षुद्र राजनीतिकनारों से नष्ट हो जायेगी। परंतु तत्कालीन राष्ट्रवादी समूहों को इसका भान हो गया था और वे भारतीय राजनीति को सही दिशा देने व एक सम्यक विकल्प देने के लिए आगे आये, तब भाजपा की स्थापना हुई।थोड़ा गहराई में विचार करने से पता चलता है कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी राजनीतिक दलों ने वोट बैंक की गुलामी की एक विशेष चादर ओढ़ ली थी। उन दिनों भारत में भारतीयता की बात करना भी जैसे अपराध होता था। भारत में भारतीय संस्कृति, आध्यात्म, धर्म और उसके विविध विषयों की चर्चा को सांप्रदायिक ठहराया जाता था। ऐसी परिस्थिति में भारत की राजनीति को भारतीयता की ओर उन्मुख करने और उसके सांस्कृतिक सरोकारों को राजनीति का केंद्र बनाने के लिए भाजपा की नींव पड़ी। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विराट विचार को लेकर 1980 में आज ही के दिन भारतीय जनता पार्टी की विधिवत स्थापना हुई थी। जिसका एक बड़ा लक्ष्य था, भारत की एकात्मता को बचाना। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के द्वारा देश को खंडित होने से बचाने के लिए एकात्म मानववाद के मूल दर्शन पर चलना। एक ऐसा दर्शन जो मनुष्य और समाज के बीच कोई संघर्ष नहीं देखता, बल्कि मनुष्य के स्वाभाविक विकास-क्रम और उसकी चेतना के विस्तार से परिवार, गांव, राज्य, देश और सृष्टि तक उसकी पूर्णता देखता है। अन्य दलों की तरह भारत को नेशन स्टेट की तरह देखने की बजाय भाजपा ने इसे राष्ट्र माना और कहा कि इसका राष्ट्रवाद सांस्कृतिक है केवल भौगोलिक नहीं।भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अंतर्गत गरीबी मिटाना केवल नारा नहीं, उसका संकल्प था। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण कोई भाषण नहीं, प्रतिबद्धता थी। कश्मीर में 370 की समाप्ति चुनावी जुमला नहीं, राष्ट्रीय एकात्मताका साक्षात संकल्प था। अब से चार दशक पहले बनी भाजपा के लिए अन्त्योदय स्लोगन नहीं, यह गरीबों का जीवन स्तर ऊंचा करने का सपना था, जिसे पार्टी के किसी भी नेतृत्व ने कभी भी देखना नहीं छोड़ा। 1980 से लेकर अब तकभाजपा के सभी नेतृत्वकर्ता इस सपने को पूर्ण करने में सक्रियरहे हैं। वे उन संकल्पों को साकार करने के लिए दिन-रात अपना श्रेष्ठतम समर्पित करते रहे हैं।वे भावी पीढ़ी को भी इन संकल्पों को साकार करने का सामर्थ्य देते हैं। शोषणमुक्त, समतायुक्त समाज की स्थापना भाजपा का चुनावी मुद्दा नहीं है, यह इसकी मूल दृष्टि है।भारत के सांस्कृतिक मानबिन्दुओं की रक्षा हो, भारत की अखंडता का प्रश्न हो अथवा समाज को समरस रखने की चुनौती हो, सभी मुद्दों पर भाजपा विगत चार दशक से अबाध रूप से अपना संकल्प सिद्ध करती आ रही है। अपने सिद्धांतों पर चलते हुए पार्टी आज 43 साल की यात्रा पूरी कर रही है। इस यात्रा में अनेक बाधाएं व कठिनाइयां भी आयी हैं परन्तु पार्टी अपने सिद्धांतों व आदर्शों पर अडिग रहते हुए आगे बढ़ती रही है।लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और उसकी मूल भावना का पालन करते हुए पार्टी ने देश के सभी हिस्सों में जनता का अटूट विश्वास हासिल किया है। आज लोकसभा में 303, राज्यसभा में 93, एमएलए 1420, एमएलसी 150 सहित 16 राज्यों में भाजपा नीत सरकारें हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सारे देश ने एक दल की विचारधारा को समादृत किया है औरभाजपा के राष्ट्रवादी चिंतन से लोग जुड़ते जा रहे हैं। इसलिए स्थापना दिवस के प्रसंग में चुनावी हार जीत के आंकड़ों को दरकिनार कर भाजपा के वैचारिक विस्तार को देखना समीचीन होगा।सन 1980 में स्थापित पाटीर्तीन दशक के अल्पकाल में ही स्वाधीनता पूर्व के दलों का राष्ट्रीय विकल्प बन गई। साथ ही उन क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व तोड़ने में भी कामयाब हुई, जिन्होंने सामाजिक न्याय की आड़ में परिवारवाद, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट और वोट बैंक की राजनीति को ही अपना धर्म बना लिया था। लोक लुभावन वादों की क्षणिक व स्वार्थ भरी राजनीति को भी नकारने में भाजपा ही विकल्प बनी है। पार्टी को जब-जब अवसर मिला है उसने समस्याओं के स्थाई समाधान पर ध्यान दिया है।स्थापना के 34 वें साल में जब 2014 में देश ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा पर पूरी तरह भरोसा जताया, तब से भाजपा सरकार अपने सभी वादों को एक एक करके पूरा करती आ रही है। श्रीराम मंदिर निर्माण करने, कश्मीर से 370 हटाने के साथ-साथ भारत के सांस्कृतिक आध्यामिक ढांचे के युगानुकूल विकास के कार्यों को भी अमलीजामा पहना रही है। आज भारत की एकात्मता के लगभग सभी तीर्थ केंद्र विकास का नया प्रतिमान गढ़ रहे हैं। सात दशक से उपेक्षा का दंश झेल रहे हमारे आध्यात्मिक केंद्र राष्ट्रवादी दल की सरकार की प्राथमिकता में शामिल हुए हैं और अबउनका गौरव पुनर्स्थापित हो रहा है।दरअसल, भाजपा ने चार दशक में देश की राजनीतिक संस्कृति को बदल दिया है। एक ओर जहां परिवारवादी, तुष्टिकरण और जातिवादी राजनीति का दौर समाप्त हो गया, वहीं अब धर्म-संस्कृति की बात करना सांप्रदायिक होना नहीं है। राष्ट्रवाद की चर्चा अब संकुचित मानसिकता का परिचायक नहीं है। सरकार की ओर से देवालयों का विकास करना, अब ध्रुवीकरण नहीं है। भारतीयता की बात करना और मातृभाषा में काम करना अब पिछड़ापन नहीं है। हिन्दुत्व का विचार अब सर्वग्राही बन गया है। अपनी प्रखर व प्रतिबद्ध कार्यशैली से भाजपा ने देश के राजनीतिक विमर्श को परिवर्तित करने में ऐतिहासिक सफलता पायी है। इस पड़ाव पर भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, एकात्म मानववाद तथा अपनी पंचनिष्ठाओं की नींव पर गर्व से खड़ी है।आजादी के बाद भ्रष्टाचार का घुन कब दानव बन गया पता ही नहीं चला। सभी दल भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे हुए नजर आने लगे। पिछले नौ साल में भाजपा की मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने का जो अभियान चलाया है, उसका असर सारा देश देख रहा है। भ्रष्टाचार में लिप्त कोई भी व्यक्ति मोदी सरकार में बच नहीं सकता। सैकड़ों जेबों से होकर गुजरने वाला सरकारी धन अब सीधे गरीब के खाते में पहुंच रहा है। बिना कटौती अनाज का एक-एक दाना गरीब आदमी की झोली में जा रहा है। बिना रिश्वत के गैस कनेक्शन, प्रधानमंत्री आवास, आयुष्मान कार्ड सहित अनेक योजनाएं आम नागरिक तक सीधे पहुंच रही हैं। डिजिटल इकोनॉमी में भारत दो साल में ही अव्वल हो गया है, तो इसका कारण यही है कि लाभ का सही हिस्सा हर खाते में सीधा हस्तांतरित हो रहा है।वस्तुत: पार्टी नेतृत्व ने सुशासन की संस्कृति से पार्टी के अन्त्योदय के सिद्धांत को आदर्श रूप में जमीन पर उतारा है। पार्टी की सफलता का यही पैमाना है कि इसकी नीतियों का लाभ पंक्ति के अंतिम पड़ाव पर खड़े व्यक्ति को मिल रहा है। समाज के निचले पायदान पर मौजूद व्यक्ति के कल्याणका अर्थ है गरीब, किसान, ग्रामीण, महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों सहित सभी वर्गों को सुशासन का लाभ मिले। सबको शिक्षा, सबको स्वास्थ्य, सबको अन्न जब मिलता है तब सच्चे अर्थों में सुशासन का संकल्प परिलक्षित होता है।सुशासन अंतत: राष्ट्र के गौरव पथ का मार्ग प्रशस्त करता है, जिस पर भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बहुत आगे निकल चुका है। (लेखक, भाजपा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष एवं खजुराहो लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं।)
डॉ रमेश ठाकुरएबीएन एडिटोरियल डेस्क। चीन ने अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न जगहों का नाम बदलने का एक ऐसा शिफूगा छोड़ा है जिसमें ना आवाज है और न चिंगारियां। फिलहाल यह पहली मर्तबा नहीं हुआ है जब उसने इन जगहों के नाम बदलने की कोशिश की हो। पूर्व में भी वह ऐसी ओछी हरकतें कर भारत को उकसाने का काम किया। उसकी इस गीदड़ भभकी को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। पर, सतर्कता बरतनी बेहद जरूरी है। दुश्मन चाहे, कमजोर हो या ताकतवर, हल्के में नहीं लेना चाहिए। केंद्र की खुफिया एजेंसियों और अरुणाचल प्रदेश की लोकल इंटेलिजेंस को पैनी निगरानी उन क्षेत्रों पर रखनी होगी, जिनका नाम बदलने का जिक्र किया है। सैन्य पहरा भी जरूरी है क्योंकि यही वो भाग है जिसपर दुश्मन की कई दर्शकों से नजर है। चीन ने अपने सरकारी अखबार के जरिये जो ये विवादित बात कही है, उसके परिणाम दूरगामी भी हो सकते हैं। क्योंकि इस बार उनकी बाकायदा मीटिंग में नाम तय किये गये हैं। जैसे विपक्ष सालों से आरोप लगाता आया है कि चीन अरुणाचल प्रदेश के कई हिस्सों में घुस गया है। आज से दो वर्ष पूर्व यानी दिसंबर-2021 में भी चीन ने अरुणाचल के विभिन्न जगहों के नाम बदले का कोरा झूठ बोला था। तब हमारे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था कि चाइना ऐसा करके हमें दिव्य भ्रमित करना चाहता है। अपनी नापाक हरकतों से हमारी नजरें हटाना चाहता था। सोचने वाली बात है, हमसे हजारों किलोमीटर दूर पर बैठे लोग पहले से तय हमारे स्थानों के नाम बदलने की बात करता है। इससे उनके दिमाग का दिवालियापन ही कहा जाएगा। ऐसे तो हमारी सरकार भी दिल्ली में बैठकर शंघाई का नाम संघर्ष नगर रख देगी, तो क्या उससे उसका नाम संघर्ष नगर हो जायेगा। नाम तो नहीं बदलेगा। पर, उपहास जरूर उड़ेगा, जैसा इस वक्त चीन का उड़ रहा है।नाम बदलने का नया विवाद दरअसल है क्या? इसे आसान थ्योरी में अगर समझें, तो इसे चीन की नापाक चाल ही कहेंगे। उसने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताकर करीब हमारे 11 अधिकृत स्थानों को अपना नाम दिया है। इसके लिए बाकायदा बीते रविवार को चीनी कैबिनेट की स्टेट काउंसिल मीटिंग आयोजित हुई जिसमें ये सभी प्रस्ताव पारित हुए। अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों को बिंदुवार तरीके से नए नाम रखे गये। क्योंकि इन नामों की पहले से उनके पास सटीक भोगौलिक जानकारियां हैं ही, जिन स्थानों के नाम बदलने की ये घोषणा हुई है उनमें दो रिहायशी इलाके हैं। पांच ऊंचे पर्वतों वाली चोटियां हैं। दो नदियां हैं और दो अन्य क्षेत्र हैं। दोनों नदियों का पानी दोनों ओर गिरता है। फिलहाल हमारे पास ये खबर अभी तक चीन सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के हवाले से आयी है। अधिकृत तौर पर उनकी सरकार ने अभी कोई कोई सूचना नहीं दी है और ना ही ऐसे कोई प्रयास किये गये हैं।गौरतलब है, चीन ने बाकायदा उन स्थानों के अधीनस्थ प्रशासनिक जिलों की श्रेणी भी सूचीबद्ध की है। जबकि, ऐसी ही एक हिमाकत 2017 में भी की थी, जब उसने अरुणाचल के छह स्थानों को अपना बताया था। भारत सरकार ने हमेशा इन हरकतों का प्रतिवाद किया है और करना भी चाहिए। उनको पता है ये उनका मात्र चिढ़ाने वाला तरीका है। जब, कोई लिखित में चिट्ठी या कब्जे की सीधी कोशिशें होगी तो उसका प्रतिकूल और माकूल उत्तर दिया जायेगा। फिलहाल सरकार वेट एंड वॉच की स्थिति में है। बैठक रविवार को हुई थी, दो-तीन दिन बीत जाने के बाद भी कोई सुगबुगाहट नहीं है, इसका मतलब ये है उन्होंने पहले की तरह सुरसुरी ही छोड़ी है। अभी कुछ महीने पूर्व की ही बात है जब चीन के इसी सरकारी अखबार के हवाले से ये झूठी खबर प्रकाशित हुई कि उन्होंने गलवान घाटी के आसपास से अपनी फोर्स हटाने का निर्णय ले लिया है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों से भी सेना हटायेंगे। दरअसल, ये उनका कोरा झूठ था, भारत सरकार को भ्रमित करने का ताकि इसके बाद भारत अपनी सेना हटाए और हम चुपके से रात के अंधेरे में धावा बोल दें। देखिए ये बदला हुआ भारत है, अब यहां रात में भी चौकन्ने रहते हैं। हिंदुस्तान 1962 के मुकाबले 2023 में बहुत मजबूत खड़ा है। भारत की सरकार भी कठोर है जिसे चीन भलीभांति जानता और समझता भी है। वरना, अभी तक तो कोई ना कोई गड़बड़ी कर चुका होता। कुछ हरकतें की भी जिसका उन्हें उनकी ही भाषा में जवाब भी मिला।चीन को लग रहा है, उनके इस निर्णय पर भारत सरकार में खलबली मचेगी लेकिन ऐसा हुआ बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि केंद्र सरकार चीनी मसले पर कोई जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहता। केंद्र सरकार अरुणाचल क्षेत्र पर आंच तक नहीं आने देना चाहती। 2017 में जब निर्वासित तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा हुई तब भी चीन ने हंगामा काटा था। चीन ने भारत सरकार पर खूब दबाव बनाया था ताकि भारत उनकी यात्रा रोक दें। यात्रा रोकने के बजाय भारत ने उलटे दलाई लामा की कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था में यात्रा को होने दिया और उन्हें राजकीय अतिथि के रूप में प्रोटोकॉल भी दिया। इससे चीन और आगबबूला हो गया। अंदर ही अंदर मन मसोसकर रह गया। उसी दौरान उनके विदेश उप-मंत्री का भारत दौरा था, उन्हें खुन्नस में आकर निरस्त कर दिया।बहरहाल, केंद्र सरकार चीन की प्रत्येक चाल को कुचलती आई है। नापाक हरकत करने का जरा भी मौका नहीं दे रही है। यही वजह है चीन जो भी कुछ कर रहा है, शंघाई में ही बैठकर। उसे पता है, मैदान में आकर उसे मुंह की ही खानी पड़ेगी। चीन ने भारत के खिलाफ नेपाल और पाकिस्तान को भी उकसा कर देख लिया, उससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। तालिबानियों से भी मदद मांग ली, उन्होंने भी खाली हाथ लौटा दिया। कुल मिलाकर वह चारों तरफ से अब अकेला पड़ गया है। नेपाल की सत्ता में चीन का बढ़ता कदम आने वाले समय में नेपालियों के लिए ही भारी पड़ने वाला है। उनके साथ मिलकर हमें परेशान करने की फिराक में था। वहां भी उनकी दाल नहीं गली।बहरहाल, भारत-चीन सीमा विवाद की एबीसीडी समझने की जरूरत है। 3500 किमी लंबी सीमा है जो तीन सेक्टरों में विभाजित है। अव्वल, पश्चिमी सेक्टर जो जम्मू-कश्मीर में 1597 क्षेत्रफल में फैला है। जहां, चीन का दखल नहीं है। दूसरा, मध्य सेक्टर है जो हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की साझा सीमाओं से सटा हुआ है जिसकी अधिकृत लंबाई 545 किमी है। यहां, भी उसकी ज्यादा कोई दखलंदाजी सीधे तौर पर नहीं है। तीसरा, क्षेत्र जो पूर्व क्षेत्र है वो अरुणाचल प्रदेश से सटा है, बारीक-सा हिस्सा सिक्किम से लगा है जिसकी लंबाई 1346 किमी है, जिसे वह कब्जाना चाहता है। जबकि, अक्साई क्षेत्र ऐसा है जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है, जो कभी हमारा हुआ भी करता था। जिसे चीन ने 1962 युद्ध के बाद कब्जा लिया था। तभी से ये भाग उसके कब्जे में है।वहीं, पूर्वी सेक्टर जो अरुणाचल प्रदेश में आता है, उसके पूरे भूभाग को चीन अपना बताता है, उस क्षेत्र में जितने भी भारतीय गांव-कस्बे बसे हैं उनका नाम बदल रहा है। नया विवाद यहीं से शुरू हुआ है। जबकि, ऐसी हरकतें वो एकाध दफे नहीं, बल्कि बीते एक दशक में पांचवीं बार कर चुका है। आगे भी करेगा, ऐसे में हिंदुस्तान सरकार को भी करीब 600 किमी में फैले अक्साई क्षेत्र के नामों को बदलकर अपने नाम दे देने चाहिए, क्योंकि उस क्षेत्र का पुराना नक्शा आज भी भारत सरकार के पास सुरक्षित है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
भाजपा स्थापना दिवस (6 अप्रैल) पर विशेषशिव प्रकाशएबीएन एडिटोरियल डेस्क। देश में राष्ट्रवाद, गरीब कल्याण, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण, पारदर्शिता का आचरण करते हुए कांग्रेस के सम्मुख विकल्प प्रस्तुत करने के लिए डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। भारतीय राजनीति के मूर्धन्य विद्वान पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा एकात्म मानववाद का वैचारिक आधार देकर जिसको पोषित करने का कार्य किया। अपने जन्म से सतत वृद्धि की ओर अग्रसर लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल के समय जनता पार्टी में विलीन हो गया।6 अप्रैल 1980 को मुंबई सागर तट पर अटल गर्जना के साथ अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा के संकल्प के साथ भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर नई पार्टी, भारतीय जनता पार्टी के नाम से प्रकट हुई। जिसका नेतृत्व भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने किया। आज वही भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 18 करोड़ सदस्यता वाली विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है। देश के अनेक राज्यों में सरकार एवं केंद्र में भारत का नेतृत्व कर रही है। अपने राष्ट्रवादी विचार, गरीब कल्याण की नीति, प्रखर एवं प्रामाणिक नेतृत्व के कारण देश के लिए वरदान सिद्ध हुई है।राजनीति के माध्यम से राष्ट्रवाद की स्थापना करते हुए राष्ट्रीय एकात्मता को पुष्ट करने का विचार भाजपा ने अपने जन्म काल से रखा। बूथ से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन तक लोकतंत्र का पालन करते हुए देश में लोकतंत्र का रक्षण भारतीय जनता पार्टी का संकल्प बना। समाज में बिना किसी भेदभाव के विकेंद्रित अर्थव्यवस्था का पालन करते हुए गरीब का उत्थान यही लक्ष्य ह।| बिना किसी भेदभाव अपनी-अपनी पूजा पद्धतियों का पालन करते हुए देश के विकास में सभी का सहयोग एवं देश प्रथम सिद्धांत का पालन करते शुद्ध आचरण से देशवासियों की सेवा भाजपा का लक्ष्य बना।हमारा देश विविधताओं से युक्त देश है। भाषा, जातियों, पूजा-पद्धति, खानपान, रंग-रूप एवं पहनावा हम सब को एक दूसरे से भिन्न दिखाते हैं। सतही तौर पर विचार करने वाले एवं विदेशी षड्यंत्रों से प्रभावित अनेक लोगों ने इस विविधता के विभेद को ही अपनी राजनीति का आधार बनाया। यह एक राष्ट्र नहीं, जातियों में परस्पर संघर्ष, आदिवासी, शहरवासी, सवर्ण दलित आदि के आधार पर अपनी रोटियां एवं वोट की फसल काटने का प्रयास किया। भाजपा प्रारंभ से ही एक राष्ट्र, एक जन, एक संस्कृति के सिद्धांत के आधार पर राजनीति करती आयी है। विविधता इसकी कमजोरी नहीं, इस देश का सौंदर्य है। उत्तर पूर्वांचल ने भी भाजपा को चुनाव जिताकर इस स्वर को प्रकट किया है इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि न तो अब उत्तर पूर्वांचल दिल्ली से दूर है और न ही दिल से दूर है। बंद, चक्का-जाम, आतंक अब समाप्त होकर वहां विकास की धारा बह रही है। कश्मीर 370 से मुक्त होकर केसर की सुगंध ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अनूठी पहल एक भारत श्रेष्ठ भारत के अंतर्गत काशी तमिल संगमय ने एकात्मता के विश्वास को गहरा किया है। वेरूवाडी, कच्छ, कश्मीर के लिए संघर्ष करने वाले भाजपा नेतृत्व ने राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकात्मता के भाव को जन-जन में जागृत किया है। इसी कारण देश के कोने-कोने से लेकर दुनिया के सुदूर स्थानों तक लाखों लोग देशभक्ति का संवत स्वर भारत माता की जय का उद्घोष कर रहे हैं।देश के राजनीतिक धरातल पर सक्रिय दल अपने दल के अंदर का लोकतंत्र खोते जा रहे हैं। चुनाव प्रक्रिया का पालन या तो है नहीं अथवा दिखावा मात्र है। कांग्रेस सहित देश की सभी क्षेत्रीय पार्टियां परिवारवाद के संकट से ग्रसित हैं। इस कारण उन दलों का प्रतिभावान नेतृत्व कुंठित होकर दल छोड़ रहा है अथवा निष्क्रिय है। जो दल अपनी पार्टी में लोकतंत्र को पालन नहीं कर सकते उनसे देश के लोकतंत्र की रक्षा की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। कांग्रेस ने तो आपातकाल देश को देकर लोकतंत्र को कुचलने का कार्य किया ही है। परिवारवाद के कारण देश का लोकतंत्र खतरे में आ सकता है यह आशंका अपने संविधान निर्माताओं के मन में भी थी। भाजपा ने अपने संविधान का पालन करते हुए निश्चित अवधि में बूथ से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव तक की प्रक्रिया का पालन करते हुए देश के लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान किया है। यही एक मात्र विचारधारा है, जिसने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने दल का अस्तित्व समाप्त किया। जबकि और दल चुनाव आयोग, ईवीएम एवं न्यायालय पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने का कार्य कर रहे हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान के इस व्यवहार ने भारतीय जनता के मन में भाजपा नेतृत्व के प्रति विश्वास को बढ़ाया है।गांधीजी अपने आर्थिक चिंतन में देश का विकास स्वदेशी एवं विकेंद्रित अर्थव्यवस्था के आधार पर चाहते थे। ग्राम पंचायत चुनना स्वराज का आधार था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सरकारों की सफलता का आधार गरीब कल्याण (अंत्योदय) को माना। स्वदेशी, सादगी, विकेंद्रित अर्थव्यवस्था से हम अपनी आर्थिक उन्नति करें, यह विचार उन्होंने दिया। किसान के खेत को पानी, रोजगार यह उनकी अर्थव्यवस्था के आधार थे। उत्पादन में वृद्धि खर्च में संयम का सिद्धांत उन्होंने दिया। प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा संचालित प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, नदियों को जोड़ने का प्रकल्प एवं सर्व शिक्षा अभियान, गरीब उत्थान एवं देश के ढांचागत विकास के अनुकरणीय उदाहरण है। उसी परंपरा में बहुगुणित वृद्धि करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गरीब कल्याण की अनेक योजनाएं, क्रियान्वयन में तकनीकी उपयोग, कृषि सिंचाई योजना एवं आत्मनिर्भरता का मंत्र गांधी जी एवं दीनदयाल जी के कल्पनाओं का साकार रूप है। जिसमें गरीब का विश्वास अर्जित करते हुए देश आर्थिक क्षेत्र में तीव्र गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है।तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय संस्कृति एवं भारतीय समाज पर आक्रमण ही राजनीतिक दलों की परंपरा बन गई थी। जो जितनी अधिक एवं कठोर गाली देगा वह सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्षवादी हो गया था। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे नेता एवं दल अपने धर्मनिरपेक्षता वाद का आवरण ओढ़ कर देशवासियों को शिक्षा दे रहे थे। जो हिंसा में लिप्त थे, वे धर्मनिरपेक्ष होने का ढोंग रच रहे थे। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भगवान श्रीराम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। धर्मनिरपेक्षता तुष्टीकरण का पर्याय हो गई थी। समाज दुखी मन से इन दलों के कारनामों को देख रहा था।भाजपा ने कहा हम विकास में कोई पक्षपात न करते हुए सभी को न्याय देंगे। इसी सोच के द्वारा अपनी गरीब कल्याण की योजनाओं के माध्यम से अल्पसंख्यक समाज के विकास का कीर्तिमान भी भाजपा सरकारों ने ही बनाया है। अपने सांस्कृतिक मान बिंदुओं के गौरव के लिए भाजपा ने कदम से कदम मिलाकर कार्य किया। आज भारत का सांस्कृतिक गौरव सूर्य के समान चमक रहा है। विश्व में चोरी करके ले जायी गयी मूर्तियों को वापस लाने का कार्य हो अथवा श्रीराम मंदिर का भी कॉरिडोर, केदारनाथ जी का सौंदर्यीकरण, महाकाल लोक का निर्माण सभी अपनी गौरवगाथा कह रहे हैं। सूफी संतों से संपर्क, बोहरा एवं पसमांदा मुस्लिम समाज के विकास की योजनाएं एवं वन डे वन चर्च जैसे प्रयास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सर्वधर्म समभाव को प्रकट करते हैं।2014 से पूर्व प्रतिदिन के समाचार पत्रों में भ्रष्टाचार सुर्खियों में रहता था। राजनेता एवं राजनीतिक दल जैसे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे थे। सरकारी संपत्ति हमारे व्यक्तिगत उपयोग के लिए है, जैसे सिद्धांत गढ़े जा रहे थे। 2014 के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने न खाऊंगा न खाने दूंगा का उद्घोष करके राजनीति में पारदर्शिता की मिसाल कायम की। देश प्रथम के सिद्धांत का पालन करने वाले अनेक राजनीतिक कार्यकर्ता भाजपा की देन हैं। जिन्होंने सत्ता के प्रतिष्ठान पर पहुंचकर भी अपनी ईमानदारी की छवि को बनाया है। राजनीति में सब कुछ जायज है, जहां यह सिद्धांत प्रतिपादित किया जाता है, वहीं ईमानदारी से सरकार चलाई एवं पुनः बनायी जा सकती है, यह भाजपा नेतृत्व ने सिद्ध किया है। 2014 से पूर्व में लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतारना पड़ता था, अब भ्रष्टाचारी अपने बचाव में सड़कों पर उतर रहे हैं। इसके कारण जीवन मूल्य राजनीति में जीवित है, यह विश्वास जनता में जागृत हुआ है।देश की स्वतंत्रता एवं विकास में सभी का योगदान है। इसके आधार पर सभी महापुरुषों का सम्मान, परमाणु विस्फोट एवं रक्षा क्षेत्र में आधुनिक सेना एवं शत्रु के द्वारा भारत को सम्मानित स्थान विश्व में भाजपा ने दिलाया है। विश्व भर में भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता स्थापित की है। इसका परिणाम है कि केवल भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व भारतीय जनता पार्टी को एवं उसके नेतृत्व को आशा भरी दृष्टि से देख रहा है। आधुनिकता के साथ, सेवा एवं भारत के विकास का संकल्प ही भाजपा का मंत्र है। इसी आधार पर उसके कार्यकर्ता पन्ना प्रमुख तक की संरचना कर रहे हैं। भाजपा भारत की आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाली पार्टी है जो अपने सेवा भाव से भारत के लिए वरदान सिद्ध होगी। (लेखक, भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री हैं।)
मनोज शर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। पहले टेपरिकॉर्डर में लोग फिल्मों के डायलॉग सुना करते थे। शोले, मुगले आजम, मजदूर जैसी फिल्मों के डायलॉग खूब चले। कुछ फिल्मों के डायलॉग दो कैसेट में आते थे। वोल्युम1-2 करके।मैने भी बचपन में मुगले आजम के डायलॉग कैसेट खूब बजाये हैं।उसकी शुरुआत धीर गंभीर आवाज में ऐसे होती थी... मैं हिंदूस्तान हूं... फिल्म में अकबर को शहंशाह , महाबली और सलीम को साहब ए आलम संबोधित किया गया है। तब की बेवकूफी ऐसी कि दो घंटे डायलॉग सुनते और इंतजार कि हां अब ये वाला गाना बजेगा...फिर बजता... हमें काश तुमसे मोहब्बत न होती?फिर कुछ मिनट खालिस उर्दू में अनारकली के लिये अकबर और सलीम में फालतू की किचकिच के बाद गाना बजता... तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे।मार्के की बात ये थी कि पूरे डायलॉग को सुनने के बावजूद मेरा बाल मन ये न जान पाया था कि इस लड़ाई में शहंशाह जीता कि साहब ए आलम?एक बार मैने अपने पापा से पूछा कि पापा अंत में किसकी जीत हुई? पापा ने कुछ गोल मोल सा बता दिया था कि सलीम मरने से बच गया था क्योंकि तोप के नाल को किसी ने ऊपर उठा दिया और अनारकली को दीवार में चुनवा देने के नाम पर सुरंग के रास्ते भारत से बाहर भेज दिया गया और सलीम को बता दिया गया कि अनार कली दीवार में चुनवा कर मुआ दी गयी। लेकिन मेरी उत्सुकता बनी रही। बाद में फिल्म देख कर ये पता चला कि पूरी फिल्म सलीम के एक नाचने वाली दाई अनारकली के प्यार के इर्द गिर्द फैंटेसी पर बनी थी।लेकिन फिल्म के संवाद और स्कूल के इतिहास के किताब को पढ़ने का दिमाग पर गहरा मानसिक असर हुआ। मैं लंबे समय तक भारतीय इतिहास को सिर्फ मुगलों का इतिहास ही समझ बैठा। मेरी बाबर, हुमायू, अकबर, जहांगीर के प्रति सिंपैथी थी। उन स्कूली किताबों में अकबर की तस्वीर के नीचे कैप्शन में "अकबर महान" लिखा होता था। अकबर से युद्ध में हेमू के आंख में तीर लगकर मरने के वाकये को पढकर मैं खुश होता था। एक बार गांव में दशहरे में नाटक खेला गया "राणा संग्राम" उसमें भी मेरी इच्छा बाबर को जीतते देखने की ही थी।अकबर के बचपन के बारे में पढ कर लगता था कि बेचारा टुअर था। उसका बाप हुमायूं तो सीढियों से गिर कर मर गया था और दस बारह वर्ष की उम्र में ही गद्दी पर बैठना पड़ा था।मेरी छोटी बहन ने आर्ट्स लिया था। मैने साइंस से आनर्स करने के बाद उसके इतिहास के पूरे किताब को पढ़ा। तब कुछ कुछ अहसास कि मैं अब तक सिर्फ मुगलों के इतिहास को ही भारत का इतिहास समझे बैठा था।दरअसल, स्कूली किताबों और बौलीवूड की फिल्मों ने मुगलों को लेकर हमें बचपन में ब्रेनवाश किया था। समय के साथ हमें भान हुआ कि बाबर, औरंगजेब ने क्या किया और मुगलों का काल ही पूरा भारतीय इतिहास नहीं बल्कि वह एक अध्याय भर है। तब स्कूली इतिहास के किताब में कहीं ये नहीं पढ़ा कि औरंगजेब ने हिंदुओं पर कितने कर लगाये, कितने मंदिर ढहाये। वैसे ही टीपू को भी पढ़ाया गया।अभी एक सूचना है कि यूपी के स्कूली किताबों से मुगलों का इतिहास घटाया जायेगा। यानि अब ढाई सौ साल का इतिहास एक सामान्य अध्याय की तरह ही होगा। ठीक ही है। अब हर सच्चाई को किताबों में शामिल करना चाहिए। हमलावरों की सही तस्वीर, यहां के शासकों के हार जीत का भी सही विवरण हो, धर्म, विध्वंस, प्रतिकार और उन शासकों का भी विस्तृत इतिहास होना जरूरी है जो मुगलों से पहले भी थे बाद भी। वर्ना अब तक तो यही पढ़ते आये हैं कि भारत का इतिहास मने सिर्फ मुगल काल। बाकी सब कल्पनाएं हैं।
श्याम जाजूएबीएन एडिटोरियल डेस्क। राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन में सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए बेबुनियाद बातें करना, गलत शब्दों के प्रयोग, अनावश्यक लांछन लगाने की प्रवृत्ति नई बात नहीं है। ऐसे अनेक प्रसंग हैं। इससे वह देश में हास्यापद हो गए हैं। लोग चटखारे लेते हैं। इससे बड़ा नुकसान उनकी पार्टी को तो हुआ ही है, साथ ही गांधी परिवार चरित्र चर्चा के दायरे में आ गया है। सूरत के विधायक पूर्णेश मोदी का राहुल के ऐसे ही बयान पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा सुर्खियों में हैं। इस मुकदमे के अदालती फैसले से राहुल ने संसद की सदस्यता से अयोग्य घोषित हो गये हैं। यह कहने में संकोच नहीं है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर राहुल का यही अतिरेक ही इस गति का कारण बना। 2019 में कर्नाटक की एक सभा में राहुल ने प्रधानमंत्री की पिछड़ी जाति का अपमान करते हुए कहा था कि देश के सब मोदी चोर क्यों होते हैं। यही वो बयान है जिस पर अदालत ने राहुल को दो साल की सजा सुनायी है।माना कि सोने की चम्मच मुंह में लेकर राहुल राजप्रसाद में जन्मे हैं। उनकी पीढ़ियों ने देश में लंबे समय तक राज किया है। वो भी लोकसभा के सदस्य रहे हैं। कांग्रेस की कमान संभाल चुके हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं वह गरीब परिवार में जन्मे और राजनीति के फलक पर चमक रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपमान करेंगे। दूरदर्शी मोदी तीन दशक से पूरे विश्व को प्रभावित कर रहे हैं। आज देश-दुनिया में उनकी लोकप्रियता भारत के हर नागरिक का सिर गर्व से ऊंचा कर रही है। सत्ता में रहने का अधिकार केवल एक ही परिवार को नहीं होता। इसे कांग्रेस और राहुल को समझना होगा।सत्ता वियोग के दुख से हताश राहुल गांधी अगर कोपभवन से नहीं निकले तो वह दिन दूर नहीं जब देश की जनता उन्हें और उनकी पार्टी को पूरी तरह खारिज कर देगी। राहुल को अहंकार त्यागना होगा। वैसे गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों की मानसिकता का इतिहास कौन नहीं जानता। इन लोगों ने अपने गलत बयानों के लिए कभी माफी नहीं मानी। यह ऐतिहासिक साक्ष्य है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस जब बहुमत से कांग्रेस के अध्यक्ष बने तब राहुल के पड़नाना नेहरू परेशान थे। उनके द्वेषपूर्ण रवैये की वजह से ही नेताजी को भारत से बाहर जाना पड़ा। स्वतंत्र भारत में उनकी मृत्यु का रहस्य कांग्रेस राज में फाइलों में दफन रहा। नेहरू ने कभी इस ऐतिहासिक गलती के लिए माफी नहीं मानी।सावरकर और संघ के प्रति दुर्भावना गांधी परिवार की खानदानी परिपाटी है। यही कारण है कि नेहरू ने गांधी जी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर पर आरोप जड़े। देशभक्त स्वयंसेवकों और सावरकर को जेल में बंद कर दिया। संघ पर प्रतिबंध लगा दिये गये। शर्मनाक यह है कि अदालत ने जब सबको बेदाग घोषित कर दिया तब भी नेहरू ने माफी नहीं मांगी।पाकिस्तान के साथ पहले युद्ध में नेहरू के कार्यकाल के समय कश्मीर का कुछ हिस्सा हमसे छीन लिया गया। यह भू-भाग आज तक वापस नहीं आया। इसका जिक्र कभी भी गांधी परिवार नहीं करता। इस ऐतिहासिक गलती पर माफी मांगना तो दूर की बात है। 1962 के युद्ध में नेहरू के चाइना प्रेम के कारण हिंदी चीनी भाई-भाई के नारों के बावजूद अपना कुछ भू-भाग चाइना के पास चला गया। सीमा क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत न होने से अपने सैनिकों को युद्ध में बड़े पैमाने पर शहादत देनी पड़ी। हार स्वीकारनी पड़ी। तब भी नेहरू ने देश से माफी नहीं मांगी।राहुल की दादी इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का अपमान करते हुए अपनी कुर्सी बचाने के लिए इमरजेंसी लगा दी। राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया। जबरदस्ती लाखों लोगों की नसबंदी कर दी गयी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, आचार्य कृपलानी और देशभक्त अटल बिहारी वाजपेयी तक को जेल भिजवा दिया। ढाई साल बाद हुए आम चुनाव में देश ने कांग्रेस के साथ इंदिरा गांधी का सत्ता से उखाड़ फेंका। देश ही नहीं दुनिया जानती है कि इमरजेंसी के लिए इंदिरा गांधी और राहुल के चाचा संजय गांधी ने कभी माफी नहीं मांगी।1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और सिखों के नरसंहार पर राहुल के पिता राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि बड़ा वृक्ष गिरने के बाद जमीन तो हिलती ही है। यह ऐसी टिप्पणी है जिसे कभी भी सिख समुदाय भूल नहीं सकता। अफसोस यह है कि राजीव गांधी ने कभी भी इस बयान के लिए न तो पाश्चाताप किया, न ही माफी मांगी।इससे साफ है कि गांधी परिवार के नस-नस में अहंकारी प्रवृत्ति है। यह लोग भारत को अपनी जागीर समझते हैं। यह परिवार संगठन में खुद को सबसे ऊंचा समझता है। अगर किसी ने विद्रोह करने की कोशिश की तो उसका अपमान करने में देर नहीं लगाते। यह गांधी परिवार अध्यादेश तक को फाड़ने से पीछे नहीं हटता। निजलिंगप्पा, नीलम संजीव रेड्डी, सीताराम केसरी, मोरारजी देसाई जैसे तमाम नेता हैं जिन्होंने गांधी परिवार के अपमान को सहते हुए खून का घूंट गटका है।राहुल का यह व्यवहार केवल देश में, संसद में या सार्वजनिक सभाओं तक सीमित नहीं है। वह विदेश में भी देश की बदनामी करने में अपनी शान समझते हैं। इसके लिए हल्ला मचे तब भी देश से माफी नहीं मांगते। अब अगर अदालत ने सजा सुनायी है तो इसमें सरकार का क्या कुसूर? जैसी करनी वैसी भरनी है। राहुल को लोकतंत्र और न्यायपालिका का सम्मान करते हुए इस मसले पर राजनीतिक रोटियां सेकने का कार्यक्रम बंद करना चाहिए।लोकतंत्र में हम करें सो कायदा नहीं चलता है। संयोग या दुर्योग से माफी मांगने की परिपाटी आपके खानदान में नहीं है, तो आपसे क्या अपेक्षा की जाये? (लेखक, भारतीय जनता पार्टी के निवर्तमान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
मूर्ख दिवस (1 अप्रैल) पर विशेष योगेश कुमार गोयल एबीएन सोशल डेस्क। विश्वभर के लगभग सभी देशों में पहली अप्रैल का दिन फूल्स डे अर्थात् मूर्ख दिवस के रूप में ही मनाया जाता है। कोई छोटा हो या बड़ा, इस दिन हर किसी को जैसे हंसी-ठिठोली करने का बहाना मिल ही जाता है और हर कोई किसी न किसी को मूर्ख बनाने की चेष्टा करता नजर आता है। लोग एक-दूसरे को किसी तरह का नुकसान पहुंचाये बिना ऐसी असत्य और मनगढंत कल्पनाओं को ही यथार्थ का रूप देकर, जिन पर कोई भी आसानी से विश्वास कर सके, एक-दूसरे को मूर्ख बनाने की चेष्टा करते हैं और अक्सर बहुत चतुर समझे जाने वाले व्यक्ति भी मूर्ख बन ही जाते हैं। शायद यही कारण है कि इस दिन चाहे कोई किसी का कितना ही विश्वासपात्र क्यों न हो, मस्तिष्क में यह बात विराजमान रहती है न कि कहीं यह हमें मूर्ख तो नहीं बना रहा! कई बार होता यह भी है कि लोग कोशिश तो करते हैं दूसरों को मूर्ख बनाने की लेकिन इस कोशिश में खुद ही मूर्ख बन जाते हैं और जब ऐसा होता है तो वाकई बड़ा मनोरंजक माहौल बन जाता है। कभी-कभी तो इस दिन सैकड़ों-हजारों की संख्या में लोग एक साथ मूर्ख बनते भी देखे गए हैं। पहली अप्रैल को मूर्ख दिवस के रूप में मनाये जाने का कारण यह माना जाता रहा है कि पुराने जमाने में चूंकि नए साल की शुरूआत 1 अप्रैल से ही होती थी, अत: लोग इस दिन को हंसी-खुशी गुजारना चाहते थे ताकि उनका पूरा साल हंसी-खुशी बीते। लोगों की इसी धारणा के चलते 1 अप्रैल को हास्य दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई थी लेकिन धीरे-धीरे लोगों का उत्साह इस दिवस के प्रति कम होने लगा तो कुछ लोगों ने इस दिन कृत्रिम हास्य के जरिये दूसरों को बेवकूफ बनाना शुरू कर दिया। लोगों को भी यह अंदाज इतना पसंद आया कि इस परम्परा ने धीरे-धीरे मूर्ख दिवस का रूप ले लिया। अप्रैल फूल बनाने की पश्चिमी देशों में शुरू हुई परम्परा भारतीय संस्कृति में कब और कैसे प्रवेश कर गई, यह पता भी न चला। भले ही इस परम्परा पर पाश्चात्य संस्कृति का रंग बहुत गहरा चढ़ा है पर यदि हम इस परम्परा में निहित उद्देश्यों को गहराई में जाकर देखें तो गौरवशाली भारतीय संस्कृति के आधार पर भी यह परंपरा गलत नहीं ठहराई जा सकती क्योंकि आज की भागदौड़ भरी अस्त-व्यस्त जिंदगी में व्यक्ति के पास जहां चैन से सांस लेने के लिए दो पल की भी फुर्सत नहीं है। वहीं इस दिवस के बहाने साल में सिर्फ एक दिन ही सही, व्यक्ति को खिलखिलाकर हंसने का मौका तो मिलता है। संभवत: मूर्ख दिवस मनाने की परम्परा की पृष्ठभूमि में व्यस्त जिंदगी में मानव मन को कुछ पल का सुकून प्रदान करने की प्रवृति ही समाई है लेकिन इसके साथ-साथ इस मौके पर इस बात का ध्यान रखा जाना भी अत्यंत आवश्यक है कि मूर्ख दिवस सभ्य मजाक के जरिये किसी को कुछ समय के लिए मूर्ख बनाकर मनोरंजन करने का दिन है। अप्रैल फूल के बहाने जानबूझकर किसी के साथ ऐसा कोई मजाक न करें, जिससे उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचे या उसका कोई अहित अथवा नुकसान हो। मूर्ख दिवस की आड़ में किसी से अपनी दुश्मनी निकालने या अपने अपने किसी अपमान का बदला लेने की चेष्टा भी नहीं होनी चाहिए। यदि आप विशुद्ध भावना से शुद्ध हास्य के जरिये इस दिन किसी को मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं तो सभवत: उस व्यक्ति को आपके मजाक का बुरा भी नहीं लगेगा। वैसे भी शुद्ध हास्य तनाव से मुक्ति प्रदान करने के साथ-साथ मन में आपसी प्रेम भाव तथा भाईचारे की भावना का संचार भी करता है और शुद्ध हास्य से सराबोर माहौल और भी खुशनुमा बन जाता है। ऐसे में मूर्ख दिवस मनाने की प्रासंगिकता आज के तनाव व घुटन भरे माहौल में बहुत बढ़ जाती है। हमारे यहां गधे और उल्लू को हमेशा मूर्ख की उपमा दी जाती रही है, इसलिए अपने दोस्तों, परिचितों अथवा संबंधियों को एक अप्रैल के दिन कुछ समय के लिए ही सही, मूर्ख बनाकर अपना व दूसरों का स्वस्थ मनोरंजन करने में कोई हर्ज नहीं है। यदि ऐसा करते समय शालीनता, शिष्टता व सभ्यता की उपेक्षा न की जाए तो कोई संदेह नहीं कि मूर्ख दिवस की महत्ता आज के दमघोंटू माहौल में कई गुना बढ़ जाती है और वर्ष भर में एक दिन के लिए ही सही, यह दिन हमें हंसी-खुशी के फव्वारे छोड़ने अर्थात् खिलखिलाकर हंसने-हंसाने तथा मनोरंजन करने का भरपूर अवसर प्रदान करता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
मुरलीधरपाप पुंज से भरे, लदेडहे हुए से हममन की चंचलतापाप-पुण्य से बंधे हुए से हमकुछ करते, कुछ सोचते कुछ करने को तैयार मनबुद्धि कलियुगी भटकातीबिलगाती और रुलातीभाग दौड़कर थकते-थकते मन को भाता अंधकारमय कोठरीअसहज हो बंद आखेंकथित नींद में क्या नहीं पातेअंतहीन दुख और सुख
गिरीश्वर मिश्रएबीएन एडिटोरियल डेस्क। श्रीराम विष्णु के अवतार हैं। सृष्टि के कथानक में भगवान विष्णु के अवतार लेने के कारणों में भक्तों के मन में आये विकारों को दूर करना, लोक में भक्ति का संचार करना, जन-जन के कष्टों का निवारण और भक्तों के लिए भगवान की प्रीति पा सकने की इच्छा पूरा करना प्रमुख हैं। सांसारिक जीवन में मद, काम, क्रोध और मोह आदि से अनेक तरह के कष्ट होते हैं और उदात्त वृत्तियों के विकास में व्यवधान पड़ता है।रामचरितमानस में इन स्थितियों का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है, नीच और अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं और अन्याय करने लगते हैं, पृथ्वी और वहां के निवासी कष्ट पाते हैं तब-तब कृपानिधान प्रभु भांति-भांति के दिव्य शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं। एक भक्त के रूप में तुलसीदास जी का विश्वास है कि सारा जगत राममय है और उनके मन में बसा भक्त कह उठता है सीय राममय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी। सारे जगत में चारों ओर राम को देखना भक्ति की पराकाष्ठा भी है और समदर्शी हो कर ऊपर से दिखने वाले विरोधों और उनसे उपजने वाली विपदाओं से उबरने का उपाय भी।आज के दौर में समानता से ज्यादा अनोखे, अद्वितीय, सबसे अलग, औरों से कुछ हट कर खुद को दिखने-दिखाने का रिवाज जोरों पर चल पड़ा है। वेश-भूषा, आचार-विचार, बात-व्यवहार सबमें अपने लिए आत्यंतिक फर्क साबित करना आज श्रेष्ठता का मानदंड होता जा रहा है। हम विविधता का उत्सव मनाने को सदैव व्याकुल रहने लगे हैं। औरों से अलग होना निश्चय ही बहुमूल्य होता है क्योंकि वह नवीनता लाता है। नवीनता मन के लिए रमणीय होती है और इसलिए वह प्रिय भी हो जाता है। नये, यानी जो पहले से भिन्न या अपूर्व है, उसे मौलिक कहा जाता है। उसे समाज में आदर मिलता है और पुरस्कृत भी किया जाता है। कहते हैं सृजनात्मक होने के लिए किसी चीज को मौलिक, उपयोगी और प्रासंगिक होना चाहिए। अस्तित्व की मौलिक एकता से विविधता की ओर आगे बढ़ती मनुष्य की दिग्विजय यात्रा निश्चय ही मोहक और चित्ताकर्षक है। परंतु भिन्नता के अति आग्रह या दुराग्रह कुछ कठिन सवाल भी खड़ा करने लगता है क्योंकि सिर्फ विविधता और भिन्नता की सिद्धि के लिए विविधता को बढ़ाते जाने से जीवन-यात्रा नहीं सधती।धरती पर जिस भौतिक दुनिया में हम रहते हैं वहां बड़ी भारी मात्रा में नाना प्रकार के पदार्थ मौजूद हैं और वे सभी अपने गुण धर्म में एक दूसरे से अलग भी हैं। मनुष्य जीवन के स्तर पर भाषा, धार्मिक विश्वास, खान-पान आदि में भी यह विविधता व्याप्त है। यह विविधता जिस तरह बढ़ती जा रही है उसका कोई ओर-छोर नहीं दिखता। इसलिए उसकी गणना करना आसान नहीं है। इंद्रियानुभव पर जोर देने वाले वैज्ञानिक युग में इस तरह के विश्लेषण की अंतहीन सम्भावनाएं हैं और उसके तरह-तरह के परिणाम भी होते हैं।हमारा शरीर भी अन्यान्य अंगों और उपांगों से बना है और वे सभी भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं। हाथ, पैर, आंख, नाक और कान न केवल अपनी रचना में एक दूसरे से भिन्न हैं बल्कि इन सबका अलग-अलग उपयोग है और सामान्यत: एक दूसरे की जगह भी नहीं ले सकते। ये सभी स्वभावत: भौतिक जगत के भिन्न-भिन्न विषयों से जुड़े होते हैं। यह विविधता अनेक तरह के कार्यों को सम्पादित करना सम्भव बनाती है। निश्चय ही क्षमता का यह विस्तार जीवनी शक्ति या प्राणवत्ता से अनिवार्य रूप से जुड़ी होती है। इस तरह विविधता के अंतर्सम्बन्ध को पहचानना जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।भिन्नता पैदा करना या भेद देखना चीजों को एक को दूसरे के विपरीत खड़ा करता है। इससे उपजने वाला अलगाव दूरियां पैदा करता है और हम जो भिन्न है उसमें दोष-दर्शन करने लगते हैं। दूसरी ओर जो समान लगता है उससे स्नेह, निकटता और मित्रता का रिश्ता बनाने लगाते हैं। धीरे-धीरे समय के साथ भिन्न छिजें कब खिसक कर विरोध के ख़ेमे में पहुंच जाती हैं इसका अंदाज़ा ही नहीं लगता। आज की दुनिया की प्रमुख समस्याएं भिन्नता और विरोधजनित असंतोष, तनाव और हिंसा के रूप में उभरती दिख रही हैं। अलग नाम का उपयोग पहचान के लिए होता है परंतु यदि वह किसी लाभ से जुड़ जाय तो वह अलगाव का आधार बन कर समानता पर छा जाता है। जब मैंपन का अहसास तीव्र होता है और हम अपने अकेले मैं को सबसे परे और सबके ऊपर रखने के लिए उद्यत होते हैं तो समानता ढंकती और बिसरती जाती है। दूसरी ओर भिन्नता प्रखर होती जाती है। तब हम भिन्नता को बचाए और बनाये रखने की कोशिश में लग जाते हैं। मैं के अखंड विस्तार में जो मेरा है उससे जो भिन्न या ममेतर है उसके साथ टकराव खड़ा हो जाता है। मैं का अहंकार फ़ुंफकार मारता है। उसे अन्य फूटी आंख भी नहीं सुहाता और तब द्वंद्व का बीजारोपण होता है और कलह की पौध पनपती है।एक और अनेक के बीच के रिश्ते राचीन काल से मनुष्य की सोच के केंद्र में रही है। पुरा काल के सृष्टि के आख्यानों में एक यह भी है की ईश्वर या परमात्मा को अकेले अच्छा नहीं लग रहा था ( स एकाकी न रमते ) और तब उसने एक से अनेक होने की इच्छा की (एकोहं बहुस्याम् ) और फिर जो भी दूसरा रचा गया उसमें वह स्वयं प्रवेश कर गया। इस आख्यान का एक आशय परमात्मा की उपस्थिति की व्याप्ति को दर्शाना है।ईशावास्योपनिषद भी यही कहता है – ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत्- अर्थात् यह दुनिया ईश्वर की वासस्थली है। इसलिए यहां हर जगह ईश्वर की उपस्थिति है। इस विचार की पराकाष्ठा शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में हुई जिसमें यह प्रतिपादित किया गया- सर्वं खल्विदम् ब्रह्म – अर्थात् जो कुछ है वह ब्रह्म ही है। सर्वव्यापी ब्रह्म, ईश्वर या परमात्मा की संकल्पना जीवन जीने के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करती है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी जगत को सीय-राममय कह कर भी सम्भवत: यही भाव व्यक्त कर रहे हैं। वे सारा जगत एक ही तत्व वाला है या एक ही तत्व का प्रकाश है... इस विचार की प्रतिष्ठा करते दिखते हैं। वस्तुतः यह मान कर ही सृष्टि मात्र में गुणवत्ता और शक्ति की प्रतिष्ठा हो सकेगी और हम उनका वास्तविक मूल्य समझ सकेंगे। आज हम पृथ्वी, जल, वायु आदि सभी को उपभोग्य वस्तु और खुद को उपभोक्ता मान कर बिना विचारे बहिचक उनका शोषण करते हैं। यह अलग बात है कि अब इस स्वार्थ वृत्ति का हानिकर पहलू उभर कर सामने आने लगा है। यदि पूरा जगत राममय है तो वह भी श्रीराम की ही तरह पूजनीय और वंदनीय हैं। श्रीराम सत्य, तप, तितिक्षा, संतोष, धैर्य, धर्मपरायणता की प्रतिमूर्ति है। श्रीराम का भाव परदुःखकातरता के साथ प्रतिष्ठित है। राममय होने के साथ यह आशा भी बलवती होती है कि राम के अनुगामियों में इन सब सद्गुणों की वृद्धि होगी। दायित्व आने के साथ शक्ति की उपस्थिति होगी। विरोध और वैमनस्य की जगह आदर और सम्मान ले लेते हैं। राम को समदर्शी, दीन बन्धु, भक्तवत्सल और करुणाकर आदि कहा गया है। जो सीय-राम-मय होगा, वह इन सब भावों से आप्लावित होगा, उसमें ये सब भाव भी उपस्थित होंगे। तब जगत की अनुभूति और प्रतीति का नजरिया तथा पैमाना बदल जाएगा। राम भाव की उपस्थिति में साम्य देखना सम्भव होगा और सम्यक् व्यवहार भी सध सकेगा।सब में किसी एक तत्व की उपस्थिति सब की अनुकूलता को द्योतित करती है जिससे सबके हित की सम्भावना बनती है। ऐसे में सभी एक दूसरे का भला करना चाहेंगे क्योंकि तब दूसरा पराया नहीं रह जायेगा। ऐसे ही उदार व्यक्ति के लिए कहा गया कि निज और पर का भेद मिट जाता है। वह अपने में सबको और सबमें अपने को देखता है। इस नये समीकरण में परस्पर भरोसा मुख्य हो जाता है। तब प्रतिरोध कम होता जाता है और परस्पर समर्थन बढ़ता है। सबको अपने जैसा मानने के कई परिणाम होते हैं। अपने अस्तित्व-बोध का विस्तार कर जो अपने लिए ठीक या प्रिय नहीं लगता उसे दूसरों के साथ करने से बचते हैं। उनके लिए आत्मन: प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत् का विचार जीवन का पाथेय सा हो जाता है। तभी सर्व और सर्वोदय की संकल्पना पुरेगी, सर्वे भवंतु सुखिन: की कामना फलवती होगी और राम-राज्य का संकल्प पूरा हो सकेगा।भेद-बुद्धि को जीवन में अपनाना कितना सतही, सरलीकृत, भ्रामक और हिंस्र है इसका अनुभव हम सब अपने जीवन में नित्यप्रति करते रहते हैं। क्षुद्र मानसिकता वाला यह भाव विचलित और स्खलित कर देने वाला होता है। ऐसी पाप बुद्धि के चलते अहंकार प्रचंड होने लगता है। तब एक दूसरे को नीचा दिखाना, चोट पहुंचाना, परवाह न करना और आधिपत्य ज़माना आसान हो जाता है। अहं भाव की अनर्गल वृद्धि के बीच हम दूसरे या किसी अन्य का अस्तित्व ही नहीं स्वीकार करना चाहते। सीय राममय कह कर तुलसीदास जी समूची सृष्टि को प्रिय और अभिनंदनीय बनाते हैं। वे यह संदेश भी देते हैं कि वह लोक जिसमें हम विचरण करते हैं सौहार्द और सामरस्य का आगार है क्योंकि राम सबके हैं और सबमें उपस्थित हैं। लोक-मानस में राम आज भी व्याप्त हैं तो इसीलिए कि वे स्वयं ही लोकाराधक हैं। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
विश्व टीबी दिवस (24 मार्च) पर विशेषयोगेश कुमार गोयलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। तपेदिक रोग के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है, जिसे विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में भी जाना जाता है। इस वैश्विक कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य लोगों को उन प्रयासों से अवगत कराना भी है, जो न सिर्फ इस बीमारी को रोकने बल्कि इसके उपचार के लिए किये जा रहे हैं।टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) को क्षय रोग तथा तपेदिक के नाम से भी जाना जाता है, जो एक जीवाणु के कारण होने वाला फेफड़ों का एक गंभीर संक्रमण है। यह खांसने अथवा छींकने पर हवा में छोड़ी गयी छोटी बूंदों से फैलता है। ड्रॉपलेट्स के जरिये फैलने वाले बैक्टीरिया कई घंटों तक हवा में रह सकते हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक टीबी दुनिया में मृत्यु के सबसे घातक और संक्रामक कारकों में से एक है, जो विश्वभर में होने वाली मौतों के शीर्ष 10 कारणों में शामिल है। डब्ल्यूएचओ की 2019 में घोषित रिपोर्ट के आधार पर दुनियाभर में एक करोड़ लोग टीबी से संक्रमित थे, जिनमें से 26.9 लाख लोगों को भारत में टीबी था। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक प्रतिदिन 4100 से भी ज्यादा लोग टीबी के कारण अपनी जान गंवाते हैं और करीब 28 हजार लोग इस रोकथाम योग्य और इलाज योग्य बीमारी से बीमार पड़ते हैं। टीबी के कारण प्रतिवर्ष दुनियाभर में करीब 15 लाख लोग मौत की नींद सो जाते हैं। डब्ल्यूएचओ टीबी को दुनिया के सबसे घातक संक्रामक हत्यारों में से एक मानता है। हालांकि टीबी से निपटने के वैश्विक प्रयासों के चलते वर्ष 2000 से लेकर अभी तक साढ़े छह करोड़ से भी ज्यादा लोगों की जान बचायी जा चुकी है।विश्व टीबी दिवस प्रतिवर्ष एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है और इस साल टीबी दिवस की थीम (हां! हम टीबी को समाप्त कर सकते हैं) है। रोग नियंत्रण और रोकथाम के लिए केंद्र (सीडीसी) के मुताबिक तपेदिक लगभग 30 लाख साल पुराना रोग है और विभिन्न सभ्यताओं में इसके अलग-अलग नाम थे। टीबी को प्राचीन रोम में टैब, प्राचीन ग्रीस में फथिसिस और प्राचीन हिब्रू में स्केफेथ कहा जाता था। मध्य युग के दौरान गर्दन तथा लिम्फ नोड्स के टीबी को स्क्रोफुला कहा जाता था, जिसे फेफड़ों में टीबी से अलग बीमारी माना जाता था। 1800 के दशक में इसे खपत के रूप में जाना जाता था। माना जाता है कि तपेदिक शब्द 1834 में जोहान शोनेलिन द्वारा गढ़ा गया था। 24 मार्च 1882 के दिन एक जर्मन चिकित्सक और माइक्रो बायोलॉजिस्ट डॉ रॉबर्ट कोच ने पाया कि इस बीमारी का कारण टीबी बैसिलस था। डॉ रॉबर्ट कोच द्वारा इस जानलेवा बीमारी के कारक बैक्टीरिया की पहचान करने की पुष्टि के फलस्वरूप ही टीबी के निदान और इलाज में दुनियाभर के वैज्ञानिकों को बड़ी मदद मिली। इसके ठीक 100 वर्षों पश्चात 1982 में इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट ट्यूबरक्लोसिस एंड लंग डिजीज ने इसी तारीख को विश्व टीबी दिवस के रूप में घोषित किया और 1996 में इस दिवस को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अन्य संगठनों के साथ डब्ल्यूएचओ भी इस संघ में शामिल हो गया, जिसके बाद औपचारिक रूप से 1998 में स्टॉप टीबी पार्टनरशिप की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य टीबी से लड़ने के साथ-साथ इसे रोकना भी था।हालांकि दुनिया को टीबी से मुक्ति के लिए वर्षों से प्रयास हो रहे हैं लेकिन विडंबना है कि भारत टीबी से सर्वाधिक प्रभावित एशियाई देश है। वैश्विक टीबी रिपोर्ट के अनुसार 2020 में भारत में टीबी के कुल 26.4 लाख मरीज थे और वर्ष 2019 में टीबी विकसित करने वाले देशों में भारत की 26 फीसदी हिस्सेदारी थी। हालांकि भारत अब तेजी से टीबी उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसी क्रम में भारत सरकार द्वारा एक विशेष कार्यक्रम प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान की शुरूआत की जा चुकी है। जहां दुनिया ने 2030 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है, वहीं भारत का संकल्प 2025 तक टीबीमुक्त होना है।राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कहना है कि भारत में दुनिया की आबादी का 20 प्रतिशत से कुछ कम है लेकिन दुनिया के कुल टीबी रोगियों का यहां 25 फीसदी से भी ज्यादा है, जो चिंता का विषय है। उनके मुताबिक टीबी से प्रभावित अधिकांश लोग समाज के गरीब तबके से ही आते हैं। इसीलिए उन्होंने गत वर्ष प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान की डिजिटल शुरुआत करते हुए लोगों से 2025 तक देश से टीबी के उन्मूलन के लिए सामूहिक रूप से युद्धस्तर पर काम करने का आग्रह किया था।टीबी के मुख्यत: दो प्रकार होते हैं, लेटेंट और एक्टिव। लेटेंट टीबी तब होता है, जब किसी व्यक्ति के शरीर में टीबी के जीवाणु होते हैं लेकिन बैक्टीरिया बहुत कम संख्या में मौजूद होते हैं। लेटेंट टीबी वाले लोग संक्रामक नहीं होते और स्वयं को बीमार महसूस नहीं करते। ऐसे व्यक्ति टीबी के बैक्टीरिया को दूसरे लोगों तक नहीं पहुंचा सकते जबकि एक्टिव टीबी वाले लोग संक्रामक होते हैं। जहां तक टीबी के कुछ प्रमुख लक्षणों की बात है जो इसका पता कुछ लक्षणों के माध्यम से लगाया जा सकता है, हालांकि आमतौर पर शुरुआती चरण में लक्षण दिखाई नहीं देते। टीबी के लक्षणों में कम से कम 3 सप्ताह तक लगातार खांसी आना, खांसी के दौरान रक्त के साथ कफ बनना, खांसते समय खून आना, ठंड लगना, बुखार, भूख न लगना, वजन कम होना, रात को पसीना आना, सीने में दर्द इत्यादि प्रमुख हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक टीबी के कारण पेट में दर्द, जोड़ों में दर्द, दौरे और लगातार सिरदर्द की समस्या भी हो सकती है।विशेषज्ञों के मुताबिक हर ऐसा व्यक्ति टीबी के जोखिम में है, जिसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है। इसके अलावा जो लोग कोविड-19 से संक्रमित हो चुके हैं या इससे उबर चुके हैं, उन्हें भी टीबी से संक्रमित होने का जोखिम ज्यादा है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक टीबी से मुक्ति के लिए संक्रमित व्यक्ति से बिना-संक्रमित व्यक्ति में इस रोग को फैलने से रोकना और टीबी रोगियों की पहचान कर उनका समुचित उपचार करना बहुत जरूरी है। टीबी से बचने के लिए संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क से बचें और ऐसे किसी व्यक्ति के संपर्क में आने पर यदि आप में भी टीबी जैसे लक्षण उत्पन्न हो रहे हों तो तुरंत प्राथमिक उपचार के लिए नजदीकी चिकित्सालय में जांच कराना जरूरी है। टीबी का समय से पता चलने पर इस रोग का उपचार किया जा सकता है। इसके उपचार में एंटीबायोटिक्स शामिल हैं। सक्रिय टीबी के मामले में प्रभावित लोगों को छह महीने से एक साल की अवधि के लिए कई दवाएं लेने की सिफारिश की जा सकती है।टीबी को एक सामान्य बीमारी समझने की भूल न करते हुए टीबी के बारे में जागरूक होना बेहद जरूरी है और यदि किसी को टीबी है तो इसका इलाज शुरू होने के बाद उसे पूरा करना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा इलाज बीच में छोड़ने पर स्थिति काफी खराब हो सकती है। यदि मरीज में टीबी के लक्षणों की पहचान सही समय पर हो जाती है तो पूरा इलाज कराकर जल्द ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है। देशभर के सरकारी अस्पतालों में टीबी की जांच और इलाज पूरी तरह मुफ्त है। बहरहाल, डब्ल्यूएचओ का मानना है कि टीबी को लेकर ज्यादा निवेश से लाखों लोगों की जान बच सकती है, जिससे टीबी महामारी के अंत में भी तेजी आयेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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