विचार

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Published / 2023-01-07 06:21:55
अब लगातार नीचे गुड़क रही है अंग्रेजी...

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत से अंग्रेजों को विदा हुए तो 75 वर्ष हो गये लेकिन भारत के भद्रलोक पर आज भी अंग्रेजी सवार है। देश का राज-काज, संसद का कानून, अदालतों के फैसलों और ऊंची नौकरियों में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। ज्यों ही इंटरनेट, मोबाइल फोन और वेबसाइट का दौर चला, लोगों को लगा कि अब हिंदी और भारतीय भाषाओं की कब्र खुद कर ही रहेगी।

ये सब आधुनिक तकनीकें अमेरिका और यूरोप से उपजी हैं। वहां अंग्रेजी का बोलबाला है। ये तकनीकें भारत में भी तूफान की तरह फैल रही थीं। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे लेकिन मोबाइल फोन, इंटरनेट या वेबसाइटों का इस्तेमाल करना चाहते थे, उन्हें मजबूरन अंग्रेजी (कामचलाऊ) सीखनी पड़ती थी लेकिन भारत के भद्रलोक को अब पता चला है कि उल्टे बांस बरेली पहुंच गये हैं। हिंदी के एक अखबार ने जो ताजातरीन सर्वेक्षण छापा है, वह भारतीय भाषा प्रेमियों को गदगदायमान कर रहा है। उसके अनुसार देश के 89 प्रतिशत लोग स्वभाषाओं का प्रयोग करते हैं।

अंग्रेजी लिखने, बोलने, समझनेवालों की संख्या देश में सिर्फ 12.85 करोड़ यानी मुश्किल से 10 प्रतिशत है। सिर्फ ढाई लाख लोगों ने अपनी मातृभाषा अंग्रेजी बता दी है। कितने शर्म की बात है कि हमारे देश में इन ढाई लाख लोगों की मातृभाषा भारत के 140 करोड़ लोगों की दादीभाषा बनी हुई है? लेकिन खुशी की बात यह है कि 90 के दशक में इंटरनेट की 80 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में होती थी, अब वह 50 प्रतिशत के आस-पास लुढ़क गई है यानी लोग स्वभाषाओं का इस्तेमाल बड़ी फुर्ती से बढ़ाने लगे हैं।

इंटरनेट ने अनुवाद को इतना सरल बना दिया है कि आप दुनिया की प्रमुख भाषाओं की सामग्री कुछ क्षणों में ही अपनी भाषा में बदल सकते हैं। अनुवाद का उद्योग आजकल अकेले भारत में 4.27 लाख करोड़ रुपये का हो गया है। जाहिर है कि भारत में सिर्फ विदेशी भाषाओं से ही देशी भाषाओं में अनुवाद नहीं होता, स्वदेशी भाषाओं में भी एक-दूसरे का अनुवाद होता है। भारत में दर्जनों भाषाएं हैं, इसीलिए यह दुनिया का सबसे बड़ा अनुवाद उद्योग घराना शीघ्र ही बन जायेगा। इससे भारत की एकता सबल होगी और पारस्परिक भाषाई विद्वेष भी घटेगा।

भारत की फिल्में भारत में ही नहीं, पड़ोसी देशों में भी बड़े उत्साह से देखी जाती हैं। यदि उनका रूपांतरण भी उनकी भाषाओं में सुलभ होगा तो इन सब देशों की एकता और सांस्कृतिक समीपता में वृद्धि होगी। भारतीय जनता को भी पड़ोसी देशों के अखबारों और फिल्मों का लाभ इस अनुवाद प्रक्रिया के जरिए जमकर मिलता रहेगा। यदि संपूर्ण दक्षिण और मध्य एशिया के देशों में हम भाषाई सेतु खड़ा कर सकें तो कुछ समय में ही हम संपूर्ण आर्यावर्त्त क्षेत्र को यूरोप से अधिक संपन्न और शक्तिशाली बना सकते हैं। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-04 20:57:04
राहुल की भारत जोड़ो यात्रा के हर कदम पर नफरत के बीज

सुरेश हिन्दुस्थानी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह यात्रा नफरत नहीं सद्भाव के लिए है, लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस के लिए अब सद्भाव की बातें केवल नारा ही बनकर रह गई हैं। यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, ठीक वैसे ही यात्रा का उद्देश्य भी सामने आता जा रहा है। हालांकि यात्रा के प्रथम दिन से ही ऐसे लोगों को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है, जो किसी न किसी रूप में देश की संस्कृति के लिए विरोधात्मक रवैया अपनाते रहे हैं। 

भारत जोड़ो यात्रा में कभी देश तोड़ने के समर्थक शामिल होते हैं, तो कभी वामपंथी एजेंडा के तहत राजनीति करने वाले राहुल गांधी के साथ चलते दिखाई देते हैं। जहां तक सद्भाव की बात है तो यह शब्द भारत के लिए नया नहीं है और न ही इसे कांग्रेस की उपज कहा जा सकता है। लेकिन यह भी सत्य है कि कांग्रेस ने अपनी नीतियों के माध्यम से हमेशा हिन्दू समाज मानबिंदुओं पर कुठाराघात ही किया है, चाहे वह राम मंदिर का मामला हो या फिर सांप्रदायिक हिंसा अधिनियम प्रस्ताव, यह दोनों ही हिंदुओं की भावनाओं का कुचलने का एक दुस्साहसिक प्रयास ही था।
हम भली भांति जानते हैं कि भारत की संस्कृति कभी भी नफरत के वातावरण का समर्थन करने वाली नहीं रही, इसलिए सवाल यह है कि देश में नफरत के भाव का बीजारोपण किसने किया। क्या इसके लिए लंबे समय तक राज करने वाली कांग्रेस की सत्ता जिम्मेदार नहीं है? क्या टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने में कांग्रेस नेताओं की भूमिका नहीं रही? इसमें तो स्वयं राहुल गांधी ही उनका समर्थन करने पहुंचे थे। 

इन बातों से लगता है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है। वे बात कुछ और करते हैं, लेकिन उनकी बातों का असर उनकी कार्यशैली में दिखाई नहीं देता। वर्तमान में राहुल गांधी की केवल एक ही शैली दिखाई देती है, वह है केवल देश को नीचा दिखाने की शैली। सांप्रदायिक सद्भाव तो भारत का मूल है, लेकिन राहुल गांधी को आज यह बात समझ में आई है। लेकिन इसके बाद भी सवाल यह आता है कि उनकी यात्रा में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाले नेता या अन्य व्यक्ति क्यों शामिल हो रहे हैं? क्या इससे कांग्रेस के चरित्र का पता नहीं चलता? अगर कांग्रेस नेता वास्तव में सद्भाव के वातावरण का उत्थान चाहते हैं तो इसमें नफरत फैलाने वाले लोगों को शामिल नहीं करना चाहिए था। 

कांग्रेस को चाहिए कि वह अपनी यात्रा में ऐसे लोगों को शामिल करने का प्रयास करे, जिनकी पहचान शांति स्थापित करने वाली रही हो। ऐसे प्रयासों के लिए राजनीतिक विचार को तिलांजलि देना पड़े तो दे देना चाहिए। क्योंकि राजनीतिक विचार ही नफरत की भावना को बढ़ावा देने का कार्य करता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कांग्रेस नेताओं के मन में वर्तमान केंद्र सरकार के प्रति द्वेष भाव भरा हुआ है। द्वेष भाव को धारण करने वाला व्यक्ति कभी भी सद्भाव नहीं ला सकता। देश भावना यही कहती है कि हम अच्छी बातों का दिल खोलकर स्वागत करें और भारतीय संस्कृति के विरोध में उठने वाले हर कदम का विरोध करें। कांग्रेस की अवधारणा के बारे में कुछ लोगों में यह सवाल उठता है कि कांग्रेस ईसाई और मुसलमानों के बारे कभी विरोधात्मक शैली नहीं अपनाती। इनके गलत कामों पर भी कांग्रेस के नेता मौन साध लेते हैं। 

हो सकता है कि यह सहजता में होता हो, लेकिन जितने मुंह उतनी बातें तो होती ही हैं। अभी यात्रा के बारे में भी यह सवाल उठने लगा है कि कांग्रेस ने इसी समय भारत जोड़ो यात्रा को विराम क्यों दिया है? कहने वाले तो यहां तक कहने लगे हैं कि यह यात्रा केवल क्रिसमस और अंग्रेजी नया साल मनाने में कोई व्यवधान न हो, इसलिए ही रोकी गई है। यह सभी जानते हैं कि अंग्रेजी नव वर्ष प्राकृतिक त्योहार नहीं है और न ही इसका प्रकृति से कोई संबंध ही है, फिर क्यों इसको बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। यह भी सर्वविदित ही है कि हम प्रकृति का साथ देंगे तो प्रकृति भी हमारा साथ देगी। 

आज समाज का बहुत बड़ा वर्ग यह कहने का साहस जुटाने लगा कि एक जनवरी वाला नव वर्ष भारत का नहीं है। लेकिन कांग्रेस के नेता इस भारतीय धारणा को बदलने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी अगर अपने आपको हिंदू मानते हैं तो उन्हें हिन्दू होने का परिचय अपनी कृति से देना ही होगा। अगर ऐसा होगा तो वह सांप्रदायिक सद्भाव को सही मायने में समझने लगेंगे। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा निसंदेह एक तपस्या है। देश में एकता स्थापित करने के लिए ऐसी यात्राएं पहले भी हो चुकी हैं। आद्य शंकराचार्य ने भी भारत में सांस्कृतिक ज्ञान का संदेश प्रवाहित करने के लिए ऐसी ही यात्रा की थी। हम तो चाहते हैं कि राहुल गांधी अपनी यात्रा के माध्यम से देश को मजबूत करने का कार्य करें, लेकिन ऐसी यात्राओं के लिए निकलने से पहले मन में विरक्ति का भाव भी होना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी के मन में चल रहे विचारों को देखकर ऐसा लगता नहीं है कि उनके स्वभाव में विरक्ति है। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान महाराष्ट्र में वीर सावरकर का उल्लेख करते समय नफरत का ही परिचय दिया। इसलिए कहा जा सकता है कि जब नफरत के बीजों का अंकुरण उनके मन में ही हो रहा है तो सद्भाव के फूल कैसे खिलेंगे। 

कांग्रेस नेताओं के मन में जब तक ऐसा भाव रहेगा, तब तक कितनी भी यात्राएं निकाल लें, वे देश का मन नहीं जीत सकते। देश का मन जीतने के लिए भारत की संस्कृति को मन और मस्तिष्क में धारण करना होगा। तभी भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य सफल होगा। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2023-01-04 20:54:02
दो गज की दूरी, मास्क जरूरी

ऋतुपर्ण दवे

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनिया एक बार फिर कोरोना की दहशत में है। नए वेरिएंट बीएफ.7 की तबाही का मंजर डरावना है। सबसे ज्यादा खौफ चीन से आ रही तस्वीरों और वीडियो ने है। चीन की विफल जीरो कोविड पॉलिसी से सारी दुनिया में एक बार फिर गुस्सा और नफरत है। व्यापार को बढ़ाने के लिए हल्के-फुल्के, बेअसर और सस्ते उत्पादों को बनाकर इंसानियत को भी नहीं बख्शने वाले चीन ने जिस तेजी से पहले 6 वैक्सीन बनाकर खूब वाहवाही लूटी बाद में इनके धड़ाधड़ बेअसर होने की सच्चाई ने दुनिया को हैरान और परेशान कर दिया है। 

जल्दबाजी में बनी चीन की वैक्सीन जिफिवैक्स, कॉन्विडेसिया, कॉनवेक, कोविलो, वेरो सेल और कोरोनावैक दुनिया में खूब बिकी। जब ये वैसा असर नहीं दिखा पाईं तो हो हल्ला मचा। सच तो यह है कि चीन खुद अपने हल्के और घटिया उत्पादों को लेकर न केवल घिर गया बल्कि सकते में है। सबसे ज्यादा बेअसर दो वैक्सीन कोविलो और वोरो सेल रहीं। इसे एक ही कंपनी सिनोफॉर्म ने बनाया था। जीरो कोविड पॉलिसी के चलते लगातार लॉकडाउन जैसी तानाशाही भरी चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिन की सख्ती ने वहां गृह युद्ध जैसे हालात बना दिए। महीनों से घरों में कैद लोगों के सब्र का बांध भी टूटा। मौत का मंजर और लाशों का ढेर अब चीन छुपा नहीं पा रहा। वैसे चीन अपनी करतूतों को छुपाने और सच को बाहर न आने देने के लिए पहले से ही दुनिया में बदनाम है। उसने कोरोना जैसे मामलों पर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन तक को गच्चा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

साल के आखिरी दिन भी डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अदनोन गेब्रेयेसस ने चीन को फटकारते हुए सच्चाई साझा करने और भारत से सीख लेने की नसीहत दी। वुहान से निकले चीनी शैतान के इलाज की खातिर उसकी वैक्सीन के खरीदार देश बेचैन हैं। इस बीच चीन का यह अहम भी टूटा है कि कोरोना फैलाना और काबू करना उसके लिए चुटकियों का खेल है। भारत पहले भी सतर्क था और अब भी है। तब और अब में फर्क इतना है कि महामारी का खौफनाक मंजर और मौतों के सच से सीख लेकर इस बार वैसा कुछ नहीं होने देने की कवायद है जो घट चुका है। कोरोना से दुनिया भर में बीते 26 महीनों के दौरान करीब साढ़े 57 लाख लोगों की जान गई है। 

चंद आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका में 9,24,530, ब्राजील में 6,31,069, भारत में 5,30,702, रूस में 3,34,753, मैक्सिको में 3,08,829, पेरू में 2,06,646, यूके में 1,57,984, इटली में 1,48,167, इंडोनेशिया में 1,44,453, ईरान में 1,32,681 लोग जान गंवा चुके हैं। अभी भारत में दैनिक संक्रमण दर करीब 0.17 प्रतिशत है। साल के आखिरी दिन 1,57,671 टेस्ट किए गए। नए साल की शुरुआत के साथ ही भारत में ओमिक्रोन के नए सब वेरिएंट एक्सबीबी.1.5 के मिलने से चिंता बढ़ गई है। पहला मामला गुजरात में मिला है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी सीडीएस के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका भर में इसके 40 प्रतिशत से ज्यादा मामले सामने आए हैं। बहरहाल भारत में नए साल की सुबह तक कोरोना के 265 मामले सामने आए और सक्रिय मामलों की संख्या 3,653 रही। 

विदेशी हवाई यात्रियों की रैंडम जांच में संक्रमण मिलना और पहले आ चुके कुछ यात्रियों का कोरोना संक्रमित होना चिंताजनक है। शंघाई के देजी अस्पताल का वी चैट मैसेज बताता है कि केवल शहर में बीते हफ्ते 54.3 लाख पॉजिटिव मामले थे। अब यह संख्या सवा करोड़ से ज्यादा पहुंच गई होगी। यही सच छुपाना पहले भी पूरी दुनिया पर भारी पड़ा और दोबारा भारी पड़ने वाला है? ऐसे में पड़ोसी होने के चलते भारत की चिंता जरूरी है। जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका समेत कई देशों में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उच्चस्तरीय बैठक लेना गंभीरता को बताता है। भारत में एक बार फिर एहतियात का दौर शुरू होना तय है। निश्चित रूप से व्यापार जगत चिंतित है। दोबारा मास्क जरूरी होगा, सेनिटाइजर, साबुन से हाथ धोना, सामाजिक दूरी का पालन करना तथा भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचने की एडवायजरी जारी हो सकती है। हालांकि भारत में दोनों खुराक और बूस्टर डोज मिलाकर अब तक 220 करोड़ लोगों का वैक्सीन लेना रहात की बात है। भारत में बीती लहर में तेजी से संक्रमित हो चुके लोगों में हाइब्रिड इम्युनिटी के चलते खतरा कम है लेकिन सतर्कता जरूरी है। 

शायद सारी कवायद इस बार इसी पर ज्यादा है। अब भी कइयों ने बूस्टर डोज नहीं ली है जिसे विशेषज्ञ जरूरी बता रहे हैं। इसलिए क्यों न हम अभी से दो गज की दूरी, मास्क जरूरी पर अमल कर पुराने अनुभवों से कोरोना के लिए खुद ही चुनौती बन जायें। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-01-02 10:06:32
कोरोना की हकीकत : जैसे आयेगा वैसे चला भी जायेगा...

पवन पाण्डेय

एबीएन सेंट्रल डेस्क। क्या विकट शोर था साहब- आ गया रे आ गया! क्या भयानक खौफ था जी-बाप रे बाप यह तो फिर आ गया! यह तो निगल ही जाएगा! चैनल दर चैनल क्या अजब आलम था-आ गया रे, खा गया रे, लील गया रे, डस गया रे! लेकिन वह आया भी और चला भी गया। आया तो खूब शोर-शराबे के साथ था, पर गया ऐसे जैसे कोई दबे पांव निकल जाता है। 

वह आंधी की तरह आया तो जरूर, पर तूफान की तरह नहीं गया। तूफान क्या, हल्का-सा झोंका भी महसूस नहीं हुआ। उसके आने का शोर तो ऐसा था, जैसे कायनात नेस्तनाबूद हो जाएगी, जैसे कहर टूट पड़ेगा। लेकिन उसके जाने का पता ही नहीं चला। वह जो आया था, वह नहीं था, उसका नाम था। वह जो खौफ था, वह उसका नाम था। वह चीन से आ रहा था। लेकिन वह चीनी सेना नहीं थी। उसे तो कूट-पीटकर भगाया जा सकता है। वह कोई चीनी माल भी नहीं था कि उसके बायकाट का आह्वान हो जाता। वह तो कोरोना था। वह पहले भी चीन से ही आया था और पूरी दुनिया में वैसे ही छा गया था, जैसे चीनी माल छाया हुआ है। 

खौफ तो चीनी माल का भी रहता ही है न। पर कोरोना का खौफ तो आखिर कोरोना का ही था। उसके खौफ का क्या मुकाबला साहब! वह तो ऐसा खौफ है कि लोग अपनी सांसें गिनने लगे थे। अपने खोये हुए मास्क ढूंढ़ने लगे थे। अस्पतालों के बिस्तर गिनने लगे थे।

खौफ ऐसा था कि सरकार बैठकें करने लगी। अस्पताल अपने ऑक्सीजन प्लांट दुरुस्त करने लगे और कोविड वार्डों को सजाने लगे। स्वास्थ्य मंत्री ने आगाही जारी कर दी। राहुल गांधी को चिट्ठी लिख दी कि भाई अपनी यात्रा छोड़ो और घर जाओ, देखो कोराना आ रहा है। सर्दी-गर्मी जब ज्यादा सताने लगे तो बच्चे भी अपना खेल का मैदान छोड़कर घर चले जाते हैं। पर बच्चा जिद्दी निकला। मैदान छोड़ने से इनकार ही कर दिया। अकेला चलूंगा, पर चलता रहूंगा। कोरोना से नहीं डरूंगा। नफरत के बाजार में मैं तो अपनी प्यार की दुकान सजा कर रहूंगा। बस इतने भर से कोरोना का खौफ वैसे ही धराशायी हो गया, जैसे वक्त आने पर तानाशाह का खौफ धराशायी हो जाता है। 

ऐसे में कोरोना बड़ा शर्मसार हुआ होगा। उसे डूब मरने की लानत तो नहीं दी जा सकती, क्योंकि आखिर तो वह महामारी है। जब सौ साल पुरानी महामारियों का खौफ अभी तक बना हुआ है तो वह कहां डूब कर मरने वाला है। वैसे भी वह मारने वाला ठहरा। अलबत्ता एक दिन तो मारने वाले भी मरते ही हैं। कोरोना को मारने की वैक्सीन मिल भी गयी और अभी और भी मिल ही जाएगी। फिर भी उससे बचकर रहने में ही भलाई है। वो क्या कहते हैं बचाव में ही बचाव है।

Published / 2023-01-02 09:57:47
मुफ्त राशन और वर्षांत की हकीकत

टीएन नाइनन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सरकार ने कोविड संबंधी कार्यक्रम के तहत नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण योजना को बंद कर दिया और उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के माध्यम से वितरित करने की घोषणा की है। अब तक पी​डीएस के तहत चावल तीन रुपये किलोग्राम, गेहूं दो रुपये किलोग्राम और मोटा अनाज एक रुपये किलोग्राम की दर पर बेचा जाता रहा है। 

इन पर औसतन 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है। यानी यह लगभग मुफ्त बिकता है। इस आवरण के परे देखने पर पता चलता है कि नि:शुल्क या 90 फीसदी स​ब्सिडी के साथ वितरित किये जाने वाले अनाज की कुल मात्रा में कमोबेश 50 फीसदी की कमी आ रही है। केंद्र सरकार के वित्त की बात करें तो इसके आवंटन में काफी कमी आयेगी। नि:शुल्क अनाज की पेशकश करने वाले राज्यों की भी काफी बचत होगी क्योंकि पूरा बिल केंद्र चुका रहा है।

राजकोषीय अनुशासन की बात करें तो जो हो चुका उसका कुछ नहीं किया जा सकता है। केंद्र सरकार की खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी को एक साथ रखकर देखा जाये तो वह जीडीपी का 2.5 फीसदी है। यह स्तर एक दशक पहले भी था। यह आं​शिक तौर पर इसलिए है कि पेट्रोलियम स​​ब्सिडी (जो कुल सब्सिडी बिल का एक तिहाई था) बिल काफी कम हुआ है। ताजा निर्णय के बाद अगले वर्ष खाद्य स​ब्सिडी बिल भी जीडीपी की तुलना में कम होगा। उर्वरक स​ब्सिडी में कमी आयेगी या नहीं यह बात काफी हद तक यूक्रेन में चल रहे युद्ध पर निर्भर करेगी। अनुमान तो यही है कि स​ब्सिडी बिल में काफी कमी आयेगी।

सरकार के निर्णय की बात करें तो दिक्कत राजकोषीय ग​णित में नहीं ब​ल्कि इस बात में है कि यह दो हकीकतों से किस प्रकार निपटता है। एक का संबंध खेती की आ​र्थिकी से है और दूसरे का रिश्ता देश की अ​धिसंख्य कामगार आबादी के आय के स्तर से है। कृ​षि की बात करें तो अ​धिकांश किसानों को उर्वरक पर भारी स​ब्सिडी, नि:शुल्क पानी और बिजली आदि मिलते हैं। भारत कृ​षि के मामले में दुनिया में सबसे कम मेहनताना देने वाले देशों में शामिल है। इसका भी फायदा मिलता है। 

कुछ सर्वा​धिक महत्त्वपूर्ण फसलों के लिए किसानों को खरीदार और मूल्य की गारंटी भी मिलती है। ऐसे में खेती से जुड़ा स्वा​भाविक जो​खिम अपने आप समाप्त हो जाता है। इसका नतीजा यह है कि महंगे और किफायती कच्चे माल के इस्तेमाल में किफायत बरतने को खास प्रोत्साहन नहीं मिलता। कई फसलों की बात करें तो उनकी उत्पादकता अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी कम है। थोक स​ब्सिडी के कारण एक ऐसा क्षेत्र व्यवहार्य नहीं बन पा रहा है जो बहुत कम वेतन स्तर पर देश के आधे रोजगार मुहैया कराता है।

आय के स्तर की बात करें तो असंगठित क्षेत्र के जो 27.7 करोड़ श्रमिक सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत हैं, उनमें से 94 प्रतिशत की मासिक आय 10,000 रुपये से कम है। बमु​श्किल 1.5 फीसदी की मासिक आय 15,000 रुपये प्रति माह से अ​धिक है। देश की कुल श्रम श​क्ति में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत है। इनमें से दो-तिहाई कृ​षि कार्य में संलग्न हैं। वहीं सर्वे बताते हैं कि आय का स्तर गैर कृ​षि आय के स्तर के ए​क चौथाई के बराबर है। 

हकीकत में देखें तो मुद्रास्फीति समायोजित कृ​षि वेतन भत्ते बीते पांच वर्षों में काफी कम हुए हैं। मेहनताने का स्तर एक स्वघो​षित आंकड़ा होता है जो बीते चार दशकों में प्रति व्य​क्ति आय में हुए पांच गुना इजाफे से टकरा सकता है। अतिरिक्त आय में से पूरी की पूरी उच्चतम स्तर के समूह के पास तो नहीं गई होगी।

गरीबी के घटते स्तर से यह बात साबित भी होती है। खपत की आदतों और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद को लेकर भी विरोधाभासी आंकड़े हैं जो बढ़ती मध्यवर्गीय श्रेणी की ओर इशारा करते हैं। अगर हालात उतने बुरे हैं जितना बताया जा रहा है तो भी क्या मुफ्त अनाज ही समस्या का हल है? अ​धिकांश कामगारों को पीडीएस दर पर परिवार के लिए एक माह का राशन खरीदने में एक दिन से अ​धिक का मेहनताना नहीं लगता है। अनाज को नि:शुल्क करने से कोई खास बदलाव नहीं आता। नि​श्चित रूप से इससे एक लोकलुभावन चक्र अवश्य शुरू हो सकता है क्योंकि राजनीतिक दल पहले ही नि:शुल्क बिजली समेत तमाम मुफ्त चीजें दे रहे हैं।

अगर हम विकल्पों की बात करें तो हमारी खोज व्यापक आ​र्थिक नीति की दिशा में जायेगी। कृ​षि क्षेत्र के वेतन भत्तों की बात करें तो उनकी कमजोरी के कारण गैर कृ​षि आय के साथ उसके अंतर में कमी नहीं आयेगी जब तक कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में और रोजगार तैयार करके लोगों को कृ​षि से इतर रोजगार नहीं मुहैया कराया जाता। तब तक गरीबों को लिए आय समर्थन आवश्यक है। तीसरी बात, रोजगार गारंटी योजना जैसा स्वचयन वाला कार्यक्रम अपने बारे में काफी कुछ बताता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य, ​स्कूली ​शिक्षा और रोजगारपरक प्र​शिक्षण में अ​धिक निवेश पर भी यही बात लागू होती है। स​ब्सिडी और नि:शुल्क तोहफे अक्सर जरूरी कामों पर से ध्यान हटा देते हैं।

Published / 2023-01-01 17:35:56
राजधर्म निर्वाह की मिसाल मोदी-योगी

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय चिंतन में कर्मयोग और संन्यास का वृहत विश्लेषण है। इन पर अमल करने वालों की अनवरत परंपरा रही है। अनगिन शासकों और राजनेताओं ने समाज के लिए निजी हित और पारिवारिक जीवन का परित्याग किया। नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे राजनेता आज भी इस महान विरासत को चरितार्थ कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने विधिवत संन्यास ग्रहण किया है। वह संन्यास धर्म की मर्यादाओं में रहते हुए समाज सेवा के पथ पर चल रहे हैं। अपने पूर्व आश्रम पिता के निधन का समाचार सुनते हैं। लेकिन कोरोना आपदा प्रबंधन के कार्यों में लगे रहते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आध्यात्मिक रूप से संन्यास आश्रम ग्रहण नहीं किया है। वह भारतीय चिन्तन के अनुरूप सामाजिक संन्यास पर अमल करते हैं। अपनी मां की अंतिम यात्रा में जाते हैं। इसके बाद उनका राजधर्म निर्वाह शुरू हो जाता है। पहले से तय कार्यक्रमों में कोई बदलाव नहीं किया जाता है। बाईस वर्ष के संवैधानिक दायित्व निर्वाह में एक भी दिन अवकाश न लेने की परम्परा कायम रहती है।मुख्यमंत्री रहे तो पूरे गुजरात को परिवार समझा। प्रधानमंत्री बने तो उनके परिवार में पूरा भारत आ गया। वह उदार चरित्र का परिचय देते हैं।

यह मेरा है और यह पराया, इस तरह की सोच संकीर्ण विचारधारा वालों की होती है लेकिन विस्तृत विचारधारा वालों के लिए तो यह सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार के समान होती है। अच्छे जनसेवक पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। मोदी ने जब जनसेवा का मार्ग अपनाया तो उन्होंने इसी सिद्धांत का अनुसरण किया। नरेन्द्र मोदी की कार्य शैली विलक्षण है। राष्ट्र और समाज की सेवा में सम्पूर्ण समर्पण। इसी के अनुरूप परिवार भावना का विस्तार। एक बार उनकी मां ने कहा था कि हमारे परिवार ने नरेन्द्र मोदी को समाज के लिए समर्पित मान लिया था, न परिवार ने कभी उनसे कोई अपेक्षा की, न नरेन्द्र मोदी ने अपने को सीमित दायरे में रखा। मुख्यमंत्री के रूप में वहां के छह करोड़ लोगों को अपना परिवार मानते रहे, उन्हीं के हित में कार्य करते रहे। प्रधानमंत्री बने तो 130 करोड़ लोगों तक उनका परिवार विस्तृत हो गया। आठ वर्षों तक बिना विश्राम के इस परिवार की सेवा में समर्पित हैं। यह कार्यशैली और चिंतन ही उनको विशिष्ट बनाता है। बिल्कुल अलग।

नरेन्द्र मोदी के लिए जन्म दिवस और पर्व आदि भी समाज सेवा के अवसर होते हैं। नरेन्द्र मोदी दीवाली सैनिकों के बीच मनाते हैं। उनके ये आयोजन व्यक्तिगत नहीं होते। नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को प्राथमिकता दी है व गरीब कल्याण के संकल्प से असंभव कार्यों को संभव करके दिखाया है। गरीब कल्याण, सुशासन, विकास, राष्ट्र सुरक्षा व ऐतिहासिक सुधारों के समांतर समन्वय से नरेन्द्र मोदी ने मां भारती को पुनः सर्वोच्च स्थान पर आसीन करने के अपने संकल्प को धरातल पर चरितार्थ किया है। यह निर्णायक नेतृत्व जनता के अटूट विश्वास के कारण ही सम्भव हो पाया है। एक सुरक्षित, सशक्त व आत्मनिर्भर नए भारत के निर्माता मोदी का जीवन सेवा और समर्पण का प्रतीक है।

 आजादी के बाद पहली बार करोड़ों गरीबों को उनका अधिकार देकर उनमें आशा और विश्वास का भाव जगाया है। भारतीय संस्कृति के संवाहक नरेन्द्र मोदी ने देश को अपनी मूल जड़ों से जोड़ हर क्षेत्र में आगे ले जाने का काम किया है। उनकी दूरदर्शिता व नेतृत्व में नया भारत एक विश्वशक्ति बनकर उभरा है। वैश्विक नेता के रूप में उनकी विशेष पहचान और छवि है। वह दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं।

वह कहते भी हैं कि अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी विरोधाभासी नहीं है। देश की प्रगति में सभी का योगदान और महत्व होता है। पर्यावरण की रक्षा से देश की प्रगति हो सकती है। यह भारत ने दुनिया को करके दिखाया है। प्रकृति, पर्यावरण, पशु, पक्षी भारत के लिए केवल स्थिरता सुरक्षा के विषय नहीं हैं, यह हमारी संवेदनशीलता और आध्यात्मिकता का भी आधार हैं। अपने पिछले जन्मदिन पर नरेन्द्र मोदी मध्य प्रदेश के श्योपुर में स्वयं सहायता समूह सम्मेलन में सहभागी हुए। उन्होंने कहा था कि आमतौर पर वह अपने जन्मदिन पर मां से मिलते हैं। उनका आशीर्वाद लेते हैं। 

आज मैं उनके पास नहीं जा सका, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों और गांवों में कड़ी मेहनत करने वाली लाखों माताएं आज यहां मुझे आशीर्वाद दे रही हैं। यह दृश्य देखकर मेरी मां को संतोष होगा कि भले बेटा आज यहां नहीं आया, लेकिन लाखों माताओं ने आशीर्वाद दिया है। नये भारत में पंचायत भवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक नारीशक्ति का परचम लहरा रहा हैं।

विगत आठ वर्षों के दौरान देश में ग्यारह करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाये गये। नौ करोड़ से ज्यादा उज्जवला के गैस कनेक्शन प्रदान किए गए। करोड़ों परिवारों में नल से जल की सुविधा उपलब्ध कराई गई। महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण हो रहा है। पिछले आठ सालों में स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाये गये। आठ करोड़ से अधिक महिलाएं इस अभियान से जुड़ी हैं। सरकार का लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार से कम से कम एक महिला को इस अभियान से जोड़ने का है। गांव की अर्थव्यवस्था में, महिला उद्यमियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार निरंतर काम कर रही है। एक जिला एक उत्पाद के माध्यम से हर जिले के लोकल उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। 

नरेन्द्र मोदी महापुरुषों द्वारा देखे गये सपनों को साकार कर रहे हैं। ब्रिटेन को पछाड़ कर भारत आज दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था व्यवस्था वाला देश बन गया है। अपनी मां के अंतिम संस्कार से खाली होने के तुरंत बाद मोदी वर्चुअल माध्यम से सरकारी कार्यक्रम में सहभागी हुए। हावड़ा और न्यू जलपाईगुड़ी के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन को हरी झंडी दिखायी। मोदी ने कहा इस सदी में देश का तेजी से विकास करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे के बुनियादी ढांचे को विकसित करने का अभियान पूरे देश में जारी रहेगा।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इस दिन प्रधानमंत्री को कोलकाता आना था, जहां हावड़ा स्टेशन पर उनका मूल कार्यक्रम आयोजित था। इस बीच सुबह के समय जब हीरा बा के निधन की खबर आई तो इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि कार्यक्रम को टाला जा सकता है। थोड़ी देर बाद ही आधिकारिक तौर पर बताया गया कि प्रधानमंत्री वर्चुअल तरीके से कार्यक्रम में शामिल होंगे। मां के अंतिम संस्कार के बाद प्रधानमंत्री अहमदाबाद के राजभवन पहुंचे। वहां वर्चुअल माध्यम से वह कार्यक्रम में शामिल हुए। हावड़ा न्यू जलपाईगुड़ी के बीच ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के बाद अपने सम्बोधन में उन्होंने बंगाल की जनता से माफी मांगते हुए कहा कि वह निजी कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके, इसके लिए वह क्षमाप्रार्थी हैं। जिस धरती से वंदे मातरम का जय घोष हुआ वहां वंदे भारत को हरी झंडी दिखाई गई। 30 दिसंबर, 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अंडमान में तिरंगा फहराकर भारत की आजादी का बिगुल फूंका था। इसके बाद प्रधानमंत्री दूसरी राष्ट्रीय गंगा परिषद की बैठक में भी शामिल हुए।

वह अपनी मां की तबियत बिगड़ने पर देररात से ही जाग रहे थे। करीब साढ़े तीन बजे भोर में उनका निधन हुआ। नरेन्द्र मोदी ने अपनी माता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनकी माता की सीख थी कि काम करो बुदि्ध से और जीवन जियो शुद्धि से। हीरा बा का जन्म 18 जून, 1923 को मेहसाणा जिले की विसनगर तहसील में हुआ था। बचपन में ही हीरा बा की माता चल बसी थीं। बिन माता की हीरा बा का बचपन बहुत गरीबी में बिता। संघर्षों के कारण कम उम्र में ही उनके पास अनुभव का खजाना था। घर में बड़ी होने के कारण पूरे परिवार की जिम्मेदारी भी उठाती रहीं। बाद में छोटी उम्र में ही वडनगर के मोदी परिवार में उनकी शादी हो गई। वहां भी वे परिवार की सबसे बड़ी बहू थीं। यहां भी उनपर जिम्मेदारी बड़ी थी, लेकिन उन्होंने तनिक भी विचलित हुए बिना इसे उठाते हुए परिवार को एकजुट रखा। वडनगर के एक छोटे से घर में वो रहती थीं, जहां एक भी खिड़की नहीं थी। 

घर पर आर्थिक संकट के दौर में हीरा बा ने दूसरे घरों में जूठे बर्तन भी मांजे। चरखा चलाने का भी उन्होंने काम किया। वे रुई कातने का भी काम करती रहीं। उनके पांच पुत्र और एक पुत्री हैं। वे छोटे पुत्र पंकज मोदी के साथ ही रहती थीं। नरेन्द्र मोदी वर्ष 2016 में अपनी माता हीरा बा को अपने साथ दिल्ली लेकर गए थे। वह कुछ दिन यहां रहीं थीं।

Published / 2023-01-01 17:06:09
हीरा बा को ममता की श्रद्धांजलि

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मां हीरा बा के निधन पर कई देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने शोक व्यक्त किया लेकिन यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कांग्रेस से सोनिया गांधी और राहुल ने कोई एक शब्द तक नहीं कहा। यह भी हो सकता है कि उन्होंने कहा हो और अखबारों ने उसे छापा न हो। लेकिन जरा हम सोचें कि भारतीय राजनीति में आपसी कड़वाहट किस स्तर तक नीचे पहुंच गई है। 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने तो शोक व्यक्त किया है और उन्होंने अपनी श्रद्धांजलि भी दी है लेकिन हमारे कई अत्यंत मुखर विरोधी नेता बिल्कुल मौन रह गये। क्या हमारे विरोधी दलों के नेता, जहां तक मोदी का सवाल है, वे किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से भी ज्यादा खफा हैं?

राहुल गांधी का अटलजी की समाधि पर जाना मुझे अच्छा लगा। यह उदारता और राजनीतिक शिष्टाचार का परिचायक है। इंदिराजी के निधन पर अटलजी ने भी जो शब्द कहे थे, उसे मार्मिक श्रद्धांजलि ही कहा जा सकता है। लोकतंत्र की यह खूबी है कि आप चुनाव के दौरान, संसद में, प्रदर्शनों में और बयानों में अपने विरोधियों का डटकर विरोध करते रहें लेकिन शोक के ऐसे अवसरों पर आप इंसानियत का परिचय दें।

इस मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अद्भुत उदारता का परिचय दिया है। मोदी का जितना कट्टर विरोध ममता ने किया है और उनके तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ को उन्होंने जितना सताया है, किसी अन्य राज्यपाल को नहीं सताया गया है, लेकिन मोदी की माताजी के निधन पर जो वाक्य उन्होंने कहे हैं, वे अत्यंत मार्मिक हैं।

ममता ने कहा कि आपकी माताजी के निधन पर आपको कैसे सांत्वना दी जाये। आपकी मां भी तो हमारी मां हैं। मोदी ने अपनी मां की अंत्येष्टि के तुरंत बाद हावड़ा-जलपाईगुड़ी वंदे भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई। वे चाहते तो इस कार्यक्रम को स्थगित भी कर सकते थे। लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि उनकी मां ने उनको कितने पवित्र संस्कार दिये थे। उनका आचरण एक अनासक्त कर्मयोगी की तरह रहा। उन्होंने अन्य नेताओं की तरह अपनी मां और अपने भाई-बहनों को सत्ता की चाशनी को चखने का भी मौका नहीं दिया जबकि हमारे नेताओं के रिश्तेदार उस चाशनी में अक्सर लथपथ हो जाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे विरोधी नेता मोदी की खुशामद करें। मोदी का जो भी काम या भाषण उन्हें अप्रिय लगे, उसकी आलोचना वे बेखटके जरूर करें लेकिन शोक के ऐसे मौकों पर सभी नेता एक-दूसरे के प्रति सहज सहानुभूति व्यक्त करें तो उनके बीच सद्भाव तो पैदा होगा ही, भारत का लोकतंत्र भी मजबूत होगा। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2022-12-30 22:43:37
कैसे कोई बनता है मेसी या एम्बाप्पे

आरके सिन्हा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। खेल का मैदान किस तरह से देश की सीमाओं से लेकर वर्गभेद मिटा देता है, यह सारी दुनिया ने बीते रविवार को देखा। फीफा विश्व कप के फाइनल को देखने का भारत से लेकर दुनिया के कोने-कोने में रहने वाले खेल प्रेमी इंतजार कर रहे थे। जाहिर है कि जो फाइनल मैच को देख रहे थे, उनमें से अधिकतर का संबंध न तो फ्रांस से था और न ही अर्जेंटीना से। पर इन दोनों देशों के खिलाड़ियों ने अपने श्रेष्ठ खेल और खेल भावना से सबका दिल जीता। 
खेल देशों-दुनिया को जोड़ता है। एक सूत्र में पिरोता है। हमने कब मोहम्मद अली, पेले, माराडोना, लारा, रोजर फेडरर या उसेन बोल्ट को अपना नहीं माना। 

इसी तरह से हमारे सफल खिलाड़ियों जैसे दादा ध्यानचंद, मिल्खा सिंह, विश्वनाथन आनंद को देश और देश से बाहर खेल प्रेमियों का भरपूर प्यार मिलता रहा। कुछ समय पहले महान टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर ने टेनिस की दुनिया से संन्यास लिया था। तब सारी दुनिया के खेल प्रेमी उनके चमत्कारी करियर को याद कर रहे थे। उनमें भारतीय भी तो कोई कम नहीं थे।

कोई खिलाड़ी मेसी, एम्बाप्पे, रोजर फेडरर, डिएगो माराडोना, मोहम्मद अली या कपिल देव कैसे बन जाता है? इस सवाल का उत्तर तलाश करने के लिए बहुत मेहनत करने की जरूरत नहीं है। सभी खिलाड़ी मेहनत करते हैं। पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी सब महान नहीं कहे जाते। वे ही महान माने जाते हैं जो बिग मैच प्लेयर होते थे। वे बड़े और अहम मैचों में छा जाते थे। तब उनका जलवा देखते ही बनता था। बड़े खिलाड़ी का यही सबसे बड़ा गुण होता है कि वे खास मैचों या विपरीत हालात में छा जाते हैं।

 मेसी तथा किलियन एम्बाप्पे ने फीफा कप के फाइनल मैच में लाजवाब खेल का प्रदर्शन किया। मेसी और एम्बाप्पे ने कुल जमा तीन और चार गोल किये। ये गुण होता है कि किसी बड़े खिलाड़ी में जो उसे महान बनाता है। मतलब जब टीम को आपकी सर्वाधिक जरूरत होती है तब ही आप अपने जौहर दिखाते हैं। कई बेहतरीन खिलाड़ी कमजोर प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अपने जौहर नहीं दिखा पाते थे। लेकिन, ये फाइनल या अन्य खास मैचों के समय अपने जलवे बिखरते हैं।
मेसी और एम्बाप्पे जैसे खिलाड़ी विश्व नागरिक बन चुके हैं। उन्हें सारी दुनिया प्यार करती थी। बड़े प्लेयर के साथ यही होता है। वह सबका होता है और सब उसके होते हैं। अब धावक उसेन बोल्ट को लें। उन्हें भारत में उतना ही अपना माना जाता है जितना किसी अन्य देश में। वैसे वे हैं तो जमैका से। 

रोजर फेडरर दिसंबर, 2015 में दिल्ली में कुछ प्रदर्शनी मैच खेलने आये थे। भारत के टेनिस के शैदाइयों को लीजैंड बन चुके रोजर फेडरर को साक्षात देखने का मौका मिल रहा था। रोजर फेडरर को खेलते हुए देखकर दर्शक झूम रहे थे। फेडरर बार-बार दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए हाथ हिला रहे थे। हार्ड, क्ले और ग्रास तीनों कोर्ट में एक जैसा शानदार प्रदर्शन करने वाले फेडरर जब कोर्ट में उतरे तो फिटनेस का चरम लग रहे थे। उनके चेहरे पर एक सुपर स्टार वाली गरिमा को देखा जा सकता था।

मुझे याद आ रही है 1976 की गणतंत्र दिवस की वह परेड। तब वहां पर महानतम मुक्केबाज मोहम्मद अली आये थे। उस समय इमरजेंसी का दौर चल रहा था। परेड शुरू होने में कुछ पल शेष थे। तब ही लाउड स्पीकर से घोषणा हुई कि विश्व हैवीवेट मुक्केबाज चैंपियन मोहम्मद अली राजपथ पर पधार रहे हैं। यह जानकार राजपथ पर मौजूद हजारों लोग प्रसन्न हो गये थे। मोहम्मद अली तब अपने करियर के शिखर पर थे। वे विश्व नायक थे। वे परेड शुरू होने से पहले राजपथ पर आ गये थे। उनके चाहने वाले उनका नाम लेकर उनका अभिवादन कर रहे थे। लंबे-ऊंचे कद के मोहम्मद अली जवाब में अपने मुक्के को हवा में घुमा रहे थे। 

मोहम्मद अली देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ बैठे थे। दुर्भाग्य से वह दौर सेल्फी का नहीं था। बहरहाल, लियोनेल मेसी का विश्व विजेता बनने का सपना आखिरकार पूरा हो गया। 2014 में खिताब चूकने वाले मेसी की टीम ने फीफा वर्ल्ड कप इतिहास के सबसे रोमांचक फाइनल में फ्रांस को फुल टाइम में 3-3 से स्कोर बराबर रहने के बाद पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से हरा दिया। यह अर्जेंटीना का तीसरा खिताब है। इससे पहले उसने 1978 और 1986 में ट्रॉफी अपने नाम की थी। पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना के गोलकीपर मार्टिनेज ने कमाल कर दिया। उन्होंने दो मौके बचाए और मेसी का सपना पूरा कर दिया। इसके साथ ही मेसी का नाम माराडोना के साथ सुनहरे अक्षरों में लिख दिया गया है।

भारत को भी मेसी, एम्बाप्पे, फेडरर और नीरज चोपड़ा जैसे सैकड़ों विश्वास से लबरेज खिलाड़ियों की दरकार है। अभी तो बस शुरूआत है। किसी भी देश का विकास इस बात से साबित होता है कि उधर खेलों की दुनिया में किस तरह की उपलब्धियां अर्जित की जा रही हैं। भारत की पुरुष बैडमिंटन टीम का भी इस साल इतिहास रचना। आप जानते हैं कि भारत ने थामस कप के फाइनल में 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया को 3-0 के अंतर से हराकर ये उपलब्धि हासिल की। 

लक्ष्य सेन, किदांबी श्रीकांत, सात्विक साईराज और चिराग शेट्टी ने भारत को थामस कप जितवाया। इसे बैडमिंटन की विश्व चैंपियनशिप माना जाता है। थामस कप में विजय से पहले भारत के बैडमिंटन सेंसेशन लक्ष्य सेन आॅल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंच गए थे। और बात भारतीय मुक्केबाज निखत जरीन की भी। वह इस्तांबुल में महिला विश्व चैंपियनशिप के फ्लाइवेट (52 किग्रा) वर्ग के एकतरफा फाइनल में थाईलैंड की जिटपोंग जुटामस को 5-0 से हराकर विश्व चैंपियन बनीं। 

तेलंगाना की मुक्केबाज जरीन ने पूरे टूर्नामेंट के दौरान प्रतिद्वंद्वियों पर दबदबा बनाए रखा और फाइनल में थाईलैंड की खिलाड़ी को सर्वसम्मत फैसले से हराया। छह बार की चैंपियन एमसी मैरीकोम (2002, 2005, 2006, 2008, 2010 और 2018), सरिता देवी (2006), जेनी आरएल (2006) और लेखा केसी इससे पहले विश्व खिताब जीत चुकी हैं।

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