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सम्मान के भरपूर हकदार हैं डॉक्टर्स
Published / 2023-06-30 18:20:10
सम्मान के भरपूर हकदार हैं डॉक्टर्स

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस (01 जुलाई) विशेषयोगेश कुमार गोयलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनियाभर में डॉक्टर्स कोरोना महामारी के भयावह दौर में अपनी जान की परवाह किए बिना करोड़ों लोगों के जीवन की रक्षा करते नजर आ चुके हैं।विकट दौर में देश में ड्यूटी के दौरान सैकड़ों चिकित्सकों की मौत हुई। फिर भी चिकित्सक जी-जान से लोगों की जान बचाने में जुटे नजर आये। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान तो बहुत से चिकित्सकों और चिकित्सा स्टाफ को अपनी छुट्टियां रद्द कर प्रतिदिन कार्य करना पड़ा। बहुत से चिकित्साकर्मी महीनों-महीनों तक अपने परिवार और छोटे बच्चों से भी दूर रहे। समाज के प्रति चिकित्सकों के ऐसे ही समर्पण एवं प्रतिबद्धता के लिए कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने तथा मेडिकल छात्रों को प्रेरित करने के लिए ही प्रतिवर्ष देश में पहली जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया जाता है। गंभीर बीमारियों से जूझते मरीजों की जान बचाने का हरसंभव प्रयास करने वाले चिकित्सक वाकई सम्मान के सबसे बड़े हकदार हैं। चिकित्सक दिवस मनाने का मूल उद्देश्य चिकित्सकों की बहुमूल्य सेवा, भूमिका और महत्व के संबंध में आमजन को जागरूक करना, चिकित्सकों का सम्मान करना और साथ ही चिकित्सकों को भी उनके पेशे के प्रति जागरूक करना है। दरअसल कुछ चिकित्सक ऐसे भी देखे जाते हैं, जो अपने इस सम्मानित पेशे के प्रति ईमानदार नहीं होते लेकिन ऐसे चिकित्सकों की भी कमी नहीं, जिनमें अपने पेशे के प्रति समर्पण की कोई कमी नहीं होती। बिना चिकित्सा व्यवस्था और बिना योग्य चिकित्सकों के इंसान की जिंदगी कैसी होती, इसकी कल्पना मात्र से ही रोम-रोम सिहर जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में चिकित्सकों का महत्व सदा से रहा है और हमेशा रहेगा।चिकित्सक दिवस की शुरुआत भारत में वर्ष 1991 में हुई थी। पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री और जाने-माने चिकित्सक डॉ बिधान चंद्र रॉय के सम्मान में चिकित्सकों की उपलब्धियों तथा चिकित्सा क्षेत्र में नये आयाम हासिल करने वाले डॉक्टरों के सम्मान के लिए इसका आयोजन होता है। वे एक जाने-माने चिकित्सक, प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और वर्ष 1948 से 1962 में जीवन के अंतिम क्षणों तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर, बिधाननगर, अशोकनगर, कल्याणी तथा हबरा नामक पांच शहरों की स्थापना की थी। संभवतः इसीलिए उन्हें पश्चिम बंगाल का महान वास्तुकार भी कहा जाता है। कलकत्ता विश्वविद्यालय से मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1911 में एमआरसीपी और एफआरसीएस की डिग्री लंदन से ली। उन्होंने एक साथ फिजिशयन और सर्जन की रॉयल कॉलेज की सदस्यता हासिल कर हर किसी को अपनी प्रतिभा से हतप्रभ कर दिया था। वर्ष 1911 में भारत में ही एक चिकित्सक के रूप में उन्होंने अपने चिकित्सा करियर की शुरुआत की। वे कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में शिक्षक नियुक्त हुए। वर्ष 1922 में वे कलकत्ता मेडिकल जनरल के सम्पादक और बोर्ड के सदस्य बने। 1926 में उन्होंने अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया और 1928 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी चुने गये।डॉ बिधान चंद्र रॉय ने 1928 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के गठन और भारत की मेडिकल काउंसिल (एमसीआई) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई बड़े-बड़े पदों पर रहने के बाद भी वे प्रतिदिन गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज किया करते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उन्होंने अपना समस्त जीवन चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया। बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं को आम जनता की पहुंच के भीतर लाने के लिए वे जीवन पर्यन्त प्रयासरत रहे। 04 फरवरी, 1961 को उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 1967 में दिल्ली में उनके सम्मान में डॉ बीसी रॉय स्मारक पुस्तकालय की स्थापना हुई और 1976 में उनकी स्मृति में केन्द्र सरकार द्वारा डॉ बीसी रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना की गयी।यह संयोग है कि डॉ रॉय का जन्म और मृत्यु पहली जुलाई को ही हुई। उनका जन्म 01 जुलाई 1882 को पटना में हुआ था और मृत्यु 01 जुलाई 1962 को हृदयाघात से कोलकाता में हुई।बहरहाल, चिकित्सकों को पृथ्वी पर भगवान का रूप माना गया है, इसलिए समाज की भी उनसे यही अपेक्षा रहती है कि वे अपना कर्तव्य ईमानदारी और पूरी निष्ठा के साथ निभायें। हालांकि निजी अस्पतालों के कुछ चिकित्सकों पर मरीजों और उनके परिजनों के साथ लापरवाही और लूट के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। दरअसल, निजी चिकित्सा तंत्र मुनाफाखोरी के व्यवसाय में परिवर्तित हो चुका है।फिर भी इस दीगर सच को भी नकारा नहीं जा सकता कि कोरोना हो या कैंसर, हृदय रोग, एड्स, मधुमेह इत्यादि कोई भी बीमारी, छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारियों से चिकित्सक ही करोड़ों लोगों को उबारते हैं। चूंकि चिकित्सक प्रायः मरीज को मौत के मुंह से भी बचाकर ले आते हैं, इसीलिए चिकित्सकों को भगवान का रूप माना जाता रहा है। चिकित्सा केवल पैसा कमाने के लिए एक पेशा मात्र नहीं है बल्कि समाज के कल्याण और उत्थान का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। इसीलिए चिकित्सक को सदैव सम्मान की नजर से देखने वाले समाज के प्रति उनसे भी समर्पण की उम्मीद की जाती है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

समान नागरिक संहिता समय की मांग
Published / 2023-06-29 20:48:02
समान नागरिक संहिता समय की मांग

मृत्युंजय दीक्षितएबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अब भारत देशहित में लिया गया अपना एक और संकल्प पूरा करने की ओर अग्रसर है और यह संकल्प है समान नागरिक संहिता का। देश लंबे समय से समान नागरिक संहिता कानून की मांग कर रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि समान नागरिक संहिता संविधान सम्मत है। भोपाल में भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात के संकेत दे दिये हैं कि अब सरकार समान नागरिक संहिता पर तीव्र गति से आगे बढ़ रही है और 2024 लोकसभा चुनाव से पूर्व ही संसद के आगामी सत्रों में सदन से पारित करवाया जा सकता है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एकदम साफ कहा कि कुछ विरोधी दल जो तुष्टिकरण करते हैं तथा मुस्लिम समाज को केवल अपना वोट बैंक समझते हैं, वहीं यूनिफार्म सिविल कोड के नाम पर मुसलमानों को भड़का रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक घर में एक सदस्य के लिए एक कानून हो और दूसरे के लिए दूसरा हो, तो घर चल पायेगा क्या? तो ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पायेगा? प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि कॉमन सिविल कोड लाओ लेकिन वोटबैंक की राजनीति करने वालों ने हमेशा इसका विरोध किया है। उधर, देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कहा था कि एक बड़ी व विदेशी साजिश के तहत समान नागरिक संहिता का विरोध किया जा रहा है। रक्षा मंत्री ने जो कड़े तेवर दिखाये हैं, उससे भी यह संदेश जा रहा है कि अब समान नागरिक संहिता बहुत ही जल्द भारत का कानून बन जायेगा। सरकार समान नागरिक संहिता पर बहुत ही सतर्कता व तर्कों के साथ आगे बढ़ रही है ताकि उसका विरोध ठंडा हो जाये। यही कारण है कि सबसे पहले केंद्रीय विधि आयोग की ओर से समान नागरिक संहिता पर आम नागरिकों व धार्मिक संस्थाओं से संहिता के संदर्भ में उनके सुझाव व विचार मांगे गये हैं ताकि भारत के सभी नागरिकों, समाजों, पंथों और मजहबों, पर समान कानून लागू हो सके। आम जनता अपने मोबाइल, लैपटाप आदि के माध्यम से विधि आयोग की वेबसाइट पर जाकर आने विचार साझा कर सकती है। विधि आयोग की यह पहल सार्वजनिक होते ही मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली सभी संस्थाओं, नेताओं, सांसदों व विधायकों ने झूठ पर आधारित बयान देने की श्रृंखला प्रारम्भ कर दी है और यह अनवरत जारी है। भाजपा की स्थापना के समय से ही समान नागरिक संहिता उसके तीन मूल ध्येयों में से एक रहा है। 2014 से 2019 तक केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद अब तक वह दो प्रमुख ध्येय प्राप्त कर चुकी है। पहला अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि मुक्त हो चुकी है और वहां भव्य राममंदिर का निर्माण प्रगति पर है और दूसरा जम्मू- कश्मीर से अनुच्छेद -370 की समाप्ति हो चुकी है। अब सरकार समान नागरिक संहिता पर आगे बढ़ रही है। वर्तमान में समान नागरिक संहिता कानून भारत के गोवा राज्य में लागू है जबकि गुजरात व उत्तराखंड में प्रक्रिया चल रही है। उत्तराखंड में एक आयोग इस विषय पर आम जनता से मंत्रणा कर रहा है और उसकी रिपोर्ट 30 जून तक आ जायेगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि उत्तराखंड की जनता से किया गया हर वादा हर हाल में पूरा किया जायेगा और राज्य में जल्द ही समान नागरिक संहिता को लागू किया जायेगा। गुजरात और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा ने समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए आयोग गठित करके जनता को एक संदेश दिया था जिसका लाभ भी भाजपा को चुनावों में मिला था। मुख्यमंत्री धामी का कहना है कि इसी कानून में जनसंख्या नियंत्रण भी आ सकता है जो सभी को मानना अनिवार्य हो जायेगा। केंद्र सरकार ने इससे पूर्व भी 21वें विधि आयोग से समान नागरिक संहिता पर सुझाव मांगे थे तब विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि, अभी देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत नहीं है। लेकिन अब 22वें विधि अयोग ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता पर अपनी पहल प्रारंभ की है। इससे पूर्व 1985 में शाहबानो प्रकरण और फिर 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट समान नागरिक संहिता पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कानून बनाने की बात कह चुका है। संविधान के अनुच्छेद -44 में भी समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कही गयी है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के सिद्धांत का पालन करना है। समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारत के संविधान के भाग- 4 के अनुच्छेद 44 में है। इसमें नीति निर्देश भी दिया गया है कि समान नागरिक संहिता कानून लागू करना हमारा लक्ष्य होगा। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी संविधान सभा की बैठकों में समान नागरिक संहिता के पक्ष में जोरदार बहस की थी किंतु नेहरू जी की वजह से उनका प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया था।बाबा साहब ने कहा था, मैं व्यक्तिगत रूप से समझ नहीं पा रहा हूं कि क्यों धर्म को इस विशाल व्यापक क्षेत्राधिकार के रूप में महत्व दिया जाना चाहिए जो असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरा है जो हमारे मौलिक अधिकारों के साथ संघर्ष कर रहा है? हमारी सामाजिक व्यवस्था में सुधार करने के लिए हमें यह स्वतंत्रता प्राप्त हो रही है, हम क्या कर रहे हैं इस स्वतंत्रता के लिए? समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद नागरिकों में समानता का भाव आएगा। इसका सबसे अधिक लाभ मुस्लिम महिलाओं को होगा पुरुषों को चार शादियों का अधिकार, हलाला, उत्तराधिकार जैसे विषयों में उन्हें अन्य महिलाओं के समान ही अधिकार मिलेंगे। समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद मजहब आधारित पर्सनल ला बोर्ड समाप्त हो जायेंगे। हिजाब और फतवों की राजनीति मंदी पड़ेगी। यही कारण है कि धर्मनिरपेक्षता का पाखण्ड करने वाले सभी दल गोलबंद होकर मुस्लिम समाज को भड़काने के लिए निकल चुके हैं। भारत में समान नागरिक संहिता का विरोध केवल मजहबी आधार पर व मजहबी राजनीति को चमकाने के लिए किया जा रहा है जबकि यह अमेरिका, आयरलैंड, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान, मिस्र आदि जो धर्मनिरपेक्ष देश है जहां पर भी समान नागरिक संहिता लागू है। भारत में ही क्यों विरोध हो रहा है, यह समझने व समझाने की आवश्यकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

मानव जीवन में योग का महत्व
Published / 2023-06-20 19:31:01
मानव जीवन में योग का महत्व

योगाचार्य महेश पाल  एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्तमान समय में स्वास्थ्यमय जीवन जीने की पद्धति का नाम योग है। बदलती दैनिक दिनचर्या, भोजन में आए बदलाव एवं लगातार कंप्यूटर, सेल फोन, सोशल मीडिया आदि के उपयोग के कारण दिन-प्रतिदिन हमारे अंदर विभिन्न प्रकार के रोग जन्म ले रहे हैं। जिनके कारण बच्चे चिड़चिड़ेपन का शिकार होते जा रहे हैं।युवा नसे के साथ-साथ मानसिक तनाव, अवसाद मोटापा, हृदय रोग, अनियंत्रित शारीरिक विकास जैसी समस्याओं से ग्रस्त होते जा रहे हैं। वही महिलाओं में मोटापा, थायराइड, पीसीओडी, डायबिटीज, बीपी जैसे गंभीर रोगों से ग्रस्त होती जा रही है।ऐसी स्थिति में योग हमारे जीवन में लगभग सभी प्रकार के रोगों से बचाव करता ओर हमे पूर्ण रुप से शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रखता है और अध्यात्म की ओर आगे बढ़ने में मदद करता है हठ यौगिक ग्रंथ घेरंड संहिता के अनुसार हमारे शरीर में षट्कर्म शोधन का कार्य करता है।आसन से दृढ़ता (मजबूती) आती हैं। मुद्रा से स्थिरता, प्रत्याहार से धैर्यता, प्राणायाम से लघुता / हल्कापन प्राण ऊर्जा को बढ़ाया जाता है। ध्यान परमात्मा से प्रत्यक्षीकरण/ साक्षात्कार कराने का साधन है समाधि से निर्लिप्तता/अनासक्त अवस्था प्राप्त हो जाती है और योगमय जीवन जीने से जीवन का सम्पूर्ण उद्देश्य पूरा हो जाता हैं।जैसा की हम सब जानते हैं इस वार 21 जून को भारत ही नहीं वल्कि संपूर्ण विश्व 9वा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने जा रहा है। प्रतिवर्ष 21 जून का यह दिन वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीघार्यु प्रदान करता है।पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया, जिसकी पहल भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी। जिसमें उन्होंने कहा था कि यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है।विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है।हमारी बदलती जीवन- शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आयें एक अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं। जिसके बाद 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमन्त्री मोदी जी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अन्दर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय का रहा।इस वार 9वे अंतराष्ट्रीय योग दिवस 2023 की थीम वसुधैव कुटुंबकम के लिए योग वसुधैव कुटुंबकम का अर्थ है- धरती ही परिवार है। इस थीम से तात्पर्य धरती पर सभी लोगों के स्वास्थ्य के लिए योग की उपयोगिता से है में बस इतना ही कहना चाहुंगा की योग को दैनिक दिनचर्या मैं सामिल करें और स्वयं को स्वस्थ बनाए अपने परिवार को स्वस्थ रखे और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभायें। (योगाचार्य महेश पाल पतंजलि जिला युवा प्रभारी और विमुक्त घुमंतू अर्ध घुमंतू महासंघ इंदौर संभाग के प्रभारी भी हैं।)

शहरी कचरा प्रबंधन के लिए गंभीर रणनीति जरूरी
Published / 2023-06-20 08:49:54
शहरी कचरा प्रबंधन के लिए गंभीर रणनीति जरूरी

अमेरिका और चीन हर साल दुनिया भर में 20 करोड़ टन से अधिक नगरपालिका के स्तर का कचरा तैयार करते हैंअमित कपूरएबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनिया में जैसे-जैसे शहरीकरण की गति तेज होती जा रही है, वैसे ही नगरपालिका के स्तर पर बढ़ता कचरा एक कठिन चुनौती पेश कर रहा है। दुनिया शहरी भविष्य की दिशा की ओर अग्रसर हो रही है लेकिन शहरी जीवन शैली के परिणामस्वरूप सबसे महत्त्वपूर्ण उप-उत्पादों में से एक नगरपालिका के स्तर पर जमा होने वाले ठोस कचरे (एमएसडब्ल्यू) की तादाद शहरीकरण की दर से भी अधिक तेजी से बढ़ रही है।विश्व बैंक की एक रिपोर्ट व्हाट ए वेस्ट: ए ग्लोबल रिव्यू ऑफ सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट में कहा गया है कि 2.9 अरब लोग 10 साल पहले महानगरीय क्षेत्रों में रहते थे और प्रति व्यक्ति, रोजाना 0.64 किलोग्राम नगरपालिका ठोस कचरा (0.68 अरब टन सालाना) तैयार होता था। हालांकि, लगभग 3 अरब लोग आज शहरों में रहते हैं और प्रति व्यक्ति के हिसाब से रोजाना 1.2 किलोग्राम ठोस कचरा (1.3 अरब टन प्रति वर्ष) तैयार कर देते हैं।इस अनुमान के मुताबिक कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि वर्ष 2025 तक, 2.2 अरब टन नगरपालिका ठोस कचरा तैयार हो सकता है क्योंकि शहरी आबादी 4.3 अरब तक बढ़ जायेगी। अमेरिका और चीन हर साल दुनिया भर में 20 करोड़ टन से अधिक नगरपालिका के स्तर का कचरा तैयार करते हैं।विश्व बैंक के अनुसार उच्च आमदनी वाले देशों में वर्ष 2050 तक रोजाना प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन 19 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है जबकि निम्न और मध्यम आमदनी वाले देशों में यह लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक बढ़ने का अनुमान है।इसके अलावा यह भविष्यवाणी की गई है कि कम आय वाले देशों में कचरा उत्पादन वर्ष 2050 तक लगभग तीन गुना बढ़ जायेगा। कुल कचरा उत्पादन के संदर्भ में देखा जाए तो पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र सबसे अधिक कचरे (23 प्रतिशत) का उत्पादन करते हैं और पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में सबसे कम (6 प्रतिशत) कचरा होता है।उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया, पश्चिम पूर्व और उत्तरी अफ्रीका जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में कचरा उत्पादन की दिशा पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और आर्थिक पहलू को भी महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करेगा जिसको ध्यान में रखते हुए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता होगी। वर्तमान में, आधे से अधिक कचरे को खुले तौर पर इन क्षेत्रों में फेंक दिया जाता है।शहरीकरण के अपने लाभ भी हैं लेकिन अगर शहरीकरण की योजना अनियोजित है और यह शहरों में रहने वाले लोगों की सहूलियत के अनुकूल नहीं है तब कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। हमें सिर्फ ऐसे शहरों की जरूरत नहीं है जो ग्रामीण इलाकों को छोड़ने वाली आबादी को रखने के लिए पर्याप्त हों बल्कि हमें ऐसे शहरों की आवश्यकता है जो उन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं जो अपने नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन में बाधा ला सकते हैं।नगरपालिका कचरा प्रबंधन न केवल महत्त्वपूर्ण है बल्कि शहरी प्रशासन का एक आवश्यक कार्य है, खासतौर पर महामारी के बाद की दुनिया में। खराब तरीके से प्रबंधित कचरे के परिणामस्वरूप आमतौर पर ऐसे खर्च होते हैं जो लंबे समय में कचरे को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने की तुलना में अधिक होते हैं। कचरे के खराब प्रबंधन का स्वास्थ्य, पर्यावरण और वैश्विक स्तर पर पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।नगरपालिका के ठोस कचरे का वैश्विक आयाम, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इसकी बढ़ती भूमिका और वस्तुओं, शहरी चलन और प्रसंस्करण क्षेत्र के बीच बढ़ते परस्पर संबंध से भी साबित होता है। कचरा और ऊर्जा कार्यबल से जुड़ी एक रिपोर्ट (अक्टूबर 2017 में जारी) के अनुसार, भारत के शहरी क्षेत्रों में 37.7 करोड़ लोग अनुमानित तौर पर 6.2 करोड़ टन ठोस कचरे का उत्पादन सालाना करते हैं। शहरी प्रशासन तंत्र को सक्रिय करने और भारत में स्वच्छ भारत मिशन-शहरी जैसे अभियानों में लोगों की व्यापक भागीदारी की पहल से आगे का रास्ता तैयार हो सकता है।औद्योगीकरण, समाजीकरण और क्षेत्रीय जलवायु के स्तर सभी नगरपालिका के ठोस कचरे की उत्पादन दरों को प्रभावित करते हैं। आमतौर पर, उत्पादित ठोस कचरे की मात्रा, आर्थिक विकास और शहरीकरण दर के साथ बढ़ती है।शहरीकरण और आमदनी के स्तर में गहरा संबंध है और जैसे-जैसे खर्च करने योग्य आमदनी और जीवन स्तर बढ़ता है, वैसे-वैसे वस्तुओं तथा सेवाओं की खपत के साथ ही उत्पादित कचरे की मात्रा भी बढ़ती है। शहरी क्षेत्रों के निवासी, ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में लगभग दोगुना कचरा पैदा करते हैं। इस तरह के कचरे के अस्वास्थ्यकर, अवैज्ञानिक और खराब निपटान के परिणामस्वरूप पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियां खड़ी हो जाती हैं।इस संबंध में, कचरा प्रबंधन के लिए एक एकीकृत रणनीति की दरकार है जिसमें रकम मुहैया कराने, निर्माण और उन केंद्रों का संचालन शामिल है जहां शहरी अपशिष्ट प्रबंधन की वर्तमान समस्याओं का प्रबंधन करने के लिए कचरे को अलग करने के तरीके, संग्रह, परिवहन, दोबारा प्रसंस्करण, इसके निपटान की सुविधाएं दी जा सके।इस संदर्भ में, वैश्विक कचरा उत्पादन के आंकड़े दो प्रमुख मुद्दों का संकेत दे सकते हैं जैसे कि कचरे को स्थायी रूप से प्रबंधित करने के लिए शहरों में सक्रिय शासन तंत्र की कमी और नागरिकों के उपभोग का रुझान और व्यवहार बड़ी मात्रा में कचरे को बढ़ावा देता है।अपर्याप्त संसाधनों और मौजूदा प्रणालियों में व्याप्त कमियों ने शहरी बुनियादी ढांचा सेवाओं, विशेष रूप से शहरी ठोस कचरा प्रबंधन पर भारी दबाव डाला है। इसीलिए शहरी कचरे को पर्यावरण प्रदूषण का कारक न बनाए जाने और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम पैदा करने से रोकने के लिए शहरी स्थानीय निकायों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे अपनी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को टिकाऊ तरीके से बढ़ाएं, संचालित करें और उसका बेहतर तरीके से रख-रखाव करें।इसके लिए महत्त्वपूर्ण तरीके से पूंजी निवेश, अत्याधुनिक, लागत प्रभावी प्रौद्योगिकियों को शामिल करने, अपशिष्ट प्रबंधन में सार्वजनिक-निजी भागीदारी के साथ ही उचित कचरा प्रबंधन की शुरूआत करने की आवश्यकता होगी। (कपूर इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटिटिवनेस, भारत के अध्यक्ष और यूएसएटीएमसी, स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में व्याख्याता हैं। देबरॉय भारत के प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं)

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी की आत्मकथा अत्यंत ही प्रेरणादायी ग्रंथ
Published / 2023-06-12 17:26:35
पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी की आत्मकथा अत्यंत ही प्रेरणादायी ग्रंथ

रथीन भद्रा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मित्रों हुतात्मा पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी का 11 जून को जन्मदिवस था। आइये भारत मां के इस वीर पुत्र को नमन करें। पंडित जी की आत्मकथा अत्यंत ही प्रेरणादायी ग्रंथ है, इसे प्रत्येक भारतीय को अवश्य पढ़ना चाहिए। हम उसका एक अंश यहां प्रस्तुत कर रहे हैं... मेरी मां 11 वर्ष की उम्र में माता जी विवाह कर शाहजहांपुर आयी थीं। उस समय वह नितांत अशिक्षित और ग्रामीण कन्या के सदृश थीं। शाहजहांपुर आने के थोड़े दिनों बाद श्री दादी जी ने अपनी बहन को बुला लिया। उन्होंने माता जी को गृह-कार्य की शिक्षा दी। थोड़े दिनों में माता जी ने घर के सब काम-काज को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं। मेरे जन्म होने के पांच या सात वर्ष बाद उन्होंने हिन्दी पढ़ना आरंभ किया। पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ था। मुहल्ले की सखी-सहेली जो घर पर आया करती थी, उन्हीं में जो कोई शिक्षित थीं, माता जी उनसे अक्षर-बोध करतीं। इस प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उस में पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अवलोकन करने लगीं। मेरी बहनों की छोटी आयु में माता जी ही उन्हें शिक्षा दिया करती थीं। जब मैंने आर्य-समाज में प्रवेश किया, तब से माता जी से खूब वार्तालाप होता। उस समय की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गये हैं। यदि मुझे ऐसी माता न मिलती तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भांति संसार चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की है, जैसी मेजिनी को उनकी माता ने की थी। यथासमय मैं उन सारी बातों का उल्लेख करूंगा। माताजी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यह था कि किसी की प्राण हानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राण दण्ड न देना। उनके इस आदेश की पूर्ति के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी। जन्मदात्री जननी! इस दिशा में तो तुम्हारा ऋण-परिशोध करने के प्रयत्न का अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूं तो भी मैं तुम से उऋण नहीं हो सकता। जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुम ने किस प्रकार अपनी देव वाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है। तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी, जो कुछ शिक्षा मैंने ग्रहण की उसका श्रेय तुम्हीं को है। जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश करती थीं, उसका स्मरण कर तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और मस्तक नत हो जाता है। तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्नेह से हर एक बात को समझा दिया। यदि मैंने धृष्तापूर्ण उत्तर दिया तब तुम ने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो। किंतु ऐसा करना ठीक नहीं, इसका परिणाम अच्छा न होगा। जीवनदात्री! तुम ने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन-पोषण ही नहीं किया किंतु आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं। जन्म-जन्मान्तर परमात्मा ऐसी ही माता दें। महान से महान संकट में भी तुम ने मुझे अधीर न होने दिया। सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सान्त्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक तृष्णा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु का दु:ख-सम्वाद सुनाया जायेगा। मां! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता-भारत माता की सेवा में अपने जीवन को बलि-वेदी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कुक्ष को कलंकित न किया, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जायेगा, तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जायेगा। गुरु गोविंदसिंहजी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु का संवाद सुना था, तो बहुत हर्षित हुई थी और गुरु के नाम पर धर्म रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई बांटी थी। जन्मदात्री! वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूं। (लेखक राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच रांची झारखंड के महासचिव हैं।)

अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस (12 जून) के पीछे एक भारतीय का संघर्ष
Published / 2023-06-10 19:27:02
अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस (12 जून) के पीछे एक भारतीय का संघर्ष

जितेंद्र परमारएबीएन एडिटोरियल डेस्क। पूरी दुनिया हर साल 12 जून को अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस के रूप में मनाती है। लेकिन आज से करीब दो दशक पहले की स्थिति अलग थी। उस समय दुनिया को बाल मजदूरों की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं था और न ही विश्व के नेताओं ने बाल श्रम व दासता को अपराध माना था। लेकिन, इन सबके बीच एक भारतीय ने बाल श्रम को लेकर पूरी दुनिया के नजरिये को ही बदल दिया।कैलाश सत्यार्थी ने बाल श्रम के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय कानून बनाने और बाल मजदूर व गुलामी के शिकार बच्चों के लिए साल में एक दिन समर्पित करने की मांग को लेकर 17 जनवरी, 1998 को फिलीपींस के मनीला से एक ऐतिहासिक वैश्विक जनजागरूकता यात्रा की शुरुआत की थी। यह यात्रा करीब पांच महीने तक चली थी। इस दौरान यह 103 देशों में 80,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर छह जून, 1998 को जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के मुख्यालय पहुंची थी। उस समय संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन केंद्र में आईएलओ का एक महत्वपूर्ण वार्षिक सम्मेलन आयोजित हो रहा था।आईएलओ सम्मेलन के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था, जब किसी सिविल सोसायटी के व्यक्ति को इसे संबोधित करने का मौका दिया गया। इसके तहत कैलाश सत्यार्थी के साथ दो बच्चों को इस वैश्विक मंच पर अपनी बात रखने के लिए बुलाया गया। कैलाश सत्यार्थी ने अपने संबोधन में बाल श्रम के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय कानून बनाने और बाल श्रम निषेध के लिए एक विशेष दिन घोषित करने की मांग की।इसके एक साल बाद 17 जून, 1999 को बाल श्रम उन्मूलन को लेकर आईएलओ कनवेंशन- 182 पारित कर दिया गया। यह बाल श्रम के खिलाफ लड़ाई में कैलाश सत्यार्थी की एक बड़ी जीत थी। इस कनवेंशन पर बहुत ही कम समय में संयुक्त राष्ट्र के सभी 187 सदस्य देशों ने हस्ताक्षर कर दिये।वहीं, बाल श्रम निषेध को लेकर एक विशेष दिन घोषित किये जाने की मांग को पूरा किया गया। साल 2002 में इसकी घोषणा की गयी कि हर साल 12 जून को अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जायेगा।

बृजभूषण के बहाने केंद्र को घेरने का चक्रव्यूह व्यर्थ, अब क्या करेगा विपक्ष...
Published / 2023-06-09 22:24:17
बृजभूषण के बहाने केंद्र को घेरने का चक्रव्यूह व्यर्थ, अब क्या करेगा विपक्ष...

डॉ मयंक चतुर्वेदीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। एक खबर आई और देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। हमलावर विपक्ष के हाथ से रेत की तरह मुद्दा फिसल गया। भाजपा के विरोधियों ने केंद्र की मोदी सरकार को बृजभूषण के बहाने घेरने के लिए झूठ का कितना बड़ा महल खड़ा किया, वह अब सभी के सामने आ गया है। दावे इतने किये गये कि पहलवान तो पहलवान कई राजनीतिक पार्टियां, अपने को किसान संगठन कहनेवाले अनेक दल मुद्दे को पकड़कर भागने की दौड़ में लग गये थे। देखें, आखिर जीतता कौन है। इस पूरे प्रकरण की शुरूआत इस साल 18 जनवरी को हुई थी, जब देश के नामी रेसलर बंजरग पुनिया, विनेश फोगाट और साक्षी मलिक दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे और भारतीय कुश्ती संघ (डब्ल्यूएफआई) के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर तानाशाही करने एवं भेदभाव के आरोप लगाए। उस समय वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीत चुकी विनेश फोगाट को पूरे देश ने रोते हुए देखा था। इन लोगों के साथ उन तमाम मोदी विरोधी आन्दोलन जीवियों को भी देखा गया था, जोकि हर उस आन्दोलन में दिखाई देते रहे हैं जो किसी न किसी रूप में केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा के विरोध में किये गये।विनेश फोगाट ने आरोप लगाया कि बृजभूषण सिंह और कोच महिला पहलवानों का यौन शोषण करते हैं। जब हम इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं तो हमें ये धमकाते हैं। उन्हें खेल के दौरान पर्याप्त सुविधाएं नहीं दी जाती। यहां तक कि ओलंपिक में खिलाड़ियों को फिजियो तक नहीं मिलता है। जिस नाबालिग पहलवान को आगे कर बृजभूषण सिंह पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था।जिसके लिए देश की महान खिलाड़ी भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष क्वीन आफ ट्रैक एंड फील्ड पीटी उषा से जंतर मंतर पर पहलवानों के समर्थकों ने बदतमीजी, धक्का-मुक्की की। यहां तक कि पहलवानों की एक समर्थक महिला ने उन पर थप्पड़ तक चला दिया, जैसा कि मीडिया रिपोर्ट्स में आया भी। जिसके बाद उनकी डबडबायी आंखों वाली तस्वीरें देश और दुनिया ने भी देखीं।फिर शुरू होता हुआ दिखा जंतर मंतर पर एक के बाद एक विपक्षी नेताओं का जमावड़ा। कभी खाप पंचायतों को तो कभी देशद्रोही तत्वों को जंतर मंतर पर देखा गया। मोदी तेरी कब्र खुदेगी, हमें चाहिए आजादी जैसे नारे भी लगे। यहां से केंद्र को परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गयी और खाप पंचायतों ने दिल्ली को ट्रैक्टरों से पाट देने की धमकी दी। प्रियंका गांधी के बहाने कांग्रेस, आप जैसी राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे को भुनाने के लिए सबसे आगे दिखीं। प्रियंका गांधी की अपील आयी कि पहलवानों का साथ दें। इसी बीच धरना स्थल जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी खिलाड़ियों का समर्थन किया। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने खुलकर केंद्र की भाजपा सरकार पर आरोप लगाये। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि हमारे पहलवानों को पीटा गया और प्रताड़ित किया गया। मैंने पहलवानों से बात की और उन्हें अपना समर्थन दिया, हम उनके साथ हैं। ममता बनर्जी ने पहलवानों के प्रदर्शन को लेकर केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा। कांग्रेस नेता और हरियाणा से राज्यसभा सदस्य दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी पहलवानों में सबसे आगे वाली पंक्ति में दिखे।दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ऐसे में भला कैसे पीछे रहनेवाली थीं, वह भी इस मुद्दे में कूद गयीं। उन्होंने इस प्रकरण में लापरवाही बरतने के आरोप में दोषी पुलिस अफसरों तक पर एफआईआर करने की सिफारिश भेज दी। किसान नेता राकेश टिकैत ने तो दो जून को हरियाणा के कुरुक्षेत्र में खाप की बैठक के बाद ऐलान ही कर दिया था कि केंद्र सरकार के पास नौ जून तक का समय है। हम बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी से कम पर कोई समझौता नहीं करेंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो हम नौ जून को जंतर-मंतर जायेंगे और देश भर में पंचायत करेंगे। पहलवानों पर लगे मुकदमे वापस हों और बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी हो। इस आन्दोलन को शशि थरूर का भी साथ मिला और न जानें कितने दिग्गज नेताओं का साथ मिला है कि उसके लिए लिखने के शब्द भी कम हैं। इस तरह से वे सब कुछ तरह-तरह के प्रयास किए गए कि कैसे हम मोदी सरकार को घेर सकते हैं और उस पर दबाव बना सकते हैं। किंतु अब क्या? इस पूरे प्रकरण की हवा निकल गयी है।बृजभूषण शरण सिंह को लेकर याद आता है वह समय,जब उन पर ये आरोप लगाये जा रहे थे, तब उन्होंने साफ कर दिया था कि अगर ये आरोप साबित हो गये तो वो फांसी पर लटकने को तैयार हैं। उन्होंने खुद पर लगे सभी आरोपों का खंडन किया था और आज उनकी बात सत्य साबित हुई है। वस्तुत: बृजभूषण शरण सिंह साल 2011 से ही भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष हैं। वह पहलवानों को समर्थन दे रहे हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बेटे दीपेंदर हुड्डा को भी एक अध्यक्ष पद के चुनाव में हरा चुके हैं। उन्होंने भारतीय कुश्ती संघ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नयी पहचान दिलायी है।आखिर फिर क्या मामला था जो उनका इतना विरोध किया गया? देखा जाए तो इसमें गहरी राजनीति छिपी हुई है। कुश्ती संघ के नियम कहते हैं कि कोई व्यक्ति अधिकतम तीन बार अध्यक्ष रह सकता है। जोकि बृजभूषण सिंह पूरे कर चुके हैं। अब भले ही वे महासंघ में अध्यक्ष नहीं बने किंतु उनके दबदबे को देखते हुए उनका कोई समर्थक ही अध्यक्ष बनेगा, जैसा कि सबसे अधिक प्रबल संभावना है। इसलिए उनके विरोधी चाहते थे कि किसी भी तरह से उनकी गिरफ्तारी हो जाये। कुश्ती संघ के अध्यक्ष का चुनाव होते वक्त वे जब सामने मौजूद ही नहीं रहेंगे तो स्वभाविक तौर पर चुनाव पर उनका प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन अब उस बेटी के पिता ने ही आगे आकर पूरे मुद्दे की हवा निकाल दी है, जिसने कि बृजभूषण शरण सिंह पर आरोप लगाये थे। ऐसे में अब पहलवानों के इस आन्दोलन का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।नाबालिग पहलवान के पिता ने बता दिया है कि उसने डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष के खिलाफ यौन उत्पीड़न की झूठी शिकायत दर्ज करायी थी क्योंकि वह अपनी बेटी के साथ हुई नाइंसाफी से नाराज था। इस पिता ने कहा है कि सरकार ने पिछले साल मेरी बेटी की हार (एशियाई अंडर 17 चैम्पियनशिप ट्रायल) की निष्पक्ष जांच का वादा किया है। मेरा भी फर्ज बनता है कि अपनी गलती सुधारूं। इस पिता ने बता दिया है कि कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के प्रति उनके मन में कड़वाहट की शुरुआत लखनऊ में 2022 में एशियाई अंडर 17 चैम्पियनशिप के ट्रायल से हुई थी, जिसमें नाबालिग लड़की फाइनल में हारकर भारतीय टीम में जगह नहीं बना सकी थी। उन्होंने रैफरी के फैसले के लिये बृजभूषण को दोषी मान लिया था। इसलिए बदले की भावना से भर गया था, मैंने बदला लेने का फैसला किया था।चलो, इस पिता की सच्चाई अब सबके सामने आ चुकी है । फिर भी आप उम्मीद रख सकते हैं कि यह मोदी सरकार है, जो जांच बृजभूषण के खिलाफ शुरू हुई है वह अपने परिणाम तक अवश्य पहुंचेगी। उन पर जो एक नाबालिग सहित सात महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न का आरोप है। इसको लेकर दिल्ली पुलिस ने सिंह के खिलाफ पॉक्सो एक्ट सहित दो एफआईआर दर्ज की हैं। अब इस नबालिग खिलाड़ी के पिता के बयान सामने आने के बाद आगे इस मामले में पॉक्सो एक्ट का प्रकरण समाप्त हो जाएगा, किंतु फिर भी छह महिला पहलवानों के आरोप बरकरार हैं। जैसा कि खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने प्रदर्शनकारी पहलवानों के साथ अपनी मुलाकात में कहा भी था कि बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होगी। दिल्ली पुलिस पहलवानों के खिलाफ 28 मई को दर्ज एफआईआर भी वापस लेगी। वह तो होगा ही। मोदी सरकार में न्याय मिलता है अभी तक ये दिखता आया है। उम्मीद रखें इस खुलासे के बाद इस प्रकरण में जिन्हें भी आपत्ति है, उन्हें भी न्याय जरूर मिलेगा, लेकिन अब जो नहीं हो पायेगा, वह है इस मुद्दे पर राजनीति।

सहज-सहज सब कोउ कहै, सहज न चिन्है कोई...
Published / 2023-06-03 21:40:01
सहज-सहज सब कोउ कहै, सहज न चिन्है कोई...

कबीर जयंती 04 जून विशेष गिरीश्वर मिश्र एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कबीर के माध्यम से हम अपने समय को ठीक से पहचान सकते हैं। कबीर कभी बड़े आसान लगते हैं तो कभी बड़े मुश्किल। हिंदी के पंडितों ने उनकी कई तरह से व्याख्या की है। कबीर को तमाम तरह के खेमों में रखा गया है। वह बड़े पक्के भक्त हैं, शुद्ध वैष्णव हैं, सूफी हैं और प्रेम के कवि तो हैं ही। वे ब्रह्म और ईश्वर की पहचान कराने वाले कवि और भक्त हैं। ज्यादातर लोग उन्हें संत कहकर समझाना चाहते हैं। उन्हें दलित चेतना का विचारक कह कर भी पेश किया गया है। इन सबके बीच असली कबीर कौन हैं यह पहचानना और भी कठिन हो गया है। वे वाचिक परम्परा के कवि और संत हैं। उन्होंने जो कुछ कहा उसका मौखिक आधार अधिक है। कई जगह से उनकी रचनाओं को विद्वानों और भक्तों ने एकत्र किया है। इसलिए उनके पाठ की प्रामाणिकता सिद्ध करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। कबीर बहुत जटिल हैं, जटिल इसलिए कि वह हम सब जैसे आदमी भी हैं और उससे ऊपर उठकर वह कवि भी हो जाते हैं और उससे उठकर वह सिद्ध भी हो जाते हैं। कबीर को पहचानना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है कि कबीर को लेकर जो किवदंतियां हैं, कहानियां हैं, वे उनको अलग-अलग घरोंदों में रखती है। इस तरह किसी एक तरह के कबीर नहीं हैं। नाना प्रकार के कबीर जगह-जगह फैले हुए जो कबीर पंथी हैं और हम जिस कबीर को पढ़ते हैं, दोनों में बहुत दूरी है। कबीर को भगवान का रूप दे दिया गया। कबीरपंथी नाना प्रकार से उनकी पूजा करते हैं। यह सब जो दुनिया की खुदाई है, उसका अपना सब लफड़ा है, वह उनको बनाता रहेगा, बिगाड़ता रहेगा। यह पृष्ठभूमि है जो जटिल बनाती है, कबीर तक हमें पहुंचने में कठिनाई पैदा करती है कि कबीर को कहां से देखा जाये? और क्या देखा जाये? कबीर हमारे लिए इसलिए भी प्रासंगिक हैं कि वो पूरे समग्र समाज को देखते हैं। कोई ऐसी जाति नहीं होगी जिसका उल्लेख उन्होंने न किया हो, कोई ऐसा धर्म नहीं होगा जिसका उल्लेख नहीं पायेंगे। जितनी भारत की विविधता है, वह सारी की सारी कबीर में दिखाई देती हैं। कबीर इस्लामी शासन था। बहुत सारे इस तरह के प्रमाण हैं जो यह बताते हैं कि उस समय धर्म परिवर्तन की भी बात होती थी। तमाम तरह के अत्याचारों की भी बात होती है। यह आत्मरक्षा का माध्यम था। जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं, यह गलत शब्द है। क्योंकि यह हिंदुत्व का दिया हुआ है ही नहीं। वह तो किसी और ने नाम दे दिया कि हिन्दू धर्म है। असली नाम तो शाश्वत धर्म हो सकता है क्योंकि उसकी बात हर जगह है। जिन लोगों ने इसका उपयोग किया और हम लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया। यह गुलामी की मानसिकता की एक प्रवृत्ति है। अंग्रेजों ने जिन-जिन रूपों में भारत को पहचाना, उन-उन रूपों को हमने स्वीकार कर लिया कि वही हम हैं, जैसा वे कह रहे थे। कबीर एक खास तरह के जीवन दृष्टि को प्रतिपादित करते हैं। बहुत तार्किक तरीका है उनका, विश्लेषण करते हैं, तथ्यों को बताते हैं। यह भी बताते हैं कि रास्ता क्या है? वह अपने समय में स्थित आंकड़ों का विश्लेषण करके निष्कर्ष भी निकाल लेते हैं। यह भी दिखलाते हैं कि कहीं न कहीं तमाम बाह्याडंबरों को हरा करके एक निखालिस मनुष्यता बचती है। यदि उस मनुष्यता को अपनाया जाये, उसके रास्ते पर चला जाये तो हम आत्मानुभूति कर सकते हैं। वह आत्मानुभूति ऐसी होगी जो भेद-भाव नहीं करेगी। वह सबके निकट होगी। सभी संत कवियों ने, लोक जीवन की भाषा को अपनाया है, यह बहुत बड़ी क्रांति थी। वह खेत में काम करने वाले गृहस्थ की भाषा है, वह पंडित की भाषा नहीं है। मगर पंडित की भाषा संस्कृत में जो कुछ हो रहा था वह सब वे जान रहे थे। उन्होंने सिद्ध किया कि लोक भाषा में भी गहन चिंतन किया जा सकता है। यह बड़ी मार्के की बात है। वे जन कवि हैं न कि आभिजात्य वाले। यह अपनी कविता के लिए कच्चा माल भी वहीं, आम जिंदगी से लेते हैं। चर्चा भी उन्हीं की करते हैं। यह एक पैराडाइम शिफ्ट है, एक प्रारूप नये ढंग का है। इसमें ज्ञान के आभिजात्य और जनता का जो भेद है, इसे दूर किया गया। कबीर की बातें जीवन की बातें है। वह केवल आदर्श की बात नहीं है। कबीर यह भी कहते हैं कि जो विचार नहीं करता है, उसके लिए तो मस्ती ही मस्ती है- सुखिया सब संसार है खावै अरु सोवै, दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै। विचार करने की कुछ कीमत तो आप को अदा करनी पड़ेगी। आप पहचानियेगा तो आप को पहचाना जायेगा। आप को खेमों में रखा जायेगा। कबीर कई तरह से सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। भाषाओं में, विचार में, तर्क के ढंग में, कहने के ढंग में। उलटबांसियों का अर्थ लगाना आसान नहीं है। घर से बाहर निकल कर वह तमाम लोगों से बात करते थे। बताते थे देखो यह गलत है और फिर स्वयं अपनी साधना में डूबे रहते थे। अपने जीवन को, अपने अनुभवों को आत्म-मंथन करना, आत्म-विचार करना, आत्म-बोध की उनकी यात्रा निरंतर चलती रहती है। वह अकेली भी है और साथ-साथ भी है। वह समाज की ओर अभिमुख भी है और स्वयंचेता भी। उनके विचारों में वे बहुत सारी उक्तियां मिलती हैं जिनसे हम उनको समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए उनकी एक बहुत प्रसिद्ध उक्ति है- हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साधु। हद बेहद दोऊ चले, ताकर मता अगाथ। इसे आप जिस रूप में भी लें, हद और बेहद स्थापित है, जो परम्परा है, जो परम्परा के परे है, जो सीमित है और जो व्यापक है। दोनों को समझना जरूरी है। कबीर की कविता में निषेध बहुत प्रखर रूप से प्रकट होता है। शायद उनके सामने जिस तरह की समस्यायें थी उन्हें देखते हुए उनका खंडन करना, उन पर चोट करना जरूरी था। इस मामले में वह बहुत ही कट्टर हैं। कट्टर इस अर्थ में हैं कि वह किसी को छोड़ते नहीं हैं- कांकर पाथर जोड़ि कै, मस्जिद लेई बनाई। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाई। यह कहने की हिम्मत है उनको। वह चाहे हिन्दू धर्म की जाति की परेशानियां हों या इस्लाम की परेशानियां, दोनों को कहीं न कहीं चोट पहुंचाते हैं। वह सहज मार्ग वाले हैं : सहज-सहज सब कोउ कहै, सहज न चिन्है कोई। जिन सहजै विषया तजि, सहज कही जे सोई। इस सहज शब्द को, समझना कठिन है। यह सहजता, यह स्वाभाविकता कैसे आई? सहजता को जीवन में कैसे लाया जाये। सहज को खोजना शायद यह उनके जीवन का केंद्रीय तत्व था। सहज को ढूंढ़ना ही उनका एक मार्ग था, जिसको उन्होंने आविष्कार किया। सत्य का अन्वेषण और सहज का मार्ग, यह रास्ता चुना उन्होंने, जो किसी के लिए भी सुगम हो सकता है, सहज हो सकता है। आसानी से जिसका उपयोग किया जा सकता है। कबीर ने कई तरह से चेतावनी दी है कि हम किस तरह से, उस सहज के मार्ग को पा सकते हैं। इस बात को खोजने की कोशिश उन्होंने की है। यह भी उन्होंने बार-बार दिखलाने की कोशिश की है कि भाई, सत्य कई नहीं है। नाम तरह-तरह के ले लो मगर सत्य है वही- हमारे राम, रहीम, करीमा, केसो, अलह, राम, सति सोई। बिस्मिल मेरि विशम्भर एकै और न दूजा कोई। वह कहते हैं कि क्यों तुम झंझट में पड़े हो, यह सब तो एक ही तत्व को बता रहे हैं। वह हमेशा इस पर भी जोर देते हैं कि अपना परिष्कार करो, सुधरो। जो समय मिला है, जो जीवन मिला है, उसमें हम सुधारें। मैं को हटाइये उसके बाद आप को नया जीवन मिलेगा। सहज का, जीवन में आत्म बोध का, कैसे विस्तार होगा, सत संगति भी चाहि, गुरु की कृपा भी चाहिए, लगन भी चाहिए और अपने आप को पहचानने की एक अदम्य जिज्ञासा भी चाहिए और इसके लिए आतुरता भी। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

अपने पर्यावरण के प्रति कितने जागरूक हैं हम
Published / 2023-06-03 21:35:32
अपने पर्यावरण के प्रति कितने जागरूक हैं हम

सत्यनारायण गुप्ताएबीएन एडिटोरियल डेस्क। बचपन में रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता पढ़ी थी- लोहे के पेड़ हरे होंगे... लेकिन लगता नहीं कि अब कभी लोहे के पेड़ हरे होंगे और कंक्रीट के जंगल से कभी सुगंध फैलेगा।  क्योंकि मानवीय गतिविधियों और क्रियाकलापों से हमारे पर्यावरण को पहुंचे नुकसान के कारण दुनिया का तापमान बढ़ रहा है और इससे जलवायु में होता जा रहा परिवर्तन अब मानव जीवन के हर पहलू के लिए खतरा बन चुका है।अगर इसे अपने ही हाल में छोड़ दिया गया तो आने वाले समय में तापमान इस कदर बढ़ जाएगा कि मानव जीवन पर संकट आ सकता है। भयावह सूखा पड़ सकता है। समुद्री जलस्तर बढ़ सकता है और इन सब प्राकृतिक आपदाओं के फलस्वरूप कई प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं। हमारे आंगन से गौरैया गायब हो चुके हैं, गंगा तट पर मरे हुए डाल्फिंस दिखाई देते हैं और बल झील के ऊपर मरी हुई मछलियां उपलती हुईं नजर आती हैं। पिघलती बर्फ के कारण जहां ध्रुवीय भालू का संकट खतरे में है वहीं आस्ट्रेलियाई समुद्र तट पर स्थित ग्रेट बैरियर रीफ का आकार छोटा होता जा रहा है।जैसा कि हम जानते हैं जलवायु परिवर्तन एक लंबे समय में या कुछ सालों में किसी स्थान का औसत मौसम है और जलवायु परिवर्तन उन्हीं औसत परिस्थितियों में बदलाव है। जितनी तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसके लिए मानव क्रियाएं सबसे ज्यादा दोषी हैं। घरेलू कामों, कारखानों और परिवहन के लिए मानव तेल, गैस और कोयले का इस्तेमाल करते हैं जिसकी वजह से जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।जीवाश्म इंधन के जलने से ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। सबसे अधिक मात्रा कार्बन डाइआॅक्साइड की होती है। ग्रीनहाउस गैसों की सघन मौजूदगी के कारण सूरज की गरमी धरती से बाहर नहीं जा पाता है, जिससे धरती का तापमान बढ़ता जाता है। आज 19 वीं सदी की तुलना में तापमान 1.2 सेल्सियस अधिक बढ़ चुका है और कार्बन डाइ आॅक्साइड की मात्रा में 50% तक वृद्धि हुई है।पर्यावरणविदों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव से बचने के लिए हमें पृथ्वी के क तापमान वृद्धि के कारकों को नियंत्रित के संबंध में ठोस कदम उठाने होंगे। वर्ष 2100 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक तापमान को नियंत्रित रखने की जरूरत है। यदि तमाम देशों द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ सकता है।यह आगे चलकर 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। फलस्वरूप पृथ्वी को भयानक हीट वेव का सामना करना पड़ेगा। समुद्र के जलस्तर पर वृद्धि होने से लाखों लोग बेघर हो जायेंगे। पौधों और जंतुओं की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो जायेंगी। जलवायु परिवर्तन के कारण ही तूफानों की संख्या में वृद्धि, बार-बार आने वाले भूकंप, नदियों में बाढ़ का विकराल रूप देखने को मिल रहा है। ग्लोबल वार्मिंग इसी गति से बढती रही तो पृथ्वी का बड़ा भूभाग जनविहीन हो जायेगा, कृषि भूमि रेगिस्तान में बदल जायेंगे। इसके उलट वैसे क्षेत्रों में भारी बारिश हो सकती है जहां पहले सूखा पड़ता था। जाहिर है गरीब देशों पर इसका कुप्रभाव अधिक व्यापक होगा। खेती और फसल को व्यापक नुकसान, पेयजल संकट, जंगलों में आग, ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ का पिघलना विशेष जलवायु के अभ्यस्त जीवों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ सकता है। यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस सदी के अंत तक 550 प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं। 2015 में पेरिस समझौते द्वारा दुनिया के तमाम देशों ने कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने तथा ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की प्रतिबद्धता दोहरायी थी। 1992 में रियो सम्मेलन से लेकर 2022 में शर्म अल शेख में आयोजित कॉप - 27 सम्मेलन तक एक साथ बैठकर दुनिया भर के राजनेता पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने के उपायों  पर चर्चा कर चुके हैं। 1972 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में नामित किया ।1973 में केवल एक पृथ्वी के नारे के तहत पहला पर्यावरण दिवस उत्सव मनाया गया। 2023 के पर्यावरण दिवस का थीम है- बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन... दुनिया भर में हर साल 430 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से आधा मात्र एक बार उपयोग होता है। इनमें से 10 फीसदी से भी कम को रिसाइकिल किया जाता है। प्रत्येक वर्ष 1930 मिलियन टन प्लास्टिक झीलों नदियों और समुद्रों में समा जाते हैं। 5 मिलीमीटर व्यास वाले प्लास्टिक कण (माइक्रोप्लास्टिक्स) भोजन पानी और हवा में घुल  जाते हैं अनुमानत: प्रति वर्ष प्रत्येक व्यक्ति 50,000 से अधिक प्लास्टिक कणों को सांस के रूप ग्रहण करता है। फेंके गये या जलाये गये एकल उपयोग वाले प्लास्टिक मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाते हैं और पहाड़ की चोटियों से लेकर समुद्र तट तक पूरी तरह से परिस्थिति तंत्र को प्रदूषित करते हैं। समय आ गया है कि मनुष्य पृथ्वी के पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक हो, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब यह हमारे रहने लायक नहीं रह जायेगी और हमें अपने जीवन को बचाए रखने के लिए ब्रह्मांड के किसी अन्य ग्रह में शरण लेना होगा। लेकिन दुर्भाग्यवश अब तक वैसे किसी ग्रह की खोज नहीं हुई है जहां जीवन संभव हो।

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