नवरात्र हवन के झोंके, सुरभित करते जनमन को।
है शक्तिपूत भारत, अब कुचलो आतंकी फन को॥
नव सम्वत पर संस्कृति का, सादर वन्दन करते हैं।
हो अमित ख्याति भारत की, हम अभिनंदन करते हैं॥
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इस साल 22 मार्च से विक्रम संवत 2080 का प्रारंभ हो रहा है। विक्रम सम्वत् को नव संवत्सर भी कहा जाता है। संवत्सर पांच प्रकार के होते हैं, जिनमें सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास सम्मिलित हैं। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ एवं मीन नामक बारह राशियां सूर्य वर्ष के महीने हैं।
सूर्य का वर्ष 365 दिन का होता है। इसका प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से होता है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ और फाल्गुन चंद्र वर्ष के महीने हैं। चंद्र वर्ष 355 दिन का होता है। इस प्रकार इन दोनों वर्षों में दस दिन का अंतर हो जाता है। चंद्र माह के बढ़े हुए दिनों को ही अधिमास या मलमास कहा जाता है।
नक्षत्र माह 27 दिन का होता है, जिन्हें अश्विन नक्षत्र, भरणी नक्षत्र, कृत्तिका नक्षत्र, रोहिणी नक्षत्र, मृगशिरा नक्षत्र, आर्द्रा नक्षत्र, पुनर्वसु नक्षत्र, पुष्य नक्षत्र, आश्लेषा नक्षत्र, मघा नक्षत्र, पूवार्फाल्गुनी नक्षत्र, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, हस्त नक्षत्र, चित्रा नक्षत्र, स्वाति नक्षत्र, विशाखा नक्षत्र, अनुराधा नक्षत्र, ज्येष्ठा नक्षत्र, मूल नक्षत्र, पूवार्षाढ़ा नक्षत्र, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, श्रवण नक्षत्र, घनिष्ठा नक्षत्र, शतभिषा नक्षत्र, पूवार्भाद्रपद नक्षत्र, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, रेवती नक्षत्र कहा जाता है। सावन वर्ष में 360 दिन होते हैं। इसका एक महीना 30 दिन का होता है।
भारतीय संस्कृति में विक्रम संवत का बहुत महत्व है। चैत्र का महीना भारतीय कैलेंडर के हिसाब से वर्ष का प्रथम महीना है। नवीन संवत्सर के संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। वैदिक पुराण एवं शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को आदिशक्ति प्रकट हुई थीं। आदिशक्ति के आदेश पर ब्रह्मा ने सृष्टि प्रारंभ की थी। इसीलिए इस दिन को अनादिकाल से नववर्ष के रूप में जाना जाता है।
मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन सतयुग का प्रारंभ हुआ था। मान्यता है कि इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने अपना राज्य स्थापित किया था। श्रीराम का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। नवरात्र भी इसी दिन से प्रारंभ होते हैं। इसी तिथि को राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी।
विजय को चिर स्थायी बनाने के लिए उन्होंने विक्रम सम्वत् का शुभारंभ किया था। इसी दिन से महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करके पंचांग की रचना की थी। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व भी है।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की थी। इस दिन महर्षि गौतम जयंती मनाई जाती है। इस दिन संघ संस्थापक डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिवस भी मनाया जाता है।
सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ट काल गणना का श्रीगणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था। तदनुसार हमारे सौरमंडल की आयु लगभग चार अरब 32 करोड़ वर्ष है। आधुनिक विज्ञान भी कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे लगभग चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है। इतना ही नहीं, श्रीमद्भागवद पुराण, श्री मारकंडेय पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार अभिशेत वाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते हैं। जिस दिन सृष्टि का प्रारंभ हुआ, वह आज ही का पवित्र दिन था। इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मंदिर में चैत्र पर्व मनाने की परंपरा बन गयी।
भारतीय महीनों का नामकरण भी बड़ा रोचक है अर्थात जिस महीने की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में पड़ती है, उसी के नाम पर उस महीने का नामकरण किया गया है, उदाहरण के लिए इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं, इसलिए इसे चैत्र महीने का नाम दिया गया। क्रांति वृत पर 12 महीने की सीमा तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किए गए और उनके नाम भी तारा मंडलों की आकृतियों के आधार पर रखे गये। इस प्रकार बारह राशियां बनीं।
चूंकि सूर्य क्रांति मंडल के ठीक केंद्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगते हैं। इसलिए प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक हो जाता है। भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि शताब्दियों तक एक क्षण का भी अंतर नहीं पड़ता, जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते हैं।
इस प्रकार प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीने को लीप ईयर घोषित कर देते हैं। तब भी नौ मिनट 11 सेकेंड का समय बच जाता है, तो प्रत्येक चार सौ वर्षों में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है, तब भी पूर्णांकन नहीं हो पाता। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही पेरिस के अंतरराष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकेंड स्लो कर दिया गया। फिर भी 22 सेकेंड का समय अधिक चल रहा है। यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है, जहां के सीजीएस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किए जाते हैं।
रोमन कैलेंडर में तो पहले 10 ही महीने होते थे। किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था, जिसे जूलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया। उसके एक सौ वर्ष पश्चात किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट अर्थात अगस्त भी बढ़ाया गया। चूंकि ये दोनों राजा थे, इसलिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गए।
आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिनों की संख्या समान है, जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है। यही नहीं, जिसे हम अंग्रेजी कैलेंडर का नौवां महीना सितंबर कहते हैं, दसवां महीना अक्टूबर कहते हैं, ग्यारहवां महीना नवम्बर और बारहवां महीना दिसम्बर है।
इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते हैं। भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितंबर का अर्थ सप्तांबर था, आकाश का सातवां भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवंबर तो नवम अंबर और दिसंबर दशांबर है।
वर्ष 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नववर्ष घोषित किया गया। जेनदअवेस्ता के अनुसार धरती की आयु लगभग 12 हजार वर्ष है। चीनी कैलेंडर लगभग एक करोड़ वर्ष पुराना मानता है। चालडियन कैलेंडर धरती को लगभग दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है। फीनीसयन इसे लगभग 30 हजार वर्ष की बताते हैं।
सीसरो के अनुसार यह लगभग चार लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है। सूर्य सिद्धांत और सिद्धांत शिरोमाणि आदि ग्रंथों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है। संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर शब्द बना है। इस प्रकार यह सिद्ध हो रहा है कि वर्ष प्रतिपदा ही नववर्ष का प्रथम दिन है।
एक जनवरी को नववर्ष मनाने वाले दोहरी भूल के शिकार होते हैं, क्योंकि भारत में जब 31 दिसम्बर की रात को 12 बजता है, तो ब्रिटेन में सायंकाल होता है, जो कि नववर्ष की पहली सुबह हो ही नहीं सकती। और जब उनका एक जनवरी का सूर्योदय होता है, तो यहां के हैप्पी न्यू ईयर मनाने वाले रात्रि भर जागने कारण सो रहे होते हैं।
ऐसी स्थिति में उनके लिए सवेरे नहा धोकर भगवान सूर्य की पूजा करना तो अत्यंत दुष्कर कार्य है। परंतु भारतीय नववर्ष में वातावरण अत्यंत मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गंधर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी, देव, मानव से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते हैं।
नववर्ष पर दिवस सुनहले, रात रूपहली, उषा सांझ की लाली छन-छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली कितनी मनोहारी लगती है। शीतल मंद सुगंध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते हैं। ऐसे ही शुभ वातावरण में अखिल लोकनायक श्रीराम का अवतार होता है। उल्लेखनीय है कि ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है।
मान्यता है कि नव संवत्सर के दिन नीम की कोमल पत्तियों और पुष्पों का मिश्रण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, मिश्री, जीरा और अजवाइन मिलाकर उसका सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है। इस दिन आंवले का सेवन भी बहुत लाभदायक बताया गया है।
माना जाता है कि आंवला नवमी को जगत पिता ने सृष्टि पर पहला सृजन पौधे के रूप में किया था। यह पौधा आंवले का था। इस तिथि को पवित्र माना जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। निसंदेह, जब भारतीय नववर्ष का प्रारंभ होता है, तो चहुंओर प्रकृति चहक उठती है। भारत की बात ही निराली है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत के सबसे विशाल, समाजसेवी व राष्ट्रभक्त संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ के संस्थापक डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म युगाब्द 4991 की चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नागपुर के एक गरीब वेदपाठी परिवार में हुआ था। डॉ हेडगेवार के पिता का नाम श्री बलिराम पंत व माता का नाम रेवतीबाई था।
हेडगेवार जी का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता किन्तु गरीबी के उस वातावरण में भी व्यायाम, कुश्ती, लाठी चलाना आदि में उनकी रुचि रही। बचपन में विभिन्न भवनों पर फहरा रहे यूनियन जैक को देखकर वे सोचते थे कि हमारे भारत वर्ष का हिंदुओं का झंडा तो भगवा ही है क्योंकि भगवान राम और कृष्ण, शिवाजी, महाराणा प्रताप सभी की जीवन लीलाएं इसी झंडे की छत्रछाया में संपन्न हुई हैं और यहीं से उनके हृदय में यूनियन जैक को उतार फेंकने की योजना तैयार होने लगी।
डॉ हेडगेवार की प्रारम्भिक शिक्षा अंग्रेजी विद्यालय नीलसिटी में हुई, जहां उन्होंने महारानी विक्टोरिया के 60वें जन्मदिन पर बांटी गयी मिठाई को कूड़ेदान में फेंक दिया था। सन 1901 में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के समय लोगों द्वारा खुशी मनाये जाने पर वो बहुत दुखी हुए।
1902 में प्लेग की महामारी के कारण उनके माता-पिता का देहावसान हो गया। हेडगेवार जी के बड़े भाई क्रोधी स्वभाव के थे। इसके कारण उन्होंने घर छोड़ दिया और अपने मित्रों के साथ रहने लगे। उन्होंने लोकमान्य तिलक के पत्र के लिए धन एकत्र करने का काम प्रारंभ किया और स्वदेशी वस्तुओं की दुकान खोलने में भी सहायता की।
19 सितंबर 1905 को अंग्रेज सरकार ने बंगाल को विभाजित कर दिया जिसका पूरे देश में व्यापक विरोध हुआ। पूरा भारत वंदेमातरम के नारे से गूंज उठा था। डॉ हेडगेवार ने नागपुर के किले से अंग्रेजों के झंडे उतारकर भगवा झंडा लगाने का प्रयास किया। विद्यालय में निरीक्षक के आने पर छात्रों ने वंदेमातरम् के नारे लगाए।
कुछ ही दिनों में डॉ हेडगेवार नागपुर में तिलक के नाम से प्रसिद्ध हो गये। उन्होंने ने 1906 में दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। वह अपनी पढ़ाई के लिए ट्यूशन और एक विद्यालय में नौकरी करने लगे । सन 1908 में अंग्रेज सरकार ने उनके पीछे गुप्तचर लगा दिये।
बड़े क्रांतिकरियों के साथ सम्पर्क में आने के लिए वह 1910 में कलकत्ता पहुंच गये। विद्यालय के पश्चात वह अन्य विद्यार्थियों से सम्पर्क करते थे। सन 1910 मे कलकत्ता में हुए दंगे के दौरान उन्होंने एक सुश्रूवा दल बनाया। यहां अनुशीलन समिति व प्रमुख क्रांतिकारियों से उनका संपर्क हुआ। जहां वो रहते थे, वहां एक गुप्तचर उनके पीछे लग गया। शंका होने पर उसकी तलाशी ली गयी।
उसके गुप्तचर होने कई प्रमाण मिले। इसके बाद उन्होंने अपनी वेशभूषा बदल दी। 1913 में उन्होंने दामोदर नदी की बाढ़ के समय पीड़ितों की खूब सेवा की। दो सितंबर को एल एल एंड संस की पदवी प्राप्त की और डॉक्टर की उपाधि लेकर वापस नागपुर लौटे। 1915 से 1920 तक वो राष्ट्रीय आंदोलनों में अत्यंत सक्रिय रहे।
प्रवास, सभा, बैठक आदि में सदा सक्रिय रहते थे। तरुणों में पूर्ण स्वतंत्रता की आकांक्षा को धधकाने में वे सदा तत्पर रहते थे। नागपुर में दोबारा प्लेग फैला। इस दौरान उनके भाई का निधन हो गया। इसके बाद डॉ हेडगेवार ने जीवन भर अविवाहित रहकर राष्ट्र कार्य करने का निश्चय किया। डॉ केशव गणोशोत्सव में उत्साह से भाग लेते थे और उत्साह भरने वाले भाषण देते थे।
उन्होंने होमरूल आंदोलन में भी भाग लिया। वो क्रांति के लिए व्यक्ति, धन तथा शस्त्रास्त्र की व्यवस्था करते थे। उन्होंने राष्ट्रीय उत्सव मंडल की स्थापना की और उनके घर पर शरद पूर्णिमा मनायी गयी। सन 1919 में उन्होंने लाहौर कांग्रेस में भाग लिया।
31 जुलाई को असहयोग आंदोलन आरंभ हो गया। कुछ समय बाद डॉ हेडगेवार, योगीराज अरविंद से मिलने पांडुचेरी गए। 1920 में नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में वह सेवा दल के प्रमुख बने।
डॉ हेडगेवार ने खिलाफत आंदोलन का विरोध किया और कहा कि यह देश के लिए घातक सिद्ध होगा। सरकार ने एक माह के लिए उनके भाषणों पर प्रतिबंध लगा दिया और फिर उन्हें एक वर्ष कारावास की सजा हुई। एक वर्ष बाद जब वे कारागार से छूटे तब स्थान- स्थान पर जनता ने उनका जोरदार स्वागत किया।
इस बीच हुए मोपला कांड में डेढ़ हजार हिंदू मारे गए और बीस हजार हिंदू मुसलमान बनाए गए। तीन करोड़ की संपत्ति नष्ट हुई। अंग्रेज सरकार ने 1923 में गणपति जुलूस को मस्जिद के सामने से निकलने पर रोक लगा दी। मुसलमानों ने दिंडी निकलने का विरोध किया।
तब डॉक्टर साहब ने हिंदू समाज में जागृति उत्पन्न कर राजे लक्ष्मणराव भोसले के सहयोग से दिण्डी सत्याग्रह का आयोजन करवाया। वह सत्याग्रह बहुत सफल हुआ। सन 1922 से 1925 तक डॉ. हेडगेवार हिंदू महासभा के कार्यों में जुटे रहे। इस अवधि को उनके जीवन में गहन विचार मंथन का काल कहा जा सकता है।
इसी बीच वीर सावरकर ने 1922 में जेल से हिन्दुत्व नामक खोजपूर्ण पुस्तक लिखकर बाहर भेजी। 1924 में एकता परिषदें बनीं और कई नेताओं ने अपने विचार व्यक्त किये। मौके पर क्रांतिकारी लाला हरदयाल ने कहा कि हिंदू राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए शुद्धि संगठन और अफगानिस्तान का भारत में विलीनीकरण आवश्यक है।
उस समय सार्वजनिक कार्य करने के जो तरीके प्रचलित थे उनसे अलग हटकर डॉ हेडगेवार ने अपनी प्रतिभा से शाखा की एक नयी पद्धति खोज निकाली। इस अनुशासित पद्धति में स्थायी संस्कार देने की अद्भुत क्षमता थी। 1925 की विजयदशमी को डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना की घोषणा की और बाद में 17 अप्रैल, 1926 को एक बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम तय हुआ।
संघ के नामकरण की बैठक में उन्होंने समझाया कि हिन्दुस्थान में हिदुओं का संगठन राष्ट्रीय ही कहलायेगा। उसे सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता। हिंदुओं का कोई भी कार्य राष्ट्रीय ही माना जाना चाहिए। संघ की स्थापना के बाद डॉक्टर साहब ने भगवा ध्वज को ही गुरु रूप में रखा। उन्होंने प्रतिवर्ष गुरुपूर्णिमा को इसका पूजन कर दक्षिणा समर्पण करने का विचार रखा।
डॉ हेडगेवार ने स्वयंसेवकों से कहा कि वह संघ का गणवेश धारण करें। संघ की कार्यपद्धति का धीरे-धीरे विकास हुआ और उसमें समय-समय पर अनेक बातें जुड़ती चली गयीं। विजयादशमी, मकर सक्रांति, वर्ष प्रतिपदा, गुरु पूर्णिमा व रक्षाबंधन के परंपरागत उत्सव संघ शाखाओं में मनाये जाने के लिए चुने गये।
इन पांच परंपरागत उत्सवों के साथ डॉक्टर साहब ने हिंदू साम्राज्य दिवस का छठा उत्सव भी प्रचलित कर स्वयंसेवकों व समाज के समक्ष यह बात रखी कि संघ क्या करना चाहता है। सन 1936 में नासिक के शंकराचार्य ने उन्हें राष्ट्र सेनापति की पदवी से विभूषित किया। डॉक्टर साहब ने संघ के विकास व विस्तार के लिए भारत के विभिन्न क्षेत्रों व राज्यों का भ्रमण किया।
अनेक बैठकें व कार्यक्रम आयोजित किये। 1935 और 1936 में उन्होंने अथक श्रम किया। कुछ दिनों बाद वे नासिक पहुंचे। वहां उन्हें डबल न्यूमोनिया हो गया। छह फरवरी, 1940 को उन्हें राजगिरि ले जाया गया। वो कुछ समय बाद पूना और फिर नागपुर पहुंचे। नागपुर में उनका स्वास्थ्य फिर खराब हो गया। अस्वस्थता बढ़ती गयी और 21 जून 1940 को उनका निधन हो गया।
डॉक्टर साहब सदैव दलगत राजनीति से दूर रहे। उनका स्पष्ट विचार था कि परतंत्र राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति के अतिरिक्त और कोई राजनीति नहीं हो सकती। जिस महापुरुष ने अपने कृतित्व के बल पर संघ कार्य को सफल कर दिखाया, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव मन में धारण कर उस महान और पुण्य कार्य को आगे बढ़ाना प्रत्येक हिंदू का स्वाभाविक कर्तव्य है।
संघ ने भारत को परम वैभवशाली बनाने का लक्ष्य अपनी आंखों के सामने रखा है। उसे साकार करने में सहयोग देना हिंदू और राष्ट्र के लिए परम कल्याणकारी होगा। डॉ हेडगेवार दैनिक जीवन में समाजरूपी देवता की उपासना का मार्ग प्रशस्त कर गये हैं।
डॉक्टर साहब का संपूर्ण जीवन अत्यंत उद्यमशील, कर्तृत्वशील और राष्ट्र को समर्पित रहा। उन्होंने संघ कार्य में तत्व निष्ठा को महत्व दिया। डॉक्टर हेडगेवार ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी हैं जिनके स्मृति मंदिर में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और एपीजे अब्दुल कलाम श्रद्धा सुमन अर्पित कर चुके हैं। उन्होंने सभी समकालीन विचारधाराओं का मंथन करने के उपरांत ही हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए संघ की स्थापना की थी।
डॉ हेडगेवार के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। डॉक्टर साहब की 1928 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस से भेंट हुई थी। नेताजी को डॉक्टर साहब की हिंदू संगठन की कल्पना पसंद आयी थी। डॉक्टर साहब का मत था कि हिंदुओं के श्रेष्ठ तत्वज्ञान और जीवन दर्शन के आधार पर ही विश्व की सभी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।
आज की कांग्रेस व उसका नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर जो आरोप लगा रहा है उन्हें डॉक्टर साहब की जीवनी और उनके विचार अवश्य पढ़ने चाहिए। पिछले दिनों कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लंदन में संघ को मुस्लिम ब्रदरहुड कहकर संबोधित कर अपनी अज्ञानता का परिचय दिया है। उनकी सोच में संघ के प्रति ईर्ष्या व नफरत स्पष्ट परिलक्षित होती है।
कांग्रेस को संभवत: यह नहीं पता कि अगर आज भारत स्वतंत्र है तो उसके पीछे डॉक्टर हेडगेवार जैसे कुशल संगठनकर्ता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ डॉक्टर हेडगेवार जी के विचारों के अनुरूप ही लगातार आगे बढ़कर समाज की सेवा कर रहा है। संघ के सेवाकार्यों में डॉ. हेडगेवार के प्रेरक विचार, कार्य व प्रसंग हैं। संघ के सेवा कार्यों से समाज में बड़ा बदलाव भी दिख रहा है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
रमेश सर्राफ धमोरा
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हम हर साल 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस मनाते हैं। इसका उद्देश्य कठपुतली को वैश्विक कला के रूप में मान्यता देना है। यह दुनिया भर के कठपुतली कलाकारों का सम्मान करने का एक प्रयास भी है। एक समय कठपुतली को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम समझा जाता था। आज कठपुतली कला मनोरंजन के साथ लोगों को जागरूक भी कर रही है। प्राचीनकाल से ही जादू टोनों एवं कुदरती प्रकोपों से बचने के लिए मानव जीवन में पुतलों का प्रयोग होता रहा है। भारत में ही नहीं बल्कि अन्यत्र भी काष्ठ, मिट्टी व पाषाण से निर्मित ये पुतले जातीय एवं पारिवारिक देवताओं के रूप में प्रतिष्ठित होते रहे हैं।
कठपुतलियों का इतिहास बहुत पुराना है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी के नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है। कुछ लोग कठपुतली के जन्म को लेकर पौराणिक आख्यान का जिक्र करते हैं कि शिवजी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाकर इस कला की शुरुआत की थी। सतवर्द्धन काल में भारत से पूर्वी एशिया के देशो इंडोनेशिया, थाइलैंड, म्यांमार, जावा, श्रीलंका आदि में इसका विस्तार हुआ। आज यह कला चीन, रूस, रूमानिया, इंग्लैंड, चेकोस्लोवाकिया, अमेरिका व जापान आदि अनेक देशों में पहुंच चुकी है। इन देशों में इस विधा का सम-सामयिक प्रयोग कर इसे बहुआयामी रूप प्रदान किया गया है। वहां कठपुतली को मनोरंजन के अलावा शिक्षा, विज्ञापन आदि अनेक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा रहा है।
भारतीय कठपुतलियों का पौराणिक ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है। महाभारत में अर्जुन द्वारा ब्रहन्नला को कठपुतलियों का खेल सिखाने का उल्लेख है। महाभारत में रूपजीवन शब्द का भी काफी प्रयोग हुआ है और वह भी पुतलियों के खेल-तमाशों के संदर्भ में। पंचतंत्र नामक ग्रन्थ में ऐसी कठपुतलियों का जिक्र है जो लकड़ी की खूटियों के सहारे नाना प्रकार के मानवी करतब दिखलाती थीं। विक्रमादित्य के समय सिंहासन बत्तीसी नामक एक ऐसा सिंहासन था जो दिन में सम्राट के बैठने के काम आता था और रात को उसकी बत्तीस कठपुतलियां विभिन्न प्रकार से रागरंग कार्यक्रम कर सम्राट को रिझाती थी।
राजस्थान की स्ट्रिंग कठपुतलियां दुनिया भर में मशहूर हैं। इसके अलावा ओडिशा, कर्नाटक और तमिलनाडु में भी कठपुतलियों की यही कला प्रचलित है। राजस्थानी कठपुतलियों का ओवल चेहरा, बड़ी आंखें, धनुषाकार भौंहें और बड़े होठ इन्हें अलग पहचान देते हैं। 5-8 स्ट्रिंग्स से बंधी ये कठपुतलियां राजस्थानी संगीत के साथ नाटक पेश करती हैं। राजस्थान में कठपुतलियों का प्रचलन काफी समय से हो रहा है। यहां कठपुतलियां नटों तथा भाटों द्वारा प्रयुक्त होती हैं। ये नट नाटक भी करते थे, नाचते भी थे एवं विभिन्न प्रकार के शारीरिक करतब भी दिखलाते थे। यह रस्सियों पर भी चलते थे ओर कठपुतलियां भी नचाते थे। नट जाति में प्रचलित एक किवदंती के आधार पर ब्रह्मा के वरदान से एक आदि नट की उत्पत्ति हुई थी। इन नटों के पूर्वज ही विक्रमादित्य के समय में सिंहासन बत्तीसी नामक कठपुतली नाटक के सर्जक थे। भारत की पुरातन संस्कृति का केन्द्रस्थल उत्तर भारत का राजस्थान एवं सिंध क्षेत्र रह चुका है।
राजस्थान के नट जो पहले राजा-महाराजाओं के दरबारों की शोभा बढ़ाते थे। धीरे-धीरे सामाजिक एवं आर्थिक कारण से पिछड़ते चले गये और छोटी-छोटी जातियों के याचक बन गये। जिन राजाओं तथा विशिष्टजनों ने उन्हें प्रोत्साहन एवं संरक्षण प्रदान किया उन्हीं की जीवन-गाथायें इनकी पुतलियों का विषय बन गयी। जैसे विक्रमादित्य के काल की सिंहासन बत्तीसी, पृथ्वीराज चौहान के समय की पृथ्वीराज संयोगिता व अमर सिंह राठौड़ का खेल प्रमुख थी। परंपरा एवं जातीय बन्धनों में बंधे ये भाट आज भी अपनी पुतलियों में संशोधन आदि का सुझाव नहीं मानते हैं। राजस्थान में आज इस जाति के लगभग सोलह हजार भाट मौजूद हैं। इनमें से लगभग आठ हजार किसी न किसी ढंग से कठपुतलियां नचाने का काम करते हैं। कुछ खेती बाड़ी के धन्धे में भी लगे हुये हैं तो कुछ ने नाच गाने को अपना पेशा बना लिया है। कुछ अपने यजमानों के घर व शादी विवाह के अवसर पर ढोल बजाकर याचक का काम करते हैं।
राजस्थान में कठपुलियों का खेल दिखाने का मंच बहुत ही सादा होता है। गांव में कठपुतली का खेल दिखाने हेतु दो खाट खड़ी कर उसको ऊपर-नीचे से बांसों से जकड़कर मंच की शक्ल दे दी जाती है। आगे की तरफ बारादरीनुमा ताजमहल नामक पर्दा लगा दिया जाता है। पृष्ठ भूमि में एक रंगीन काली चादर लगा दी जाती है जिसके पीछे से ये कठपुतलियों का संचालन करते हैं। इनकी कठपुतलियों का आकार लगभग डेढ़ फुट का होता है। इन कठपुतलियों की वेशभूषा पारम्परिक राजस्थानी होती है।
30 वर्षों से निरंतर प्रचलन में होने से राजस्थानी कठपुतलियों का मूल नाटक बिल्कुल ही विकृत हो गया है। अब तो दर्शक संचालन शैली तथा नाट्य-विधि के कारण ही कठपुतली का खेल देखते हैं। आज भी राजस्थानी कठपुतलियों में दर्शकों को बांधने की ताकत देखने का मिलती है जो कदाचित अन्य किसी में नहीं है। कठपुतली संचालक द्वारा अपने मुंह से ही सीटीनुमा आवाज निकालकर भाव व्यक्त किया जाता है। आमतौर पर आजकल कठपुतली निर्माण कार्य कठपुतली संचालक स्वयं ही करता है क्योंकि पारम्परिक कठपुतली निर्माता बढ़ई बहुत कम संख्या में रह गये हैं। इन कठपुतलियों को भाट बड़े आदर-भाव से देखते हैं। आज भी इनकी पारंपरिक कठपुतलियों के लंहगों की अनेक परतें इनकी पुरातन प्रियता की द्योतक है। कठपुतलियों के मुंह निर्मित होते हैं तथा अन्य सब अंग रूई व कपड़ों से बनाये जाते हैं। प्रयोग में नहीं आने वाली कठपुतलियों को ये लोग फेंकते नहीं बल्कि आदर पूर्वक जल में प्रवाहित करते हैं।
राजस्थानी कठपुतलियों में चेहरे का आकार शरीर से बड़ा, आंखें काफी बड़ी, वक्षस्थल अत्यंत लघु एवं उभरा हुआ तथा पांवों का न होना इनकी अपनी विशेषता है। इससे कठपुतलियों का संचालन अत्यन्त सजीव बन जाता है। कठपुतलियों के खेल दिखाने वाले दल में दो या तीन व्यक्ति होते हैं। औरतें ढालक बजाती हैं व मर्द कठपुतलियां चलाते हैं। इनके दोनों हाथ मशीन की तरह चलते हैं। सीटी द्वारा उत्पन्न विविध ध्वनियां, वाचन के साथ पैर से पैदा की गयी आवाजें तथा ढोलक की विचित्र थापें समस्त नाटक को प्राणवान बना देती हैं। राजस्थानी कठपुतलियां पिछले सैकड़ों वर्षों से समाज की अवहेलना व उदासीनता की शिकार रही हैं। इन्हें सरकार से किसी प्रकार का कोई संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ है। इन कठपुतली परिचालक भाटों को उनका पिछड़ापन, अंधविश्वास तथा इनकी परम्परागतता ने भी इन्हें काफी हानि पहुंचाई है। सरकार को इन सर्वाधिक पुरातन कठपुतली कला को आधुनिक बनाने के लिए नये कथानक, नये विचार तथा नवजीवन प्रदान करने में सहयोग करना चाहिये ताकि हमारे लोक जीवन का अंग बन चुकी कठपुतली कला सदैव हमारे साथ रहकर मनोरंजन करती रहे।
जीविकोपार्जन के लिए कठपुतली कलाकारों को गांव-कस्बों से पलायन करना पड़ रहा है। कलाकारों ने नाच-गाना और ढोल बजाने का काम शुरू कर लिया है। रोजगार की तलाश ने ही कठपुतली कलाकारों की नई पीढ़ी को इससे विमुख किया है। जन उपेक्षा व उचित संरक्षण के अभाव में नई पीढ़ी इस लोक कला से उतनी नहीं जुड़ पा रही है जितनी जरूरत है। उनके परिवार के सदस्य आज भी अन्य किसी व्यवसाय की बजाय कठपुतली बनाना पसंद करते हैं। वह कहते हैं कि कठपुतली से उनके पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं। उन्हें इस बात का मलाल है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति व कला को बचाने और प्रोत्साहन देने के तमाम दावों के बावजूद कठपुतली कला को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। हमारे देश में कठपुतली कला के स्वरूप में खासे बदलाव देखे जा सकते हैं। आज इनमें महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन जैसे विषयों पर आधारित कार्यक्रम, हास्य-व्यंग्य और शैक्षणिक कार्यक्रम भी दिखाये जाते हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के एक निर्णय से छद्म धर्मनिरपेक्ष दल बेचैन और व्यग्र हैं। चिंता में हैं कि अब उनकी तुष्टिकरण की राजनीति का क्या होगा? प्रदेश की राजनीति में अभी तक कहा जाता रहा है कि दिवंगत सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव चरखा दांव चलते थे।
इस बार असली चरखा दांव योगी आदित्यनाथ ने चला है। इसने मुस्लिम तुष्टिकरण और जातिवादी नेताओं को चित कर दिया है। जो लोग रामचरित मानस जैसे दिव्य व पवित्र ग्रंथ की कुछ चौपाइयों का गलत अर्थ निकालकर हिंदू समाज में जातिभेद व विवाद उत्पन्न कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का प्रयास कर रहे थे वो अब सकते में हैं।
यह लोग सोच रहे थे कि प्रदेश में भगवा लहर को सनातन धर्म और सनातन संस्कृति के आस्था के केंद्र और धर्मग्रंथों का दुष्प्रचार करके और सामाजिक समरसता का वातावरण दूषित करके रोका जा सकता है।
प्रदेश सरकार ने 22 मार्च से 30 मार्च तक दुर्गा मंदिरों और शक्तिपीठों में दुर्गा सप्तशती के पाठ, देवी जागरण व गायन के कार्यक्रम कराने का आदेश तो जारी किया ही है साथ ही अष्टमी और श्रीरामनवमी के दिन अखंड रामायण का पाठ कराने का आदेश भी जारी किया है।
नवरात्रि के पावन अवसर पर इन कार्यक्रमों में महिलाओं एवं बालिकाओं सहित जनसहभगिता को बढ़ाने पर बल दिया गया है। इन सभी कार्यक्रमों के अवसर पर मंदिर परिसरों में विकास कार्यों एवं बुनियादी सुविधाओं की होर्डिंग भी लगेंगी।
इन आयोजनों को भव्यता प्रदान करने के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति चयनित देवी मंदिरों, शक्तिपीठों में कलाकारों के माध्यम से कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। प्रदेश में पहली बार प्रशासन स्तर पर देवी मंदिरों एवं शक्तिपीठों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित होने जा रहे हैं।
वर्तमान परिदृश्य में सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिकोण से यह आयोजन बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, क्यांकि अभी तक प्रदेश में जितनी भी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकारें रहीं उनके कार्यकाल में केवल और केवल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का विकृत दौर ही देखा गया है।
सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि सरकार के इस निर्णय का आज वही दल विरोध कर रहे हैं जिनके कार्यकाल में राजभवन व मुख्यमंत्री आवास रोजा इफ्तार का केंद्र बन जाते थे। आज सपा सरकार के इस फैसले का विरोध कर रही है। याद करिये सपा के कार्यकाल में कब्रिस्तानों के निर्माण के लिए 1200 करोड़ रुपये जारी हुए थे।
मंदिरों में रामायण पाठ का विरोध वो लोग कर रहे है जिन्होंने या तो भगवान राम को काल्पनिक बता रखा है या रामचरित मानस का अपमान किया है। यह वही लोग हैं जिनके मुखिया दिवंगत मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में निहत्थे राम भक्तों का नरसंहार करवाया था।
सरकार के निर्णय का आदेश आने के बाद समाजवादी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर जहरीला बयान दिया। मौर्य ने कहा है कि आम जनमानस ने स्वत: रामचरित मानस का पाठ करना बंद कर दिया है तब सकरार अपने धन से मंदिरों में रामायण पाठ कराने जा रही है।
स्वामी प्रसाद का यह बयान बहुत ही विकृत व झूठा है। स्वामी प्रसाद ने कहा है- इस प्रकार का आयोजन महिलाओं, दलितों, पिछड़ों का अपमान है। यह बहुत ही मूर्खतापूर्ण व राजनीतिक ईर्ष्या वश दिया गया बयान है। तथ्य यह है कि आज प्रदेश की राजनीति में स्वामी प्रसाद जैसे तथाकथित जातिवादी राजनीतिक नेताओं को कोई कोई भाव नहीं दिया जा रहा है।
स्वामी प्रसाद जैसे नेताओं को यह पता ही नहीं है कि जब से उन्होंने रामचरित मानस का झूठा विमर्श गढ़ा है तब से हिंदू समाज ही नहीं अन्य विद्वान व नागरिक वर्ग भी रामचिरत मानस को एक बार फिर पढ़ रहा है। गीता प्रेस जो रामचरित मानस के प्रकाशन और विपणन का प्रमुख संस्थान है, के अनुसार स्वामी प्रसाद के मानस विरोधी कृत्य के पश्चात मानस की बिक्री में वृद्धि हुई है।
विगत दिनों दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले में भी लोगों ने रामचरित मानस में रुचि दिखाई और पहले ही दिन 200 से अधिक प्रतियां बिक गयीं।
समाजवादी पार्टी के सभी मुस्लिम सांसद, मुस्लिम लीग, कांग्रेस, बहुजन समाजवादी पार्टी और एआइएएम सरकार के निर्णय का कड़ा विरोध कर रहे हैं। यह लोग सरकार से सवाल कर रहे हैं कि आप रमजान में मुस्लिम समाज के लिए क्या कर रहे हैं?
इन तथाकथित दलों की नजर में यह संविधान विरोधी कदम है। सपा मुखिया बयान दे रहे हैं कि यह रकम तो बहुत कम है अपितु इस काम के लिए सरकार को कम से कम दस करोड़ देने चाहिए थे।
भाजपा सरकार की ओर से मंत्री जयवीर सिंह का बयान आया है कि सरकार भारतीय संस्कृति व परम्पराओं को आगे बढ़ाने के लिए इस प्रकार के कदम उठाती रहेगी। अगर आवश्यकता पड़ी तो ऐसे आयोजनों के लिए सरकार और अधिक धन जारी करेगी।
प्रदेश सरकार ने इस प्रकार का आयोजन करके हिंदू समाज को एक बहुत बड़ा उपहार दिया है और वह भी उस समय जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण तीव्र गति से चल रहा है।
योगी के इस दांव से यह सिद्ध हुआ है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष विरोधी दल असल में हिंदू विरोधी हैं। यह सभी दल अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पचा नहीं पा रहे हैं। यह आगामी एक जनवरी से पहले प्रदेश में फिर वर्ग का रंग घोलना चाहते हैं क्यों कि इसी दिन राम मंदिर का भव्य उद्घाटन होना है। इनकी कोशिश है कि इसमें खलल पड़े।
योगेश कुमार गोयल
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट, नाप-तोल में गड़बड़ी, मनमाने दाम वसूलना, बगैर मानक वस्तुओं की बिक्री, ठगी, सामान की बिक्री के बाद गारंटी अथवा वारंटी के बावजूद सेवा प्रदान नहीं करना इत्यादि समस्याओं से ग्राहकों का सामना अक्सर होता रहता है। ऐसी ही समस्याओं से निजात दिलाने और अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है।
वास्तव में यह उपभोक्ताओं को उनकी शक्तियों और अधिकारों के बारे में जागरूक करने का एक महत्वपूर्व अवसर है। उपभोक्ता आन्दोलन की नींव सबसे पहले 15 मार्च, 1962 को अमेरिका में रखी गई। 15 मार्च, 1983 से यह दिवस हर साल मनाया जाता है।
भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरूआत मुंबई में वर्ष 1966 में हुई। तत्पश्चात पुणे में 1974 में ग्राहक पंचायत की स्थापना के बाद कई राज्यों में उपभोक्ता कल्याण के लिए संस्थाओं का गठन किया गया। इस प्रकार उपभोक्ता हितों के संरक्षण की दिशा में यह आन्दोलन आगे बढ़ता गया। उपभोक्ताओं को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए कई कानून भी बनाए गए।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद से उपभोक्ताओं को शीघ्र, त्वरित एवं कम खर्च पर न्याय दिलाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस दिवस को मनाए जाने का मूल उद्देश्य यही है कि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए और अगर वे धोखाधड़ी, कालाबाजारी, घटतौली इत्यादि के शिकार होते हैं तो वे इसकी शिकायत उपभोक्ता अदालत में कर सकें।
ग्राहकों के साथ आए दिन होने वाली धोखाधड़ी को रोकने और उपभोक्ता अधिकारों को ज्यादा मजबूती प्रदान करने के लिए देश में 20 जुलाई 2020 को ह्यउपभोक्ता संरक्षण कानून-2019ह्ण (कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट-2019) लागू किया गया। यह कानून अब साढ़े तीन दशक पुराने ह्यउपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986ह्ण का स्थान ले चुका है।
भारत में उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक वह व्यक्ति उपभोक्ता है, जिसने किसी वस्तु या सेवा के क्रय के बदले धन का भुगतान किया है या भुगतान करने का आश्वासन दिया है और ऐसे में किसी भी प्रकार के शोषण अथवा उत्पीड़न के खिलाफ वह अपनी आवाज उठा सकता है तथा क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है।
खरीदी गई किसी वस्तु, उत्पाद अथवा सेवा में कमी या उसके कारण होने वाली किसी भी प्रकार की हानि के बदले उपभोक्ताओं को मिला कानूनी संरक्षण ही उपभोक्ता अधिकार है। यदि खरीदी गई किसी वस्तु या सेवा में कोई कमी है या उससे आपको कोई नुकसान हुआ है तो आप उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
उपभोक्ताओं का शोषण होने और ऐसे मामलों में उनके द्वारा उपभोक्ता अदालत की शरण लिए जाने के बाद मिले न्याय के कुछ मामलों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि उपभोक्ता अदालतें उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए कितना बड़ा काम कर रही हैं। एक उपभोक्ता ने एक दुकान से बिजली का एक पंखा खरीदा लेकिन एक वर्ष की गारंटी होने के बावजूद थोड़े ही समय बाद पंखा खराब होने पर भी जब दुकानदार उसे ठीक कराने या बदलने में आनाकानी करने लगा तो उपभोक्ता ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया।
अदालत ने अपने आदेश में नया पंखा देने के साथ उपभोक्ता को हजार्ना देने का भी फरमान सुनाया। एक अन्य मामले में एक आवेदक ने सरकारी नौकरी के लिए अपना आवेदन अंतिम तिथि से पांच दिन पूर्व ही स्पीड पोस्ट द्वारा संबंधित विभाग को भेज दिया लेकिन आवेदन निर्धारित तिथि तक नहीं पहुंचने के कारण उसे परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया गया।
आवेदक ने डाक विभाग की लापरवाही को लेकर उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया और उसे न्याय मिला। चूंकि स्पीड पोस्ट को डाक अधिनियम में एक आवश्यक सेवा माना गया है, इसलिए उपभोक्ता अदालत ने डाक विभाग को सेवा शर्तों में कमी का दोषी पाते हुए डाक विभाग को मुआवजे के तौर पर आवेदक को एक हजार रुपये की राशि देने का आदेश दिया।
ऐसी ही छोटी-बड़ी समस्याओं का सामना जीवन में कभी न कभी हम सभी को करना ही पड़ता है लेकिन अधिकांश लोग अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ते। इसका एक प्रमुख कारण यही है कि देश की बहुत बड़ी आबादी अशिक्षित है, जो अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अनभिज्ञ है लेकिन जब शिक्षित लोग भी अपने उपभोक्ता अधिकारों के प्रति उदासीन नजर आते हैं तो आश्चर्य होता है।
यदि आप एक उपभोक्ता हैं और किसी भी प्रकार के शोषण के शिकार हुए हैं तो अपने अधिकारों की लड़ाई लड़कर न्याय पा सकते हैं। कोई वस्तु अथवा सेवा लेते समय हम धन का भुगतान तो करते हैं पर बदले में उसकी रसीद नहीं लेते। शोषण से मुक्ति पाने के लिए सबसे जरूरी है कि आप जो भी वस्तु, सेवा अथवा उत्पाद खरीदें, उसकी रसीद अवश्य लें। यदि आपके पास रसीद के तौर पर कोई सबूत ही नहीं है तो आप अपने मामले की पैरवी सही ढंग से नहीं कर पाएंगे।
पिछले कुछ वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें उपभोक्ता अदालतों से उपभोक्ताओं को पूरा न्याय मिला है लेकिन आपसे यह अपेक्षा तो होती ही है कि आप अपनी बात अथवा दावे के समर्थन में पर्याप्त सबूत तो पेश करें।
उपभोक्ता अदालतों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इनमें लंबी-चौड़ी अदालती कार्रवाई में पड़े बिना ही आसानी से शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। यही नहीं, उपभोक्ता अदालतों से न्याय पाने के लिए न तो किसी प्रकार के अदालती शुल्क की आवश्यकता पड़ती है और मामलों का निपटारा भी शीघ्र होता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अमेरिका के लॉस एंजिल्स में भारतीय समयानुसार आज की सुबह कभी न भूलने वाली रही। हॉलीवुड के मशहूर डॉल्बी थियेटर में आयोजित आस्कर अवार्ड समारोह में भारत का नाम ऊंचा हो गया। भारतीय वृत्तचित्र द एलिफेंट व्हिस्परर्स ने डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट श्रेणी में आस्कर जीतकर इतिहास रच दिया। इसे भारतीय सिनेमा के अमृतकाल का सबसे खास उपहार ही माना जाना चाहिए। यह तमिल भाषा में बनाया गया वृत्तचित्र है। इस दौड़ में और भी दिग्गज खिलाड़ी रहे। मगर कार्तिकी गोंजाल्विस निर्देशित ओटीटी मंच नेटफ्लिक्स के इस वृत्तचित्र ने इस श्रेणी में सबको मात दी।
यह वृत्तचित्र अपने प्रतिद्वंद्वियों हॉलआउट, हाउ डू यू मेजरमेंट ए ईयर, द मार्था मिशेल इफेक्ट और स्ट्रेंजर एट द गेट को मात देकर सबसे आगे रहा। कार्तिकी पर नाज इसलिए भी है कि उन्होंने इस पुरस्कार को अपनी मातृभूमि भारत को समर्पित किया। उन्होंने बहुत ही खूबसूरत संदेश दिया है। उन्होंने कहा-मैं आज यहां हमारे और प्रकृति के बीच के पवित्र बंधन, मूल निवासी समुदाय के लोगों के सम्मान और अन्य जीवित प्राणियों के प्रति सहानुभूति और अंतत: सह-अस्तित्व की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी।
इस वृत्त चित्र के निमार्ता गुनीत मोंगा हैं। बड़ी बात यह है कि नेटफ्लिक्स ने इस वृत्तचित्र पर भरोसा जताते हुए अपना मंच प्रदान किया। द एलिफेंट व्हिस्परर्स हाथियों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच के अटूट बंधन पर आधारित है। इसे सही मायने में हाथी मेरे साथी भी कहा जा सकता है।
वहीं इस बार का आस्कर समारोह भारतीय फिल्म आरआरआर के गीत नाटु नाटु के लिए भी खासे महत्व का रहा। नाटु नाटु ने भी आस्कर जीतकर इतिहास में नाम दर्ज करा लिया। नाटु नाटु ने अकादमी पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ मूल (तेलुगु मूल) गीत की श्रेणी में यह अवार्ड जीतकर फिल्म टेल इट लाइक अ वुमन के गीत अपलॉज, टॉप गन: मावेरिक के गीत होल्ड माई हैंड, ब्लैक पैंथर: वाकांडा फॉरएवर के लिफ्ट मी अप और एवरीथिंग एवरीवेयर आल एट वन्स के दिस इज ए लाइफ को शिकस्त दी।
तेलुगु गीत नाटु नाटु के संगीतकार एमएम कीरावानी गदगद हैं। इसे सुरों से पिरोने वाले काल भैरव और राहुल सिप्लीगुंज भी खुशी से नाच रहे हैं। नाटु नाटु का मतलब ही होता है नाचना। इस गाने को अभिनेता राम चरण और जूनियर एनटीआर पर फिल्माया गया है। पहले चर्चा थी कि अवार्ड समारोह में यही दोनों इसी गीत पर परफार्मेंस देंगे। लेकिन काल भैरव और राहुल सिप्लीगुंज ने समारोह में अपने इस गीत की बेहतरीन प्रस्तुति देकर दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों को खड़े होकर तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। इस प्रस्तुति के दौरान आयोजकों ने मंच पर गीत के सेट को दिखाने की कोशिश की। बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है कि इस गीत की शूटिंग यूक्रेन की राजधानी कीव स्थित राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में हुई थी।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक 4 दिन पहले महिला आईपीएल शुरू हुआ है। जिसमें यह नारा लगा "यह तो बस शुरुआत है।" लेकिन शुरुआत तो बहुत पहले से हो चुकी थी। रजिया सुल्तान (महिला शासिका) झांसी की रानी लक्ष्मीबाई (स्वतंत्रता सेनानी) देविका रानी (फिल्मों में अभिनय) इंदिरा गांधी (राजनीति) शकुंतला देवी (गणितज्ञ) पीटी उषा (एथलिट) कल्पना चावला (अंतरिक्ष) रीता फारिया और सुष्मिता सेन (सौंदर्य प्रतियोगिता) की उपलब्धियों से आज की भारतीय महिला बहुत आगे निकल चुकी हैं।
पिछले वर्ष जब देश में अमृत महोत्सव वर्ष की शुरुआत हुई देश को पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिली। खेल के मैदान में पीवी सिंधु, रिचा घोष, मीराबाई चानू, निखत जरीन, प्रियंका नूटक्की (शतरंज ग्रैंडमास्टर) प्रियंका मोहिते (800 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पांच पर्वत चोटियों पर चढ़ने वाले पर्वतारोही) ने देश का गौरव बढ़ाया। साथ ही पीटी ऊषा का भारतीय ओलंपिक संघ का पहली महिला अध्यक्ष बनना भी मील का पत्थर रहा।
वर्ष 2022 में हिंदी लेखिका गीतांजलि श्री को "रेत समाधि" के लिए बुकर पुरस्कार मिला। वहीं भारतीय लेखिका मीनाकंडा सामी को इंटरनेशनल" हर्मन कैस्टन पुरस्कार 2022" पुरस्कार प्राप्त हुआ।
वर्ष 2023 में उमी कमानी और अनुपमा रामचंद्रन की जोड़ी ने स्नूकर विश्व कप जीतकर तथा शेफाली वर्मा की कप्तानी में अंडर -19 टी 20 महिला विश्वकप जीतकर खेल जगत में भारत का परचम लहराया। वहीं भारत में जन्मी गीता गोपीनाथ आईएमएफ में चीफ़ इकाॅनोमिस्ट के पद पर नियुक्त होने वाली पहली महिला बनीं। केरल की सोम क्रिश्चियन कैलिफोर्निया कम्युनिटी कॉलेज सिस्टम का 11वां स्थाई चांसलर चुनी गयी। उधर अमेरिका से ही खबर है कि हो सकता है अगले राष्ट्रपति चुनाव में दो भारतीय मूल की महिलाओं में ही भिड़ंत हो। निकी हिली और कमला हैरिस के बीच।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत आज से 115 वर्ष पहले 1908 में हुई। 1908 में 8 मार्च के दिन अमेरिका में महिलाओं ने एक परेड का आयोजन किया था। उनकी मांग थी कि महिलाओं के काम के घंटे कम हो, वेतन अच्छा मिले और महिलाओं को वोट डालने का हक भी मिले। इसके एक वर्ष बाद अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐलान किया। इसे अंतरराष्ट्रीय बनाने का ख्याल सबसे पहले क्लारा जेटकिन नाम की एक महिला के ध्यान में आया था।
उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का सुझाव 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं के सम्मेलन में दिया था। पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2011 में मनाया गया। 2017 में रुस की महिलाओं के प्रदर्शन के बाद वहां के जार को पद से हटना पड़ा। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को औपचारिक मान्यता संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1975 में दी गयी।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पहचान जामुनी रंग से होती है इसे इंसाफ और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। कई देशों में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर राष्ट्रीय अवकाश रहता है। चीन में राष्ट्रीय परिषद के सुझाव पर बहुत से महिलाओं को 8 मार्च के को आधे दिन की छुट्टी दी जाती है। इटली में महिलाओं को 8 मार्च को सीमौसा फूल देकर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है।
अमेरिका में मार्च का महीना महिलाओं का महीना होता है। राष्ट्रपति की तरफ से घोषणा जारी की जाती है जिसमें अमेरिकी महिलाओं की उपलब्धियों का बखान किया जाता है। वर्ष 2023 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए संयुक्त राष्ट्र की थीम है : "एम्ब्रैस इक्विटी" जिसका अर्थ है लैंगिक समानता पर ध्यान देना।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जाति खासी चर्चा में है। डॉ लोहिया और डॉ अंबेडकर सहित अनेक चिंतकों ने भारत की जातीय संरचना को राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध बताया है। डॉ लोहिया ने जाति तोड़ो का नारा भी दिया था। डॉ अंबेडकर ने भी जाति के समूल नाश का ध्येय लेकर लगातार काम किया था। जाति खात्मा सभी महान नेताओं का स्वप्न रहा है। लेकिन जाति की अस्मिता बढ़ाने का गलत काम जारी है। जाति की कोई संवैधानिक परिभाषा नहीं है। बेशक भारत में सैकड़ों जातियां हैं। जाति का अस्तित्व है। जाति की राजनीति है। जातियां राष्ट्रीय एकता में बाधक रही हैं। मूलभूत प्रश्न है कि आखिर जातियां हैं क्या?
फ्रांसीसी विद्वान सेनार्ट के अनुसार ये एक निकाय जैसी हैं। अनुवांशिकता से प्रतिबद्ध है। कतिपय उत्सवों के अवसर पर इनके लोग इकट्ठे होते हैं। समान धंधों व्यवसायों के कारण आपस में जुड़े रहते हैं। कुछ जातियों में परंपरागत जाति मनवाने के लिए जातिवाह्य घोषित करने की परंपरा भी रही है। भारत की वर्तमान जाति व्यवस्था में यह विवेचन लागू नहीं होता। एक विद्वान एच मस्ले के अनुसार- जाति परिवारों का समूह होती हैं। प्रायः व्यवसाय विशेष की सूचक होती हैं। प्रत्येक जाति का एक पौराणिक पुरुष होता है। पौराणिक पुरुष अदृश्य देवता भी हो सकता है। जाति के सभी सदस्य स्वयं को उस पुरुष या देवता के प्रति निष्ठावान रखते हैं। जाति की यह परिभाषा भी भारतीय जाति व्यवस्था का पूरा अर्थ नहीं प्रकट करती।
हिस्ट्री ऑफ कास्ट इन इंडिया में डॉ केतकर ने लिखा है- यह एक सामाजिक समूह होती हैं। इसकी सदस्यता संतति और इस प्रकार जन्मे लोगों तक ही सीमित रहती है। इसके सदस्यों पर कठोर सामाजिक नियमों के अधीन समाज के बाहर विवाह न करने पर पाबंदी रहती है। यहां जाति का सबसे प्रमुख गुण है कि जाति समूह के बाहर विवाह करने पर पाबंदी रहती है। एक विद्वान नेस्फील्ड ने लिखा है- जाति समाज का ऐसा समूह होती हैं जो अन्य वर्ग से किसी प्रकार का सम्बंध स्वीकार नहीं करती। इसके सदस्य अपने जाति समूह के बाहर अन्य जाति समूह से विवाह का रिश्ता नहीं जोड़ते।
वे अन्य जातियों से खानपान का रिश्ता भी नहीं जोड़ते। लेकिन भारत में खानपान के बंधन टूट गए हैं। स्वाधीनता संग्राम के पहले से ही भारत में जातियों की अस्मिता को राष्ट्रीय एकता में बाधक माना गया था। संविधान निर्माता भी जातियों की समाप्ति चाहते थे। इसीलिए संविधान की उद्देशिका में जातियों का उल्लेख भी नहीं है। उद्देशिका संविधान का सारतत्व है। उद्देशिका का प्रारम्भ, हम भारत के लोग से होता है। पूरे देश के जन गण मन को हम भारत के लोग के दायरे में रखना और अभिज्ञात करना संविधान निर्माताओं का स्वप्न रहा है। उद्देशिका संविधान का प्राण है। संविधान की उद्देशिका में राष्ट्र के स्वप्न अन्तर्निहित हैं। जाति समाप्ति और हम भारत के लोग में विलय संविधान निर्माताओं का स्वप्न रहा है।
जातियां राष्ट्रीय एकता में बाधक है। लेकिन दुर्भाग्य से समाज में उनकी गहन उपस्थिति व अस्मिता है। विचारहीन राजनीति जाति अस्मिता को मजबूत करने पर आमादा है। दुनिया के प्रत्येक संविधान का एक दर्शन होता है। दर्शन विहीन संविधान राष्ट्र के अंतःकरण का भाग नहीं बनता। भारत के संविधान का एक दर्शन है।
संविधान निर्माण के प्रारम्भ में पंडित नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य संकल्प का प्रस्ताव रखा था। यह प्रस्ताव 22 जनवरी, 1947 को पारित हुआ। संकल्प में कहा गया था- संविधान सभा भारत को स्वतंत्र, प्रभुत्व सम्पन्न गणराज्य के रूप में घोषित करने के अपने सत्यनिष्ठ संकल्प की और भावी शासन के लिए संविधान बनाने की घोषणा करती है। आगे कहा है- प्रभुत्व सम्पन्न स्वतंत्र भारत की सभी शक्तियां और अधिकार उसके संगठक भाग और शासन के सभी अंग लोक से उत्पन्न हैं।
जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रतिष्ठा और अवसर की तथा विधि के समक्ष समता, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, उपासना, व्यवसाय, संगमन और कार्य की स्वतंत्रता, विधि और सदाचार के अधीन होगी। महत्वपूर्ण बात यह कही गई थी- यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना समुचित और गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी और विश्व शांति और मानव कल्याण के लिए स्वेच्छा से अपना पूरा सहयोग देगी। यहां प्राचीन भूमि शब्द ध्यान देने योग्य है। भूमि का अर्थ धरती नहीं है। प्राचीन भूमि का अर्थ प्राचीन संस्कृति है। इसी संकल्प से उद्देशिका की रचना हुई थी। उद्देशिका में जाति इकाई नहीं है। लेकिन राजनीति मरणासन्न जाति अस्मिता को बार बार पुनर्जीवन देती है।
भारत जातियों का संगठन नहीं है। संविधान में जातियों की अस्मिता नहीं है। डॉ अंबेडकर ने कहा था- जाति अप्राकृतिक है और यह बहुत दिन तक जीवित नहीं रह सकती। वैदिक काल में जातियां नहीं थीं। वर्ण व्यवस्था भी नहीं थी। उस समय सामाजिक समानता थी। राजनीति में मार्क्सवाद, पूंजीवाद, समाजवाद की तरह ब्राह्मणवाद शब्द प्रयोग भी चलता है। ब्राह्मणवाद का संकेत जाति व्यवस्था से है। जाति की समाप्ति के लिए अनेक महान नेताओं ने परिश्रम किये थे और अनेक संगठनों ने भी। कोलकाता के ब्रह्म समाज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कुछ समाजवादी विचारक भी जाति समाप्ति के पक्षधर थे। सबका उद्देश्य जाति समाप्ति था। शूद्र शब्द बहुत चलता है। सामूहिक रूप में शूद्र सैकड़ों व्यवसायों से जुड़े समूहों का साझा नाम हो सकता है।
डॉ अंबेडकर के अनुसार अंतर्विवाह ही जाति उत्पत्ति का कारण है। कुछ वर्गों ने अपने लिए दूसरे वर्गों के सदस्यों के साथ विवाह पर रोक लगायी। डॉ अंबेडकर ने प्रश्न उठाया है- जाति उद्भव के अध्ययन से हमें इस प्रश्न का उत्तर मिलना चाहिए कि वो कौन सा वर्ग था जिसने अपने लिए बाड़ा खड़ा किया। डॉ अंबेडकर ने कहा है- मैं इसका प्रत्यक्ष उत्तर देने में असमर्थ हूं। ब्राह्मण वर्ग ने स्वयं की घेराबंदी एक जाति के रूप में क्यों कर ली। डॉ अंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में जाति व्यवस्था पर शोधपूर्ण भाषण दिया था- मैं आपको एक बात बताना चाहता हूं कि जाति धर्म का नियम मनु प्रदत्त नहीं है।
वह ब्राह्मणों को जाति व्यवस्था का जन्मदाता नहीं मानते। कहते हैं- ब्राह्मण अनेक गलतियां करने के दोषी रहे हों और मैं कह सकता हूं वे ऐसे थे। लेकिन जाति व्यवस्था को गैर ब्राह्मणों पर लाद देने की उनकी क्षमता नहीं थी। अपनी तर्कपटुता से उन्होंने भले ही इस प्रक्रिया को सहायता प्रदान की हो। लेकिन अपनी ऐसी योजना को निश्चित रूप से अपने सीमित दायरे से आगे नहीं बढ़ा सकते थे। समाज को अपने स्वरूप के अनुरूप ढालना कितना गौरवशाली और कितना कठिन कार्य होता है।
ऐसा कार्य करने में किसी को भी आनंद प्राप्त हो सकता है और वह इस प्रशस्ति कार्य को कर सकता है। लेकिन वह इसे बहुत आगे तक नहीं ले जा सकता। जाति समाप्ति के लिए कठिन परिश्रम की आवश्यकता है। राज बदलना आसान होता है। समाज बदलना कठिन। संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जातियों को चिह्नित कर विशेष रक्षोपाय देने की व्यवस्था की थी। पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए आयोग बनाने की भी व्यवस्था की गई थी। जातियां स्वाभाविक रूप में विदा हो रही हैं। यह शुभ है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
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