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बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा आखिर क्यों जरूरी...
Published / 2023-07-24 22:46:10
बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा आखिर क्यों जरूरी...

आरके सिन्हाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। अभी कुछ दिन पहले ही केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसआई) ने एक बेहद जरूरी फैसला लिया। इसके तहत अब सीबीएसई स्कूलों को प्री-प्राइमरी से 12वीं कक्षा तक क्षेत्रीय व मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करने का विकल्प देगी। अब तक, राज्य बोर्ड स्कूलों के विपरीत, सीबीएसई स्कूलों में केवल अंग्रेजी और हिंदी माध्यम ही शिक्षा प्राप्त करने का विकल्प था। सीबीएसई ने अपने सभी संबंधित स्कूलों से कहा है कि जहां तक संभव हो सके यथाशीघ्र तो पांचवीं कक्षा तक क्षेत्रीय भाषा में या फिर बच्चे की मातृभाषा में पढ़ाई के विकल्प उपलब्ध करायें। बेशक, यह एक युगांतकारी फैसला है। हरेक बच्चे के पास यह विकल्प होना ही चाहिए कि वह अपनी मातृभाषा में स्कूली शिक्षा ग्रहण कर सके। हां, उसे विषय के रूप में कोई एक भाषा या एकाधिक भाषाएं पढ़ायी जा सकती हैं।भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और डॉ बाबा साहेब आंबेडकर ने भी अपनी स्कूली शिक्षा क्रमश: अपनी मातृभाषा हिंदी और मराठी में ही ली थी। ये दोनों आगे चलकर अंग्रेजी में भी महारत हासिल करने में सफल रहे। इन दोनों से बड़ा ज्ञानी कौन होगा। यानी आप प्राइमरी तक अपनी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने के बाद बेहतर ढंग से आगे बढ़ सकते हैं। टाटा समूह के चेयरमेन नटराजन चंद्रशेखरन ने भी अपनी स्कूली शिक्षा अपनी मातृभाषा तमिल में ही ली थी। उन्होंने स्कूल के बाद इंजीनियरिंग की डिग्री रीजनल इंजीनयरिंग कालेज (आरईसी), त्रिचि से हासिल की। यह जानकारी अपने आप में महत्वपूर्ण इस दृष्टि से है कि तमिल भाषा से स्कूली शिक्षा लेने वाले विद्यार्थी ने आगे चलकर अंग्रेजी में भी महारत हासिल किया और करियर के शिखर को छुआ।बेशक, भारत में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने की अंधी दौड़ के चलते अधिकतर बच्चे असली शिक्षा को पाने के आनंद से वंचित रह जाते हैं। असली शिक्षा का आनंद तो आप तब ही पा सकते हैं, जब आपने कम से कम पांचवीं तक की शिक्षा अपनी मातृभाषा में ही हासिल की हो। विभिन्न अध्ययनों से प्रमाणित हो चुका है कि जो बच्चे मातृभाषा में स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे अधिक सीखते हैं। अंग्रेजी का विरोध नहीं है या अंग्रेजी शिक्षा या अध्ययन को लेकर कोई आपत्ति भी नहीं है। पर भारत को अपनी भाषाएं, चाहे हिंदी, तमिल, बांग्ला या कोई अन्य, में प्राइमरी स्कूली शिक्षा देने के संबंध में तो बहुत पहले ही फैसला ले लेना चाहिए था। क्योंकि उसके बिना बच्चों को सही शिक्षा तो नहीं दी जा सकती। हां, शिक्षा के नाम पर प्रमाणपत्र जरूर बांटे जा सकते हैं। याद रखें कि शिक्षा का अर्थ है ज्ञान। बच्चे को ज्ञान कहां मिला? हम तो उन्हें नौकरी पाने के लिए तैयार कर रहे हैं। अभी हमारे यहां पर दुर्भाग्यवश स्कूली या कालेज शिक्षा का अर्थ नौकरी पाने से अधिक कुछ भी नहीं है। आजादी के बाद हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान का जो सपना देखा गया था वह सपना दस्तावेजों और सरकारी कार्यक्रमों में ही दबकर रह गया था।हम सब जानते हैं कि सारे देश में अंग्रेजी के माध्यम से स्कूली शिक्षा लेने-देने की महामारी ने अखिल भारतीय स्वरूप ले लिया है। जम्मू-कश्मीर तथा नगालैंड ने अपने सभी स्कूलों में शिक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही कर दिया है। महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडू समेत कुछ और अन्य राज्यों में छात्रों को विकल्प दिये जा रहे हैं कि वे चाहें तो अपनी पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी रख सकते हैं। यानी बच्चों को उनकी मातृभाषा से दूर करने की भरपूर कोशिश हुई। मुझे मेरे एक मित्र (जो राजधानी के मशहूर स्कूल के प्रधानाचार्य रहे हैं) बता रहे थे कि जब वे हरियाणा के करनाल जिले के एक ग्रामीण इलाके में पढ़ा रहे थे तो उन्हें एक नया अनुभव हुआ। वहां पर माता-पिता के साथ बच्चे खुशी-खुशी स्कूल में दाखिला लेने आते। वे नई किताबें और कॉपियां लेकर स्कूल आने लगते। लेकिन, स्कूल में कुछ दिन बिताने के बाद उनका स्कूल से मोहभंग होने लगता। वे कहने लगते कि उन्हें तो पढ़ना आता ही नहीं। वे धीरे-धीरे चुप रहने लगते कक्षा में। इसकी वजह यह थी कि उन्हें पढ़ाया जाता था अंग्रेजी में। उन्हें उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाता तो शायद उनका स्कूल और पढ़ाई से मोहभंग न होता। इस स्थिति के कारण अनेक बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते। विद्यार्थियों को मातृभाषा में शिक्षा देना मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक रूप से वांछनीय है, क्योंकि, विद्यालय आने पर बच्चे यदि अपनी भाषा में पढ़ते हैं, तो वे विद्यालय में आत्मीयता का अनुभव करने लगते हैं और यदि उन्हें सब कुछ उन्हीं की भाषा में पढ़ाया जाता है, तो उनके लिए सारी चीजों को समझना बेहद आसान हो जाता है।समूचे संसार के भाषा-वैज्ञानिकों, अध्यापकों और शिक्षा से जुड़े अन्य जानकारों की राय है कि बच्चा सबसे आराम से अपनी भाषा में पढ़ाए जाने पर ही शिक्षा ग्रहण करता है। जैसे ही उसे किसी अन्य भाषा में पढ़ाया जाने लगता है, तब ही गड़बड़ चालू हो जाती है। हमारे देश में तो यही होता चला आ रहा है। कई अध्ययनों से साबित हो चुका है कि जो बच्चे अपनी मातृभाषा में प्राइमरी से पढ़ना चालू करते हैं उनके लिए शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ने की संभावनाएं अधिक प्रबल रहती हैं। यानी बच्चे जिस भाषा को घर में अपने अभिभावकों,भाई-बहनों, मित्रों के साथ बोलते हैं, उसमें पढ़ने में उन्हें अधिक सुविधा रहती है। अफसोस कि हमारे देश के एक बड़े वर्ग ने मान लिया है कि अंग्रेजी जाने-समझे बिना गति नहीं है। इसके चलते हर स्तर पर इसे बढ़ावा देने की मानसिकता नजर आती है। एक तरह से यह सोच घर कर गई है कि अंग्रेजी जाने बिना दुनिया अधूरी-अधकचरी है। बेशक, इसी मानसिकता के चलते हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा अपनी आय का एक बड़ा भाग अपने बच्चों को कथित अंग्रेजी स्कूलों में भेजने पर खर्च करने लगा है। एक अनुमान के मुताबिक, वर्तमान में भारत के 25 फीसद स्कूली बच्चे उन स्कूलों में पढ़ाई शुरू करने लगे हैं, जहां पर मातृभाषा की बजाय शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। इन बच्चों को शिक्षा का आनंद आ ही नहीं सकता। इनमें से अनेक अंग्रेजी की अनिवार्यता का चलते स्कूलों को छोड़ देते हैं। खैर, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसआई) के ताजा फैसले से एक उम्मीद अवश्य जागी है कि चलो हमने भी भारत की अपनी भाषाओं को सम्मान देना भले ही देर से चालू तो किया। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

योगी सरकार से शिक्षा में बड़ा सुधार
Published / 2023-07-24 22:42:06
योगी सरकार से शिक्षा में बड़ा सुधार

डॉ दिलीप अग्निहोत्रीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। योगी सरकार ने छह वर्ष में उत्तर प्रदेश में विकास के नये आयाम स्थापित किये हैं। इसमें शिक्षा भी शामिल है। माध्यमिक और बेसिक शिक्षा पर इतना ध्यान पहले कभी नहीं दिया गया।आपरेशन कायाकल्प योगी आदित्यनाथ की अभिनव योजना रही है। परिषदीय विद्यालयों में इंफ्रॉस्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए आपरेशन कायाकल्प के पहले चरण में किए गए प्रयासों में आशातीत सफलता मिली है। इस अवधि में परिषदीय विद्यालयों के इंफ्रॉस्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए 11 हजार करोड़ रुपये खर्च किये गए। बेसिक शिक्षा परिषद तथा माध्यमिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में एक लाख 64 हजार से अधिक शिक्षकों की भर्ती की गई है। बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में करीब साठ नये विद्यार्थियों का नामांकन हुआ। सितंबर तक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के 2.36 लाख शिक्षकों को टैबलेट उपलब्ध कराये जायेंगे। शिक्षकों को ट्रेनिंग दी जाएगी। टैबलेट में शासकीय कार्यक्रमों की योजनाओं के बारे में जागरुकता सामग्री प्री-लोडेड होगी। अब आपरेशन कायाकल्प के दूसरे चरण की शुरुआत की तैयारी शुरू हो रही है। इंफ्रॉस्ट्रक्चर के साथ शैक्षिक गुणवत्ता, पठन-पाठन का माहौल, तकनीकी दक्षता, डिजिटल लर्निंग और वोकेशनल शिक्षा की ओर बढ़ना होगा। विद्यालयों में एट ग्रेड लर्निंग की व्यवस्था होगी। मुख्यमंत्री अभ्युदय कम्पोजिट विद्यालयों को प्रारम्भिक तौर पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लिया जायेगा। सभी जनपदों में एक विद्यालय मुख्यमंत्री अभ्युदय कंपोजिट विद्यालय के रूप में विकसित किया जायेगा। प्रोजेक्ट अलंकार के तहत माध्यमिक विद्यालयों के जीर्णोद्धार कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया जायेगा।शासकीय के साथ-साथ वित्त पोषित अशासकीय विद्यालयों में संबंधित प्रबंध तंत्र के सहयोग से जीर्णोद्धार होगा। उत्तर प्रदेश के विकास पर नीति आयोग की रिपोर्ट चर्चा में है। इसके आधार पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सुशासन का आकलन किया जा सकता है। नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि यूपी विकसित प्रदेश बनने की दिशा में अग्रसर है। छह वर्ष में साढ़े पांच करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर आ चुके हैं। लोग समर्थ और सक्षम बन रहे हैं। नीति आयोग के निर्धारित मानकों में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण था। नयी शिक्षा नीति लागू होने के बाद शिक्षा के सभी स्तरों पर व्यापक सुधार हुआ है। राज्य में 746 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के क्रमिक उन्नयन तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों को प्री-प्राइमरी के रूप में विकसित करने का कार्य किया जा रहा है। इस क्रम में मुख्यमंत्री ने लोक भवन में बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को ड्रेस, स्वेटर, स्कूल बैग, जूता-मोजा एवं स्टेशनरी क्रय के लिए धनराशि का डीबीटी के माध्यम से अंतरण प्रक्रिया का शुभारंभ किया। इसके अलावा योगी सरकार ने नकल विहीन परीक्षा सुनिश्चित की गयी। इससे देश में यूपी की शिक्षा का महत्व और सम्मान बढ़ा है। शिक्षा में किया गया निवेश कभी व्यर्थ नहीं जाता।शिक्षा देश और समाज के भविष्य को संवारने का माध्यम है। छह वर्ष पहले प्रदेश में मात्र बारह राजकीय मेडिकल कॉलेज थे। विगत छह वर्षों के प्रयास के बाद आज पैंतालीस जनपदों में सरकारी मेडिकल कॉलेज संचालित हैं। आज प्रदेश में 22 राज्य विश्वविद्यालय व तीन केंद्रीय विश्वविद्यालय संचालित हैं।छत्तीस निजी विश्वविद्यालय, दो एम्स हैं। दो आईआईटी व आईआईएम संचालित हैं। दो हजार से अधिक पॉलिटेक्निक व वोकेशनल इंस्टीट्यूट भी संचालित हैं। कुछ दिन बाद हर जिले में विश्वविद्यालय नजर आयेंगे। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

देश की ज्वाइंट फैमिली में दरार ला रही हैं वैश्विक बाजारी शक्तियां
Published / 2023-07-21 23:46:14
देश की ज्वाइंट फैमिली में दरार ला रही हैं वैश्विक बाजारी शक्तियां

वैश्विक बाजारी शक्तियां भारत के संयुक्त परिवारों को तोड़ने में सफल हो रही हैंप्रह्लाद सबनानीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में भी प्रयासरत हैं कि किस प्रकार भारत में संयुक्त परिवार की प्रणाली को तोड़ा जाये ताकि परिवारों की संख्या बढ़े एवं विभिन्न उत्पादों की मांग बढ़े और इन कम्पनियों द्वारा निर्मित उत्पादों की बिक्री बाजार में बढ़े।सनातन भारतीय संस्कारों के अनुसार भारत में कुटुंब को एक महत्वपूर्ण इकाई के रूप में स्वीकार किया गया है एवं भारत में संयुक्त परिवार इसकी परिणती के रूप में दिखाई देते हैं। परंतु, पश्चिमी आर्थिक दर्शन में संयुक्त परिवार लगभग नहीं के बराबर ही दिखाई देते हैं एवं विकसित देशों में सामान्यत: बच्चों के 18 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही, वे अपना अलग परिवार बसा लेते हैं तथा अपने माता-पिता से अलग मकान लेकर रहने लगते हैं। इस चलन के पीछे संभवत: आर्थिक पक्ष इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि जितने अधिक परिवार होंगे उतने ही अधिक मकानों की आवश्यकता होगी, कारों की आवश्यकता होगी, टीवी की आवश्यकता होगी, फ्रिज की आवश्यकता होगी, आदि। लगभग समस्त उत्पादों की आवश्यकता इससे बढ़ेगी जो अंतत: मांग में वृद्धि के रूप में दिखाई देगी एवं इससे इन वस्तुओं का उत्पादन बढ़ेगा। ज्यादा वस्तुएं बिकने से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लाभप्रदता में भी वृद्धि होगी। कुल मिलाकर इससे आर्थिक वृद्धि दर तेज होगी।विकसित देशों में इस प्रकार की मान्यताएं समाज में अब सामान्य हो चलीं हैं। अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में भी प्रयासरत हैं कि किस प्रकार भारत में संयुक्त परिवार की प्रणाली को तोड़ा जाये ताकि परिवारों की संख्या बढ़े एवं विभिन्न उत्पादों की मांग बढ़े और इन कंपनियों द्वारा निर्मित उत्पादों की बिक्री बाजार में बढ़े। इसके लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस प्रकार के विभिन्न सामाजिक सीरियलों को बनवाकर प्रायोजित करते हुए टीवी पर प्रसारित करवाती हैं जिनमें संयुक्त परिवार के नुकसान बताये जाते हैं एवं छोटे छोटे परिवारों के फायदे दिखाये जाते हैं। सास बहू के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़े दिखाये जाते हैं एवं जिनका अंत परिवार की टूट के रूप में बताया जाता है। भारत एक विशाल देश है एवं विश्व में सबसे बड़ा बाजार है, बहुराष्ट्रीय कंपनियां यदि अपने इस कुचक्र में सफल हो जाती हैं तो उनकी सोच के अनुसार भारत में उत्पादों की मांग में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है, इससे विशेष रूप से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सीधे सीधे फायदा होगा। इसी कारण के चलते आज जॉर्ज सोरोस जैसे कई विदेशी नागरिक अन्य कई विदेशी संस्थानों एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ मिलकर भारतीय संस्कृति पर हमला करते हुए दिखाई दे रहे हैं एवं भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं।आज यदि भारत विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन जाता है, जिसके लिए लगातार प्रयास भारत में किये जा रहे हैं, तो इसका सबसे अधिक बुरा असर इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर होने वाला है। क्योंकि, इससे इन कंपनियों द्वारा निर्मित उत्पादों की मांग भारत में कम हो जायेगी और आज केवल भारत ही पूरे विश्व में सबसे अधिक तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है। यदि भारत में इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों की मांग कम हो जाती है तो ये कम्पनियां अपने उत्पादों को बेचेंगी कहां एवं कैसे अपनी लाभप्रदता में वृद्धि दर्ज करेंगी। इसलिए इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत की महान संस्कृति पर अपने हमलों के तेज कर दिया है।विकसित देशों में आज सामाजिक तानाबाना छिन्न भिन्न हो गया है। शादीशुदा जोड़ों के बीच तलाक की दर लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच गयी है, जिससे छोटे-छोटे बच्चे केवल अपने माता अथवा पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। यदि माता अथवा पिता में से कोई एक पुन: विवाह कर लेता है तो उस बच्चे को सौतेले पिता अथवा सौतेली माता के साथ रहना होता है, जहां उसकी पर्याप्त देखभाल नहीं हो पाती है तथा उस बच्चे का मानसिक विकास ठीक तरीके से नहीं हो पाता है। ये बच्चे अक्सर मानसिक तनाव के दौर से गुजरते हैं और इसका पूरा असर इन बच्चों की पढ़ाई पर भी पढ़ता है। आज अमेरिका में अमेरिकी मूल के नागरिकों के बच्चे विज्ञान एवं गणित जैसे विषयों में बहुत कम रुचि ले रहे हैं, इससे वहां के मूल नागरिकों के बच्चे न तो डॉक्टर बन पा रहे हैं और न ही इंजीनियर। डॉक्टर एवं इंजीनियर के साथ-साथ प्रबंधन के क्षेत्र में भी एशियाई मूल के नागरिकों के बच्चे आगे बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसी प्रकार, विकसित देशों में विवाह पूर्व बच्चों का गर्भ धारण करना भी आम रिवाज होता जा रहा है तथा बगैर विवाह किये लिव इन रिलेशनशिप में साथ रहना भी आम बात हो गयी है। लिव इन रिलेशनशिप के दौरान पैदा हुए बच्चों को न केवल कई प्रकार की कानूनी समस्याओं का सामना करना होता है बल्कि इन बच्चों की देखभाल भी ठीक तरीके से नहीं हो पाती है।विकसित देशों में बच्चों का सही लालन पालन नहीं होने के चलते इन बच्चों में हिंसा की प्रवृति पैदा हो रही है। इसी कारण से आज अमेरिका में प्रति नागरिक जेलों की संख्या अन्य देशों की तुलना में बहुत अधिक है, स्वाभाविक रूप से प्रति नागरिक कैदियों की संख्या भी तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक है।सामाजिक ताना-बाना के छिन्न भिन्न होने के चलते आज अमेरिका में सबसे अधिक खर्च सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर करना पड़ रहा है। वृद्ध नागरिक, चूंकि अपने बच्चों से अलग रहते हैं एवं वृद्धावस्था में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। अत: इनकी देखभाल पर सरकार को भारी भरकम राशि खर्च करनी होती है। इसी प्रकार जेलों के रख रखाव एवं इनमें निवास कर रहे कैदियों पर भी भारी भरकम राशि खर्च करनी होती है। इस प्रकार के खर्च उत्पादकता के श्रेणी में नहीं होने के चलते व्यर्थ खर्च ही माने जाते हैं। इससे कुल मिलाकर विशेष रूप से अमेरिका आज गम्भीर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका के इस अवस्था में पहुंचने के पीछे विशेष रूप से वहां का सामाजिक ताना-बाना का छिन्न भिन्न होना ही माना जा रहा है।इसके ठीक विपरीत भारतीय सनातन संस्कृति में कुटुंब व्यवस्था को ईश्वर प्रदत्त उपहार माना गया है। संयुक्त परिवार में बच्चों के रहने के चलते उनकी बचपन में देखभाल ठीक तरह से होती है एवं भारत के बच्चों के हिंसा की प्रवृत्ति लगभग नहीं के बराबर पाई जाती है। इन बच्चों का मानसिक विकास भी उच्च स्तर का हो जाता है।बुजुर्गों की देखभाल भी संयुक्त परिवार में बहुत अच्छी तरह से हो जाती है एवं सरकारों को किसी विशेष प्रकार की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर खर्च करने की आवश्यकता ही नहीं होती है। परंतु, पश्चिमी देशों द्वारा सनातन भारतीय संस्कृति पर प्रहार किए जा रहे हैं। इस प्रकार के प्रयासों से भारतीय नागरिकों को आज जागरूक करने की आवश्यकता है।पश्चिमी संस्कृति तो अपने आप में असफल सिद्ध होती दिखाई दे रही है। अब केवल सनातन भारतीय संस्कृति ही विकसित देशों में फैल रही अशांति को दूर करने में सक्षम दिखाई दे रही है। इस प्रकार, सनातन भारतीय संस्कृति को अपनाकर पूरे विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है। (लेखक भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त उप महाप्रबंधक हैं।)

प्रेम से ही संसार में परिवर्तन
Published / 2023-07-19 23:14:50
प्रेम से ही संसार में परिवर्तन

गुरु महावतार बाबा : स्मृति दिवस 25 जुलाई पर विशेष संध्या एस नायर एबीएन एडिटोरियल डेस्क। श्रीश्री परमहंस योगानंद ने अपने गौरव ग्रंथ योगी कथामृत में आधुनिक भारत के महावतार बाबाजी के इस वचन का उल्लेख किया है, मैं अपने भौतिक शरीर का कभी त्याग नहीं करूंगा। मेरा यह भौतिक शरीर इस पृथ्वी पर कम से कम कुछ लोगों को सदा दिखाई देता रहेगा। इसी पुस्तक के माध्यम से इस संसार को पहली बार महान अवतार बाबाजी के बारे में पता चला था। उनके अनुयायी मानते हैं कि दैवी आदेश अथवा गहन विनम्रता के कारण ये एकांतवासी महान लंबे अरसे से बद्रीनारायण के आसपास के उत्तरी हिमालय पर्वतों के पूर्ण निर्जन प्रदेश में अपने स्थूल शरीर में वास कर रहे थे। उनके अनुयायी मानते हैं कि महागुरु अपने शिष्यों के एक छोटे से समूह के साथ हिमालय के निर्जन पर्वतों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते रहते हैं। अनासक्त महागुरु के रहस्यमय शब्द डेरा डण्डा उठाओ उनके शिष्यों के समूह के लिए सूक्ष्म शरीर के माध्यम से तत्क्षण किसी अन्य स्थान पर पहुंचने का संकेत होते हैं। जनवरी, 1894 में, प्रयागराज कुंभ मेले में, बाबाजी ने स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी से भेंट की थी और उन्हें वचन दिया था कि वे उनके पास एक शिष्य को भेजेंगे, जिसे उनको क्रियायोग परम्परा में प्रशिक्षित करना होगा। वे विशेष शिष्य थे श्री श्री परमहंस योगानंद, जिन्होंने कालान्तर में योगदा सत्संग सोसायटी आफ इण्डिया/सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना की, जिसके माध्यम से एक शताब्दी से अधिक समय से ईश्वरीय सेवा की भावना के साथ प्राचीन क्रियायोग विज्ञान का प्रसार कार्य किया जा रहा है। अपना पवित्र कार्य प्रारंभ करने के लिए पाश्चात्य जगत को प्रस्थान करने से पूर्व योगानंदजी को दैवी आश्वासन की आवश्यकता अनुभव हुई। जैसा कि उन्होंने अपनी पुस्तक योगी कथामृत में लिखा है, अमेरिका जाने का संकल्प तो मेरे मन ने कर लिया था, पर साथ ही ईश्वर की अनुमति और आश्वासन-वाणी सुनने के लिए वह और भी अधिक कृतसंकल्प था। 25 जुलाई, 1920 को योगानंदजी प्रात:काल से ही अत्यंत दृढ़ संकल्प के साथ प्रार्थना करने बैठ गये। जब उनकी प्रार्थना की उत्कटता पराकाष्ठा तक पहुंच गयी, ठीक उसी क्षण उनके कोलकाता स्थित घर के दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। युवा शिष्य को हिमालय के सर्वव्यापी महागुरु का तेज सहस्रों सूर्यों के उदय के समान प्रतीत हो रहा था। उन्होंने मधुर स्वर में बात की, हां, मैं बाबाजी हूं। हम सबके परमपिता ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली है। उन्होंने मुझे तुमसे यह बताने का आदेश दिया है ह्यअपने गुरु की आज्ञा का पालन करो और प्रवास करो। डरो मत; तुम्हारा पूर्ण संरक्षण किया जायेगा। यह अनुभव श्री श्री लाहिड़ी महाशय के दृढ़ विश्वास का साक्षी है कि श्रद्धापूर्वक स्मरण से भक्त को तत्क्षण आध्यात्मिक आशीर्वाद प्राप्त होता है। उस महत्वपूर्ण दिवस की स्मृति में सम्पूर्ण विश्व के भक्त प्रत्येक वर्ष 25 जुलाई को बाबाजी स्मृति दिवस के रूप में मनाते हैं। बताते हैं अनेक वर्षों के पश्चात सन् 1963 में बाबाजी ने वाईएसएस/एसआरएफ की तीसरी अध्यक्ष दया माता को अपनी पूरी महिमा के साथ दर्शन दिये थे, जब वे हिमालय में द्वाराहाट के निकट पवित्र गुफा की तीर्थयात्रा पर गयी हुई थीं, जहां ऐसा माना जाता है कि बाबाजी ने कुछ समय तक निवास किया था। इसी पवित्र स्थल पर उन्होंने श्री श्री लाहिड़ी महाशयजी को क्रिया योग के लुप्त विज्ञान की दीक्षा प्रदान की थी। दया माताजी ने महागुरु से उनके सच्चे स्वरूप के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की थी तो उनके इस मधुर प्रश्न का उत्तर दिया था, मेरी प्रकृति प्रेम है क्योंकि केवल प्रेम ही इस संसार को परिवर्तित कर सकता है।

नयी शिक्षा नीति और सीखने-सिखाने की संस्कृति का विकास
Published / 2023-07-19 23:08:41
नयी शिक्षा नीति और सीखने-सिखाने की संस्कृति का विकास

गिरीश्वर मिश्र एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहा जाता है धरती पर ज्ञान जैसी कोई दूसरी पवित्र वस्तु नहीं है। भारत में प्राचीनकाल से ही न केवल ज्ञान की महिमा गाई जाती रही है बल्कि उसकी साधना भी होती आ रही है। इस बात का असंदिग्ध प्रमाण देती है काल के क्रूर थपेड़ों के बावजूद अभी भी शेष बची विशाल ज्ञान राशि। अनेकानेक ग्रंथों तथा पांडुलिपियों में उपस्थित यह विपुल सामग्री भारत की वाचिक परम्परा की अनूठी उपलब्धि के रूप में वैश्विक स्तर पर अतुलनीय और आश्चर्यकारी है। यह हमारे लिए सचमुच गौरव का विषय है कि आज जैसी उन्नत संचार तकनीकी के अभाव में भी मानव स्मृति में भाषा के कोड में संरक्षित होकर यह सब जीवित रह सका। इस परंपरा में मनुष्य के जीवन में होने वाले आरम्भ में विकास और उत्तर काल में ह्रास की अकाट्य सच्चाई को स्वीकार करते हुए मनुष्य को जीने के लिए तैयार करने की व्यवस्था की गई थी। ज्ञान केंद्रित भारतीय संस्कृति के अंतर्गत अभ्यास और गुरु के संरक्षण में मिलने वाली शिक्षा का परिणाम व्यास, पाणिनि, पतंजलि, वाल्मीकि, कणाद, गौतम, जैमिनि, भरत, कालिदास, भर्तृहरि, बाणभट्ट, भवभूति, चाणक्य, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, चरक, सुश्रुत, शंकराचार्य आदि जैसी महान विभूतियों और उनकी अमूल्य कृतियों के रूप में प्रतिफलित हुआ। गुणवत्ता और शिक्षा की उत्कृष्टता की दृष्टि से नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विद्या केंद्रों की वास्तविकता विश्व विदित है। बर्तानवी उपनिवेश के दौर में भारत की अपनी शिक्षा व्यवस्था को समूल उखाड़ कर अंग्रेजी शिक्षा का जो बिरवा रोपा गया था वह स्वतंत्र भारत में विशाल वृक्ष बन कर किस प्रकार छाता गया और हम किस स्थिति में पहुंचे हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की शिक्षा की प्रक्रिया और उसके सामाजिक स्तर पर होने वाले परिणाम सबके सामने हैं। देश की आवश्यकता और वर्तमान वैश्विक संदर्भ में शिक्षा का ढांचा और प्रक्रिया में बदलाव लाने की दृष्टि से पांच वर्ष लम्बे विचार विमर्श के बाद 2020 में नई शिक्षा नीति का मसौदा लाया गया। दुर्भाग्यवश कोरोना की लंबी महामारी के दौरान लड़खड़ाती पुरानी व्यवस्था भी बेपटरी हो गयी और नयी नीति भी शिक्षा का स्वभाव बदलने के लिए आगे बढ़ी। इन सबके बीच अस्त-व्यस्त शिक्षा व्यवस्था नई चुनौतियों से जूझ रही है। इस बीच जनसंख्या की दृष्टि से अब जब भारत विश्व में प्रथम स्थान पर पहुंच चुका है इसकी युवा पीढ़ी संख्या की दृष्टि से अब अधिक अपेक्षा करती है। वर्ष 2020 में आयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भारत की औपचारिक शिक्षा की चुनौतियों और संभावनाओं को पहचान कर उसका आकलन करते हुए समर्थ भारत के निर्माण के लिए शिक्षा के आयोजन के लिए एक खाका प्रस्तुत किया था। इस नीति के आने के साथ ही औपचारिक शिक्षा से जुड़े हितधारकों में चर्चाएं शुरू हो गयीं। नीति की संस्तुतियों को शिक्षा में सुधार की सकारात्मक पहल मानते हुए सबके द्वारा इसका स्वागत किया गया। जुलाई 2020 में प्रस्तुत की गयी इस नीति से जुड़ी कार्य योजनाएं दिसंबर 2020 तक आने लगीं। पिछले तीन वर्षों में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा एवं शोध के लिए सरकार ने जो कुछ भी कहा, सुना और किया, उसे नीति के क्रियान्वयन का हिस्सा बनाया गया। समग्र शिक्षा अभियान की अवधि को 2025-26 तक बढ़ा दिया गया। इसे नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का माध्यम बनाया गया। 8 अपै्रल 2021 को सार्थक (स्टूडेंट्स एंड टीचर्स होलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रो क्वालिटी एजुकेशन) नाम से एक वृहद् कार्ययोजना प्रस्तुत की गयी। यह कार्ययोजना वर्तमान में एक मार्गदर्शिका की भूमिका में कार्य कर रही है। किसी भी राज्य की विद्यालयी शिक्षा से जुड़ी आधिकारिक वेबसाइट पर इसके आलोक में बनायी जा रही योजनाओं का ब्योरा देखा जा सकता है। इसका उपयोग नीति के अंतर्गत किये जा रहे कार्यों की उपलब्धि को मापने के लिए भी किया जा रहा है। ध्यातव्य है कि नीति की एक प्रमुख संस्तुति आधारभूत साक्षरता और गणितीय योग्यता का संवर्धन करना था। इस दिशा में पहल करते हुए 5 जुलाई 2021 को निुपण भारत अभियान शुरू किया गया। इस अभियान का लक्ष्य रखा गया कि वर्ष 2026-27 में कक्षा तीन तक के बच्चे पढ़ने और गिनने की आधारभूत क्षमता से युक्त हो जाये। नीति के क्रियान्वयन की एक मुख्य एजेंसी एनसीईआरटी है। इसने इस दिशा में पहल करते हुए 29 जुलाई 2021 को विद्या प्रवेश नाम के खेल आधारित माड्यूल प्रस्तुत किया। इस संस्था के द्वारा आधारभूत स्तर (फाउंडेशनल स्तर) के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा प्रस्तुत की जा चुकी है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की विद्यालयी शिक्षा के लिए भी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का एक मसौदा चर्चा और फीडबैक के लिए आ चुका है। एनसीईआरटी ने सेवारत अध्यापकों के पेशेवर विकास के लिए संचालित निष्ठा कार्यक्रम को भी नीति के अनुसार सुधार कर संयोजित किया है। यह भी गौरतलब है कि लगभग हर तीन महीने पर किसी न किसी योजना का शुभारम्भ किया जा रहा है। इसके अंतर्गत विद्याजंलि और पीएम श्री योजना प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है। भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय 2020 के बाद जिस किसी भी कार्यक्रम और योजना को आरंभ कर रहा है कि उसे शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की शक्ल में प्रस्तुत कर रहा है। यह राहत की बात है कि केंद्र सरकार ने विगत वर्षों की तुलना में अपने शिक्षा बजट में लगभग 11.86 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। उच्च शिक्षा के स्तर पर किसी केंद्रीकृत सुधार की जगह विश्वविद्यालय और राज्य सरकारों के स्तर पर सुधार के कुछ प्रयास हो रहे हैं। अधिकांश विश्वविद्यालयों की वेबसाइटों पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की कार्ययोजना का ब्योरा देखा जा सकता है। ये कार्य योजनाएं शिक्षा नीति से सूत्र को पहचानती हैं और इसके क्रियान्वयन का चरणबद्ध प्रस्ताव प्रस्तुत करती हैं। इनमें पाठ्यचर्या और शिक्षण प्रक्रिया में सुधार और आकलन की लचीली पद्धति का उल्लेख किया जाता है। एकेडमिक बैंक आफ क्रेडिट के विकास को जरूर बड़े पैमाने पर लागू किया गया है। हर विश्वविद्यालय राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के नाम पर नए तरह के अध्ययन कार्यक्रमों को आरंभ करने की योजना बनाने में अग्रसर हो रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उत्साह पोर्टल आरंभ कर नीति क्रियान्वयन की निगरानी की कोशिश भी की जा रही है। इसके लिए बहुअनुशासनात्मकता, डिजिटल संसाधनों का अधिकाधिक प्रयोग, कौशल विकास, शोध, नवाचार, उद्यमिता और भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के अवसरों को को लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों की कार्ययोजना की निगरानी और उन्हें सहयोग देने का प्रयास जारी है। इस नीति के क्रियान्वयन का सकारात्मक परिणाम यह भी है कि उच्च शिक्षा के परिसरों में भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय भाषाएं अब एक महत्वपूर्ण घटक की तरह पहचानी जा रही हैं किंतु अभी यह रस्मी तौर पर हड़बड़ी में ही हो रहा है और शिक्षा की मुख्य धारा से इसका कोई आर्गेनिक रिश्ता नहीं बन पा रहा है। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन खड़ा कर शोध में सुधार हेतु 2023-28 के लिए पचास हजार करोड़ रुपये आवंटित करने की खबर आयी है। विद्यालय स्तर पर नीति के प्रभाव में आवंटित वित का प्रस्तुतीकरण और समायोजन नए वर्गों में हो रहा है लेकिन आधारभूत समस्याएं पूर्ववत ही ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। विद्यालयों में सीखने के कुछ संसाधन जरूर उपलब्ध हो रहे हैं परंतु सीखने-सिखाने की संस्कृति में कोई बदलाव नहीं हो रहा है। आज भी मास्टर साहब प्रशिक्षण लेने और देने में व्यस्त हैं। सरकार की अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन का हिसाब-किताब का बोझ उनके ही कंधों पर अभी भी जारी है। केंद्रीकृत योजनाओं का विभिन्न माध्यमों से प्रचार का काम विधिवत किया जा रहा है लेकिन विद्यालय स्तर पर इन्हें लेकर उदासीनता ही छायी हुई है। नई पाठ्यपुस्तकों के आने की सुगबुगाहट के बीच उनकी सामग्री की गलत सही आलोचना के दौर शुरू हो चुके हैं। यदि सरकारी तंत्र को छोड़ दिया जाए तो यह नीति सरकारी विद्यालयों पर जनता में भरोसा विकसित करने की दिशा में कोई खास प्रभाव छोड़ती नजर नहीं आ रही है। उच्च शिक्षा के स्तर पर कोविड के बाद से सत्र की नियमितता की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के आधार पर स्नातक और परास्नातक में प्रवेश विलंब से हो रहा है। उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं के परीक्षा परिणामों की घोषणा और स्नातक में प्रवेश की अवधि में लगभग तीन माह का अंतराल हो रहा है। उच्च शिक्षा के स्तर पर बहुअनुशासनात्मकता और सुनम्य व्यवस्था के बीच शिक्षण-अधिगम सुदृढ़ होने के बजाय शॉर्टकट अपनाता नजर आ रहा है। आम तौर पर देखें तो आज की सोच में शिक्षा के तीन मुख्य उद्देश्य ध्यान आकृष्ट करते हैं। वह अच्छी तरह से जीने के लिए जरूरी क्षमताओं को विकसित करती है जैसे पढ़ना, लिखना, डिजिटल साक्षरता, अपनी और समाज की देख-रेख करना, तथा लोगों के साथ मिल कर समूह में काम करना इत्यादि। इस आधारभूत जरूरत के साथ जुड़ी दूसरी आवश्यकता है मूल्यों और चरित्र या स्वभाव का निर्माण। सामाजिक दायित्व और नैतिकता पर मंडराते खतरों और लोभ लाभ के तीव्र आकर्षण के बीच सहानुभूति, आदर, सच्चाई, ईमानदारी, सहयोग और सदाचार के महत्व को कम नहीं आंका जा सकता। तीसरी बात है ज्ञान विशेष का निर्माण जो विभिन्न अध्ययन-अनुशासनों से जुड़ा होता है, उसका विकास। हालाँकि ये तीनों जुड़े हैं और साथ-साथ ही जीवन में चलते हैं। गौर तलब है कि इनके लिए वास्तविक सामाजिक परिस्थिति में सीखना अनिवार्य है। आन लाइन की तकनीकी इनके लिए किसी भी तरह से मुनासिब नहीं है और उससे बात नहीं बन सकती। इनके लिए सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों ही स्तरों पर सहज सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। शिक्षा केंद्रों की बदहाली के अनेक आयाम हैं जिन पर गौर करना जरूरी है। आज विद्यार्थियों के लिए वे विकर्षण का केंद्र बन रहे हैं और साधन जुटा कर वे विदेश की ओर रुख कर रहे हैं। बहुत सी सामान्य या उससे नीचे की संस्थाएं भी नैक से उच्च और उच्चतर ग्रेड का प्रमाणपत्र पा कर आगे बढ़ रही हैं। आम आदमी निरुपाय और भ्रमित हो रहा है। उच्च शिक्षा के अध्यापक नई शब्दावली और प्रस्तुति के बीच ऐसे उलझे हैं कि वे क्या और कैसे पढ़ाये में नवाचार करने के बजाय पुरानी पाठ्यचर्या पर नये कवर चढ़ाकर आगे बढ़ ले रहे हैं। उद्यमिता विकास के नाम पर उच्च शिक्षा संस्थानों और उद्यम आधारित अधिगम स्थलों के बीच न के बराबर तालमेल है। विद्या के परिसर में ज्ञान की संस्कृति की जगह जोड़ तोड़ की राजनीति और गैर अकादमिक आकांक्षाओं को साकार करने पर अधिक जोर दिया जाने लगा है। कुछ खास शैक्षिक संस्थाओं को छोड़ दें जिन्हें स्वायत्तता मिली है और जहां गुणवत्ता की स्वीकृति है अन्य संस्थाएं उदासीनता, दखलंदाजी और अव्यवस्था से ग्रस्त हो कर हर तरह के समझौतों के साथ बीमार हो रही हैं। सरकारी व्यवस्था जहां अनेक कमियों से जकड़ कर अनुत्पादक बनी हुई है वहीं निजी शिक्षा व्यवस्थाएं अनियंत्रित हो कर बेहद मंहगी हुई जा रही हैं। गुणवत्ता और मानक के स्तर की चिंता आकड़ों में फंस रही है। नयी शिक्षा नीति को जमीन पर उतारने के लिए शैक्षिक व्यवस्था में बदलाव लाने पर ही उसकी साख बचेगी। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

देश में सुधारों की रफ्तार से लॉजिस्टिक्स गुलजार
Published / 2023-07-19 00:02:18
देश में सुधारों की रफ्तार से लॉजिस्टिक्स गुलजार

सुमिता डावराएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत आज विकास की ऊंची उड़ान भरने को तैयार है। वैश्विक स्तर पर सभी प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारत की लॉजिस्टिक्स संबंधी रेटिंग बेहतर होते जाने के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स से जुड़ी इसकी बाधाएं दूर होती जा रही हैं।मैन्यूफैक्चरिंग और व्यापार के क्षेत्र में भारत की वैश्विक स्थिति बुनियादी ढांचे और निर्यात-आयात (एक्जिम) संबंधी लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने से संबंधित सुधारों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। बुनियादी ढांचे को अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण विकास इंजन के रूप में पहचानते हुए, प्रधानमंत्री की गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (एनएमपी) और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति जैसे सुधारों ने सामानों एवं यात्रियों की आवाजाही के लिए लॉजिस्टिक्स से जुड़े बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स संबंधी सेवाओं में सुधार पर ध्यान केन्द्रित किया है। बहुत ही कम समय में, इन सुधारों के परिणाम दिखाई देने लगे हैं।विश्व बैंक ने लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स (एलपीआई) से संबंधित 2023 की अपनी रिपोर्ट में लॉजिस्टिक्स से जुड़ी उन्नत दक्षता की दिशा में भारत द्वारा की गई प्रगति को स्वीकार किया है। विश्व बैंक की यह रिपोर्ट 139 देशों के एलपीआई के बारे में जानकारी साझा करती है और भारत को इस सूचकांक में 38वें स्थान पर रखती है, जोकि 2018 में हमारी रैंक की तुलना में छह स्थान ऊपर है। एलपीआई छह व्यापक मापदंडों पर आधारित गुणात्मक धारणाओं का एक सर्वेक्षण-आधारित प्रमाणीकरण है, जो सीमा शुल्क, बुनियादी ढांचे, अंतरराष्ट्रीय लदान (शिपमेंट), लॉजिस्टिक्स संबंधी क्षमता एवं लॉजिस्टिक्स से जुड़ी सेवाओं की गुणवत्ता, समयबद्धता, निगरानी एवं जानकारी जैसे पहलुओं पर विचार करता है।विश्व बैंक एक ऐसी उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में भारत का उदाहरण देता है, जिसने 2015 से देश के पूर्वी एवं पश्चिमी दोनों तटों पर स्थित बंदरगाहों को सुदूर इलाकों में स्थित आर्थिक केंद्रों से जोड़ते हुए बुनियादी ढांचे एवं विभिन्न प्रौद्योगिकियों में निवेश किया है। अन्य कारकों के अलावा, इस तरह के निवेश के कारण ही बंदरगाहों पर कंटेनरों के ठहराव के समय के मामले में भारत का प्रदर्शन कई विकसित देशों की तुलना में कहीं बेहतर है।मई से लेकर अक्टूबर 2022 के बीच, भारत में कंटेनरों के ठहराव का समय न्यूनतम 3 दिन था, जबकि संयुक्त अरब अमीरात एवं दक्षिण अफ्रीका के मामले में यह समय चार दिन, अमेरिका के मामले में सात दिन और जर्मनी के मामले में 10 दिन था।विश्व बैंक की यह रिपोर्ट भारत को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसने नेशनल लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक सर्विसेज लिमिटेड (एनएलडीबीएसएल) जैसे डिजिटलीकृत प्लेटफॉर्म के उपयोग के जरिए आपूर्ति शृंखला में दृश्यता ला दी है। यह रिपोर्ट बताती है कि लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक (एलडीबी) कैसे आरएफआईडी (रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन) टैग के उपयोग के जरिए भारत में एक्जिम कंटेनरों की आवाजाही की निगरानी करता है और उसके बारे में सटीक जानकारी रखता है, जिससे माल पाने वाले (कान्साइनी) के लिए अपनी आपूर्ति शृंखला की एक छोर से दूसरे छोर तक निगरानी (ऐंड-टू-एंड ट्रैकिंग) करना संभव हो जाता है। शुरू में माल की स्थिति का पता लगाने वाले (कार्गो ट्रेसिंग) इस प्रकार के तंत्र का शुभारंभ 2016 में देश के पश्चिमी तट पर किया गया था और आज इस तंत्र के दायरे में सभी प्रमुख बंदरगाह और निजी बंदरगाह आते हैं। भारतीय बंदरगाहों पर कंटेनरों के बेहतर ठहराव समय के लिए इसे श्रेय दिया जाता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के संदर्भ में कहें तो माल की निगरानी (कार्गो ट्रैकिंग) व्यवस्था की शुरुआत के साथ, देश के पूर्वी तट पर स्थित विशाखापत्तनम बंदरगाह पर कंटेनरों के ठहराव का समय 2015 में 32.4 दिन से घटकर 2019 में 5.3 दिन रह गया।देश के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानते हुए, भारत सरकार ने आपूर्ति शृंखला पर निगरानी रखने के लिए एक डिजिटल प्रणाली के रूप में लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक प्रोजेक्ट (एलडीबी) का शुभारंभ किया था। एनएलडीबीएसएल को राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास निगम (एनआईसीडीसी) और निप्पॉन इलेक्ट्रिक कंपनी (एनईसी) लिमिटेड नाम की जापानी कंपनी के बीच एक एसपीवी (विशेष प्रयोजन वाहन) के रूप में संचालित किया जाता है। एलडीबी, एक्जिम कंटेनर की आवाजाही के बारे में वास्तविक समय में विस्तृत जानकारी प्रदान करने हेतु आपूर्ति शृंखला में कार्यरत विभिन्न एजेंसियों के पास उपलब्ध डिजिटल जानकारी को एकत्रित व व्यवस्थित करता है। यह प्लेटफॉर्म भारत के एक्जिम कंटेनर की शत-प्रतिशत मात्रा को संभालता है। इस पर एक मोबाइल ऐप के साथ-साथ एक पोर्टल के जरिए माल पाने वालों (कान्साइनी) के लिए जानकारी पाने की सुविधा उपलब्ध है। इस तरह, एलडीबी दृश्यता प्रदान करता है और भारत के कंटेनरीकृत एक्जिम लॉजिस्टिक्स से संबंधित बिग डेटा एनालिटिक्स को सक्षम बनाता है।जुलाई 2016 में अपना कामकाज शुरू करने बाद से, एलडीबी ने 60 मिलियन एक्जिम कंटेनरों की निगरानी की है। भारत के शत-प्रतिशत कंटेनरीकृत एक्जिम कार्गो की निगरानी करने और उनका पता लगाने के लिए आरएफआईडी, आईओटी (इंटरनेट आॅफ थिंग्स) और बिग डेटा एनालिटिक्स से संबंधित प्रौद्योगिकियों के संयोजन के साथ, एलडीबी ने प्रमुख भारतीय बंदरगाहों, सबसे व्यस्त टोल प्लाजा, लगभग 400 कंटेनर फ्रेट स्टेशनों (सीएफएस)/अंतदेर्शीय कंटेनर डिपो (आईसीडी) और बंदरगाहों पर खाली यार्ड, विशेष आर्थिक क्षेत्रों और यहां तक कि नेपाल एवं बांग्लादेश की सीमाओं पर स्थित एकीकृत चेक पोस्ट के साथ भी तालमेल बिठाया है।आरएफआईडी से संबंधित आंकड़ों को हासिल करने के उद्देश्य से एसपीवी द्वारा माल ढुलाई के लिए सर्पित गलियारों (डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) सहित सभी प्रमुख सड़क एवं रेल मार्गों पर लगभग 3000 आरएफआईडी रीडर स्थापित किये गये हैं।एलडीबी हासिल एवं व्यवस्थित किए गए आंकड़ों का विभिन्न प्रकार से विश्लेषण करता है। इन विश्लेषणों में बंदरगाह पर कंटेनरों के ठहराव के समय की गणना, माल की आवाजाही के क्रम में होने वाले भीड़भाड़ का विश्लेषण, कंटेनर की आवाजाही की गति का विश्लेषण, प्रदर्शन संबंधी मानदंड, आवागमन में लगने वाले समय का विश्लेषण (बंदरगाह से सीएफएस या इसके उलट) आदि शामिल है। ये विश्लेषण मासिक, त्रैमासिक और वार्षिक आधार पर किये जाते हैं और सभी संबंधित मंत्रालयों, बंदरगाह के प्राधिकारियों, टर्मिनल के संचालकों, सीमा झ्र शुल्क से जुड़ी एजेंसियों और अन्य हितधारकों के साथ साझा किये जाते हैं।दूसरी ओर, संबंधित एजेंसियों द्वारा कठिनाई पैदा करने वाले बिंदुओं और सुधार की जरूरत वाले क्षेत्रों की पहचान करने हेतु नियमित विश्लेषणों का उपयोग किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों के एलडीबी के आंकड़ों के विश्लेषण से यह पता चलता है कि कंटेनरों की निकासी मामले में आईसीडी और सीएफएस के प्रदर्शन में सुधार के अलावा कंटेनर को संभालने से जुड़े प्रदर्शन, सड़क मार्ग से गुजरने वाले कंटेनरों की निकासी, प्रमुख राजमार्गों पर कंटेनर की गति के मामले में भी सुधार हुआ है। दिल्ली-मुंबई मार्ग और मुंद्रा बंदरगाह को जोड़ने वाले मार्ग जैसे प्रमुख राजमार्गों पर कंटेनर की गति भी 2018 की तुलना में बेहतर हुई है। आज, एलडीबी ने दक्षता के साथ सीमा पार व्यापार को सुनिश्चित करने के लिए न केवल नेपाल एवं बांग्लादेश की सीमाओं तक अपनी सेवाओं का विस्तार किया है, बल्कि वह भारत के एक्जिम कंटेनरों की आवागमन के दौरान ठहराव वाले पहले अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह तक निगरानी रखने के लिए समुद्री ट्रैकिंग प्रणाली का भी उपयोग करता है। इसके अलावा, हमारे एफटीए को समान अंतरराष्ट्रीय प्रणालियों के साथ एकीकृत करके लाभ उठाने की संभावना तलाशना हमारे आगे के कदमों का हिस्सा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि निर्यात कंटेनर पूरी दक्षता के साथ अंतिम गंतव्य तक पहुंचें और इससे हमारे व्यापार को बढ़ावा मिले।यह तेज गति से चलने वाले लेन में एक लंबी यात्रा की शुरुआत मात्र है। लॉजिस्टिक्स इको सिस्टम में सुधार के लिए भारत में नवीन डिजिटल प्रौद्योगिकियों का उपयोग गति में और तेजी लायेगा तथा सोने पर सुहागा की स्थिति बनाते हुए अगले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर हमारी लॉजिस्टिक्स रैंकिंग को भी बेहतर करेगा। यह गति निश्चित रूप से 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के हमारे महत्वाकांक्षी लक्ष्य को साकार करने में मदद करेगी। (लेखिका, भारत सरकार के लॉजिस्टिक्स, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में विशेष सचिव हैं।)

मुकदमों का अंबार, न्याय के मंदिरों की समस्याएं अपार
Published / 2023-07-16 21:20:24
मुकदमों का अंबार, न्याय के मंदिरों की समस्याएं अपार

विश्व अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस/ 17 जुलाई पर विशेष रमेश सर्राफ धमोरा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। न्याय शब्द आशा और उम्मीद का प्रतीक है। जब किसी को लगता है कि उसकी बात अच्छी तरह सुनी जायेगी तथा उसे अपनी बात कहने का पूरा अवसर मिलेगा, तो वह न्याय है। न्याय शब्द एक नई रोशनी लेकर आता है। व्यक्ति के मन में एक उम्मीद जगाता है कि उसकी बात को पूरी तरह सुनकर ही निर्णय किया जाएगा। न्याय एक बहुत ही सम्मानित वह संतुष्टि प्रदान करने वाला शब्द है। आज भी जब दो व्यक्तियों के बीच में झगड़ा होता है तो दोनों एक दूसरे से कहते हैं कोर्ट में आ जाना फैसला हो जाएगा। यह लोगों की न्याय के प्रति आस्था का एक जीता जागता उदाहरण है। न्याय पाना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है। कोई भी सरकार या व्यवस्था तभी सफल मानी जाती है, जिसमें हर व्यक्ति को निष्पक्ष रूप से न्याय मिल सकें। हमारे देश में तो सदियों से न्यायिक प्रणाली बहुत मजबूत रही है। रजवाड़ों के जमाने की न्याय प्रक्रिया के उदाहरण हम आज भी देते हैं। भारत के महान सम्राट राजा विक्रमादित्य की न्याय प्रणाली की आज भी हर जगह चर्चा और सराहना होती है।हमारा देश जब स्वतंत्र हुआ तो संविधान के निर्माताओं ने न्यायपालिका को कार्यपालिका और विधायिका से अलग रखा। न्याय के लिए सशक्त कानून बनाए गए। देश के लोगों को सही व निष्पक्ष न्याय मिल सके इसके लिए लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की स्थापना की गयी। देश में न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उदाहरण इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते आया फैसला है। उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पद के अयोग्य ठहरा दिया था। इससे अधिक न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मजबूती कहां देखने को मिल सकती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के शासन के तहत अदालतों को न्याय एवं अन्याय में फर्क करने का अधिकार हासिल है। सही क्या है तथा गलत क्या है यह अदालत विधान की पुस्तकों के आधार पर तय करती हैं। आज लंबित मामलों की संख्या को देखकर कहा जा सकता है, इंसाफ चाहने वाले पीड़ित लोगों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। देश की विधायी व्यवस्था में न्याय की शीर्षस्थ संस्था न्यायालय हैं। हर साल दुनिया भर के लोग 17 जुलाई को इस दिवस को मनाते हैं। यह दुनिया में आधुनिक न्यायालय प्रणालियों की स्थापना का भी स्मरण कराता है। यह दिन मौलिक मानवाधिकारों की वकालत और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। 17 जुलाई 1998 को 120 से अधिक देश अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के लिए रोम संविधि नामक एक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए एक साथ आए थे। यह न्यायालय सबसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों वाले व्यक्तियों का विश्लेषण करता है और उन पर आरोप लगाता है। इनमें नस्लीय हत्या, युद्ध अपराध, मानवता के अपराध और आक्रामकता के अपराध शामिल हो सकते हैं। बहुत से लोगों से अक्सर यह सवाल सुनने को मिलता है कि न्याय कहां मिलता हैं। इस प्रश्न का होना भी यह बताता है कि आज भी आम आदमी को आसानी से न्याय नहीं मिल पा रहा हैं। न्याय के बारे में एक पुरानी अंग्रेजी कहावत है कि न्याय में देरी करना न्याय को नकारना है और न्याय में जल्दबाजी करना न्याय को दफनाना है। यदि इस कहावत को हम भारतीय न्याय व्यवस्था के परिपेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि इसका पहला भाग पूर्णत: सत्य प्रतीत होता है। सीमित संख्या में हमारे जज और मजिस्ट्रेट मुकदमों के बोझ तले दबे प्रतीत होते हैं। एक मामूली विवाद कई सालों तक चलता है तथा पीड़ित को दशकों तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है। यही वजह है कि लोगों में न्याय के प्रति गहरे असंतोष के भाव हैं। बावजूद इसके आज भी न्यायपालिका परेशान लोगों के लिए सांत्वना का माध्यम है। निराश लोगों के लिए आशा की किरण है। गलत काम करने वाले लोगों के लिए भय का कारण है। यह बुद्धिमान और संवेदनशील लोगों के लिए मंदिर समान है। एक ऐसी शरण स्थली है जहां गरीब और अमीर दोनों को ही आसानी से न्याय मिलता है। न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठने वाले लोगों के लिए यह एक सम्मान और गर्व का स्थान होता है। परंतु आज के समय में गरीब लोगों की न्यायालय में पहुंच बहुत कम हो गयी है। धूर्त लोग न्यायालयों का दुरुपयोग समाज के सम्मानित लोगों के विरुद्ध हथियार के रूप में करने लगे हैं। संविधान ने न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी अदालतोंं पर डाल दी है। वे ही न्याय के एकमात्र एवं सर्वोपरि स्रोत माने जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत के उच्च न्यायालय एक मुकदमे का निर्णय सुनाने में लगभग चार वर्ष से अधिक का समय लेते हैं। निचली अदालतोंं का हाल तो और खराब हैं। जिला कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक चलने वाले एक मुकदमे का अंतिम फैसला 7 से 10 साल में आता है। लोगों का मानना है कि भारत की न्याय प्रणाली में अधिक समय खर्च होने का मूल कारण मामलों की अधिकता है। लेकिन असल समस्या है मामलों का शीघ्र निपटान न हो पाना। केवल यह कहकर कि हमारे न्यायिक तंत्र में खामियां बताकर उसे कोसते रहना उचित नहीं हैं। देश दे सभी सभी नागरिकों, जजों, वकीलों तथा हमारी सरकारों का यह दायित्व है कि न्याय व्यवस्था को दुरुस्त किया जाये। (लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

जमीनी हकीकत : जलवायु परिवर्तन और धन संबंधी प्रश्न
Published / 2023-07-12 22:04:38
जमीनी हकीकत : जलवायु परिवर्तन और धन संबंधी प्रश्न

जलवायु परिवर्तन दुनिया के सबसे गरीब देशों में गरीब लोगों को सबसे बुरी तरह प्रभावित करता हैसुनीता नारायण एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया मौसम की अतियों की मार झेल रही है। यह बात भी स्पष्ट है कि इस तबाही का असर भी असमान है। यह दुनिया के सबसे गरीब देशों में गरीब लोगों को सबसे बुरी तरह प्रभावित करती है। क्लाइमेट फाइनैंस या जलवायु वित्त केवल वह भुगतान या हजार्ना नहीं है जो जलवायु परिवर्तन के इन विपरीत और असंगत प्रभावों को कम करने के काम आये। बल्कि इसका संबंध उस बदलाव के लिए धन मुहैया कराना भी है जिसकी इन देशों को विकास की प्रक्रिया में जरूरत है। उन्हें अलग तरह के विकास की आवश्यकता है ताकि वे बिना अधिक उत्सर्जन के आगे बढ़ सकें। यही वजह है कि जलवायु न्याय इतना अधिक मायने रखता है। जलवायु न्याय शब्द का सबसे पहली बार इस्तेमाल सन 1992 में यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन आन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) में किया गया था। वहां इस बात पर सहमति बनी थी कि ऐतिहासिक रूप से वातावरण को प्रदूषित करने वाले देशों को उत्सर्जन कम करने की आवश्यकता है। इस बात पर भी सहमति बनी थी कि शेष विश्व जिसे विकास का अधिकार था उन्हें वित्तीय मदद और तकनीकी मदद मुहैया कराई जाएगी ताकि वे टिकाऊ वृद्धि हासिल कर सकें। बहरहाल, बीते 30 वर्षों से अधिक समय में दुनिया में अनगिनत जलवायु सम्मेलन हुए हैं और इनका इरादा प्राय: इस सिद्धांत को शिथिल करने या समाप्त करने का रहा है। परंतु बदलती जलवायु की तरह ही समता का मुद्दा भी खत्म होने वाला नहीं है। आज, दुनिया की आबादी का 70 फीसदी हिस्सा अपनी बेहतरी के लिए ऊर्जा या अन्य अनिवार्य आवश्यकताओं के मामले में सुरक्षित विकास नहीं हासिल कर सका है। इस बीच दुनिया का वह कार्बन बजट लगभग समाप्त हो गया है जो दुनिया की तापवृद्धि को औद्योगिक युग के पूर्व के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित रखने के लिए आवश्यक था। अब यह भी स्पष्ट है कि 2009 में सालाना जिस 100 अरब डॉलर राशि का वादा किया गया था और जो अब तक भ्रामक बनी हुई है, वह राशि भी शायद अपर्याप्त साबित होगी। वैसे भी उसे हासिल करने में काफी देर हो चुकी है। हकीकत में एक अलग तरह का सुरक्षित भविष्य हासिल करने के लिए बहुत बड़ी धनराशि की आवश्यकता है। ऐसे में हमें तेजी से पैसे जुटाने की आवश्यकता है। परंतु केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। हमें ढांचागत मुद्दों पर भी विमर्श करना होगा जिनमें वैश्विक असमानता शामिल है। इस असमानता के कारण यह लगभग तय है कि दुनिया के गरीब देश उत्सर्जन में कमी की कीमत नहीं चुका पाएंगे। मेरे सहयोगियों ने एक रिपोर्ट तैयार की है जिसका शीर्षक है- बियॉन्ड क्लाइमेट फाइनैंस। यह रिपोर्ट इस मसले को सुलझाने में मदद करती है। हम जानते हैं कि जलवायु वित्त के नाम पर एकत्रित की गई धनराशि अपर्याप्त है। हमें पता है कि जलवायु वित्त से दुनिया का क्या तात्पर्य है इसकी कोई ऐसी परिभाषा नहीं है जिस पर सभी सहमत हों। परंतु हम यह नहीं जानते हैं या इस बात पर चर्चा नहीं करते हैं कि जलवायु वित्त के नाम पर जो भी राशि दी जा रही है वह किसी किस्म की रियायत नहीं है। इस राशि में बमुश्किल 5 फीसदी अनुदान है जबकि शेष ऋण या इक्विटी के रूप में है। ऐसे में आश्चर्य की बात नहीं है कि जिसे जलवायु वित्त का नाम दिया जा रहा है वह उन देशों को नहीं मिलने वाला है जिन्हें उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। आश्चर्य की बात नहीं है कि ये फंड वहां जाते हैं जहां पैसे बनाने की संभावना अधिक हो, जहां वित्तीय बाजार स्थिरता को खतरा कम हो और जहां वित्त की लागत कम हो। एक सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने पर यूरोप में उसकी ब्याज लागत 2-5 फीसदी होती है, ब्राजील में यह 12-14 फीसदी और कुछ अफ्रीकी देशों में यह 20 फीसदी तक होती है। ऐसे में जाहिर है ब्राजील और अफ्रीका में संयंत्र लगाना व्यावहारिक नहीं होगा। परंतु ज्यादा बुरी बात यह है कि अगर यह पैसा ऊंची ब्याज दर वाले ऋण के रूप में अफ्रीका जाता है, जो कि अनिवार्य तौर पर होता है तो बस उन देशों की ऋण चुकाने की समस्या में ही इजाफा होगा। विभिन्न देश कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट नहीं कर सकते हैं क्योंकि वैसा करने से उनकी क्रेडिट रेटिंग खराब हो सकती है। परंतु जलवायु परिवर्तन उनकी स्थिति को और खराब कर देगा क्योंकि सर्वाधिक संवेदनशील देश वे हैं जिन पर कर्ज का बोझ अधिक है। जलवायु परिवर्तन की हर आपदा इन देशों को और अधिक कर्ज के बोझ में डुबा देती है क्योंकि वे अपने आप को बचाने के लिए हर बार नया कर्ज लेते हैं। इस बीच इन देशों की क्रेडिट रेटिंग खराब कर दी जाती है और उनकी ऋण की लागत और बढ़ जाती है। यहां मैं वैश्विक रेटिंग प्रणाली में निहित पूर्वग्रहों की बात नहीं कर रहे हैं लेकिन इन्हें इसी तरह तैयार किया गया है कि तमाम देश नाकाम हो जायें। आज मुश्किल से गुजर रहे अधिकांश देश जिन्हें उत्सर्जन कम करने के लिए भी धन चाहिए। उनका कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। वे वार्षिक ब्याज के रूप में जो राशि चुकाते हैं वह 2023 में उनके सरकारी राजस्व के 16 फीसदी तक थी। जाहिर है अब हम छोटे बदलावों की बात नहीं कर सकते हैं। ऐसे भी प्रस्ताव हैं जिनके मुताबिक रियायती वित्त व्यवस्था के लिए नई धनराशि तलाश की जा सकती है। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है ब्रिजटाउन एजेंडा। बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोट्टली ने इस बारे में स्पष्ट आह्वान किया है। हमें जल्दी जवाब चाहिए। लब्बोलुआब यह है कि जलवायु वित्त की यह प्रवृत्ति बदलनी होगी जहां अब तक वह केवल विभिन्न देशों का कर्ज बढ़ाने का काम कर रहा था और उन्हें अगली त्रासदी के लिए और मुश्किल में डाल रहा था। ऐसे में अब जरूरत इस बात की है कि जलवायु परिवर्तन जैसे इस बड़े संकट के लिए वाकई धन जुटाया जाये।

नीरज चोपड़ा और फुटबॉल में खिताबी जीत से भारतीय खिलाड़ियों का हौसला बुलंद
Published / 2023-07-07 19:21:18
नीरज चोपड़ा और फुटबॉल में खिताबी जीत से भारतीय खिलाड़ियों का हौसला बुलंद

आरके सिन्हाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। पिछले दिनों खेल जगत से आई दो खबरों ने हरेक भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। पहली खबर थी कि ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा ने इस साल का दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए लुसाने डायमंड लीग भी जीत लिया। नीरज चोपड़ा ने 87.66 मीटर भाला फेंककर पहला स्थान हासिल किया। चोट के बाद भी वापसी करते हुए नीरज चोपड़ा ने दूसरा डायमंड लीग जीता। इससे पहले दोहा डायमंड लीग में उसने 88.67 मीटर भाला फेंका था। दूसरी खुशी दी भारत की फुटबॉल टीम ने। भारत ने कुवैत को हराते हुए नौवीं बार सैफ फुटबॉल चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम पर कर लिया । दोनों ही टीमें 90 मिनट के बाद भी एक्स्ट्रा टाइम तक 1-1 के स्कोर पर बराबर थीं । ऐसे में मैच का नतीजा पेनल्टी शूटआउट से निकला, जहां भारत ने अपने घरेलू दर्शकों के बीच कुवैत को 5-4 से हराया। इससे पहले सेमीफाइनल में भी भारत ने लेबनान को पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से हराया था।भारत को खेल के मैदान में चौतरफा मिल रही सफलताएं साबित करती हैं कि भारत में खेलों पर सरकार और निजी क्षेत्र पर्याप्त ध्यान दे रहा है। ये दोनों खेलों के विकास पर इनवेस्ट भी कर रहे हैं। ये कोई बहुत पुरानी बातें नहीं हैं जब अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजनों में भारत की लगभग सांकेतिक उपस्थिति ही रहा करती थी। हम हॉकी में तो बेहतर प्रदर्शन कर लिया करते थे, पर शेष खेलों में हमारा प्रदर्शन प्राय: औसत ही रहता था। हमारे खिलाड़ियों-अधिकरियों की टोलियां बड़े खेल आयोजनों में जाकर खाली हाथ वापस आ जाया करती थी। हिन्दुस्तानी खेल प्रेमियों की निगाहें तरस जाती थीं, एक अदद पदक को देखने के लिए। पर गुजरे एक दशक से स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हम बैडमिंटन जैसे खेल में विश्व चैंपियन बनने लगे हैं, हमारा धावक ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतता है और क्रिकेट में तो हम विश्व की सबसे बड़ी शक्ति हैं ही। हमारी बेटियां वेट लिफ्टिंग तथा कुश्ती जैसी स्पधार्ओं में देश की झोली पदकों से भर देती हैं। हम बड़े खेल आयोजन भी कर रहे हैं। हमने पिछले साल चेन्नई में 44वें शतरंज ओलंपियाड का आयोजन किया। जो पहली बार भारत में हुई। शतरंज ओलंपियाड चेन्नई से 50 किलोमीटर दूर मामल्लापुरम में हुआ और इसमें रिकॉर्ड खिलाड़ियों ने भाग लिया। नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक खेलों में भारत को गोल्ड मेडल दिलवाया। उनकी उपलब्धि पर सारा देश गर्व कर रहा है। हमने 2022 में थॉमस कप जीता था। लक्ष्य सेन, किदांबी श्रीकांत, एच एस प्रणय और सात्विक साईराज, रंकी रेड्डी-चिराग शेट्टी ने जो धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया उसने उस धारणा को धराशायी कर दिया कि भारतीय खेलों के लिए नहीं बने हैं।लंबे समय से हम भारतीयों ने अपने मन में इन भ्रांतियों को पनपने भी दिया। कहा जाता रहा है कि भारतीयों में वह जीतने वाला दम-खम नहीं होता। हम सिर्फ देश में ही अच्छा खेलते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेकार साबित होते हैं। अफसोस कि हमने खुद दूसरों को अपने ऊपर हंसने का पूरा मौका दिया है। हमने इस साल ओडिशा में विश्व हॉकी चैंपियनशिप को भी आयोजित किया। अब हम विश्व कप क्रिकेट चैंपियनशिप की भी मेजबानी करने जा रहे हैं। 2023 क्रिकेट विश्व कप आईसीसी क्रिकेट विश्व कप का 13वां संस्करण होगा, जिसे अक्टूबर और नवंबर 2023 के दौरान आयोजित किया जाना है।यह पहली बार होगा जब प्रतियोगिता पूरी तरह से भारत में आयोजित की जानी है।पिछले तीन संस्करणों 1987, 1996 और 2011 में भारत आंशिक रूप से मेजबान था। मूल रूप से, टूर्नामेंट 9 फरवरी से 26 मार्च 2023 तक खेला जाना था। लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण जुलाई 2020 में, तिथियों को अक्टूबर और नवंबर में स्थानांतरित कर दिया गया। याद कीजिये कि हमने कुछ साल पहले फीफा अंडर 17 विश्व कप का भी आयोजन किया था।बहरहाल, ये कहना पड़ेगा कि भारत खेलों में चौतरफा स्तर पर आगे बढ़ रहा है। हमारे खिलाड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज कर रहे हैं। हम अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजन भी सफलतापूर्वक तरीके से आयोजित कर रहे हैं। पर मुझे एक बात कहने दें कि हमें अपने बड़े-विशाल स्टेडियमों का सही से इस्तेमाल करने पर फोकस करना होगा। मतलब ये कि इनमें युवा उदीयमान खिलाड़ी आराम से आकर अभ्यास कर सकें। देश की राजधानी दिल्ली में 1951 के पहले एशियाई खेलों के बाद 1982 में एशियाई खेल हुए और फिर 2010 में कॉमनवेल्थ खेल आयोजित किए गए। इनके आयोजन पर हजारों करोड़ रुपया खर्च हुआ ताकि विभिन्न स्टेडियम आदि बन सकें। 1982 के एशियाई खेलों के सफल आयोजन के लिए जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, इंदिरा गांधी स्टेडियम, करणी सिंह शूटिंग रेंज वगैरह का निर्माण हुआ था। कॉमनवेल्थ खेलों के समय पहले से बने स्टेडियमों को नये सिरे से विकसित किया गया। पर इतने भव्य आयोजनों के बाद भी दिल्ली से विभिन्न खेलों में श्रेष्ठ खिलाड़ी नहीं निकल पाये। दिल्ली को लघु भारत भी कहा जा सकता है। यहां देशभर के भारतीय नागरिक रहते हैं। यह स्थिति अफसोसजनक है कि दिल्ली से भारत को नामवर खिलाड़ी नहीं मिल रहे हैं। इसके साथ ही एक राय ये भी है कि राजधानी में जो बड़े-बड़े स्टेडियम बने उनमें खिलाड़ियों को आराम से प्रैक्टिस की सुविधा नहीं मिल पाती। यह स्थिति फौरन खत्म होनी चाहिए। देश के बाकी सभी शहरों-महानगरों में बने स्टेडियमों को खिलाड़ियों से दूर रखने का क्या मतलब है। मुझे एक बार राजधानी के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में कुछ अफ्रीकी नौजवान मिले। वे सब भारत में पढ़ रहे थे। वे अफ्रीकी नौजवान स्टेडियम के बाहर व्यायाम कर रहे थे। मैंने उनसे कहा कि हम बेहतर खिलाड़ी इसलिए नहीं निकाल पाते क्योंकि हमारे यहां विश्व स्तरीय स्टेडियम नहीं है। मेरी बात को सुनकर वे दो-तीन अफ्रीकी मुस्कराते हुए जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम की तरफ इशारा करते हुए कहने लगे- इस तरह का शानदार स्टेडियम आपको सारे अफ्रीका में कहीं भी नहीं मिलेगा। हमारे खिलाड़ी जीतते हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वे मैदान में जीत के जज्बे के साथ उतरते हैं। संयोग से अब हमारे खिलाड़ियों के पास जीत का जज्बा और सुविधाएं दोनों हैं। उन्हें अब बस शिखर को छूना है। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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