बाल विवाह मुक्त भारत का खाका पेश करती एक किताबएबीएन सोशल डेस्क। एक सामाजिक मुद्दे पर लिखी गई किताब का छपने के चंद हफ्तों के भीतर इतना व्यापक असर और इसमें बतायी गयी रणनीतियों पर जमीनी स्तर से लेकर सरकारी गलियारों तक अमल एक दुर्लभ घटना है। अक्टूबर के पूर्वार्ध में आई किताब व्हेन चिल्ड्रेन हैव चिल्ड्रेन : टिपिंग प्वाइंट टू इंड चाइल्ड मैरेज ने बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में जुटे जमीनी कार्यकर्ताओं और अन्य हितधारकों में यह विश्वास जगाने में सफलता पायी है कि इस बुराई का अंत निकट है। इस किताब में सुझायी गयी रणनीतियों से चंद हफ्तों में ही उनके अभियान को नयी धार मिली है। प्रख्यात बाल अधिकार कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता भुवन ऋभु द्वारा लिखी गयी यह किताब संयुक्त राष्ट्र के इन अनुमानों से असहमति जताती है कि देश 2050 तक कहीं जाकर बाल विवाह के खात्मे के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के करीब पहुंचेगा। इसके विपरीत यह किताब 2030 तक ही इस लक्ष्य को हासिल करने की बात करती है और इसके लिए ठोस रणनीतिक योजना और समग्र रूपरेखा पेश करती है। इस किताब का 11 अक्टूबर 2023 को पूरे देश में एक साथ 250 जिलों में लोकार्पण किया गया और अब यह जमीनी स्तर पर बाल विवाह के खात्मे के लिए काम रहे 160 से ज्यादा संगठनों के लिए इस लड़ाई में पथप्रदर्शक की भूमिका में है।इतना ही नहीं, विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों, बाल विवाह निषेध अधिकारियों और कुछ राज्यों के मुख्य सचिवों ने पत्र जारी कर विभिन्न सरकारी विभागों को इस किताब की सिफारिशों और बाल विवाह की रोकथाम के लिए सुझाई गई रणनीति पर अमल की ताकीद की है। व्हेन चिल्ड्रेन हैव चिल्ड्रेन सतत, समग्र, समन्वित और लक्ष्य केंद्रित उपायों से एक तय समयसीमा में लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पिकेट रणनीति के जरिये बाल विवाह के खात्मे की रूपरेखा पेश करती है। हर साल लाखों ऐसी किशोरियां जिन्हें स्कूल में होना चाहिए था, भविष्य के सुनहरे सपने बुनने चाहिए थे, बाल विवाह के नर्क में धकेल दी जाती हैं जहां उनके हिस्से में आता है सिर्फ बलात्कार, उत्पीड़न और शोषण। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में रोजाना 17 साल से कम उम्र की 4,442 लड़कियों को शादी का जोड़ा पहना दिया जाता है। उधर, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रपट के अनुसार देश में रोजाना बाल विवाह के सिर्फ तीन मामले ही थाने पहुंच पाते हैं। जनगणना और एनसीआरबी के आंकड़ों में जमीन-आसमान का यह फर्क चिंता का विषय है। लेकिन इस किताब में बताई गई व्यावहारिक रणनीतियां और ईकोसिस्टम यानी पारिस्थितिकी स्तरीय दृष्टिकोण की पैरोकारी यह भरोसा जगाती है कि भारत के लिए बाल विवाह की मौजूदा 23.5 फीसदी दर को 2030 तक 5.5 फीसदी तक लाना असंभव नहीं है। यह जादुई संख्या वो देहरी है जहां से लक्षित हस्तक्षेपों की आवश्यकता खत्म हो जायेगी और बाल विवाह का चलन अपने आप खत्म होने लगेगा।पिकेट रणनीति सरकार, समुदायों, गैर सरकारी संगठनों से और बाल विवाह के लिहाज से संवेदनशील बच्चियों के लिए नीतियों, निवेश, संम्मिलन, ज्ञान-निर्माण और एक पारिस्थितिकी जहां बाल विवाह फल-फूल नहीं पाए और इसकी रोकथाम के लिए निरोधक और निगरानी तकनीकों पर एक साथ काम करने का आह्वान करती है।पिकेट रणनीति बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई को एक रणनीतिक औजार मुहैया कराने के साथ-साथ तमाम हितधारकों के विराट लेकिन बिखरे हुए प्रयासों को एक ठोस आकार और दिशा देती है। व्हेन चिल्डेन हैव चिल्ड्रेन ने बाल विवाह मुक्त भारत अभियान में एक नयी उर्जा का संचार किया है। बाल विवाह के अभिशाप को खत्म करने के लिए देश भर के 160 से ज्यादा गैरसरकारी और नागरिक संगठन बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के तहत एक मंच पर आये हैं और बाल विवाह की सबसे ज्यादा दर वाले देश के 300 जिलों में इसके खिलाफ अभियान चला रहे हैं। इन सभी संगठनों और तमाम अन्य हितधारकों ने किताब में पेश किये गये रोडमैप और व्यवहार्य रणनीतियों की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए इसे बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में एक ऐसे सशक्त हस्तक्षेप के रूप में स्वीकार किया है जो न सिर्फ बच्चों के साथ हो रहे अपराध को विमर्श के केंद्र में लाती है, बल्कि इसके समाधान की एक ठोस रूपरेखा भी पेश करती है। इसलिए व्हेन चिल्डेन हैव चिल्ड्रेन को महज एक किताब के बजाय एक जीवंत और सामयिक दस्तावेज के तौर पर देखना उचित होगा, जो सामाजिक बदलाव के लिए एक पथप्रदर्शक का भी काम करती है।
आरके सिन्हाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। अभी कुछ दिन पहले की एक खबर ने लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन रखने वाले हरेक इंसान को उदास कर दिया होगा। खबर संभवत: आपने भी पढ़ी होगी। अगर किसी कारणवश नहीं पढ़ी तो बताना जरूरी है कि मध्य प्रदेश के जिला सीहोर में एक मुस्लिम महिला को उसके ससुराल वालों ने इसलिए बुरी तरह पीटा, क्योंकि, उसने भाजपा को हालिया विधानसभा चुनाव में वोट दिया था।उस महिला को पीटने वालों में उसका अपना देवर भी शामिल था। उसे जब पता चला कि उसके भाई की पत्नी ने भाजपा के हक में वोट किया है तो उसने अपनी भाभी को बुरी तरह से डंडों से मारा। उसका कुछ संबंधियों और पड़ोसियों ने भी साथ दिया। इसके बाद पीड़ित महिला न्याय के लिए कलेक्ट्रेट पहुंची और वहां आवेदन सौंपकर न्याय की गुहार लगायी। अब जरा बताइये कि भाजपा के खिलाफ इतनी नफरत कुछ लोगों के मन में क्यों है?देश का कोई भी नागरिक किसी भी दल के उम्मीदवार को वोट देने के लिए स्वतंत्र है। ये अधिकार देश का संविधान सभी को देता है। तब किसी को भी इस बात के लिए तकलीफ क्यों हो रही है कि उसके परिवार में किसने फलां-फला दल के पक्ष में मतदान क्यों किया। दरअसल भाजपा सरकार से कुछ कठमुल्लों को इसलिए नाराजगी है क्योंकि उसने (भाजपा) ने मुसलमानों में ट्रिपल तलाक और हलाला जैसे अमानवीय परम्परा को खत्म करने के लिए बड़े कदम उठाये। इन कठमुल्लों की घोर महिला विरोधी सोच को जहां से भी ललकारा जाता है, तो ये पागलपन पर उतरने लगते हैं, बेवजह हिंसक हो उठते हैं। मुझे याद आ रहा है जब कुछ समय पहले मुंबई में उन मुस्लिम महिलाओं के साथ भी इसी तरह मारपीट और धक्कामुक्की की गयी जो ट्रिपल तलाक के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चला रही थीं। उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दी गईं कुछ सड़क छाप मुस्लिम नेताओं और उनके चेलों द्वारा। इन लफंगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाने वाली महिलाओं पर इस्लाम विरोधी होने तक का आरोप भी लगा दिया था।अब मध्य प्रदेश की ताजा घटना को देखिये। हैरानी की बात ये है कि कोई भी मुस्लिम संगठन या अपने को मुसलमानों का नेता कहने वाला उस महिला के साथ खड़ा नहीं हो रहा है जिसके साथ मारपीट की गई है। अपने को मुसलमानों का शुभचिंतक बताने वाली तीस्ता सीतलवाड़ ने उस दीन-हीन महिला के हक में कोई बयान तक नहीं दिया है। वे तमाम लेखक और कैंडल मार्च निकालने वाले बुद्धिजीवी भी नदारद हैं जो बात-बात पर दीन-हीन मुसलमान औरतें का साथ देने के लिए तैयार रहते हैं। भाजपा को हर वक्त बुरा-भला कहने वाले यह तो अब जान लें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अपने अभी तक के शासनकाल में औरतों के हक में तमाम बड़ी योजनाएं लागू की हैं और करते ही चले जा रहे हैं। उनका लाभ मुसलमान औरतों को भी हो रहा है, क्योंकि, मोदी जी के शासन में जाति धर्म के आधार पर कोई भेदभाव तो है ही नहीं। इसलिए मुसलमान औरतें की मोदी सरकार और भाजपा को लेकर राय बदली है। प्रधानमंत्री मोदी अपने अधिकांश संबोधनों में महिलाओं के सशक्तीकरण पर जोर देते हैं। मोदी सरकार युवाओं के साथ-साथ महिलाओं के विकास पर भी जोर दे रही है। उसकी तीन योजनाओं के फलस्वरूप महिलाओं को आर्थिक तौर पर मजबूती मिली है। पहले बात की शुरुआत उज्जवला योजना 2023 से ही करते हैं। प्रदूषण को कम करने व महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की योजनाओं को संचालन किया जा रहा है। इसी कड़ी में केंद्र सरकार द्वारा उज्जवला योजना लॉन्च की गयी। इस योजना के माध्यम से देश की महिलाओं को निशुल्क गैस सिलेंडर उपलब्ध करवाये जाते हैं। इस योजना के अंतर्गत देश के 8.3 करोड़ परिवारों को लाभ पहुंचा है। जाहिर है, इस योजना से जिन औरतों को लाभ हो रहा है उनमें मुसलमान और ईसाई महिलाएं भी हैं। क्या जिन्हें उज्जवला योजना से लाभ होने लगा है वह मोदी सरकार का बिना वजह विरोध करेंगी? अब बात करें फ्री सिलाई मशीन योजना की। इस योजना के अंतर्गत देश की तमाम महिलाओं को फ्री सिलाई मशीन प्रदान की जायेगी, जिसके जरिए महिलाएं आसानी से घर बैठे रोजगार प्राप्त कर सकती हैं और जीवन का गुजर-बसर कर सकती हैं। अब मोदी सरकार की सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन योजना की बात कर लें। सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन योजना की शुरुआत 10 अक्टूबर 2019 को ही की गयी थी। इस योजना के तहत गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की जीवन सुरक्षा के लिए निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं सरकार देती है। इस योजना के जरिए सभी गर्भवती महिलाओं के प्रसव से पहले चार बार मुफ्त जांच का अधिकार है। इसके अलावा प्रसव के समय होने वाला सारा खर्च सरकार द्वारा उठाया जायेगा और प्रसव के बाद 6 महीने तक मां और बच्चे को निशुल्क दवाइयां भी उपलब्ध करायी जायेगी। जाहिर है, इन तमाम युगांतकारी योजनाओं का लाभ मुसलमान औरतों को भी तो हो रहा है।इसके साथ ही मोदी सरकार की पहल पर मुसलमान औरतों को तीन तलाक से मुक्ति मिली। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी आया। इसने मुसलमान औरतों को तीन तलाक की बर्बर कुप्रथा से मुक्ति दिलवा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान तीन तलाक पर रोक लगा दी। कहते हैं कि हैं कि न्याय अंधा होता है। वरना न्याय की देवी की दोनों आंख पर पट्टी नहीं बंधी होती। इसका पता चला गया। हालांकि, कई कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन ट्रिपल तलाक को जारी रखने की पुरजोर वकालत भी कर रहे थे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मुसलमान औरतों को जीवनदान दे ही दिया। इस फैसले के आने से पहले तक यह कहा जा रहा था कि ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही यह तय हो जायेगा कि मानवता जीतती है या मुस्लिम सांप्रदायिकता और अमानवीयता। एक बात समझ ली जाये कि अब मुस्लिम औरतें भी पढ़-लिख गयी हैं और जाग उठी हैं। वे भी अब गुलामी की जंजीर को तोड़ने का मन बना चुकी हैं। अब इन्हें नामंजूर है कि इनके शौहर या परिवार के बाकी सदस्य इन्हें अपना गुलाम बनाकर रखें। मध्य प्रदेश की उस बहादुर महिला के जज्बे को सलाम, जिसने अपने विवेक से अपने मताधिकार का प्रयोग किया और उन सबकी शिकायत की जिन्होंने उसके साथ मारपीट की। देश को ऐसी महिलाओं के साथ खड़ा होना होगा। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
डॉ हराधन कोईरी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति और संस्कार के उन्नायक कवि हैं। 12 दिसंबर को उनकी 59वीं पुण्यतिथि है। पुण्य तिथि के अवसर पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का पुनरावलोकन करने के साथ-ही उनके काव्यादर्शों को आत्मसात कर हिंदी साहित्य में फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय भावना, वैष्णवी आस्था और समन्वय की विराट चेष्टा है। समाज की उन्नति में पारिवारिक जीवन मूल्यों की बड़ी भूमिका होती है। गुप्त जी अपनी कविताओं में पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण के प्रति अधिक तत्पर दिखते हैं। उनकी यह तत्परता साकेत में सर्वत्र दिखाई पड़ती है, जिसके कारण उन्हें कौटुम्बिक कवि भी कहा गया है। वे सच्चे अर्थों में आस्था और विश्वास के कवि हैं। अपने काव्य गुरु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के उपकार को स्वीकारते हुए साकेत की भूमिका में लिखते हैं : करते तुलसीदास भी कैसे मानस नाद? यदि उन्हें महावीर का मिलता नहीं प्रसाद। गुप्त जी साहित्य में हो रहे उत्तरोत्तर परिवर्तनों को अभिव्यक्त करने में सफल कवि थे। उनकी इस कालानुसरण की क्षमता को देखते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है- गुप्त जी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। मैथिलीशरण गुप्त ने दो प्रबंध काव्य साकेत और जय भारत एवं उन्नीस खंड काव्यों की रचना की है। इसके पीछे द्विवेदी युगीन संस्कार और उनकी मयार्दावादी दृष्टिकोण रहा है। उनकी प्रसिद्धि का आधार ग्रंथ साकेत में उन्होंने रामकथा को दुहराया ही नहीं है बल्कि रामकथा का पुनर्मूल्यांकन किया है। इसके साथ ही उर्मिला और कैकेयी के जैसे उपेक्षित पात्रों को अपनी सहानुभूति से अधिक संवेदनशील और युगानुकूल बनाया है। चित्रकूट की सभा में कैकेयी कहती हैं - युग युग तक चलती रहे यह कठोर कहानी रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी। निज जन्म जन्म तक सुने जीव यह मेरा धिक्कार! उसे था महास्वार्थ ने घेरा। कैकेयी का यह चरित्र कवि की मौलिक प्रतिभा का परिचायक है। इतना ही नहीं गुप्त जी के राम वाल्मीकि और तुलसी के राम से भिन्न हैं। उनके राम इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आये हैं। राम स्वयं कहते हैं- मैं आया उनके हेतु जो कि तापित हैं, जो विवश, विकल, बलहीन, दीन, शापित हैं। भव में में नव वैभव व्याप्त कराने आया, नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया। मैथिलीशरण गुप्त को उपेक्षितों के कवि कहा गया है। उन्हें ऐसा कहना उचित भी है। उन्होंने भारतीय साहित्य में उपेक्षित नारी पात्रों को देखने की एक नई दृष्टि दी है। उसी का परिणाम है कि उनके प्रसिद्ध काव्य साकेत में उर्मिला के चरित्र को विशेष प्रतिष्ठित मिली है। वहीं यशोधरा काव्य में गौतम की पत्नी यशोधरा को। विष्णुप्रिया काव्य में चेतनदेव की पत्नी विष्णुप्रिया को और रत्नावली काव्य में तुलसीदास की पत्नी रत्ना आदि की वेदना को सशक्त सहानुभूति दी है। साथ -ही नारी स्वाभिमान की अभिव्यक्ति भी करायी है। यशोधरा अपनी सखियों से कहती हैं- सिद्धि हेतु स्वामी गये ये गौरव की बात पर चोरी चोरी गये, यह बड़ा व्याघात। आगे फिर यशोधरा कहती हैं। हम क्षत्राणी हैं और क्षत्रिय धर्म की निर्वाह करना जानते हैं। हमें दुख इस बात की है कि मेरे पति ने मुझे पहचाना परंतु जाना नहीं। यशोधरा कहती हैं- स्वयं सुसज्जित करके क्षण में प्रियतम को, प्राणों के पण में हमीं भेज देतीं हैं रण में, क्षात्र धर्म के नाते सखी, वह मुझसे कहकर जाते। कविवर मैथिलीशरण गुप्त साहित्य को केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं मानते हैं, बल्कि उसमें जीवन के लिए संदेश भी होना चाहिए। भारत-भारती में वे कहते हैं- केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।वे भारत की समृद्ध ज्ञान- विज्ञान की परम्परा का गौरव गान भी किया है। साथ-ही उन्होंने भारतीय ऋषि-मुनियों की उस सनातन परम्परा का उल्लेख किया है जो विश्व को बहुत कुछ दिया है। भारत-भारती के अतीत खंड मे वे लिखते हैं - संसार को हमीं ने ज्ञान भिक्षा दान की, आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की। भारतीय का अतीत बहुत ही गौरवशाली रहा है, किन्तु वर्तमान हमारा ठीक नहीं है। इसीलिए गुप्त जी अगाह करते हैं- देखो हमारा विश्व में नहीं उपमान था, नर-देव के हम और भारत? देवलोक समान था।आज हर क्षेत्र में मूल्यों का विघटन हो रहा है। ऐसे समय में मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों की कविताओं का दायित्व बढ़ जाता है। समाज में पढ़े लिखे लोग आजकल ऐसे असामाजिक तत्वों से जुड़ जाते हैं जहां से निकल पाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। मूल्यों का यह गिरावट अब साहित्यों में भी होने लगा है। साहित्य अब लोककल्याण की भावना से च्युत होकर स्वार्थ साधना व प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। ऐसे समय में गुप्त जी का साहित्य सर्वाधिक प्रासंगिक और पठनीय हो जाता है। वे भारत की भारतीयता बनी रहे इसके लिए भी सचेत करते हैं- हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी? आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।गुप्त जी उदार हृदय के कवि थे। समन्वय के कवि थे। इसलिए राम,श्याम और बुद्ध में भेद नहीं करते हैं। उन्होंने सिखों पर लिखा, इस्लाम पर लिखा,ईसा मसीह पर लिखा। वे सभी धर्मों और संप्रदायों के प्रति सहिष्णु थे। इसलिए वे हिंदी साहित्य जगत में राष्ट्र कवि, दद्दा, संस्कृति के व्याख्याता, मानवता के उदघोषक, आधुनिक तुलसी, उपेक्षितों के कवि, और युगद्रष्टा कवि आदि कहलाये। शांतिप्रिय द्विवेदी ने ठीक ही कहा है - किसी माला में प्रथम मणि उपवन में प्रथम पुष्प और गगन में प्रथम नक्षत्र का जो महत्वपूर्ण स्थान हो सकता है वही स्थान वर्तमान हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त का है। (लेखक गोस्सनर महाविद्यालय, रांची के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक हैं।)
कुलदीप तिर्कीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। इसाई धर्मावलंबी आगमन काल में प्रवेश कर चुके हैं और अपने पभु के जन्मोत्सव की तैयारी में लग गये हैं न सिर्फ बाह्य रूप से बल्कि आंतरिक रूप से भी कई बार हम अपने प्रभु की योजना को समझ नहीं पाते और उनसे दूर हो जाते हैं। तैयार एक छोटी सी कहानी से समझने का प्रयास करते हैं। एक बार एक अध्यापक कक्षा में विद्यार्थियों को तितली की इल्ली के बारे में पढ़ा रहे थे। उन्होंने उनसे कहा कि यह इल्ली दो घंटे बाद तितली में बदल जायेगी लेकिन इसके लिए उन्हें अपने खोल से बाहर आने में संघर्ष करना होगा। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि जब इल्ली बाहर निकलने की कोशिश करें तो कोई भी उस इल्ली की मदद न करें। यह कहकर वे कक्षा से बाहर चले गए। सभी विद्यार्थियों ने उसे ध्यान से देखना शुरू कर दिया। दो घंटे बाद इल्ली ने बाहर निकलने की कोशिश शुरू कर दी। उसे इतना संघर्ष करते हुए देख एक छात्र को उस पर दया आ गई और उसने इल्ली की सहायता करनी शुरू कर दी। तभी अध्यापक कक्षा में आ गये और उसे रोक दिया। वे विद्यार्थियों को समझाने लगे कि यदि इल्ली ने बाहर आने ने संघर्ष नहीं किया और बाहर आ गयी, तो यह मर जायेगी और इसके विपरीत यदि यह बिना सहायता के बाहर आयी तो बच जायेगी। अपने खोल से बाहर आने के लिए जो संघर्ष करती हैं, वह तितली के पंखों को मजबूत करता है। कई बार हमारे जीवन में तकलीफ आती है दु:ख आते हैं समस्याएं आती है और हम अपने सृष्टकर्ता को कोसते है उनसे दूर होने की योजना बनाने लगते है।आगमण काल हमे याद दिलाता है और संदेश देता है कि हमारे सृष्टकर्ता हमारी मजबूती के लिए हमारे जीवन में दु:ख तकलीफ देते हैं हमारी परीक्षा लेते हैं ताकि हम और मजबूत हो सकें उनपर भरोषा और विश्वास कर सकें। तभी क्रिसमस का असली आनंद हमारे जीवन में आयेगा। (लेखक रांची महाधर्मप्रांतीय यूथ कोर्डिनेटर हैं।)
कुटुंब प्रबोधन का प्रेरक श्रीराम परिवार एबीएन सोशल डेस्क। रामचरितमानस एक ओर राम का जीवन चरित्र व मनुष्य जाति के अनुभवों का उत्कट निचोड़ है तो दूसरी ओर यह नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद् होकर सनातन धर्म के सभी मानक ग्रंथों के अर्क स्वरूप भी है, जिसे मानस के अंत में छहों शास्त्र सब ग्रंथन को रस कह कर दोबारा पुष्ट कर दिया गया है। मनुष्य से पुरुषोत्तम बनकर यानी मृत्यु से अमरत्व की ओर बढ़ने की यात्रा के पथ प्रदर्शक श्रीराम हैं। अपने भीतर छुपी संभावना और सुख-शांति की अभीप्सा को पूरा कर सकने की आकांक्षा के बीच, रामचरितमानस में राम इस मार्ग का संकेत हैं कि मनुष्य के स्वरूप को चरितार्थ करने और उससे ऊपर उठने और अपने भीतर निहित संभावनाओं को साकार करने का कोई लघुमार्ग (शॉर्टकट) नहीं हैं। पारिवारिक, सामाजिक और लौकिक जीवन के कर्तव्य परायणता में राम ने अपने आचरण और व्यवहार से जो मानक स्थापित किये, उन मानकों में यह संभावना हमेशा निहित रही कि व्यक्ति का व्यवहार, परिस्थिति के अनुसार भले बदलता रहे, लेकिन उसका अंतरंग स्थिर रहे। मानव उन्हीं मूल्यों का प्रतिनिधित्व करे जो शाश्वत हो, जो मनुष्य और समाज के लिए हमेशा उपयोगी और ऊंचा उठाने वाले हों। उदाहरण के लिए परिवार को ही लें, राम में परिवार के अनुशासन, सबके प्रति विश्वास, एक-दूसरे के सुखों और इच्छाओं का निर्वाह और उनके लिए त्याग की भावना का महत्व रहा है। इन मूल्यों का निर्वाह रामचरित के हर प्रसंग में होता दिखाई देता है। क्षण भर में राजमुकुट धारण कर राजा राम बनने वाले वनवासी राम बनने हेतु बल्कल वस्त्र पहन लेते हैं और पिता के वचनों एवं माता कैकेयी के प्राप्त वरदान हेतु वन जाने हेतु निकल जाते हैं। व्यक्तिगत जीवन में राम ने एक ओर मर्यादाओं की प्रतिष्ठा की तो दूसरी ओर उन्होंने जहां जरूरी समझा। वहां मान्यताओं में दखल भी दिया। शूर्पणखा का अंग-भंग, अहिल्या को पुनर्जीवन और प्रतिष्ठा, एक पत्नीव्रत, बाली उद्धार, शबरी उद्धार, विभीषण को लंका का राज दे देना आदि कई प्रसंग हैं, जिनमें वह परंपरा से हटकर काम करते हैं। यह सब करते हुए वह धर्म-मर्यादा की स्थापना ही कर रहे होते हैं क्योंकि मर्यादा की स्थापना ही धर्म की शाश्वतता को बनाये रखती है।यदि यज्ञाग्नि भी मर्यादा का उल्लंघन करे तो उसे जल के द्वारा नियंत्रित करने का विधान धर्म का ही है। यदि इन कामों को पारिवारिक और सांस्थानिक रचनाओं के भरोसे छोड़ा जाता तो संभवत: पंचायतें, न्यायालय, दंडाधिकारी और समितियों को उन नतीजों पर पहुंचने में वर्षों लग जाते और न्याय की प्रक्रिया संपन्न होते- होते वह अर्थहीन व अनुपयोगी हो जाते।टूटते संयुक्त परिवारों का सहाराइन दिनों परिवार का ढांचा बदल रहा है, संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। कई जगह तो नौकरी के कारण पति-पत्नी और बच्चों के लिए भी अलग तरह से सोचना और व्यवस्था बनानी पड़ रही है। ऐसे में जब कि ज्ञान परंपरा का एक पीढ़ी से दूसरी में प्रवाह बाधित हो गया है तो राम का चरित्र, मूल्य, व्यवहार और आदर्शों की यशोगाथा को समेटे श्री रामचरितमानस/ रामायण जीवन का संविधान बन सकता है। आज के बड़े-बड़े फैमिली सलाहकार अपनी सलाह में परिवारों में यही अंतिम सत्य बताते हैं कि परिवार वह इकाई है जहां आप तर्कों और जय-पराजय से समाधान नहीं पा सकते अपितु त्याग के द्वारा कर्तव्य पालन करके ही सुख शांति प्राप्त करेंगे। यह मान्यता भारत में त्रेतायुग में ही प्रभु राम के जीवन से स्थापित हो चुकी थी।राम परिवार के आदर्श-स्नेह, सहयोग, सद्भाव और विश्वास को आधार बनाकर आपसी संबंधों, कर्तव्यों और दायित्वों को समझा और निबाहा जा सकता है। जब राम, लक्ष्मण और सीता वनवास संपन्न कर अयोध्याजी वापस आते हैं तो माता कौशल्या ने मिलते ही सबसे पहले लक्ष्मण से आकुल होकर पूछा कि मुझे दिखाओ तुम्हें शक्ति कहां लगी थी, पुत्र तुम्हें कितनी वेदना से गुजरना पड़ा ! लक्ष्मण जी ने इसका उत्तर दिया, वेदना राघवेन्द्रस्य केवलं व्रणिनो वयम (वाल्मीकि रामायण) अर्थात हमें तो केवल घाव हुआ था, वेदना तो बड़े भाई राम को हुई थी। बस यही राम का सार है की सभी एक-दूसरे के भाव, प्रेम, हर्ष और विषाद में एकरस हो जायें। राम जी के छोटे भाई भरत जी का चरित्र तो ऐसा है की कहीं-कहीं उनकी श्रद्धा, समर्पण और मर्यादा रूपी हिमालय के आगे रामजी लघु प्रतीत होते हैं। भाई की चरण पादुका से राज चलाना और स्वयं नंदीग्राम में भूमि पर सोना और पर्णकुटी में रहना। राम जी अपने भाई भरत को राजधर्म की सीख देते हुए कहते हैं की, मुखिआ मुखु सो चाहिए यानि मुखिया मुख के समान होना चाहिए, जो स्वयं के पोषण या सुख में अकेला है, परंतु विवेक पूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है। राम और भरत का चरित्र भरत-मिलाप प्रसंग में एक दूसरे के सामने ऐसे अडिग हैं की गोस्वामी तुलसीदास को लिखना पड़ता है धीर धुरंधर धीरजु त्यागा यानि भरत जी के असीम त्याग और मर्यादा के समक्ष धैर्य की धुरी धारण करने वाले श्रीराम को भी अपना धीरज प्रेमाश्रुओं के सामने तोड़ देना पड़ता है।अयोध्या के एक राजकुमार श्री राम द्वारा सुदूर वन में हनुमान को आभार व्यक्त करने के क्रम में कहा जाता है, मय्येव जीर्णतां यातु यत्त्वयोपकृतं हरे। नर: प्रत्युपकारार्थी विपत्तिमनुकाङ्क्षति॥ (हे कपिकुलनन्दन।) आपने जो मेरे साथ उपकार किया है वह मेरे में ही जीर्ण हो जाय (मुझमें पच जाय), बाहर अभिव्यक्ति का कोई अवसर ही न आवे, क्योंकि प्रत्युपकार करने वाला व्यक्ति अपने उपकारी के लिये विपत्ति की कामना करता है, जिससे उसे अपने प्रत्युपकार के लिए उचित अवसर मिले (वा. रामायण)। भगवान राम के समय में सनातन संस्कृति के वैचारिक मानदंडों पर विचार करें और उस काल खंड में संसार की अन्य संस्कृतियों के विकास से तुलना करें तो सहज ही आपको यह अनुभव होगा कि राम और अयोध्या के समाज का उत्कृष्ट सामाजिक एवं पारिवारिक मूल्य कितना ऊंचा था और संसार भर में क्यों प्रासंगिक हुआ। सुख-दु:ख की अनुभूति आज पश्चिमी मनोविज्ञान इस स्थिति में पहुंचा जहां दबे स्वर में स्वीकारा जा रहा कि सुख-दु:ख वास्तव में भौतिक संसाधनों पर निर्भर नहीं करते। सुख-दु:ख मनुष्य की अनुभूति के ही परिणाम हैं, उसकी मान्यता, कल्पना एवं अनुभूति विशेष के ही रूप में सुख-दुख का स्वरूप बनता है। जैसा मनुष्य का भावना स्तर होगा उसी के रूप में सुख-दु:ख की अनुभूति होगी। एक ओर जहां पश्चिमी संसार सुख को परिभाषित करने में भौतिक संसाधनों के अंतहीन दौड़ में लगा है वहीं सनातन धर्म में सुख-दु:ख का विमर्श एक साथ त्रेतायुग से होता आया है। हम मानते हैं कि सुख और दु:ख दो भिन्न अवस्थाएं होते हुए भी एक-दूसरे के पूरक हैं। मृत्युशैय्या पर पड़े हुए दशरथ से मंत्री सुमंत्र कहते हैं; जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा॥ काल करम बस होहि गोसाई। बरबस रात्रि दिवस की नाई। सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोड सम धीर धरहिं मन माहीं॥ अर्थात जन्म-मरण, सुख-दु:ख के भोग, हानि-लाभ, प्यारों का मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी, काल और कर्म के अधीन रात और दिन की तरह बरबस होते रहते हैं। मूर्ख लोग सुख में हर्षित होते और दु:ख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। (मानस) श्रीराम, कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता:भगवान श्रीराम एवं उनके समाज का चिंतन केवल रावण को मारकर सीता माता की प्राप्ति तक सीमित कर देना उचित नहीं है, जैसा कि आज के डिजिटल विमर्श में चहुंओर दिखाई दे रहा है। आज जब की भारतीय समाज एकजुट होकर श्री अयोध्या जी में प्रभु राम का भव्य मंदिर बना रहा है तो ऐसे में हम सभी को समाज की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी अपने परिवार के प्रबोधन पर विशेष बल देना चाहिए। ऐसे में राम के सामाजिक, पारिवारिक एवं कर्तव्य आधारित चिंतन का परिवार के साथ प्रतिदिन 10 मिनट बैठकर विमर्श अवश्य करना चाहिए। बच्चों को अगले दिन राम के ऊपर बोलने का चिंतन बिंदु दें जिससे उनके भीतर भी संस्कार की ज्योति जल सके। घर में एक रामचरितमानस रखें और सप्ताह में एक बार पूरा परिवार एक साथ बैठकर उसका पाठ अवश्य करें। (लेखक, धर्म-संस्कृति के अध्येता और प्रभुराम के डिजिटल विश्वकोश रामचरित डॉट इन के फाउंडर हैं।)
राजकुमारी पाण्डेय 20 प्वाइंट्स के साथ जानें पति-पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाने के सूत्र एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जब स्त्री और पुरुष शादी के बंधन में बंधते हैं, तो उन्हें इस रिश्ते से कई सारी उम्मीदें होती हैं। शादी लव हो या अरेंज, शुरुआत में हर किसी को यह समझने में थोड़ा वक्त लग जाता है कि यह बंधन कैसा होना चाहिए। कई लोग सोचते हैं कि पति पत्नी रिलेशनशिप में विश्वास और प्यार ही काफी है। यह सच भी है, लेकिन इसके अलावा भी पति-पत्नी के रिश्ते में कई अन्य चीजें जरूरी हैं। पति पत्नी का रिश्ता कैसा होना चाहिए। वैवाहिक जीवन क्या है?जब कोई महिला व पुरुष दोनों ही कानूनी व धार्मिक रूप से एक साथ रहने का वादा करने के बाद शादी के बंधन में बंधते हैं, तो उसे वैवाहिक जीवन का नाम दिया गया है। बता दें कि हिंदू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक माना गया है, जिसमें दो व्यक्ति जीवनभर साथ रहने का वादा करते हैं। हालांकि, विवाह के बंधन में बंधने के लिए लड़का और लड़की का बालिग होना भी जरूरी है। प्रेम, त्याग, एक दूसरे की परवाह, विश्वास और एक दूसरे का जीवन भर साथ निभाने जैसी जिम्मेदारियां वैवाहिक जीवन का हिस्सा होती हैं। शोध की मानें तो वैवाहिक जीवन में अगर प्यार, आपसी समझदारी, एक दूसरे के प्रति परवाह, एक दूसरे और एक दूसरे के परिवार के प्रति मान-सम्मान, थोड़े-बहुत सुलह-समझौते, विश्वास हो, तो वैवाहिक जीवन सुखी हो सकता है। पति-पत्नी का रिश्ता मजबूत होने के साथ नाजुक भी होता है। ऐसे में जीवनभर इस रिश्ते को निभाना आसान नहीं होता। इसलिए, पति पत्नी के रिश्ता कैसा होना चाहिए, नीचे हम इससे जुड़ी जानकारी दे रहे हैं :विश्वास से भरा : हर रिश्ते में विश्वास होना बेहद आवश्यक है। विश्वास और भरोसा पति पत्नी के रिश्ते की नींव को मजबूत बनाता है। दोनों के बीच जितना विश्वास होगा उतना ये रिश्ता गहरा और सशक्त होता है। विवाह के बाद हर कपल के नये जीवन की शुरूआत होती है। शक रिश्ते की इस डोर को कमजोर बना सकता है। ऐसे में दोनों को एक दूसरे पर विश्वास बनाकर रखना चाहिए। एक दूसरे के लिए सम्मान : पति पत्नी के रिश्ते में एक दूसरे के प्रति सम्मान बहुत अहमियत रखता है। इसके साथ ही अगर ये एक दूजे के रिश्तेदारों, सगे संबंधियों का सम्मान करेंगे, तो इनमें एक दूसरे के प्रति सम्मान के साथ प्यार भी बढ़ता है। कई बार देखा जाता है कि पति-पत्नी खुद एक दूसरे से सम्मान की इच्छा रखते हैं, लेकिन खुद एक दूसरे को सम्मान नहीं देते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। इस रिश्ते में दोनों बराबर सम्मान के हकदार होते हैं। पति पत्नी का रिश्ता तभी चल सकता है, जब दोनों के बीच में लगाव, सम्मान व एक दूजे के प्रति समर्पण होता है। भावनाओं की कद्र : जब पति और पत्नी दोनों एक दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखते हैं, तो उनका रिश्ता खुद-ब-खुद संवरने लगता है। हालांकि, कई लोग इस बात पर उतना ध्यान नहीं देते हैं। अगर रिश्तों में भावनाओं की कद्र ना हो, तो पति-पत्नी के बीच दरार आने की संभावना बढ़ सकती है। हर इंसान की पसंद, सोच, लाइफस्टाइल अलग होता है, जिस वजह से कई चीजों को लेकर पति-पत्नी के विचार अलग हो सकते हैं। ऐसे में एक दूसरे की भावनाओं को समझते हुए चलेंगे, तो दोनों में प्यार बना रहेगा और रिश्ता भी गहरा होगा। रिश्ते में पारदर्शिता : पति-पत्नी के बीच का रिश्ता तब बिगड़ने लगता है, जब वो एक दूसरे से अपने मन की बात शेयर नहीं करते हैं। कई बार महिलाएं अपने मन की बात पति के सामने रखने से झिझकती हैं, तो कुछ मामलों में पति भी अपनी भावनाएं व्यक्त करने में कतराते हैं। इससे रिश्ते में एक अलगाव सा आ जाता है, जो कुछ समय बाद दोनों को अधूरेपन का एहसास दिलाने लगता है। यह अधूरापन अच्छे रिश्ते का संकेत नहीं है। इसलिए, पति-पत्नी के बीच कभी कुछ छुपा नहीं होना चाहिए। हर चीज को लेकर दोनों में पारदर्शिता होनी चाहिए। मनाने की कला : पति-पत्नी में छोटी मोटी लड़ाई होना आम बात है, लेकिन कई बार इस नोक-झोंक में दोनों में से कोई एक नाराज हो जाता है। ऐसे समय में दूसरा पार्टनर भी गुस्से में रहेगा, तो इससे रिश्ते में दूरियां आ सकती हैं। इसलिए सामने वाले को समझदारी से पेश आना होगा। पार्टनर के साथ बैठकर विवाद सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। क्वालिटी टाइम : आज के समय में हर कोई अपने काम में इतना व्यस्त है कि वो अपने लिए भी समय नहीं निकाल पाता है। यह रिश्तों में दूरियों का कारण बन सकता है। ऐसे में अपने-अपने बिजी शेड्यूल से समय निकालकर पति-पत्नी कहीं घूमने का प्लान कर सकते हैं। कुछ वक्त के लिए तनाव से दूर होकर एक दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताने से रिश्ते में नयापन बना रहेगा। झूठ से परहेज : झूठ दीमक के समान होता है, जो किसी भी रिश्ते की नींव को कमजोर कर देता है। जिस रिश्ते में झूठ ने अपना डेरा बना लिया वो रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चलता है। एक झूठ को छिपाने के लिए पार्टनर को कई झूठ बोलने पड़ते हैं। इसलिए पति पत्नी के रिश्ते में झूठ की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। तारीफ करने में कंजूसी न करें : एक दूसरे के साथ सात जन्मों तक रहने की कसमें खा सकते हैं, तो फिर तारीफ करने में कंजूसी क्यों। कुछ लोग अपने पार्टनर की अच्छी बातों की खुलकर प्रशंसा नहीं कर पाते हैं। उन्हें यह समझना होगा कि रिश्ते को मजबूत बनायें रखने में शब्दों का बहुत महत्व होता है। अगर ऐसा करना उनकी आदत में नहीं है, तो उन्हें अपने रिश्ते को बनायें रखने के लिए इस पर काम करना चाहिए। इसके लिए पार्टनर द्वारा किये गये अच्छे कामों के लिए उन्हें कॉम्पलिमेंट दें। अपने पार्टनर को बताएं कि आपकी जिंदगी में उनके आने से कितना कुछ बदल गया है। उनकी सुंदरता के साथ उनकी आंतरिक सुंदरता की भी तारीफ करें।मिलकर घर का काम करना : पति-पत्नी दोनों को एक दूसरे के प्रति हेल्पिंग नेचर रखना चाहिए। माना कि पत्नी घर का कामकाज संभालती हैं, तो पति दफ्तर जाते हैं। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पति घर के कामों में हाथ नहीं बंटा सकते। वहीं, कई घरों में तो पति-पत्नी दोनों ही काम पर जाते हैं। ऐसे में घर के कामों को दोनों को मिलकर करना चाहिए। इससे किसी एक पर काम का दबाव नहीं पड़ेगा और दोनों को एक दूसरे के साथ समय ज्यादा बिताने का भी मौका मिलता है। छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढ़ना : जीवन में सुख-दु:ख का आना जाना लगा रहता है, लेकिन कई बार कुछ लोग परेशानियों के चलते हर समय दुखी रहने लगते हैं। इसका असर उनकी नीजी जिंदगी पर भी पड़ने लगता है। ऐसी स्थितियों में चुपचाप रहने की बजाय अपने दुख को पार्टनर संग शेयर करना चाहिए। इससे आपकी परेशानियों में आपका साथ देने के लिए आपका पार्नर आपके पास होगा। एक अच्छा रिश्ता वही होता है जिसमें पार्टनर बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी परेशानी को शेयर कर सके। विवादों को बढ़ावा न देना : कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो लड़ाई के दौरान पुरानी बातों को बीच में ले आते हैं। इससे सामने वाले को गहरी ठेस पहुंच सकती है। पुरानी बातों को बीच में लाना गलत है। अच्छे कपल्स का काम यह होता है कि वो आपसी मतभेदों या नोकझोंक की वजह पुरानी बातों को नहीं बनने देते हैं। ऐसी बातें जिन्हें याद करने से आपसी कलह बढ़ता हो, उन्हें भुला देने में ही समझदारी होती है। माफी मांगने व माफ करने में पीछे न रहें : कई बार कपल्स के बीच अनबन हो जाती है और माफी मांगते समय उनका इगो सामने आता है। इससे अच्छे से अच्छे रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगती हैं। रिश्ते को अच्छा बनाये रखने के लिए माफी मांगने में पीछे न रहें। अपनी गलतियों को स्वीकार करें व माफी मांगकर झगड़े को खत्म कर देना चाहिए। वहीं, सामने वाले की गलती है तो उसे माफ कर देना चाहिए। आपसी समझ बरकरार रखें : रिश्ते को बनाये रखने के लिए दोनों पार्टनर्स के बीच संयम होना बहुत जरूरी होता है। कई बार आस-पास कुछ ऐसी परिस्थितियां होती हैं, जिसके चलते पति पत्नी के बीच अनबन हो सकती है। ऐसे समय में संयम और प्यार से पेश आना चाहिए। गुस्सा नहीं समझदारी दिखायें। सामने वाले की परेशानी को समझें। पलट कर जवाब न दें, इससे विवाद बढ़ सकता है। अहमियत दें : अक्सर रिश्ते में खटास आने लगती है, जब सामने वाले की किसी बात को अहमियत नहीं दी जाती है। इस पुरुष प्रधान समाज में कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि घर के अधिकतर निर्णय पुरुष ही लेते हैं पर ऐसा नहीं होना चाहिए। जीवन के हर फैसले में पति-पत्नी दोनों का बराबर अधिकार होता है। इसलिए, अपने हर फैसले में पार्टनर को शामिल करें। उनकी राय को भी तवज्जो दें। एक अच्छा रिश्ता वही होता है, जिसमें पति-पत्नी दोनों एक दूजे को अहमियत दें। परवाह करें : पति-पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए एक दूजे की परवाह करना भी जरूरी है। इसके लिए एक दूसरे की पसंद, ना पसंद का ध्यान रखना चाहिए। इससे सामने वाले को इस बाद का अहसास होगा कि आप उनकी कितनी परवाह करते हैं। साथ ही आपका रिश्ता ओर मजबूत व गहरा होता जाएगा। अहंकार को रखें घर के बाहर : किसी भी रिश्ते में अहंकार यानी इगो के आने से उसका विनाश होना तय होता है। ऐसे में पति पत्नी के इस नाजुक रिश्ते में अहंकार को कोसों दूर रखना चाहिए। इससे अच्छे भले रिश्ते में भी दरार आ सकती है। हर मुश्किल घड़ी में दें साथ : जीवन में उतार-चढाव लगे रहते हैं। किसी का समय कभी एक जैसा नहीं रहता है। कभी कोई शारीरिक रूप से, तो कोई आर्थिक रूप से परेशान हो सकता है। कभी किसी को मानसिक परेशानी हो सकती है। एक अच्छा और मजबूत रिश्ता वही होता है जिसमें एक पार्टनर दूसरे पार्टनर के बुरे वक्त में उनका साथ न छोड़े बल्कि उनकी हिम्मत बने। सामने वाले की बात को तवज्जो दें : खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए पति-पत्नी को एक दूसरे की बात को ध्यान से सुनना चाहिए। कई बार जब सामने वाले की बात को ध्यान से नहीं सुना जाता, तो यह रिश्ते में दूरी का कारण बनने लगता है। इसलिए हमेशा अपने पार्टनर की बात को तवज्जो देनी चाहिए। इससे रिश्ते में किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश नहीं रहती है। अच्छे दोस्त बनें : पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार, विश्वास, सम्मान के साथ दोस्त की तरह अच्छी अंडरस्टैंडिंग होना भी जरूरी है। दोस्ती का रिश्ता बेहद खास होता है। पति-पत्नी के बीच अगर दोस्ती का रिश्ता होता है, तो दोनों को एक दूसरे को ओर अच्छे से जान पायेंगे। दोनों की अंडरस्टैंडिंग अच्छी होगी और इससे रिश्ते में भी मजबूती आती है। अगर पति पत्नी के बीच दोस्ती का रिश्ता होता है, तो उनका जीवन ओर भी ज्यादा खुशहाल हो सकता है। कच्चे धागे की तरह : पति-पत्नी का रिश्ता कच्चे धागे की तरह होता है, लेकिन इसमें प्यार गहरा हो तो इस रिश्ते की डोर को कोई नहीं तोड़ सकता। हर पति-पत्नी खुशहाली के साथ अपना वैवाहिक जीवन व्यतीत करना चाहता है, लेकिन पति पत्नी का रिश्ता कैसा होना चाहिए, इस बात से कई लोग अंजान होते हैं। ऐसे में अच्छे पति पत्नी कैसे बनें, जिन्हें अपनाकर दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाया जा सकता है। रिलेशनशिप से जुड़ी अन्य जानकारी के लिए आप बने रहें एबीएन न्यूज के साथ...।
टीम एबीएन, रांची। सोशल मीडिया आज की तारीख में दोधारी तलवार है। लेकिन इसके प्रभाव और दुष्प्रभाव पर विमर्श आवश्यक है। भूगर्भ शास्त्र के प्रो उदय कुमार ने कहा कि हम आज की तारीख में सोशल मीडिया को नकार भी नहीं सकते हैं। स्टूडेंट सर्किल के 26 वें वर्षगाठ के अवसर पर रेडियम रोड रांची स्थित संस्थान के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने इसके महत्व को रेखांकित किया। सोशल मीडिया पर मोती और कंकड़ दोनों हैं। अब आप पर निर्भर करता है कि आप क्या चुनते हैं। उन्होंने बताया कि किस प्रकार सोशल मीडिया पर सूचना प्रकाशित होने से हजारीबाग जिले में स्थित हिमयुग का प्रतीक जो चैक डैम बनने से डूब रहा था, उसे डूबने से बचा लिया गया। सूचना के प्रसार में और सूचना के प्रसार को लेकर हमारे मन में होती जिजीविषा को मुकाम तक पहुंचाने का काम भी सोशल मीडिया बड़े ही बेहतर तरीके से कर रहा है। उन्होंने स्टूडेंट सर्किल को भी सोशल मीडिया का प्रतीक बताते हुए कहा कि कई लोगों की जमात की बुद्धिमता ने मिलकर जिस प्रकार लोगों के बीच अपने ज्ञान का प्रसार किया उससे प्रसारित करने वाले और इससे लाभ उठाने वाले दोनों का कल्याण हुआ। इस अवसर पर प्रशासनिक अधिकारी अरविंद लाल ने कहा कि आज संस्थान के हजारों युवा विभिन्न प्रशासनिक पदों पर हैं। ये एक सामाजिक और मानवीय सोच के साथ काम कर रहें है जहां युवाओं का कल्याण समाज में समरसता और समाज के एक बड़े वर्ग की उम्मीद पर खरे उतरे हैं। आर्थिक लाभ के बजाए सामाजिक सेवा और समाज के उत्तरोतर विकास को ध्यान में रखकर पूरी टीम ने काम किया। मौके पर संस्थान की निदेशिका रश्मि सिन्हा, खान सर, मुरलीधर, आनंद सर सहित कई लोगों ने विचार रखे। संस्थान आने वाले दिनों में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के लिए युवाओं का मार्गदर्शन जारी रखेगा।
धनतेरस (10 नवम्बर) पर विशेषयोगेश कुमार गोयलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। दिवाली से दो दिन पूर्व धनतेरस मनाया जाता है, जो इस वर्ष 10 नवंबर को मनाया जा रहा है। धनतेरस का इतिहास बहुत पुराना माना जाता है। यह त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है तथा इस दिन आरोग्य के देवता भगवान धन्वन्तरि एवं धन व समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन किया जाता है।धन्वंतरि को आयुर्वेद का देवता और देवताओं का चिकित्सक माना गया है, इसलिए धनतेरस चिकित्सकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय इसी दिन धन्वंतरि आयुर्वेद और अमृत लेकर प्रकट हुए थे।धनतेरस मनाने के संबंध में जो प्रचलित कथा है, उसके अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं और असुरों द्वारा मिलकर किये जा रहे समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से निकले नवरत्नों में से एक धन्वंतरि ऋषि भी थे, जो जनकल्याण की भावना से अमृत कलश सहित अवतरित हुए थे। धन्वंतरि ऋषि ने समुद्र से निकलकर देवताओं को अमृतपान कराया और उन्हें अमर कर दिया। यही वजह है कि धन्वंतरि को आरोग्य का देवता माना जाता है और आरोग्य तथा दीर्घायु प्राप्त करने के लिए ही लोग इस दिन उनकी पूजा करते हैं।इस दिन मृत्यु के देवता यमराज के पूजन का भी विधान है और उनके लिए भी एक दीपक जलाया जाता है, जो यम दीपक कहलाता है। धार्मिक ग्रथों में यमराज के पूजन के संबंध में एक कथा प्रचलित है। एक बार यमराज ने अपने दूतों से प्रश्न किया कि क्या प्राणियों के प्राण हरते समय तुम्हें कभी किसी प्राणी पर दया भी आयी? यह प्रश्न सुनकर सभी यमदूतों ने कहा- महाराज, हम सब तो आपके सेवक हैं और आपकी आज्ञा का पालन करना ही हमारा धर्म है। अत: दया और मोह-माया से हमारा कुछ लेना-देना नहीं है। यमराज ने उनसे जब निर्भय होकर सच-सच बताने को कहा, तब यमदूतों ने बताया कि उनके साथ एक बार वास्तव में ऐसी एक घटना घट चुकी है। यमराज ने विस्तार से उस घटना के बारे में बताने को कहा तो यमदूतों ने बताया कि एक दिन हंस नाम का एक राजा शिकार के लिए निकला और घने जंगलों में अपने साथियों से बिछुड़ कर दूसरे राज्य की सीमा में पहुंच गया। उस राज्य के राजा हेमा ने राजा हंस का राजकीय सत्कार किया और उसी दिन हेमा की पत्नी ने एक अति सुंदर पुत्र को जन्म दिया, लेकिन ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के मात्र चार दिन बाद ही इस बालक की मृत्यु हो जायेगी। यह दु:खद रहस्य जानकर हेमा ने अपने नवजात पुत्र को यमुना के तट पर एक गुफा में भिजवा दिया और वहीं पर उसके लालन-पालन की शाही व्यवस्था कर दी गयी और बालक पर किसी युवती की छाया भी नहीं पड़ने दी, लेकिन विधि का विधान तो अडिग था।एक दिन राजा हंस की पुत्री घूमते-घूमते यमुना तट पर निकल आयी और राजकुमार की उस पर नजर पड़ गयी। उसे देखते ही राजकुमार उसपर मोहित हो गया। राजकुमारी की भी यही दशा थी। अत: दोनों ने उसी समय गंधर्व विवाह कर लिया, लेकिन विधि के विधान के अनुसार 4 दिन बाद राजकुमार की मृत्यु हो गयी। यमदूतों ने यमराज को बताया कि उन्होंने ऐसी सुंदर जोड़ी अपने जीवन में इससे पहले कभी नहीं देखी थी। वे दोनों कामदेव और रति के समान सुंदर थे। इसीलिए राजकुमार के प्राण हरने के बाद नवविवाहिता राजकुमारी का करुण विलाप सुन उनका कलेजा कांप उठा। घटना का पूर्ण वृतांत सुनने के बाद यमराज ने यमदूतों से कहा कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन धन्वंतरि ऋषि का पूजन करने तथा यमराज के लिए दीप दान करने से इस प्रकार की अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है। ऐसी मान्यता है कि उसके बाद से ही इस दिन धन्वंतरि ऋषि और यमराज का पूजन किये जाने की प्रथा आरंभ हुई। धनतेरस के दिन घर के टूटे-फूटे बर्तनों के बदले तांबे, पीतल अथवा चांदी के नये बर्तन तथा आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है। कुछ लोग नयी झाड़ू खरीदकर उसका पूजन करना भी इस दिन शुभ मानते हैं। (लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
इनके कोहराम से बचाव का कब होगा इंतजाम डॉ राजेन्द्र प्रसाद शर्मा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बाघ बकरी कंपनी के मालिक पराग देसाई (49) की स्ट्रीट डॉग्स (लावारिस कुत्तों) के हमले से हुई मौत से देश में नयी बहस शुरू हो गयी है। ऐसी घटनाओं से भारत ही नहीं अपितु दुनिया के अधिकांश देश दो-चार होते आ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्था लैंसेट की हालिया रिपोर्ट की माने तो दुनिया के तमाम देशों में हर साल लावारिस कुत्तों के कारण 59 हजार लोग अपनी जान गंवाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों को भी इस संदर्भ में देखा जाए तो केवल लावारिस कुत्तों के हमलों से जान गंवाने वालों में हमारे देश की भागीदारी लैसेंट के आंकड़ों में 36 फीसदी के लगभग है। कोरोना काल को अलग कर भी दिया जाये, तो 2021 की तुलना में 2022 में ऐसी घटनाओं में इजाफा हुआ है। भारत सरकार के संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2019 से 2022 के बीच लावारिस कुत्तों के काटने के डेढ़ करोड़ से अधिक मामले सामने आये हैं। यह तो वह आंकड़े हैं जो पंजीकृत हुए हैं। असल आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा होगा। दरअसल, गली-कूचों में घूमने वाले कुत्तों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई होती है तो उस पर धारा 428 व 429 के तहत सजा का प्रावधान है। इसके साथ ही पशु प्रताड़ना का मामला बन जाता है। कुत्तों को प्रताड़ित करने, मारने, जहर देने या अन्य तरह से प्रताड़ित करने पर पांच साल तक की जेल तक हो सकती है। ऐसे में सवाल यह उठ जाता है कि लावारिस कुत्तों से बचाव का क्या रास्ता हो सकता है। देखा जाए तो स्थानीय प्रशासन यानी कि नगर निगम, नगर परिषद, नगर पालिका जैसी संस्थाओं के पास ऐसे कुत्तों को पकड़ने की जिम्मेदारी होती है। कभी गलियों में घूमने वाली लावारिस गायों को पकड़ने की तरह ही स्ट्रीट डॉग्स को पकड़ने का अभियान भी चलता रहा है। पर अब ऐसे अभियान नहीं दिखते। सवाल लावारिस कुत्तों का ही नहीं अपितु पालतू कुत्तों को लेकर भी इसी तरह से गंभीर है। देश के कई कोनों में पालतू कुत्तों द्वारा लोगों पर आक्रमण करने और काट खाने की घटनाएं भी आए-दिन देखने को मिल रही हैं। समस्या केवल एक जगह की नहीं है। दरअसल, कुत्तों को पालना आज फैशन भी बनता जा रहा है। लोग ऐसी नस्ल के कुत्ते पालने लगे हैं जिनको देखने मात्र से सिहरन होने लगती है। यह स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। कुत्तों को पालना या नहीं पालना निजी मामला है और इस पर किसी तरह के कमेंट करना भी गलत होगा पर पालतू कुत्तों को खुला छोड़ना और आते-जाते लोगों को काटना गंभीर हो जाता है। यह भी सब जानते हैं कि कुत्तों के काटने पर समय पर इलाज नहीं कराने पर यह जानलेवा हो जाता है। इससे समस्या की गंभीरता को समझा जा सकता है। देश में हर पांचवें साल मवेशियों और लावारिस जानवरों की गणना होती है। 2019 की गणना के अनुसार देश में लावारिस कुत्तों की संख्या करीब एक करोड़ 53 लाख है। पशुपालन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक लावारिस कुत्ते हैं। जहां तक काटने की घटनाओं की बात करें तो 2021 में देश में 17 लाख एक हजार 33 मामले सामने आये। 2022 में यह आंकड़ा 19 लाख 16 हजार 863 रहा। यह अपने आप में चेताने वाले आंकड़े हैं। कुत्तों के हमलों से बचने के लिए डॉग्स के मनोविज्ञान को भी समझना होगा। होता यह है कि जब आते-जाते व्यक्ति पर कुत्ते आक्रमण करते हैं और आप दोपहिया वाहन चला रहे हैं तो आप वाहन की स्पीड तेज कर देते हैं और इस कारण से कुत्ता भी उसी गति से तेज भागने लगता है और ऐसे में या तो बैलेंस बिगड़ जाने से गिर जाते हैं या कुत्ता आपको पकड़ लेता है और काट खाता है। ऐसे में मनोविज्ञान यह कहता है कि कुत्ता भौंकने लगे तो स्पीड कम करते हुए उसे डराने का प्रयास किया जाना चाहिए। इससे सामान्यत: कुत्ता शांत हो जाएगा और आपके पीछे भागना बंद कर देगा। यह एक सामान्य धारणा है। एक बात यह भी साफ हो जानी चाहिए कि कुत्ता काट खाये तो तत्काल डॉक्टर के पास जाएं और जरूरी इलाज कराने में किसी तरह की लापरवाही नहीं बरते। क्योंकि छोटी सी लापरवाही जानलेवा हो सकती है। इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन को भी गंभीर होना होगा। समय-समय पर कुत्तों को पकड़ने का अभियान चलाना होगा। दूसरी ओर कुत्तों को पालने वालों के प्रति भी सरकार को सख्ती बरतनी होगी। पालतू कुत्तों को सार्वजनिक स्थल या गली-मोहल्ले में घुमाने के दौरान सावधानी बरतना सुनिश्चित कराना होगा ताकि वह हिंसक होकर किसी पर आक्रमण न कर सकें। सावधानी ही बचाव का एकमात्र रास्ता है। इसके अलावा पालतू कुत्तों को भी समय-समय पर टीका लगे, इस पर भी नजर रखने की जरूरत है। स्थानीय प्रशासन को अवेयरनेस कार्यक्रम भी चलाना चाहिए। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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