डॉ हाराधन कोईरी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसे-जैसे अयोध्या नगरी के नवनिर्मित श्रीराम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के दिन नजदीक आते जा रहे हैं। वैसे- वैसे विभिन्न अखबारों,पत्र-पत्रिकाओं एवं अन्य जन माध्यमों में श्रीराम पर विशेष सामग्री प्रस्तुत की जा रही है जिससे जनमानस को राम की भव्यता, दिव्यता और शुभ्रता को अनुभव करने में सहूलियत हो रही है। भारतीय साहित्य में राम का चरित्र भरा पूरा है। सभी कवि अपनी काव्यात्मक प्रतिभा से राम के शील,शक्ति और सौंदर्य को अपने अपने ढंग से देखने,समझने का प्रयास किया है। कविवर निराला ने भी राम की शक्ति पूजा के माध्यम से राम को नये भाव-बोध के साथ के देखने का प्रयास किया है। उन्होंन राम को युगीन संवेदना के अनुकूल पूरी तरह से समय-सापेक्ष और मानवीय धरातल पर खड़ा किया है। निराला के राम सामान्य मनुष्य की तरह विषम परिस्थित में दुखी एवं निराश होते हैं। यथा - मित्रवर, विजय होगी न समर अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति! कहते छल-छल हो गये नयन, कुछ बूंद पुन: ढलके दृगजल। रावण के साथ युद्ध करने के क्रम में जब पहली बार राम को कठिन परिस्थित का एहसास होता है,तब उनका मन कौंधने लगता है और वे कहते हैं - है अमानिशा उगलता गगन घन अंधकार खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन-चार।निराला के राम तुलसी के राम जैसे निर्विकार नहीं है। उनका एक रूप आधिदैविक है और दूसरा सहज मानवीय। कविवर निराला इस ओर इशारा करते हुए लिखते हैं- स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय अर्थात वे जितने दृढ़ चेता हैं,उतने ही शंकालु भी। पूरी कविता में राम की इसी आशा-निराशा के द्वंद्व को दिखाया गया है। राम को उदास देख विभीषण इसका कारण पूछते हैं। राम मंद स्वर में उत्तर देते हैं कि समर में हमें विजय न मिलेगी। यह नर-वानर का राक्षस से युद्ध नहीं रहा। रावण के आमंत्रण पर महाशक्ति उसकी सहायता के लिए उतरी हैं। यह कहते-कहते राम के नेत्र छलछला उठते हैं।जाम्बवान उन्हें धैर्य देते हुए कहते हैं कि आप भी आराधना का उत्तर दृढ़ आराधना से दीजिए और शक्ति का पूजन कीजिए। जब तक सिद्धि की प्राप्ति न हो जाए तब तक युद्ध छोड़ दीजिये। तब तक युद्ध का संचालन अन्य वीर करते रहेंगे। सुग्रीव आदि एक स्वर से इस सुझाव का समर्थन करते हैं। राम तत्काल ही शक्ति की आराधना करने लगते हैं। वे हनुमान को देवीदह नामक सरोवर से जाकर एक सौ आठ कमल पुष्प ले आने का आदेश देते हैं। हनुमान प्रभात से पूर्व ही कमल फूल ले आते हैं। रात्रि का अवसान होता है। सूर्य की प्रथम किरण फूटती है। युद्ध भूमि में कोलाहल होने लगता है किन्तु राम मन को एकाग्र किए आराधना में मग्न हैं। इसी प्रकार पांच दिन बीत गए। छठे दिन उनका मन आज्ञाचक्र पर पहुंच गया। भगवती को कमल पुष्प अर्पित करते हुए राम एक ही आसन पर अडिग बैठे रहे। आठवें दिन एक इंदीवर शेष रह गया और मन सहस्रार को पार करने की प्रतीक्षा करने लगा है। तब दो पहर रात बीतने के बाद साक्षात् भगवती दुर्गा राम की परीक्षा लेने के लिए पूजा का अन्तिम पुष्प उठा ले गयीं। हाथ बढ़ाने पर राम को जब फूल न मिला तो उनका हृदय अस्थिर हो उठा। आसन छोड़ने से असिद्धि होगी यह सोच वे अपने को धिक्कारने लगे- धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध जानकी ! हाय,उद्धार,प्रिये का हो न सका। तभी उनके मन में विचार आया कि बचपन मेरी मां मुझे कमल नयन कहती थीं, ऐसा सोच कर जैसे ही अपने दक्षिण नेत्र को अर्पित करने के लिए ब्रह्मशर उठाये, देवी ने उनका हाथ थाम लिया और युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद देती हुई राम के शरीर में विलीन हो गयीं- साधु, साधु, साधक धीर,धर्म-धन धन्य राम! कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम। होगी जय, होगी जय,हे पुरुषोत्तम नवीन! कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन। कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने राम की शक्ति पूजा कविता के माध्यम से मनुष्य के कभी न परास्त होने वाले विवेक का बखान किया है। विकट विरोधी परिस्थितयों में भी धैर्य के साथ काम करने की प्रेरणा दी है। राम के व्यक्तित्व की भांति निराला का व्यक्तित्व भी अपराजेय रहा है।इसीलिए उन्होंने लिखा भी है- वह एक और मन रहा राम का जो न थका। निराला के राम में यद्यपि आत्मग्लानि के स्वर हैं फिर भी संघर्ष के स्वर अधिक प्रबल है। इसलिए हम कह सकते हैं कि निराला के राम गोस्वामी तुलसीदास के राम से भिन्न और भवभूति के राम के निकट हैं। (लेखक गोस्सनर महाविद्यालय, रांची के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के सहायक प्रोफेसर हैं।)
प्रो संजय द्विवेदी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज पूरी दुनिया उत्सुकता के साथ 22 जनवरी के ऐतिहासिक क्षण का इंतजार कर रही है। दुनिया में कोई भी देश हो, अगर उसे विकास की नई ऊंचाई पर पहुंचना है, तो उसे अपनी विरासत को संभालना ही होगा। हमारी विरासत, हमें प्रेरणा देती है, हमें सही मार्ग दिखाती है। इसलिए आज का भारत, पुरातन और नूतन दोनों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ रहा है। एक समय था जब अयोध्या में रामलला टेंट में विराजमान थे, लेकिन आज राम मंदिर का भव्य निर्माण हो रहा है। श्रीराम मंदिर का निर्माण एक अनथक संघर्ष का प्रतीक है। अयोध्या यानी वह भूमि जहां कभी युद्ध न हुआ हो। ऐसी भूमि पर कलयुग में एक लंबी लड़ाई चली और त्रेतायुग में पैदा हुए रघुकुल गौरव भगवान श्रीराम को आखिरकार छत नसीब होने वाली है। राजनीति कैसे साधारण विषयों को भी उलझाकर मुद्दे में तब्दील कर देती है, रामजन्मभूमि का विवाद इसका उदाहरण है। आजादी मिलने के समय सोमनाथ मंदिर के साथ ही यह विषय हल हो जाता तो कितना अच्छा होता। आक्रमणकारियों द्वारा भारत के मंदिरों के साथ क्या किया गया, यह छुपा हुआ तथ्य नहीं है। किंतु उन हजारों मंदिरों की जगह, अयोध्या की जन्मभूमि को नहीं रखा जा सकता। एक ऐतिहासिक अन्याय की परिणति आखिरकार ऐतिहासिक न्याय ही होता है। यह बहुत संतोष की बात है कि भारत की न्याय प्रक्रिया के तहत आए फैसले से मंदिर का निर्माण संपन्न हुआ है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस अर्थ में गौरवशाली हैं कि उनके कार्यकाल में इस विवाद का सौजन्यतापूर्ण हल निकल सका और मंदिर निर्माण हो सका। इस आंदोलन से जुड़े अनेक नायक आज दुनिया में नहीं हैं। उनकी स्मृति आती है। मुझे ध्यान है उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता और मंत्री रहे दाऊदयाल खन्ना ने मंदिर के मुद्दे को आठवें दशक में जोरशोर से उठाया था। उसके साथ ही अशोक सिंघल जैसे नायक का आगमन हुआ और उन्होंने अपनी संगठन क्षमता से इस आंदोलन को जनांदोलन में बदल दिया। संत रामचंद्र परमहंस, महंत अवैद्यनाथ जैसे संत इस आंदोलन से जुड़े और समूचे देश में इसे लेकर एक भावभूमि बनी। आज तक सरयू नदी ने अनेक जमावड़े और कारसेवा के प्रसंग देखे हैं। सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम फैसले के बाद जिस तरह का संयम हिंदू समाज ने दिखाया वह भी बहुत महत्व का विषय है। क्या ही अच्छा होता कि इस कार्य को साझी समझ से हल कर लिया जाता। किंतु राजनीतिक आग्रहों ने ऐसा होने नहीं दिया। कई बार जिदें कुछ देकर नहीं जातीं, भरोसा, सद्भाव और भाईचारे पर ग्रहण जरूर लगा देती हैं। दुनिया के किसी देश में यह संभव नहीं है उसके आराध्य इतने लंबे समय तक मुकदमों का सामना करें। किंतु यह हुआ और सारी दुनिया ने इसे देखा। यह भारत के लोकतंत्र, उसके न्यायिक-सामाजिक मूल्यों की स्थापना का समय भी है। यह सिर्फ मंदिर नहीं है जन्मभूमि है, हमें इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। विदेशी आक्रांताओं का मानस क्या रहा होगा, कहने की जरूरत नहीं है। किंतु हर भारतवासी का राम से रिश्ता है, इसमें भी कोई दो राय नहीं है। वे हमारे प्रेरणापुरुष हैं, इतिहास पुरुष हैं और उनकी लोकव्याप्ति विस्मयकारी है। ऐसा लोकनायक न सदियों में हुआ है और न होगा। लोकजीवन में, साहित्य में, इतिहास में, भूगोल में, हमारी प्रदर्शनकलाओं में उनकी उपस्थिति बताती है राम किस तरह इस देश का जीवन हैं। राम शब्द संस्कृत की रम क्रीड़ायाम धातु से बना है अर्थात हरेक मनुष्य के अंदर रमण करने वाला जो चैतन्य-स्वरूप आत्मा का प्रकाश विद्यमान है, वही राम है। राम को शील-सदाचार, मंगल-मैत्री, करुणा, क्षमा, सौंदर्य और शक्ति का पर्याय माना गया है। कोई व्यक्ति सतत साधना के द्वारा अपने संस्कारों का परिशोधन कर राम के इन तमाम सद्गुणों को अंगीकार कर लेता है, तो उसका चित्त इतना निर्मल और पारदर्शी हो जाता है कि उसे अपने अंत:करण में राम के अस्तित्व का अहसास होने लगता है। कदाचित यही वह अवस्था है जब संत कबीर के मुख से निकला होगा, मोको कहां ढूंढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में न मैं मंदिर न मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में। राम, दशरथ और कौशल्या के पुत्र थे। संस्कृत में दशरथ का अर्थ है- दस रथों का मालिक। अर्थात पांच कर्मेंद्रियों और पांच ज्ञानेंद्रियों का स्वामी। कौशल्या का अर्थ है- कुशलता। जब कोई अपनी कर्मेंद्रियों पर संयम रखते हुए अपनी ज्ञानेंद्रियों को मयार्दापूर्वक सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है, तो उसका चित्त स्वाभाविक रूप से राम में रमने लगता है। पूजा-अर्चना की तमाम सामग्रियां उसके लिए गौण हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व इतना सहज और सरल हो जाता है कि वह जीवन में आने वाली तमाम मुश्किलों का स्थितप्रज्ञ होकर मुस्कुराते हुए सामना कर लेता है। भारतीय जनमानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है कि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं, बल्कि उनका महत्व इसलिए है, क्योंकि उन्होंने उन तमाम कठिनाइयों का सामना बहुत ही सहजता से किया। उन्हें मयार्दा पुरुषोत्तम भी इसलिए कहते हैं, क्योंकि अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने स्वयं को बेहद गरिमापूर्ण रखा। राम का होना मर्यादाओं का होना है, रिश्तों का होना है, संवेदना का होना है, सामाजिक न्याय का होना है, करुणा का होना है। वे सही मायनों में भारतीयता के उच्चादर्शों को स्थापित करने वाले नायक हैं। उन्हें ईश्वर कहकर हम अपने से दूर करते हैं। जबकि एक मनुष्य के नाते उनकी उपस्थिति हमें अधिक प्रेरित करती है। एक आदर्श पुत्र, भाई, सखा, न्यायप्रिय नायक हर रुप में वे संपूर्ण हैं। उनके राजत्व में भी लोकतत्व और लोकतंत्र के मूल्य समाहित हैं। वे जीतते हैं किंतु हड़पते नहीं। सुग्रीव और विभीषण का राजतिलक करके वे उन मूल्यों की स्थापना करते हैं जो विश्वशांति के लिए जरुरी हैं। वे आक्रामणकारी और विध्वंशक नहीं है। वे देशों का भूगोल बदलने की आसुरी इच्छा से मुक्त हैं। वे मुक्त करते हैं बांधते नहीं। अयोध्या उनके मन में बसती है। इसलिए वे कह पाते हैं, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। यानि जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है। अपनी माटी के प्रति यह भाव प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी नागरिक का भाव होना चाहिए। वे नियमों पर चलते हैं। अति होने पर ही शक्ति का आश्रय लेते हैं। उनमें अपार धीरज है। वे समुद्र की तीन दिनों तक प्रार्थना करते हैं। विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीति बोले राम सकोप तब भय बिनु होहिं न प्रीति। यह उनके धैर्य का उच्चादर्श है। वे वाणी से, कृति से किसी को दुख नहीं देना चाहते हैं। वे चेहरे पर हमेशा मधुर मुस्कान रखते हैं। उनके घीरोदात्त नायक की छवि उन्हें बहुत अलग बनाती है। वे जनता के प्रति समर्पित हैं। इसलिए तुलसीदास जी रामराज की अप्रतिम छवि का वर्णन करते हैं- दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज काहुंहिं नहीं व्यापा। राम ने जो आदर्श स्थापित किए उस पर चलना कठिन है। किंतु लोकमन में व्याप्त इस नायक को सबने अपना आदर्श माना। राम सबके हैं। वे कबीर के भी हैं, रहीम के भी हैं, वे गांधी के भी हैं, लोहिया के भी हैं। राम का चरित्र सबको बांधता है। अनेक रामायण और रामचरित पर लिखे गए महाकाव्य इसके उदाहरण हैं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त स्वयं लिखते हैं- राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य हैकोई कवि बन जाए, सहज संभाव्य है। भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृति के ऐसे वटवृक्ष हैं, जिनकी पावन छाया में मानव युग-युग तक जीवन की प्रेरणा और उपदेश लेता रहेगा। जब तक श्रीराम जन-जन के हृदय में जीवित हैं, तब तक भारतीय संस्कृति के मूल तत्व अजर-अमर रहेंगे। श्रीराम भारतीय जन-जीवन में धर्म भावना के प्रतीक हैं, उनमें मानवोचित और देवोचित गुण थे, इसीलिए वे मर्यार्दा पुरुषोत्तम कहलाये। भगवान श्रीराम का जीवन चरित्र भारत की सीमाओं को लांघकर विदेशियों के लिए भी शांति, प्रेरणा और नवजीवनदायक बनता जा रहा है। श्रीराम धर्म के साक्षात स्वरूप हैं, धर्म के किसी अंग को देखना है, तो राम का जीवन देखिये, आपको धर्म की असली पहचान हो जायेगी। धर्म की पूर्णता उनके जीवन में आद्यन्त घटित हुई है। श्रीराम ने लौकिक धरातल पर स्थिर रहकर धर्म एवं मयार्दा का पालन करते हुए मानव को असत्य से सत्य की ओर, अधर्म से धर्म की ओर तथा अन्याय से न्याय की ओर चलने की प्रेरणा दी है। कर्त्तव्य की वेदी पर अपने व्यक्तिगत सुख-प्रलोभनों की आहुति श्रीराम की जीवन कहानी का सार है। संसार में महापुरुष अपने जीवन, गुण, कर्म, स्वभाव, कर्त्तव्य, बुद्धि, तप-त्याग और तपस्या से जो अमर जीवन-संदेश देते हैं, वही मानवता की स्थायी धरोहर होती है। हमारा सौभाग्य है कि हम ऐसे दैवीय गुणों के धनी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की संताने हैं। श्रीराम का प्रेरक चरित्र भूली-भटकी मानव जाति में नवजीवन चेतना का संचार कर सकता है। उनके जीवन की घटनाएं आज के भोगी विलासी और मानवता का गला घोंटने वाले नामधारी मनुष्य को बहुत कुछ सोचने, करने और जीने की प्रेरणा दे सकती है। उनके जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप से अमर संदेश मिलता है। श्रीराम के द्वारा दर्शित आदर्शों एवं जीवन मूल्यों का भारतीय समाज में बहुत ऊंचा स्थान है। यदि हम सबक लेना चाहें, तो रामायण की प्रत्येक घटना से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। लक्ष्मण जी का श्रीराम जी के साथ वन-गमन करना, भरत जी का राज्य को ठुकराना, पादुका रखकर शासन-व्यवस्था चलाना, परस्पर भाइयों की प्रीति का श्रेष्ठ उदाहरण है। आज भाई-भाई एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो रहे हैं, परिवार परस्पर की कलह के कारण टूट रहे हैं। सर्वत्र स्वार्थ, अहंकार और अकेले भोगने की भावना उद्दाम हो रही है। ऐसे में रामायण हमें शिक्षा देती है कि नश्वर सुख-भोग और धन-धाम-धरा के लिए परस्पर लड़ना नहीं चाहिए। चित्रकूट प्रवास-काल में शूर्पणखा द्वारा श्रीराम को अपनी ओर आकर्षित करके विवाह का प्रस्ताव रखने पर राम द्वारा दृढ़ता से मना कर देना प्रेरणा देता है कि यदि जीवन को सुखी और शान्तिमय बनाना है, तो एक पत्नीव्रत का आचरण करना चाहिए। स्वर्णमृग को देखकर सीताजी का उसे पाने की इच्छा करना तथा भगवान राम द्वारा मायावी मृग को पाने के लिए पीछे दौड़ना और सीता जी का हरण हो जाने की घटना आज के जीवन प्रसंगों को बहुत कुछ प्रेरणा दे सकती है। आज का मनुष्य धन की मृगतृष्णा के पीछे पागलों की तरह दौड़ा जा रहा है, जो प्राप्त है उससे संतुष्ट नहीं हो पा रहा है। विज्ञान की चमकीली, भड़कीली, दिखावटी, बनावटी चीजों के पीछे दिन-रात अधर्म-असत्य, छल-प्रपंच का सहारा लेकर दौड़ा जा रहा है। इससे हानि यह हुई है कि आत्मारूपी सीता छिन गयी है, भौतिकवादी व्यक्ति सिर्फ शरीर के लिए जीने लगा है तथा इसी मृगतृष्णा में वह जीवन का अंत कर लेता है। रामायण कहती है दुनिया में आंखें खोलकर चलो, सभी चमकने वाली चीजें सोना नहीं होती हैं। चमक-दमक में व्यक्ति हमेशा धोखा खाता है, इसी धोखे में आत्मरूपी सीता का रावण द्वारा हरण होता है तथा बाद में राम-रावण का निर्णायक युद्ध होता है। यदि रामायण से कुछ सीखना है, तो चरित्र निर्माण, विचारों की उच्चता, भावों की शुद्धता, पवित्रता तथा जीवन को धर्म-मर्यादा एवं उच्चादर्श की ओर ले चलना सीखें। सीता जी का राम जी के साथ वन जाना संसार के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ देता है। वनवास राम जी को मिला था, सीता जी को नहीं, रामायण में वनवास का प्रसंग यह शिक्षा देता हैं कि नारी की परीक्षा संपत्ति में नहीं विपत्ति में होती है। श्रीराम अपने जीवन की सरलता, संघर्ष और लोकजीवन से सहज रिश्तों के नाते कवियों और लेखकों के सहज आकर्षण का केंद्र रहे हैं। उनकी छवि अति मनभावन है। वे सबसे जुड़ते हैं, सबसे सहज हैं। उनका हर रूप, उनकी हर भूमिका इतनी मोहनी है कि कविता अपने आप फूटती है। किंतु सच तो यह है कि आज के कठिन समय में राम के आदर्शों पर चलता साधारण नहीं है। उनसी सहजता लेकर जीवन जीना कठिन है। वे सही मायनों में इसीलिए मयार्दा पुरुषोत्तम कहे गए। उनका समूचा व्यक्तित्व राजपुत्र होने के बाद भी संघर्षों की अविरलता से बना है। वे कभी सुख और चैन के दिन कहां देख पाते हैं। वे लगातार युद्ध में हैं। घर में, परिवार में, ऋषियों के यज्ञों की रक्षा करते हुए, आसुरी शक्तियों से जूझते हुए, निजी जीवन में दुखों का सामना करते हुए, बालि और रावण जैसी सत्ताओं से टकराते हुए। वे अविचल हैं। योद्धा हैं। उनकी मुस्कान मलिन नहीं पड़ती। अयोध्या लौटकर वे सबसे पहले मां कैकेयी का आशीर्वाद लेते हैं। यह विराटता सरल नहीं है। पर राम ऐसे ही हैं। सहज-सरल और इस दुनिया के एक अबूझ से मनुष्य। राम भक्त वत्सल हैं, मित्र वत्सल हैं, प्रजा वत्सल हैं। उनकी एक जिंदगी में अनेक छवियां हैं। जिनसे सीखा जा सकता है। अयोध्या का मंदिर इन सद् विचारों, श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का प्रेरक बने। राम सबके हैं। सब राम के हैं। यह भाव प्रसारित हो तो देश जुड़ेगा। यह देश राम का है। इस देश के सभी नागरिक राम के ही वंशज हैं। हम सब उनके ही वैचारिक और वंशानुगत उत्तराधिकारी हैं, यह मानने से दायित्वबोध भी जागेगा, राम अपने से लगेगें। जब वे अपने से लगेगें तो उनके मूल्यों और उनकी विरासतों से मुंह मोड़ना कठिन होगा। सही मायनों में रामराज्य आएगा। कवि बाल्मीकि के राम, तुलसी के राम, गांधी के राम, कबीर के राम, लोहिया के राम, हम सबके राम हमारे मनों में होंगे। वे तब एक प्रतीकात्मक उपस्थिति भर नहीं होंगे, बल्कि तात्विक उपस्थिति भी होंगे। वे सामाजिक समरसता और ममता के प्रेरक भी बनेंगे और कर्ता भी। इसी में हमारी और इस देश की मुक्ति है। आज के भारत का मिजाज अयोध्या में स्पष्ट दिखता है। आज यहां प्रगति का उत्सव है तो कुछ दिन बाद यहां परंपरा का उत्सव भी होगा। आज यहां विकास की भव्यता दिख रही है, तो कुछ दिनों बाद यहां विरासत की भव्यता और दिव्यता दिखने वाली है। यही तो भारत है। विकास और विरासत की यही साझा ताकत भारत को 21वीं सदी में सबसे आगे ले जाएगी। (लेखक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं।)
चेतनादित्य आलोक एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से भेजे गये समन के मद्देनजर झारखंड के राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाया जा रहा है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की तरह ही इस बार झारखंड में हेमंत सोरेन भी पत्नी कल्पना सोरेन को राजनीतिक विरासत सौंप सकते हैं। दरअसल, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को प्रवर्तन निदेशालय की ओर से सातवीं बार भेजे गए समन को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं समेत आईएनडीआइए गठबंधन के तमाम राजनीतिक दलों के बीच झारखंड सरकार के भविष्य को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। यही कारण है कि कांग्रेस के राज्य विधायक दल ने भी आनन-फानन में तीन जनवरी को एक बैठक आहूत की, जिसमें राज्य के चारों मंत्रियों समेत 13 विधायक तथा राज्य कांग्रेस के प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने भी भाग लिया। हालांकि, कांग्रेस की ओर से मीर ने बैठक को लेकर मीडिया से इतना ही कहा कि विधायकों के साथ बैठक काफी अच्छी रही। देखा जाये तो कांग्रेस की यह बैठक वास्तव में अपने विधायकों की नब्ज टटोलने की एक कोशिश भर थी। दरअसल, कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को यह डर सता रहा है कि कहीं संकट की घड़ी में उनके विधायक टूट न जाएं। इसीलिए कांग्रेस के आलाकमान ने राज्य कांग्रेस के प्रभारी मीर को रांची भेजकर विधायकों को एकजुट रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने की बात कही होगी। इस बात में वजन इसलिए भी है, क्योंकि झारखंड में आईएनडीआईए गठबंधन के भीतर यदि सबसे अधिक खतरा किसी पार्टी के टूटने का है तो वह कांग्रेस ही है, क्योंकि संकट की घड़ी आने पर सबसे पहले कांग्रेसी विधायक ही इधर-से-उधर होते पाए गए हैं। इससे पहले भी एक बार झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार के गिरने की खबर फैली थी, जब राजनीतिक गलियारों में यह बात खूब उछली थी कि कई कांग्रेसी विधायक भाजपा के कुछ केंद्रीय एवं स्थानीय नेताओं के संपर्क में लगातार बने हुए हैं। उस समय कांग्रेसी विधायकों की आलाकमान से नाराजगी उनके टूटने की वजह बताई जा रही थी। तब पार्टी को तोड़कर भाजपा में शामिल होने के कथित आरोपी विधायकों का बंगाल कनेक्शन खुलकर सामने आया था। शायद इसीलिए कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व झारखंड सरकार पर आने वाले संकट को भांपकर पहले ही अपनी तैयारी पूरी कर लेना चाहता था। उधर, झामुमो के भीतर ईडी की ओर से मुख्यमंत्री सोरेन को भेजे गये समन को लेकर अलग ही भय का माहौल बना हुआ है, क्योंकि केंद्रीय एजेंसी की ओर से उन्हें सातवीं बार समन भेजा गया था, जिसे आखिरी समन बताया जा रहा है। हालांकि उसे षड्यंत्र का हिस्सा बताते हुए मुख्यमंत्री इस बार भी ईडी के समक्ष उपस्थित नहीं हुए और उन्होंने समन का गोल-मोल जवाब भेज दिया। देखा जाए तो ईडी को जवाब भेजकर उन्होंने खानापूर्ति भले ही कर ली हो, लेकिन वे भी जानते हैं कि उनके ऊपर ईडी की तलवार हर वक्त लटक रही है, जिससे अब उनका बचना बेहद कठिन ही नहीं, बल्कि असंभव प्रतीत होने लगा है। इसका प्रमुख कारण इस मामले में ईडी का वह अल्टीमेटम है, जो एजेंसी ने मुख्यमंत्री को समन के साथ भेजा था। उसमें एजेंसी ने मुख्यमंत्री से साफ-साफ कहा था कि या तो पूछताछ के लिए वे स्वयं उपस्थित हों अथवा केंद्रीय एजेंसी को स्थान और तिथि बताएं, ताकि उनसे पूछताछ की जा सके। बहरहाल, अब इस मामले में यह संभावना जताई जा रही है कि केंद्रीय एजेंसी वैधानिक प्रक्रियाएं अपनाकर पूछताछ करने के लिए मुख्यमंत्री को हिरासत में ले सकती है। संभव है कि विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन के इस कदम को मूर्खतापूर्ण मानने की गलती कर दें, लेकिन सच तो यह है कि गिरफ्तारी अथवा ईडी द्वारा हिरासत में लिए जाने की स्थिति में सोरेन जनता के बीच स्वयं को पीड़ित (विक्टिम) दिखाकर आगे की राजनीति साधने की तैयारी में हैं। यही नहीं, हर स्थिति में वे राज्य का सिंहासन अपने ही किसी करीबी (शायद पत्नी) के पास रखना चाहते हैं। तभी तो तीन जनवरी को आनन-फानन में आईएनडीआईए गठबंधन के तमाम सहयोगी दलों के विधायकों के साथ मुख्यमंत्री आवास में बैठक कर उन्हें रांची से दूर जाने से मना करते हुए यह कहा था कि फिलहाल वे उतनी ही दूरी पर रहें कि जरूरत पड़ने पर तीन घंटे के भीतर मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच सकें। भाजपा विधायक दल के नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबुलाल मरांडी ने भी हेमंत सोरेन पर हमला करते हुए विधायकों को बरगलाने का आरोप लगाया है। बहरहाल, पल-पल बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच हेमंत सोरेन की बेहद सधी चालों पर यदि गौर किया जाये तो मालूम होता है कि मुख्यमंत्री फिलहाल अपने पत्ते खोलने वाले नहीं हैं, बल्कि वे वेट एंड वॉच की रणनीति पर चलते हुए ईडी के अगले कदम पर नजर बनाए हुए हैं। तात्पर्य यह कि झारखंड में राजनीतिक ऊहापोह की स्थिति अभी बनी रहेगी।
डॉ वंदना सेनएबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रायः कहा जाता है कि जीवन हो तो भगवान श्रीराम जैसा। जीवन जीने की उच्चतम मर्यादा के पथ प्रदर्शक भगवान श्रीराम के जीवन पर दृष्टिपात करेंगे तो निश्चित ही हमें कई पाथेय दिखाई देंगे, लेकिन इन सबमें सामाजिक समरसता का आदर्श उदाहरण कहीं और दिखाई नहीं देता। अयोध्या के राजा श्रीराम ने अपने जीवन से अनुशासन और विनम्रता का जो चरित्र प्रस्तुत किया, वह आज भी समाज के लिए एक दिशाबोध है।वनवासी राम का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक समरसता का अनुकरणीय पाथेय है। श्रीराम ने वनगमन के समय प्रत्येक कदम पर समाज के अंतिम व्यक्ति को गले लगाया। केवट के बारे में हम सभी ने सुना ही है, कि कैसे भगवान राम ने उनको गले लगाकर समाज को यह संदेश दिया कि प्रत्येक मनुष्य के अंदर एक ही जीव आत्मा है। बाहर भले ही अलग दिखते हों, लेकिन अंदर से सब एक हैं। यहां जाति का कोई भेद नहीं था। वर्तमान में जिस केवट समाज को वंचित समुदाय की श्रेणी में शामिल किया जाता है, भगवान राम ने उनको गले लगाकर सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है। सामाजिक समरसता के भाव को नष्ट करने वाली जो बुराई आज दिखाई दे रही है, वह पुरातन समय में नहीं थी। समाज में विभाजन की रेखा खींचने वाले स्वार्थी व्यक्तियों ने भेदभाव को जन्म दिया है।वर्तमान में हम स्पष्ट तौर पर देख रहे हैं कि समाज को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है, जिसके कारण जहां एक ओर समाज की शक्ति तो कमजोर हो रही है, वहीं देश भी कमजोर हो रहा है। वर्तमान में राम राज्य की संकल्पना को साकार करने की बात तो कही जाती है, लेकिन उसके लिए सकारात्मक प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। सामाजिक एकता स्थापित करने के लिए रामायण हम सभी को उचित मार्ग दिखा सकती है।यह भी सर्वविदित है कि राम वन गमन के दौरान भगवान राम ने निषाद राज को भी गले लगाया, केवट को भी पूरा सम्मान दिया। इतना ही नही भगवान राम ने उन सभी को अपना अंग माना जो आज समाज में हेय दृष्टि से देखे जाते हैं। इसका यही तात्पर्य है कि भारत में कभी भी जातिगत आधार पर समाज का विभाजन नहीं था। पूरा समाज एक शरीर की ही तरह था। जैसे शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होता है, तब पूरा शरीर अस्वस्थ हो जाता था। इसी प्रकार समाज की भी अवधारणा है, समाज का कोई भी हिस्सा वंचित हो जाये तो सामाजिक एकता की धारणा समाप्त होने लगती है। हमारे देश में जाति आधारित राजनीति के कारण ही समाज में विभाजन के बीजों का अंकुरण किया गया। जो आज एकता की मर्यादाओं को तार-तार कर रहा है।भगवान राम ने अपने वनवास काल में समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का काम पूरे कौशल के साथ किया। समाज की संग्रहित शक्ति के कारण ही भगवान राम ने आसुरी प्रवृत्ति पर प्रहार किया। समाज को निर्भयता के साथ जीने का मार्ग प्रशस्त किया। इससे यही शिक्षा मिलती है समाज जब एक धारा के साथ प्रवाहित होता है तो कितनी भी बड़ी बुराई हो, उसे नतमस्तक होना ही पड़ता है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो संगठन में ही शक्ति है। इससे यह संदेश मिलता है कि हम समाज के साथ कदम मिलाकर नहीं चलेंगे तो हम किसी न किसी रुप में कमजोर होते चले जायेंगे और हमें कोई न कोई दबाता ही चला जायेगा। सम्पूर्ण समाज हमारा अपना परिवार है। कहीं कोई भेदभाव नहीं है। जब इस प्रकार का भाव बढ़ेगा तो स्वाभाविक रुप से हमें किसी भी व्यक्ति से कोई खतरा भी नहीं होगा। आज समाज में जिस प्रकार के खतरे बढ़ते जा रहे हैं, उसका अधिकांश कारण यही है कि समाज का हिस्सा बनने से बहुत दूर हो रहे हैं। अपने जीवन को केवल भागदौड़ तक सीमित कर दिया है। यह सच है कि व्यक्ति ही व्यक्ति के काम आता है। यही सांस्कृतिक भारत की अवधारणा है।पूरे विश्व में भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में पहचाना जाता है, जब हम भारत को राष्ट्र बोलते हैं, तब हमें इस बात का बोध होना ही चाहिए कि राष्ट्र आखिर होता क्या है? हम इसका अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि राष्ट्र की एक संस्कृति होती है, एक साहित्यिक अवधारणा होती है, एक आचार विचार होता है, एक जैसी परंपराएं होती हैं। भगवान राम के जीवन में इन सभी का साक्षात दर्शन होता है, इसलिए कहा जा सकता है कि राम जी केवल वर्ग विशेष के न होकर सम्पूर्ण विश्व के हैं। उनके आदर्श हम सभी के लिए हैं। हमें राम जी के जीवन से प्रेरणा लेकर ही अपने जीवन को उत्सर्ग के मार्ग पर ले जाने का उपक्रम करना चाहिए। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
मृत्युंजय दीक्षितएबीएन एडिटोरियल डेस्क। देश में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कस ली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन इस बार और बेहतर प्रदर्शन करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। विपक्ष भी आईएनडीआईए बनाकर हुंकार भर रहा है। वर्ष 2023 में हुए कुल नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक व तेलंगाना में विजय प्राप्त हुई है। मगर इस गठबंधन में कई पेंच इतनी बुरी तरह से उलझ गये हैं कि सुलझना कठिन होता जा रहा है।भाजपा राम मंदिर, सनातन संस्कृति के उत्थान और विकसित भारत संकल्प यात्रा के बल पर लगातार आगे बढ़ती जा रही है। मगर विपक्ष का गठबंधन अभी तक चार बैठकों के बावजूद संयोजक का नाम तक तय नहीं कर पाया है। 19 दिसंबर को बैठक में कांग्रेस ने गठबंधन में शामिल दलों से सीट साझा करने पर चर्चा करने के लिए एक पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया है।जब दो राज्यों हिमाचल प्रदेश व कर्नाटक में कांग्रेस को सफलता मिली तब कुछ विश्लेषकों को ऐसा लगने लगा कि प्रधानमंत्री मोदी का जादू उतरने लगा है और कांग्रेस के नेतृत्व में संपूर्ण विपक्ष के मन में आशा का एक नया संचार हुआ है किंतु राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम का रिजल्ट आते ही इन विश्लेषकों को सांप सूंघ गया। मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भाजपा की ऐतिहासिक विजय ने विपक्ष की बोलती बंद कर दी।अगले साल 22 जनवरी को अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियां चल रही हैं। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ने इसके लिए सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मल्लिकार्जुन खड़गे, वामपंथी नेता सीताराम येचुरी सहित कई विपक्षी नेताओं को निमंत्रण भेजा। अभी यह पक्का नहीं है कि सनातन विरोधी इस गठबंधन के नेता अयोध्या जाते हैं या नहीं।माना तो यही जा रहा है कि इनमें से कई नहीं जायेंगे। सबसे ज्यादा फजीहत इस गठबंधन की साथी समाजवादी पार्टी की होनी है। कौन नहीं जानता रामभक्त कारसेवकों पर मुलायम सिंह यादव ने ही गोली चलवाई थी। मुस्लिम-यादव गठजोड़ से सत्ता पाने वाले उनके पुत्र और सपा नेता अखिलेश यादव समारोह में चले जाते हैं तो उनके एम-वाई समीकरण को गहरा आघात लगना तय है।राम मंदिर निर्माण के समर्पण अभियान पर सपा नेताओं ने संघ व भाजपा को चंदाजीवी कहकर अपमानित किया है। आम आदमी पार्टी ने दो कदम आगे जाकर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के चंपत राय पर जमीन घोटाले के फर्जी आरोप लगा दिये। वास्तविकता यह है कि आज इस पार्टी के कई बड़े नेता मनीष सिसोदिया, संजय सिंह व सुरेंद जैन सलाखों के पीछे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कथित शराब घोटाले के मुख्य किरदार बताये जा रहे हैं। ईडी का सामना तक नहीं कर पा रहे। आईएनडीआईए गठबंधन में शामिल सभी दल व नेता हिंदू सनातन संस्कृति, भारतीय सभ्यता व संस्कृति, भाषा, रहन सहन व खानपान के घोर विरोधी हैं। सभी नेता मुस्लिम तुष्टिकरण, ईसाइयत और पश्चिमी सभ्यता के आकंठ डूबे हुए हैं।मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में पराजय के बाद विरोधी दलों के नेता संतुलन ही खो बैठे हैं। द्रमुक नेता तो सनातन धर्म का उन्मूलन करने का प्रण तक ले चुके हैं। गठबंधन के बड़े सरमायेदार मोहब्बत की दुकान खोलने वाले राहुल गांधी खामोश हैं। आज राममला की प्राण- प्रतिष्ठा समारोह में जाना कांग्रेस के लिए सांप- छछूंदर की गति जैसा हो गया है। जायेंतो मुश्किल और न जाए तो भी मुश्किल। कांग्रेस के नेतृत्व में बने गठबंधन के सभी नेता हिंदू धर्म का जमकर मखौल उड़ा चुके हैं। कांग्रेस तो भगवान राम का अस्तित्व ही नकार चुकी है। ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग को फव्वारा तक कहा जा चुका है। संसद के दोनों सदनों में विपक्षी सदस्यों के सामूहिक निलंबन की ऐतिहासिक घटना के बाद ममता बनर्जी की टीएमसी के सांसद कल्याण बनर्जी संवैधानिक पद पर विराजमान उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड का मजाक बना चुके हैं। वह बार- बार कह रहे हैं कि उपराष्ट्रपति धनखड़ का हजार बार मजाक उड़ायेंगे। संसद के शीतकालीन सत्र में द्रमुक सदस्य ने गौमाता का अपमान करते हुए बयान दिया कि भाजपा केवल गोमूत्र वाले राज्यों में ही है।अभी डीएमके नेता दयानिधि मारन ने बयान दिया है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग सिर्फ हिंदी सीखते हैं और इसके बाद तमिलनाडु मजदूरी करने के लिए आते हैं। वो शौचालय और सड़कों की सफाई जैसे काम करते हैं। गठबंधन की पिछली बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिंदी में भाषण दिया तो द्रमुक नेता टीआर बालू ने उनके भाषण का अंग्रेजी अनुवाद मांग लिया। इससे नीतीश कुमार नाराज हो गये।अब यह साफ हो चुका है कि 26 दलों के इस गठबंधन के सभी नेताओं में घोर विरोधाभास है। यह सभी दल भ्रष्टाचार के दलदल में अथाह डूबे हुए हैं और गिरफ्तारी से बचने के लिए नये- नये पैंतरे चल रहे हैं । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मंत्रियों के यहां लगातार छापे पड़ रहे हैं। यह सरकार गीता समारोह का मजाक उड़ा चुकी है । झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी गिरफ्तारी की तलवार लटकी है। इन लोगों ने गांधी परिवार को दरकिनार कर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को सुनियोजित साजिश के तहत प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
मनोज शर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। बेकारे में अभिसार, पुण्य प्रसून, रविश वगैरह को लोग प्रबुद्ध पत्रकार मान बैठे थे। हकीकत में सब के सब रंगा सियार निकले। जैसे ही नेशनल चैनलों से ये भगाये गये इनका ऊपरी मुलम्मा उतर गया। एक जानकार पत्रकार काम नहीं रहने पर भी क्या नाच गाने भांड़ लबाड़ का प्रचार करने लगेगा? आज अभिसार को हमेंशा सिर्फ डंकी फिल्म का गुणगान करते देखते हैं तो लगता है, ये पत्रकार कैसे बना था? पुण्य प्रसून अपने यूट्यूब चैनल पर बेसिर पैर का इतना फेंकते रहता है कि कुछ पल्ले नहीं पड़ता। आज भी किसी मुद्दे पर वही घीसा पिटा लगातार बकवास करता है। उसे सुनकर लगता है कि डिजिटल युग में ये कैसेट टेपरिकार्डर की तरह बज रहा है।रविश कुमार अब उस डिब्बाबंद एक्सपायर खाने की तरह है जिसकी पैकिंग अच्छी है, पर अंदर सामग्री विष हो चुकी है। हर बार वही भारत-विरोधी, बहुसंख्यक विरोधी, सरकार विरोधी चपड़ चपड़। दुष्प्रचार और झूठ को अच्छे शब्दों में गंभीरता से पेश करना इसका पेशा है। याद कीजिये कोरोना काल में यह श्रीमान केरल माडल की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे और जब केरल में कोरोना विस्फोट हुआ तो चुप्पी साध लिये।दरअसल, इन पत्रकारों को टीवी मीडिया में औकात से ज्यादा वैल्यू मिल जाता है और अब हाशिये पर खदेड़ाने के बाद रेवेन्यू के लिये किसी भी हद तक जा रहे हैं, औसत सिनेमा और एक्टर एक्ट्रेस का कशीदा पढ़ रहे हैं।वर्तमान में भी ढेर हैं जिन्हें आज टीवी मीडिया से हटा दिया जाये तो इनका असली रूप सामने आ जायेगा। मैं दावे से कहता हूं कि रविश, पुण्य प्रसून, अभिसार से बहुत ज्यादा हकीकत पसंद गुणी युवा पत्रकार झारखंड में ही हैं और बेशक उनमें रांची विश्वविद्यालय मास कौम विभाग से पढ़े हुए हमारे छात्र भी हैं, कोई शक? (लेखक पत्रकारिता विभाग से जुड़े हुए हैं।)
पांच साल तक की बच्चियां सुरक्षित नहीं, क्यों खुल रही हैं व्यभिचार की साइट्स? डॉ निवेदिता शर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह घटना उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की जरूर है पर देश के लिए नयी नहीं है। मैं स्वयं कई जगह ऐसी घटनाओं पर संज्ञान लेकर पीड़ित एवं उनके परिवारजन से मिलने गयी हूं। देश में आये दिन ऐसी अनेकों वारदात हो रही हैं। इनमें जो समानता है- वह है, विकृत मानसिकता और किसी-किसी घटना में विपरीत लिंग के प्रति संबंध बनाने की जिज्ञासा। कई जानबूझकर इसके शिकार बनाये जा रहे हैं और अनेक बिना जाने कौतूहलवश इसके चंगुल में फंस अपराध कर रहे हैं। प्रश्न है आखिर इसके लिए दोष किसे दिया जाये? क्या परिवार को दोषी माना जाये? जिसकी परवरिश में कमी है। क्या संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को दोषी ठहराया जाये? जो यह नहीं सिखा पा रही कि अपने आयुवर्ग या अन्य भी किसी के साथ कैसे व्यवहार करना है। क्या इसका दोषी संपूर्ण समाज है? या फिर इस प्रकार के आ रहे मामलों के लिए राज्य एवं केंद्र की सरकार दोषी हैं? जिनका काम कानून व्यवस्था को बनाये रखना है। बलिया में घटी घटना में किशोर ने जो कहानी बतायी, वह चौंकाने वाली है। उससे यह सहज पता चलता है कि आखिर हमारे बच्चे मोबाइल में गेम खेलने के साथ वह सब भी देख रहे हैं जो कि उन्हें अभी अवयस्क रहते हुए नहीं देखना चाहिए। मेरा मानना है कि वयस्क होने पर भी इन सब से दूर ही रहना चाहिए। इस 14 साल के किशोर ने बताया कि कैसे पिता के मोबाइल में उसने अश्लील वीडियो देखा। पश्चात उसके मन में गलत ख्याल आने लगे। जब ये घटना घटी तब दोनों ही खेल रहे थे, फिर खेलते-खेलते किशोर उसे एक सुनसान जगह पर ले गया। जहां उसने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया। इस दौरान बच्ची की हालत बिगड़ गयी, यह देख किशोर बच्ची को उसी हालत में छोड़ भाग गया। खून से लथपथ बच्ची घर पहुंची तो परिजनों के होश उड़ गये। फिर पुलिस की कार्रवाई और आगे किशोर के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। जिस बच्ची के साथ यह घटना घटी वह अभी भी सदमे में है। आगे जो होना है वह इस केस में भी होगा। कानून अपना काम करेगा और जिसे सजा मिलनी है वह भी दी जायेगी। किंतु फिर वही प्रश्न घूम फिरकर सामने आ जाता है कि आखिर भारतीय समाज में इस प्रकार की वारदातें घट क्यों रही हैं? नाबालिग इसके शिकार हो रहे हैं और हमारी तमाम संवैधानिक एवं सामाजिक संस्थाएं भी मिलकर इन्हें रोकने में नाकामयाब साबित हो रही हैं! भला कौन है इसके पीछे दोषी? तो कहीं न कहीं दोषी तो हम सभी हैं। स्वभाविक तौर पर देखा जाए तो सुधार की यह प्रक्रिया आज परिवार से शुरू करते हुए समाज एवं कानून के स्तर पर सरकारों तक जाने की आवश्यकता है। यह हाल में आया आंकड़ा है जिसमें बताया गया कि भारत में 2018 के बाद से पॉर्न वीडियो देखने वालों की संख्या बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही है। लगभग 75 फीसदी की इसमें वृद्धि हुई है। इसके साथ ही भारत में मानसिक रोगियों और यौन अपराध के ग्राफ में वृद्धि देखी गई है। हां, केंद्र सरकार के इस दिशा में प्रयास जरूर बीच में कुछ समय के लिए प्रभावी दिखे, जिसमें कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई ) की सख्ती और पोर्न वेबसाइट्स को ब्लॉक करने के बाद भारत दुनिया में तीसरे स्थान से 12वें स्थान पर पहुंच गया था। किंतु तथ्य यह है कि आज देश की कुल आबादी में करीब 10 करोड़ की आबादी पॉर्न वेबसाइट के लत में है। 10 करोड़ की आबादी में करीब 3 करोड़ बच्चे और 7 करोड़ वयस्क पॉर्न वेबसाइट की चपेट में हैं। यह सही है कि सरकार ने पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध लगाते हुए एक हजार से अधिक वेबसाइट्स पर प्रतिबन्धित लगाया, लेकिन वह भी कारगर नहीं रहा, क्योंकि कई वेबसाइट अन्य नाम से फिर से इंटरनेट पर आ गयी। सजा के सख्त नियम हैं, फिर भी यह अपराध भारतीय समाज में फलफूल रहा है। समाज एवं देश में व्याप्त होती यह गंदगी रुकने को तैयार नहीं और छोटे बच्चे लगातार इसके शिकार बन रहे हैं। आज हम 2023 के आखिरी महीने में हैं। इस साल सबसे ज्यादा अश्लील फिल्में किसने देखीं? पोर्नहब के अध्ययन में सामने आया कि फिलीपींस ने। दूसरा स्थान पोलैंड का है। भारत इस सूची में तीसरा है। हालांकि कहने वाले बचाव में यह कह सकते हैं कि भारत, सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के नाते, स्वाभाविक रूप से अन्य कम जनसंख्या वाले देशों की तुलना में उच्चतम अनुपात दिखाता है। लेकिन यहां सोचिये; क्या इस प्रकार बोलकर अपनी कमियों पर पर्दा डालना उचित होगा? इस सूची में अगले स्थान पर वियतनाम, तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान हैं। मोरक्को, ईरान और जर्मनी क्रमश: 8वें, 9वें और 10वें स्थान पर हैं। पॉर्न हब की यह रिपोर्ट चेता रही है कि 11 से 16 साल के 53 फीसदी बच्चे पॉर्न वीडियो देख रहे हैं। इसमें भी चौंका देनेवाली बात यह है कि भारत में पोर्न देखने वाले कुल उपभोक्ताओं में महिलाओं की भागीदारी 30 फीसदी है, जो कि विश्व में सबसे ज्यादा है। यानी कि सिर्फ पुरुष समाज को ही इसके लिए पूरी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। महिलाएं स्वयं भी इस अपराध के लिए उनके साथ बराबर की हिस्सेदार हैं। वास्तव में यह डरावना सच हमें अपने वर्तमान और भविष्य के प्रति सावधान होने के लिए कह रहा है । बाल संरक्षण आयोग एवं अन्य संवैधानिक संस्थाएं अपराध होने पर उसे संज्ञान में लेकर उस पर कार्रवाई के लिए प्रयास कर सकती हैं, किंतु असली कार्य तो अपराध को रोकने का परिवार एवं समाज को ही करना है, जहां से अपराध की शुरूआत होती है। कार्टून, फिल्म और ओटीटी पर वेबसीरीज बनाने वाले लोग इसी समाज से आते हैं जो द्विअर्थी संवाद एवं बहुत कुछ हिंसात्मक, भाषायी रूप से अश्लील एवं घटिया सामग्री नित-रोज परोस रहे हैं। कार्टून के बीच में कंडोम के विज्ञापन आना बता रहा है कि ट्राई या अन्य नियामक संस्था का किसी को कोई डर नहीं है। मैं फिर कहूंगी कि बच्चे भोले मन के होते हैं, वह जो देखते और समझते हैं आगे वैसा ही व्यवहार करते हैं। ऐसे में सरकार इतना तो कर ही सकती है कि जितनी भी इस तरह की सामग्री इंटरनेट पर सर्च सांकेतिक भाषायी (की) से सर्च होती है, उन सभी पर रोक लगा दे। जो बाजार की जरूरत के नाम पर ओटीटी या इसी प्रकार के अन्य प्लेटफॉर्म पर अश्लीलता परोस रहे हैं, वह इसका निर्माण बंद कर दें और अभिभावक होने के नाते हम भले ही कितने ही व्यस्त हों, लेकिन यह जरूर देखें कि हमारे बच्चे मोबाइल और किसी भी स्क्रीन पर टाइम बिताते वक्त आखिर देख क्या रहे हैं। समय रहते यदि उन्हें वहीं रोक दिया जाए और सही-गलत के संबंध में तत्काल समझाया जाये तो ही एक अच्छे भविष्य की उम्मीद है, अन्यथा तो बलिया जिले जैसी घटनाएं देश भर में आगे सर्वत्र घटती रहेंगी और हम सभी उन घटी घटनाओं के पीछे का सच जानने एवं उन पर कार्रवाई करने में व्यस्त बने रहेंगे। (लेखिका, मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्य हैं।)
कुलदीप तिर्कीएबीएन सोशल डेस्क। आगमन काल याद दिलाता है भले परमात्मा हमें दिखाई नहीं देता पर उनका अस्तित्व संसार के कण कण में हैं। एक बार एक व्यक्ति नाई की दुकान पर बाल कटवाने गया। नाई और उस व्यक्ति के बीच में ऐसे ही बातें शुरू हो गई और वे लोग बातें करते-करते भगवान के विषय पर बातें करने लगे। तभी नाई ने कहा कि मैं भगवान के अस्तित्व को नहीं मानता और इसीलिए तुम मुझे नास्तिक भी कह सकते हो। तुम ऐसा क्यों कह रहे हो व्यक्ति ने पूछा। नाई ने कहा बाहर जब तुम सड़क पर जाओगे तो तुम समझ जाओगे कि भगवान का अस्तित्व नहीं है। अगर भगवान होते, तो क्या इतने सारे लोग भूखे मरते? क्या इतने सारे लोग बीमार होते? क्या दुनिया में इतनी हिंसा होती? व्यक्ति ने थोड़ा सोचा, लेकिन वह वाद-विवाद नहीं करना चाहता था इसलिए चुप रहा और नाई की बातें सुनता रहा। नाई ने अपना काम खत्म किया और वह व्यक्ति नाई को पैसे देकर दुकान से बाहर आ गया। वह जैसे ही नाई की दुकान से निकला, उसने सड़क पर एक लम्बे-घने बालों वाले एक व्यक्ति को देखा जिसकी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी और ऐसा लगता था शायद उसने कई महीनों तक अपने बाल नहीं कटवाये थे।वह व्यक्ति वापस मुड़कर नाई की दुकान में दुबारा घुसा और नाई से कहा- क्या तुम्हें पता है? नाइयों का अस्तित्व नहीं होता। नाई ने कहा- तुम कैसी बेकार बातें कर रहे हो? क्या तुम्हे मैं दिखाई नहीं दे रहा? मैं यहां हूं और मैं एक नाई हूं। और मैंने अभी अभी तुम्हारे बाल काटे है। व्यक्ति ने कहा- नहीं! नाई नहीं होते हैं। अगर होते तो क्या बाहर उस व्यक्ति के जैसे कोई भी लंबे बाल व बढ़ी हुई दाढ़ी वाला होता? नाई ने कहा अगर वह व्यक्ति किसी नाई के पास बाल कटवाने जायेगा ही नहीं तो नाई कैसे उसके बाल काटेगा? व्यक्ति ने कहा कि तुम बिल्कुल सही कह रहे हो, यही बात है। भगवान भी होते हैं लेकिन कुछ लोग भगवान पर विश्वास ही नहीं करते तो भगवान उनकी सहायता करेगा कैसे? कुछ लोगों की आम धारणा होती है जो हमें दिखाई नहीं देता, वो संसार में है ही नहीं। जबकि ऐसा नहीं है। भगवान का अस्तित्व हर जगह है। कोई माने या ना माने। यदि आप संकट के समय पूरी आस्था के साथ उसे पुकारोगे तो वह किसी ने किसी रूप में आपकी सहायता करने जरूर आयेगा। आगमन काल में हम उसी प्रभु को अपने हृदय में ग्रहण करने के लिए अपने हृदय को साफ, शुद्ध और पवित्र करते हैं। (लेखक झारखंड क्रिश्चियन यूथ एसोसिएशन के केंद्रीय अध्यक्ष हैं।)
प्रमोद भार्गवएबीएन एडिटोरियल डेस्क। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा पैसे के बदले प्रश्न पूछने के मामले में अनैतिक और अशोभनीय आचरण के कारण सत्रहवीं लोकसभा की सदस्यता खो बैठी हैं। उनके निष्कासन की सिफारिश संसद की आचार समिति ने जांच के बाद की। कुछ समय से इस बात पर बहस हो रही थी कि मोइत्रा पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई है? दरअसल धन लेकर सवाल पूछने के आरोप भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने मोइत्रा पर लगाते हुए संसद में कहा था कि उन्होंने भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी और उनकी कंपनियों को कठघरे में खड़ा करने के नजरिए से संसद में निरंतर 40 से ज्यादा प्रश्न पूछे। इसके बदले मोइत्रा ने घूस और कीमती उपहार लिए। यही नहीं उन्होंने लोकसभा पोर्टल की लॉग इन आईडी और पासवर्ड भी दुबई में रहने वाले भारतीय कारोबारी दर्शन हीरानंदानी से साझा किए। इस तथ्य को मोइत्रा ने भी स्वीकारा।सांसदों के असंसदीय आचरण संसद और संविधान की संप्रभुता को कैसे खिलवाड़ कर रहे हैं? इनके कारनामे पहले भी देखने में आते रहे हैं। नोट के बदले वोट देने से लेकर संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के स्टिंग ऑपरेशन भी हुए हैं। 1991 के आम चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर आयी थी। कई क्षेत्रीय दलों के समर्थन से कांग्रेस ने पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। जुलाई 1993 में इस जोड़तोड़ की सरकार के विरुद्ध मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सदन में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव आखिर में 14 मतों के अंतर से खारिज हो गया।इसके बाद 1996 में सीबीआई को एक शिकायत मिली, जिसमें आरोप लगाया गया कि राव की सरकार को जीवनदान देने के बदले में झारखंड मुक्ति मोर्चा के कुछ सांसदों और जनता दल के अजीत सिंह गुट को रिश्वत दी गयी थी। इस मामले में झामुमो प्रमुख शिबु सोरेन और उनकी पार्टी के चार सांसदों पर नोट लेकर वोट देने का आरोप लगा था। इन सांसदों के बैंक खातों में मिली धनराशि से भी यह पुष्टि हुई कि नोट के बदले वोट देने की कालावधि में ही यह राशि जमा हुई थी।पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की नैतिक शुचिता पर आंच 22 जुलाई 2008 को तब आई थी, जब उसने लोकसभा में विश्वास मत हासिल किया। यह स्थिति अमेरिका के साथ गैर-सैन्य परमाणु सहयोग समझौते के विरोध में वामपंथी दलों द्वारा मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापसी के कारण निर्मित हुई थी। वामदलों के अलग हो जाने के बावजूद सरकार का वजूद कायम रहा, क्योंकि उसने बड़े पैमाने पर नोट के बदले सांसदों के वोट खरीदे। इस मामले में संजीव सक्सेना और सुहैल हिन्दुस्तानी को हिरासत में लिया गया। इनकी गिरफ्तारी के बाद आये बयानों से जाहिर हुआ कि सरकार बचाने के लिए वोटों को खरीदने का इशारा शीर्ष नेतृत्व की ओर से हुआ था।सुहैल ने समाजवादी पार्टी के मौजूदा राज्यसभा के सदस्य अमर सिंह के साथ सोनिया के तत्कालीन राजनीतिक सचिव अहमद पटेल का भी नाम लिया था। वोट के बदले इस नोटकांड में अमर सिंह के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल हुई थी। इस मामले में अमर सिंह और सुधीर कुलकर्णी को प्रमुख षड्यंत्रकारी आरोपित किया गया था। संजीव सक्सेना और भाजपा कार्यकर्ता सुहैल हिन्दुस्तानी के साथ 22 जुलाई 2008 को लोकसभा में विश्वास मत के दौरान भाजपा सांसद अशोक अर्गगल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर सिंह भगोरा को वोट के बदले घूस दी थी। इसका लोकसभा में इन सांसदों ने नोटों की गड्डियां लहराकर पर्दाफाश किया था।संसदीय परम्परा और नैतिकता की दुहाई देने वाले मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए यह षड्यंत्र अमर सिंह ने रचा था। मनमोहन सिंह पर कठपुतली प्रधानमंत्री आदि आरोप भले ही लगते रहे हों, किंतु उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर अंगुली कभी नहीं उठी पर 22 जुलाई 2008 को नेपथ्य में रहकर जिस तरह से उन्होंने राजनीति के अग्रिम मोर्चे पर शिखंडी और बृहन्नलाओं को खड़ा करके विश्वास मत पर विजय हासिल की उससे कांग्रेस की सत्ता में बने रहने की ऐसी विवशता सामने आयी, जिसने संविधान में स्थापित पवित्रता, मर्यादा और गरिमा की सभी चूलें हिलाकर रख दी थीं।हमारे माननीयों में से अनेक ने घूस के लालच में नैतिकता की सभी सीमाएं लांघने का काम स्टिंग ऑपरेशन के जरिये की गयी बातचीत में भी किया है। 50 हजार की छोटी रिश्वत के लिए भी वे फर्जी विदेशी तेल कंपनी को बिना कोई सोच-विचार किये, भारत-भूमि पर उतारने के लिए तैयार हो गये थे। बिना यह शंका किए कि इस तथाकथित कंपनी का स्वदेशी कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा ?अलबत्ता, रोड़ा दूर करने की दृष्टि से पेट्रोलियम मंत्रालय को सिफारिशी पत्र भी लिख दिये थे। लालच और लापरवाही की यह बैखौफ स्थिति एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिये सामने आयी थी। कई प्रमुख दलों के 11 सांसद रिश्वत का लेन-देन करते हुए गोपनीय कैमरे की आंख में कैद हो गये थे। यह स्टिंग ऑपरेशन कोबरा पोस्ट के प्रमुख अनिरुद्ध बहल ने किया था। इन सांसदों में कांग्रेस, भाजपा, बसपा और अन्नाद्रमुक के सांसद शामिल थे। साफ है, भृष्टाचार की कोई दलीय सीमा नहीं है। कोई वैचारिक विभाजन नहीं है। चोर-चोर मौसेरे भाई हैं।इसके पहले भी कोबरा पोस्ट ने ही इसी प्रकृति के एक और स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया था। इसमें 11 सांसदों पर पैसा लेकर संसद में सवाल पूछने का आरोप लगा था। तब इन सभी को संसद से बर्खास्त कर दिया गया था। इस ऑपरेशन की गिरफ्त में भाजपा के दिलीप सिंह जूदेव, भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण, जया जेटली और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी भ्रष्टाचार व अनैतिकता बरतने को तैयार होते हुए कैमरे में कैद कर लिये गये थे। जब इन स्टिंग ऑपरेशन का खुलासा सामाचार चैनलों पर हुआ तो जूदेव छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गये। अजीत जोगी को कांग्रेस से निलंबित होना पड़ा। बंगारु लक्ष्मण से भाजपा ने अध्यक्षी छीन ली। जया जेटली को रक्षा सौदों के लिए घूस लेते हुए दिखाया गया था, जो तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस से जुड़ी थीं। लिहाजा जाॅर्ज को रक्षा मंत्री का पद छोड़ना पड़ा।दरअसल, जब राजनीति का मकसद ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज बने रहने और जायज-नाजायज तरीकों से धन कमाने का हो जाये, तब सवाल संसद में प्रश्न पूछने का हो अथवा विश्वास मत के दौरान मत हासिल करने का, राष्ट्र और जनहित गौण हो जाते हैं। प्रजातंत्र के मंदिरों में जो परिदृश्य दिखाई दे रहे हैं, उनसे तो यही जाहिर होता है कि राष्ट्रीय हित अनैतिक आचरण और बाजारवाद की महिमा बढ़ाने में समर्पित किए जा रहे हैं। महुआ मोइत्रा के ताजा मामले से साफ हुआ है कि सांसद संविधान और लोकतंत्र की गरिमा से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहे।उस समय सर्वोच्च न्यायालय ने कथित आरोपित सांसदों को संविधान के अनुच्छेद 105 में दर्ज प्रावधान के अंतर्गत छूट दी थी। इसमें प्रावधान है कि किसी सांसद द्वारा संसद के भीतर की गई कायर्वाही को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। फिर चाहे वह कोई टिप्प्णी हो, दिया गया वोट हो या फिर संबंधों से संबंधित हो। ऐसे प्रावधान संविधान निर्माताओं ने शायद इसलिए रखे होंगे, जिससे जनप्रतिनिधि अपने काम को पूरी निर्भीकता से अंजाम दे सकें। उन्हें अपनी अवाम पर इतना भरोसा था कि जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि नैतिक दृष्टि से इतना मजबूत तो होगा ही कि वह रिश्वत लेकर न तो अपने मत का प्रयोग करेगा और न ही सवाल पूछेगा?लेकिन यह देश और जनता का दुर्भाग्य ही है कि जब बच निकलने के ये कानूनी रास्ते सार्वजनिक होकर प्रचलन में आ गये तो सांसद अपने नैतिक और संवैधानिक दायित्व से भी विचलित होने लग गये। अब सीता सोरेन बनाम भारतीय संघ मामले में सुनवाई करते हुए सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पांच सदस्यीय पीठ ने इस लेन-देन को गंभीरता से लिया है। पीठ ने कहा है कि सदन में वोट के लिए रिश्वत में शामिल सांसदों और विधायकों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया से बचने की छूट पर पुनर्विचार के लिए सात जजों की पीठ बनायी जायेगी। यह पीठ तय करेगी कि सांसद या विधायक सदन में मतदान के लिए घूस लेता है तो उस पर अदालत में मुकदमा चलेगा अथवा नहीं? यह आदेश चार अक्टूबर, 2023 को सीता सोरेन की याचिका पर सुनाया गया है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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