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Published / 2023-06-20 08:49:54
शहरी कचरा प्रबंधन के लिए गंभीर रणनीति जरूरी

  • अमेरिका और चीन हर साल दुनिया भर में 20 करोड़ टन से अधिक नगरपालिका के स्तर का कचरा तैयार करते हैं

अमित कपूर

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनिया में जैसे-जैसे शहरीकरण की गति तेज होती जा रही है, वैसे ही नगरपालिका के स्तर पर बढ़ता कचरा एक कठिन चुनौती पेश कर रहा है। दुनिया शहरी भविष्य की दिशा की ओर अग्रसर हो रही है लेकिन शहरी जीवन शैली के परिणामस्वरूप सबसे महत्त्वपूर्ण उप-उत्पादों में से एक नगरपालिका के स्तर पर जमा होने वाले ठोस कचरे (एमएसडब्ल्यू) की तादाद शहरीकरण की दर से भी अधिक तेजी से बढ़ रही है।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट व्हाट ए वेस्ट: ए ग्लोबल रिव्यू ऑफ सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट में कहा गया है कि 2.9 अरब लोग 10 साल पहले महानगरीय क्षेत्रों में रहते थे और प्रति व्यक्ति, रोजाना 0.64 किलोग्राम नगरपालिका ठोस कचरा (0.68 अरब टन सालाना) तैयार होता था। हालांकि, लगभग 3 अरब लोग आज शहरों में रहते हैं और प्रति व्यक्ति के हिसाब से रोजाना 1.2 किलोग्राम ठोस कचरा (1.3 अरब टन प्रति वर्ष) तैयार कर देते हैं।

इस अनुमान के मुताबिक कोई भी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि वर्ष 2025 तक, 2.2 अरब टन नगरपालिका ठोस कचरा तैयार हो सकता है क्योंकि शहरी आबादी 4.3 अरब तक बढ़ जायेगी। अमेरिका और चीन हर साल दुनिया भर में 20 करोड़ टन से अधिक नगरपालिका के स्तर का कचरा तैयार करते हैं।

विश्व बैंक के अनुसार उच्च आमदनी वाले देशों में वर्ष 2050 तक रोजाना प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन 19 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है जबकि निम्न और मध्यम आमदनी वाले देशों में यह लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक बढ़ने का अनुमान है।

इसके अलावा यह भविष्यवाणी की गई है कि कम आय वाले देशों में कचरा उत्पादन वर्ष 2050 तक लगभग तीन गुना बढ़ जायेगा। कुल कचरा उत्पादन के संदर्भ में देखा जाए तो पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र सबसे अधिक कचरे (23 प्रतिशत) का उत्पादन करते हैं और पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में सबसे कम (6 प्रतिशत) कचरा होता है।

उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया, पश्चिम पूर्व और उत्तरी अफ्रीका जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में कचरा उत्पादन की दिशा पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और आर्थिक पहलू को भी महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करेगा जिसको ध्यान में रखते हुए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता होगी। वर्तमान में, आधे से अधिक कचरे को खुले तौर पर इन क्षेत्रों में फेंक दिया जाता है।

शहरीकरण के अपने लाभ भी हैं लेकिन अगर शहरीकरण की योजना अनियोजित है और यह शहरों में रहने वाले लोगों की सहूलियत के अनुकूल नहीं है तब कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। हमें सिर्फ ऐसे शहरों की जरूरत नहीं है जो ग्रामीण इलाकों को छोड़ने वाली आबादी को रखने के लिए पर्याप्त हों बल्कि हमें ऐसे शहरों की आवश्यकता है जो उन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं जो अपने नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन में बाधा ला सकते हैं।

नगरपालिका कचरा प्रबंधन न केवल महत्त्वपूर्ण है बल्कि शहरी प्रशासन का एक आवश्यक कार्य है, खासतौर पर महामारी के बाद की दुनिया में। खराब तरीके से प्रबंधित कचरे के परिणामस्वरूप आमतौर पर ऐसे खर्च होते हैं जो लंबे समय में कचरे को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने की तुलना में अधिक होते हैं। कचरे के खराब प्रबंधन का स्वास्थ्य, पर्यावरण और वैश्विक स्तर पर पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

नगरपालिका के ठोस कचरे का वैश्विक आयाम, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इसकी बढ़ती भूमिका और वस्तुओं, शहरी चलन और प्रसंस्करण क्षेत्र के बीच बढ़ते परस्पर संबंध से भी साबित होता है। कचरा और ऊर्जा कार्यबल से जुड़ी एक रिपोर्ट (अक्टूबर 2017 में जारी) के अनुसार, भारत के शहरी क्षेत्रों में 37.7 करोड़ लोग अनुमानित तौर पर 6.2 करोड़ टन ठोस कचरे का उत्पादन सालाना करते हैं। शहरी प्रशासन तंत्र को सक्रिय करने और भारत में स्वच्छ भारत मिशन-शहरी जैसे अभियानों में लोगों की व्यापक भागीदारी की पहल से आगे का रास्ता तैयार हो सकता है।

औद्योगीकरण, समाजीकरण और क्षेत्रीय जलवायु के स्तर सभी नगरपालिका के ठोस कचरे की उत्पादन दरों को प्रभावित करते हैं। आमतौर पर, उत्पादित ठोस कचरे की मात्रा, आर्थिक विकास और शहरीकरण दर के साथ बढ़ती है।

शहरीकरण और आमदनी के स्तर में गहरा संबंध है और जैसे-जैसे खर्च करने योग्य आमदनी और जीवन स्तर बढ़ता है, वैसे-वैसे वस्तुओं तथा सेवाओं की खपत के साथ ही उत्पादित कचरे की मात्रा भी बढ़ती है। शहरी क्षेत्रों के निवासी, ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में लगभग दोगुना कचरा पैदा करते हैं। इस तरह के कचरे के अस्वास्थ्यकर, अवैज्ञानिक और खराब निपटान के परिणामस्वरूप पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियां खड़ी हो जाती हैं।

इस संबंध में, कचरा प्रबंधन के लिए एक एकीकृत रणनीति की दरकार है जिसमें रकम मुहैया कराने, निर्माण और उन केंद्रों का संचालन शामिल है जहां शहरी अपशिष्ट प्रबंधन की वर्तमान समस्याओं का प्रबंधन करने के लिए कचरे को अलग करने के तरीके, संग्रह, परिवहन, दोबारा प्रसंस्करण, इसके निपटान की सुविधाएं दी जा सके।

इस संदर्भ में, वैश्विक कचरा उत्पादन के आंकड़े दो प्रमुख मुद्दों का संकेत दे सकते हैं जैसे कि कचरे को स्थायी रूप से प्रबंधित करने के लिए शहरों में सक्रिय शासन तंत्र की कमी और नागरिकों के उपभोग का रुझान और व्यवहार बड़ी मात्रा में कचरे को बढ़ावा देता है।

अपर्याप्त संसाधनों और मौजूदा प्रणालियों में व्याप्त कमियों ने शहरी बुनियादी ढांचा सेवाओं, विशेष रूप से शहरी ठोस कचरा प्रबंधन पर भारी दबाव डाला है। इसीलिए शहरी कचरे को पर्यावरण प्रदूषण का कारक न बनाए जाने और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम पैदा करने से रोकने के लिए शहरी स्थानीय निकायों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे अपनी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को टिकाऊ तरीके से बढ़ाएं, संचालित करें और उसका बेहतर तरीके से रख-रखाव करें।

इसके लिए महत्त्वपूर्ण तरीके से पूंजी निवेश, अत्याधुनिक, लागत प्रभावी प्रौद्योगिकियों को शामिल करने, अपशिष्ट प्रबंधन में सार्वजनिक-निजी भागीदारी के साथ ही उचित कचरा प्रबंधन की शुरूआत करने की आवश्यकता होगी। (कपूर इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटिटिवनेस, भारत के अध्यक्ष और यूएसएटीएमसी, स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में व्याख्याता हैं। देबरॉय भारत के प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं)

Published / 2023-06-12 17:26:35
पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी की आत्मकथा अत्यंत ही प्रेरणादायी ग्रंथ

रथीन भद्रा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मित्रों हुतात्मा पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी का 11 जून को जन्मदिवस था। आइये भारत मां के इस वीर पुत्र को नमन करें। पंडित जी की आत्मकथा अत्यंत ही प्रेरणादायी ग्रंथ है, इसे प्रत्येक भारतीय को अवश्य पढ़ना चाहिए। हम उसका एक अंश यहां प्रस्तुत कर रहे हैं... 

मेरी मां 

11 वर्ष की उम्र में माता जी विवाह कर शाहजहांपुर आयी थीं। उस समय वह नितांत अशिक्षित और ग्रामीण कन्या के सदृश थीं। शाहजहांपुर आने के थोड़े दिनों बाद श्री दादी जी ने अपनी बहन को बुला लिया। उन्होंने माता जी को गृह-कार्य की शिक्षा दी। थोड़े दिनों में माता जी ने घर के सब काम-काज को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं। 

मेरे जन्म होने के पांच या सात वर्ष बाद उन्होंने हिन्दी पढ़ना आरंभ किया। पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ था। मुहल्ले की सखी-सहेली जो घर पर आया करती थी, उन्हीं में जो कोई शिक्षित थीं, माता जी उनसे अक्षर-बोध करतीं। इस प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उस में पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अवलोकन करने लगीं। 

मेरी बहनों की छोटी आयु में माता जी ही उन्हें शिक्षा दिया करती थीं। जब मैंने आर्य-समाज में प्रवेश किया, तब से माता जी से खूब वार्तालाप होता। उस समय की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गये हैं। यदि मुझे ऐसी माता न मिलती तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भांति संसार चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता। 

शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की है, जैसी मेजिनी को उनकी माता ने की थी। यथासमय मैं उन सारी बातों का उल्लेख करूंगा। माताजी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यह था कि किसी की प्राण हानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राण दण्ड न देना। उनके इस आदेश की पूर्ति के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी। 

जन्मदात्री जननी! इस दिशा में तो तुम्हारा ऋण-परिशोध करने के प्रयत्न का अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूं तो भी मैं तुम से उऋण नहीं हो सकता। जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुम ने किस प्रकार अपनी देव वाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है। 

तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी, जो कुछ शिक्षा मैंने ग्रहण की उसका श्रेय तुम्हीं को है। जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश करती थीं, उसका स्मरण कर तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और मस्तक नत हो जाता है। तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्नेह से हर एक बात को समझा दिया। 

यदि मैंने धृष्तापूर्ण उत्तर दिया तब तुम ने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो। किंतु ऐसा करना ठीक नहीं, इसका परिणाम अच्छा न होगा। जीवनदात्री! तुम ने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन-पोषण ही नहीं किया किंतु आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं। जन्म-जन्मान्तर परमात्मा ऐसी ही माता दें। 

महान से महान संकट में भी तुम ने मुझे अधीर न होने दिया। सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सान्त्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक तृष्णा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। 

किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु का दु:ख-सम्वाद सुनाया जायेगा। मां! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता-भारत माता की सेवा में अपने जीवन को बलि-वेदी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कुक्ष को कलंकित न किया, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। 

जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जायेगा, तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जायेगा। गुरु गोविंदसिंहजी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु का संवाद सुना था, तो बहुत हर्षित हुई थी और गुरु के नाम पर धर्म रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई बांटी थी। जन्मदात्री! वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूं। (लेखक राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच रांची झारखंड के महासचिव हैं।)

Published / 2023-06-10 19:27:02
अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस (12 जून) के पीछे एक भारतीय का संघर्ष

जितेंद्र परमार

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पूरी दुनिया हर साल 12 जून को अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस के रूप में मनाती है। लेकिन आज से करीब दो दशक पहले की स्थिति अलग थी। उस समय दुनिया को बाल मजदूरों की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं था और न ही विश्व के नेताओं ने बाल श्रम व दासता को अपराध माना था। लेकिन, इन सबके बीच एक भारतीय ने बाल श्रम को लेकर पूरी दुनिया के नजरिये को ही बदल दिया।

कैलाश सत्यार्थी ने बाल श्रम के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय कानून बनाने और बाल मजदूर व गुलामी के शिकार बच्चों के लिए साल में एक दिन समर्पित करने की मांग को लेकर 17 जनवरी, 1998 को फिलीपींस के मनीला से एक ऐतिहासिक वैश्विक जनजागरूकता यात्रा की शुरुआत की थी। 

यह यात्रा करीब पांच महीने तक चली थी। इस दौरान यह 103 देशों में 80,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर छह जून, 1998 को जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के मुख्यालय पहुंची थी। उस समय संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन केंद्र में आईएलओ का एक महत्वपूर्ण वार्षिक सम्मेलन आयोजित हो रहा था।

आईएलओ सम्मेलन के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था, जब किसी सिविल सोसायटी के व्यक्ति को इसे संबोधित करने का मौका दिया गया। इसके तहत कैलाश सत्यार्थी के साथ दो बच्चों को इस वैश्विक मंच पर अपनी बात रखने के लिए बुलाया गया। कैलाश सत्यार्थी ने अपने संबोधन में बाल श्रम के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय कानून बनाने और बाल श्रम निषेध के लिए एक विशेष दिन घोषित करने की मांग की।

इसके एक साल बाद 17 जून, 1999 को बाल श्रम उन्मूलन को लेकर आईएलओ कनवेंशन- 182 पारित कर दिया गया। यह बाल श्रम के खिलाफ लड़ाई में कैलाश सत्यार्थी की एक बड़ी जीत थी। इस कनवेंशन पर बहुत ही कम समय में संयुक्त राष्ट्र के सभी 187 सदस्य देशों ने हस्ताक्षर कर दिये।

वहीं, बाल श्रम निषेध को लेकर एक विशेष दिन घोषित किये जाने की मांग को पूरा किया गया। साल 2002 में इसकी घोषणा की गयी कि हर साल 12 जून को अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जायेगा।

Published / 2023-06-09 22:24:17
बृजभूषण के बहाने केंद्र को घेरने का चक्रव्यूह व्यर्थ, अब क्या करेगा विपक्ष...

डॉ मयंक चतुर्वेदी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। एक खबर आई और देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। हमलावर विपक्ष के हाथ से रेत की तरह मुद्दा फिसल गया। भाजपा के विरोधियों ने केंद्र की मोदी सरकार को बृजभूषण के बहाने घेरने के लिए झूठ का कितना बड़ा महल खड़ा किया, वह अब सभी के सामने आ गया है। दावे इतने किये गये कि पहलवान तो पहलवान कई राजनीतिक पार्टियां, अपने को किसान संगठन कहनेवाले अनेक दल मुद्दे को पकड़कर भागने की दौड़ में लग गये थे। देखें, आखिर जीतता कौन है।

 इस पूरे प्रकरण की शुरूआत इस साल 18 जनवरी को हुई थी, जब देश के नामी रेसलर बंजरग पुनिया, विनेश फोगाट और साक्षी मलिक दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे और भारतीय कुश्ती संघ (डब्ल्यूएफआई) के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर तानाशाही करने एवं भेदभाव के आरोप लगाए। उस समय वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीत चुकी विनेश फोगाट को पूरे देश ने रोते हुए देखा था। इन लोगों के साथ उन तमाम मोदी विरोधी आन्दोलन जीवियों को भी देखा गया था, जोकि हर उस आन्दोलन में दिखाई देते रहे हैं जो किसी न किसी रूप में केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा के विरोध में किये गये।

विनेश फोगाट ने आरोप लगाया कि बृजभूषण सिंह और कोच महिला पहलवानों का यौन शोषण करते हैं। जब हम इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं तो हमें ये धमकाते हैं। उन्हें खेल के दौरान पर्याप्त सुविधाएं नहीं दी जाती। यहां तक कि ओलंपिक में खिलाड़ियों को फिजियो तक नहीं मिलता है। जिस नाबालिग पहलवान को आगे कर बृजभूषण सिंह पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था।

जिसके लिए देश की महान खिलाड़ी भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष क्वीन आफ ट्रैक एंड फील्ड पीटी उषा से जंतर मंतर पर पहलवानों के समर्थकों ने बदतमीजी, धक्का-मुक्की की। यहां तक कि पहलवानों की एक समर्थक महिला ने उन पर थप्पड़ तक चला दिया, जैसा कि मीडिया रिपोर्ट्स में आया भी। जिसके बाद उनकी डबडबायी आंखों वाली तस्वीरें देश और दुनिया ने भी देखीं।

फिर शुरू होता हुआ दिखा जंतर मंतर पर एक के बाद एक विपक्षी नेताओं का जमावड़ा। कभी खाप पंचायतों को तो कभी देशद्रोही तत्वों को जंतर मंतर पर देखा गया। मोदी तेरी कब्र खुदेगी, हमें चाहिए आजादी जैसे नारे भी लगे। यहां से केंद्र को परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गयी और खाप पंचायतों ने दिल्ली को ट्रैक्टरों से पाट देने की धमकी दी। प्रियंका गांधी के बहाने कांग्रेस, आप जैसी राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे को भुनाने के लिए सबसे आगे दिखीं। प्रियंका गांधी की अपील आयी कि पहलवानों का साथ दें। 

इसी बीच धरना स्थल जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी खिलाड़ियों का समर्थन किया। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने खुलकर केंद्र की भाजपा सरकार पर आरोप लगाये। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि हमारे पहलवानों को पीटा गया और प्रताड़ित किया गया। मैंने पहलवानों से बात की और उन्हें अपना समर्थन दिया, हम उनके साथ हैं। ममता बनर्जी ने पहलवानों के प्रदर्शन को लेकर केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा। कांग्रेस नेता और हरियाणा से राज्यसभा सदस्य दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी पहलवानों में सबसे आगे वाली पंक्ति में दिखे।

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ऐसे में भला कैसे पीछे रहनेवाली थीं, वह भी इस मुद्दे में कूद गयीं। उन्होंने इस प्रकरण में लापरवाही बरतने के आरोप में दोषी पुलिस अफसरों तक पर एफआईआर करने की सिफारिश भेज दी। किसान नेता राकेश टिकैत ने तो दो जून को हरियाणा के कुरुक्षेत्र में खाप की बैठक के बाद ऐलान ही कर दिया था कि केंद्र सरकार के पास नौ जून तक का समय है। 

हम बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी से कम पर कोई समझौता नहीं करेंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो हम नौ जून को जंतर-मंतर जायेंगे और देश भर में पंचायत करेंगे। पहलवानों पर लगे मुकदमे वापस हों और बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी हो। इस आन्दोलन को शशि थरूर का भी साथ मिला और न जानें कितने दिग्गज नेताओं का साथ मिला है कि उसके लिए लिखने के शब्द भी कम हैं। इस तरह से वे सब कुछ तरह-तरह के प्रयास किए गए कि कैसे हम मोदी सरकार को घेर सकते हैं और उस पर दबाव बना सकते हैं। किंतु अब क्या? इस पूरे प्रकरण की हवा निकल गयी है।

बृजभूषण शरण सिंह को लेकर याद आता है वह समय,जब उन पर ये आरोप लगाये जा रहे थे, तब उन्होंने साफ कर दिया था कि अगर ये आरोप साबित हो गये तो वो फांसी पर लटकने को तैयार हैं। उन्होंने खुद पर लगे सभी आरोपों का खंडन किया था और आज उनकी बात सत्य साबित हुई है। वस्तुत: बृजभूषण शरण सिंह साल 2011 से ही भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष हैं। वह पहलवानों को समर्थन दे रहे हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बेटे दीपेंदर हुड्डा को भी एक अध्यक्ष पद के चुनाव में हरा चुके हैं। उन्होंने भारतीय कुश्ती संघ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नयी पहचान दिलायी है।

आखिर फिर क्या मामला था जो उनका इतना विरोध किया गया? देखा जाए तो इसमें गहरी राजनीति छिपी हुई है। कुश्ती संघ के नियम कहते हैं कि कोई व्यक्ति अधिकतम तीन बार अध्यक्ष रह सकता है। जोकि बृजभूषण सिंह पूरे कर चुके हैं। अब भले ही वे महासंघ में अध्यक्ष नहीं बने किंतु उनके दबदबे को देखते हुए उनका कोई समर्थक ही अध्यक्ष बनेगा, जैसा कि सबसे अधिक प्रबल संभावना है। इसलिए उनके विरोधी चाहते थे कि किसी भी तरह से उनकी गिरफ्तारी हो जाये। कुश्ती संघ के अध्यक्ष का चुनाव होते वक्त वे जब सामने मौजूद ही नहीं रहेंगे तो स्वभाविक तौर पर चुनाव पर उनका प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन अब उस बेटी के पिता ने ही आगे आकर पूरे मुद्दे की हवा निकाल दी है, जिसने कि बृजभूषण शरण सिंह पर आरोप लगाये थे। ऐसे में अब पहलवानों के इस आन्दोलन का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

नाबालिग पहलवान के पिता ने बता दिया है कि उसने डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष के खिलाफ यौन उत्पीड़न की झूठी शिकायत दर्ज करायी थी क्योंकि वह अपनी बेटी के साथ हुई नाइंसाफी से नाराज था। इस पिता ने कहा है कि सरकार ने पिछले साल मेरी बेटी की हार (एशियाई अंडर 17 चैम्पियनशिप ट्रायल) की निष्पक्ष जांच का वादा किया है। मेरा भी फर्ज बनता है कि अपनी गलती सुधारूं। इस पिता ने बता दिया है कि कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के प्रति उनके मन में कड़वाहट की शुरुआत लखनऊ में 2022 में एशियाई अंडर 17 चैम्पियनशिप के ट्रायल से हुई थी, जिसमें नाबालिग लड़की फाइनल में हारकर भारतीय टीम में जगह नहीं बना सकी थी। उन्होंने रैफरी के फैसले के लिये बृजभूषण को दोषी मान लिया था। इसलिए बदले की भावना से भर गया था, मैंने बदला लेने का फैसला किया था।

चलो, इस पिता की सच्चाई अब सबके सामने आ चुकी है । फिर भी आप उम्मीद रख सकते हैं कि यह मोदी सरकार है, जो जांच बृजभूषण के खिलाफ शुरू हुई है वह अपने परिणाम तक अवश्य पहुंचेगी। उन पर जो एक नाबालिग सहित सात महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न का आरोप है। इसको लेकर दिल्ली पुलिस ने सिंह के खिलाफ पॉक्सो एक्ट सहित दो एफआईआर दर्ज की हैं। अब इस नबालिग खिलाड़ी के पिता के बयान सामने आने के बाद आगे इस मामले में पॉक्सो एक्ट का प्रकरण समाप्त हो जाएगा, किंतु फिर भी छह महिला पहलवानों के आरोप बरकरार हैं। 

जैसा कि खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने प्रदर्शनकारी पहलवानों के साथ अपनी मुलाकात में कहा भी था कि बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होगी। दिल्ली पुलिस पहलवानों के खिलाफ 28 मई को दर्ज एफआईआर भी वापस लेगी। वह तो होगा ही। मोदी सरकार में न्याय मिलता है अभी तक ये दिखता आया है। उम्मीद रखें इस खुलासे के बाद इस प्रकरण में जिन्हें भी आपत्ति है, उन्हें भी न्याय जरूर मिलेगा, लेकिन अब जो नहीं हो पायेगा, वह है इस मुद्दे पर राजनीति।

Published / 2023-06-03 21:40:01
सहज-सहज सब कोउ कहै, सहज न चिन्है कोई...

कबीर जयंती 04 जून विशेष 

गिरीश्वर मिश्र 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कबीर के माध्यम से हम अपने समय को ठीक से पहचान सकते हैं। कबीर कभी बड़े आसान लगते हैं तो कभी बड़े मुश्किल। हिंदी के पंडितों ने उनकी कई तरह से व्याख्या की है। कबीर को तमाम तरह के खेमों में रखा गया है। वह बड़े पक्के भक्त हैं, शुद्ध वैष्णव हैं, सूफी हैं और प्रेम के कवि तो हैं ही। वे ब्रह्म और ईश्वर की पहचान कराने वाले कवि और भक्त हैं। ज्यादातर लोग उन्हें संत कहकर समझाना चाहते हैं। 

उन्हें दलित चेतना का विचारक कह कर भी पेश किया गया है। इन सबके बीच असली कबीर कौन हैं यह पहचानना और भी कठिन हो गया है। वे वाचिक परम्परा के कवि और संत हैं। उन्होंने जो कुछ कहा उसका मौखिक आधार अधिक है। कई जगह से उनकी रचनाओं को विद्वानों और भक्तों ने एकत्र किया है। इसलिए उनके पाठ की प्रामाणिकता सिद्ध करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। 

कबीर बहुत जटिल हैं, जटिल इसलिए कि वह हम सब जैसे आदमी भी हैं और उससे ऊपर उठकर वह कवि भी हो जाते हैं और उससे उठकर वह सिद्ध भी हो जाते हैं। कबीर को पहचानना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है कि कबीर को लेकर जो किवदंतियां हैं, कहानियां हैं, वे उनको अलग-अलग घरोंदों में रखती है। 

इस तरह किसी एक तरह के कबीर नहीं हैं। नाना प्रकार के कबीर जगह-जगह फैले हुए जो कबीर पंथी हैं और हम जिस कबीर को पढ़ते हैं, दोनों में बहुत दूरी है। कबीर को भगवान का रूप दे दिया गया। कबीरपंथी नाना प्रकार से उनकी पूजा करते हैं। यह सब जो दुनिया की खुदाई है, उसका अपना सब लफड़ा है, वह उनको बनाता रहेगा, बिगाड़ता रहेगा। 

यह पृष्ठभूमि है जो जटिल बनाती है, कबीर तक हमें पहुंचने में कठिनाई पैदा करती है कि कबीर को कहां से देखा जाये? और क्या देखा जाये? कबीर हमारे लिए इसलिए भी प्रासंगिक हैं कि वो पूरे समग्र समाज को देखते हैं। कोई ऐसी जाति नहीं होगी जिसका उल्लेख उन्होंने न किया हो, कोई ऐसा धर्म नहीं होगा जिसका उल्लेख नहीं पायेंगे। जितनी भारत की विविधता है, वह सारी की सारी कबीर में दिखाई देती हैं। 

कबीर इस्लामी शासन था। बहुत सारे इस तरह के प्रमाण हैं जो यह बताते हैं कि उस समय धर्म परिवर्तन की भी बात होती थी। तमाम तरह के अत्याचारों की भी बात होती है। यह आत्मरक्षा का माध्यम था। जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं, यह गलत शब्द है। क्योंकि यह हिंदुत्व का दिया हुआ है ही नहीं। वह तो किसी और ने नाम दे दिया कि हिन्दू धर्म है। 

असली नाम तो शाश्वत धर्म हो सकता है क्योंकि उसकी बात हर जगह है। जिन लोगों ने इसका उपयोग किया और हम लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया। यह गुलामी की मानसिकता की एक प्रवृत्ति है। अंग्रेजों ने जिन-जिन रूपों में भारत को पहचाना, उन-उन रूपों को हमने स्वीकार कर लिया कि वही हम हैं, जैसा वे कह रहे थे। 

कबीर एक खास तरह के जीवन दृष्टि को प्रतिपादित करते हैं। बहुत तार्किक तरीका है उनका, विश्लेषण करते हैं, तथ्यों को बताते हैं। यह भी बताते हैं कि रास्ता क्या है? वह अपने समय में स्थित आंकड़ों का विश्लेषण करके निष्कर्ष भी निकाल लेते हैं। यह भी दिखलाते हैं कि कहीं न कहीं तमाम बाह्याडंबरों को हरा करके एक निखालिस मनुष्यता बचती है। 

यदि उस मनुष्यता को अपनाया जाये, उसके रास्ते पर चला जाये तो हम आत्मानुभूति कर सकते हैं। वह आत्मानुभूति ऐसी होगी जो भेद-भाव नहीं करेगी। वह सबके निकट होगी। सभी संत कवियों ने, लोक जीवन की भाषा को अपनाया है, यह बहुत बड़ी क्रांति थी। वह खेत में काम करने वाले गृहस्थ की भाषा है, वह पंडित की भाषा नहीं है। मगर पंडित की भाषा संस्कृत में जो कुछ हो रहा था वह सब वे जान रहे थे। 

उन्होंने सिद्ध किया कि लोक भाषा में भी गहन चिंतन किया जा सकता है। यह बड़ी मार्के की बात है। वे जन कवि हैं न कि आभिजात्य वाले। यह अपनी कविता के लिए कच्चा माल भी वहीं, आम जिंदगी से लेते हैं। चर्चा भी उन्हीं की करते हैं। यह एक पैराडाइम शिफ्ट है, एक प्रारूप नये ढंग का है। इसमें ज्ञान के आभिजात्य और जनता का जो भेद है, इसे दूर किया गया। कबीर की बातें जीवन की बातें है। वह केवल आदर्श की बात नहीं है। 

कबीर यह भी कहते हैं कि जो विचार नहीं करता है, उसके लिए तो मस्ती ही मस्ती है- सुखिया सब संसार है खावै अरु सोवै, दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै। विचार करने की कुछ कीमत तो आप को अदा करनी पड़ेगी। आप पहचानियेगा तो आप को पहचाना जायेगा। आप को खेमों में रखा जायेगा। कबीर कई तरह से सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। भाषाओं में, विचार में, तर्क के ढंग में, कहने के ढंग में। उलटबांसियों का अर्थ लगाना आसान नहीं है। 

घर से बाहर निकल कर वह तमाम लोगों से बात करते थे। बताते थे देखो यह गलत है और फिर स्वयं अपनी साधना में डूबे रहते थे। अपने जीवन को, अपने अनुभवों को आत्म-मंथन करना, आत्म-विचार करना, आत्म-बोध की उनकी यात्रा निरंतर चलती रहती है। वह अकेली भी है और साथ-साथ भी है। वह समाज की ओर अभिमुख भी है और स्वयंचेता भी। 

उनके विचारों में वे बहुत सारी उक्तियां मिलती हैं जिनसे हम उनको समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए उनकी एक बहुत प्रसिद्ध उक्ति है- हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साधु। हद बेहद दोऊ चले, ताकर मता अगाथ। इसे आप जिस रूप में भी लें, हद और बेहद स्थापित है, जो परम्परा है, जो परम्परा के परे है, जो सीमित है और जो व्यापक है। दोनों को समझना जरूरी है। 

कबीर की कविता में निषेध बहुत प्रखर रूप से प्रकट होता है। शायद उनके सामने जिस तरह की समस्यायें थी उन्हें देखते हुए उनका खंडन करना, उन पर चोट करना जरूरी था। इस मामले में वह बहुत ही कट्टर हैं। कट्टर इस अर्थ में हैं कि वह किसी को छोड़ते नहीं हैं- कांकर पाथर जोड़ि कै, मस्जिद लेई बनाई। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाई। यह कहने की हिम्मत है उनको। वह चाहे हिन्दू धर्म की जाति की परेशानियां हों या इस्लाम की परेशानियां, दोनों को कहीं न कहीं चोट पहुंचाते हैं। 

वह सहज मार्ग वाले हैं : सहज-सहज सब कोउ कहै, सहज न चिन्है कोई। जिन सहजै विषया तजि, सहज कही जे सोई। इस सहज शब्द को, समझना कठिन है। यह सहजता, यह स्वाभाविकता कैसे आई? सहजता को जीवन में कैसे लाया जाये। सहज को खोजना शायद यह उनके जीवन का केंद्रीय तत्व था। 

सहज को ढूंढ़ना ही उनका एक मार्ग था, जिसको उन्होंने आविष्कार किया। सत्य का अन्वेषण और सहज का मार्ग, यह रास्ता चुना उन्होंने, जो किसी के लिए भी सुगम हो सकता है, सहज हो सकता है। आसानी से जिसका उपयोग किया जा सकता है। कबीर ने कई तरह से चेतावनी दी है कि हम किस तरह से, उस सहज के मार्ग को पा सकते हैं। इस बात को खोजने की कोशिश उन्होंने की है। यह भी उन्होंने बार-बार दिखलाने की कोशिश की है कि भाई, सत्य कई नहीं है। 

नाम तरह-तरह के ले लो मगर सत्य है वही- हमारे राम, रहीम, करीमा, केसो, अलह, राम, सति सोई। बिस्मिल मेरि विशम्भर एकै और न दूजा कोई। वह कहते हैं कि क्यों तुम झंझट में पड़े हो, यह सब तो एक ही तत्व को बता रहे हैं। वह हमेशा इस पर भी जोर देते हैं कि अपना परिष्कार करो, सुधरो। जो समय मिला है, जो जीवन मिला है, उसमें हम सुधारें। 

मैं को हटाइये उसके बाद आप को नया जीवन मिलेगा। सहज का, जीवन में आत्म बोध का, कैसे विस्तार होगा, सत संगति भी चाहि, गुरु की कृपा भी चाहिए, लगन भी चाहिए और अपने आप को पहचानने की एक अदम्य जिज्ञासा भी चाहिए और इसके लिए आतुरता भी। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

Published / 2023-06-03 21:35:32
अपने पर्यावरण के प्रति कितने जागरूक हैं हम

सत्यनारायण गुप्ता

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बचपन में रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता पढ़ी थी- लोहे के पेड़ हरे होंगे... लेकिन लगता नहीं कि अब कभी लोहे के पेड़ हरे होंगे और कंक्रीट के जंगल से कभी सुगंध फैलेगा।  क्योंकि मानवीय गतिविधियों और क्रियाकलापों से हमारे पर्यावरण को पहुंचे नुकसान के कारण दुनिया का तापमान बढ़ रहा है और इससे जलवायु में होता जा रहा परिवर्तन अब मानव जीवन के हर पहलू के लिए खतरा बन चुका है।

अगर इसे अपने ही हाल में छोड़ दिया गया तो आने वाले समय में तापमान इस कदर बढ़ जाएगा कि मानव जीवन पर संकट आ सकता है। भयावह सूखा पड़ सकता है। समुद्री जलस्तर बढ़ सकता है और इन सब प्राकृतिक आपदाओं के फलस्वरूप कई प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं। 

हमारे आंगन से गौरैया गायब हो चुके हैं, गंगा तट पर मरे हुए डाल्फिंस दिखाई देते हैं और बल झील के ऊपर मरी हुई मछलियां उपलती हुईं नजर आती हैं। पिघलती बर्फ के कारण जहां ध्रुवीय भालू का संकट खतरे में है वहीं आस्ट्रेलियाई समुद्र तट पर स्थित ग्रेट बैरियर रीफ का आकार छोटा होता जा रहा है।

जैसा कि हम जानते हैं जलवायु परिवर्तन एक लंबे समय में या कुछ सालों में किसी स्थान का औसत मौसम है और जलवायु परिवर्तन उन्हीं औसत परिस्थितियों में बदलाव है। जितनी तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसके लिए मानव क्रियाएं सबसे ज्यादा दोषी हैं। घरेलू कामों, कारखानों और परिवहन के लिए मानव तेल, गैस और कोयले का इस्तेमाल करते हैं जिसकी वजह से जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

जीवाश्म इंधन के जलने से ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। सबसे अधिक मात्रा कार्बन डाइआॅक्साइड की होती है। ग्रीनहाउस गैसों की सघन मौजूदगी के कारण सूरज की गरमी धरती से बाहर नहीं जा पाता है, जिससे धरती का तापमान बढ़ता जाता है। आज 19 वीं सदी की तुलना में तापमान 1.2 सेल्सियस अधिक बढ़ चुका है और कार्बन डाइ आॅक्साइड की मात्रा में 50% तक वृद्धि हुई है।

पर्यावरणविदों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव से बचने के लिए हमें पृथ्वी के क तापमान वृद्धि के कारकों को नियंत्रित के संबंध में ठोस कदम उठाने होंगे। वर्ष 2100 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक तापमान को नियंत्रित रखने की जरूरत है। यदि तमाम देशों द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ सकता है।

यह आगे चलकर 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। फलस्वरूप पृथ्वी को भयानक हीट वेव का सामना करना पड़ेगा। समुद्र के जलस्तर पर वृद्धि होने से लाखों लोग बेघर हो जायेंगे। पौधों और जंतुओं की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो जायेंगी। जलवायु परिवर्तन के कारण ही तूफानों की संख्या में वृद्धि, बार-बार आने वाले भूकंप, नदियों में बाढ़ का विकराल रूप देखने को मिल रहा है। 

ग्लोबल वार्मिंग इसी गति से बढती रही तो पृथ्वी का बड़ा भूभाग जनविहीन हो जायेगा, कृषि भूमि रेगिस्तान में बदल जायेंगे। इसके उलट वैसे क्षेत्रों में भारी बारिश हो सकती है जहां पहले सूखा पड़ता था। जाहिर है गरीब देशों पर इसका कुप्रभाव अधिक व्यापक होगा। 

खेती और फसल को व्यापक नुकसान, पेयजल संकट, जंगलों में आग, ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ का पिघलना विशेष जलवायु के अभ्यस्त जीवों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ सकता है। यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस सदी के अंत तक 550 प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं। 

2015 में पेरिस समझौते द्वारा दुनिया के तमाम देशों ने कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने तथा ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की प्रतिबद्धता दोहरायी थी। 1992 में रियो सम्मेलन से लेकर 2022 में शर्म अल शेख में आयोजित कॉप - 27 सम्मेलन तक एक साथ बैठकर दुनिया भर के राजनेता पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने के उपायों  पर चर्चा कर चुके हैं। 

1972 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में नामित किया ।1973 में केवल एक पृथ्वी के नारे के तहत पहला पर्यावरण दिवस उत्सव मनाया गया। 2023 के पर्यावरण दिवस का थीम है- बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन... दुनिया भर में हर साल 430 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से आधा मात्र एक बार उपयोग होता है। 

इनमें से 10 फीसदी से भी कम को रिसाइकिल किया जाता है। प्रत्येक वर्ष 1930 मिलियन टन प्लास्टिक झीलों नदियों और समुद्रों में समा जाते हैं। 5 मिलीमीटर व्यास वाले प्लास्टिक कण (माइक्रोप्लास्टिक्स) भोजन पानी और हवा में घुल  जाते हैं अनुमानत: प्रति वर्ष प्रत्येक व्यक्ति 50,000 से अधिक प्लास्टिक कणों को सांस के रूप ग्रहण करता है। 

फेंके गये या जलाये गये एकल उपयोग वाले प्लास्टिक मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाते हैं और पहाड़ की चोटियों से लेकर समुद्र तट तक पूरी तरह से परिस्थिति तंत्र को प्रदूषित करते हैं। 

समय आ गया है कि मनुष्य पृथ्वी के पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक हो, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब यह हमारे रहने लायक नहीं रह जायेगी और हमें अपने जीवन को बचाए रखने के लिए ब्रह्मांड के किसी अन्य ग्रह में शरण लेना होगा। लेकिन दुर्भाग्यवश अब तक वैसे किसी ग्रह की खोज नहीं हुई है जहां जीवन संभव हो।

Published / 2023-05-29 19:42:38
संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन और भारत की भूमिका

योगेश कुमार गोयल 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सारी दुनिया में संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस हर साल 29 मई को मनाया जाता है। इस मिशन में भारत की अहम भूमिका है। 1960 से 1964 तक के यूएसओसी कांगो मिशन में भारतीय वायुसेना के छह कैनबरा बॉम्बर एयरक्राफ्ट तैनात किए गए थे।

इनमें 467 अधिकारी, 401 जेसीओ और 11354 जवानों ने हिस्सा लिया था। इस मिशन में 39 सैनिकों ने अपने प्राण गंवाये थे। 1992 से 1993 तक कंबोडिया में भारत ने सीजफायर की निगरानी की थी। यहां के चुनाव में भी सहायता की थी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के इस मिशन में 1373 सैनिकों की तैनाती की थी। 

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2002 में आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए पहली बार शांति रक्षा मिशन को अधिकार दिये। साथ ही 29 मई को शांति रक्षक दिवस के रूप में नामित किया। तब से प्रतिवर्ष इस दिन को संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यूएन के शांति रक्षा कार्यों में भाग लेना वैकल्पिक है।

कनाडा और पुर्तगाल ही विश्व में अब तक सिर्फ दो ऐसे देश हैं, जिन्होंने प्रत्येक शांति रक्षा अभियान में हिस्सा लिया है। यूएन का शांति रक्षा मिशन इस साल अपनी 75वीं सालगिरह मना रहा है। उसके अब तक के शांति रक्षक अभियानों में अब तक दुनियाभर के 4000 से भी ज्यादा शांति रक्षकों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। 

इनमें भारत के शांति रक्षकों की संख्या करीब 170 है। यह संख्या किसी भी अन्य देश के मुकाबले सर्वाधिक है। 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर होने के साथ ही संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। इसकी स्थापना द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता देशों ने की थी। 

इसका मकसद था कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के मामलों में हस्तक्षेप करने से भविष्य में पुन: विश्वयुद्ध जैसे हालात न उभरने पाएं। इन देशों में अमेरिका, यूके, फ्रांस, रूस इत्यादि शक्तिशाली देश शामिल थे। इन संस्थापकों को उम्मीद थी कि वे इसके जरिये युद्ध को सदा के लिए रोक पाएंगे किन्तु 1945 से 1991 के शीत युद्ध के समय विश्व के विरोधी भागों में विभाजित होने के कारण शांति रक्षा संघ को बनाये रखना बहुत कठिन हो गया था। 

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 29 मई 1948 को पहला संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन स्थापित किया गया था। उस समय इजरायल तथा अरब देशों के बीच फैली अशांति को दूर करने के लिए यूएन शांति रक्षक सैनिकों की तैनाती की गई थी। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अफ्रीका, अमेरिका, एशिया, यूरोप तथा मध्य पूर्व में 71 शांति अभियानों की स्थापना की गयी। फिलहाल विश्व में एक लाख से भी अधिक पुरुष व महिला बतौर शांति रक्षक यूएन के शांति अभियानों में संलग्न हैं। 

संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन में सबसे ज्यादा संख्या इथोपिया और बांग्लादेश के शांति रक्षकों की है। इन दोनों देशों के बाद इसमें सर्वाधिक योगदान देने वाले देशों में भारत है। फिलहाल सात हजार से भी अधिक भारतीय सैन्य और पुलिस जवान अफगानिस्तान, कांगो, हैती, लेबनान, लाइबेरिया, मध्य पूर्व, साइप्रस, दक्षिण सूडान, पश्चिम एशिया और पश्चिम सहारा में तैनात हैं। 

यूएन के शांति मिशनों में भारत की भूमिका अहम है। सबसे पहले नवम्बर 1950 से जुलाई 1954 तक चले कोरियाई युद्ध के दौरान भारत ने इस मिशन में 17 अधिकारी, नौ जूनियर कमीशंड अधिकारी (जेसीओ) तथा 300 सैनिक तैनात किये गये थे। भारत हथियारों से लैस एक दल को 1956 से 1967 के बीच संयुक्त राष्ट्र की आपातकालीन सेना में भेजने वाला देश भी बना था। 

इस अवधि के दौरान भारत की ओर से 393 अधिकारी, 470 जेसीओ तथा 12383 जवान संयुक्त राष्ट्र के मिशन में शामिल हुए थे। वर्ष 2017 में संयुक्त राष्ट्र के किसी भी मिशन में भारत के किसी भी शांतिरक्षक को अपने प्राणों की आहुति नहीं देनी पड़ी।

अंतरराष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस वैश्विक शांति के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले ऐसे संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षकों की स्मृति के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने शांति स्थापना में अपने प्राणों का बलिदान दिया। 

इस दिन ऐसे शांति रक्षकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। मरणोपरांत डैग हैमारस्जोल्ड मेडल प्रदान किया जाता है। इस सम्मान की स्थापना वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव डैग हैमारस्जोल्ड की स्मृति में की गयी थी। हैमारस्जोल्ड की 1961 में एक विमान हादसे में मौत हो गयी थी। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-05-28 14:24:36
नया संसद भवन यानी नया भारत-नया सवेरा...

हृदयनारायण दीक्षित

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत का मन उल्लास से भरा पूरा है। 28 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नये संसद भवन का लोकार्पण करेंगे। यह इतिहास का स्वर्णिम अध्याय होगा। लेकिन भारतीय स्वाभिमान के इस अवसर पर भी लगभग डेढ़ दर्जन राजनीतिक दल कार्यक्रम का बहिष्कार कर रहे हैं। वे राष्ट्रीय महत्व के इस अवसर पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। 

गृहमंत्री अमित शाह ने इसे ओछी राजनीति बताया और कहा है कि नया संसद भवन देश की सांस्कृतिक विरासत परंपरा व सभ्यता को आधुनिकता से जोड़ने का सुंदर प्रयास है। इस ऐतिहासिक समारोह के साक्षी बनने के लिए सबको निमंत्रित किया गया है कि इस कार्यक्रम में सब लोग हिस्सा लें। उन्होंने कहा है कि इस कार्यक्रम को राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय परम्पराओं व आधुनिकता से जुड़ने का महान क्षण है। इस स्थान का इतिहास भी महत्वपूर्ण है।

दिल्ली कई सदियों से सत्ता का प्रमुख केन्द्र रही है। ब्रिटिश सत्ता ने प्रारम्भ में अपनी राजधानी कलकत्ता में स्थापित की थी और बाद में दिल्ली। तत्कालीन शासक किंग जार्ज प्रथम ने 12 दिसंबर 1911 में इसकी आधारशिला रखी थी। ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और अलबर्ट बेकर ने इस नए नगर की योजना बनाई थी। लगभग बीस वर्ष बाद योजना पूरी हुई। 13 फरवरी 1931 को दिल्ली को राजधानी घोषित किया गया था।

नये भवन की अनेक विशिष्टताएं हैं। नवनिर्मित संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास सेंगोल की स्थापना की जाएगी। यह पांच फीट लंबा चांदी से बना दंड है। इस पर सोने की पालिश है। आठवीं सदी के बाद से लगभग आठ सौ वर्ष तक चोल साम्राज्य था। चोल साम्राज्य में सत्ता का हस्तांतरण इसी सेंगोल से होता था। विद्वान राजनेता सी राजगोपालाचारी के सुझाव पर तमिलनाडु के तिरुवदुथुराई मठ ने इसे तैयार कराया था। इसके शीर्ष पर न्याय के रक्षक और प्रतीक नंदी अटल दृष्टि के साथ मौजूद हैं।

चोल शिव उपासक थे। सेंगोल तमिल भाषा के शब्द सेम्मई से निकला है। इसका अर्थ धर्म निष्ठा और सच्चाई होता है। सेंगोल राजदण्ड भारतीय शासक की शक्ति और अधिकार का प्रतीक था। 14 अगस्त 1947 को पं. जवाहर लाल नेहरू ने तमिलनाडु की जनता से सेंगोल को स्वीकार किया था। ब्रिटिशों से सत्ता हस्तांतरण के लिए राजाजी ने चोल वंश के सत्ता हस्तांतरण से प्रेरणा लेने का सुझाव दिया। 

राजगोपालाचारी के सुझाव के बाद तमिलनाडु के तिरुवदुथुराई मठ ने सेंगोल तैयार कराया था। पूरा भारत नये संसद भवन की खूबसूरती के साथ चोल साम्राज्य की प्राचीन परंपरा से भी जुड़ रहा है। संसद भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की जीवमान सत्ता है। संसद के पास विधायी और संविधायी अधिकार हैं। भारत में ऋग्वेद के रचनाकाल के पहले से ही लोकतंत्र की धारा प्रवाहमान रही है। यहां देवताओं के सम्बंध में भी तर्क प्रतितर्क का वातावरण रहा है। यूरोपीय विद्वान ब्रिटिश संसद को विश्व लोकतंत्र की जननी बताते हैं। 

वस्तुत: भारत में ही लोकतंत्र और संसदीय संस्थाओं का जन्म और विकास वैदिक काल में ही हो चुका था। सभा और समितियां ऋग्वेद में हैं। महाभारत 18 पर्वों में विभाजित है। एक पर्व का नाम सभा पर्व है। सभा समिति में वैदिक काल में ही सामाजिक महत्व के विषयों पर विचार विमर्श होते थे। गायों को प्रणाम करते हुए ऋग्वेद के एक ऋषि कहते हैं कि हे गौ माता आपकी चर्चा सभा में होती है।
भारतीय परंपरा में परस्पर विचार विमर्श का विशेष महत्व रहा है। 

अथर्ववेद (7.1.63) के एक मंत्र में ऋषि कहते हैं, सभा और समिति प्रजापति की दुहिताएं हैं। वे मेरी रक्षा करें। मुझे उत्तम शिक्षा दें। सदन में एकत्र हुए वरिष्ठ समुचित भाषण करें। सभा और समिति के उल्लेख से वैदिक साहित्य भरा पूरा है। अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है, सभा हमारी रक्षा करे। उसके सभ्य सभासद मेरी रक्षा करें। (15.9.2) ऋग्वेद के एक मंत्र में कहते हैं कि तुम अपने घर को भद्र बनाओ। तुम्हारी वाणी भद्र हो और तुम चिरकाल तक सभा में रहो। 

(6.28.6) सभा में लंबे समय तक रहना प्रतिष्ठा का विषय था। ऋग्वेद के एक अन्य मंत्र में सभा में जाने वाले की प्रशंसा है। कहते हैं कि वह हमेशा सभा में जाता है। सभा और समितियां सामान्य एकत्रीकरण नहीं थीं। सभा एक सुसंगठित संस्था थी। इसके सदस्य सभ्य या सभेय कहे जाते थे। सभा वैदिक काल में ही राष्ट्र व जनपदों में सक्रिय और जीवंत थी। मधुर बोलना, सुन्दर तर्क देना, विपक्षी के तर्क सुनना जैसे सभी लोकतांत्रिक तत्व वैदिक काल में विकसित हो चुके थे। 

भारतीय संविधान निर्माताओं ने संसदीय प्रणाली अपनायी। भारत के लिए इसे स्वीकार करने में सुविधा थी। भारत की प्रज्ञा पहले से ही लोकतांत्रिक थी। भारत के लोगों को संसदीय प्रणाली अपनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। हमारी संसद ने जटिल से जटिल विषयों पर धीर गंभीर होकर कानून बनाए हैं। बेशक संवैधानिक आपातकाल के समय सम्पूर्ण विपक्ष जेल में था। संसदीय प्रणाली पर ऐतिहासिक संकट था। 

अनेक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन भी विपक्ष की गैरहाजिरी में ही पारित हुए। लेकिन संसद ने आपातकाल के बाद जरूरी संशोधन किए। संसद भारतीय बुद्धि और विवेक का मन दर्पण है। अभी भी कभी-कभी संसद में गतिरोध हो जाता है। संसद की कार्यवाही ठप हो जाती है। भारत का मन दुखी होता है। लेकिन संसदीय प्रणाली अपनी कठिनाइयों व चुनौतियों का समाधान स्वयं कर लेती है।

नया संसद भवन लोकार्पण के समय से ही विश्व का आकर्षण बन चुका है। हम दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र हैं। दुनिया की सभी संसदीय संस्थाएं भारत की और देखती हैं और प्रेरित होती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद प्रवेश के पहले दिन सीढ़ियों में माथा टेक कर संसद के प्रति अपना श्रद्धा भाव व्यक्त किया था। यह एक ऐतिहासिक भाव प्रवण क्षण था। प्रधानमंत्री के मन में संविधान और उसकी संस्थाओं के प्रति गहन आदर भाव है। विधायिका व न्यायपालिका के प्रति कार्यपालिका का आदर ध्यान देने योग्य है। 

हजारों वर्ष पहले वैदिककाल की संसदीय संस्थाओं से लेकर आधुनिक काल तक संसदीय संस्कृति का लंबा इतिहास है। यहां सांस्कृतिक निरंतरता है। कायदे से नये संसद भवन के लोकार्पण के अवसर पर सभी दलों, नेताओं और संसद सदस्यों को एक साथ लोकार्पण का साक्षी बनना चाहिए। संसद भवन सामान्य निर्मिति नहीं है। इस भवन के प्रत्येक अंश और कण-कण में राष्ट्र के लोकमंगल का प्रवाह है। जैसे मंदिर सामान्य भवन नहीं होते, मंदिरों के भीतर एक विशेष प्रकार की विद्युत चुम्बकीय धारा बहती है। 

वैसे ही संसद भवन के भी प्रत्येक अंग में लोकतांत्रिक चेतना की प्राणवान सत्ता है। इसलिए इस अवसर पर सबको एक साथ समवेत होना चाहिए। कुछ राजनीतिक दल इस अवसर को भी मोदी विरोध के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। यह अनुचित है। संसद भवन को श्रद्धा और आदरपूर्वक ही देखना चाहिए। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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