एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बिहार में होने वाली चुनावी सभाओं पर गौर करें तो यहां उनके निशाने पर सीधे तौर पर राष्ट्रीय जनता दल और तेजस्वी यादव होते हैं। कांग्रेस और राहुल गांधी दूसरे नंबर पर होते हैं और यहां की जातिगत और परिवारवादी राजनीति तीसरे नंबर पर।
तेजस्वी यादव को भी उन्होंने राहुल गांधी की तरह शहजादे का खिताब दे रखा है और इंडिया गठबंधन को भ्रष्टाचार, गुंडाराज और जातिगत जनगणना के सवाल पर बांटने वाला गठबंधन करार दिया है। उधर अपने चुनावी गणित और रणनीति की वजह से चर्चा में रहने वाले प्रशांत किशोर भी पांच दौर के चुनावों के बाद ये दावा करने से नहीं चूक रहे कि बिहार में अब भी मोदी या केन्द्र की सरकार को लेकर कोई गुस्सा नहीं है, मोदी लहर भले ही इस बार न हो लेकिन प्रशांत किशोर को इस बार भी मोदी सरकार बनती दिख रही है और खासकर बिहार में नीतीश कुमार के पलटू राम वाली छवि के बावजूद एनडीए को कोई खास नुकसान होता नहीं दिख रहा है। जबकि चुनाव विश्लेषक और किसी ज़माने में सटीक चुनावी भविष्यवाणियां करने वाले सैफोलॉजिस्ट योगेन्द्र यादव इस बार एनडीए को ढाई सौ के नीचे देख रहे हैं। सबके अपने-अपने चश्मे हैं और अपना-अपना नज़रिया है जबकि असली फैसला खामोश वोटर यानी जनता को करना है।
लेकिन तमाम ज़मीनी सर्वे हवा का रुख कुछ और बताते हैं। इसकी बानगी तेजस्वी यादव और कांग्रेस की सभाओं में उमड़ती जबरदस्त भीड़ के तौर पर देखी जा सकती है। इंडिया गठबंधन जिन अंतर्विरोधों के बाद बना और आखिरी वक्त तक सीटों के बंटवारे को लेकर जो असमंजस रहा, उसे भाजपा और जेडीयू अपने पक्ष में मान रही है और अपनी चुनावी सभाओं में इसे लेकर अब तक गठबंधन पर सवाल उठाती है। भाजपा के 400 पार के दावे में बिहार की 40 सीटें भी शामिल हैं। 2019 में भाजपा ने यहां से जो 17 उम्मीदवार उतारे थे, वह सभी जीते थे जबकि जेडीयू के 17 में से 16 उम्मीदवार जीते थे।
एनडीए के अन्य घटकों में लोक जनशक्ति पार्टी के भी सभी 6 उम्मीदवार जीत गए थे। पिछले आम चुनाव में यानी एनडीए को कुल 40 में से 39 सीटें मिली थीं जबकि एक सीट कांग्रेस ने जीती थी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार भाजपा अपनी सभी सीटें बचा पाएगी, क्या नीतीश की मौकापरस्ती जेडीयू को फिर से पिछली बार जितनी सीटें दिला पाएगी और क्या इस बार एनडीए 39 के आंकड़े तक पहुंच पाएगा? बिहार ऐसा राज्य है जिसमें सभी सात चरणों में चुनाव हो रहे हैं यानी 19 अप्रैल से शुरू होकर 1 जून तक लगातार। छठे दौर में 8 और आखिरी दौर में भी 8 सीटें बाकी हैं।
नीतीश के पाला बदलने से भाजपा के दोबारा सरकार में आने के बाद पार्टी के पास सत्ता की ताकत भी है और मशीनरी भी, साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के दौरों से उम्मीदें भी। लेकिन आरजेडी की बढ़ती ताकत, कांग्रेस का पुनर्जीवन और राहुल गांधी की मेहनत ने इंडिया गठबंधन को काफी मजबूती के साथ जनता के सवालों से जोड़कर पेश किया है जिसका असर दिख रहा है। यहां जातिगत जनगणना का भी असर है और तेजस्वी के सरकार में रहते दस लाख नौकरी देने का रिकॉर्ड बनाने की मिसाल भी।
दरअसल, बिहार की राजनीति लगातार कई उतार-चढ़ावों से होकर गुज़रती रही है। यहां वैचारिक और सैद्धांतिक राजनीति का बेशक एक दौर था, लेकिन करीब चार दशक से सारे समीकरण पूरी तरह सत्ता केन्द्रित और जाति आधारित होते गए। वर्ष 1974 के जेपी आंदोलन ने जिस नई राजनीति की नींव रखी थी और जिन मूल्यों और सिद्धांतों की बात होती थी, उसे सत्ता के खेल ने ध्वस्त कर दिया। मौजूदा राजनीति में शीर्ष पर बैठे तमाम नेता खुद को उस दौर के आंदोलनकारी बताते हैं। जेपी ने उन्हें तत्कालीन कांग्रेस सरकार, इंदिरा गांधी की निरंकुशता और इमरजेंसी जैसे कदमों के खिलाफ एकजुट करके सत्ता की राह दिखाई, लेकिन सत्ता का नशा ऐसा चढ़ा कि उस दौर के तमाम नेता भ्रष्टाचार, जातिगत समीकरण और जोड़-तोड़ के खेल में लगे रहे।
लेकिन अब युवा नेतृत्व में आई राजनीतिक परिपक्वता और एक ईमानदार, साफ-सुथरी राजनीति की उम्मीद से आम लोगों में बदलाव की चाहत दिखने लगी है। ये नेता अपने भाषणों में मोदी सरकार के वादों के साथ उनकी निरंकुश वाली छवि को उभारने और लोगों के मन में बैठाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। दरअसल भाजपा का कट्टर हिन्दुत्व और राम मंदिर जैसे मुद्दे बिहार में उतने असरदार नहीं दिखते, इसलिए यहां मोदी को भी इन नेताओं पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के अलावा कोई बड़ा दांव नहीं दिख रहा, अपनी सरकार की उपलब्धियों में पांच किलो मुफ्त अनाज की गारंटी को भाजपा तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल कर रही है। लेकिन जिस तरह बेरोज़गारी और महंगाई के सवाल पर, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल पर विपक्ष मोदी को घेर रहा है, उनकी योजनाओं और गारंटियों की असलियत बता रहा है, उससे उनकी रैलियों में लोगों का हुजूम उमड़ रहा है।
बिहार में चुनाव आम तौर पर जातिगत आधार पर ही लड़े जाते रहे हैं और भाजपा समेत सभी पार्टियां अपने उम्मीदवार उसी गणित के आधार पर उतारती रही हैं, इस बार भी यही स्थिति है। 2019 में जिस तरह एनडीए को लगभग 54 फीसदी वोट मिले थे, इस बार इसमें भले ही कुछ गिरावट हो लेकिन असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के अलग अलग लड़ने से कहीं न कहीं वोट बंटने का फायदा उसे ही होता दिख रहा है। यह गणित प्रशांत किशोर का है। दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन में मुख्य तौर पर आरजेडी, कांग्रेस के साथ सीपीआई (एमएल), वीआईपी, भाकपा, माकपा हैं जिसमें इस बार बेशक तेजस्वी और राहुल की सभाओं में उमड़ती भीड़ ने यह तो साबित कर ही दिया है कि इस बार टक्कर आसान नहीं है। जीत का अंतर काफी कम होने वाला है और कोई ताज्जुब नहीं कि खामोश वोटर हवा का रुख बदल भी सकता है।
यह संकेत इसलिए भी मिल रहे हैं कि इस बार मोदी मैजिक जैसी कोई चीज़ प्रत्यक्षदर्शी नहीं है और प्रधानमंत्री के भाषणों में सरकार के कामकाज और भावी योजनाओं की बजाय कांग्रेस और आरजेडी पर आक्रामक तरीके से हमला करने के अलावा और कुछ नहीं है। साथ ही लगातार खुद पर केन्द्रित और आत्मप्रशंसा वाले भाषण उनके लिए शायद बहुत कारगर साबित न हों। ऐसा तमाम वोटरों से होने वाली हजारों बातचीत के वीडियो से साफ होता है कि कहीं मोदी जी की आत्ममुग्धता उनके लिए मुसीबत न बन जाये। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पश्चिम बंगाल ही नहीं, अन्य गैर-भाजपा सरकारों के प्रांतों में हिंदुओं को प्रताड़ित करने के घटनाक्रम सामने आते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तो हिंदुओं के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का उग्र और हिंसक प्रदर्शन होता रहा हैं। लोकसभा चुनाव के दो चरण शेष रहे हैं, चुनाव प्रचार चरम पर है। सभी राजनीतिक दल अपनी बढ़त बनाने के लिये कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण करने का प्रयास करते हुए राष्ट्र की एकता-अखण्डता एवं बहुसंख्यक हिंदू धर्म विरोधी स्वरों को बुलंद किये हुए है और अपनी मर्यादाओं को भूल रहे हैं।
विशेषत: इंडिया गठबंधन से जुड़े दल एवं बाहर से समर्थन देने की बात करने वाले दल ऐसा दूषित प्रचार कर रहे हैं, जिससे न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है बल्कि ऐसे दलों को राजनीतिक लाभ की बजाय नुकसान होने की संभावनाएं प्रबल हो रही है। इन चुनावों में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस एवं इंडिया गठबंधन के अन्य दल हिंदुओं से, हिंदू मंदिरों-भगवानों-संतों एवं हिंदू पर्वों से नफरत का बिगुल हर मोड़ पर बजाते रहे हैं जो हर रोज सामने आ रहा है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए और अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए हिंदू संतों को राजनीति में घसीटने की कोशिश की है। उन्होंने रामकृष्ण मठ, रामकृष्ण मिशन और भारत सेवाश्रम संघ से जुड़े संतों पर निशाना साधते हुए कहा है कि ये लोग भाजपा के लिए काम कर रहे हैं।
मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए ओबीसी आरक्षण पर पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्णय पर कानून की धज्जियां उडाते हुए उंगली उठायी है। इस प्रकार कानून की अवमानना वह नेता ही खड़ी कर सकता है, जिसे एक खास वर्ग के वोट चाहिए। संतों को लेकर राजनीतिक टिप्पणी करना, नि:संदेह आपत्तिजनक है एवं दुर्भाग्यपूर्ण है।
कांग्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस हिंदुओं को अपने ही देश में सेकेंड क्लास सिटिजन एवं अल्पसंख्यक बनाना चाहती है। मुस्लिम तुष्टीकरण की इन दलों की सोच एवं नीति न केवल उनके घोषणा-पत्रों में बल्कि उनके बयानों में स्पष्ट झलक रही है। सभी विपक्षी दलों ने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की है, राजनीतिक दलों का एकतरफा रवैया हमेशा से समाज को दो वर्गों में बांटता रहा है एवं सामाजिक असंतुलन तथा रोष का कारण रहा है।
बदले हुए राजनीतिक हालात इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि किसी भी एक वर्ग की अनदेखी कर कोई भी दल राजसत्ता का आनंद नहीं उठा सकता। लेकिन लगातार जीत की ओर बढ़ रहे भाजपा को हराने के लिये इन दलों को मुस्लिम वोटों का ही सहारा नजर आ रहा है, जिसके चलते ये हिन्दू विरोध को प्रचंड किये हुए।
ममता बनर्जी ने अपने शासन में मुस्लिमों को खुश करने एवं उनके वोटों को अपने पक्ष में करने के लिये हिन्दू विरोध का कोई मौका नहीं छोड़ा है। ममता ने रामकृष्ण मठ, मिशन और भारत सेवाश्रम संघ पर झूठा एवं भ्रामक आरोप लगाया है कि ये हिंदू संगठन भाजपा के पक्ष में काम कर रहे हैं, जबकि इन संगठनों की ओर से एक बार भी भाजपा के पक्ष में मतदान करने का आह्वान नहीं किया गया है।
दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में इस्लामिक संगठनों एवं चर्चों के द्वारा भाजपा के विरोध में किसी एक विशेष दल के पक्ष में मतदान करने के प्रकरण बार-बार सामने आये हैं। चुनावों को धार्मिक एवं सांप्रदायिक रंग देने की इन विडंबनापूर्ण स्थितियों पर आज तक ममता बनर्जी ने एक भी बयान नहीं दिया है।
इसलिए भी कहा जा सकता हैं कि बिना किसी प्रमाण हिंदू संतों पर निशाना साधने का अभिप्राय यही है कि ममता बनर्जी की निगाहें कहीं और है निशाना कहीं और है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा ममता बनर्जी पर संतों को धमकाने का आरोप निराधार नहीं है। क्योंकि एक संत कार्तिक महाराज ने मुख्यमंत्री ममता को कानूनी नोटिस भेज कर कहा है कि ममता बनर्जी के बयान निराधार, झूठे और अपमानजनक है।
पश्चिम बंगाल ही नहीं, अन्य गैर-भाजपा सरकारों के प्रांतों में हिंदुओं को प्रताड़ित करने के घटनाक्रम सामने आते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तो हिंदुओं के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का उग्र और हिंसक प्रदर्शन होता रहा है। पिछले कुछ सालों से हमेशा यह देखा गया है कि तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता सत्ता पाकर भाजपा समर्थकों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करते हैं।
वर्ष 2021 में भी तृणमूल कांग्रेस के जीतने के बाद राज्य में बवाल हुआ था और पंचायत चुनाव जीतने के बाद भी उसके कार्यकर्ताओं ने हिंसक उत्पात मचाया था। उस समय भाजपा कार्यकर्ताओं के घरों को खोज-खोजकर हमले हुए थे। ऐसे स्थिति में और ऐसे कार्यकर्ताओं के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का हिंदू संगठनों एवं धर्मगुरुओं के भाजपा के पक्ष में होने का बयान संतों के लिए जान तक का खतरा पैदा कर सकता है।
ऐसा हुआ भी है, ममता बनर्जी के बयान के बाद कुछ हमलावर जलपाईगुड़ी स्थित रामकृष्ण मिशन के आश्रम में घुस गये। उन्होंने भिक्षुओं पर हमला किया, सीसीटीवी आदि तोड़े दिये। याद हो कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहली बार संतों पर दोष लगाकर उनके खिलाफ माहौल बनाने का काम नहीं हुआ।
मुस्लिम वोटों को आकर्षित करने के लिये इंडिया गठबंधन के दल विशेषत: कांग्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस अल्पसंख्यकों को भी सपोर्ट नहीं कर पा रहे हैं। अल्पसंख्यकों में सिख, पारसी, यहूदी, जैनी, बौद्ध आदि धर्म आते हैं, लेकिन कांग्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम परस्ती करते आई है।
ओबीसी आरक्षण पर पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने जिस तरह से कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्णय पर उंगली उठायी है, उससे तो यही लगता है कि राजनीतिक वोट बैंक के लिए संविधान की जितनी अवमानना की जा सकती है, वह की जाती रहेगी। सामनेवाले को घेरने के लिए उसी संविधान की आड़ भी ली जायेगी।
ममता ने मुस्लिमों को ओबीसी सर्टिफिकेट देकर उन्हें तरह-तरह से लाभ पहुंचाने का षड़यंत्र किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनावी रैलियों में इंडी गठबंधन के सत्ता में आते ही एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण को मुस्लिमों को देने की बात कह रहे हैं, वह भी इस घटना से साफ होता नजर आ रहा है। धर्म के आधार पर आरक्षण भारतीय संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतों के खिलाफ है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने 22 मई को पश्चिम बंगाल में 2010 के बाद जारी ओबीसी सर्टिफिकेट रद्द करने का आदेश दिया है। जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती और राजशेखर की बेंच ने कहा कि 2011 से प्रशासन ने किसी नियम का पालन किए बगैर ओबीसी सर्टिफिकेट जारी कर दिये। इस तरह से ओबीसी सर्टिफिकेट देना असंवैधानिक है। यह सर्टिफिकेट पिछड़ा वर्ग आयोग की कोई भी सलाह माने बगैर जारी किये गये।
इसलिए इन सभी सर्टिफिकेट को कैंसिल कर दिया गया है। हालांकि यह आदेश उन लोगों पर लागू नहीं होगा, जिन्हें पहले नौकरी मिल चुकी या मिलने वाली है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम 1993 के आधार पर ओबीसी की नई सूची पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग तैयार करेगी।
ममता बनर्जी सरकार से पहले वामपंथी शासन काल में भी हिन्दू संतों को माकपा की सरकार ने निशाना बनाया था। तब परिणाम यह हुआ था कि कोलकाता में सरेआम 16 भिक्षु और 1 साध्वी हत्या की गयी थी। आज उस नरसंहार को बिजोन सेतु नरसंहार कहा जाता है। राजनीतिक बेशर्मी देखिये कि सरेआम संतों की हत्याएं की गयी लेकिन आज तक उस नरसंहार में किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है।
माकपा सरकार पर आरोप हैं कि उसने इस मामले से संबंधित तथ्यों को छिपाया। नरसंहार की जांच के लिए बने आयोगों को न तो माकपा सरकार ने सहयोग दिया और न ही तृणमूल कांग्रेस ने। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान के बाद से भय का वातावरण बन गया है। आश्रमों एवं संतों को नुकसान पहुँचाने की आशंका गहरा गयी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सांप्रदायिक बयान की जितनी निंदा की जाये कम है।
यह तो निश्चित है कि वर्तमान कांग्रेस, पूर्व में आजादी से अब तक की कांग्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति ही की है। इस सोच के कारण कांग्रेस एवं अन्य इंडिया गठबंधन के दलों ने राम मंदिर उद्घाटन से भी दूरी बनाये रखी। इंडिया गठबंधन, कांग्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस की हिंदू विरोधी छवि का नुकसान इन दलों को निश्चित रूप से मिलेगा। क्या वास्तव में ये दल अपनी बिगड़ती छवि एवं नुकसान से परेशान है? या इस बात से कि उसकी छवि बिगाड़कर हिंदू विरोधी बताने की कोशिश की जा रही हैं? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि वे अपनी बदहाली के कारणों को समझना भी चाहते है या नहीं?
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पूर्वांचल की 27 सीटों पर इंडिया गठबंधन तू चल मैं आता हूं की तर्ज पर कार्य कर रही है। सपा और कांग्रेस इस इलाके को सियासी तौर पर उपजाऊ मानती है। यही वजह है कि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की जिन सीटों पर जनसभा हो रही है, उन पर निगाह रखी जा रही है।
उत्तर प्रदेश में पांच चरण के मतदान के बाद अब राजनैतिक ताकतों का पूरा फोकस पूर्वांचल की 27 लोकसभा सीटों पर आकर टिक गया है।
पूर्वांचल में पूरे प्रदेश से अलग सियासी बयार बहती है। यह क्षेत्र राजनैतिक रूप से काफी सशक्त भी है। यहां के लोगों की रग-रग में सियासत देखने को मिल जाती है। तमाम बड़े और दिग्गज नेताओं को भी पूर्वांचल की धरती काफी रास आती है। यहां से निकले नेताओं ने देश-विदेश में खूब नाम कमाया है। पूर्व प्रधानमंत्रियों में पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, वीपी सिंह, चंद्रशेखर यहीं की धरती से निकलकर सियासत की बुलंदी पर पहुंचे थे।
पूर्वांचल से सर्वाधिक बार निर्वाचित होने वाले सांसदों की सूची पर नजर डालें तो बलिया की धरती के रहने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर 1977 से 1991 तक के बीच में बलिया से रिकॉर्ड 8 बार सांसद निर्वाचित हुए हैं। इसके अलावा बलिया के चंद्रशेखर ने सीधे सांसद से प्रधानमंत्री बनने तक का सफर तय किया है। इन 27 सीटों में एक सीट वाराणसी की भी है, जहां से मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं।
यह उनका तीसरा लोकसभा चुनाव है। मोदी की जीत में कहीं कोई संदेह नहीं है, यहां तक की सपा प्रमुख अखिलेश यादव तक ने यहां से मोदी की जीत की भविष्यवाणी कर दी है। हां, यह और बात है कि वह यहां से तीसरी बार चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री के रूप में भी हैट्रिक लगा पायेंगे। इस बार यदि मोदी फिर से पीएम बनते हैं तो वह देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के लगातार तीन कार्यकाल में प्रधानमंत्री बनने के रिकार्ड की बराबरी कर लेंगे। इसको लेकर भाजपा तो पूरी तरह से आत्मविश्वास से भरी हुई है, लेकिन विपक्ष को यही लगता है कि अबकी बार मोदी बुरी तरह से हार रहे हैं।
खैर, मुद्दे पर आया जाये तो पूर्वांचल ने देश को देश की पहली मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी जैसी नेत्री दी तो संपूर्णानंद, कमलापति त्रिपाठी, वीर बहादुर सिंह और राम नरेश यादव जैसे मुख्यमंत्री यूपी को दिये। इतना ही नहीं सीपीएन सिंह, महावीर प्रसाद, कल्पनाथ राय, सुखदेव प्रसाद, केडी मालवीय, आरपीएन सिंह और कलराज मिश्र जैसे नेता पूर्वांचल से निकल कर केंद्रीय सरकारों में महत्वपूर्ण पदों पर हैं और रहे।
सोशलिस्ट पार्टी के नेता बाबू गेंदा लाल से लेकर कम्युनिस्ट नेता सिवन लाल सक्सेना जैसे नेताओं ने पूर्वांचल से राजनीति की। हरिशंकर तिवारी, मार्कंडेय चंद्र, बलराम यादव, जगदंबिका पाल, राम गोविंद चौधरी, अम्बिका चौधरी जैसे पूर्वांचल के कद्दावर नेता राज्य सरकारों में मंत्री रहे। वर्तमान में सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ ही सात कैबिनेट सहित कई मंत्री पूर्वांचल से हैं। इसके लिए इंडिया और एनडीए ने ताकत झोंक दी है।
खास बात यह है कि इसी क्षेत्र में एनडीए गठबंधन में शामिल सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल की प्रतिष्ठा दांव पर हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में भी चुनाव है। दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस को एक और कांग्रेस को पांच सीटें मिली हैं। इन सीटों को पर कांग्रेस और सपा ने फ्रंटल संगठनों के पदाधिकारियों को उतार दिया है। पूर्वांचल की 27 लोकसभा सीटों पर एक-एक वोट का हिसाब रखा जा रहा है।
यूपी के पश्चिमी, मध्य और बुंदेलखंड के इलाकों में चुनाव होने के बाद सभी दलों के आलाकमान ने यहां के ज्यादातर नेताओं को इन्हीं 27 सीटों पर उतार दिया गया है। भाजपा ने वाराणसी में महिला सम्मेलन के जरिये नया प्रयोग किया है तो आसपास की सीटों पर प्रचार का नया मॉडल अपनाया है। पार्टी की ओर से पूर्वांचल की सीटों पर जल जीवन मिशन, मकान और शौचालय हित अन्य योजनाओं का लाभ पाने वाले लाभार्थियों की ब्लॉकवार सूची निकाली गई है।
इस सूची के जरिये मतदाताओं तक पहुंच कर उन्हें समझाने का प्रयास किया जा रहा है। हर विधानसभा को तीन से चार हिस्से में बांट कर वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में बैठकें की जा रही है। इतना ही नहीं पार्टी ने नयी रणनीति के तहत समूह बैठक तय की है। इसमें डॉक्टर, इंजीनियर, कपड़ा कारोबारी, दवा व्यापारी की बैठकें तय की गयी हैं। उदाहरण के लिए चिकित्सा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत नेताओं को इसी क्षेत्र के लोगों से मिलने का लक्ष्य दिया है।
इसके लिए बाकायदे विधानसभा क्षेत्रवार सूची सौंपी गयी है। खास बात यह है कि पिछड़े वर्ग पर ज्यादा फोकस किया गया है। यही वजह है कि पिछड़े वर्ग की जहां जिस जाति की आबादी है, उस क्षेत्र में उसी बिरादरी के नेताओं को भेजा गया है। भाजपा पिछड़ा वर्ग काशी क्षेत्र के महामंत्री सुभाष कुशवाहा ने बताया कि वाराणसी और आसपास की सीटों पर इटावा, एटा, फरूर्खाबाद, मैनपुरी सहित सैफई के आसपास के यादव नेताओं को उतार दिया गया है। इसी तरह निषाद बहुल इलाके में इसी बिरादरी के नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी गयी है।
उधर, पूर्वांचल की 27 सीटों पर इंडिया गठबंधन तू चल मैं आता हूं की तर्ज पर कार्य कर रही है। सपा और कांग्रेस इस इलाके को सियासी तौर पर उपजाऊ मानती है। यही वजह है कि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की जिन सीटों पर जनसभा हो रही है, उन पर निगाह रखी जा रही है। इसके लिए कांग्रेस ने अलग से टीम लगायी है। यह टीम नेताओं के कार्यक्रम और उनके द्वारा जनसभा में उठाये गये सवाल का जवाब तैयार कर अपने नेताओं को भेज रही है।
इतना ही नहीं अगले दो से तीन दिन में संबंधित इलाके में न सिर्फ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सभा लगायी जा रही है बल्कि उन सीटों पर मतदाताओं को लुभाने के लिए नयी रणनीति अपनायी जा रही है। कांग्रेस और सपा ने पूर्वांचल की 27 सीटों के लिए रायबरेली-अमेठी मॉडल को भी लागू किया है। विधानसभा क्षेत्र को सेक्टर में बांट कर बूथों पर जिस बिरादरी का वोटबैंक हैं, उसी बिरादरी के नेता को लगाया गया है। इन दोनों पार्टियों ने यादव, मुसलमान के अलावा अन्य जातियों के नेताओं को जिम्मेदारी देने पर जोर दिया है।
ब्राह्मण बहुल इलाके की जिम्मेदारी खुद कांग्रेस प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय ने संभाली है। वह दिन में सपा-कांग्रेस के नेताओं के बीच समन्वय बैठकें कर रहे हैं तो रात में ब्राह्मण बहुल इलाके में रात्रि चौपाल लगा रहे हैं। इसी तरह सपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष डा राजपाल कश्यप निषाद, कश्यप, बिंद बिरादरी के बीच रात्रिकाली बैठकें करने में जुटे हैं। डा कश्यप का दावा है कि सपा की ओर से निषाद बिरादरी के पांच प्रत्याशी उतारने का फायदा मिल रहा है।
छठवें चरण की 14 सीटें और सातवें चरण की 13 सीटें पर कई दिग्गज मैदान में हैं। इसमें सुल्तानपुर से मेनका गांधी, आजमगढ़ से धर्मेंद्र यादव, भदोही से तृणमूल कांग्रेस के ललितेशपति त्रिपाठी, इलाहाबाद से उज्ज्वल रमण सिंह, जौनपुर से महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री कृपाशंकर सिंह जैसे नामचीन चेहरे हैं। वाराणसी से खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, मिजार्पुर से अपना दल की अनुप्रिया पटेल, घोसी से सुभासपा के अरविंद राजभर मैदान में हैं। इसी क्षेत्र में निषाद पार्टी का भी वजूद है। ऐसे में इन सभी दलों के मुखिया से लेकर बूथ सदस्य तक गांव- गांव वोट मांग रहे हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नकली वस्तुओं का व्यापार और बिक्री एक वैश्विक समस्या बनकर उभरी है। खाद्य सुरक्षा मानकों और उनके विनियमों का अनुपालन कंपनियां नहीं कर कायदे-कानूनों को ठेंगा दिखाने लगी हैं। शिकायतकर्ताओं पर कंपनी वाले हमलावर होते हैं। समझने की जरूरत है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? दरअसल, इसके पीछे एक खास वजह है।
वजह के किरदार हैं दो धड़े। अव्वल, ठेकेदार और दूसरे कांट्रेक्टर? ठेकेदार के रूप में वह संस्था जो इन पर अंकुश लगाने का नाटक करती है और कांट्रेक्टर सरकारी मशीनरी जो राजस्व के नाम पर मोटा माल वसूल कर अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेती हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण दोनों अगर कमर कस लें, तो किसी कंपनी की हिम्मत नही, जो खाद पदर्थों में गड़बड़ी भी कर सकें।
गौरतलब है कि नकली और पायरेटेड ब्रांड की बाढ़ ने भूमिगत व्यापार बनाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह प्रभावित किया हुआ है। डुप्लीकेट मसालों का मसला अगर सार्वजनिक नहीं हुआ होता, तो ये मुद्दा चचार्ओं में आता ही नहीं? ऐसा प्रतीत होता है जैसे भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया है। समय-समय पर होने वाली छापेमारी, मॉनेटरिंग, धरपकड़ और शिकायतों की तत्काल प्रभाव से जांच करवाना, अब नहीं होता। एक बार लाइसेंस वितरण करने के बाद फाइल को धूल चाटने के अलमारी में दबा दिया जाता है।
जब रिन्यूवल का समय आता है तभी कुंभकर्णी नींद खुलती है, क्योंकि उस वक्त फिर से फीस लेनी होती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण और कंपनियों के बीच सीधी सांठगांठ रहती है। शिकायतें ऊपर तक नहीं पहुंची, बीच में ही मैनेज कर ली जाती है। ऐसी स्थिति में कंपनियां लोगों के जीवन से खिलवाड़ नहीं करेंगी तो क्या करेंगी?
प्राधिकरण और कंपनियों के बीच दोस्ती के चलते ही मैगी खाने से बच्चे बीमार पड़े, मसालों से पेट खराब हुआ, कोल्ड ड्रिंक पीने से पेट की आते सूज गयी जैसी खबरें मीडिया में दिनोंदिन बढ़ रही हैं। कंपनियां जबसे बेलमाग हुई हैं तभी से खाद्य पदार्थों में नक्कालों ने बिना डरे कब्जा कर लिया है। नकली प्लास्टिक चावल, गधे-घोड़े की लीद से जीरा बनाना अब आम बात है।
दरअसल, इस तरह की खबरें लोगों को तभी पता चली हैं, जब ये गोरखधंधे कहीं न कहीं पकड़े गये। मेरठ में पिछले साल नकली जीरा बनाने वाला कारखाना पकड़ा गया था। दिल्ली के बुराड़ी में भी ऐसा ही एक कारखाना पुलिस ने पकड़ा था। जाली सामानों के सबसे हानिकारक रूपों में नकली दवाइयां प्रमुख हैं, जिनकी बिक्री अकेले एशिया से दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका तक लगभग 1.6 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष है।
दवाओं में मलेरिया की दवा में सबसे ज्यादा फर्जीवाड़ा होता है। मलेरिया की एक तिहाई दवाएं नकली होती है। 2008 में विश्व स्तर पर पकड़ी गयी लगभग दो-तिहाई नकली दवाइयों को पूर्वी एशिया में भेजने का मामला भी खूब गर्माया था। अब कंपनियां नकली माल के अलावा धड़ल्ले से उत्पादों की कीमतें भी बढ़ाती हैं क्योंकि कंपनियां संगठित आपराधिक गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए सुरक्षा प्रणालियां बढ़ाती हैं और अनुसंधान और विकास में अधिक निवेश करती हैं। कुल मिलाकर हर परिस्थितियों से वो निपटना जान चुकी हैं। ऐसे में आमजन को ही सतर्क होना होगा, ब्रांडों की सत्यता-वास्तविकता खुद से परखनी होगी। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोकसभा चुनाव 2024 के पांच चरणों का मतदान पूरा हो चुका है, हालांकि अब तक हुई 429 सीटों पर औसत मतदान लगभग 57.44 प्रतिशत रहा है। खुद चुनाव आयोग 60 फीसदी से कम मतदान को चिंताजनक मानता है। ऐसे में उन कारणों पर बात करना जरूरी है, जो लगातार मतदान के प्रति लोगों के कम होते रुझान की वजह हो सकते हैं या उन वजहों पर ध्यान देने की आवश्यकता है जो कम मतदान का कारण बन रहे हैं।
इसके लिए सबसे पहले कुछ सवाल उठाने, उनके हल खोजने और कुछ सुविधाओं को सुलभ बनाने की आवश्यकता पर बात करना जरूरी है। ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि देश का कोई भी वयस्क नागरिक कहीं से भी मतदान कर सके? क्यों न 75 वर्ष से ऊपर या बीमार व्यक्तियों के लिए एक मोबाइल पोलिंग बूथ की व्यवस्था हो? ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि 75 वर्ष से ऊपर या जरूरतमंद मतदाताओं को लाने-छोड़ने की व्यवस्था हो!
ऐसे ही क्यों न पर्यटन या जरूरी कामों से सफर कर रहे मतदाता भी अपने मताधिकार का उपयोग करने में सक्षम हों? यूं भी एक चुनाव में हजारों करोड़ रुपये का खर्च आता है, फिर ऐसी कुछ व्यवस्थाओं में कुछ करोड़ और खर्च कर के यदि मतदान प्रतिशत बढ़ाया जा सकता है तो क्यों न इन उपायों पर गंभीरता से विचार किया जाये?
चुनाव आयोग के नियमानुसार आपको आपके निर्वाचन क्षेत्र में ही मतदान देने का अधिकार है। इसके लिए आपको मतदाता सूची में खुद को पंजीकृत करना जरूरी है। यहां तक तो ठीक है लेकिन क्यों न ऐसी कोई व्यवस्था हो जो ऐसे मतदाताओं को कवर करती हो जो किसी भी कारण, भले रोजगार हो, व्यवसाय हो, पर्यटन हो या मेडिकल इमरजेंसी, से अपने निर्वाचित क्षेत्र में मतदान वाले दिन उपलब्ध नहीं हैं।
इन मतदाताओं के लिए प्रत्येक शहर में किसी भी निजी या सरकारी भवन में ऐसी व्यवस्था की जा सकती है जिससे वह अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सके। हम एक एडवांस टेक्नोलॉजी वाले युग में जी रहे हैं, जहां हर रोज नए इन्वेंशन देखने को मिलते हैं, वहां क्या ऐसा कुछ नहीं हो सकता कि एक टेक्नोलॉजी बेस्ड सिस्टम हो, जो इंदौर के किसी मतदाता जो यदि कानपुर में हो तो वह कानपुर में ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल आनलाइन माध्यम से कर सके तथा इसका रिकॉर्ड इंदौर पोलिंग स्टेशन में दर्ज हो।
जाहिर तौर पर इसमें कुछ बेसिक दिक्कतें जरूर हो सकती हैं लेकिन इन्ही दिक्कतों के ऊपर कम वोटिंग प्रतिशत का हल ढूंढ़ा जा सकता है। जिस प्रकार सेना, सुरक्षा बलों या चुनाव ड्यूटी में लगाये गये कर्मचारियों को अपने मतदान केंद्र पर जाने की जरूरत नहीं होती और वे अपने कार्य स्थल से ही बैलेट पेपर पर वोट डाल सकते हैं, ऐसी ही कुछ व्यवस्था उन लोगों के लिए भी हो जो विभिन्न कारणों से अपने पोलिंग स्टेशन पर उपलब्ध नहीं हो पाते।
दूसरी ओर वर्तमान लोकसभा चुनाव की ही बात करें तो इस बार 100 साल से ज्यादा के 2.18 लाख वोटर हैं। क्यों न ऐसे वोटर्स के लिए एक मोबाइल बूथ की व्यवस्था हो। हर शहर में कुछ ऐसे मोबाइल बूथ कार्यरत हों जो चिन्हित मतदाताओं के एरिया में मौजूद हों, उनके घरों के समीप हों, जिससे उन्हें अपने मत का उपयोग करने में आसानी हो।
इसी प्रकार 75 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों को पोलिंग स्टेशन तक लाने-छोड़ने की व्यवस्था भी की जा सकती है। इसी प्रकार प्रत्येक पोलिंग स्टेशन पर मोबाइल हेल्थ केयर वैन, पीने के पानी आदि सुरक्षात्मक व्यवस्थाओं की पहल भी की जा सकती है। अंत में हम यह भी नहीं कह सकते कि वोट देना नागरिकों का कर्त्तव्य है तो कुछ भी कैसी भी परिस्थिति का सामना कर के, वह अपने कर्त्तव्य का पालन करें।
यदि कम होते वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी करनी है तो उपरोक्त कारणों और उनके उपायों पर भी गंभीरता से विचार किया जा सकता है, क्योंकि यदि ऐसे ही वोटिंग प्रतिशत कम होता गया तो इसे नागरिकों के लोकतंत्र से उठते विश्वास के रूप में भी देखा जायेगा, जो भारत जैसे विकासशील देश के लिए सम्मानजनक स्थिति नहीं है। (लेखक राजनीतिक रणनीतिकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संबंध में दिये गये दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बयान के पश्चात प्रदेश में सियासी पारा बढ़ गया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने लखनऊ में पुन: दावा किया है कि यदि भारतीय जनता पार्टी केंद्र की सत्ता में आयी तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटा दिया जायेगा। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले डेढ़-दो वर्षों से अमित शाह को पीएम बनाने में लगे हुए हैं।
इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया, देवेंद्र फडणवीस, रमन सिंह और मनोहर लाल खट्टर को पहले ही हटा दिया। अब अमित शाह के प्रधानमंत्री बनने की राह में केवल योगी आदित्यनाथ ही अंतिम कांटा हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी अगले वर्ष 17 सितंबर को जैसे ही 75 वर्ष के हो जायेंगे, वे प्रधानमंत्री पद छोड़ कर अमित शाह को प्रधानमंत्री बना देंगे। इसके पश्चात दो से तीन महीने में योगी आदित्यनाथ को हटा दिया जायेगा। अरविंद केजरीवाल के इस बयान की प्रासंगिकता पर चर्चा हो रही है या चर्चा में रहने के लिए यह राजनीतिक जुमला मात्र है।
वास्तव में अरविंद केजरीवाल भी जानते हैं कि उनका यह बयान असत्य एवं भ्रामक है। वे इस प्रकार के बयान देकर एक ओर तालियां बटोरना चाहते हैं तो दूसरी ओर फूट डालो और राज करो की नीति अपना रहे हैं। यद्यपि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केजरीवाल को कड़े शब्दों में उत्तर दे दिया है।
उन्होंने बांदा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा- केजरीवाल की बुद्धि जेल जाने के बाद फिर गयी है। अन्ना हजारे के सपनों पर पानी फेरने वाले केजरीवाल अब मेरा नाम लेकर बातें कर रहे हैं। अन्ना ने जिस कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन किया था, केजरीवाल ने उसे ही अपने गले की हार बना लिया है। जेल जाकर उन्हें पता चल गया है कि अब वह कभी जेल के बाहर नहीं आने वाले हैं।
इस बयानबाजी के मध्य प्रधानमंत्री मोदी ने संकेतों के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है कि योगी आदित्यनाथ अपना कार्यकाल पूर्ण करेंगे। उन्होंने कहा- आने वाले पांच सालों में मोदी-योगी पूर्वांचल की तस्वीर और तकदीर दोनों बदलने वाले हैं। सियासी गलियारे में इस बयान को अरविंद केजरीवाल के बयान से जोड़कर देखा जा रहा है। इस प्रकार मोदी ने केजरीवाल के बयान को भ्रामक एवं असत्य सिद्ध कर दिया है।
इससे पूर्व गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया था कि प्रधानमंत्री मोदी अपना कार्यकाल पूर्ण करेंगे तथा वर्ष 2029 के पश्चात भी वे भाजपा का नेतृत्व करते रहेंगे। प्रधानमंत्री मोदी 75 वर्ष की आयु के पश्चात् भी अपने पद पर बने रहेंगे। इस प्रकार अमित शाह ने यह बात स्पष्ट कर दी है कि उनका प्रधानमंत्री बनने का अभी कोई विचार नहीं है।
इसके अतिरिक्त पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी स्पष्ट कर चुके हैं कि 75 वर्ष के पश्चात सेवानिवृति वाली बात पार्टी के संविधान में नहीं है। इस प्रकार की बातें केवल दुष्प्रचार के लिए बोली जा रही हैं। इसमें दो मत नहीं कि भाजपा का संगठन अत्यंत सुदृढ़ है। इसलिए अरविंद केजरीवाल की भ्रामक बयानबाजी से पार्टी को कोई हानि नहीं होगी।
वास्तव में प्रधानमंत्री भली-भांति जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में सराहनीय विकास कार्य किये हैं। उनके मुख्यमंत्री काल में प्रदेश ने दिन दोगुनी रात चौगुनी उन्नति की है। प्रदेश की जनता भी उनके विकास एवं जनहित के कार्यों से अति प्रसन्न एवं संतुष्ट है, तभी उसने उन्हें दूसरी बार मुख्यमंत्री चुना।
सर्वविदित है कि उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जाता है, क्योंकि यही चुनाव आगे के लोकसभा चुनाव की दिशा निर्धारित करता है। इसीलिए उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहता है। अपने उत्कृष्ट कार्यों एवं सुशासन के कारण उन्होंने दो बार भारतीय जनता पार्टी को विजयश्री दिलायी है। भारतीय जनता पार्टी ने भी योगी आदित्यनाथ के कार्यों को सराहा तथा उन्हें प्रदेश की बागडोर सौंप दी।
लोकसभा चुनाव 2024 पाचवें चरण तक आते आते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 49 दिनों में कुल 111 जनसभाएं सहित 144 जनसभाएं की है। इसके अलावा योगी अबतक आठ राज्यों में भी चुनाव प्रचार कर चूकें है। मुख्यमंत्री ने 27 मार्च को मथुरा में प्रबुद्ध सम्मेलन कर प्रदेश की चुनावी कमान संभाल ली थी।
27 मार्च से 19 मई तक कुल 50 दिनों में मुख्यमंत्री लगातार चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं। अब तक उन्होने 15 प्रबुद्ध सम्मेलन और 12 रोड सो किया है। योगी की जनसभाओं में अपार भीड़ उनको सुनने के लिए प्रचंड गर्मी में भी जुट रही है। इसमें दो मत नहीं है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश ने लगभग सभी क्षेत्रों में प्रशंसनीय उन्नति की है। प्रदेश में कृषि, उद्योग, रोजगार, आवास, परिवहन, बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा, सुरक्षा व्यवस्था, संस्कृति, धर्म एवं पर्यावरण आदि क्षेत्रों में सराहनीय कार्य किये गये हैं।
मेधावी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान दी जा रही है। वृद्धजन, विधवा एवं दिव्यांगजन को पेंशन के रूप में आर्थिक सहायता दी जा रही है। सरकार ने अनाथ बच्चों के भरण-पोषण की भी व्यवस्था की है। जिन परिवारों में कमाने वाला कोई नहीं है उन्हें भी आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। निर्धन परिवार की लड़कियों एवं दिव्यांगजन के विवाह के लिए अनुदान दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त योगी सरकार निराश्रित गौवंश के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रही है।
उल्लेखनीय है कि योगी आदित्यनाथ पार्टी के चाल, चरित्र एवं चेहरे के अनुसार प्रदेश में हिंदुत्व की छवि को और सुदृढ़ करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। उनके कार्य इस बात को सिद्ध करते हैं। चाहे प्राचीन नगरों के नाम परिवर्तित करना हो या काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण करना हो। उनके सभी कार्य इसका साक्षात प्रमाण हैं। उनकी देखरेख में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर राम मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा है। योगी सरकार राज्य के धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थलों के विकास एवं सौन्दर्यीकरण पर विशेष ध्यान दे रही है।
योगी सरकार ने बौद्ध सर्किट में श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनगर तथा रामायण सर्किट में चित्रकूट एवं श्रृंगवेरपुर में पर्यटन सुविधाओं का विकास करवाया है। इसी प्रकार बृज तीर्थ क्षेत्र विकास परिषद, नैमि षारण्य तीर्थ क्षेत्र विकास परिषद, विन्ध्य तीर्थ क्षेत्र विकास परिषद, शुक्र धाम तीर्थ विकास परिषद, चित्रकूट तीर्थ विकास परिषद एवं देवीपाटन तीर्थ विकास परिषद का गठन किया गया, ताकि यहां के विकास कार्य सुचारू रूप से हो सकें।
सरकार तीर्थ यात्रियों एवं पर्यटकों को अनेक सुविधाएं उपलब्ध करवा रही है। योगी सरकार तीर्थ यात्रियों को कई सुविधाएं प्रदान कर रही है। इसके अंतर्गत कैलाश मानसरोवर के तीर्थ यात्रियों की अनुदान राशि 50 हजार रुपये से बढ़ाकर एक लाख रुपये प्रति यात्री की गयी है। इसी प्रकार सिंधु दर्शन के लिए अनुदान राशि 20 हजार रुपये की गयी।
योगी सरकार प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए यथासंभव प्रयास कर रही है। इसके अंतर्गत गोरखपुर के रामगढ़ ताल में वाटर स्पोर्ट्स, पीलीभीत टाइगर रिजर्व एवं चंदौली में देवदारी राजदारी वाटरफॉल का विकास किया गया। स्पिरिचुअल सर्किट के अंतर्गत गोरखपुर, देवीपाटन, डुमरियागंज में पर्यटन सुविधाओं का विकास किया गया। जेवर, दादरी, नोएडा, खुर्जा एवं बांदा में भी पर्यटन सुविधाओं का विकास किया गया। आगरा में शाहजहां पार्क एवं महताब बाग-कछपुरा का कार्य एवं वृंदावन में बांके बिहारी जी मंदिर क्षेत्र में पर्यटन का विकास किया गया।
दुधवा टाइगर रिजर्व एवं पीलीभीत टाइगर रिजर्व स्थलों का विकास किया गया है। सरकार ने महाभारत सर्किट के अंतर्गत महाभारत से संबंधित स्थलों का विकास करवाया है। शक्तिपीठ सर्किट एवं आध्यात्मिक सर्किट से संबंधित स्थलों का भी विकास करवाया गया है। विपक्षी सरकार पर भेदभाव के आरोप लगाते रहते हैं, परंतु सत्य यही है कि भाजपा सरकार बिना किसी भेदभाव के समान रूप से विकास कार्य करवा रही है। जैन एवं सूफी सर्किट के अंतर्गत आगरा एवं फतेहपुर सीकरी में पर्यटन सुविधाओं का विकास करवाया जाना इस बात का प्रमाण है।
योगी सरकार अयोध्या में दीपोत्सव, मथुरा में कृष्णोत्सव, बरसाना में रंगोत्सव, वाराणसी में शिवरात्रि एवं देव दीपावली का आयोजन करा रहा है। देश ही नहीं, अपितु विदेशों में भी इसकी चर्चा हो रही है। इसके साथ-साथ सरकार कला एवं साहित्य को भी प्रोत्साहित कर रही है। राज्य में साहित्यकारों एवं कलाकारों को उत्तर प्रदेश गौरव सम्मान प्रदान किए जाने का निर्णय लिया गया।
योगी आदित्यनाथ के शासन में प्रदेश ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पृथक पहचान बनायी है। लगभग सभी क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश देश में अग्रणी रहा है। आज देश में उत्तर प्रदेश मॉडल की चर्चा की जा रही है। ये सब योगी आदित्यनाथ के प्रयास से ही संभव हो सका है। (लेखक, लखनऊ विवि में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पाकिस्तानी सेना की गोलियों से अब तक 3 नागरिक मारे जा चुके हैं और कई घायल भी हैं। पीओके में इस संघर्ष की एक वजह कश्मीर की खुशहाली भी है। पीओके के लोग कश्मीर की तरह सहूलियत की मांग करते रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान सरकार ने दो वक्त की रोटी के लिए उन्हें मोहताज बना दिया है। इस वजह से पीओके के लोग भारत में विलय की मांग भी करने लगे हैं।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पिछले पांच दिनों से हाहाकार मचा हुआ है। पीओके के लोग पाकिस्तान के जुल्म, महंगाई और बदहाली से परेशान हो चुके हैं। हालात ये हैं कि पीओके की जनता और पाकिस्तान की सेना एक दूसरे की जान के प्यासे हो चुके हैं। इन दोनों के बीच कई दौर की हिंसा हो चुकी है। पाकिस्तानी सेना की गोलियों से अब तक 3 नागरिक मारे जा चुके हैं और कई घायल भी हैं।
पीओके में इस संघर्ष की एक वजह कश्मीर की खुशहाली भी है। पीओके के लोग कश्मीर की तरह सहूलियत की मांग करते रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान सरकार ने दो वक्त की रोटी के लिए उन्हें मोहताज बना दिया है। इस वजह से पीओके के लोग भारत में विलय की मांग भी करने लगे हैं। पिछले कुछ दिनों में भारत के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री ने ऐसे कई बयान दिए हैं जिसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का जिक्र रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि पाकिस्तान ने अगर चूड़ियां नहीं पहनी है तो भारत पहना देगा। गृह मंत्री अमित शाह ने लगातार कहा कि पीओके भारत का हिस्सा है। इसे वापस लेंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि पीओके को ताकत से हासिल करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। वो खुद ही भारत में शामिल हो जाएगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि पीओके पर पाकिस्तानी कब्जा खत्म करके उसे भारत में शामिल कर लिया जाएगा। भारतीय नेताओं के ये बयान पिछले पांच से दस दिनों के अंदर आए हैं। पीओके के लोगों का विद्रोह भी इसी दौरान हो रहा है। सवाल ये है कि क्या पीओके में कुछ बड़ा होने वाला है?
बिजली और खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों के विरोध में व्यापारी शुक्रवार को सड़कों पर उतर आए। अगस्त 2023 में भी उच्च बिजली बिलों के खिलाफ ऐसे ही विरोध प्रदर्शन हुए थे। स्ट्राइक की वजह से पीओके की राजधानी और सबसे बड़े शहर मुजफ्फराबाद में सार्वजनिक परिवहन, दुकानें, बाजार और व्यवसाय बंद हो गये। मीरपुर और मुजफ्फराबाद डिवीजनों में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ दिए और पुलिस के साथ झड़प भी देखने को मिली।
12 मई को विधानसभा और अदालतों जैसी सरकारी इमारतों की सुरक्षा के लिए अर्धसैनिक रेंजरों को बुलाने की नौबत आ गई। बढ़ती ऊर्जा लागत के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दो साल से अधिक समय से अत्यधिक उच्च मुद्रास्फीति और निराशाजनक आर्थिक विकास दर का सामना कर रही है। पाकिस्तानी अखबार डॉन अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2022 से उपभोक्ता मुद्रास्फीति 20% से ऊपर रही है और मई 2023 में 38% तक पहुंच गयी है।
पीओके के नेता क्षेत्र में बिजली वितरण में इस्लामाबाद सरकार द्वारा कथित भेदभाव का विरोध कर रहे हैं। डॉन ने क्षेत्र के प्रमुख चौधरी अनवारुल हक द्वारा नीलम-झेलम परियोजना द्वारा उत्पादित 2,600 मेगावाट जलविद्युत का उचित हिस्सा नहीं मिलने की शिकायतों पर रिपोर्ट प्रकाशित की है।
हक ने यह भी कहा है कि हालिया बजट में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि के लिए संसाधनों के उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया गया था और उन्हें भुगतान करने के लिए विकास निधि का उपयोग करने के लिए मजबूर किया गया।
फरवरी 2019 के पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सूखे खजूर, सेंधा नमक, सीमेंट और जिप्सम जैसे पाकिस्तानी उत्पादों पर सीमा शुल्क बढ़ाकर 200% करने के बाद पीओके में व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ। परिणामस्वरूप, भारत में पाकिस्तान का निर्यात औसत से गिर गया। डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में $45 मिलियन प्रति माह से बढ़कर मार्च और जुलाई 2019 के बीच केवल $2.5 मिलियन प्रति माह हो गया।
अगस्त 2019 में जम्मू और कश्मीर में भारत द्वारा किए गए संवैधानिक परिवर्तनों के बाद पाकिस्तान द्वारा सभी व्यापार बंद करने के बाद स्थिति और अधिक कठिन हो गई थी। भारत-पाकिस्तान व्यापार पिछले पांच वर्षों में सालाना लगभग 2 बिलियन डॉलर के निचले स्तर पर आ गया है।
रूस-यूके्रन युद्ध के बाद वैश्विक खाद्य और ईंधन की कीमतें बढ़ने के बाद से पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट आई है। इसी तरह के भुगतान संतुलन संकट ने 2022-23 में श्रीलंका को भी पंगु बना दिया, जिससे भारत को समर्थन उपायों का विस्तार करना पड़ा।
स्टेट बैंक आफ पाकिस्तान के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार अगस्त 2021 में 20.1 बिलियन डॉलर के शिखर से गिरकर फरवरी 2023 में 2.9 बिलियन डॉलर हो गया, जो केवल एक महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त है। पाकिस्तान अपनी कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 40% आयात करता है।
पीएम शरीफ ने पीओके के लिए 23 अरब पाकिस्तानी रुपये (718 करोड़ हिंदुस्तानी रुपये) के पैकेज की घोषणा की है। पांच दिनों से चल रहे प्रदर्शन के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उच्चस्तरीय बैठक की। इस बैठक में पाक के पीएम अनवारुल हक, पीएमएल-एन के नेता राजा फारूक हैदर, कश्मीर मामलों के मंत्री अमीर मुकाम और कई प्रमुख राजनेता शामिल हुए।
अब खबर आयी है कि शहबाज शरीफ पीओके का दौरा करने वाले हैं। पीओके के मुजफ्फराबाद में शहबाज शरीफ का दौरा होगा। इसके साथ ही खबर आयी है कि पाकिस्तान ने पीओके को बचाने के लिए 24 सरकारी कंपनियों को बेचने का फैसला किया है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अयोध्याधाम के भव्य श्रीराम मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या कम नहीं हो रही है। मंदिर लोकार्पण के बाद से यह सिलसिला अनवरत जारी है। यहां प्रतिदिन लघु भारत के भी दर्शन होते हैं। भाषा अलग है। लेकिन श्रद्धा भाव समान है। भीषण गर्मी में भी किसी का उत्साह कम नहीं है। अयोध्या की सड़कें, मंदिर सभी जगह श्रीराम की जय जयकार गूंजती रहती है। एक-दूसरे की जो भाषा भी जो नहीं समझते वह भी जय श्रीराम से परस्पर अभिवादन करते है।
श्रीराम लला के दर्शन कर लोग भावविह्वल होते है। दर्शनार्थियों के इस हुजूम में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान भी शामिल हैं। उन्होंने श्रीराम लला के दर्शन किये। मत्था टेका। अयोध्या का पड़ोसी जिला बहराइच आरिफ मोहम्मद खान का चुनावी क्षेत्र रहा है। आरिफ मोहम्मद खान ने न केवल रामलला को जीभर के निहारा बल्कि उन्होंने रामलला के दरबार में उन्हें लेटकर प्रणाम किया और उनके प्रति अपनी भावना समर्पित की।
उन्होंने सामाजिक सौहार्द का एक बड़ा संदेश दिया। आरिफ मोहम्मद अपने राष्ट्रवादी विचारों के लिए प्रसिद्ध हैं। वह उर्दू, फारसी, हिंदी संस्कृत आदि अनेक भाषाओं के जानकर हैं। बहुत अध्ययनशील हैं। अपने संबोधन में वह वेद पुराण उपनिषदों का उद्धरण देते हैं। भारतीय संस्कृति की महत्ता का प्रतिपादन करते हैं। कहते हैं कि यह भारत है जिसने ज्ञान और उसके प्रसार का मानवीय चिंतन दुनिया को दिया।
सूर्य सिद्धांत यूरोपीय पुनर्जागरण का आधार है। नौवीं शताब्दी में भारतीय सूर्य सिद्धांत ग्रंथ को लेकर भारतीय मनीषी अरब गए थे। बगदाद के सुल्तान ने उसका अनुवाद कराया। इसके बाद यह ग्रंथ स्पेन के राजा ने मंगवाया। उसका अनुवाद वहां हुआ। युरोपीय पुनर्जागरण इसी भारतीय सिद्धांत पर आधारित है।
उपनिषद कहते हैं ज्ञान प्राप्त करो फिर उसको साझा करो। कपिल मुनि ने ज्ञान प्राप्त किया। फिर उसे अपनी मां को सुनाया। यह प्रसार की ही ललक थी। भारतीय चिंतन में सेवा सहायता पूजा की भांति है। इसमें भेदभाव नहीं है। इस भारतीय विरासत पर अमल तय हो जाए तो सभी कार्य अपने आप होते चलेंगे। भारतीय ज्ञान का सारांश गीता में है। भारत में ज्ञान की पूजा हुई। इस मार्ग से भटके तभी भारत परतंत्र हुआ। ज्ञान का प्रसार बंद कर दिया। इसलिए गुलाम हुए। जो ज्ञान को साझा नहीं करता वह सरस्वती का उपासक नहीं खलनायक होता है। महामना मालवीय ने इसी चेतना का जागरण किया।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय इसका एक निमित्त या पड़ाव मात्र है। भारतीय संस्कृति का जागरण हो रहा है। ज्ञान की तरह पवित्र करने वाला कुछ नहीं है। ब्रह्मचारी वह है जो विद्यार्थी है। जिसमें जिज्ञासा है। विज्ञान का महत्व है। विज्ञान प्रकृति पर नियन्त्रण का प्रयास करता है। ज्ञान ब्रह्म की ओर ले जाता है। एकता का आधार आत्मा है। मनुष्य ही नहीं जीव-जन्तु सभी में आत्मा है। इसलिए भेदभाव नहीं होना चहिए।
आरिफ मोहमद जनवरी में मणिराम दास छावनी में हुए अयोध्या उत्सव में सहभागी हुए थे। उसमें उन्होंने कहा था कि राम मंदिर के निर्माण से पूरा देश गर्व महसूस कर रहा है। उस खुशी में हिस्सा लेने के लिए आया हूं। श्रीराम का जीवन हमें सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भक्ति आंदोलन की शुरूआत दक्षिण में उत्तर भारत से काफी पहले हो गई थी। आंदोलन में श्रीराम को अवतार के रूप में देखा गया है। सबमें राम सबके राम यह वास्तविकता नजर आती है।
आरिफ मोहम्मद खान की भगवान राम पर आस्था किसी से छुपी नहीं है। वह अकसर कहते हैं कि आज भी अगर आप ग्रामीण इलाकों में चले जाएं तो लोग एक दूसरे से राम-राम करते हैं। यहां तक कि जब झगड़ा हो जाता है तो लोग कहते हैं कि राम-राम करो, झगड़ा मत करो। ऐसा कोई नहीं है जिसके दिल में राम न हों। मुसलमान के दिल में भी राम हैं।
हम ऐसे देश में रहते हैं जहां कि संस्कृति ये नहीं कहती है कि हम दूसरों पर हमला करें। भगवान राम भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि हैं। राम के व्यक्तित्व की विशेषता यह है कि वह हर युग के महानायक हैं। प्रभु राम समावेशी समाज, सामाजिक समरसता और एकता का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। रामकथा की लोकप्रियता भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
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