एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज यह प्रामाणिक रूप से कहा जा सकता है कि अपने स्वर्णिम अतीत को विस्मृत करने वाला भारतीय समाज अब अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। सही मायनों में कहा जाए तो समाज प्राकृतिक होने की ओर कदम बढ़ा चुका है। विश्व की महान और शाश्वत परंपराओं का धनी भारत देश भले ही अपनी पहचान बताने वाली कई बातों का भूल गया हो, लेकिन कुछ बातें ऐसी भी हैं, जिनका स्वरुप आज भी वैसा ही दिखाई देता है, जैसा दिग्विजयी भारत का था।
हम भले ही अपने शुभ कार्यों में अंग्रेजी तिथियों का उल्लेख करते हों, लेकिन उन तिथियों का उन शुभ कार्यों से कोई संबंध नहीं रहता। हम जानते हैं कि भारत में जितने भी त्यौहार एवं मांगलिक कार्य किए जाते हैं, उन सभी में केवल भारतीय काल गणना को ही प्रधानता दी जाती है। इसका आशय स्पष्ट है कि भारतीय ज्योतिष उस कार्य के गुण और दोष को भली भांति प्रकट करने की क्षमता रखता है। किसी अन्य कालगणना में यह संभव ही नहीं है। वर्तमान में हम भले ही स्वतंत्र हो गये हों, लेकिन पराधीनता का काला साया एक आवरण की तरह हमारे सिर पर विद्यमान है।
जिसमें चलते हम उस राह का अनुसरण करने की ओर प्रवृत्त हुए हैं, जो हमारे संस्कारों के साथ समरस नहीं है। अब नव वर्ष को ही ले लीजिए। अंग्रेजी पद्धति से एक जनवरी को मनाया जाने वाला वर्ष, नया कहीं से भी नहीं लगता। इसके नाम पर किया जाने वाला मनोरंजन फूहड़ता के अलावा कुछ भी नहीं है। सोचने की बात यह है कि आधुनिकता के नाम पर समाज का अभिजात्य वर्ग वह सब कुछ कर रहा है, जो सभ्य और भारतीय समाज के लिए स्वीकार करने योग्य नहीं है। विसंगति तो यह है कि हमारे समाज के यही लोग संस्कृति बचाने के नाम पर लंबे चौड़े व्याख्यान देते हैं।
भारतीय काल गणना के अनुसार मनाए जाने वाले त्यौहारों के पीछे कोई न कोई प्रेरणा विद्यमान है। हम जानते हैं कि हिन्दी के अंतिम मास फाल्गुन में वातावरण भी वर्ष समाप्ति का संकेत देता है। साथ ही नव वर्ष के प्रथम दिन से ही वातावरण सुखद हो जाता है। हमारे ऋषि-मुनि कितने श्रेष्ठ होंगे, जिन्होंने ऐसी काल गणना विकसित की, जिसमें कब क्या होना है, इस बात की पूरी जानकारी समाहित है। पिछले दो हजार वर्षों में अनेक देशी और विदेशी राजाओं ने अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की तुष्टि करने तथा इस देश को राजनीतिक दृष्टि से पराधीन बनाने के प्रयोजन से अनेक संवतों को चलाया, किंतु भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान केवल विक्रमी संवत के साथ ही जुड़ी रही।
अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण आज भले ही सर्वत्र ईसवी संवत का बोलबाला हो। भारतीय तिथि-महीनों की काल गणना से लोग अनभिज्ञ होते जा रहे हों। परंतु वास्तविकता यह भी है कि देश के सांस्कृतिक पर्व-उत्सव तथा राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक आदि महापुरुषों की जयंतियां आज भी भारतीय काल गणना के हिसाब से ही मनायी जाती हैं, ईसवी संवत के अनुसार नहीं। विवाह-मुंडन का शुभ मुहूर्त हो या श्राद्ध-तर्पण आदि सामाजिक कार्यों का अनुष्ठान, ये सब भारतीय पंचांग पद्धति के अनुसार ही किया जाता है, ईसवी सन की तिथियों के अनुसार नहीं।
इसके बाद भी हमारे समाज का एक वर्ग इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। इसके कारण हम सामाजिक मान मयार्दाओं का स्वयं ही मर्दन करते जा रहे हैं। जिसके चलते इसका दुष्प्रभाव हमारे सामने आ रहा है और समाज में अनेक प्रकार की विसंगतियां भी जन्म ले रही हैं, जो भारतीय जीवन दर्शन के हिसाब से स्वीकार योग्य नहीं हैं। भारतीय नव वर्ष का अध्ययन किया जाये तो चारों तरफ नई उमंग की धारा प्रवाहित होती हुई दिखाई देती है। जहां प्रकृति अपने पुराने आवरण को उतारकर नये परिवेश में आने को आतुर दिखाई देती है, वहीं भारत माता अपने पुत्रों को धन धान्य से परिपूर्ण करती हुई दिखाई देती है।
भारतीय नव वर्ष के प्रथम दिवस पूजा पाठ करने से असीमित फल की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि शुभ कार्य के लिए शुभ समय की आवश्यकता होती है और यह शुभ समय निकालने की सही विधा केवल भारतीय काल गणना में ही समाहित है। भारतीय नववर्ष का पहला दिन यानी सृष्टि का आरंभ दिवस, युगाब्द और विक्रम संवत जैसे विश्व के प्राचीन संवत का प्रथम दिन, श्रीराम एवं युधिष्ठिर का राज्याभिषेक दिवस, मां दुर्गा की साधना चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिवस, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, प्रखर देशभक्त डॉ. केशवराव हेडगेवार का जन्मदिवस, आर्य समाज का स्थापना दिवस, संत झूलेलाल जयंती। इतनी विशेषताओं को समेटे हुए हमारा नव वर्ष वास्तव में हमें कुछ नया करने की प्रेरणा देता है। वास्तव में ये वर्ष का सबसे श्रेष्ठ दिवस है।
नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। ब्रह्मपुराण के अनुसार पितामह ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि निर्माण प्रारंभ किया था, इसलिए यह सृष्टि का प्रथम दिन है। इसकी काल गणना बड़ी प्रचीन है। सृष्टि के प्रारंभ से अब तक लगभग 1 अरब, 95 करोड़, 58 लाख, 85 हजार, 115 वर्ष बीत चुके हैं। यह गणना ज्योतिष विज्ञान द्वारा निर्मित है। आधुनिक वैज्ञानिक भी सृष्टि की उत्पत्ति का समय एक अरब वर्ष से अधिक बता रहे हैं। जो भारतीय काल गणना की शाश्वत उपयोगिता का प्रमाण देता है।
हिन्दु शास्त्रानुसार इसी दिन से ग्रहों, वारों, महीनों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है, क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव शृंगार किया जाता है। लोग नव वर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार सजाते हैं तथा नवीन वस्त्राभूषण धारण करके ज्योतिषाचार्य द्वारा नूतन वर्ष का संवत्सर फल सुनते हैं।
विक्रमादित्य ने भारत की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत इस तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है। ऐसे में विचारणीय तथ्य यह है कि हम जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं या फिर जड़ बनकर पश्चिम के पीछे भागना चाहते हैं। ध्यान रहे नकल हमेशा नकल ही रहती है, वास्तविकता नहीं हो सकती। आज चमक दमक के प्रति बढ़ता आकर्षण हमें भारतीयता से दूर कर रहा है, लेकिन यह भी एक बड़ा सच है कि दुनिया के तमाम देशों के नागरिकों को भारतीयता रास आने लगी है। (लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। येसु के क्रूस की खोज से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ और किंवदंतियाँ रोम के येरुसलेम में पवित्र क्रूस की बासिलिका की उत्पत्ति में एक साथ जुड़ी हुई हैं।
चेसारेया के इतिहासकार यूसेबियस (265-340 ई.) ने उल्लेख किया कि सम्राट हार्डियन ने कलवारी पर्वत और पवित्र कब्र पर पेगन मंदिर बनवाए थे ताकि येसु ख्रीस्त और उनके शिष्यों से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को भुला दिया जा सके। लेकिन सन 313 ई. में सहनशीलता के एडिक्ट की घोषणा और धर्म सतावट या उत्पीड़न की समाप्ति के बाद, सम्राट कॉन्स्टेंटाइन ने इन पेगन मंदिरों को ध्वस्त किया और उनकी जगह पर एक बड़ा ईसाई मंदिर, ल अनास्तासिस ए मार्टिरियॉन अर्थात उत्थान और शहीदी स्थल बनवाया।
सन 325 में संत हेलेना, सम्राट कॉन्स्टेंटाइन की माँ, अपनी वृद्धावस्था में पवित्र भूमि की यात्रा पर गईं। उनका जन्म 250 ई. में बिटिनिया के ड्रेपानुम में हुआ था और जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने ईसाई धर्म को अपनाया।
संत अम्ब्रोस ने अपने लेखों में उन्हें एक साधारण परिवार की महिला के रूप में वर्णित किया, जिनके पिता एक सराय के मालिक थे। वह कॉन्स्टेंटियस क्लोरस नामक व्यक्ति की उपपत्नी बनीं, लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। जब उनका बेटा सम्राट बना, तो उन्होंने दरबार में ऑगस्टा की उपाधि प्राप्त की। अर्थात हेलेना को एक उच्च सामाजिक और राजनीतिक पद प्राप्त हुई।
प्राचीन चर्च इतिहासकारों, जिनमें संत अम्ब्रोस भी शामिल हैं, ने संत हेलेना की ईसाई गुणों की सराहना की। संत हेलेना को कलवारी पर्वत पर तीन क्रूस खोजने का श्रेय दिया जाता है। येसु के सच्चे क्रूस की कहानी रोम की बासिलिका के पवित्र वेदी के ऊपर चित्रित की गई है, जो लगभग 13वीं सदी में वाराज्जे के जाकोपो की स्वर्णमालिका से ली गई है। इसके अनुसार, संत हेलेना ने पवित्र भूमि जाकर येरुसलेम के एक निवासी से येसु के क्रूस की चर्चा की और उन्होंने बताया कि ये क्रूस कहाँ दफनाए गए थे।
खुदाई करने वाले ने तीन क्रूसों को निकाला, जिन्हें बाद में एक जुलूस के साथ येरुसलेम ले जाया गया। वहां, संत मकैरियस, शहर के बिशप, ने ईश्वर से एक चिन्ह मांगा और अंततः उन्होंने येसु ख्रीस्त के क्रूस को पहचानने में सफलता पाई, जब उन्होंने एक युवा के निर्जीव शरीर को पवित्र क्रूस की लकड़ी के ऊपर रखा और उसे जीवन प्राप्त हुवा।
संत हेलेना ने क्रूस को तीन हिस्सों में बांटा। एक हिस्सा उन्होंने येरुसलेम में छोड़ा, दूसरा हिस्सा अपने बेटे को कांस्टेंटिनोपल भेजा, और तीसरा हिस्सा अपने साथ रोम ले आईं, साथ ही एक कील और कलवारी पर्वत की मिट्टी का ढेर भी, जिसे उन्होंने उस प्रार्थनालय के फर्श पर बिछाया जो आज संत हेलेना को समर्पित है जो येरुसलेम में पवित्र क्रूस की बासिलिका, रोम में सुरक्षित है। आज भी येसु के पवित्र क्रूस के लकड़ी और हेलेना दोवारा लाई गई इस मिट्टी के ढेर को देखा और छुआ जा सकता है।
एक सहस्त्राब्दी से अधिक समय तक, पवित्र दुखभोग के अवशेषों को क्यूबिकुम सैंटे हेलेनाए (संत हेलेना का कक्ष) में रखा गया, जिसे किंवदंती के अनुसार सम्राज्ञी का निजी कक्ष माना जाता है। हाल की पुरातात्विक खुदाई (1996) में एक बपतिस्मा कुण्ड (बैपटिज़्मल फाउंट) और कुछ कब्रें पाई गईं, जो यह संकेत देती हैं कि यह प्रार्थनालय केवल निजी उपयोग के लिए नहीं था, बल्कि एक सार्वजनिक प्रार्थनालय था, जहाँ रोमन ईसाई समुदाय अपने विश्वास को पवित्र दुखभोग के अवशेषों के पास व्यक्त करता था।
वाराज्जे के जाकोपो के अनुसार, ख़ोसरों, जो पेर्सिया के सम्राट थे, ने येरुसलेम पर विजय प्राप्त कर सच्चे क्रूस के अवशेषों को कब्जा कर लिया था। सम्राट हेराक्लियस ने ख़ोसरों को द्वंद्व युद्ध में चुनौती दी, अवशेषों को पुनः प्राप्त किया और उन्हें येरुसलेम वापस लाया। वहाँ पहुँचने पर, उन्होंने पाया कि शहर के द्वार उनके लिए बंद थे। तभी एक स्वर्गदूत प्रकट हुआ और हेराक्लियस को पवित्र शहर में विनम्र बनकर प्रवेश करने के लिए आमंत्रित किया, जैसा कि स्वयं येसु ख्रीस्त ने किया था।
हेराक्लियस ने अपने सम्राट का वस्त्र और आभूषण त्यागकर, पवित्र क्रूस को अपने कंधे पर उठाया, और जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, शहर के द्वार उनके लिए खुल गए। यह पवित्र क्रूस की बासिलिका के भित्तिचित्र पहले पिंटुरिच्चियो या पेगुरिनो द्वारा बनाए गए थे। 2000 में हुई बहाली के बाद, इसे एंटोनियाज़ो रोमैनो (1430-1508) और उनके स्कूल के साथ जोड़ा गया, जो 15वीं सदी के अंत में कार्य कर रहे थे।
रोम के येरुसलेम में पवित्र क्रूस की बासिलिका एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जहाँ सम्राज्ञी हेलेना द्वारा पवित्र भूमि से लाए गए पवित्र अवशेषों को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा गया है। यह तीर्थयात्रा न केवल इतिहास की याद दिलाती है, बल्कि हर ख्रीस्तीय विश्वासियों को अपने आस्था और आध्यात्मिक जीवन को मजबूत बनाने के लिए प्रेरित करती है।
(नोट : लेखक राँची महाधर्मप्रांत हैं। ये सभी तथ्य रोम के येरुसलेम में पवित्र क्रूस की बासिलिका से लिए गए हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्व रंगमंच दिवस हर वर्ष 27 मार्च को मनाया जाता है। यह दिवस रंगमंच की महत्ता, उसकी सामाजिक भूमिका और सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित करने के लिए समर्पित है। रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि यह समाज को आईना दिखाने, विचारों को प्रकट करने और बदलाव लाने का एक प्रभावी माध्यम है।
विश्व रंगमंच दिवस की शुरुआत 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट द्वारा की गयी थी। इसका उद्देश्य रंगमंच को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना था। हर वर्ष इस दिन विश्व प्रसिद्ध रंगकर्मी एक संदेश देते हैं, जिसमें रंगमंच की भूमिका और उसकी दिशा पर विचार किया जाता है।
इस वर्ष 2025 में रंगमंच ने सामाजिक और डिजिटल परिवर्तन के साथ अपने स्वरूप को और अधिक समृद्ध किया है। कई नये नाटक एवं प्रयोगात्मक प्रस्तुतियां आई हैं जो समाज के ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित हैं। विशेष रूप से पर्यावरण, युवा सशक्तिकरण, डिजिटल तकनीक और पारंपरिक रंगमंच का मिश्रण देखने को मिला है।
रंगमंच केवल एक कला नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक दृष्टिकोण भी है। यह व्यक्ति के आत्मविश्वास, संवाद कौशल, भावनात्मक अभिव्यक्ति और सहानुभूति को विकसित करता है। यह समाज को विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों को समझने में मदद करता है। अब सवाल यह है कि युवा पीढ़ी को रंगमंच से क्यों जुड़ना चाहिए? सृजनात्मकता एवं आत्म-अभिव्यक्ति झ्र रंगमंच युवाओं को अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने का अवसर देता है।
नेतृत्व और टीम वर्क झ्र एक नाटक को प्रस्तुत करने के लिए टीम भावना आवश्यक होती है, जिससे नेतृत्व क्षमता विकसित होती है। सामाजिक जागरूकता : रंगमंच के माध्यम से युवा विभिन्न सामाजिक मुद्दों से परिचित होते हैं और उनका समाधान खोजने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। संवाद कौशल एवं आत्मविश्वास झ्र अभिनय से संवाद कौशल में सुधार होता है, जो किसी भी पेशे में आवश्यक होता है।
दूसरा सवाल है कि समाज में रंगमंच का दायित्व और सुधार की क्या संभावनाएं हैं, तो बताना चाहुंगा कि रंगमंच समाज में नैतिकता, करुणा और न्याय जैसे मूल्यों को बढ़ावा देता है। यह न केवल मनोरंजन बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी माध्यम है। शिक्षा में सुधार झ्र नाटकों को शिक्षा प्रणाली में जोड़ने से बच्चों की कल्पनाशीलता और सोचने की क्षमता में वृद्धि होगी। समाज में सकारात्मक बदलाव झ्र नाटक जातिवाद, भेदभाव, हिंसा और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता फैलाने का एक सशक्त साधन हो सकता है।
संस्कृति का संरक्षण झ्र पारंपरिक रंगमंच की विधाओं जैसे रामलीला, नौटंकी, कठपुतली, यक्षगान, कुचिपुड़ी, नाचा, छाउ, लौंडा नाच, भवाई जैसे लोकनाट्यों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। हमारे धर्मग्रंथों में भी रंगमंच और नाटक की महत्ता को स्वीकार किया गया है। महाभारत में यक्ष प्रश्न के संवाद और कई घटनाएं नाटकीयता से भरी हैं, जो जीवन के गहरे संदेश देती हैं। भगवद गीता स्वयं श्रीकृष्ण का एक महान संवाद-नाट्य है, जिसमें उन्होंने अर्जुन को धर्म और कर्म का बोध कराया।
रामायण में रामलीला, जो आज भी भारत में प्रचलित है, रंगमंच का एक प्रमुख उदाहरण है। नाट्य शास्त्र (भरत मुनि द्वारा रचित) को रंगमंच का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है, जिसमें अभिनय, मंच सज्जा और नाट्य संरचना के नियम बताए गए हैं। राष्ट्र निर्माण में भी रंगमंच का बहुत बड़ा योगदान है। रंगमंच समाज और राष्ट्र के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकता है। देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता झ्र नाटक स्वतंत्रता संग्राम, भारतीय संस्कृति और देशभक्ति की भावना को उजागर कर सकते हैं।
शिक्षा और सामाजिक सुधार झ्र बाल विवाह, भ्रष्टाचार, पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर नाटक जागरूकता फैलाने का कार्य कर सकते हैं। नवाचार एवं रोजगार झ्र रंगमंच के क्षेत्र में न केवल कलाकार बल्कि तकनीशियन, लेखक, निर्देशक, संगीतकार आदि के लिए भी रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। तीसरा सवाल युवाओं को रंगमंच से कैसे जोड़ा जाये? विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में नाट्य विभाग की स्थापना एवं नाट्य मंचन अनिवार्य करना चाहिए।
सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों द्वारा नाट्य कार्यशालाओं का आयोजन। लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रंगमंच के कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार। राज्य सरकारों को स्थानीय प्रशिक्षित कलाकारों एवं लोक कलाकारों को मंच और अवसर प्रदान कराने की पहल करनी चाहिए। रंगमंच सिर्फ एक मंच नहीं, यह जीवन का प्रतिबिंब है। भारतीय रंगमंच का प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रतिष्ठित ग्रंथ नाट्यशास्त्र को माना जाता है। इसमें रंगमंच, अभिनय, नाट्य संरचना, रस, भाव और मंच-सज्जा के विभिन्न पहलुओं का विस्तार से वर्णन किया गया है।
इसमें कई बहुमूल्य श्लोक हैं जो रंगमंच की महत्ता को दशार्ते हैं। नाट्यशास्त्र में उद्धृत एक श्लोक से उद्देश्य और महत्व के बारे में बताया गया है कि न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न स कला। नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन यन्न दृश्यते॥ (नाट्यशास्त्र, अध्याय 1, श्लोक 116) अर्थात नाट्य में ऐसा कोई ज्ञान, कला, शिल्प, विद्या, योग या कर्म नहीं है जो इसमें प्रदर्शित न किया गया हो। रंगमंच जीवन के हर पक्ष को समाहित करता है। धर्म्यमर्थ्यं च काम्यं च विविधान्श्चोपदेशकान्। लोकस्य सर्ववृत्तार्थं नाट्यमेतत्करिष्यति॥
(नाट्यशास्त्र, अध्याय 1, श्लोक 107) कहा गया है कि नाट्य धर्म, अर्थ, काम और उपदेश से परिपूर्ण होगा तथा यह लोक के समस्त आचरणों को दर्शायेगा। नाट्य का प्रभाव समाज पर क्या पड़ता है इस संदर्भ में नाट्यशास्त्र में जो श्लोक उद्धृत है सहितं गीतेन वादित्रै: पुष्टं व्याख्यानभूषितम्। रम्यं दृष्टिप्रसादं च श्रव्यं च सुखदं तथा॥ (नाट्यशास्त्र, अध्याय 1, श्लोक 125) अर्थात संगीत, वाद्ययंत्रों और संवादों से युक्त नाट्य, दृश्य एवं श्रवण दोनों के लिए आनंददायक होता है और इसे देख-सुनकर मन को प्रसन्नता मिलती है। वहीं रस की उत्पत्ति और प्रभाव के बारे में कहा गया है
विभावानुभावव्यभिचारी संयोगाद्रसनिष्पत्ति:। (नाट्यशास्त्र, अध्याय 6, श्लोक 31) रस की उत्पत्ति विभाव (उत्प्रेरक तत्व), अनुभाव (प्रतिक्रिया) और व्यभिचारी भाव (संवेदनशीलता) के संयोग से होती है। जबकि नाट्य के द्वारा समाज में सुधार लाया जा सकता है जिसका वर्णन नाट्य शास्त्र के इस श्लोक से प्रतिपादित होता है। नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम्। (नाट्यशास्त्र, अध्याय 1, श्लोक 112) अर्थात विभिन्न रुचियों वाले लोगों के लिए नाटक एक समान रूप से आनंद देने वाला माध्यम है। यह सभी के लिए है और समाज को एक सूत्र में बांधता है।
यह विश्व रंगमंच दिवस नाट्यशास्त्र की महत्ता को और अधिक बढ़ा देता है। शास्त्र में लिखित ये श्लोक यह दशार्ते हैं कि रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को शिक्षित करने, संस्कृति को संरक्षित करने और जीवन के विविध रंगों को प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम है। नाट्य को एक समग्र कला के रूप में स्वीकार किया गया है, जो संगीत, नृत्य, अभिनय और संवाद के माध्यम से दर्शकों को रसास्वादन कराता है। रंगमंच केवल कला नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का एक माध्यम है।
यह एक ऐसा मंच है जो समाज की समस्याओं को उजागर करता है, व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करता है और सामाजिक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विश्व रंगमंच दिवस हमें इस बात का स्मरण कराता है कि रंगमंच के बिना जीवन अधूरा है, क्योंकि यह समाज का प्रतिबिंब है और हमें सोचने, समझने सुधरने और सुधारने की प्रेरणा देता है। (लेखकर रंगकर्मी, निर्देशक सह सहायक आचार्य हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसानों के लिए विभिन्न योजना बनाकर के उनको धरातल पर अमलीजामा पहनाने का कार्य बखूबी किया है, किसानों की आय को बढ़ाने के लिए योगी सरकार निरंतर प्रयास कर रही है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 मार्च 2025 को अपने दूसरे कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे कर लिए हैं। वहीं योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में लगातार आठ वर्ष तक कार्य करने का एक नया कीर्तिमान बना दिया है।
सख्त, ईमानदार व एक विजनरी प्रशासक वाली कार्यशैली के दम पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश व देश के साथ-साथ पार्टी में भी एक भरोसेमंद ब्रांड बनकर के स्थापित हो गये हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता का आलम यह हो गया है कि एक तरफ तो देश के हर राज्य के चुनावों में प्रचार के लिए योगी आदित्यनाथ की मांग निरंतर होती है, वहीं दूसरी तरफ अब योगी की कार्यशैली के देश ही नहीं बल्कि दुनिया में भी आये दिन चर्चाएं होती रहती हैं।
वैसे भी जिस तरह से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले आठ वर्षों के अपने शासन के दौरान उत्तर प्रदेश के शासन व पुलिस-प्रशासन की कार्यशैली में जबरदस्त ढंग से सुधार करते हुए, दशकों से सरकारी तंत्र की तरह-तरह के हस्तक्षेप, माफियागिरी, भ्रष्टाचार व राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते कुंद हो चुकी धार को तेज करते हुए, उसे आम जनमानस व देश के हित में कार्य करने के लिए प्रेरित करने का कार्य बखूबी किया है, जोकि बेहद ही काबिले-तारीफ है और जिसका परिणाम अब स्पष्ट रूप से शासन व पुलिस-प्रशासन की कार्यशैली में आये सकारात्मक बदलाव के रूप में राज्य के आम जनमानस को नजर आने लगा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने दमदार ढंग से सत्ता में आठ वर्ष का अपना लंबा कार्यकाल 25 मार्च 2025 को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। जो कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के नाम पर एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि इतिहास में दर्ज हो गयी है। देश के हर कोने में योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली के बड़ी संख्या में आम व खास लोग प्रसंशक होते जा रहे हैं।
शानदार कार्यशैली के दम पर अपने प्रथम कार्यकाल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देश व दुनिया में बुलडोजर बाबा के नाम से मशहूर हो गये थे। उनके बुलडोजर ने उत्तर प्रदेश के बड़े से बड़े माफियाओं की सल्तनत को ध्वस्त करने का कार्य बेखौफ होकर के किया है, आज देश के अधिकांश राज्य अपराध व अपराधियों पर नकेल कसने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली की नकल करने में लगे हुए हैं, जो उनकी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
नियम-कायदे व कानून पसंद देशभक्त देशवासियों व उत्तर प्रदेश के निवासियों के लिए योगी आदित्यनाथ के प्रथम कार्यकाल की तरह ही दूसरे कार्यकाल से भी लोगों को बहुत ही ज्यादा उम्मीदें थीं। जिस पर जनता की अदालत में योगी आदित्यनाथ अपने दूसरे कार्यकाल में भी पूरी तरह से खरे उतरते नजर आ रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों ने अब उत्तर प्रदेश को एक बीमारू राज्य की श्रेणी से निकल कर के देश में दूसरे पायदान पर लाकर के खड़ा कर दिया है, जो योगी आदित्यनाथ सरकार की बड़ी उपलब्धि है।
जो लोग यूपी की अर्थव्यवस्था को वन ट्रिलियन इकनॉमी करके देश में विकास की अग्रणी पंक्ति पर स्थापित होता देखना चाहते हैं, योगी आदित्यनाथ उन लोगों के सपने को जल्द से जल्द ही धरातल पर सरकार करने के लिए दिन-रात जुटे हुए हैं और वर्ष 2029 तक उन्होंने इस लक्ष्य को हासिल करने की समय सीमा भी तय कर रखी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यह भी अच्छे से जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जल्द से जल्द देश की अर्थव्यवस्था को फाइव ट्रिलियन इकनॉमी की बनते हुए देखने का जो सपना देखा है, इस सपने को पूरा करने का रास्ता उत्तर प्रदेश की गलियों से होकर ही गुजरता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अच्छे से जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में जितनी तेजी से सभी क्षेत्रों का बिना किसी भेदभाव के विकास होगा, उतनी ही तेजी के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था के फाईव ट्रिलियन इकनॉमी बनने का भी रास्ता साफ होगा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व देश के देशभक्त आम जनमानस का सपना भी धरातल पर साकार होता नजर आयेगा। वैसे भौगोलिक रूप से देखा जाये तो उत्तर प्रदेश एक बहुत बड़े क्षेत्रीय विस्तार वाला राज्य है, जिसके चलते पूरे राज्य का सर्वांगीण विकास करना एक बहुत बड़ी चुनौती है।
लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस चुनौती को स्वीकारते हुए उत्तर प्रदेश के सभी क्षेत्रों के विकास के लिए योजनाएं बना कर, उन्हें तेजी से धरातल पर अमलीजामा पहनाने का कार्य बखूबी किया है। धरातल पर जाकर के देखें तो उत्तर प्रदेश में सर्वांगीण विकास को तेज गति देने वाले आधारभूत ढांचे का निर्माण कार्य योगी राज में बहुत ही तेजी से जगह-जगह चल रहा है। प्रदेश के गांव, कस्बे व शहरों के निवासियों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए योगी सरकार धरातल पर निरंतर कार्य कर रही है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा के अनुरूप उत्तर प्रदेश की ताकत उसकी एकजुटता में है, जिसके चलते ही उत्तर प्रदेश के चारों हिस्से पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध क्षेत्र व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव, कस्बों व शहरों में बड़े पैमाने पर विकास का एक पूरा सशक्त आधारभूत ढांचा योगी राज में तैयार हो रहा है। उत्तर प्रदेश में अब योगी के प्रयासों से ही डबल इंजन की सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों के मार्ग, सड़क मार्ग, हाईवे, एक्सप्रेस-वे, रेल, मेट्रो, एयरपोर्ट, रेपिड रेल, जल मार्ग, डेडिकेटिड फ्रेट कॉरिडोर, डिफेंस कॉरिडोर, औधोगिक क्षेत्र, राज्य में दूर दराज के गांव तक भी इंटरनेट, अत्याधुनिक कोल्डस्टोरेज की सुविधा, वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट आदि के सपने को धरातल पर मूर्त रूप दिया है।
वहीं योगी आदित्यनाथ ने देश व दुनिया में बसे करोड़ों सनातन धर्म के अनुयायियों के धार्मिक पर्यटन के उद्देश्य से राम मंदिर निर्माण, अयोध्या, काशी व मथुरा का विकास, प्रयागराज में महाकुंभ 2025 में विश्व स्तरीय अत्याधुनिक महाकुंभ नगरी का निर्माण करके लगभग 66 करोड़ से अधिक लोगों को संगम पर स्नान करा कर के, उत्तर प्रदेश व देश की अर्थव्यवस्था को तरक्की के पंख लगा कर के राज्य में विकास के नये आयाम स्थापित करने का कार्य किया है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य में भयमुक्त माहौल बनाने के लिए पूरे प्रदेश में ही बेहद सख्त व प्रभावी कदम उठाए हैं। उनकी सख्ती के चलते ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने योगी सरकार के पिछले आठ वर्षों के कार्यकाल में माफिया व अपराधियों की कमर तोड़ने का कार्य बखूबी से किया है। योगी सरकार ने राज्य में 222 दुर्दांत अपराधियों को मुठभेड़ में मार गिराने कार्य किया है। मुठभेड़ के दौरान 8,118 अपराधी घायल हुए हैं। वहीं आम जनमानस में खौफ पैदा करने वाले 79,984 खतरनाक अपराधियों के विरुद्ध गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है।
वहीं योगी आदित्यनाथ सरकार ने वर्ष 2017 से वर्ष दिसंबर 2024 तक चिन्हित 68 माफियाओं के लंबित मुकदमों में प्रभावी पैरवी करते हुए 73 अभियोगों में 31 माफियाओं और 74 सह अपराधियों को आजीवन कारावास व अर्थदंड की सजा दिलवाने का कार्य भी किया है और दो अपराधियों को सजा ए मौत फांसी भी सुनायी गयी है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह रणनीति उत्तर प्रदेश में भयमुक्त माहौल बनाने के सपने को धरातल पर साकार करने का कार्य करती है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नासा की अनुभवी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और उनके साथी बुच विल्मोर, जो पिछले नौ महीने से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर थे, आज सफलतापूर्वक धरती पर लौट आये। स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल की मदद से उन्होंने मेक्सिको की खाड़ी में सुरक्षित लैंडिंग की।
सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर जून 2024 में बोइंग के स्टारलाइनर के साथ परीक्षण उड़ान के लिए अंतरिक्ष में गए थे। हालांकि, स्टारलाइनर में तकनीकी खामी के कारण उनकी वापसी में देरी हुई, जिससे वे नौ महीने तक आईएसएस पर रहे। उनकी वापसी के लिए स्पेसएक्स का क्रू-10 मिशन लॉन्च किया गया था, जिससे सफलतापूर्वक उन्हें धरती पर वापस लाया जा सका। वापसी के बाद दोनों अंतरिक्ष यात्रियों को स्ट्रेचर पर ले जाया गया, जो लंबे समय तक भारहीनता में रहने के बाद एक सामान्य प्रक्रिया है।
यह मिशन न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा बल्कि इससे वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने के प्रभावों को समझने में भी मदद मिलेगी। इससे नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों को भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों, जैसे मंगल पर मानव मिशन की योजना बनाने में सहायता मिलेगी। सुनीता विलियम्स व उनके सहयोगी की वापसी अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मिशन भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए मूल्यवान डेटा प्रदान करेगा और अंतरिक्ष यान तकनीक के सुधार में सहायक सिद्ध होगा।
सुनीता विलियम्स और उनके जैसे अनुभवी अंतरिक्ष यात्री भविष्य के चंद्र और मंगल अभियानों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। नासा और अन्य स्पेस एजेंसियाँ अब दीर्घकालिक अंतरिक्ष मिशनों की तैयारी कर रही हैं, जिनमें अंतरिक्ष में रहने के नए तरीके, कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण की संभावनाएँ और अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने की रणनीतियाँ शामिल हैं। इसके अलावा, स्टारलाइनर जैसी तकनीकों में सुधार कर, अंतरिक्ष अन्वेषण को अधिक सुरक्षित और कुशल बनाया जाएगा। अंतरिक्ष में मानव उपस्थिति को और विस्तारित करने के लिए वैज्ञानिक शोध जारी रहेंगे, जिससे भविष्य में मंगल और उससे आगे की यात्राएँ संभव हो सकेंगी।
सुनीता विलियम्स भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री हैं, जिनका भारत से गहरा जुड़ाव रहा है। उनके पिता भारतीय मूल के हैं और उन्होंने कई बार भारत के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है। भारत में अंतरिक्ष विज्ञान और अनुसंधान की बढ़ती उपलब्धियों के बीच सुनीता विलियम्स एक प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं। इसरो (आईएसआरओ) भी अब मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम, गगनयान की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। इसरो ने हाल ही में गगनयान के लिए प्रमुख परीक्षण पूरे किए हैं और आने वाले वर्षों में भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन को लॉन्च करने की योजना बना रहा है।
सुनीता विलियम्स की उपलब्धियाँ न केवल भारतीय वैज्ञानिकों बल्कि देश के युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत हैं। उनकी सफलता यह दिखाती है कि भारतीय मूल के लोग वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। भविष्य में, इसरो और नासा के बीच सहयोग बढ़ सकता है, जिससे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को और मजबूती मिलेगी। सुनीता विलियम्स न केवल एक उत्कृष्ट अंतरिक्ष यात्री हैं बल्कि एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व भी हैं।
उनका सफ़र यह दर्शाता है कि कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और विज्ञान के प्रति जुनून कैसे किसी को नई ऊंचाइयों तक पहुँचा सकता है। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं और युवा वैज्ञानिकों को प्रेरित किया है कि वे अंतरिक्ष अनुसंधान और विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ें। उन्होंने कई मौकों पर भारतीय छात्रों व युवाओं से संवाद किया है और उन्हें वैज्ञानिक क्षेत्रों में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। उनके अनुभव और उपलब्धियाँ न केवल अंतरिक्ष क्षेत्र बल्कि विज्ञान और तकनीक में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणा हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सीमाएँ केवल मानसिकता में होती है और यदि कोई लक्ष्य निर्धारित किया जाए तो उसे प्राप्त किया जा सकता है।
सुनीता विलियम्स और उनके जैसे अनुभवी अंतरिक्ष यात्री भविष्य के चंद्र और मंगल अभियानों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। नासा और अन्य स्पेस एजेंसियाँ अब दीर्घकालिक अंतरिक्ष मिशनों की तैयारी कर रही हैं, जिनमें अंतरिक्ष में रहने के नए तरीके, कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण की संभावनाएँ और अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने की रणनीतियाँ शामिल हैं। इसके अलावा, स्टारलाइनर जैसी तकनीकों में सुधार कर अंतरिक्ष अन्वेषण को अधिक सुरक्षित और कुशल बनाया जाएगा। अंतरिक्ष में मानव उपस्थिति को और विस्तारित करने के लिए वैज्ञानिक शोध जारी रहेंगे, जिससे भविष्य में मंगल और उससे आगे की यात्राएँ संभव हो सकेंगी।
सुनीता विलियम्स की वापसी अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मिशन भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए मूल्यवान डेटा प्रदान करेगा और अंतरिक्ष यान तकनीक के सुधार में सहायक सिद्ध होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सुनीता विलियम्स की सफल वापसी पर बधाई देते हुए उनके साहस तथा समर्पण की सराहना की। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनका यह मिशन भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और युवाओं के लिए एक प्रेरणा है, जो अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयों को छूने का सपना देखते हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारी सोच अब आहिस्ता-आहिस्ता बदलने लगी है। हम प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति थोड़ा मित्रवत भाव रखने लगे हैं। घर की छत या बालकनी में पक्षियों के लिए दाना-पानी डालने लगे हैं। गौरैया से हम फ्रेंडली हो चले हैं। किचन गार्डन और घर की बालकनी में कृत्रिम घोंसला लगाने लगे हैं। गौरैया हमारे आसपास आने लगी है।
उसकी चीं-चीं की आवाज हमारे घर-आंगन में सुनाई पड़ने लगी है। गौरैया संरक्षण को लेकर ग्लोबल स्तर पर बदलाव आया है, यह सुखद है। फिर भी अभी यह नाकाफी है। हमें प्रकृति से संतुलन बनाना चाहिए। हम प्रकृति और पशु-पक्षियों के साथ मिलकर एक सुंदर प्राकृतिक वातावरण तैयार कर सकते हैं। जिन पशु -पक्षियों को हम अनुपयोगी समझते हैं वह हमारे लिए प्राकृतिक पर्यावरण को संरक्षित करने में अच्छी-खासी भूमिका निभाते हैं लेकिन हमें इसका ज्ञान नहीं होता।
गौरैया हमारी प्राकृतिक मित्र है और पर्यावरण में सहायक है। गौरैया प्राकृतिक सहचरी है। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फुदकती और चावल या अनाज के दाने को चुगती है। कभी घर की दीवार पर लगे आईने पर अपनी हमशक्ल पर चोंच मारती दिख जाती। एक वक्त था जब बबूल के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में घोंसले लटके होते थे लेकिन वक्त के साथ गौरैया एक कहानी बन गई। हालांकि पर्यावरण के प्रति जागरूकता के चलते हाल के सालों में यह दिखाई देने लगी है। गौरैया इंसान की सच्ची दोस्त भी है और पर्यावरण संरक्षण में उसकी खासी भूमिका है। दुनिया भर में 20 मार्च गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी गौरैया संरक्षण के लिए लोगों से पहल की अपील कर चुके हैं। उन्होंने राज्यसभा सदस्य बृजलाल के प्रयासों को ट्वीटर पर खूब सराहा था और कहा कि गौरैया संरक्षण को लेकर आपका प्रयास बेहतरीन और काबिले तारीफ है। राज्यसभा सदस्य बृजलाल ने अपने घर में गौरैया संरक्षण को लेकर काफी अच्छे उपाय किए हैं। उन्होंने गौरैया के लिए दाना-पानी और घोंसले की व्यवस्था की है। जंगल में आजकल पंच सितारा संस्कृति विस्तार ले रही है। प्रकृति के सुंदर स्थान को भी इंसान कमाने का जरिया बना लिया है। जो पशु- पक्षियों के लिए खतरा बन गया है।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर के प्रयासों से 20 मार्च का दिन गौरैया के नाम रखा गया। 2010 में पहली बार यह दुनिया में मनाया गया। गौरैया का संरक्षण हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इनसान की भोगवादी संस्कृति ने हमें प्रकृति और उसके साहचर्य से दूर कर दिया है। गौरैया एक घरेलू और पालतू पक्षी है। यह इंसान और उसकी बस्ती के पास रहना अधिक पसंद करती है। पूर्वी एशिया में यह बहुतायत पायी जाती है। यह अधिक वजनी नहीं होती। इसका जीवनकाल दो साल का होता है। यह पांच से छह अंडे देती है।
भारत की आंध्र यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में गौरैया की आबादी में 60 फीसदी से अधिक की कमी बताई गई है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी आफ प्रोटेक्शन आफ बर्ड्स ने इस चुलबुले और चंचल पक्षी को रेड लिस्ट में डाल दिया है। दुनिया भर में ग्रामीण और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी घटी है। गौरैया की घटती आबादी के पीछे मानव विकास सबसे अधिक जिम्मेदार है। गौरैया पासेराडेई परिवार की सदस्य है लेकिन इसे वीवरपिंच परिवार का भी सदस्य माना जाता है। इसकी लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। इसका वजन 25 से 35 ग्राम तक होता है। यह अधिकांश झुंड में रहती है। यह अधिक से अधिक दो मील की दूरी तय करती है। मानव जहां-जहां गया, गौरैया उसका हमसफर बनकर उसके साथ गयी।
गांवों में अब पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। जिसका कारण है कि मकानों में गौरैया को अपना घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। पहले गांवों में कच्चे मकान बनाए जाते थे। उसमें लकड़ी और दूसरी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता था। कच्चे मकान गौरैया के लिए प्राकृतिक वातावरण और तापमान के लिहाज से अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते थे, लेकिन आधुनिक मकानों में यह सुविधा अब उपलब्ध नहीं होती। यह पक्षी अधिक तापमान में नहीं रह सकता। देश की खेती-किसानी में रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता प्रयोग बेजुबान पक्षियों और गौरैया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। केमिकल युक्त रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से कीड़े-मकोड़े भी विलुप्त हो चले हैं। जिनमें गिद्ध, कौआ, महोख, कठफोड़वा और गौरैया शामिल हैं। इनके भोजन का भी संकट खड़ा हो गया है।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर नासिक से हैं और वह बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े रहे हैं। उन्होंने यह मुहिम 2008 से शुरू की थी। आज यह दुनिया के 50 से अधिक देशों तक पहुंच गयी है। दिलावर के विचार में गौरैया संरक्षण के लिए लकड़ी के बुरादे से छोटे-छोटे घर बनाए जाएं और उसमें खाने की भी सुविधा भी उपलब्ध हो। घोंसले सुरक्षित स्थान पर हों, जिससे गौरैयों के अंडों और चूजों को हिंसक पक्षी और जानवर शिकार न बना सकें। हमें प्रकृति और जीव-जंतुओं के सरोकार से लोगों को परिचित कराना होगा। आने वाली पीढ़ी तकनीकी ज्ञान अधिक हासिल करना चाहती है लेकिन पशु-पक्षियों से वह जुड़ना नहीं चाहती है। इसलिए हमें पक्षियों के बारे में जानकारी दिलाने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। जिससे हम अपनी पर्यावरण दोस्त को उचित माहौल दे पाएं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी वीचैट हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्त्रियों की भागीदारी हर देश, समाज और परिवार में रेखांकित करने योग्य रही है। बावजूद इसके उनके व्यक्तित्व और विचारों के प्रति समावेशन यानी समानता का भाव नदारद रहा है। जिसके चलते तेजी से आगे बढ़ती दुनिया के हर कोने में ही आधी आबादी की तरक्की की गति जरा कम ही रही। लैंगिक भेदभाव और असमानता की स्थितियां स्त्रियों की हिस्सेदारी बढ़ाने में बड़ी बाधा बनती रही हैं।
गौरतलब है कि इस वर्ष इंटरनेशनल वीमन्स डे की थीम सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए अधिकार-समानता और सशक्तीकरण है। यह दिन स्त्रियों को शुभकामनाएं देने का विशेष दिन भर नहीं बल्कि उनके लिए समानता का परिवेश बनाने से जुड़ा संदेश लिए है। समग्र परिवेश में सार्थक बदलाव लाने के लिए आवश्यक है कि समानता की इस मुहिम को हर परिवार भी आगे बढ़ाये।
सकारात्मक और प्रेरणादायी परिस्थितियां बेहतरी से जुड़े हर बदलाव को खाद-पानी देती हैं। अधिकारों और मानवीय मोर्चे पर बराबरी की बुनियाद बनाने वाली इस वर्ष की थीम तो आज ही नहीं, आने वाले कल के लिए भी एक प्रेरणादायी परिवेश बनाने से जुड़ी है। ऐसे सामाजिक-पारिवारिक ताने-बाने को तैयार करने का उद्देश्य लिए है, जिसमें महिलाओं को हर स्तर पर प्रोत्साहन देने का काम किया जाए।
यह वैचारिक रूपरेखा व्यावहारिक धरातल पर एक बेहतर दुनिया के निर्माण का इरादा लिए है। समझना कठिन नहीं कि सामूहिक रूप से आधी आबादी के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल बनाने के लिए प्रेरित करने वाली परिस्थितियां आवश्यक भी हैं। आमतौर पर देखने में आता है कि घर हो या बाहर, स्त्रियों के उत्साह को सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलती है।
बहुत सी सामाजिक बाधाएं और पारिवारिक नीति-नियम आधी आबादी के प्रति समान व्यवहार अपनाने में रुकावट बनते हैं। जबकि अपने प्रयासों के लिए प्रशंसा पाना किसी भी इंसान को सबसे अधिक प्रेरणा देता है। समाज हो, कार्यस्थल हो या घर हो झ्र समग्र परिवेश में स्त्रियों को उनके अधिकार दिलाने और बराबरी की बुनियाद पक्की करने के लिए उनके उत्साह और हौसले को बल देने का भाव जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हर स्त्री के अधिकार और समानता की ऐसी ही बातें रखने के लिए एक प्रभावी मंच के समान है। वीमन्स डे पर बराबरी चाहने की साझी आवाज दुनिया के हिस्से में गूंजती है। भारतीय समाज के परंपरागत ढांचे में पारिवारिक व्यवस्था इस भाव और बदलाव को सबसे अधिक बल दे सकती है।
महिलाएं सदा से ही अपनी हर भूमिका को एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में जीती आई हैं। मां, पत्नी, सहकर्मी ही नहीं, आस-पड़ोस में बसे किसी परिवार की सदस्य के रूप में भी। अपनों-परायों, सभी को उनकी बातें और बर्ताव प्रेरणा देता रहा है। स्त्रियों की उपस्थिति हर हाल में बेहतरी की ओर बढ़ने का संबल देती रही है।
पीड़ादायी यह है कि स्त्रियां खुद अपना संबल नहीं बन पातीं। हर फ्रंट पर अपनी ही अनदेखी करती हैं। अपनी हिस्सेदारी पर अधिकार जमाने में पीछे रह जाती हैं। काबिलियत के बावजूद कामयाबी की राह पर बढ़ने से हिचकती हैं। यही कारण है कि भारतीय परिवेश में ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी उनके लिए न्यायसंगत और समानता के भाव से भरा समाज नहीं बन पाया है।
आवश्यक है कि स्त्रियां स्वयं आगे आएं। मानसिक बल और सामाजिक अपनेपन को अपने सशक्त व्यक्तित्व की बुनियाद बनाएं। मां, परवरिश के मोर्चे पर बेटी को मजबूत मन की धनी बनाकर तो बेटियां मां का मन समझकर एक-दूजे का संबल बन सकती हैं। यूं ही दूसरे सम्बन्धों में भी खींचतान के बजाय साथ देने की सोच हर स्त्री के लिए सहयोगी परिवेश बना सकती है। एक महिला किसी दूसरी महिला की मददगार बन सकती है।
स्त्रियों के प्रति पूर्वाग्रह, रूढ़िवादिता और भेदभाव के रहते लैंगिक समानता वाले विश्व की कल्पना नहीं की जा सकती। इसीलिए महिलाओं को सही मायने में भागीदार बनाने के लिए उनकी उम्र, क्षमता और शारीरिक छवि से परे विविधता को खुले मन से स्वीकारना जरूरी है। हर स्त्री के व्यक्तित्व और विचारों को मान देना जरूरी है।
इसमें घर-परिवार के लोग भी व्यक्तिगत रूप से बहू-बेटियों का मन समझने, उनके काम को महत्व देने और उनकी भागीदारी को अहमियत देकर लैंगिक समानता के भाव को बढ़ावा दे सकते हैं। असमानता से जूझने के लिए भी स्त्रियां एक-दूजे का हाथ थामें। बेटी के जन्म पर अपराधबोध या दूसरे घर से आई बहू को अधिकार देने में भेदभाव करने की मानसिकता से खुद स्त्रियों को भी बाहर आना होगा।
व्यवस्थागत नियमों के साथ ही घर-परिवार में भी परिवर्तन लाने होंगे, ताकि सकारात्मक बदलावों को गति दी जा सके। इस वर्ष के विषय में समाहित एक भाव एक्सीलरेट एक्शन भी है। जिसके तहत लैंगिक समानता से जुड़े सभी पहलुओं पर ठोस कदम उठाने का आह्वान किया गया है।
यह विचार आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक स्तर पर प्रभावी योजनाओं की वकालत करते हुए महिलाओं का जीवन बेहतर बनाने का उद्देश्य लिए है। बदलाव के लिए गंभीरता से प्रयास किये जाएं व उन्हें रफ्तार भी दी जाए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करने का विशेष अवसर है महाशिवरात्रि, जो भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और महाशिवरात्रि का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मानसिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व इस वर्ष 26 फरवरी को मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि को भगवान शिव का सबसे पवित्र दिन माना गया है, जो सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी है। भारत में धार्मिक मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि का बहुत महत्व है। यह आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने का सुअवसर है। महाशिवरात्रि को शिव तत्व को आत्मसात करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को समाप्त करने और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त करने का सबसे उत्तम अवसर माना जाता है।
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, भांग एवं शहद अर्पित करने से विशेष फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस दिन जलाभिषेक के साथ भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सुख-शांति बनाए रखने के लिए भी यह व्रत लाभकारी माना गया है। इस रात्रि को जागरण करने वाले भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शिवपुराण के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से समस्त पापों का नाश होता है और भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्रि की रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है, जिसमें हर प्रहर में शिवलिंग का अलग-अलग द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है, पहले प्रहर में जल, दूसरे प्रहर में दही, तीसरे प्रहर में घी और चौथे प्रहर में शहद से अभिषेक करने का विधान है।
धर्मग्रंथों में भगवान शिव को कालों का काल और देवों का देव अर्थात् महादेव कहा गया है। एक होते हुए भी शिव के नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग, बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक रूप हैं। देवाधिदेव भगवान शिव के समस्त भारत में जितने मंदिर अथवा तीर्थस्थान हैं, उतने अन्य किसी देवी-देवता के नहीं।
आज भी समूचे देश में उनकी पूजा-उपासना व्यापक स्तर पर होती है। सर्वत्र पूजनीय शिव को समस्त देवों में अग्रणी और पूजनीय इसलिए भी माना गया है क्योंकि वे अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं और दूध या जल की धारा, बेलपत्र व भांग की पत्तियों की भेंट से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
वे भारत की भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता के प्रतीक हैं। भारत में शायद ही ऐसा कोई गांव मिले, जहां भगवान शिव का कोई मंदिर अथवा शिवलिंग स्थापित न हो। यदि कहीं शिव मंदिर न भी हो तो वहां किसी वृक्ष के नीचे अथवा किसी चबूतरे पर शिवलिंग तो अवश्य स्थापित मिल जायेगा।
हालांकि बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जिस प्रकार विभिन्न महापुरुषों के जन्मदिन को उनकी जयंती के रूप में मनाया जाता है, उसी प्रकार भगवान शिव के जन्मदिन को उनकी जयंती के बजाय रात्रि के रूप में क्यों मनाया जाता है? इस संबंध में मान्यता है कि रात्रि को पापाचार, अज्ञानता और तमोगुण का प्रतीक माना गया है और कालिमा रूपी इन बुराइयों का नाश करने के लिए हर माह चराचर जगत में एक दिव्य ज्योति का अवतरण होता है, यही रात्रि शिवरात्रि है।
शिव और रात्रि का शाब्दिक अर्थ एक धार्मिक पुस्तक में स्पष्ट करते हुए कहा गया है- जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव है अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करुणासागर भगवान शिव हैं। जो नित्य, सत्य, जगत आधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं।
महासमुद्र रूपी शिव ही एक अखंड परम तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं, यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से सगुण ईश्वर और निर्गुण ब्रह्म कहे जाते हैं तथा यही परमात्मा, जगत आत्मा, शम्भव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, रूद्र आदि कई नामों से संबोधित किए जाते हैं।
शिव के मस्तक पर अर्द्धचंद्र शोभायमान है, जिसके संबंध में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से विष और अमृत के कलश उत्पन्न हुए थे। इस विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि इससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था, ऐसे में भगवान शिव ने इस विष का पान कर सृष्टि को नया जीवनदान दिया जबकि अमृत का पान चन्द्रमा ने कर लिया।
विषपान करने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे नीलकंठ के नाम से जाने गये। विष के भीषण ताप के निवारण के लिए भगवान शिव ने चन्द्रमा की एक कला को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। यही भगवान शिव का तीसरा नेत्र है और इसी कारण भगवान शिव ‘चन्द्रशेखर’ भी कहलाये।
धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव के बारे में उल्लेख मिलता है कि तीनों लोकों की अपार सुन्दरी और शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और भूत-पिशाचों से घिरे रहते हैं।
उनका शरीर भस्म से लिपटा रहता है, गले में सर्पों का हार शोभायमान रहता है, कंठ में विष है, जटाओं में जगत तारिणी गंगा मैया हैं और माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल (नंदी) को भगवान शिव का वाहन माना गया है और ऐसी मान्यता है कि स्वयं अमंगल रूप होने पर भी भगवान शिव अपने भक्तों को मंगल, श्री और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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