एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की सांस्कृतिक विविधता केवल उसके मंदिरों, ग्रंथों और त्योहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसके गांवों की मिट्टी में, उसकी लोककथाओं में और उन अनकही कलाओं में बसी हुई है जिन्हें पीढ़ियों तक लोग जीते आए हैं। इन्हीं अनमोल परंपराओं में से एक है सोहराय चित्रकला एक ऐसी दीवार-चित्रण की परंपरा जो झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा जैसे राज्यों के आदिवासी समुदायों की आत्मा में बसती है।
सोहराय चित्रकला केवल एक दृश्य कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह एक संस्कृति की जीवंत भाषा है। यह पर्व विशेष रूप से फसल कटाई के समय मनाया जाता है, जब जनजातीय समाज प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए अपने घरों और गोठों को सजाता है। महिलाएं दीवारों को लीप-पोतकर उस पर चित्र बनाती हैं पशु-पक्षी, वृक्ष, बेल-बूटे, देवी-देवता, और जीवन के अनेक प्रतीकों को। यह परंपरा न केवल दृश्य रूप में सुंदर होती है, बल्कि इसके पीछे गहरी सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना काम करती है।
इस चित्रकला की विशेषता यह है कि यह पूरी तरह स्वाभाविक और आत्मप्रेरित होती है। कलाकार यानी गांव की महिलाएं, किसी औपचारिक प्रशिक्षण या डिज़ाइन पाठ्यक्रम से नहीं गुजरतीं। वे इसे अपनी माताओं और दादियों से सीखती हैं, जो स्वयं इसे पीढ़ियों से करती आ रही होती हैं। यह कला श्रुत परंपरा और अभ्यास पर आधारित होती है एक ऐसी परंपरा जिसमें चित्रों के माध्यम से जीवन के विविध अनुभवों को, भावनाओं को और लोकविश्वासों को अभिव्यक्त किया जाता है।
सोहराय की दीवारें केवल सजावट नहीं हैं। वे एक सामाजिक दस्तावेज़ हैं, जिनमें उस समाज की स्त्रियों का आत्मबोध, उनकी संवेदनाएं, और उनकी प्रकृति के साथ सामंजस्य का चित्रण छिपा होता है। यह चित्रकला केवल उत्सव की प्रतीक नहीं है, यह उस जीवनदर्शन की अभिव्यक्ति है जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई विभाजन नहीं है, जहां गाय, बैल, वृक्ष, नदी और स्त्री सब एक ही जीवनचक्र का हिस्सा हैं। लेकिन आज इस चित्रकला का स्वर धीमा होता जा रहा है। वह जो कभी हर गांव की हर दीवार पर दिखाई देती थी, वह अब खोजने पर भी मुश्किल से मिलती है।
इसका एक बड़ा कारण है आधुनिकता की आंधी, जिसने गांवों की संरचना, जीवनशैली और मूल्यों को तेजी से बदला है। पहले जहां मिट्टी की दीवारें आम थीं, आज वहां सीमेंट और पक्के मकान आ गए हैं। इन पक्की दीवारों पर न तो लीपने की परंपरा रह गई है और न ही उस पर चित्रकारी की जरूरत महसूस की जाती है। दूसरी ओर, बाजारवाद और मीडिया ने ग्रामीण समाज को शहरी दिखने की होड़ में डाल दिया है। अब गांवों में भी लोग घरों को शहरों की तरह सजाना चाहते हैं आधुनिक रंग, वॉलपेपर, टाइल्स और प्लास्टिक की सजावटों से।
ऐसी स्थिति में मिट्टी और गोबर से बनी पारंपरिक चित्रकला पुरानी और गंवारू समझी जाने लगी है। युवा पीढ़ी, जो मोबाइल और इंटरनेट से जुड़ चुकी है, उसे अब इन परंपराओं में न तो गर्व की अनुभूति होती है और न ही उनमें कोई भविष्य दिखता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी शिक्षा प्रणाली और सरकारी नीतियां भी इस दिशा में पूरी तरह निष्क्रिय हैं। आज स्कूलों में बच्चों को अंतरिक्ष विज्ञान, कंप्यूटर और अंग्रेजी सिखाई जाती है, लेकिन उनके अपने समाज की कला, इतिहास और परंपराओं से उन्हें काट दिया जाता है।
नतीजा यह होता है कि वे अपनी जड़ों से अपरिचित होते जाते हैं और अपने ही समाज की धरोहरों को उपेक्षित कर देते हैं। कुछ स्थानों पर जरूर कुछ संस्थाएं, कलाकार और शोधकर्ता इस चित्रकला को बचाने के प्रयास कर रहे हैं। लेकिन ये प्रयास सीमित और प्रायः शहर केंद्रित हैं। जब तक यह कला उस समाज में, उसी की भाषा में, उसी की जमीन पर नहीं बचेगी, तब तक यह केवल एक लोककला बनकर रह जाएगी, जीवित परंपरा नहीं। सोहराय चित्रकला को केवल फोक आर्ट के नाम पर दीर्घाओं में टांग देने से यह नहीं बचेगी।
इसे गांवों में, स्कूली पाठ्यक्रमों में, लोकमंचों पर, महिलाओं के स्व-सहायता समूहों में, और जन-चेतना अभियानों में जीवित करना होगा। इसके लिए सरकार, समाज और शिक्षा प्रणाली को मिलकर एक समेकित प्रयास करना होगा। इस चित्रकला का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह आदिवासी स्त्रियों की रचनात्मकता और आत्माभिव्यक्ति का माध्यम है। एक ऐसे समाज में जहां स्त्रियों की आवाज़ें अक्सर दबा दी जाती हैं, सोहराय चित्रकला उन्हें एक ऐसा मंच देती है जहां वे बिना बोले भी बहुत कुछ कह पाती हैं।
चित्रों में उनकी सोच, उनकी भावनाएं, उनका पर्यावरण से रिश्ता, उनकी धार्मिकता और उनकी सामाजिक भूमिका सब कुछ समाहित होता है। ऐसे में इस चित्रकला को बचाना, केवल एक सांस्कृतिक विरासत को नहीं, बल्कि स्त्री स्वाभिमान और सृजनात्मकता को भी बचाना है। सोहराय चित्रकला के साथ-साथ इससे जुड़ी अनेक उपकथाएं, गीत, लोकगीत और मान्यताएं भी हैं जो धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। अगर यह परंपरा समाप्त हो गई, तो केवल एक दृश्य कला ही नहीं जाएगी, बल्कि उससे जुड़े लोकज्ञान, लोकविश्वास और सामाजिक संरचनाएं भी खो जाएंगी।
आज हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि हम किस प्रकार की आधुनिकता को अपनाना चाहते हैं। क्या वह आधुनिकता जो हमारी जड़ों को काटकर केवल उपभोक्तावाद को बढ़ावा देती है? या वह जो अपनी परंपराओं को समझते हुए, उन्हें साथ लेकर भविष्य की ओर बढ़ती है? सोहराय की दीवारें अब चुप हैं। लेकिन यह चुप्पी केवल एक कला की नहीं है, यह एक चेतावनी है कि यदि हमने समय रहते अपनी परंपराओं की ओर मुड़कर नहीं देखा, तो आने वाली पीढ़ियों के पास इतिहास की केवल तस्वीरें होंगी, अनुभव नहीं। हमें यह याद रखना चाहिए कि परंपरा कोई बोझ नहीं होती, बल्कि वह एक ऐसी विरासत होती है जो हमारी अस्मिता, हमारी पहचान और हमारे सामाजिक ताने-बाने की नींव होती है।
सोहराय चित्रकला हमें सिखाती है कि प्रकृति, स्त्री, समाज और कला ये सब आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हें अलग करना, या किसी एक को खो देना, पूरे ताने-बाने को कमज़ोर करना है। इसलिए यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम इस चित्रकला को फिर से गांव की दीवारों पर जीवित करें। इसे स्कूली शिक्षा में लाएं, इसे डिजिटल माध्यमों पर प्रस्तुत करें, इसे महज अतीत की वस्तु न बनाएं। कलाकारों को सम्मान दें, उन्हें मंच दें, और सबसे महत्वपूर्ण समाज को यह समझाएं कि मिट्टी की दीवार पर बना चित्र किसी ब्रांडेड दीवार घड़ी से अधिक जीवंत और मूल्यवान हो सकता है। यदि हम अब भी चुप रहे, तो एक दिन इतिहास हमें यह कहेगा कि हमने केवल एक चित्रकला को नहीं, एक समाज की स्मृति, स्त्री की रचनाशीलता और प्रकृति से हमारे रिश्ते को खो दिया। सोहराय की दीवारें हमसे पुकार रही हैं क्या हम उनकी आवाज़ सुनने को तैयार हैं?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहा जाता है कि अगर किसी देश को आगे बढ़ना है, विकसित होना है, तो उसका युवा सशक्त और समर्थ होना चाहिए। विश्व में भारत ऐसा देश है, जहां सबसे अधिक युवा आबादी है।
हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि अगर भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है, तो उसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हमारी युवा शक्ति ही निभाएगी। देश के विकास की रफ्तार युवाओं की ऊर्जा, विचार और संकल्प से ही तय होती है। लेकिन आज राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, अपने युवाओं को नशे की लत से दूर रखना। वर्तमान में युवा वर्ग नशे के घेरे में आता जा रहा है।
यह नशा न केवल उनके स्वास्थ्य बल्कि करियर, सपनों और देश की ताकत को भी प्रभावित कर रहा है। एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 10 से 24 वर्ष की उम्र के हर 5 में से 1 युवा ने कभी न कभी ड्रग्स का सेवन किया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की रिपोर्ट के अनुसार, 8.5 लाख से अधिक बच्चे ड्रग्स की लत का शिकार हैं। ये आंकड़े बेहद डरावने और चिंतन योग्य हैं।
ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों के खात्मे के लिए भारत सरकार ने पिछले 11 वर्षों में कई प्रभावी कदम उठाये हैं। 2020 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने नशा मुक्त भारत अभियान की शुरुआत की। नशे की लत को रोकने और पीड़ितों की सहायता के लिए सरकार ने राष्ट्रीय नशा मुक्ति केंद्र (IRCAs) और आउटरीच-कम-ड्रॉप-इन सेंटर (ODICs) की स्थापना की। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाये गये।
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ड्रग माफिया के विरुद्ध सशक्त ऑपरेशन्स किए। साथ ही, देशभर में युवाओं की काउंसलिंग हेतु हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर भी स्थापित किए गए। इसके अलावा विभिन्न राज्यों में भी स्थानीय प्रशासन, गैर-सरकारी संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से नशे के विरुद्ध कई बड़े अभियान चलाये जा रहे हैं।
भारत इस लड़ाई को और मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है। इसी कड़ी में MY Bharat ने एक बड़ी पहल की है। बाबा काशी विश्वनाथ की धरती से 19 से 20 जुलाई तक युवा आध्यात्मिक समिट का आयोजन किया जा रहा है। इसका थीम होगा नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत।
वाराणसी के पावन घाटों पर आयोजित होने वाले इस समिट का उद्देश्य, एक ऐसी राष्ट्रीय नीति बनाना है, जो युवाओं के नेतृत्व में नशा मुक्ति अभियान को सशक्त बनाये। इस समिट में देशभर की 100 से अधिक आध्यात्मिक संस्थाओं के युवा प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है।
साथ ही स्वास्थ्य मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और अन्य महत्वपूर्ण संस्थाएं भी इसमें सहभागिता करेंगी। इसके माध्यम से युवाओं को एक ऐसा मंच मिलेगा, जहां वो अपनी आवाज़ को सरकार और नीति निर्माताओं तक पहुँचा सकेंगे।
इस समिट में देश की नशे के विरुद्ध लड़ाई को मजबूत करने के लिए विभिन्न सेशन्स आयोजित किए जाएंगे। इसमें नशे की प्रवृत्ति, इसकी प्रकृति, प्रकार, पीड़ितों की जनसांख्यिकी, अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव और सरकार तथा MY Bharat के युवा स्वयंसेवकों की भूमिका जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श और चर्चा होगी। साथ ही नशे की लत से उबरने वाले युवाओं की प्रेरक कहानियां और उनके अनुभव भी साझा किए जाएंगे, ताकि अन्य युवा उनसे प्रेरणा ले सकें।
अंत में एक काशी डिक्लेरेशन जारी किया जाएगा, जो अगले पांच वर्षों के लिए नशा मुक्ति अभियान का रोडमैप होगा। इसमें यह तय किया जाएगा कि युवाओं को किस प्रकार नशे से दूर रखा जाए, नशे की गिरफ्त में आए लोगों की कैसे सहायता की जाए और पूरे देश में जागरूकता अभियान को किस तरह तेज किया जाए।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हमेशा देश की अमृत पीढ़ी के सपनों का भारत बनाने की बात करते हैं। उनके विजन के अनुरूप, युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा उठाया गया यह कदम, एक समग्र और प्रभावशाली पहल का उदाहरण बनेगा। यह पहल न केवल युवाओं को नशे से दूर रखने में मदद करेगी, बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में भी सशक्त भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करेगी।
देश को विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारी युवा शक्ति की है। काशी में आयोजित होने वाला युवा आध्यात्मिक समिट इस लक्ष्य की दिशा में केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चेतना का प्रारंभ स्थल बनेगा।
यह नशे के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी अभियान को नई दिशा और ऊर्जा देगा। साथ ही, युवाओं में नैतिक मूल्यों, सामाजिक ज़िम्मेदारी और आत्म-संयम का ऐसा भाव जागृत करेगा, जो न केवल उन्हें अपने जीवन में सार्थकता देगा, बल्कि देश को भी आत्मनिर्भर, सशक्त और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का माध्यम बनेगा। काशी की पवित्र धरती से उठने वाली यह पुकार, हर युवा के मन में जागृति और देशभक्ति का नया प्रकाश भर देगी और यही संकल्प 2047 के विकसित भारत की मजबूत नींव बनेगा। (लेखक केंद्रीय श्रम एवं रोजगार तथा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री, भारत सरकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसान के लिए मवेशी केवल पशुधन नहीं; बल्कि परिवार के सदस्य जैसे होते हैं। ये जानवर दैनिक कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, आय का वैकल्पिक स्रोत पैदा करते हैं और अन्य कृषि गतिविधियों के लिए सामग्री भी प्रदान करते हैं। क्या आप जानते हैं कि जैसे हम अपने जीवन, वाहनों और स्वास्थ्य का बीमा करते हैं, वैसे ही हम अपने पशुधन का भी बीमा करवा सकते हैं?
गाय, भैंसों, बकरियों और अन्य पशुधन को बीमा द्वारा कवरेज प्रदान की जा सकती है। हमारे पशुधन हमें अत्यधिक लाभ प्रदान करते हैं और देखभाल के लिए हम पर निर्भर होते हैं। उनके लिए बीमा पॉलिसी लेना अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे उनकी देखभाल हो सके और महत्वपूर्ण रूप से, हमारी आजीविका भी सुरक्षित हो सके। इसके अलावा, अगर हमारे पशु बीमार हो जाते हैं या दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं, तो बीमा हमें आर्थिक तनाव से बचायेगा, जिससे कृषि उद्यम में हमारा विश्वास मजबूत होगा।
अंत में, हमारे पशुओं के लिए बीमा एक महत्वपूर्ण आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है, जो न केवल हमारे पैसों की सुरक्षा करती है, बल्कि हमारे पशुधन की उचित देखभाल भी सुनिश्चित करती है। चिकित्सा के खर्चों और मृत्यु की स्थिति में नये पशु घर लाने के खर्चों को कवर करके, यह बीमा अप्रत्याशित खर्चों के कारण आने वाले आर्थिक बोझ को कम करती है। इस अतिरिक्त देखभाल को अपनाना न केवल हमारे प्रिय पशुओं की भलाई सुनिश्चित करता है, बल्कि हमें अप्रत्याशित खर्चों के संभावित बोझ से भी राहत देता है और हमारी आर्थिक स्थिरता को मजबूत करता है। (लेखक एग्रीबिजनेस, बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस के हेड हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सशक्तिकरण की शुरुआत पहुँच - अधिकारों, सेवाओं, सुरक्षा और अवसरों तक पहुँच से होती है । बीते दशक में, अधिक समावेशी और डिजिटल रूप से सशक्त भारत का निर्माण करने पर केंद्रित मोदी सरकार की प्रतिबद्धता के माध्यम से इस पहुँच को नए सिरे से परिभाषित किया गया है और सभी के लिए सुलभ बनाया गया है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस परिवर्तन में सबसे अग्रणी रहा है।
माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत @2047 के विजन से निर्देशित, मंत्रालय ने लाभ को अंतिम छोर तक त्वरित, पारदर्शी और कुशल तरीके से पहुँचाना सुनिश्चित करने के लिए अपने कार्यक्रमों में प्रौद्योगिकी को व्यवस्थित रूप से एकीकृत किया है।
हम अक्सर कहते हैं: सशक्त महिलाएँ, सशक्त भारत और सशक्तिकरण की शुरुआत पहुँच - अधिकारों, सेवाओं, सुरक्षा और अवसरों तक पहुँच से होनी चाहिए । आज, यह पहुँच तेज़ी से डिजिटल होती जा रही है। जो कभी आकांक्षापूर्ण था, वह अब क्रियाशील बन चुका है –ऐसा सरकार द्वारा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, रियल-टाइम डेटा सिस्टम और उत्तरदायी शासन पर ज़ोर दिए जाने की बदौलत संभव हुआ है।
मंत्रालय ने देखरेख, संरक्षण और सशक्तीकरण पर दृढ़ता से ध्यान केंद्रित करते हुए - पोषण, शिक्षा, कानूनी सुरक्षा और आवश्यक अधिकारों तक पहुँच को मजबूत किया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि महिलाएं और बच्चे न केवल अधिक स्वस्थ, अधिक सुरक्षित जीवन जी सकें, बल्कि वे आत्मविश्वासी नेतृत्वकर्ता और अमृत काल के परिवर्तनकर्ता के रूप में भी उभर सकें।
जैसा कि माननीय प्रधानमंत्री ने बहुत सटीक रूप से कहा है, मैं प्रौद्योगिकी को सशक्त बनाने के साधन के रूप में तथा आशा और अवसर के बीच की दूरी को पाटने वाले उपकरण के रूप में देखता हूँ। इस लोकाचार ने मैनुअल प्रक्रियाओं से लेकर रियल-टाइम डैशबोर्ड तक, असंबद्ध योजनाओं से लेकर एकीकृत प्लेटफार्मों तक हमारे परिवर्तन का मार्गदर्शन किया है। इस परिवर्तन की आधारशिला सक्षम आंगनवाड़ी पहल है।
भारत भर में 2 लाख से ज़्यादा आंगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक और सशक्त बनाने के लिए निरुपित यह कार्यक्रम बाल्यावस्था देखरेख और विकास की अगली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। पोषण, स्वास्थ्य सेवा और पूर्व-विद्यालयी शिक्षा सेवाओं की ज़्यादा प्रभावी प्रदायगी संभव बनाते हुए इन केंद्रों को स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल डिवाइस और नए-नए लर्निंग टूल्स के साथ अपग्रेड किया जा रहा है।
देश भर में 14 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं को पोषण ट्रैकर के साथ एकीकृत करने से रियल-टाइम डेटा एंट्री, कार्य निष्पादन की निगरानी और साक्ष्य-आधारित नीतिगत हस्तक्षेप संभव हो पाया है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को स्मार्टफोन और व्यापक प्रशिक्षण से लैस करके, यह पहल अंतिम छोर तक गुणवत्तापूर्ण सेवा प्रदायगी सुनिश्चित करती है। यह 2014 से पहले मौजूद मैनुअल रिकॉर्ड-कीपिंग और डेटा ब्लाइंड स्पॉट से एक निर्णायक बदलाव का प्रतीक है।
एक दशक पहले, आईसीडीएस प्रणाली असंबद्ध डेटा, विलंबित प्रतिक्रियाओं और रियल-टाइम ट्रैकिंग की कमी से दबी हुई थी। पोषण ट्रैकर ने - पोषण सेवा प्रदायगी में सटीकता, दक्षता और जवाबदेही की शुरुआत कर इस परिदृश्य को बदल दिया है।
10.14 करोड़ से ज़्यादा लाभार्थी अब इस प्लेटफॉर्म पर पंजीकृत हैं- जिनमें गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली माताएँ, छह साल से कम उम्र के बच्चे और किशोरियाँ शामिल हैं। यह प्लेटफॉर्म विकास की निगरानी और पूरक पोषण प्रदायगी पर रियल-टाइम अपडेट को सक्षम बनाते हुए समय पर हस्तक्षेप और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण सुनिश्चित करता है। डिजिटल रूप से सशक्त सामुदायिक केंद्रों के रूप में आंगनवाड़ी केंद्रों की नए सिरे से परिकल्पना कर, शहरी-ग्रामीण विभाजन को पाटते हुए- पोषण ट्रैकर महत्वपूर्ण रूप से स्वस्थ भारत, सुपोषित भारत के राष्ट्रीय विजन को आगे बढ़ा रहा है।
लोक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार (2025) से सम्मानित यह मंच पोषण भी पढाई भी का भी समर्थन करता है, जो प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को डिजिटल प्रशिक्षण मॉड्यूल प्रदान करते हुए विकसित भारत के अमृत काल में समग्र देखभाल को बढ़ावा दे रहा है।
पूरक पोषण कार्यक्रम (एसएनपी) में पारदर्शिता को और मजबूत करने तथा लीकेज कम करने के लिए एक फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम शुरू किया गया है। इस डिलिवरी तंत्र को सुरक्षित, सटीक और सम्मानजनक बनाते हुए यह सुनिश्चित करता है कि पोषण सहायता केवल पात्र लाभार्थियों को ही मिले।
प्रौद्योगिकी-आधारित प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से यह मंत्रालय पोषण से बढ़कर, महिलाओं के लिए सुरक्षा और सहायता सुनिश्चित कर रहा है। शी-बॉक्स पोर्टल हर महिला को, चाहे वह किसी भी रोजगार की स्थिति में हो या संगठित या असंगठित, निजी या सार्वजनिक क्षेत्र में काम करती हो, पॉश अधिनियम के तहत उसे शिकायत दर्ज कराने के लिए सिंगल-विंडो एक्सेस प्रदान करता है - जिससे ऑनलाइन निवारण और ट्रैकिंग संभव हो पाती है।
इस बीच, मिशन शक्ति डैशबोर्ड एंड मोबाइल ऐप संकट से घिरी महिलाओं को एकीकृत सहायता प्रदान करता है, उन्हें निकटतम वन स्टॉप सेंटर से जोड़ता है - जो अब लगभग हर जिले में चालू है। ये कदम इस बात का उदाहरण हैं कि तकनीक का उपयोग न केवल दक्षता के लिए, बल्कि न्याय, सम्मान और सशक्तिकरण के लिए भी किया जा रहा है। एक दशक पहले, मातृत्व लाभ की निगरानी करना मुश्किल था और इसमें देरी होती थी। मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई) की शुरूआत की है - जो मातृ कल्याण की दिशा में बहुत बड़ा बदलाव है।
पीएमएमवीवाई नियम, 2022 के तहत, गर्भवती महिलाओं को उनके पहले बच्चे के लिए 5,000 रुपये की राशि मिलती है । मिशन शक्ति के तहत, अगर दूसरा बच्चा लड़की है, तो - बेटियों के लिए सकारात्मक सुदृढ़ीकरण को बढ़ावा देते हुए लाभ की राशि 6,000 रुपये तक बढ़ जाती है। कागज रहित प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) प्रणाली के माध्यम से वितरित, शुरुआत से अब तक 4 करोड़ से अधिक महिला लाभार्थियों तक 1,9000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि पहुँच चुकी है।
पीएमएमवीवाई - आधार-आधारित प्रमाणीकरण, मोबाइल-आधारित पंजीकरण, आंगनवाड़ी/आशा कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर सहायता और रियल-टाइम डैशबोर्ड का लाभ उठाते हुए एक पूर्णतः डिजिटल कार्यक्रम है। एक समर्पित शिकायत निवारण मॉड्यूल तथा पारदर्शिता, विश्वास और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला नागरिकों से संबंधित पोर्टल है - जो बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।
ये लक्षित प्रयास ठोस नतीजे दे रहे हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्ल्यू) की स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (एच एम आई एस) की नवीनतम रिपोर्ट से पता चलता है कि जन्म के समय लिंगानुपात (एसआरबी) 918 (2014-15) से बढ़कर 930 (2023-24) हो गया है, जिसमें 12 अंकों का शुद्ध सकारात्मक परिवर्तन हुआ है। मातृ मृत्यु दर 130 प्रति 1000 जन्म (2014-16) से घटकर 97 प्रति 1000 जन्म (2018-20) हो गई है - जो हमारी सरकार के पिछले एक दशक के निरंतर प्रयासों के सकारात्मक प्रभाव को रेखांकित करता है।
प्रत्येक बच्चा पोषित, सुरक्षित और संरक्षित वातावरण का हकदार है। हाल के वर्षों में, डिजिटल परिवर्तन ने बाल संरक्षण और कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किशोर न्याय अधिनियम के तहत, मंत्रालय ने केयरिंग्स पोर्टल (बाल दत्तक ग्रहण संसाधन सूचना एवं मार्गदर्शन प्रणाली) के माध्यम से गोद लेने के इकोसिस्टम को मजबूत किया है। यह डिजिटल इंटरफ़ेस एक अधिक पारदर्शी, सुलभ और कुशल गोद लेने की प्रक्रिया सुनिश्चित करता है।
डिजिटलीकरण ने बाल देखभाल संस्थानों, पालन-पोषण केंद्रों और जेजे अधिनियम के तहत वैधानिक सहायता संरचनाओं की निगरानी में भी सुधार किया है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) द्वारा विकसित प्लेटफॉर्म बाल अधिकारों के उल्लंघन पर सक्रिय रूप से नज़र रख रहे हैं। इस बीच, मिशन वात्सल्य डैशबोर्ड विभिन्न बाल कल्याण हितधारकों के बीच अभिसरण और समन्वय को मजबूत करता है।
यह नया भारत है - जहाँ शासन प्रौद्योगिकी से मिलता है, और जहाँ नीति उद्देश्य से मिलती है। पिछले दशक में, माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ओजस्वी नेतृत्व में, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने न केवल डिजिटल परिवर्तन को अपनाया है - बल्कि इसका समर्थन भी किया है।
जैसे-जैसे हम अमृत काल में आगे बढ़ रहे हैं, मंत्रालय प्रत्येक महिला और प्रत्येक बच्चे का राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनना सुनिश्चित करते हुए आगे बढ़कर नेतृत्व करना जारी रखेगा। प्रौद्योगिकी, पारदर्शिता और लक्षित कार्रवाई के माध्यम से, हम एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर रहे हैं जहाँ सशक्तिकरण महज नारा भर नहीं है - बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए वास्तविकता है। (लेखिका केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जब हमें कोई सहयोग करता है अथवा हमारी इच्छा के अनुसार कार्य के लिए उद्धत होता है तो उसके अनेक कारण हो सकते हैं, परंतु की गयी प्रतिक्रिया के प्रति आभार व्यक्त करने से अनेक सूक्ष्म तथा प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होते हैं।
भौतिक दृष्टि से सूक्ष्म लाभ के रूप में सर्वप्रथम तो हमारे अंदर के अहंकार का दमन होता है और हमारे परिष्कृत व्यवहार के कारण सहयोगी का अतिरिक्त आस्था, विश्वास एवं सत्यनिष्ठा का प्रतिफल प्राप्त होता है और हमारे इक्षित कार्य की गति कई गुणा बढ़ जाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर के आराधना में हम उन्हें आह्वान करते हैं, उन्हें सक्रिय रहने की प्रार्थना करते हैं और समर्पण भी करते हैं; यह सब करते हुए यदि उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट नहीं कर पाये तो स्वयं के श्रेष्ठ होने का अभिमान हमारे सर के ऊपर चढ़कर बोलने लगता है।
हमारी विनम्रता खो जाती है तथा हमारी आराधना निष्फल हो जाती है। जैसे-जैसे हमारे अंदर कृतज्ञता की भावना प्रबल होते जाती है वैसे-वैसे हम अपने निर्धारित लक्ष्य के निकट होते चले जाते हैं। कृतज्ञता प्रकट करने के लिए शब्दों से कहीं अधिक व्यवहार प्रभावशाली होता है...।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नयी पीढ़ी तो आपातकाल की विभीषिका से बिल्कुल अपरिचित है। बातचीत के क्रम में इस पीढ़ी ने आपातकात शब्द जरूर सुना होगा लेकिन 25-26 जून, 1975 की रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गये आपातकाल के दंश की कई पीढ़ियां भुक्तभोगी हैं।
अंग्रेजों से आजाद होने के बाद भारत लोकतांत्रिक देश तो बन गया, लेकिन ठीक 25 साल बाद तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की ओर से थोपी गयी इमरजेंसी में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ गयी थी। 25 जून 1975 की आधी रात में अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए इंदिरा ने तानाशाही का ऐसा नमूना पेश किया, जो उस पीढ़ी के लोग अब भी नहीं भूल पाये हैं।
बीते साल 25 जून को लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के तुरंत बाद ओम बिरला ने आपातकाल की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पढ़ा, जिसमें आपातकाल को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा संविधान पर हमला बताया गया। इस कदम के बाद सदन में कांग्रेस सांसदों ने विरोध किया। कांग्रेस की ओर से कहा गया कि पांच दशक पुराने इस काले दौर का स्मरण नहीं किया जाना चाहिए। संयोगवश, इंडिया ब्लॉक के सदस्यों ने एक दिन पूर्व 24 जून को सदस्य के रूप में शपथ लेते समय संविधान की प्रतियां उठायी थीं।
ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या कांग्रेस आपातकाल को सही मानती है या फिर यह चाहती है कि लोकतंत्र को कलंकित करने और संविधान का निरादर करने वाले इस तानाशाही भरे कदम का स्मरण नहीं किया जाना चाहिए? क्या कांग्रेस कांग्रेस चाहती है कि आपातकाल पर चर्चा नहीं होनी चाहिए। लेकिन आपातकाल के भुगतभोगी आम लोगों और नेताओं का मानना है कि अतीत की भूलों को विस्मृत करने से उनके दोहराए जाने का खतरा बढ़ जाता है।
वास्तव में कांग्रेस और उसके नेता आपातकाल की गलती को स्वीकार नहीं करते। अगर वह अपनी गलती स्वीकार करते तो वह यह कहने की हिम्मत जुटाते कि 49 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से देश पर आपातकाल थोपने और राजनीतिक विरोधियों, मीडिया एवं जनता के खिलाफ दमन का चक्र चलाना एक भूल थी।
कांग्रेस को आपातकाल की याद दिलाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि पिछले कुछ समय से वह संविधान के खतरे में होने का फर्जी हौवा खड़ा कर उसके प्रति प्रतिबद्धता जताने में लगी हुई है। यह ठीक है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का संख्या बल बढ़ा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह दबे-छिपे स्वर में आपातकाल को सही ठहराने की कोशिश करती दिखने लगे। उसकी यह कोशिश तो आपातकाल के स्मरण को और अधिक आवश्यक ठहराती है।
यदि वह संविधान के प्रति इतनी ही अधिक प्रतिबद्ध है तो फिर यह क्यों नहीं स्वीकार करना चाहती कि इंदिरा गांधी ने अपनी संसद सदस्यता खारिज किये जाने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए आपातकाल का सहारा लिया और इस क्रम में इसी संविधान को कुचला और उसकी प्रस्तावना को मनमाने तरीके से बदल दिया।
नयी पीढ़ी तो आपातकाल की विभीषिका से बिल्कुल अपरिचित है। बातचीत के क्रम में इस पीढ़ी ने आपातकात शब्द जरूर सुना होगा लेकिन 25-26 जून, 1975 की रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गए आपातकाल के दंश की कई पीढ़ियां भुक्तभोगी हैं। आपातकाल के दौरान पूरा देश कारागार में परिवर्तित हो गया था।
विपक्ष के सभी नेताओं को रात में ही जगा कर नजदीकी जेल में जबरन उन्हें डाल दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी सहित 26 संगठनों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल के मुखर आलोचक रहे फिल्मी कलाकारों को भी इसका दंश झेलना पड़ा। किशोर कुमार के गानों को रेडियो और दूरदर्शन पर बजाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। देव आनंद को भी अनौपचारिक प्रतिबंध का सामना करना पड़ा था।
आपातकाल की कहानी को बार-बार दोहराना इसलिए भी जरूरी है कि आज की युवा पीढ़ी कम से कम यह जान ले कि जो आजादी और स्वतंत्रता उसे अनायास मिली है, सहज सुलभ है, वह दरअसल कितने बलिदानों से मिली है और उसे कायम रखने के लिए कितनी लड़ाइयां हुई हैं! लोगों को पता चलना चाहिए कि संविधान की हत्या किसे कहते हैं।
पूर्व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू के शब्दों में, आपातकाल की घोषणा ने देश की लोकतांत्रिक संरचना को हिला कर रख दिया। लोकतांत्रिक व्यवस्था के कमजोर पक्षों पर व्यापक विचार विमर्श हुआ और देश ने दोबारा कभी भी इसे नहीं लगाये जाने का प्रण किया। यह प्रतिज्ञा तभी बनी रहेगी जब देश बार बार उस आपातकाल से मिलने वाले सबक को याद करता रहेगा। खास कर, युवाओं को आजाद भारत के उस काले अध्याय की जानकारी और उससे मिले सबक को जानना होगा।
देश में आपातकाल लागू होने के बाद कई त्रासद घटनाएं हुईं। दिल्ली का तुर्कमान गेट कांड भी इनमें एक था। मुस्लिम बहुल उस इलाके को संजय गांधी ने दिल्ली के सौंदर्यीकरण के नाम पर खाली करा दिया। यह काम लोगों की सहमति से नहीं, बल्कि जबरन किया गया गया। बुल्डोजर से लोगों के घर ढहाये गये। जिन्होंने विरोध किया, उन्हें जेलों में ठूंस दिया गया। विरोध के दौरान पुलिस ने लाठियां बरसायी और आंसू गैस के गोले छोड़े। पुलिस ने गोलियां भी चलायी। चार लोगों की जान चली गयी।
संजय गांधी ने तब तक परिवार नियोजन का अभियान छेड़ दिया था। सड़क से भिखारियों, झोपड़पट्टी के लोगों और राहगीरों को पकड़ कर जबरन नसबंदी के टार्गेट पूरे किये जाने लगे। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 18 अक्टूबर 1976 को नसबंदी अभियान का विरोध कर रहे आंदोलकारियों पर पुलिस ने सीधी फायरिंग कर दी थी। जिसमें 42 बेगुनाहों की मौत हो गयी थी। मृतकों की स्मृति में यहां शहीद चौक बना हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान देशभर में 1 करोड़ 10 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गयी थी।
तत्कालीन अटार्नी जनरल नीरेन डे ने तब सुप्रीम कोर्ट में यह कबूल किया था कि जीने का अधिकार स्थगित है। यदि स्टेट आज किसी की जान भी ले ले तो भी उसके खिलाफ कोई व्यक्ति कोर्ट की में नहीं जा सकता। ऐसे मामलों को सुनने के कोर्ट के अधिकार खत्म कर दिये गये हैं। ऐसा तो अंग्रेजों के राज में भी नहीं था। विलायती शासन में भी कम से कम जनता को कोर्ट में जाने की छूट तो मिली हुई थी।
आपातकाल की अवधि के दौरान सत्ता के दुरुपयोग, कदाचार और ज्यादतियों के विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेसी शाह की अध्यक्षता में शाह आयोग का गठन किया था। आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि आपातकाल के दौरान एक लाख से ज्यादा लोगों को निवारक हिरासत कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया था।
24 जून 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इमरजेंसी का जिक्र करते हुए कहा- जो लोग इस देश के संविधान की गरिमा को समर्पित हैं, जो लोग भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं पर निष्ठा रखते हैं, उनके लिए 25 जून न भूलने वाला दिवस है। इमरजेंसी के विरोध में केंद्र की बीजेपी सरकार ने हर साल 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है। असल में, संविधान हत्या दिवस मनाने का मकसद संविधान की हत्या करने वालों और इस घटना से लोगों को हुई तकलीफों के बारे में आज की पीढ़ी को परिचित कराना है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, जब भी मैं निराशा होता हूं, तब इतिहास के पन्नों को पलटकर सत्य और प्रेम की जीत को दोहराने वाले तथ्यों का स्मरण करता हूं। इतिहास के पन्नों पर आतातायी और हत्यारे भी रहे हैं और कुछ पल के लिए वो अजेय भी दिखे लेकिन यह खास ख़्याल रखें कि अंत में उनका खात्मा हुआ है। जीत हमेशा सत्य की हुई है। हमें अपने कटु अनुभवों से सीख लेने की आवश्यकता है, ताकि न्यू इंडिया के सपने को साकार कर सकें।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बिरसा मुंडा जी के शोषण मुक्त समाज की कल्पना आज भी संघर्ष की राह पर है हम चाह कर भी जनता को उनके मौलिक अधिकार का सुख नहीं दे पाये। आज भी जीवन जीने के न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए जन समुदाय संघर्ष कर रहा है। इस चिंता को अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो समाज में आर्थिक समानता का ना होना और एक दूसरे के शोषण करने की प्रवृत्ति का हावी होना भी एक महत्वपूर्ण कारक नजर आता है झारखंड के सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में बिरसा मुंडा का शोषण-मुक्त समाज की स्थापना ग्राहक पंचायत की दृष्टि से भी झारखंड की एक आवश्यकता है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि उलगुलान केवल विद्रोह नहीं था, वह एक सामाजिक चेतना थी— शोषण, अन्याय और असमानता के विरुद्ध एक संवेदनशील जन आंदोलन था। बिरसा मुंडा ने जिस शोषण-मुक्त समाज की कल्पना की थी, वह आज के उपभोक्तावादी समाज में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी 19 वीं सदी में थी। उनका संघर्ष केवल जमींदारी और अंग्रेजी शासन के खिलाफ नहीं था, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में न्याय, समानता और स्वावलंबन की स्थापना के लिए था।
देखा जाये तो ग्राहक पंचायत का मूलभूत दर्शन और भगवान बिरसा मुंडा की सोच की दिशा और दृष्टिकोण बिल्कुल एक है। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत का मूल मंत्र ग्राहक : एवं राजा है और बिरसा मुंडा की सामाजिक चेतना दोनों ही जनसत्ता, अधिकार और जागरूकता के स्तंभों पर आधारित हैं।
बिरसा मुंडा ने जीवन के हर स्तर पर शोषण के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। आज झारखंड में ग्राहक भी एक ऐसे ही शोषण तंत्र से जूझ रहा है— चाहे वह महंगे दामों पर मिलावटी सामान हो या मुनाफाखोरी, घटिया सेवा, नकली उत्पाद, या डिजिटल धोखाधड़ी।
झारखंड के उपभोक्ताओं की आज की स्थिति चिंताजनक है।ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की भारी कमी है। उपभोक्ता अधिकारों के बारे में जानकारी का अभाव है। मूलभूत आवश्यकताओं में मिलावट, जैसे राशन, दूध, दवा, खाद-बीज आदि में व्यापक शोषण देखने को मिलता है।आदिवासी समुदाय, जो बिरसा मुंडा की विरासत को आगे बढ़ाते हैं, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनके संसाधनों का दोहन, बाजार में ठगी और जानकारी का अभाव उनके आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी शोषण को गहरा करता है।
अब यह प्रश्न उठ सकता है कि बिरसा मुंडा के विचारों को ग्राहक पंचायत कैसे आगे बढ़ा सकती है? इसके लिए न्यायसंगत बाजार व्यवस्था की स्थापना करनी होगी क्योंकि बिरसा मुंडा समानता के पक्षधर थे। ग्राहक पंचायत भी मुनाफाखोरी और भेदभावपूर्ण मूल्य निर्धारण के खिलाफ कार्य कर रही है। हर वर्ग को गुणवत्तायुक्त, सही दाम पर वस्तुएं मिलें, यही उसका लक्ष्य है।
स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना भी आवश्यक है । बिरसा ने स्वदेशी जीवनशैली और प्रकृति के अनुरूप जीवन को महत्व दिया। ग्राहक पंचायत स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक ज्ञान और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भरता की दिशा में कार्य कर सकती है। शिक्षा और जागरूकता अभियान जारी रखना होगा।बिरसा ने समाज को जगाया था। ग्राहक पंचायत भी झारखंड में उपभोक्ता शिक्षा को मिशन के रूप में ले रही हैं, विद्यालयों, पंचायतों, बाजारों और आदिवासी क्षेत्रों में जन-जागरूकता फैलाकर।
शोषण के विरुद्ध संगठनात्मक शक्ति को एकजुट होना होगा। बिरसा मुंडा ने जनसंगठन खड़ा किया था। ग्राहक पंचायत भी ग्राहकों का ऐसा संगठित मंच है जो प्रशासन, उत्पादक और व्यापारियों के समक्ष उपभोक्ताओं के अधिकारों की आवाज बुलंद करता है। नव झारखंड की ओर अग्रसर होना है तो बिरसा मुंडा की प्रेरणा से ग्राहक पंचायत की दिशा को अंगीकार करना ही होगा। आज झारखंड को एक ऐसे जन आंदोलन की आवश्यकता है जो शोषण के आधुनिक रूपों उपभोक्ता ठगी, डिजिटल धोखाधड़ी, अनियंत्रित मूल्य वृद्धि, मिलावट और कॉपोर्रेट वर्चस्व के विरुद्ध संगठित हो।
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत इस भूमिका को निभाने में सक्षम है, क्योंकि वह न केवल एक संस्था है बल्कि जनजागरण पर आधारित सामाजिक आंदोलन है । यह एक ऐसा उलगुलान है, जो ग्राहकों को राजा बना सकता है, और बाजार को सेवा का माध्यम! (लेखक अखिल भरतीय ग्राहक पंचायत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र (बिहार, झारखंड) के संगठन मंत्री हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अन्तत: भारत ने सैन्य क्षेत्र में थियेटर कमान की स्थापना और थियेटर कमांडर की नियुक्ति करने का महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया। आॅपरेशन सिंदूर के सफल क्रियान्वयन के बाद रक्षा बजट में वृद्धि के प्रस्ताव और पांचवीं पीढ़ी के आक्रामक गहराई से भेदने वाले अत्याधुनिक लड़ाकू विमान एडवांस्ड मीडियम कॉम्बेट एयरक्राफ्ट परियोजना को मंजूरी देने के साथ यह एक सामयिक सामरिक निर्णय है।
बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और भारत की सीमाओं के पास पसरे शत्रुओं के अतीत और इरादों को देखते हुए यह कदम पहले ही उठाने की जरूरत थी। सरकार ने डेढ़ वर्ष से लंबित थियेटर कमान के गठन की जमीनी तैयारियों का क्रियान्वयन शुरू कर दिया है। केंद्र ने अंतर सेवा संगठन अधिनियम (कमांड, नियंत्रण और अनुशासन) यानी (इंटर सर्विसेज आॅगेर्नाइजेशन (कमांड, कंट्रोल एंड डिसिप्लिन एक्ट 2023)) बुधवार को राजपत्र में अधिसूचित कर दिया। यह थियेटर कमान के गठन का प्रथम चरण है।
जाहिर है, आपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद केंद्र सरकार ने अपनी रक्षा तैयारियों को और मजबूती प्रदान करनी शुरू कर दी है। हालांकि रक्षा मंत्रालय ने सेनाओं की दक्षता बढ़ाने के लिए थियेटर कमान के गठन का निर्णय पहले कर लिया था। इसके तहत भारतीय सशस्त्र सेनाओं की तीनों सेवाओं की ऐसी कमानें गठित होंगी, जिसमें थल, नभ, जल सेना सहित अर्धसैनिक बलों को भी शामिल किया जा सकता है।
यह लंबे समय से प्रतीक्षित सामरिक महत्व का सुधार है जो भविष्य के युद्धों को लड़ने के लिए सैन्य संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए है। संसद से 2023 को पारित इस अधिनियम को इसी 27 मई को सरकार ने भारत के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया है। इस महत्वपूर्ण कदम का उद्देश्य एक निश्चित भौगोलिक इकाई में सेना के तीनों अंगों के एक समूह को प्रभावी कमांड, सटीक नियंत्रण और कुशल कामकाज को बढ़ावा देना है, जिससे सशस्त्र बलों के बीच तालमेल बेहतर होगा। यह अधिनियम आईएसओ के कमांडर-इन-चीफ और आफिसर-इन-कमांड को मजबूत और प्रभावी बनायेगा।
दरअसल थियेटर कमान का अर्थ है एक क्षेत्रीय इकाई में सेना, नौसेना और वायु सेना के समन्वित संचालन के लिए एक ही कमांडर के अधीन एकीकृत करना। यह एक ऐसी सैन्य संरचना है, जो विभिन्न सैन्य शाखाओं के बीच समन्वय और दक्षता को बढ़ायेगी। सैन्य क्षेत्र में थिएटर कमान में थियेटर का मतलब एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से है, जहां सैन्य अभियान या आपरेशन किये जाते हैं।
यह एक ऐसा क्षेत्र होता है जहां युद्ध, सैन्य रणनीति, या सुरक्षा से संबंधित गतिविधियां केंद्रित होती हैं। थियेटर शब्द का उपयोग सैन्य संदर्भ में इसलिए किया जाता है क्योंकि यह एक युद्ध क्षेत्र या आपरेशनल क्षेत्र को दशार्ता है, जैसे कि एक नाटक के मंच की तरह, जहां सभी नाटक के सभी भागों, आयामों, पहलुओं की गतिविधियां एक निर्देशक के निर्देश में समन्वित एवं सुचारु रूप से संपन्न होती हैं। थियेटर कमांड की स्थापना एकीकृत बल प्रयोग, परिचालन दक्षता और संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिए रक्षा मंत्रालय का 2025 के लिए चुने गए नौ क्षेत्रों में से एक है, जिसे मंत्रालय ने सुधारों का वर्ष घोषित किया है।
राजपत्र में अधिसूचित संदर्भ के अनुसार, यह अधिनियम थियेटर कमांड की स्थापना के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है। इस अधिनियम से तीन भौगोलिक कमान (उत्तरी, पश्चिमी, समुद्री) प्रस्तावित किए गए हैं। लखनऊ में चीन-केंद्रित उत्तरी थियेटर कमान, जयपुर में पाकिस्तान-केंद्रित पश्चिमी थियेटर कमान और तिरुवनंतपुरम में हिन्द महासागर या तटीय थियेटर कमान स्थापित करने का प्रस्ताव है, जो एक सीमा, एक बल की अवधारणा के अनुरूप होगा।
प्रत्येक थियेटर कमान में सेना, नौसेना, और वायुसेना की इकाइयां एकीकृत रूप से काम करती हैं, ताकि उस क्षेत्र में सैन्य रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। कमान का सर्वोच्च अधिकारी थियेटर कमांडर होता है जो एक सैन्य अधिकारी होता है, जो एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र (थियेटर आफ आपरेशन) में सैन्य अभियानों का नेतृत्व करता है। और उस क्षेत्र में सभी सैन्य बलों (सेना, नौसेना, वायुसेना) के संचालन को समन्वयित करता है। यह एक परिचालन कमांडर की (आपरेशनल) भूमिका है, जो युद्ध या संकट के दौरान रणनीति और कमान को लागू करती है।
इन कमानों के लिए चुने गये थियेटर कमांडर सामान्य रूप से थलसेना से लेफ्टिनेंट जनरल, नौसेना से वाइस एडमिरल या वायुसेना से एयर मार्शल स्तर का अधिकारी हो सकता है, जिसे कमांड की जिम्मेदारी दी जायेगी। यह एक एग्जीक्यूटिव पद है, जो विशिष्ट थियेटर के लिए ही गठित होगी, स्थायी नहीं। पहले के सशस्त्र बलों के कानूनी ढांचे में त्रि-सेवा मामलों में निश्चित विधिक सीमाएं निर्धारित थीं, क्योंकि एक सेवा के अधिकारी को दूसरी सेवा के कर्मियों पर अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार नहीं था।
उदाहरण के लिए, एक संयुक्त कमांड का नेतृत्व करने वाला तीन-सितारा जनरल अपने अधीन सेवा करने वाले वायुसेना या नौसेना कर्मियों न कोई निर्देश दे सकता था न ही उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता था। ऐसी शक्तियों की कमी का कमांड, नियंत्रण और अनुशासन पर सीधा प्रभाव पड़ता था। थियेटर कमानों की स्थापना से अब स्थिति बदल जायेगी। थियेटराइजेशन अभियान का नेतृत्व रक्षा स्टाफ के प्रमुख (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान कर रहे हैं।
दुनिया के कई देशों की रक्षा सेवाओं में थियेटर कमांडर का पद या इसके समकक्ष संरचना मौजूद है, खासकर उन देशों में जिनके पास बड़े और संगठित सैन्य बल हैं, वे एकीकृत सैन्य अभियानों के लिए थियेटर कमांड सिस्टम का उपयोग करते हैं। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी में 2016 से पांच थियेटर कमांड हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में थियेटर कमांडर की भूमिका को जियोग्राफिक कम्बैटेंट कमांडर कहा जाता है। रूस में थियेटर कमांडर की अवधारणा सैन्य जिलों (मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट) के रूप में है। जापान की सेल्फ-डिफेंस फोर्सेस में क्षेत्रीय कमांड हैं, लेकिन ये थियेटर कमांडर की तुलना में कम एकीकृत हैं।
आस्ट्रेलियाई रक्षा बलों में आपरेशनल कमांड होते हैं, लेकिन थियेटर कमांडर का पद नहीं है। पाकिस्तान की सेना में क्षेत्रीय कोर कमांडर होते हैं, जो कुछ हद तक थियेटर कमांडर की भूमिका निभाते हैं। उत्तर कोरिया, वियतनाम और अन्य कुछ देशों में क्षेत्रीय सैन्य कमांड हैं, लेकिन इन्हें स्पष्ट रूप से थियेटर कमांडर नहीं मान सकते। वैसे विश्व के सामरिक जगत में क्षेत्रीय थियेटर कमांड की अवधारणा को पहली बार प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में एमिएंस की लड़ाई में लागू किया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लगभग सभी भाग लेने वाले देशों ने एकीकृत कमांड के सिद्धांतों को अपनाया।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त सेवाओं की एकीकृत संरचनाएं (थियेटर कमान) नयी युद्ध क्षमताओं को बनाने और समन्वय करने में मदद करेंगी। साथ ही भविष्य की प्रौद्योगिकी और रणनीति को तेजी से आत्मसात करने में सहायता करेंगी क्योकि थियेटराइजेशन की अवधारणा एकल सेवा संचालन की कमियों को कम करने और आधुनिक युद्ध का समर्थन करने का प्रयास करती है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
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