विचार

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Published / 2025-11-01 11:07:52
साहित्य समाज का दर्पण है...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रसिद्ध कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी इस कथन को स्थापित किया था। समाज की छवि, आर्थिक शैक्षणिक स्थिति, संस्कृति, परंपरा एवं विरासत और विचारधारा को उसका साहित्य ही स्पष्ट करता है।

समाज की वास्तविकता का प्रतिबिंब तथा उसकी सामाजिक गतिविधि का लेखा-जोखा उसका अपना साहित्य ही होता है। तत्कालीन युग का साहित्य उस समय के समाज का विचारधारा, उसके संघर्ष एवं उन्नति का आलेख होता है।

रामायण महाभारत तथा विभिन्न धर्मो के ग्रंथ तत्कालीन युग के साहित्य के रूप में लोक-व्यवहार को प्रतिबिंबित करता है। सामाजिक जीवन-शैली की मर्यादा को रेखांकित करता है। सफलता एवं असफलता के कारणों की शिक्षा देता है।

लोक व्यवहार इतना महत्वपूर्ण है कि वही व्यक्तित्व के प्राथमिक परिचय का आधार बन जाता है। वाणी (बोलचाल) व्यवहार का प्रमुख घटक है। पूरे समाज का लोक व्यवहार उसके साहित्य से समझा जा सकता है।

जिस समाज के पास अपना साहित्य नहीं होता है अथवा साहित्य की रचना में अभिरुचि नहीं होती है वह समाज संसार की नजरों से ओझल हो जाता है तथा अपनी पहचान के संकट से जूझता रहता है।

समाज के पास उपलब्ध साहित्य मात्र पूजा की वस्तु नहीं होती है बल्कि इसका अध्ययन एवं लोक व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है जिससे सब प्रकार के सफलता एवं संतुष्टि प्राप्त किया जा सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2025-10-31 19:30:17
कानून के ज्ञाता, सादगी के प्रतीक और समाजसेवा के दीपक थे प्रो विष्णु चरण महतो

मृत्युंजय प्रसाद 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की धरती ने अनेक प्रतिभाओं को जन्म दिया है, पर उनमें एक नाम सदा श्रद्धा से लिया जाता है — प्रोफेसर विष्णु चरण महतो। वे केवल एक कानून के अध्येता नहीं, बल्कि सादगी, ईमानदारी, और जनसेवा के जीवंत प्रतीक थे। 
छोटानागपुर विधि महाविद्यालय के प्राध्यापक, सिल्ली प्रखण्ड के प्रथम प्रमुख, और झारखंड आंदोलन के प्रखर योद्धा के रूप में उन्होंने जो छाप छोड़ी, वह आज भी अविस्मरणीय है। 

ज्ञान के पथिक से समाज के पथप्रदर्शक तक 

23 फरवरी 1926 को सिल्ली प्रखण्ड के कांटाडीह गांव में जन्मे प्रो. महतो एक साधारण किसान परिवार से थे, लेकिन उनके सपने असाधारण थे। बाल्यकाल से ही वे मेधावी, गंभीर और अनुशासित विद्यार्थी रहे। 

रांची जिला स्कूल से मैट्रिक, पटना विश्वविद्यालय से स्नातक और पटना विधि महाविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय पटना उच्च न्यायालय में कार्य किया। लेकिन समाज और शिक्षा के प्रति लगाव ने उन्हें रांची वापस खींच लाया। यहां वे न केवल वकालत करने लगे, बल्कि छोटानागपुर विधि महाविद्यालय में अध्यापन के माध्यम से सैकड़ों विद्यार्थियों के जीवन को दिशा दी। 

झारखंड आंदोलन के सच्चे सिपाही 

झारखंड आंदोलन में प्रो. महतो ने मारांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। उन्होंने झारखंड पार्टी के उम्मीदवार के रूप में 1952 और 1957 के विधानसभा चुनाव लड़े। दोनों बार मामूली अंतर से हारने के बावजूद उनका जज्बा अटूट रहा। वे कहा करते थे चुनाव हारने से आदर्श नहीं हारते, असली जीत लोगों के दिलों में होती है। 

शिक्षा ही समाज का असली दीपक 

प्रो. महतो का दृढ़ विश्वास था सूखी रोटी खाओ, लाल चाय पियो, लेकिन अपने बच्चों को जरूर पढ़ाओ। वे शिक्षा को समाज सुधार का सबसे सशक्त साधन मानते थे। उन्होंने नारी शिक्षा को विशेष महत्व दिया और कहा शिक्षित नारी ही समाज की असली शक्ति है। 

जनसेवा की मिसाल 

सिल्ली प्रखंड प्रमुख के रूप में उन्होंने कई ऐतिहासिक कार्य किये। सिंगपुर से कांटाडीह तक श्रमदान से सड़क बनवाई, गांव में बिजली पहुंचायी, किसानों के लिए सिंचाई की सुविधा करायी और बेरोजगार युवाओं को शिक्षक के रूप में रोजगार दिलाया। उन्होंने सिंगपुर (मुरी) में बनने वाले भारत माता अस्पताल के लिए अपनी जमीन दान में दी। यह उनकी मानवता और त्याग की मिसाल है। 

कुरमाली भाषा के रक्षक और प्रेरणा स्रोत 

कुरमाली भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए वे जीवनभर प्रयासरत रहे। उनके मार्गदर्शन से अनेक शोधकतार्ओं ने कुरमाली लोक-साहित्य पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। 

वे चाहते थे कि रांची विश्वविद्यालय में कुरमाली भाषा का शोध केंद्र स्थापित हो और आज कुरमाली भाषा परिषद एवं बाईसी कुटुम परिषद उनके इसी सपने को साकार करने में जुटी हैं। 

युवाओं के प्रेरणास्रोत 

वे हमेशा युवाओं को प्रोत्साहित करते थे। जब नंदलाल महतो का चयन बिहार प्रशासनिक सेवा में हुआ, तो उन्होंने गर्व से कहा कि यू आर द सेकंड कुरमी आफ छोटानागपुर रीजन आफ्टर ठाकुर दास महतो! उनकी प्रेरणा ने अनगिनत युवाओं को सफलता की राह दिखायी। 

दीपावली के दिन बूझ गया एक दीपक 

एक नवंबर 1986 दीपावली की रात, जब घर-घर में दीप जल रहे थे, उसी दिन यह सादगी और सेवा का दीपक सदा के लिए बुझ गया। परंतु उनके विचार, उनके कर्म और उनके आदर्श आज भी हजारों दिलों में रौशनी फैला रहे हैं। (लेखक वरीय अधिवक्ता एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Published / 2025-10-29 21:22:46
भारत की श्रम संहिताएं: समावेशी आर्थिक विकास की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम

चंद्रजीत बनर्जी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भूमि और श्रम; भारत के विकास के आधार-स्तंभ हैं— भूमि अवसंरचना और औद्योगिक विकास को गति देती है, जबकि श्रम उत्पादकता और समावेश को बढ़ावा देता है। इस संदर्भ में, भारत की नई श्रम संहिताएं एक परिवर्तनकारी कदम को रेखांकित करती हैं, 29 कानूनों को एक आधुनिक, एकीकृत संरचना में समेकित करती हैं तथा श्रम परिदृश्य में स्पष्टता, एकरूपता और समानता सुनिश्चित करती है।

श्रमिकों के लिए, ये संहिताएं मजबूत सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित कार्यस्थल और औपचारिक लाभों तक व्यापक पहुंच की सुविधा प्रदान करती हैं, जबकि व्यवसायों को सरलीकृत अनुपालन, कार्यबल प्रबंधन में लचीलेपन और सभी क्षेत्रों में समान अवसर का लाभ मिलता है। हालांकि अंतिम प्रभाव कार्यान्वयन की गुणवत्ता पर निर्भर करेगा, लेकिन ये संहिताएं भारत के श्रम बाजार को 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम हैं।

जयपुर में वितरण सेवाओं से लेकर साणंद में तकनीकी भूमिकाओं और गुवाहाटी में निर्माण कार्य तक— विभिन्न क्षेत्रों में भारत के कार्यबल की आकांक्षा एक-जैसी है: सुरक्षित कार्य परिस्थितियों तक पहुंच, उचित पारिश्रमिक और दूसरी जगह ले जाने योग्य एवं विश्वसनीय सामाजिक सुरक्षा। श्रमिक चाहे कारखानों में कार्यरत हों या खेतों में, या प्लेटफॉर्म-आधारित सेवाओं से जुड़े हों, वे तीन प्रमुख आश्वासन चाहते हैं: आय स्थिरता, पूवार्नुमानित सामाजिक सुरक्षा और रोजगार में सम्मान। 

भारत की चार श्रम संहिताएं इस आकांक्षा को जीवंत वास्तविकता में बदलने के उद्देश्य से तैयार की गयी हैं, ताकि समता और सुरक्षा के सिद्धांत का कार्य जगत में अंतर्निहित होना सुनिश्चित हो सके। सुधारों के केंद्र में है - सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार। लाखों असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिक, जो भारत के कार्यबल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, नयी व्यवस्था के तहत औपचारिक मान्यता प्राप्त करेंगे और कई सुविधाओं के पात्र बन जायेंगे। 

भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा और मातृत्व लाभ के प्रावधान अब औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ऐतिहासिक रूप से बहिष्कृत श्रेणियों तक इनका विस्तार हो जायेगा। यह बदलाव, न केवल कमजोर श्रमिकों के लिए सुरक्षा सुविधा को मजबूत करता है, बल्कि उद्यमों को रोजगार को औपचारिक बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक सुरक्षा के समग्र आधार का विस्तार होता है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 औपचारिक रूप से गिग, प्लेटफॉर्म और असंगठित श्रमिकों को मान्यता देती है तथा केंद्र और राज्यों को उनके लिए समर्पित सामाजिक-सुरक्षा कोष स्थापित करने की सुविधा देती है। एग्रीगेटर्स को टर्नओवर का 1-2 प्रतिशत, भुगतान का अधिकतम 5 प्रतिशत, योगदान करने के लिए बाध्य किया जा सकता है, जो गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लाभों के वित्तपोषण का एक व्यावहारिक तरीका है।

आधार-आधारित पंजीकरण पहले ही अधिसूचित किया जा चुका है और ई-श्रम पोर्टल में 31 करोड़ से अधिक श्रमिक नामांकित हैं। प्रत्येक श्रमिक को एक सार्वभौमिक खाता संख्या (यूनिवर्सल अकाउंट नंबर, यूएएन) दी गयी है, जिसके जरिये स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व सहायता, या वृद्धावस्था पेंशन जैसे लाभों को नये कार्य-स्थल में स्थानांतरित किया जा सकता है, चाहे वे कहीं भी काम करते हों। ई-श्रम रजिस्ट्री, वास्तव में, अनौपचारिक श्रमिकों के संदर्भ में भारत का पहला राष्ट्रीय डेटाबेस है— जो समावेशी विकास और आपदा सहनीयता की दिशा में एक आवश्यक कदम है।

व्यवसाय सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियां संहिता भी उतनी ही परिवर्तनकारी है, जो सुरक्षा मानदंडों को एकीकृत करती है और विशेष रूप से, महिलाओं को सहमति और सुरक्षा उपायों के साथ रात्रि पाली में काम करने की अनुमति देती है। यह प्रगतिशील उपाय महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार करता है, जबकि सुरक्षा को अनिवार्य बनाये रखता है। 

ओएसएच संहिता लाइसेंस और निरीक्षण प्रणालियों को भी युक्तिसंगत बनाती है, जो दंड के बजाय रोकथाम की संस्कृति को बढ़ावा देने के क्रम में जोखिम-आधारित, प्रौद्योगिकी-सक्षम अनुपालन की ओर अग्रसर है। इसी तरह, वेतन संहिता सभी क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन और समय पर भुगतान व्यवस्था को सार्वभौमिक बनाती है, चाहे उनका क्षेत्र या कौशल स्तर कुछ भी हो। 

औद्योगिक संबंध संहिता, विवाद समाधान तंत्र को मजबूत करने और सामाजिक संवाद को बढ़ावा देने का प्रयास करती है। विवाद बढ़ने से पहले बातचीत, सुलह और मध्यस्थता को प्रोत्साहित करके, यह संहिता एक अधिक स्थिर औद्योगिक संबंध वातावरण का निर्माण करती है। इसके अतिरिक्त, ट्रेड यूनियन मान्यता और बड़े उद्यमों के लिए स्थायी आदेशों से संबंधित सरलीकृत नियम; नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों में पारदर्शिता और पूवार्नुमान में सुधार को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किये गये हैं। 

उद्यमों, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए, श्रम संहिताओं का अर्थ है सरल अनुपालन: मानकीकृत परिभाषाएं, कम रजिस्टर, डिजिटल रूप से दाखिल करना और बहुत कम अस्पष्टता। भारत का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह वित्त वर्ष 2021-22 में 83.6 बिलियन डॉलर रहा था और वित्त वर्ष 2024-25 में यह 81 बिलियन डॉलर के साथ मजबूत स्थिति में है। इस अवधि में, भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण सुधार लागू किए, जिनमें श्रम सुधारों का अधिनियमन भी शामिल है। वित्त वर्ष 2021-22 में पूंजीगत व्यय के लिए लगभग 13 लाख करोड़ रुपये से अधिक का उच्चतम आवंटन हुआ। 

इसके अलावा, संस्थागत नीति, डिजिटल सुधारों, देश में व्यापार करने में आसानी को बढ़ावा देने और भारत को एक आकर्षक निवेश गंतव्य स्थल बनाने के माध्यम से अनुपालन बोझ को कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुधार किये गये। इसी अवधि में विनिर्माण क्षेत्र में सुधार तथा सेमीकंडक्टर उद्योग, कोयला क्षेत्र, ऊर्जा और खनिज क्षेत्र को मजबूत करने से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बाजार में देश की स्थिति को और मजबूत करने में योगदान मिला। 

फिर भी, कानून पारित करना केवल आधी यात्रा है। श्रम समवर्ती सूची का विषय है, जिसका अर्थ है कि केंद्र और राज्य दोनों को कार्यान्वयन के लिए नियम बनाने और अधिसूचित करने होंगे। हालांकि अधिकांश राज्यों ने चारों संहिताओं के अंतर्गत नियमों का मसौदा तैयार कर लिया है, लेकिन अंतिम अधिसूचना जारी करने की गति असमान बनी हुई है। एक राष्ट्र, एक श्रम कानून व्यवस्था के विजन को साकार करने के लिए, यह आवश्यक है कि केंद्र और सभी राज्य कार्यान्वयन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ें। 

इस बदलाव को प्रभावी बनाने के लिए, कुछ प्राथमिकताएं उभर कर सामने आती हैं- 

  1. पहला, असंगठित श्रमिकों के कवरेज को क्रियान्वित करना। एग्रीगेटर्स के लिए अंशदान दरों की सूचना देना, पारदर्शी नामांकन और लाभ-वितरण प्रणालियां स्थापित करना तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाना। 
  2. प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए सिंगापुर के केंद्रीय भविष्य निधि (सीपीएफ) जैसे अंतर्राष्ट्रीय मॉडल, मूल्यवान जानकारी प्रदान कर सकते हैं। दूसरा, डिजिटल अवसंरचना को वास्तविक पात्रता में बदलना। ई-श्रम, ईपीएफओ और ईएसआईसी डेटाबेस को लिंक करना, ताकि श्रमिक जहां भी जायें, लाभ उनके साथ चलें। आधार का उपयोग दूसरी जगह ले जाने की सुविधा (पोर्टेबिलिटी) के लिए किया जाना चाहिए, न कि बहिष्करण के लिए। 
  3. तीसरा, जागरूकता और क्षमता का निर्माण। 

एमएसएमई को संहिताओं को समझने के लिए हेल्प-डेस्क और सरलीकृत मार्गदर्शिकाओं की आवश्यकता है; श्रमिकों को बहुभाषी हेल्पलाइन और जमीनी सहायता की जरूरत होती है। सरकार, उद्योग निकायों और यूनियनों के संयुक्त प्रयास यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि कागज पर लिखे अधिकार, लाभ-प्राप्ति में परिवर्तित होंगे। मूलत:, यह सुधार इस विश्वास पर आधारित है कि काम सुरक्षित होगा और उचित भुगतान किया जाएगा; सामाजिक सुरक्षा श्रमिक के साथ बनी रहेगी और अनुपालन इतना सरल होगा कि सभी इसमें भाग ले सकेंगे। 

इस संरचना के निर्माण के लिए सरकार प्रशंसा की पात्र है। यदि हम इन्हें गति, पारदर्शिता और सहयोग के साथ कार्यान्वयन करते हैं, तो ये संहिताएं भारत के अगले विकास अध्याय का आधार बन सकती हैं - व्यवसायों के लिए प्रतिस्पर्धा, श्रमिकों के लिए सम्मानजनक कार्य और निवेशकों के लिए पूर्वानुमानित व्यावसायिक वातावरण।  यही विकसित भारत का सार है - समावेश के साथ विकास और समृद्धि, जो प्रत्येक श्रमिक तक पहुंचती हो। (लेखक भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के महानिदेशक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2025-10-29 20:23:45
भारत की श्रम संहिताएं: समावेशी आर्थिक विकास की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम

चंद्रजीत बनर्जी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भूमि और श्रम; भारत के विकास के आधार-स्तंभ हैं— भूमि अवसंरचना और औद्योगिक विकास को गति देती है, जबकि श्रम उत्पादकता और समावेश को बढ़ावा देता है। इस संदर्भ में, भारत की नई श्रम संहिताएं एक परिवर्तनकारी कदम को रेखांकित करती हैं, 29 कानूनों को एक आधुनिक, एकीकृत संरचना में समेकित करती हैं तथा श्रम परिदृश्य में स्पष्टता, एकरूपता और समानता सुनिश्चित करती है।

श्रमिकों के लिए, ये संहिताएं मजबूत सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित कार्यस्थल और औपचारिक लाभों तक व्यापक पहुंच की सुविधा प्रदान करती हैं, जबकि व्यवसायों को सरलीकृत अनुपालन, कार्यबल प्रबंधन में लचीलेपन और सभी क्षेत्रों में समान अवसर का लाभ मिलता है। हालांकि अंतिम प्रभाव कार्यान्वयन की गुणवत्ता पर निर्भर करेगा, लेकिन ये संहिताएं भारत के श्रम बाजार को 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम हैं।

जयपुर में वितरण सेवाओं से लेकर साणंद में तकनीकी भूमिकाओं और गुवाहाटी में निर्माण कार्य तक— विभिन्न क्षेत्रों में भारत के कार्यबल की आकांक्षा एक-जैसी है: सुरक्षित कार्य परिस्थितियों तक पहुंच, उचित पारिश्रमिक और दूसरी जगह ले जाने योग्य एवं विश्वसनीय सामाजिक सुरक्षा। श्रमिक चाहे कारखानों में कार्यरत हों या खेतों में, या प्लेटफॉर्म-आधारित सेवाओं से जुड़े हों, वे तीन प्रमुख आश्वासन चाहते हैं: आय स्थिरता, पूवार्नुमानित सामाजिक सुरक्षा और रोजगार में सम्मान। 

भारत की चार श्रम संहिताएं इस आकांक्षा को जीवंत वास्तविकता में बदलने के उद्देश्य से तैयार की गयी हैं, ताकि समता और सुरक्षा के सिद्धांत का कार्य जगत में अंतर्निहित होना सुनिश्चित हो सके। सुधारों के केंद्र में है - सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार। लाखों असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिक, जो भारत के कार्यबल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, नयी व्यवस्था के तहत औपचारिक मान्यता प्राप्त करेंगे और कई सुविधाओं के पात्र बन जायेंगे। 

भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा और मातृत्व लाभ के प्रावधान अब औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ऐतिहासिक रूप से बहिष्कृत श्रेणियों तक इनका विस्तार हो जायेगा। यह बदलाव, न केवल कमजोर श्रमिकों के लिए सुरक्षा सुविधा को मजबूत करता है, बल्कि उद्यमों को रोजगार को औपचारिक बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक सुरक्षा के समग्र आधार का विस्तार होता है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 औपचारिक रूप से गिग, प्लेटफॉर्म और असंगठित श्रमिकों को मान्यता देती है तथा केंद्र और राज्यों को उनके लिए समर्पित सामाजिक-सुरक्षा कोष स्थापित करने की सुविधा देती है। एग्रीगेटर्स को टर्नओवर का 1-2 प्रतिशत, भुगतान का अधिकतम 5 प्रतिशत, योगदान करने के लिए बाध्य किया जा सकता है, जो गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लाभों के वित्तपोषण का एक व्यावहारिक तरीका है।

आधार-आधारित पंजीकरण पहले ही अधिसूचित किया जा चुका है और ई-श्रम पोर्टल में 31 करोड़ से अधिक श्रमिक नामांकित हैं। प्रत्येक श्रमिक को एक सार्वभौमिक खाता संख्या (यूनिवर्सल अकाउंट नंबर, यूएएन) दी गयी है, जिसके जरिये स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व सहायता, या वृद्धावस्था पेंशन जैसे लाभों को नये कार्य-स्थल में स्थानांतरित किया जा सकता है, चाहे वे कहीं भी काम करते हों। ई-श्रम रजिस्ट्री, वास्तव में, अनौपचारिक श्रमिकों के संदर्भ में भारत का पहला राष्ट्रीय डेटाबेस है— जो समावेशी विकास और आपदा सहनीयता की दिशा में एक आवश्यक कदम है।

व्यवसाय सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियां संहिता भी उतनी ही परिवर्तनकारी है, जो सुरक्षा मानदंडों को एकीकृत करती है और विशेष रूप से, महिलाओं को सहमति और सुरक्षा उपायों के साथ रात्रि पाली में काम करने की अनुमति देती है। यह प्रगतिशील उपाय महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार करता है, जबकि सुरक्षा को अनिवार्य बनाये रखता है। 

ओएसएच संहिता लाइसेंस और निरीक्षण प्रणालियों को भी युक्तिसंगत बनाती है, जो दंड के बजाय रोकथाम की संस्कृति को बढ़ावा देने के क्रम में जोखिम-आधारित, प्रौद्योगिकी-सक्षम अनुपालन की ओर अग्रसर है। इसी तरह, वेतन संहिता सभी क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन और समय पर भुगतान व्यवस्था को सार्वभौमिक बनाती है, चाहे उनका क्षेत्र या कौशल स्तर कुछ भी हो। 

औद्योगिक संबंध संहिता, विवाद समाधान तंत्र को मजबूत करने और सामाजिक संवाद को बढ़ावा देने का प्रयास करती है। विवाद बढ़ने से पहले बातचीत, सुलह और मध्यस्थता को प्रोत्साहित करके, यह संहिता एक अधिक स्थिर औद्योगिक संबंध वातावरण का निर्माण करती है। इसके अतिरिक्त, ट्रेड यूनियन मान्यता और बड़े उद्यमों के लिए स्थायी आदेशों से संबंधित सरलीकृत नियम; नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों में पारदर्शिता और पूवार्नुमान में सुधार को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किये गये हैं। 

उद्यमों, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए, श्रम संहिताओं का अर्थ है सरल अनुपालन: मानकीकृत परिभाषाएं, कम रजिस्टर, डिजिटल रूप से दाखिल करना और बहुत कम अस्पष्टता। भारत का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह वित्त वर्ष 2021-22 में 83.6 बिलियन डॉलर रहा था और वित्त वर्ष 2024-25 में यह 81 बिलियन डॉलर के साथ मजबूत स्थिति में है। इस अवधि में, भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण सुधार लागू किए, जिनमें श्रम सुधारों का अधिनियमन भी शामिल है। वित्त वर्ष 2021-22 में पूंजीगत व्यय के लिए लगभग 13 लाख करोड़ रुपये से अधिक का उच्चतम आवंटन हुआ। 

इसके अलावा, संस्थागत नीति, डिजिटल सुधारों, देश में व्यापार करने में आसानी को बढ़ावा देने और भारत को एक आकर्षक निवेश गंतव्य स्थल बनाने के माध्यम से अनुपालन बोझ को कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुधार किये गये। इसी अवधि में विनिर्माण क्षेत्र में सुधार तथा सेमीकंडक्टर उद्योग, कोयला क्षेत्र, ऊर्जा और खनिज क्षेत्र को मजबूत करने से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बाजार में देश की स्थिति को और मजबूत करने में योगदान मिला। 

फिर भी, कानून पारित करना केवल आधी यात्रा है। श्रम समवर्ती सूची का विषय है, जिसका अर्थ है कि केंद्र और राज्य दोनों को कार्यान्वयन के लिए नियम बनाने और अधिसूचित करने होंगे। हालांकि अधिकांश राज्यों ने चारों संहिताओं के अंतर्गत नियमों का मसौदा तैयार कर लिया है, लेकिन अंतिम अधिसूचना जारी करने की गति असमान बनी हुई है। एक राष्ट्र, एक श्रम कानून व्यवस्था के विजन को साकार करने के लिए, यह आवश्यक है कि केंद्र और सभी राज्य कार्यान्वयन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ें। 

इस बदलाव को प्रभावी बनाने के लिए, कुछ प्राथमिकताएं उभर कर सामने आती हैं- 

  1. पहला, असंगठित श्रमिकों के कवरेज को क्रियान्वित करना। एग्रीगेटर्स के लिए अंशदान दरों की सूचना देना, पारदर्शी नामांकन और लाभ-वितरण प्रणालियां स्थापित करना तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाना। 
  2. प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए सिंगापुर के केंद्रीय भविष्य निधि (सीपीएफ) जैसे अंतर्राष्ट्रीय मॉडल, मूल्यवान जानकारी प्रदान कर सकते हैं। दूसरा, डिजिटल अवसंरचना को वास्तविक पात्रता में बदलना। ई-श्रम, ईपीएफओ और ईएसआईसी डेटाबेस को लिंक करना, ताकि श्रमिक जहां भी जायें, लाभ उनके साथ चलें। आधार का उपयोग दूसरी जगह ले जाने की सुविधा (पोर्टेबिलिटी) के लिए किया जाना चाहिए, न कि बहिष्करण के लिए। 
  3. तीसरा, जागरूकता और क्षमता का निर्माण। 

एमएसएमई को संहिताओं को समझने के लिए हेल्प-डेस्क और सरलीकृत मार्गदर्शिकाओं की आवश्यकता है; श्रमिकों को बहुभाषी हेल्पलाइन और जमीनी सहायता की जरूरत होती है। सरकार, उद्योग निकायों और यूनियनों के संयुक्त प्रयास यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि कागज पर लिखे अधिकार, लाभ-प्राप्ति में परिवर्तित होंगे। मूलत:, यह सुधार इस विश्वास पर आधारित है कि काम सुरक्षित होगा और उचित भुगतान किया जाएगा; सामाजिक सुरक्षा श्रमिक के साथ बनी रहेगी और अनुपालन इतना सरल होगा कि सभी इसमें भाग ले सकेंगे। 

इस संरचना के निर्माण के लिए सरकार प्रशंसा की पात्र है। यदि हम इन्हें गति, पारदर्शिता और सहयोग के साथ कार्यान्वयन करते हैं, तो ये संहिताएं भारत के अगले विकास अध्याय का आधार बन सकती हैं - व्यवसायों के लिए प्रतिस्पर्धा, श्रमिकों के लिए सम्मानजनक कार्य और निवेशकों के लिए पूर्वानुमानित व्यावसायिक वातावरण।  यही विकसित भारत का सार है - समावेश के साथ विकास और समृद्धि, जो प्रत्येक श्रमिक तक पहुंचती हो। (लेखक भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के महानिदेशक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2025-10-25 20:25:29
छठ पूजा : लोक आस्था, संयम और पर्यावरण संतुलन का पर्व

शिवानंद उपाध्याय  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। छठ भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक ऐसा पर्व हैं जो न केवल धार्मिक आस्था का  प्रतीक हैं, बल्कि सामाजिक एकता, पर्यावरणीय चेतना और मानव-प्रकृति के सामंजस्य को उजागर भी करताहैं। यह पर्व श्रद्धा, संयम, आत्मसंयम और सामूहिक एकता की ऐसी मिसाल प्रस्तुत करता है, जो भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक, सामाजिक और दार्शनिक मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति है। 

छठ पूजा केवल पूजा या व्रत का अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह जीवन के प्रति कृतज्ञता, आत्मबल और प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व का उत्सव है। यह पर्व मूलत: सूर्य देवता की उपासना का पर्व है, जिन्हें जीवनदायिनी ऊर्जा, प्रकाश और स्वास्थ्य का स्रोत माना जाता है। सूर्य के प्रति यह श्रद्धा मानव जीवन की निरंतरता, कृषि की समृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन की अभिव्यक्ति है। 

आध्यात्मिक और दार्शनिक आयाम 

आध्यात्मिक दृष्टि से छठ पूजा आत्मसाक्षात्कार और आत्मशुद्धि का पर्व है। व्रती इस अवसर पर अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हैं, जो आत्म-नियंत्रण और आत्मबल का प्रतीक है। व्रत के दौरान शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धता पर विशेष बल दिया जाता है। यह संयम न केवल भौतिक तपस्या है, बल्कि आत्मा की उन्नति का माध्यम भी है। 

सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा हमें यह सिखाती है कि जीवन में जो भी प्राप्त है, उसके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। यह अर्घ्य केवल जल का नहीं, बल्कि श्रद्धा, आभार और विनम्रता का प्रतीक है। डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने की परंपरा यह भी दशार्ती है कि जीवन में उतार-चढ़ाव दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए। दार्शनिक रूप से, यह कर्मयोग का संदेश देती हैकि हर परिस्थिति में निरंतर कर्म ही जीवन का आधार है। 

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि 

छठ पूजा की उत्पत्ति प्रारंभिक वैदिक काल से जुड़ी मानी जाती है। छठ पूजा की मूल भावना-सूयोर्पासना और कृतज्ञता प्रकट करना-वैदिक परंपरा से जुड़ी है। ऋग्वेद में सूर्य और उषा की उपासना का उल्लेख मिलता है, जिसमें सूर्य को जीवनदायिनी ऊर्जा और समस्त सृष्टि के पोषक के रूप में वर्णित किया गया है। यह पर्व वैदिक आर्य संस्कृति की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है, जिसमें प्रकृति और उसके तत्वों-सूर्य, जल, वायु और भूमि-की आराधना की जाती थी। 

प्राचीन भारत में कृषि और गोपालन आर्थिक विकास के प्रमुख आधार थे। छठ पर्व इसी कृषि संस्कृति से जुड़ा है। यह किसानों का पर्व है, जो भूमि, जल और सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। सूर्योपासना इस बात का प्रतीक है कि सूर्य ही कृषि उत्पादन और जीवन का मूल स्रोत है। इस पूजा में प्रयुक्त होने वाला ईख (गन्ना), ऐसा कहा जाता है कि ईक्ष्वाकु वंश के समय में ईक्षु (गन्ना) से शक्कर उत्पादन आरंभ हुआ था। श्रीराम के शासनकाल में ईख की खेती और शक्कर उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था को बल मिला। आज भी सरयू क्षेत्र में ईख की खेती उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाती है, जो भारत के कृषि-आधारित आर्थिक विकास की जड़ में है। 

सामाजिक और समतावादी स्वरूप 

छठ पूजा की सबसे विशिष्ट विशेषता इसका लोकाभिमुख और समतावादी स्वरूप है। यह पर्व समाज के हर वर्ग को समान रूप से जोड़ता है। अन्य कई धार्मिक उत्सवों के विपरीत, इसमें पूजा का अनुष्ठान करने या कराने वाले पंडितों या पुरोहितों की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं होती। उपासक स्वयं ही अनुष्ठान करते हैं, जिससे यह पूजा आत्म-उपासना का प्रतीक बन जाती है। यह अनुष्ठानिक लोकतंत्र का एक सुंदर उदाहरण है, जहां जाति, वर्ग, धर्म या आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। 

इस पर्व का सामुदायिक पहलू भी अत्यंत सशक्त है। परिवार के सदस्य और पड़ोसी मिलकर तैयारी करते हैं ेघरों की सफाई, घाटों की सजावट और प्रसाद की तैयारी में सभी सहभागी होते हैं। इस सामूहिकता में सहयोग, समानता और एकता की भावना निहित है, इसलिए यह पर्व सामाजिक एकसूत्रता का पर्याय है। 

पर्यावरणीय दृष्टिकोण 

छठ पूजा को सबसे अधिक पर्यावरण-अनुकूल त्योहार माना जाता है। जहां अनेक आधुनिक त्योहारों पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगते हैं, वहीं छठ पर्व पूर्णत: प्रकृति-संगत और सादगीपूर्ण है। इस त्योहार में प्लास्टिक, कृत्रिम सजावट या आतिशबाजी का प्रयोग नहीं होता। इसके स्थान पर प्राकृतिक वस्तुओं, जैसे बांस से बने सूप, दौरा, मिट्टी के चूल्हे और घर में बनी मिठाइयों का प्रयोग किया जाता है।इस प्रकार, यह पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

छठ पूजा का पर्यावरणीय पहलू केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी संपूर्ण भावना में निहित है। यह पर्व पक्षियों के मौसमी प्रवास के समय के साथ मेल खाता है और प्राय: नदियों, तालाबों या प्राकृतिक जलस्रोतों के तट पर मनाया जाता है। इन अनुष्ठानों से मनुष्य और प्रकृति के बीच के सामंजस्यपूर्ण संबंध का प्रतीकात्मक प्रदर्शन होता है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ तालमेल में रहना ही स्थायी जीवन का आधार है। 

छठ व्रत : संयम और आत्मशक्ति का उत्सव 

छठ व्रत को सबसे कठोर और पवित्र व्रतों में से एक माना जाता है। इसमें व्रती तीन दिन तक कठोर नियमों का पालन करते हैं, जिसमें उपवास, निराहार रहना, पवित्रता बनाए रखना और प्रकृति के प्रति श्रद्धा प्रकट करना शामिल है। व्रती बिना किसी आडंबर या दिखावे के यह व्रत पूर्ण निष्ठा और समर्पण से करते हैं। यह आत्म-संयम का उत्सव है, जो व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है और आत्मबल की गहराई को अनुभव कराता है। 

छठ पूजा : पर्यावरण से एकाकार का पर्व  

छठ पूजा केवल धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि यह जीवन का एक गहन दर्शन है। यह आत्मसंयम के माध्यम से आत्म-शक्ति प्राप्त करने, श्रम की गरिमा का सम्मान करने, प्रकृति के प्रति सम्मान विकसित करने और समाज में समानता तथा सहयोग की भावना को सुदृढ़ करने का पर्व है। यह कृषि के आर्थिक चक्र का उत्सव है।  

आस्था के साथ-साथ यह पर्व एक आर्थिक और पर्यावरणीय आंदोलन भी है, जो दर्शाता है कि परंपराएं केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का भी आधार बन सकती हैं। यह केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि यह जीवन के उस दर्शन का उत्सव है जो कहता है- प्रकृति ही जीवन है, और उसका सम्मान ही सच्ची उपासना।

Published / 2025-10-17 21:50:37
छात्रों के अधिकार और प्रतियोगी परीक्षाएं

एनके मुरलीधर 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। छात्रों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों को भी विधिक अधिकार प्राप्त होते हैं। लेकिन जानकारी के अभाव में अक्सर परीक्षार्थी या विद्यार्थी इनका इस्तेमाल नहीं करते हैं। अगर उन्हें परीक्षा प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी लगे या तय सुविधा न मिले या फिर भेदभाव हो तो वे निश्चित प्लेटफॉर्म पर उसकी शिकायत कर न्याय प्राप्त कर सकते हैं। 

भारत में छात्र और किसी परीक्षा को देने वाले परीक्षार्थी अपनी पढ़ाई और परीक्षा के संबंध में कई तरह के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के मालिक होते हैं। लेकिन ज्यादातर को इस सबके बारे में पता नहीं होता। तो जानना उपयोगी है कि छात्रों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों के विधिक और संवैधानिक अधिकार क्या-क्या होते हैं और उन्हें कैसे नीतिगत सुरक्षा में बांटा जा सकता है। परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी लगे तो पहले ये कदम उठायें। 

आनलाइन शिकायत करायें दर्ज 

अगर छात्रों या विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाएं देने वाले परीक्षार्थियों को परीक्षा प्रक्रिया में किसी गड़बड़ी का अहसास हो। जैसे उन्हें लगे कि पेपर लीक हो गया है या जो परिणाम आया है, वो गलत है या किसी भी तरह की परीक्षा में पारदर्शिता की कमी है, तो वे शिकायत करने और अपनी शिकायत के संबंध में न्याय पाने के लिए ये कदम उठा सकते हैं। सबसे पहले वे परीक्षा की आयोजक संस्था, चाहे वह यूपीएससी हो, एसएससी हो, एनटीए हो या पीएससी हो, आधिकारिक शिकायत प्रणाली यानी पोर्टल आदि पर आनलाइन शिकायत दर्ज कराएं। अगर उन्हें इसका पता नहीं है तो परीक्षा भवन में स्थित प्रबंधक के कार्यालय से इसकी जानकारी हासिल कर सकते हैं। 

आरटीआई आवेदन या ट्रिब्यूनल में केस 

परीक्षा में गड़बड़ी लगे तो दूसरे कदम के रूप में परीक्षार्थी अपने ओएमआरसी या आंसर शीट अथवा मार्किंग विवरण मांगने के लिए आरटीआई आवेदन कर सकते हैं। जबकि तीसरे चरण के रूप में ये छात्र अगर इन्हें लगता है कि पहले दो कदमों से उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो वे हाईकोर्ट में पिटीशन अनुच्छेद 226 के तहत या सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में केस दायर कर सकते हैं, इसका उन्हें कानूनी हक है और चौथे व अंतिम कदम के रूप में पेपर लीक आदि के लिए सीबीआई/ईडी जांच की मांग की जा सकती है। 

अगर कॉलेज या स्कूल में समस्या हो 

ऐसी स्थिति में पहले कदम के रूप में उस संस्थान की जहां से आपका संबंध हो, ग्रीवांस रिड्रेसल सेल्फ/यूजीसी कम्पलेंट पोर्टल पर शिकायत करें। दूसरे कदम के रूप में राज्य शिक्षा विभाग या विश्वविद्यालय में इसकी लिखित शिकायत करें। तीसरे कदम के रूप में अगर छात्र पर मानसिक उत्पीड़न/ हिंसा/ भेदभाव हुआ है तो आईपीसी और एससी/ एसटी एट्रोसीटीज एक्ट जैसे कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज करायी जा सकती है। चौथे कदम के रूप में फीस और सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं के लिए कंज्यूमर कोर्ट में दस्तक दी जा सकती है। 

अगर दिव्यांग छात्रों को जरूरी सहूलियत न मिलें इसके लिए पहले कदम के रूप में परीक्षा प्राधिकरण/संस्थान से लिखित शिकायत करें कि आरपीडब्ल्यूडी एक्ट 2016 का पालन नहीं हो रहा। दूसरे कदम के रूप में जिला स्तर पर चीफ कमिशनर फॉर पर्संस विद डिसएबिलिटी को शिकायत भेजें और तीसरे कदम के रूप में जरूरत पड़ने पर हाईकोर्ट में रिट डालकर अतिरिक्त समय स्क्राइब या अन्य सहूलियत की मांग करें। 

परीक्षार्थियों को मानसिक दबाव हो... 

ऐसी स्थिति में पहले कदम के रूप में छात्र या उसके परिजन मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन पर संपर्क करें, जो कि 1800-599-7019- किरण हेल्पलाइन है। दूसरे कदम के रूप में मेंटल हेल्थ केयर अधिनियम 2017 के तहत हर छात्र को मुफ्त काउंसलिंग और इलाज का अधिकार है। अगर संस्थान दबाव बना रहा हो, जैसे असंभव टारगेट, भेदभाव, तो पुलिस या शिक्षा विभाग में शिकायत दर्ज करायें। 

अगर रिजल्ट या मेरिट लिस्ट में गड़बड़ हो 

ऐसे में पहले कदम के रूप में आधिकारिक उत्तर कुंजी और कटआफ की कॉपी आरटीआई के जरिये प्राप्त करें। दूसरे कदम के रूप में आवश्यक आंसर शीट का रिवैल्यूएशन मांगें और तीसरे कदम के रूप में स्टे आर्डर या रि-एंग्जाम की मांग की जा सकती है। 

कहां-कहां से मिल सकती है मदद 

विशेषकर प्रतियोगी परीक्षा भर्ती विवादों के लिए आरटीआई पोर्टल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में शिकायत कर सकते हैं। भेदभाव या उत्पीड़न के मामले में नेशनल कमीशन फॉर शिड्यूल कास्ट/ट्राइब/माइनरटीज/वुमन्स, फीस/सुविधा से जुड़े विवाद में कंज्यूमर कोर्ट से मदद मिल सकती है। 

कुछ अन्य अधिकार भी 

भारत में हर छात्र को समान अवसर देना संस्थान की जिम्मेदारी है। चौदह साल तक की उम्र के हर व्यक्ति को मुफ्त शिक्षा का अधिकार है। परीक्षा भर्ती और कॉलेज प्रशासन आदि से जुड़ी सूचनाएं पाने का सबको अधिकार है। भारत में हर छात्र और प्रतियोगी परीक्षार्थी को निष्पक्ष परीक्षा का अधिकार है, उसे समान अवसर व आरक्षण के लाभ का अधिकार है। बता दें कि इस जानकारी को कानूनी मदद, स्रोत के तौरपर नहीं इस्तेमाल किया जा सकता। सिर्फ पाठकों में अपने अधिकारों के प्रति सजगता बढ़ाने के लिए इसका उपयोग संभव है।

Published / 2025-10-14 22:08:41
कर्नाटक : आरएसएस पर अघोषित आपातकाल की चर्चा जोरों पर...

कर्नाटक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अघोषित आपातकाल की तैयारी 

डॉ मयंक चतुर्वेदी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने शताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहा है। समाज में संगठन के योगदान और उसके अनुशासन, सेवा व राष्ट्रभाव की भावना को लेकर देशभर में कार्यक्रम आरंभ हुए हैं। लेकिन अभी इस उत्सव की गूंज शुरू ही हुई कि कर्नाटक की राजनीति में एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ है। राज्य सरकार के मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे प्रियांक खरगे ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को एक पत्र लिखकर सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, पार्कों और मंदिरों में आरएसएस की शाखाओं और कार्यक्रमों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है। 

चार अक्टूबर को लिखे गए इस पत्र को मुख्यमंत्री कार्यालय ने 12 अक्टूबर को सार्वजनिक किया। सिद्धारमैया ने मुख्य सचिव शालिनी राजनिश को पत्र भेजकर मामले की जांच और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दे दिये हैं। इससे साफ हो गया कि कर्नाटक सरकार अब संघ के विरुद्ध सख्त रुख अपनाने की तैयारी में है। 

प्रियांक खरगे की आपत्ति: वैचारिक या राजनीतिक 

प्रियांक खरगे का आरोप है कि आरएसएस सरकारी व सहायता प्राप्त संस्थानों में बिना अनुमति शाखाएं चला रहा है, जहां लाठी लेकर नारेबाजी की जाती है और बच्चों के दिमाग में नफरत भरी जाती है। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि ये गतिविधियां संविधान की भावना और राष्ट्रीय एकता के खिलाफ हैं, इसलिए इन पर तत्काल रोक लगायी जाये। 

दरअसल, ये पहली बार नहीं जब प्रियांक ने ऐसा बयान दिया हो। जुलाई 2025 में उन्होंने कहा था कि अगर कांग्रेस केंद्र में सत्ता में आयी तो कानूनी प्रक्रिया के तहत पूरे देश में आरएसएस पर प्रतिबंध लगायेगी। उस वक्त भी भाजपा ने इसे हिंदू-विरोधी मानसिकता का प्रतीक बताया था। अब वही विचार कर्नाटक में सरकारी दस्तावेज का रूप लेता दिख रहा है। 

संघ पर प्रतिबंधों का इतिहास: हर बार और मजबूत होकर लौटा 

इस संबंध में उल्लेखित है कि आरएसएस का इतिहास इस बात का गवाह है कि प्रतिबंधों ने इसे कमजोर नहीं किया, यह ऐसे कठिन दौर में अत्यधिक संगठित रूप में ही लोगों के सामने आया है। आपको बतादें कि संघ पर पहला प्रतिबंध (1948): महात्मा गांधी की हत्या के बाद। नाथूराम गोडसे के कथित संबंध के नाम पर 4 फरवरी 1948 को बैन लगाया गया था, लेकिन 18 महीने बाद जांच में संघ निर्दोष पाया गया और 12 जुलाई 1949 को बैन हटा। दूसरा प्रतिबंध (1975) में इंदिरा गांधी की इमरजेंसी में लगा। 

उस दौरान आरएसएस को अवैध घोषित किया गया, हजारों स्वयंसेवक जेल में ठूंस दिये गये, लेकिन इमरजेंसी खत्म होते ही संघ पहले से अधिक सक्रिय रूप में लौटा और जनसंघ-जनता पार्टी के पुनर्गठन में निर्णायक भूमिका निभाई। तीसरा प्रतिबंध (1992) में बाबरी विध्वंस के बाद पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने आरएसएस, विहिप और बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाया, जो 1993 में अदालत से हट गया क्योंकि कोई ठोस सबूत नहीं मिला। 

हर बार संघ ने शांतिपूर्ण तरीके से जवाब दिया। उसने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया, बल्कि समाज सेवा और राष्ट्रनिर्माण के कार्यों से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। चीन युद्ध से लेकर कोविड महामारी तक, हर संकट में संघ के स्वयंसेवक देश के आम जन की सेवा करते हुए और उन्हें हर संभव मदद पहुंचाते हुए ही नजर आये हैं। वे राहत कार्यों में अग्रिम पंक्ति में रहते हैं। ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक तौर पर उठता है कि क्या कर्नाटक सरकार सचमुच संवैधानिक आधार पर कदम उठा रही है या फिर यह एक वैचारिक द्वेष से प्रेरित राजनीतिक रणनीति है? 

डिजिटल युद्ध: #बैन आरएसएस अभियान और वैचारिक ध्रुवीकरण 

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से #बैन आरएसएस ट्रेंड कर रहा है। वामपंथी संगठनों, सेकुलर लॉबी और इस्लामी कट्टरपंथी समूहों से जुड़े कई हैंडल इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। आरोप वही पुराने हैं; फासीवाद, संघी मानसिकता, हिंदू राष्ट्रवाद। दिलचस्प यह है कि इसी दौरान कुछ निष्क्रिय या प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े लोग भी इस मुहिम को हवा दे रहे हैं। जिस तरह यह ट्रेंड संगठित तरीके से फैलाया गया है, वह यह संकेत देता है कि यह केवल प्रियांक खरगे का व्यक्तिगत विचार नहीं बल्कि एक सुविचारित वैचारिक मोर्चा है। 

शाखा से डर क्यों 

संघ की शाखाएं वर्षों से सार्वजनिक स्थानों पर लगती रही हैं; स्कूल के मैदान, पार्क या मंदिर परिसर, जहां न तो राजनीति होती है और न ही कोई प्रचार। वहां अनुशासन, योग, देशभक्ति और समाज सेवा की भावना सिखाई जाती है। फिर भी इन्हें निशाने पर लेना बताता है कि समस्या गतिविधियों से नहीं, विचार से है। संघ की विचारधारा सर्वे भवन्तु सुखिन: के साथ ही एकता और आत्मगौरव की भावना जगाती है। यही वह विचार है जो विभाजित राजनीति के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता हुआ दिखाई देता है। कर्नाटक में कांग्रेसी सरकार का ये कदम बता रहा है कि कांग्रेस और वामपंथी तबके को संघ की सामाजिक पकड़ असहज करती है। जबकि संघ न तो चुनाव लड़ता है, न सत्ता की होड़ करता है। उसकी ताकत आम जन से सीधे संवाद और समाज सेवा से आती है, जो राजनीति से परे है। 

कर्नाटक की राजनीति: अंदरूनी कलह और ध्यान भटकाने की कोशिश 

दरअसल, कर्नाटक में कांग्रेस सरकार इस समय कई मोर्चों पर घिरी है, बढ़ते महिला अपराध, बिजली संकट, पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार, और डीके शिवकुमार व सिद्धारमैया के बीच नेतृत्व संघर्ष जैसी चुनौतियां सामने हैं। ऐसे में आरएसएस पर बैन का मुद्दा सरकार के लिए ध्यान भटकाने का उपकरण बनता दिख रहा है। 

विचारधारा बनाम राजनीति 

यहां आरएसएस का प्रभाव इस तथ्य से स्पष्ट है कि उसने अनुसूचित जाति, जनजाति, दलित, पिछड़े और महिलाओं को जोड़ने में उल्लेखनीय काम किया है। समरसता अभियान, सेवा भारती, विविध शिक्षण संस्थान और वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों के जरिए संघ ने समाज के उस हिस्से तक पहुंच बनायी, जहां राजनीति कभी नहीं पहुंच सकी। यही कारण है कि संघ के विरुद्ध जब भी राजनीतिक बवंडर उठता है, वह वैचारिक रूप से कमजोर पड़ जाता है। संघ की शाखाएं किसी पार्टी का मंच नहीं है, यह तो राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला हैं। 

अघोषित आपातकाल की गंध 

कर्नाटक में यदि सरकारी आदेशों के जरिए संघ की शाखाओं या गतिविधियों पर रोक लगाने की कोशिश होती है, तो यह लोकतंत्र के मूलाधारों पर चोट होगी। संघ कोई अवैध संगठन नहीं, बल्कि भारत के संविधान के तहत एक सामाजिक संगठन है। ऐसे में प्रशासनिक दबाव डालकर उसकी गतिविधियां रोकना अघोषित आपातकाल जैसा कदम माना जायेगा। इसे सेकुलरिज्म के नाम पर वैचारिक आतंक कहा जा सकता है; जहां असहमति को देशद्रोह और राष्ट्रवाद को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। 

इतिहास यही कहता है कि जब भी संघ को दबाने की कोशिश हुई, जनता ने उसे और अपनाया। यह संगठन सत्ता या विरोध से नहीं, समाज की स्वीकृति से जीवित है। कर्नाटक में यदि कांग्रेस यह मानती है कि वैचारिक दमन से संघ को कमजोर किया जा सकता है, तो यह वही भूल दोहराना होगा जो 1948, 1975 और 1992 में की जा चुकी है। यदि किसी लोकतांत्रिक राज्य में समाज सेवा करने वाले संगठन को खतरा मान लिया जाए, तो यह लोकतंत्र की पराजय होगी, न कि उसकी सुरक्षा। संघ का सौ साल का इतिहास भी यही गवाही देता है कि जो संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की आत्मा से जुड़ा है, उसे कोई राजनीतिक तूफान मिटा नहीं सकता है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2025-10-12 14:45:21
मैथिली ठाकुर और मिथिला...

प्रभात गोपाल झा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मैथिली ठाकुर के महज चुनाव लड़ने की चर्चा है और प्याली में तूफान सा खड़ा हो गया है। मैथिली चुनाव लड़ें या नहीं, यह उनका व्यक्तिगत अधिकार है। हर आदमी को यह हक है कि वह किस क्षेत्र में कहां, कैसे काम करे। सिर्फ इस मुद्दे पर किसी का विरोध अनुचित है।

अगर मैथिली मिथिला में आकर चुनाव लड़ने की इच्छा रखती हैं, तो आलोचना नहीं हो। मैथिली ठाकुर ने लाइव टीवी शो और अन्य कार्यक्रमों की बदौलत अपार सफलता हासिल की। यहां मिथिला में उनके कार्यक्रम कम होना या मिथिला से दूरी बरतना बहस का विषय नहीं हो सकता। वैसे भी किसी का भी चुनाव लड़ना उसका व्यक्तिगत अधिकार है। अगर पार्टी नीति तय करती है तो यह उसके दायरे की बात है, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं। उस व्यक्ति पर सवाल खड़ा नहीं कर सकते हैं।

असल में आज का मिथिला समाज खुद विरोधाभास से जूझ रहा है। मिथिला के गांव वीरान पड़े हैं। मुद्दे कम हैं। यह भी सच्चाई है कि मिथिला के लिए दिल्ली पटना से ज्यादा दिल के करीब हो गया है। समाज ही व्यक्तिवादी हो चला है। जिस समाज में विचार, आहार और व्यवहार की बात होती थी, वहां सिर्फ एक व्यक्ति के चुनाव लड़ने या नहीं लड़ने की बात पर गजब की उथल-पुथल है।

हाल के दिनों में किसी के व्यक्तिगत अधिकार पर इस तरह की ट्रोलिंग किसी और समाज में नहीं दिखती। यहां वक्त के हिसाब से समाज में बदलाव की गुंजाइश कम है। मैथिली की पहल पर उनके कम उम्र के होने की भी लोग दुहाई दे रहे हैं। लेकिन ये ऐसे लोग हैं, जो नीति तय करते हैं और विचार के धनी माने जाते हैं। यहां अब उनके विचारों से थोड़ी असहजता होती है। मिथिला को लेकर चिंता भी।

बुनियादी सवाल है कि अगर कोई अपना भाग्य खुद लिखने की कोशिश कर रहा है तो आप ट्रोलर की भूमिका क्यों निभा रहे हैं। किसी के व्यक्तिगत निर्णय पर आप और हम क्यों फैसला दें। हां, वोट देते समय चयन का मुद्दा आपका होगा।  

मैथिली की पहल का स्वागत करना चाहिए। मैथिली ठाकुर या किसी बड़ी शख्सियत द्वारा चुनाव लड़ने की पहल का स्वागत हो। क्योंकि वक्त अगर उन्हें सलामी देगा तो आपको भी झुकना होगा। नहीं तो कई जीनियस पहले भी गुमनामी के अंधेरे में खो चुके हैं। ऐसे में किसी को ट्रोल कर आप खुद ही अपनी हताशा दिखा रहे हैं। वैसे भी बुलंदी चंद दिनों की मेहमान होती है।

बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊंची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है
~मुनव्वर राणा 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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