एबीएन डेस्क। आजकल चलन है कि लोग जितना चलते हैं, उसका रिकॉर्ड रखते हैं कि वो आज कितने कदम चले। हो सकता है कि आप भी ऐसा करते हो। ऐसे में कई लोग लक्ष्य भी रखते हैं कि उन्हें तो पैदल चलना ही है और इसमें अधिकतर 10 हजार कदम का लक्ष्य रखते हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं साइंस के हिसाब से इतना चलना आपके शरीर पर कैसे असर डालता है और सही में इंसान को हर रोज कितने किलोमीटर चलना चाहिए। डीडब्ल्यू की एक रिपोर्ट के अनुसार, फिटनेस एक्सपर्ट कहते हैं एक व्यक्ति को एक दिन में 7500 कदम चलना चाहिए। इसका मतलब है कि हर व्यक्ति को हर रोज 6 किलोमीटर पैदल चलना चाहिए। अगर इसको लगातार फॉलो किया जाए तो इंसान पूरे जीवन में डेढ़ लाख किलोमीटर से भी ज्यादा पैदल चल सकता है। लेकिन, इसके साथ ये भी कहा जाता है कि अगर कोई इतना चलता है तो एक समय बाद उनके एडी और घुटने में दर्द की शिकायत भी हो सकती है। ऐसे में 7500 कदम काफी है और अगर आप कम कदम भी चलते हैं तो यह आपके शरीर के लिए काफी लाभदायक होते हैं। 10 हजार की बात कहां से आई? रिपोर्ट के अनुसार, जापान की एक कंपनी ने सबसे कदम गिनने वाली मशीन बनाई थी। इस मशीन को कमर बांधना पड़ता है, जिससे ये कदम का पता लगाती थी। इस मशीन का नाम मानपो-की था, जिसका मतलब है 10 हजार कदम। इसके बाद से ही 10 हजार कदम चलन में आ गए। लेकिन, 10 हजार कदम के पीछे कोई खास साइंस नहीं है और कोई रिसर्च नहीं की गई है। ये सिर्फ यूं ही कहीं से चला आ रहा है। इसके साथ ही कई रिसर्च में सामने आ चुका है कि 7500 से ज्यादा कदम चलने का कोई फायदा नहीं होता है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। चिकित्सा क्षेत्र में कैंसर जैसी बीमारी को आज भी असाध्य रोग की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि अब एक क्लीनिकल ट्रायल के बाद दावा किया जा रहा है कि जिन मरीजों पर प्रयोग किया गया उनको 100 प्रतिशत सार्थक परिणाम मिले हैं और वे पूरी तरह कैंसर से मुक्त हो गए। अगर भविष्य में भी यह दवा कारगर रहती है तो इसे कैंसर के लिए संजीवनी ही कहा जाएगा। क्लीनिकल ट्रायल के तौर पर रेक्टल कैंस के 18 मरीजों पर यह प्रयोग किया गया था। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इन मरीजों को 6 महीने तक डोस्टरलिमैब नाम की दवा दी गई। दावा किया गया है कि अब ये सभी मरीज पूरी तरह कैंसर से मुक्त हैं। डोस्टरलिमैब नाम की दवा लैब में विकसित अणुओं से बनी है जो कि मानव शरीर में सब्स्टीट्यूट एँटीबॉडीज के तौर पर काम करती है। जिन मरीजों को यह दवा दी गई थी उनके ट्यूमर धीरे-धीरे गायब हो गए। इन सभी मरीजों में कैंसर का नामोनिशान भी मिट गया। इनका फिजिकल एग्जाम, एंडोस्कोपी, पॉजिट्रोन एमिशन टोमोग्राफी और पीईटी स्कैन के साथ ईएमआई भी कराया गया। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन कैटरिंग सेंटर के डॉ. लुइस ए डियाज के मुताबिक इतने दिनों के इतिहास में यह पहली बार संभव हुआ है कि एक तरह के इलाज से ही सभी मरीज पूरी तरह ठीक हो गए। बता दें कि इलाज करवाने के दौरान किसी भी मरीज को कीमोथेरपी, सर्जली और रेडिएशन जैसे दर्दनाक प्रॉसेस से गुजरना पड़ता है। इस वजह से कई अन्य बीमारियां भी हो जाती हैं। लेकिन इस क्लीनिकल ट्रायल के नतीजों से वैज्ञानिक भी हैरान हैं। जिन मरीजों को लगा था कि उनका इलाज का यह एक चरण भर है अब उन्हें पूरी तरह से बीमारी से मुक्ति मिल चुकी है। मीडिया से बात करते हुए डॉ. एलन पी वेनूक ने कहा कि यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि सभी मरीजों में कैंसर का नामोनिशान खत्म हो गया। यह दुनिया की पहली ऐसी रिसर्च है। ट्रायल के तौर पर डोस्टरलिमैड को हर तीसरे हफ्ते 6 महीने तक दिया गया। खास बात यह है कि इस दवा के कोई साइड इफेक्ट नहीं दिखायी दिए हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। मलाशय के कैंसर से पीड़ित एक छोटे समूह में शामिल लोग उस समय चकित रह गए, जब उन्होंने पाया कि उनका कैंसर एक प्रायोगिक उपचार के बाद बिल्कुल खत्म हो गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, एक बहुत ही छोटे नैदानिक परीक्षण (क्लीनिकल ट्रायल) में 18 रोगियों ने लगभग छह महीने तक Dostarlimab नामक दवा ली और अंत में, उनमें से सभी ने अपने कैंसर ट्यूमर को गायब होते देखा। Dostarlimab प्रयोगशाला द्वारा निर्मित अणुओं वाली एक दवा है जो मानव शरीर में स्थानापन्न प्रतिरक्षा (सब्सीट्यूट एंटीबॉडी) के रूप में कार्य करती है। सभी 18 मलाशय कैंसर रोगियों को एक ही दवा दी गई और उपचार का नतीजा यह रहा कि सभी रोगियों में कैंसर पूरी तरह से समाप्त हो गया। शारीरिक परीक्षणों जैसे एंडोस्कोपी, पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी या पीईटी स्कैन या एमआरआई स्कैन में भी कैंसर का नामोनिशान नहीं मिला। कैंसर के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ : न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर के डॉ लुइस ए डियाज जे ने कहा कि यह कैंसर के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, नैदानिक परीक्षण में शामिल रोगियों को अपने कैंसर को मिटाने के लिए पिछले इलाजों जैसे कि कीमोथेरेपी, रेडिएशन और चीरफाड़ सर्जरी… का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप आंत, मूत्र और यहां तक कि यौन रोग भी हो सकते हैं। अगले चरण के रूप में इनसे गुजरने की उम्मीद में 18 मरीज परीक्षण के लिए गए। हालांकि, उनके लिए आगे कोई इलाज की जरूरत नहीं थी। सभी मरीजों में कैंसर का पूरी तरह से खत्म होना असाधारण : इस परीक्षण का जो नतीजा आया, उसने मेडिकल की दुनिया में तहलका मचा दिया है। मीडिया से बात करते हुए कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में कोलोरेक्टल कैंसर विशेषज्ञ के तौर पर काम करने वाले डॉ एलन पी वेनुक ने कहा कि सभी मरीजों में कैंसर का पूरी तरह से खत्म होना अविश्वसनीय है। उन्होंने इस रिसर्च को दुनिया में इस तरह का पहला रिसर्च बताया, जहां सभी रोगी ठीक हो गए। उन्होंने यह भी कहा कि यह विशेष रूप से कारगर था क्योंकि सभी रोगियों को परीक्षण दवा के दौरान बड़ी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा। मरीजों की आंखों में थे खुशी के आंसू : इसी तरह से, मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर और रिसर्च पेपर के सह-लेखक एवं पेशे से ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ एंड्रिया सेर्सेक ने उस लम्हे के बारे में बताया, जब रोगियों को पता चला कि वे कैंसर से मुक्त हो चुके हैं। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया, उन सभी की आंखों में खुशी के आंसू थे। परीक्षण के दरम्यान, रोगियों ने छह महीने के लिए हर तीन सप्ताह में Dostarlimab लिया। वे सभी अपने कैंसर के समान चरणों में थे – यह स्थानीय रूप से मलाशय में था, लेकिन शरीर के अन्य अंगों में नहीं फैला था। अब, दवा की समीक्षा करने वाले कैंसर शोधकर्ताओं ने मीडिया को बताया कि इलाज उम्मीदों से भरा रहा है, लेकिन यह देखने के लिए बड़े पैमाने पर परीक्षण की जरूरत है कि क्या यह अधिक मरीजों के लिए काम करेगा और क्या कैंसर वास्तव में खत्म हो गया है।
टीम एबीएन, रांची। मेदांता अस्पताल रांची में न्यूरोलॉजी विभाग के डॉ कुमार विजय आनंद ने दुर्लभ बीमारी न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका (एनएमओ) का इलाज दवाओं से करने में कामयाबी हासिल की है। उनकी यह कामयाबी इसलिए भी बड़ी है कि जो मरीज इसे लेकर उनके पास आया था उसमें बीमारी से संबंधित लक्षण स्पष्ट नहीं थे ऐसे में इस बीमारी की पहचान मुश्किल थी। दवाओं से मरीज को ठीक करने के बाद डॉ कुमार विजय आनंद ने कहा कि इस बीमारी के लक्षण की पहचान कर जल्द इलाज शुरू करना एवं जरूरी टेस्ट कराना महत्त्वपूर्ण है। ऑटोइम्यून डिजीज है न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका (एनएमओ) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की एक ऑटोइम्यून डिजीज है, जो मस्तिष्क, आंखों और रीढ़ की नसों को मुख्य रूप से प्रभावित करता है। इस बीमारी में शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है, जिससे वह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और प्रोटीन ( AQP4 ) को बाहरी मानकर शरीर में एंटीबॉडी का निर्माण कर मस्तिष्क, आंखों और रीढ़ की नसों पर हमला करने लगता है। इस दुर्लभ बीमारी और केस के बारे में मेदांता रांची के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ कुमार विजय आनंद कहते हैं कि झारखंड के सुदूर ग्रमीण इलाके से आए 46 वर्षीय मरीज को ब्रेन स्ट्रोक जैसी स्थिति में भर्ती किया गया था। मरीज को चक्कर, लगातार हिचकी और उल्टियां हो रही थी। इसके साथ ही मरीज के शरीर का पूरा बायां भाग लकवा ग्रस्त हो चुका था। जांच के बाद मरीज में न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका (एनएमओ) बीमारी का पता चला। इस बीमारी की पहचान करना मुश्किल होता है। इस मरीज में ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण थे, जिससे इसकी पहचान करना और भी मुश्किल था। आमतौर पर इसका प्रमुख लक्षण है - आंखों की रोशनी चले जाना, हमेशा सुस्ती बना रहना, चलने- फिरने में असंतुलन की स्थिति, लगातार हिचकी आना, उल्टियां होना, लकवा की शिकायत आदि। इस बीमारी में मरीज के प्रतिरक्षा तंत्र मे असंतुलन हो जाती है औऱ नसों को नुकसान करने वाले एंटीबॉडी से मरीज की मस्तिष्क और स्पाइन की कोशिकाएं नष्ट होने लगती है और इसका दुष्प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है। मरीज की जान बचाने के लिए इलाज जरूरी था : डॉ कुमार विजय आनंद ने बताया कि 46 वर्षीय इस मरीज में न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका के पूरे लक्षण मौजूद नहीं थे इसलिए इनकी बीमारी की पहचान करना मुश्किल था और इसके बाद मरीज को जीवन भर की अपंगता से बचाने के लिए इसका सही इलाज जरूरी था। मरीज के परिजनों ने आर्थिक दिक्कतों के कारण IVIG और प्लाज्माफेरेसिस जैसे इलाज कराने से मना कर दिया गया। ऐसी परिस्थितियों में हमने मरीज को हाई डोज स्टेरॉइड और कुछ एडवांस इमुनोमोडुलेटर टैबलेट्स देकर ठीक किया है। दूसरी बार जब मरीज फॉलोअप में आया तो उसके स्वास्थ्य में काफी सुधार पाया गया।
एबीएन हेल्थ डेस्क। कोरोना महामारी के बीच ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने बूस्टर डोज के रूप में CORBEVAX वेक्सीन को मंजूरी दे दी है। इससे पहले DCGI ने बायोलॉजिकल ई के कोर्बेवैक्स का उपयोग 12 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के टीकाकरण के लिए किया जा रहा है। अब DCGI ने 18 और उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए मंजूरी दे दी है। बायोलॉजिकल ई ने मई में निजी टीकाकरण केंद्रों के लिए माल और सेवा कर सहित कॉर्बेवैक्स की कीमत 840 प्रति खुराक से घटाकर 250 कर दिया था। बीई ने कॉर्बेवैक्स के विकास में टेक्सास चिल्ड्रन हॉस्पिटल और बायलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के साथ कोलॉबोरेट किया था। टीकाकरण के लिए EUA प्राप्त करने से पहले, कंपनी ने कहा कि उसने 5 से 12 और 12 से 18 आयु वर्ग के 624 बच्चों में चरण दो और तीन में सेंट्रल क्लीनिकल ट्रायल किए हैं। जब मार्च में कॉर्बेवैक्स को 12 से 14 साल के समूह के लिए लॉन्च किया गया था, तो जैविक ई की प्रबंध निदेशक महिमा दतला ने संकेत दिया था कि उनके टीके की सामर्थ्य उन प्रमुख लक्ष्यों में से एक था, जिसके लिए उन्होंने काम किया था।
टीम एबीएन, रांची। भारतीय युवाओं में बढ़ते हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हाल के कुछ दिनों में कई सेलिब्रिटीज की मौतें इसके कारण हो चुकी है। दक्षिण भारतीय अभिनेता पुनीत राजकुमार, बिग बॉस फेम सिद्धार्थ शुक्ला और अब मशहूर सिंगर केके की मौत का कारण हार्ट अटैक या कार्डियक अरेस्ट बताया जा रहा है। एक स्टडी बताती है कि अगर आप 50 साल की उम्र पार कर चुके भारतीय हैं, तो आपको 20 प्रतिशत हार्ट की समस्या हो सकती है। इसका कारण खराब लाइफस्टाइल और अन्य बीमारियां हो सकती है। भारत में पूरी दुनिया की तुलना हार्ट की बीमारी एक दशक पहले शुरू हो जाती है। भारतीय शहरी युवाओं हार्ट अटैक का सबसे बड़ा कारण मानसिक तनाव है। मेदांता अस्पताल रांची के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ नीरज प्रसाद कहते हैं कि पहले हृदय से जुड़ी बीमारियों को बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था लेकिन अब माना जाता है कि किसी भी उम्र में यह हो सकती है। हार्ट अटैक के विभिन्न कारण होते हैं। हाई लिपिड प्रोफाइल, विशेषकर हाई कोलेस्ट्रॉल, हाइपरटेंशन और डायबिटीज के रोगियों को यह बीमारी हो सकती है। अनुवांशिक होना भी एक कारण है। यह है हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट : हार्ट अटैक एक ब्लड सर्कुलेशन प्रॉब्लम है। जब हार्ट मसल्स तक ब्लड सर्कुलेशन ब्लॉक हो जाता है या ठीक से नहीं पहुंचता या लंबे समय तक इसकी सप्लाई नहीं होती तो हार्ट मसल्स डैमेज हो जाती हैं। जिसके परिणामस्वरूप हार्ट अटैक आया है। वहीं जब व्यक्ति का हार्ट पंपिंग करना बंद कर देता है, बॉडी में ब्लड सर्कुलेशन रूक जाता है और व्यक्ति सामान्य तरीके से सांस नहीं ले पाता तो कार्डिएक अरेस्ट यानि हार्ट फेल हो जाता है। हार्ट अटैक और कार्डिएक अरेस्ट दोनों में ही इमरजेंसी सिचुएशन होती है। इससे बचने के लिए अच्छी जीवनशैली अपनायें : मेदांता अस्पताल रांची के हृदयरोग विशेषज्ञ कहते हैं कि कम उम्र में हार्ट अटैक या कार्डियक अरेस्ट आने का सबसे बड़ा कारण खराब जीवनशैली है। इसलिए इससे बचना चाहते हैं तो एक अच्छी जीवनशैली को अपनाएं। स्मोकिंग से दूर रहें। डायबिटीज और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों वाले लोगों को अपना खास ख्याल रखना चाहिए। आहार में वसा और चीनी कम लें। इसके साथ ही नियमित रूप से व्यायाम करें।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। वैश्विक स्तर पर जारी कोरोना महामारी सभी के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। पिछले दो साल से जारी संक्रमण में वायरस के कई तरह के नए वैरिएंट्स देखने को मिले है, इनमें से कुछ की प्रकृति भी एक दूसरे से भिन्न देखी गई है। कोरोना के उभरते नए वैरिएंट्स से बचाव के लिए वैज्ञानिक दो डोज वाली वैक्सीन के बाद लोगों को बूस्टर शॉट देने की सलाह देते हैं, इससे शरीर में नए वैरिएंट्स से मुकाबले के लिए मजबूत प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद मिलती है। हालांकि जिस तरह से एक के बाद एक, कोरोना वायरस के नए-नए वैरिएंट्स सामने आ रहे हैं, इसने विशेषज्ञों की चिंता को और बढ़ा दिया है। असल में महामारी की शुरुआत में कोरोना वायरस के मूल रूप को ध्यान में रखते हुए टीके तैयार किए गए थे, हालांकि समय के साथ वायरस में हुए म्यूटेशन ने इन टीकों की प्रभाविकता को कम कर दिया है। इसी खतरे को ध्यान में रखते हुए हाल के शोध के आधार पर वैज्ञानिकों की एक टीम का कहना है कि आने वाले समय में वैक्सीनेशन में अपडेशन की आवश्यकता हो सकती है। विशेषज्ञों का स्पष्ट तौर पर कहना है कि जिस तरह से कोरोना वायरस के नए वेरिएंट्स उभर रहे हैं, ऐसे में भविष्य में कोविड-19 बूस्टर शॉट्स के लिए नए फॉर्मूलेशन की आवश्यकता होगी। आइए जानते हैं वैज्ञानिकों का इस संबंध में और क्या कहना है? टीके प्रभावी, पर समय के साथ अपडेशन की जरूरत : विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 से बचाव के लिए प्रयोग में लाए जा रहे टीके अब भी नए वैरिएंट्स से होने वाले संक्रमण के गंभीर मामलों और इसके कारण होने वाली मौत से सुरक्षित रखने में सहायक हैं। पर जिस तरह से अधिक संक्रामक नए वैरिएंट्स सामने आ रहे हैं साथ ही समय के साथ लोगों की प्रतिरक्षा कम होती जाती है, ऐसे में हमें टीकों में अपडेशन को लेकर विचार करना चाहिए। टीकों के नए फॉर्मूलेशन और अपडेशन का मतलब नए वैरिएंट्स की प्रकृति के आधार पर इसमें बदलाव और वैक्सीन की तीन या चार खुराक देने की आवश्यकता से है। बार-बार वैक्सीनेशन की होगी जरूरत : वायरस के प्रति टीकों की प्रतिरोधक क्षमता को लेकर अध्ययन कर रहे वैज्ञानिक ने बताया कि अक्सर यह पूछा जाता रहा है कि भविष्य में लोगों को कितनी बार टीके देने की आवश्यकता हो सकती है? फिलहाल तो यह समझना आवश्यक है कि कोई ऐसा पैरामीटर नहीं है जिसके आधार पर यह तय किया जा सके कि आगे कौन सा नया वैरिएंटस आएगा और भविष्य में ये वैक्सीन, लोगों को सुरक्षित रखने में कितनी सहायक होंगी? इस सवाल के बारे में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि वायरस में म्यूटेशन के साथ हमें वैक्सीन के अपडेशन की जरूरत पर ध्यान देना होगा। इन्फ्लूएंजा और सार्स-सीओवी-2 की प्रकृति : वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरस में म्यूटेशन और उस आधार पर वैक्सीनेशन की जरूरत को समझने के लिए इन्फ्लुएंजा वायरस एक उदाहरण है। यह संक्रमण बार-बार देखने को मिलता रहा है। हर साल विशेषज्ञ इस संक्रमण के कारण होने वाली गंभीर बीमारी के जोखिम को कम करने के लिए फ्लू शॉट के सर्वोत्तम फॉर्मूलेशन को लाने का प्रयास करते हैं। कोरोना के मामले में भी हमें इसी तरह की जरूरत हो सकती है। वैसे तो इन्फ्लूएंजा और सार्स-सीओवी-2 वायरस की प्रकृति अलग-अलग हैं, पर इन्फ्लूएंजा की तरह ही कोरोना वायरस में हो रहे अपडेशन के साथ-साथ वैक्सीन की प्रभाविकता को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। वैक्सीन अपडेशन की आवश्यकता : वैज्ञानिकों का कहना है कि सार्स-सीओवी-2 का प्रसार जारी है और इसके एंडमिक होने की संभावना है। ऐसे में यह संभव है कि लोगों को निकट भविष्य के लिए समय-समय पर बूस्टर शॉट्स की आवश्यकता हो सकती है। वायरस खुद में म्यूटेशन करके आसानी से मानव कोशिकाओं में प्रवेश कर लेता है, जबकि हमारे पास अभी वायरस के मूल स्ट्रेन के आधार पर ही टीके हैं। टीके आपके शरीर को एक विशेष स्पाइक प्रोटीन को पहचानने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, चूंकि वायरस का स्पाइक प्रोटीन समय के साथ बदलता जा रहा है, ऐसे में इससे सुरक्षा के लिए हमें वैक्सीनेशन में समय के साथ नए फॉर्मूलेशन की आवश्यकता पर जोर देना होगा। (नोट : यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है।)
एबीएन हेल्थ डेस्क। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में आज फिर कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। यहां पिछले 24 घंटों में 739 नए केस दर्ज हुए हैं, जो कि कल आए मामलों से ज्यादा है। इसके साथ ही मुंबई में कोविड पॉजिटिविटी रेट बढ़कर 8.4% पर पहुंच गया है। जबकि मंगलवार को यह दर 6 फीसदी थी। कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच बीएमसी ने टेस्टिंग बढ़ाने के निर्देश दिए हैं और इसके लिए युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत बतलाई। शहर में इस साल 1 फरवरी के बाद से बुधवार को सबसे ज्यादा कोविड के 739 केस सामने आए हैं। इस बीच बीएमसी ने चेतावनी देते हुए कहा कि मॉनसून के नजदीक होने के कारण अब कोविड-19 केस में तेजी से वृद्धि देखने को मिल सकती है। कोरोना वायरस संक्रमण की रोकथाम के लिए बीएमसी ने टेस्टिंग बढ़ाने और अस्पतालों को अलर्ट पर रहने का निर्देश दिया है। साथ ही 12-18 साल के आयु वर्ग की कैटेगरी में टीकाकरण अभियान और बूस्टर डोज को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए कहा है। वहीं मुंबई में अस्पतालों के आईसीयू में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में अचानक से उछाल देखने को मिला है। अप्रैल की तुलना में मई में कोविड महामारी के कारण अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में 231 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सोमवार तक, शहर के अस्पतालों में 215 मरीज दाखिले हुए, जबकि अप्रैल में ऐसे मरीजों की तादाद सिर्फ 65 थी। हाल ही में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने कहा था कि महाराष्ट्र के उन जिलों के लोगों को मास्क लगाने समेत तमाम सावधानी बरतनी चाहिए, जहां कोरोना वायरस संक्रमण के मामले रोजाना बढ़ रहे हैं। वहीं मुंबई में ओमिक्रॉन के सब वेरिएंट BA.4 के चार और BA.5 के तीन मरीज मिले हैं। इससे चिंता और बढ़ गई है क्योंकि ये सब वेरिएंट अति संक्रामक माने गए हैं।
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