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Published / 2022-10-11 13:05:57
मेदांता रांची के डॉक्टर की चेतावनी : खराब जीवनशैली के कारण तेजी से फैल रहा अर्थराइटिस

एबीएन हेल्थ डेस्क। आज की लगातार बदल रही जीवन शैली और भागदौड़ वक्त में कब किसे क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। कोरोना काल के बाद लोगों के जीवन में अप्रत्याशित रूप से बदलाव आए हैं। कई नई बीमारियों ने भी एक घर कर लिया है। इससे कोई भी अछूता नहीं है। इन्हीं बीमारियों में अर्थराइटिस भी अब शामिल हो गया है। जो तेजी से लोगों में फैल रहा है और लोगों को अपना शिकार बना रहा है। वर्ल्ड अर्थराइटिस डे पर मेदांता रांची ने लोगों को स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि यह ऐसी बीमारी है जो अब हर उम्र के लोगों को अपने चपेट में ले रही है। जीवन शैली में बदलाव करके काफी हद तक इस बीमारी से बचा जा सकता है। मेदांता रांची के वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीलेश मिश्रा कहते हैं, हर साल 12 अक्टूबर को वर्ल्ड अर्थराइटिस डे मनाया जाता है। ऐसे में हमारी कोशिश लोगों के बीच में यह अवेयर करने की होती है कि किसी भी बीमारी को लोग छोटा नहीं समझे। अर्थराइटिस एक ऐसी बीमारी है। जिससे लोगों को चलने या बैठने में तकलीफ होती है और अगर इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिए दिया गया तो भारी परेशानी हो सकती है। निलेश यह भी बताते हैं कि कोरोना के बाद युवाओं में अर्थराइटिस से जुड़े गठिया के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। मेदांता रांची के वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीलेश मिश्रा कहते हैं कि पहले अर्थराइटिस की बीमारी सामान्य तौर पर 40- 45 साल के बाद देखने को मिलती थी लेकिन अब इसके फैलाव में काफी तेजी हो गई है। हर रोज मेदांता रांची में बड़ी संख्या में वैसी महिला और पुरुष पहुंच रहे हैं जो जोड़ों के दर्द से परेशान हैं। अर्थराइटिस यानी कि गठिया जोड़ों की सूजन और दर्द से जुड़ा हुआ रोग है। जब शरीर में यूरिक एसिड बढ़ जाता है तो ऐसी बीमारी होती है। यह ऐसी बीमारी है जो मुख्यत ओल्ड एज के लोगों में देखने को मिलता है। अपने देश में साठ साल से ज्यादा लगभग 80 फीसदी बुजुर्ग इस बीमारी से पीड़ित हैं। डॉक्टर नीलेश यह भी बताते हैं कि वर्क फ्रॉम होम कल्चर आने के बाद आर्थराइटिस में अप्रत्याशित रूप से तेजी देखी जा रही है। मेदांता रांची के वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीलेश मिश्रा यह भी कहते हैं कि अगर कुछ चीजों पर ध्यान दिया जाए तो बहुत हद तक आर्थराइटिस पर कंट्रोल किया जा सकता है। वह बताते हैं कि एक्सरसाइज और डाइट का ख्याल तो लोगों को रखना ही होगा और साथ ही साथ प्रचुर मात्रा में ताजी और हरी सब्जी का सेवन और खानपान में सीजनल फलों के उपयोग को शामिल करके अर्थराइटिस से बचा जा सकता है। उन्होंने यह भी आगाह किया कि जब जोड़ों में दर्द शुरू हो तो उसे हल्के में कतई न लें। डॉक्टर निलेश यह भी बताते हैं कि अक्सर यह देखा जाता है कि जब जोड़ों में दर्द होता है तो लोग हॉट वाटर बैग से उसकी सिकाई करते हैं जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए। जब दर्द होता है तो बिना डॉक्टर की सलाह के लोग पेन किलर का भी इस्तेमाल करने लगते हैं। इससे क्षणिक तौर पर आराम तो मिल जाता है लेकिन किडनी और इससे संबंधित अन्य बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है।

Published / 2022-10-07 13:08:38
अर्ली स्टेज में प्रोस्टेट कैंसर के इलाज से मिल सकता है लाभ : डॉ अशोक गुप्ता, मेदांता रांची

टीम एबीएन, रांची। प्रोस्टेट कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका डायग्नोस आमतौर पर 60 साल के बाद सामने आता है। अगर शुरुआती दौर में ही में इस बीमारी के लक्षण को पकड़ लिया जाए और उचित दिशा निर्देश में इलाज किया जाए तो ऐसी हालत में मरीजों को बहुत लाभ मिल सकता है। यह आंकड़ा मेदांता रांची के प्रोस्टेट कैंसर के विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक गुप्ता ने दी। डॉ अशोक ने बताया कि प्रोस्टेट एक छोटी ग्रंथि होती है जो एक इंसान के निचले पीछे पेट में पाई जाती है। यह मूत्राशय के नीचे और मूत्र मार्ग के आसपास स्थित है। प्रोस्टेट हार्मोन टेस्टोस्टेरोन द्वारा विनियमित होता है और एक तरल पदार्थ का उत्पादन करता है। जिसे वीर्य कहते हैं। वीर्य शुक्राणु युक्त तरल पदार्थ है, जो स्क्रीन के दौरान मूत्र मार्ग से निकलता है। जो प्रोस्टेट में कोशिकाओं की असामान्य और घातक वृद्धि से ट्यूमर बन जाता है। उसे ही प्रोस्टेट कैंसर कहा जाता है। ये कैंसर शरीर के अन्य क्षेत्रों में फैल जब फैलना शुरू करता है। तब भी इसे प्रोस्टेट कैंसर ही कहा जाता है क्योंकि कैंसर प्रोस्टेट के कोशिकाओं से बना है। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुरुषों में होने वाला कैंसर है और यह बहुत कॉमन कैंसर है। इसके होने का मुख्य और सबसे बड़ा कारण अनुवांशिक है और इस कैंसर के करीब 90: मामले अनुवांशिक ही होते हैं। दरअसल जेनेटिक म्यूटेशन से जो बदलाव आता है तो उससे मरीजों में कैंसर होने के चांसेज हो जाते हैं। वैसे लोग या वैसे मरीज जिनके भाई और पिताजी को कैंसर रहा हो या फिर फर्स्ट डिग्री रिलेटिव को कैंसर रहा हो। वैसे मरीजों में आम आदमी की तुलना में कैंसर होने का खतरा ढाई गुना ज्यादा होता है। यह मुख्य तौर पर अमेरिकन में पाए जाने वाला रोग है और इसकी तुलना में एशियन और अफ्रीकन में यह बीमारी कम होती है। भारतीयों में यह बीमारी कम होने का एक मुख्य कारण रेसियल डिफरेंस भी है। डॉक्टर अशोक ने यह भी बताया कि यह कैंसर धीरे-धीरे होता है। 70 से 90 साल से ऊपर के पुरुषों में इस कैंसर का खतरा ज्यादा रहता है। पुरुषों में मुंह के कैंसर के बाद होने वाला दूसरा सबसे कॉमन कैंसर है। अपने देश में अभी जब हम स्क्रीनिंग कर रहे हैं तो यह अब जल्दी पकड़ में आ रहा है। करीब 80 से 90: मामलों में हम यह स्क्रीनिंग तब करते हैं, जब यह काफी फैल चुका होता है। इसमें उनकी ट्रीटमेंट भी होता है और रिकवरी भी होती है। अगर शुरूआती दौर में ही कैंसर को पकड़कर बेहतर इलाज की जाए तो अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। खास बात यह कि जो लोग स्मोकिंग करते हैं उनमें बीमारी होने दोबारा होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर किसी का प्रोस्टेट कैंसर ठीक हो गया और वह स्मोकिंग करने लगे तो उसे कैंसर दुबारा हो जाएगा , या फिर जिनका वजन ज्यादा होता है, उनमें बीमारी हायर स्टडीज में डायग्नोसिस करवाते हैं। स्मोकिंग और अधिक वजन कुछ रिस्क फैक्टर है।

Published / 2022-10-01 06:43:50
कोरोना वैक्सीन : प्रीकॉशन डोज के 75 दिन में मात्र 27% रहा कवरेज

एबीएन हेल्थ डेस्क। कोरोना वायरस के खिलाफ देश में चल रहे टीकाकरण के अभियान में सरकार की ओर से लोगों के लिए प्रीकॉशन डोज का 75 दिन तक खास अभियान चलाया गया है। इन 75 दिनों में कोरोना वैक्सीन की प्रीकॉशन डोज को निशुल्क तौर पर लगाया गया। यह अभियान शुक्रवार को खत्म हो गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन 75 दिनों में 15.92 करोड़ प्रीकॉशन डोज निशुल्क लगाया गया है। देश की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर यह अभियान जुलाई के मध्य में शुरू किया गया था। जुलाई में जब इस फ्री प्रीकॉशन डोज का अभियान शुरू किया गया था तो उसके पहले देश में सिर्फ 8 फीसदी युवाओं को ही वैक्सीन की यह तीसरी डोज लगाई गई थी। अब यह अभियान खत्म होने पर युवाओं की ये संख्या बढ़कर 27 फीसदी हो गई है। इससे यह पता चलता है कि देश की तीन चौथाई युवा आबादी को अब भी कोरोना वैक्सीन की प्रीकॉशन डोज लगनी बाकी है। देश में 75 दिन तक चले नि:शुल्क प्रीकॉशन डोज के इस बड़े अभियान के लिए कुल 13.01 लाख टीकाकरण केंद्र बनाये गये थे। इनमें से 4451 टीकाकरण केंद्रों को धार्मिक यात्राओं के मार्ग पर लगाया गया था, ताकि बड़ी आबादी को कवर किया जा सके। साथ ही करीब 11.03 लाख टीकाकरण कैंपों को सरकारी या निजी कार्यस्थलों पर लगाया गया था। भारत में इस साल जनवरी में प्रीकॉशन डोज को लगाने की शुरुआत हुई थी। पहले इस प्रीकॉशन डोज को 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों के लिए फ्री किया गया था। इसके साथ ही हेल्थकेयर वर्कर्स और फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए भी इसे फ्री किया गया था। अप्रैल से सरकार की ओर से 18 साल से 59 साल तक के लोगों के लिए इसे निजी टीकाकरण केंद्रों पर लगाने के लिए इसकी कीमत तय कर दी गई थी।

Published / 2022-09-30 17:42:57
नई आफत : दुनिया में तेजी से फैल रहा हैजा, तीन गुना ज्यादा मर रहे लोग

एबीएन हेल्थ डेस्क। इन दिनों चारों ओर लगातार फैल रहे हैजा ने विश्व की चिंता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य डब्ल्यूएचओ ने कहा कि सालों तक नियंत्रण में रहे हैजा के मामले बढ़ने लगे हैं। इससे चिंता भी बढ़ रही है। हैजा फैलने की भयावहता इसी बात से समझी जा सकती है कि इस साल के शुरुआती 9 महीनों में 26 देशों ने इस बीमारी के बढ़ते मामलों की जानकारी दी। डब्ल्यूएचओ ने कहा कि साल 2017 से 2021 के बीच 20 से भी कम देशों में हैजा फैला था। डब्ल्यूएचओ के हैजा-डायरिया टीम के लीडर फिलिप बारबोजा ने कहा- सालों से हैजा के मामले में गिरावट आ रही थी। लेकिन, अब हम विश्व में इसके मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी देख रहे हैं। पिछले साल से हैजा के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि केवल मामले बढ़ नहीं रहे, बल्कि, इसका प्रकोप अपने आप में बहुत बड़ा और जानलेवा है। फिलिप के मुताबिक, साल 2021 में हैजा से मरने वालों की मृत्यु दर पिछले 5 साल के मुकाबले में तीन गुना है। उन्होंने बताया कि इसकी वजह गरीबी, जीवन का संघर्ष और मौसम में होने वाला बदलाव हैं। बाढ़, तूफान और सूखा स्वच्छ पानी का अभाव कर देते हैं। इससे हैजा को फलने-फूलने के लिए सकारात्मक माहौल मिल जाता है। अगर मौसम में बदलाव होता रहा और हम नहीं संभले तो स्थिति भयावह हो जायेगी। गौरतलब है कि डब्ल्यूएचओ के पास हैजा से मरने वालों का स्पष्ट आंकड़ा नहीं होता, क्योंकि कई देश इसकी गणना ही नहीं करते। बारबोजा ने कहा कि हैजा की वैक्सीन सीमित संख्या में हैं। इसकी मांग के मुताबिक पूर्ती नहीं हो पा रही। हैजा के कुछ लाख टीके बचे हैं। वह इस साल के अंत तक खत्म हो जायेंगी। इस बीमारी को रोकने के लिए न तो वैक्सीन हैं, न समय पर जागरूकता के लिए अभियान चलाया जा सकता है। विशेषज्ञ बताते हैं हैजा की वैक्सीन बनाने वाली एक ही कंपनी है। जिनके साथ मिलकर वह टीके बनाती हैं, उन कंपनियों को अपने खर्चे खुद उठाने पड़ते हैं। इसलिए यह कंपनियां टीके बनाने में ज्यादा रुचि नहीं लेतीं।

Published / 2022-09-30 06:58:51
झारखंड में लंपी स्किन डिजीज की एंट्री, भोपाल से लौटे सैंपल मिले पॉजिटिव

एबीएन हेल्थ डेस्क। अफ्रीकन स्वाइन फीवर के बाद अब झारखंड में लंपी स्किन डिजीज की पुष्टि हो गयी है। राज्य के रांची और देवघर से लंपी स्किन डिजीज की पुष्टि के लिए बीमार और संदिग्ध मवेशियों का सैंपल जांच के लिए भोपाल भेजा गया गया था। जहां से आई रिपोर्ट में लंपी वायरस से हुए संक्रमण की पुष्टि हो गयी है। राज्य में 6-7 जिलों में अलग अलग जगहों पर अभी-भी दर्जनों पशु एलएसडी के लक्षणों के साथ बीमार हैं। झारखंड में जानवरों की मौत की संख्या करीब दर्जनों में हैं। विभिन्न जिलों में अब तक दर्जन भर गाय व बछड़ों की मौत हुई है। झारखंड के पशुओं की इस बीमारी का मुख्य कारण लंपी वायरस (लंपी स्किन डिजीज) का संक्रमण ही है। अब इसकी पुष्टि आईसीएआर के एनआईएचएसएडी लेबारेटरी, भोपाल की जांच रिपोर्ट से हो गयी है। राज्य में बड़ी संख्या में गोवंशीय पशुओं के लंपी स्किन डिजीज के लक्षण के साथ बीमार होने पर पशुपालन विभाग ने 19 सितंबर को संदिग्ध लंपी डिजीज के जानवरों से लिये गये 125 सैंपल लंपी की जांच के लिए भोपाल भेजा था। इस 125 सैंपल में से 82 सैंपल की जांच रिपोर्ट आ गई है, जिसमें से देवघर और रांची से लिये गए 28 सैंपल में लंपी वायरस की पुष्टि हुई है। जांच रिपोर्ट भोपाल से आई है, उसमें रांची के 23 एवं देवघर के 05 सैंपल लंपी पॉजिटिव पाये गये हैं। रांची में ही अभी तक चान्हो, नगड़ी व खलारी, सोनाहातू में कई पशुओं की मौत हो चुकी है। रांची के जिन इलाकों से लिये गये सैंपल में एलएसडी की पुष्टि हुई है। उसमें इसमें शहर के साथ ही कुलगू, बंध्या, लोआडीह, कुटे, कामता, कोलंबा, दलादली, बारीडीह, बुढ़मू जैसे इलाके शामिल है।

Published / 2022-09-27 13:20:23
कोरोना जैसा उभर रहा चमगादड़ों में पाया जानेवाला बेहद खतरनाक खोस्ता-2 वायरस

एबीएन हेल्थ डेस्क। पिछले ढाई साल से अधिक समय से पूरी दुनिया कोरोना जैसी भयंकर महामारी से त्रस्त है। दुनियाभर में कोरोना संक्रमण का खतरा लगातार जारी है। तमाम प्रकार की वैक्सीन और बचाव के उपायों के बाद भी अब तक विशेषज्ञ इस नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं कि आखिर यह महामारी कब तक खत्म होगी? कोविड-19 के खतरे के बीच हालिया रिपोर्ट में शोधकतार्ओं ने इसी के जैसे एक और घातक संक्रमण को लेकर अलर्ट किया है। शोधकतार्ओं ने रूसी चमगादड़ों में खोस्ता-2 नामक एक नए वायरस की पहचान की है, इसकी प्रकृति सार्स-सीओवी-2 वायरस से मिलती जुलती देखी जा रही है। प्रारंभिक शोध के आधार पर वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह भी आसानी से मानव कोशिकाओं में प्रवेश करके संक्रमण के जोखिम को बढ़ा सकता है। जर्नल प्लोस पैथाजन्स की एक रिपोर्ट के अनुसार खोस्ता-2 का दूसरा नाम सरबेको-वायरस है। यह वायरस कोविड-19 के टीकों की प्रतिरक्षा से बचकर संक्रमण का कारण बन सकता है। प्रमुख वैज्ञानिक माइकल लेटको के नेतृत्व में अन्य वैज्ञानिकों की टीम ने 2020 में रूस के चमगादड़ों से सार्स-सीओवी-2 वायरस के ही समान कोरोनावायरस के एक समूह की पहचान की है। इसमें खोस्ता-1 और खोस्ता-1, दो नये प्रकार के पैथाजन्स पाए गए हैं। खोस्ता-1 को लेकर दावा किया जा रहा है कि यह मानव कोशिकाओं में आसानी से प्रवेश नहीं कर सकता, लेकिन खोस्ता-2 न सिर्फ प्रवेश कर सकता है, साथ ही गंभीर संक्रमण का कारण भी बन सकता है। अध्ययनकर्ताओं की टीम ने पाया कि खोस्ता-2 और कोरोना वायरस की प्रकृति लगभग एक जैसी ही है। खोस्ता-2 भी उसी एसीई2 रेस्पिरेटर्स को लक्षित करता है जिसका उपयोग कोरोनावायरस मानव कोशिकाओं में प्रवेश करने के लिए करता रहा है। इसके अलावा, जब वैज्ञानिकों ने खोस्ता-2 पर कोविड-19 के टीकों के प्रभाव को जानने को कोशिश की तो इसमें पाया गया कि यह इसे बेअसर कर सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक संभावित खतरा हो सकता है, जिसके बारे में अध्ययन किया जा रहा है। शोध के प्रमुख वैज्ञानिक माइकल लेटको कहते हैं, अब तक के अध्ययनों के परिणाम के आधार पर वैसे तो हम किसी को डराना नहीं चाहते हैं, पर फिलहाल यह पाया गया है कि खोस्ता-2, वैक्सीन रेजिस्टेंस है। यानी कि कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए किया गया टीकाकरण इससे सुरक्षा देने के लिए नाकाफी है। हालांकि यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि प्रकृति में पहले से ऐसे अनेक वायरस घूम रहे हैं जिनमें ये गुण हैं, वे मानव रिसेप्टर्स से जुड़ सकते हैं और वर्तमान वैक्सीन्स उन्हें निष्प्रभावी नहीं कर पा रहे हैं। हम इस वायरस को समझने के शुरुआती चरणों में हैं, आगे इसके बारे में और विस्तार से जानने के लिए अध्ययन किए जा रहे हैं। शोधकर्ताओं द्वारा साझा की गई जानकारियों के अनुसार कोरोनावायरस के साथ-साथ इसी परिवार का एक और सदस्य खोस्ता-2 भी देखा गया है। इसके कई माध्यमों से पशुओं से इंसानों में पहुंचने के स्रोत हो सकते हैं, इसे समझने के लिए अध्ययन जारी है। यह कोविड-19 वैक्सीन प्रतिरोधी है, जिसका मतलब है कि उपलब्ध कोविड-19 के टीके खोस्ता-2 वायरस से सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते हैं। इसकी प्रकृति और संक्रामकता काफी हद तक सार्स-सीओवी-2 वायरस से मिलती जुलती है, खास बात यह भी है कि दोनों ही वायरस के स्रोत चमगादड़ ही हैं।

Published / 2022-09-23 17:44:39
राहत... वैज्ञानिक बोले- कोरोना महामारी का अंत नजदीक, बीत गया सबसे बुरा दौर

एबीएन हेल्थ डेस्क। क्या कोविड महामारी से प्रभावित हमारे जीवन का सबसे बुरा दौर बीत चुका है? कुछ वैज्ञानिकों का यही मानना है। दुनियाभर में दो साल से ज्यादा समय तक कोविड-19 द्वारा जिंदगी के हर पहलू पर अपना असर छोड़ने के बाद शायद पहली बार ऐसा कहा जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि महामारी भले ही समाप्त हो गई है लेकिन कोविड हमारे बीच मौजूद रहेगा। भारत और दुनियाभर में संक्रमण के मामले धीरे-धीरे घट रहे हैं। बीमारी के इस वर्तमान स्वरूप में संक्रमण के मामले न तो तेजी से बढ़ रहे हैं और न ही एकदम से घट रहे हैं। अशोक विश्वविद्यालय में भौतिकी और जीव विज्ञान विभाग में प्रोफेसर गौतम मेनन ने कहा, इन मामलों का बेहद छोटा हिस्सा भी मौत को दावत दे सकता है। यह एक नयी परिस्थिति होगी जिसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए। महामारी की शुरुआत से ही संक्रमण के मामलों का अध्ययन कर रहे मेनन ने कहा, दुनिया हमेशा स्थायी रूप से बेहद सतर्क रहने की स्थिति में नहीं चल सकती। कोविड-19 को अंतरराष्ट्रीय आपातकाल घोषित किये जाने के दो साल से ज्यादा समय बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन अब यह कहने की स्थिति में है कि कोविड-19 महामारी का अंत नजदीक है।

Published / 2022-09-23 06:02:44
कोरोना महामारी तो अभी खत्म नहीं हुई, लेकिन अंत निकट ही है : डब्ल्यूएचओ

एबीएन सेंट्रल डेस्क। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना महामारी को लेकर कहा है कि अब दुनिया में इसका अंत दिखाई देने लगा है। लेकिन के प्रमुख ने गुरुवार को अपने इस दावे को खारिज कर दिया कि कोविड-19 महामारी का अंत निकट था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने कहा कि महामारी खत्म नहीं हुई है, लेकिन अंत दिखाई दे रहा है। डब्ल्यूएचओ चीफ घेब्रेयसस ने कहा कि कोरोना अंत का अंत दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि हम अंत में हैं। उन्होंने दोहराया कि महामारी को समाप्त करने के लिए दुनिया अब तक की सबसे अच्छी स्थिति में थी, जिसमें साप्ताहिक मौतों की संख्या में गिरावट जारी थी और जनवरी 2021 में वे जो चरम पर थी अभ उसका सिर्फ 10 प्रतिशत है। टेड्रोस ने बताया कि दुनिया की दो-तिहाई आबादी को टीका लगाया गया है, जिसमें तीन-चौथाई स्वास्थ्य कार्यकर्ता और वृद्ध लोग शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हमने ढाई साल एक लंबी, अंधेरी सुरंग में बिताये हैं, और हम उस सुरंग के अंत में प्रकाश को देखना शुरू कर रहे हैं। लेकिन, उन्होंने जोर देकर कहा कि यह अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है और सुरंग में अभी भी अंधेरा है, कई बाधाएं हैं जो हमें परेशान कर सकती हैं अगर हम ध्यान नहीं देते हैं। हम अभी भी सुरंग में हैं।

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