एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूनाइटेड किंगडम के स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना के दो नए वैरिएंट बीक्यू.1 और एक्सबीबी को लेकर चेतावनी जारी की है। इन दोनों ही वैरिएंट की वजह से यूके में कोरोना से संक्रमित लोगों में तेजी आ रही है। यूके में अभी तक 700 से ज्यादा केस बीक्यू.1 के और 18 एक्सबीबी के केस सामने आ चुके हैं। एक्सपर्ट्स ने बताया है कि दोनों ही वैरिएंट बहुत ही ज्यादा प्रतिरोधी क्षमता वाले हैं। हो सकता है कि इन वैरिएंट पर वर्तमान में मौजूद वैक्सीन असर न करें। ये दोनों ही वैरिएंट सबसे तेजी से फैलने वाले ओमिक्रोन वैरिएंट के ही सब वैरिएंट हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन सब वैरिएंट का झुंड नोर्थ अमेरिका और यूरोप में नवंबर तक कोरोना की एक और लहर ला सकता है। यूके की स्वास्थ्य और सुरक्षा एजेंसी नये सब वैरिएंट्स की जांच की जा रही है और इनके संक्रमण पर भी नजर रखी जा रही है। बैसेल यूनिवर्सिटी की बायोजेंट्रम रिसर्च फेसिलिटी (जो पैंडेमिक की शुरू से ही बहुत नजदीक से जांच कर रही है) ने कहा है कि नये वैरिएंट्ंस बहुत तेजी से फैलने की क्षमता रखते हैं। बायोजेन्ट्रम की कंप्यूटेशनल बायोलोजिस्ट कोर्नेलियस रोमर ने कहा, ओमिक्रॉन शायद पहला ऐसा वैरिएंट जो कि इम्यूनिटी से बच सकता था, इसी वजह से ओमिक्रोन की इतनी बड़ी लहर दिखाई दी थी। कोरोना के नये सब वैरिएंट ज्यादातर एक जैसे ही हैं। यह सभी एक ही तरह के म्यूटेशन से बने हैं और इसलिए यह इम्यूनिटी से बचने में भी सक्षम हो सकते हैं। एक्सबीबी वैरिएंट के कई मामले भारत में भी पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तमिलनाडु में सामने आ चुके हैं। इनके अलावा कुछ मामले कर्नाटक, गुजरात और राजस्थान से भी मामले सामने आये हैं। वहीं स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने कहा है कि लोगों को कोरोना की गाइडलाइन के मुताबिक ही रहना चाहिए। दिवाली से ठीक पहले महाराष्ट्र में भी एक्सबीबी वैरिएंट का केस सामने आया था जिसके बाद राज्य सरकार ने भी लोगों से सुरक्षित वातावरण में त्योहार मनाने को कहा था। वहीं स्वास्थ्य विभाग की माने तो एक्सबीबी वैरिएंट नवंबर के बीच अपनी पीक पर होगा।
एबीएन हेल्थ डेस्क। केरल में एवियन इंफ्लुएंजा के बढ़ते खतरे के बीच केंद्र सरकार ने भी सतर्कता बढ़ा दी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुरुवार को एवियन फ्लू से जुड़े मामलों की जांच के लिए सात सदस्यीय एक दल को केरल भेजा है। यह दल जांच के बाद अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपेगा और इसे रोकने के तरीके बतायेगा। एवियन फ्लू को बर्ड फ्लू के नाम से भी जाना जाता है। यह इन्फ्लूएंजा (फ्लू) टाइप ए वायरस के संक्रमण के कारण होने वाली बीमारी है। दुनियाभर में जंगली पक्षियों में इसका प्रकोप देखा जाता रहा है, पक्षियों के संपर्क में आने वाले इंसानों में भी इस संक्रमण का जोखिम होता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस फ्लू को काफी घातक माना जाता है, इसके कारण इंसानों में मृत्यदर 56 फीसदी से अधिक देखी गई है। मानव संक्रमण, मुख्य रूप से संक्रमित जानवरों या दूषित वातावरण के सीधे संपर्क के माध्यम होता है। यह शरीर में कई प्रकार की गंभीर जटिलताओं का कारण बनने के साथ कुछ स्थितियों में जानलेवा भी हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिन स्थानों पर इस प्रकार के संक्रमण का खतरा हो वहां जाने से बचना चाहिए। आइए इस गंभीर संक्रमण के बारे में विस्तार से जानते हुए इससे बचाव के उपायों के बारे में समझते हैं। बर्ड फ्लू एक प्रकार के इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होता है, हालांकि इससे सीधे तौर पर इंसानों के प्रभावित होने का जोखिम नहीं होता है। यह पक्षियों, मुर्गों में होने वाला संक्रमण है जिनके माध्यम से यह इंसानों में संक्रमण का कारण बनता है। एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और यूरोप के कुछ हिस्सों में बर्ड फ्लू का प्रकोप देखा जा चुका है। कुछ मामलों में, बर्ड फ्लू एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी फैल सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, खुले बाजार में जहां अंडे और मुर्गे बेचे जाते हैं, या जहां पर पोल्ट्री फार्म्स होते हैं वहां से संक्रमण के बढ़ने का खतरा सबसे अधिक देखा गया है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक डॉ सौम्या स्वामीनाथन ने गाम्बिया में बच्चों की मौत के मामले पर चिंता जतायी है। उन्होंने कहा कि इन सभी बच्चों की मौत का चार भारतीय निर्मित कफ सिरप से जुड़ना एक गंभीर मुद्दा है। स्वामीनाथन गुरुवार को पुणे में विकासशील देशों के वैक्सीन मैन्युफैक्चरर्स नेटवर्क (डीसीवीएमएन) की वार्षिक आम बैठक से इतर पत्रकारों से बात कर रही थीं। डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट ने गाम्बिया में 66 बच्चों की मौत को भारत में बने चार कफ सिरप से जोड़ा है। स्वामीनाथन ने कहा कि भारत सरकार डब्ल्यूएचओ के संपर्क में है क्योंकि डब्ल्यूएचओ ने वास्तव में जांच के आधार पर रिपोर्ट प्रदान की थी जो यह साबित करने के लिए की गई थी कि यह डायथिलीन ग्लाइकोल संदूषण के कारण था। यह एक बहुत ही गंभीर मुद्दा है और इसे बहुत गंभीरता से लिया जाना है। उन्होंने कहा कि भारत में केंद्रीय और राज्य स्तर के दवा नियामक हैं और उनके संचालन में सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत है। ऐसा कोई तंत्र नहीं है जहां विभिन्न राज्यों के नियामक वास्तव में एक साथ काम कर सकते हैं, एक दूसरे के उत्पादों पर निरीक्षण कर सकते हैं। भारत को जेनेरिक दवाओं और टीकों के क्षेत्र में अग्रणी बने रहने के लिए, यह साबित करना महत्वपूर्ण है कि उनके पास एक बहुत मजबूत नियामक प्रणाली है। बता दें कि गाम्बिया में 69 बच्चों की मौत के बाद भारतीय कफ सिरप निर्माता कंपनी जांच के घेरे में है। भारत सरकार की ओर से इस संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन को एक पत्र भी लिखा गया है, जिसमें कहा गया है कि उसके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी एटिओलॉजी (रोग व मृत्यु का कारण पता करने वाला वैज्ञानिक अध्ययन) का निर्धारण करने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में भारत के औषधि महानियंत्रक ने इस संबंध में अधिक क्लीनिकल जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है।
टीम एबीएन, रांची। मेदांता हॉस्पिटल, रांची के कंसलटंट न्यूरो सर्जन डॉ आनंद कुमार झा ने वर्ल्ड ट्रॉमा डे के अवसर पर बताया कि हर साल बड़ी संख्या में सड़क हादसे में लोग अपनी जान गवां बैठते हैं। लोगों को अगर हादसे के बाद सही वक्त पर ट्रीटमेंट दिया जाये, तो बहुत संभव है कि इन आंकड़ों में भी सुधार हो सकता है। अगर किसी मरीज की दुर्घटना हो जाती है तो शुरुआती 6 घंटे बहुत मायने रखते हैं। अगर इन 6 घंटे में मरीज का इलाज किया जाए तो उसकी जान बचायी जा सकती है। मेदांता हॉस्पिटल, रांची में ऐसे मरीजों के इलाज की विशेष सुविधा है। वर्ल्ड ट्रॉमा डे के बारे में डॉक्टर आनंद कुमार झा ने बताया कि इस डे को मनाए जाने का उद्देश्य प्रिवेंशन और अवेयरनेस होता है। विशेष रूप से एक्सीडेंट से कैसे बचे? यदि अगर कोई टू व्हीलर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उसके लिए हेलमेट बहुत जरूरी होता है। अवेयरनेस के कारण जो ड्राइविंग करते हैं, वह तो हेलमेट लगाते ही हैं लेकिन जो पीछे बैठते हैं। हेलमेट उनके लिए भी ज्यादा जरूरी है। ट्रैफिक रूल को फॉलो करना भी बहुत जरूरी होता है। अगर कोई फोर व्हीलर का यूज कर रहा है तो सीट बेल्ट का उपयोग जरूर करें। यह अनिवार्य है। डॉ आनंद ने बताया कि अगर दुर्भाग्य से घटना हो जाती है तो सबसे पहले इस चीज को देखा जाता है कि मरीज में जान बची है या नहीं ? उसमें पल्स की स्पीड देखनी होती है। मरीज को वाहन की सहायता से नजदीक के हॉस्पिटल में लेकर जाना होता है। इसमें कुछ सावधानी अपनाने की जरूरत होती है। मरीज को ले जाने के वक्त सीधा लिटा कर ली जाए। इस बात का ख्याल रखना होता है अगर मुंह से खून निकल रहा है या उल्टी जैसा लग रहा है तो उसे थोड़ा करवट दे सकते हैं। उसके जो भी नजदीकी हॉस्पिटल है उसमें मरीज को शिफ्ट किया जा सकता है। वह बताते हैं कि दुर्घटना होने के बाद जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी ट्रीटमेंट देने की जरूरत होती है। लेकिन 6 घंटे बहुत अहम माने जाते हैं। मेदांता हॉस्पिटल, रांची में 24 घंटे और सातों दिन इमरजेंसी और ट्रॉमा विभाग कार्यरत रहता है। डॉ आनंद कुमार झा यह भी बताते हैं कि सड़क हादसे में सबसे अहम ब्रेन को बचाना होता है। अगर ब्रेन में गहरी चोट लगे तो पेशेंट की मौत आॅन द स्पॉट भी हो सकती है। इसके अलावा छाती या पेट का चोट भी घातक हो सकता है। अगर छाती में चोट लगती है तो तुरंत सिक्योर करने की जरूरत होती है। पेट में चोट लगने से ब्लड लॉस होने के चांसेस ज्यादा होते हैं। मेदांता हॉस्पिटल रांची में विश्वस्तरीय इलाज की व्यवस्था है, जिससे हादसे के शिकार मरीजों का बेहतर इलाज होता है। वर्ल्ड ट्रॉमा डे के मौके पर डॉक्टर आनंद कुमार झा यह कहते हैं कि कुछ सावधानी जरूर रखे। ड्राइविंग के वक्त हेलमेट का इस्तेमाल जरूर करें साथ ही हेलमेट को प्रॉपर टाइ करें। ड्राइविंग के वक्त मोबाइल पर कभी बातें न करें और ट्रैफिक रूल को जरूर फॉलो करें। ज्यादातर खुद की गलती से नहीं बल्कि दूसरों की गलती से एक्सीडेंट होता है। अगर आप सही हैं तो फिर दूसरे भी सही रहेंगे। अगर लोग यह सोच ले कि ट्रैफिक रूल का पालन करेंगे और गाड़ी को सही चलाएंगे तो ऐसी नौबत शायद नहीं आएगी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। देश में पिछले कुछ महीनों में हार्ट अटैक के मामले काफी बढ़ गये हैं। कम उम्र में ही दिल का दौरा पड़ रहा है और इससे मौत हो रही है। कई मामलों में अटैक अचानक आ रहा है और मौके पर ही मौत हो रही है। हालांकि हार्ट अटैक के कुछ ऐसे लक्षण होते हैं, जिनकी पहचान से समय रहते इस बीमारी की पहचान हो सकती है, जिससे मरीज की जान बचाई जा सकती है। आइये जानते हैं क्या हैं वे लक्षण और कैस दिल की बीमारियों से बचाव कैसे करें। डॉक्टर गुप्ता बताते हैं कि खराब लाइफस्टाइल, खानपान की गलत आदतों और कोविड वायरस की वजह से हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। कोविड महामारी के बाद कोरोना हार्ट डिजीज के केस काफी बढ़ गये हैं। लोग डाइट में जंक फूड लेते हैं। शराब और धूम्रपान की लत भी काफी बढ़ गई है। साथ ही कोरोना वायरस की वजह से हार्ट आर्टरीज में हुए ब्लड क्लॉट की वजहे से भी दिल का दौरा पड़ रहा है। ब्लड क्लॉट की वजह से हार्ट फंक्शन सही से नहीं हो पाते हैं और इससे ब्लड पंप करने में परेशानी होती है और दिल का दौरा पड़ जाता है। हार्ट डिजीज के बढ़ते मामलों का एक कारण यह भी है कि लोग इस बीमारी के लक्षणों पर ध्यान नहीं देते हैं। कई मामलों में छाती में दर्द को गैस का दर्द समझते हैं, लेकिन ये हार्ट अटैक का कारण बनता है। कई मामलों में जेनिटिक कारणों और अधिक मानसिक तनाव की वजह से भी हार्ट डिजीज हो सकती है। इसलिए मानसिक सेहत पर भी ध्यान दें। अगर घर में किसी को पहले से ही दिल की बीमारी है, तो अपना ध्यान रखें और डॉक्टरों से सलाह जरूर लें। हार्ट अटैक आने से पहले दिखते हैं ये लक्षण अचानक ज्यादा पसीना आना सांस लेने में परेशानी छाती में दर्द और जकड़न बाएं हाथ और कंधे में दर्द जी मिचलाना और गर्दन जबड़े या पीठ तक पहुंचा दर्द ऐसे करें हार्ट डिजीज से बचाव खानपान का ध्यान रखें और डाइट में प्रोटीन और विटामिन शामिल करें। रोजाना कम से कम आधा घंटा एक्सरसाइज करें। धूम्रपान और शराब का सेवन न करें। हर तीन महीने में हार्ट की जांच के लिए लिपिड प्रोफाइल और चेस्ट एमआरआई करायें। कम से कम सात घंटे की नींद जरूर लें। हार्ट अटैक का कोई भी लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टरों से सलाह लें।
एबीएन हेल्थ डेस्क। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस का एक और नया वेरिएंट बनाया है। कहा जा रहा है कि यह ओमिक्रोन से 80 गुना ज्यादा संक्रामक है। इस प्रयोग के बाद पूरी दुनिया के वैज्ञानिक चिंता में हैं, लोगों का डर है कि इस तरह के प्रयोगों के चलते से फिर से कहीं महामारी न फैल जाये। बता दें कि यह वायरस ओमिक्रोम और मूल कोरोनावायरस का हाइब्रिड है। यह इतना खतरनाक है कि रिसर्च में शामिल 100 में से 80 चूहों की इस वायरस के चलते मौत हो गयी। बोस्टन के जिस प्रयोगशाला में यह हाइब्रिड तैयार किया गया है उसके प्रमुख का कहना है कि शोध के जरिए कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन की भूमिका को समझने और इसके बेहतर इलाज के सिस्टम को तैयार करने में मदद मिलेगी। वहीं दुनियाभर के वैज्ञानिक इस शोध के बाद टेंशन में हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनिया को 2030 से पहले कैंसर का टीका मिल जायेगा। कोविड-19 का टीका बनाने वाली बायोएनटेक के सह-संस्थापक युगुर साहिन ने एक बयान में कहा कि कैंसर के इलाज के लिए या कैंसर मरीजों के जीवन को बदलने का इलाज बहुत जल्द हमारी मुट्ठी में होगा। उन्होंने कहा कि कैंसर का टीका कोविड-19 वैक्सीन के विकास के दौरान वैज्ञानिकों की हासिल सफलताओं पर आधारित होगा। उन्होंने कहा, अब सिर्फ आठ साल के भीतर कैंसर का टीका व्यापक रूप से उपलब्ध हो सकता है। हमें भरोसा है कि 2030 से पहले निश्चित रूप से कैंसर का टीका दुनिया में आ जाएगा। उन्होंने कहा, हमारा लक्ष्य फिलहाल यह देखना है कि क्या हम सर्जरी के तुरंत बाद मरीजों को व्यक्तिगत टीका दे सकते हैं या नहीं।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड में कोरोना और लंपी वायरस के चलते अब मिजिल्स-रूबेला नामक बीमारी ने दस्तक दे दी है। यह बीमारी राज्य के कई जिलों में तेजी से फैल रही है। वहीं, धनबाद जिले में मिजिल्स के मरीजों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। इस बीमारी की चपेट में आकर अब तक 4 बच्चों की मौत हो गई है। वहीं, 30 से ज्यादा मरीज संक्रमित पाए गए हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो जिला रेड जोन की तरफ चला जाएगा। दरअसल, यह बीमारी बच्चों में तेजी से फैलती है, जिसकी वजह से अब तक 4 बच्चों की मौत हो गई है। बता दें कि इस बीमारी के ज्यादातर मरीज ग्रामीण इलाके के हैं। स्वास्थ्य विभाग ने इस बीमारी से लोगों को बचाने के लिए विशेष टीम तैयार कर ली है। टीम में शामिल डॉक्टर द्वारा मिजिल्स के मरीजों पर लगातार नजर रखी जा रही है। स्वास्थ्य विभाग की टीम गांवों में कैंप लगाकर लोगों का इलाज शुरू करने की तैयारी में है। स्वास्थ्य विभाग ने आंकड़े जारी कर बताया है कि साल 2021-22 में 67 प्रतिशत बच्चों को मिजिल्स का टीका दिया गया है। 33 प्रतिशत बच्चे टीकाकरण नहीं हो सका। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार बाघमारा, बलियापुर, धनबाद सदर, गोविंदपुर, झरिया, निरसा, तोपचांची व टुंडी ब्लॉक में 72,327 बच्चों के टीकाकरण का लक्ष्य निर्धारित था जबकि, 48,459 बच्चों को मिजिल्स का टीका दिया गया। करीब 23,868 बच्चे मिजिल्स टीकाकरण से छूट गए। सिविल सर्जन डॉ आलोक ने बताया कि मिजिल्स संक्रामक बीमारी है। खासकर बच्चों के बीच यह तेजी से फैलता है। इससे बचाव के लिए 15 माह के बच्चों को मिजिल्स व रूबेला का टीका दिया जाता है। पहला टीका का पहला डोज 9 माह में और दूसरा डोज 15 माह में बच्चे को दिया जाता है। इस समय सीमा में छोटे बच्चों को 5 साल की अवधि तक में 1 माह में 2 टीका देना अनिवार्य है।
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