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Published / 2024-07-14 12:02:16
कांस्टिपेसन रोग (कब्ज) एक गंभीर समस्या, निदान वस्ति यौगिक क्रिया : योगाचार्य महेशपाल

एबीएन हेल्थ डेस्क। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार, षट्कर्म एक प्रारंभिक अभ्यास है जो शरीर को आंतरिक रूप से शुद्ध करता है और फिर योगी को आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए तैयार करता है। योगाचार्य महेशपाल बताते है कि, बस्ती क्रिया बृहदान्त्र को पूरी तरह से साफ करके शरीर को आंतरिक रूप से फिर से भरने की एक तकनीक है। 

यह हठ योग प्रदीपिका में वर्णित षट्कर्म के रूप में जानी जाने वाली छह शुद्धि तकनीकों में से एक है ।बस्ती क्रिया एक आयुर्वेदिक तकनीक, एनीमा से समानता रखती है, जिसमें औषधीय द्रव से भरी एक ट्यूब को मलाशय में डालकर बृहदान्त्र को साफ किया जाता है। इस तकनीकों के पीछे का उद्देश्य बृहदान्त्र से मल और अन्य अशुद्धियों को बाहर निकालना है। इसलिए, बस्ती क्रिया को योगिक एनीमा के रूप में भी जाना जाता है।

वस्ति (enima) वह क्रिया है, जिसमें गुदामार्ग, मूत्रमार्ग, अपत्यमार्ग, व्रण मुख आदि से औषधि युक्त विभिन्न द्रव पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराया जाता बस्ती क्रिया करने के दो प्रकार हैं, अर्थात जल बस्ती (पानी के साथ) और स्थल बस्ती क्रिया (हवा के साथ)। परंपरागत रूप से, जला बस्ती नदी में बैठकर की जाती थी, हालाँकि, पानी से भरी बाल्टी या टब का उपयोग भी किया जा सकता है। 

जला शब्द पानी को दर्शाता है, क्योंकि यहाँ पानी का उपयोग आंतों को साफ करने के लिए किया जाता है, पानी से भरा टब लें और उस पर उत्कटासन में बैठें या उकड़ू बैठें। पानी का स्तर नाभि तक आना चाहिए। अपने हाथों को घुटनों पर टिकाकर आगे झुकें गुदा-संकोचक मांसपेशियों को फैलाकर गुदा के माध्यम से पानी को बड़ी आंत में खींच लें। 

साँस छोड़ें और साथ ही उदियाना बंध और नौली क्रिया करें। फिर, साँस छोड़ें और गुदा के माध्यम से पानी को बाहर निकाल दें यह पहले चक्र का समापन है, आप इसे 3-5 चक्रों तक दोहरा सकते हैं जब तक कि आंतें साफ न हो जाएं। स्थल वस्ति के अभ्यास के लिए विपरीत करणी मुद्रा में फर्श से 60 डिग्री के कोण पर पीठ के बल लेट जायें। अब घुटनों को छाती की ओर खींचें और स्फिंक्टर मांसपेशियों को बाहर और अंदर धकेलें ताकि आंतों में हवा भर जाये।

खींची गयी हवा को अंदर रोककर नौली क्रिया करते हुए बृहदान्त्र की ओर ऊपर की ओर खींचा जाता है। इस बीच, हवा (अपान वायु) नाभि क्षेत्र पर दबाव डालते हुए ऊपर की ओर उठती है। कुछ मिनट तक हवा को अंदर ही रोके रखें और फिर गुदा के माध्यम से उसे बाहर निकाल दें। इससे स्थल बस्ती का एक चक्र बनता है और सुविधानुसार इसे 3-5 बार दोहराया जा सकता है। 

वस्ति षट्कर्म का अभ्यास करते समय कुछ सावधानियां रखनी चाहिए, उच्च रक्तचाप, हर्निया या किसी भी गंभीर पाचन विकार से पीड़ित लोगों को बस्ती क्रिया से बचना चाहिए। बस्ती क्रिया करने के बाद लगभग 72 मिनट तक भोजन का सेवन न करें।बादल, बरसात, हवा या तूफानी मौसम में इस अभ्यास से बचना सबसे अच्छा है। यह अभ्यास सुबह खाली पेट किया जाना चाहिए। वस्ति क्रिया का अभ्यास योग गुरु या योगाचार्य के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। 

इस क्रिया के अभ्यास से हमें कई लाभ प्राप्त होते हैं, यह आंतों से हानिकारक बैक्टीरिया, विषाक्त अशुद्धियाँ, जमा हुआ मल, थ्रेडवर्म और गर्मी, कब्ज, नर्वस डायरिया, पेट फूलना और इरिटेबल बाउल सिंड्रोम से पीड़ित लोगों को बस्ती क्रिया से चिकित्सीय लाभ मिलता है। बस्ती क्रिया वात, पित्त और कफ के बीच संतुलन लाती है एवं शरीर को हाइड्रेट करती है जिससे त्वचा की चमक, रंगत और बनावट बढ़ती है। 

कब्ज अमाशय की स्वाभाविक परिवर्तन की वह अवस्था है, जिसमें मल निष्कासन की मात्रा कम हो जाती है। मल कड़ा हो जाता है, उसकी आवृति घट जाती है या मल निष्कासन के समय अत्यधिक बल का प्रयोग करना पड़ता है। अत्याधिक कब्ज की समस्या से बचाव के लिए महीने में दो बार वस्ति योग क्रिया का अभ्यास किया जाना चाहिए जिससे आंतो मैं जमा हुआ मल की सफाई हो सके, बस्ती क्रिया शरीर की एक उन्नत योगिक सफाई है जो अधिकांश बीमारियों को ठीक करती है।

इसका महत्व इसके अर्ध चिकित्सा के रूप में वर्णन से अच्छी तरह से समझा जा सकता है, अर्थात दुनिया के सभी उपचारों का आधा हिस्सा है बस्ती क्रिया करके अपनी सभी इंद्रियों को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ अपने शरीर को उन्नत योगिक अभ्यासों के लिए शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तैयार करें।

Published / 2024-07-08 21:34:32
नैति योगिक क्रिया साइनस रोग से बचाव करती है : योगाचार्य महेशपाल

एबीएन हेल्थ डेस्क। नेति षट्कर्म नासिका मार्ग को साफ करने और शुद्ध करने की प्रक्रिया है, जिसमें गुनगुना नमकीन जल, सूत्र (धागा) दूध और घी का प्रयोग किया जाता है। जिससे साइनस में जमा हुआ मैल बाहर निकलता है और संतुलित श्वास को बढ़ावा मिलता है। योगाचार्य महेशपाल बताते हैं कि नेति हठयोग में वर्णित एक महत्वपूर्ण शरीर शुद्धि योग क्रिया है। नेति, षटकर्म का महत्वपूर्ण अंग है। नेति मुख्यत: सिर के अंदर वायु-मार्ग को साफ करने की क्रिया है। हठयोग प्रदीपिका और घेरंड सहिता में नेति के बहुत से लाभ वर्णित हैं। 

नेति के मुख्यत: दो रूप हैं : जलनेति तथा सूत्रनेति। जलनेति में जल का प्रयोग किया जाता है; सूत्रनेति में धागा या पतला कपड़ा प्रयोग में लाया जाता है जलनेति में पानी से नाक की सफाई की जाती और आपको साइनस, सर्दी, जुकाम , पोल्लुशन, इत्यादि से बचाता है। जलनेति में नमकीन गुनगुना पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें पानी को नेटिपोट से नाक के एक छिद्र से डाला जाता है और दूसरे से निकाला जाता है। फिर इसी क्रिया को दूसरी नॉस्ट्रिल से किया जाता है। 

अगर संक्षेप में कहा जाए तो जलनेति एक ऐसी योग है जिसमें पानी से नाक की सफाई की जाती है और नाक संबंधी बीमारियों से आप निजात पाते हैं। जलनेति दिन में किसी भी समय की जा सकती है। यदि किसी को जुकाम हो तो इसे दिन में कई बार भी किया जा सकता है। इसके लगातार अभ्यास से यह नासिका क्षेत्र में कीटाणुओं को पनपने नहीं देती। सूत्र नेति में, गीली डोरी या पतली सर्जिकल ट्यूबिंग की लंबाई को सावधानीपूर्वक और धीरे से नाक के माध्यम से मुंह में डाला जाता है। 

फिर छोर को मुंह से बाहर निकाला जाता है और दोनों सिरों को एक साथ पकड़कर बारी-बारी से डोरी को नाक और साइनस से अंदर और बाहर खींचा जाता है। इसका उपयोग नाक को साफ करने और नाक के पॉलीप्स को हटाने के लिए भी किया जाता है। सूत्र नेति एक नाक साफ करने वाला योगाभ्यास है जिसमें नाक के क्षेत्र और बाहरी श्वसन क्षेत्रों को नरम धागे की मदद से साफ किया जाता है। 

नेति योग क्रिया का अभ्यास योग गुरु या योगाचार्य के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए, साइनस नाक के आसपास चेहरे की हड्डियों के भीतर नम हवा के रिक्त स्थान हैं, जिन्हें वायुविवर या साइनस कहते हैं। साइनस पर उसी श्लेष्मा झिल्ली की परत होती है, जैसी कि नाक और मुँह में। जब किसी व्यक्ति को जुकाम तथा एलर्जी हो, तो साइनस ऊतक अधिक श्लेष्म बनाते हैं एवं सूज जाते हैं। 

साइनस का निकासी तंत्र अवरुद्ध हो जाता है एवं श्लेष्म इस साइनस में फंस सकता है। बैक्टीरिया, कवक एवं वायरस वहां विकसित हो जाते हैं तथा वायुविवरशोथ,या साइनसाइटिस रोग का कारण बन जाते हैं। वायुविवरशोध साइनसाइटिस की रोकथाम के लिए नेति योग क्रिया का अभ्यास किया जाता है जिससे नासिका के अंदर बैक्टीरिया, कवक वायरस विकसित न हो और हम साइनस रोग से बच्चे रहे नैति क्रिया जिसमें जल नेति, सूत्र नैति के द्वारा बैक्टीरिया फंगस और वायरस को साफ किया जाता है अगर कोई रोगी साइनस रोग से ग्रसित हैं वह भी निरंतर नेति क्रिया से धीरे-धीरे ठीक हो जाता है नैति क्रिया के अभ्यास से शरीर पर कई लाभ देखे गए जिसमें  जुकाम और कफ  कान, आंख, गले  सिर दर्द, तनाव, क्रोध आदि समस्याओं मैं लाभकारी है। 

यह गले की खराश, टॉन्सिल्स और सूखी खांसी एवं आंसू नलिकाओं को साफ करने में मदद करता है, जिससे दृष्टि स्पष्ट होती है और आंखों में चमक आती है। नाक के मार्ग को साफ करता है जिससे गंध की अनुभूति में सुधार होता है, नैति क्रिया के अभ्यास से संबंधित कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए, जलनेति के बाद नाक को सुखाने के लिए भस्त्रिका प्राणायाम व अग्निसार क्रिया का अभ्यास करे इस योग क्रिया को करते समय मुंह से ही सांस लेनी चाहिए। 

अभ्यास खाली पेट सुबह किया जाना चाहिए इस तरह नैति योगक्रिया षट्कर्म के अभ्यास से हमारे आंखों में चमक आती है और हमारे चेहरे का उसे और तेज बढ़ता है और संपूर्ण शरीर स्वस्थ बने के साथ-साथ उसमें ओज,तेज, स्फूर्ति का विकास होता है हमारी दैनिक दिनचर्या में एक हफ्ते में एक बार नेति योग क्रिया का अभ्यास जरूर करना चाहिए जिससे हम विभिन्न प्रकार के आंख नाक कान गले  से संबंधित रोगों से हम बच रहे हैं।

Published / 2024-07-04 11:33:53
धौति योगिक क्रिया अभ्यास से पाचनतंत्र में परिशुद्धता आती है : योगाचार्य महेशपाल

एबीएन हेल्थ डेस्क। धौति एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है शुद्धिकरण और यह मूल शब्द धू से लिया गया है, जिसका अर्थ है धोना। योगाचार्य महेशपाल विस्तार से बताते है कि, धौति क्रिया षट्कर्मों में से एक है, जो हठ योग द्वारा वर्णित छह सफाई तकनीकें हैं। छह षट्कर्म नेति, धौति, बस्ती, नौली क्रिया, कपालभाति और त्राटक हैं । यह योगिक सफाई तकनीक पाचन और श्वसन स्वास्थ्य में सुधार करती है। धौति, षट्कर्म का एक प्रमुख विधि है। धौति ग्रास (भोजन नली) और पेट का शुद्धिकरण इस विधि को गज-कर्ण के नाम से भी जाना जाता है। 

गज हाथी को कहते हैं। जब हाथी को अपने पेट में उबकायी आती है, तब वह अपनी (ग्रसिका) ग्रीवा में सूंड अंदर तक डाल देता है और पेट के अंदर की वस्तुओं को बाहर निकाल फेंकता है। इस प्रकार यह विधि हमें प्रकृति से ही प्राप्त हुई है। यह विधि पेट में अति अम्लता होने या जब कुछ अपाच्य या बुरा खा लिया हो, तब मिचली से छुटकारा दिलाती है। 

यह विधि खाद्य प्रति-ऊर्जा (एलर्जी) और दमा भी दूर कर पाती है। इसे चार भागों में बांटा गया है: अंतरा (आंतरिक) धौति, दंत (दांत) धौति, हृदय (हृदय या वक्ष क्षेत्र) धौति और मूल शोधन (मलाशय सफाई)। अंतरा धौति (आंतरिक शुद्धि) चार भागों में विभाजित है: वातसार, वारिसार, अग्निसार और बहिष्कृता वातसार धौति में पेट को फैलाने के लिए बार-बार हवा को निगलना शामिल है। फिर हवा को उल्टे आसन की सहायता से आंत के साथ बाहर निकाला जाता है।

घेरंडा संहिता में कहा गया है कि यह अभ्यास एक दिव्य शरीर को उत्पन्न करन में सक्षम बनाता है,वारीसार धौति, एक प्रमुख सफाई ऑपरेशन है। इसमें  गर्म नमकीन पानी पीकर आंत को साफ करना और तब तक आसनों का एक निश्चित क्रम करना शामिल है जब तक कि गुदा से पानी बह न जाये। इस अभ्यास के बाद नमक के बिना पकाया गया एक विशिष्ट भोजन और फिर एक सप्ताह तक एक विशिष्ट आहार पर रहना होता है।

अग्निसार धौति, जिसे वह्निसुर धौति भी कहा जाता है, में पेट की मांसपेशियों का उपयोग करके पेट को हिलाकर गर्मी पैदा की जाती है, अग्नि संस्कृत में आग के लिए है। इसे वज्रासन में घुटने टेककर और बार-बार हांफते हुए सांस के साथ पेट को अंदर और बाहर हिलाते हुए किया जाता है, बहिष्कृत धौती, एक बहुत कठिन अभ्यास जिसमें कमर तक पानी में खड़े होकर, मलाशय को बाहर निकालकर उसे धोना शामिल है।

दन्त धौति, दंत शुद्धि, को दन्त मूल, जिह्वा मूल, कपालभाती और कर्ण धौति में विभाजित किया गया है। चक्षु धौति मैं आंखों को स्वस्थ रखने के लिए आंखों का स्नान, कभी-कभी शामिल किया जाता है।दंत और जिह्वा मूला क्रमशः दांतों और जीभ की सफाई है।  भारत में नीम की छड़ी पारंपरिक है, इसे टूथब्रश के रूप मैं इस्तेमाल किया जा सकता है। जिससे हमारे दांत और मसूड़े पूर्ण रूप से विभिन्न प्रकार के रोगों से बच सकते हैं।

कपालभाति नरम तालू के पीछे की सफाई है, जबकि कर्ण धौति का अर्थ है कानों की सफाई। हृदय धौति, छाती शोधन, को दण्ड धौति, वमन धौति, और वस्त्र धौति में विभाजित किया गया है। दंड धौति में केले के पौधे के मूल से बनी एक लंबी मुलायम छड़ी को अन्नप्रणाली में डालना और फिर धीरे-धीरे उसे बाहर निकालना शामिल है। इस प्रक्रिया के लिए योग विशेषज्ञ योगाचार्य की देखरेख की आवश्यकता होती है। 

वमन धौति में प्रत्येक भोजन के लगभग तीन घंटे बाद उल्टी करवाना शामिल है, जैसे कि नमकीन पानी के साथ और गले के पिछले हिस्से को गुदगुदाना। वस्त्र धौति में पतले कपड़े की एक लंबी पट्टी को निगलना और उसे बाहर निकालना, अन्नप्रणाली और पेट को साफ करना शामिल है।

मूल शोधन, मलाशय या जड़ की सफाई, पानी और या तो हल्दी की एक छड़ी या मध्य उंगली का उपयोग करके मलाशय का शोधन करना शामिल है। धौति क्रियाओं के बहु-आयामी चिकित्सीय लाभ भी हैैं। वारिसार धौति को मल निष्कासन, माइग्रेन से जुड़़ी पाचन संबंधी समस्याओं, कमरदर्द उच्च रक्तचाप, मोटापा, इररिटेबल बाउल सिंड्रोम और मधुमेह आदि रोग-निवारण मेें सहायक पाया गया है। 

शंख प्रक्षालन को कोलोनोस्कोपी हेतु आंतों की सफ़़ाई के लिए एक उपयोगी साधन माना गया है। वमन धौति माइग्रेन के दर्द और मोटापे को भी कम करने मेें सहायक है। यह फेफड़़े सम्बन्धी कार्ययों मेें सुधार करता है। आहार संयम के साथ अगर धौति क्रियाओं का अभ्यास किया जाये तो यह स्वयं मेें कायाकल्प की प्रक्रिया है।

अभ्यास के समय कुछ कुछ रोगों से संबंधित सावधानी रखनी होती है जिसमें, पेप्टिक अल्सर, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मिर्गी, हर्ननिया, रक्तस्रावी बवासीर और स्ट्रोक के रोगियोंको तथा अत्यधिक कमजोरी की अवस्था मेें अंतर्धौति तथा हृदधौति के अभ्यासों से बचना चाहिए  पंद्रह साल की उम्र के बाद ही इनका अभ्यास शुरू करना चाहिए। आंतरिक घाव या पाचन तंत्र मेें अत्यधिक संवेदनशीलता होने पर भी इनका अभ्यास नहीं करना चाहिए धौति का अभ्यास हमेशा एक प्रशिक्षित शिक्षक के मार्गदर्शन मेें ही किया जाना चाहिए धौति विभिन्न रोगों के लिए योग चिकित्सा प्रोटोकॉल का एक अभिन्न अंग है।

धौति नाड़़ियों से मल को दू र कर सभी चक्रो को शुद्ध करता है और पंच प्राणों मेें सामंजस्य स्थापित कर पूरे प्राणिक शरीर मेें प्राण के स्तर को बढ़़ाता है एवं शरीर के सभी महत्वपूर्ण संस्थानों को प्रभावित और सक्रिय करता है, जिनमेें पाचन, श्वसन, रक्त-संचार और तंत्रिका तंत्र मुख्य हैैं, इसलिए धौति क्रिया का अभ्यास रोग निवारक और उपचारात्मक दोनों है।

Published / 2024-06-20 21:21:41
योग के साथ जीयें सुखी और स्वस्थ जीवन

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस/ 21जून/ विशेष

गिरीश्वर मिश्र 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहते हैं योग को यदि पूरी तरह से और गंभीरता से अपना लिया जाए तो वह आदमी का सबसे अच्छा और भरोसेमंद मित्र साबित होता है। यह अपने साधकों को दु:खों और क्लेशों से मुक्त करता है और सुखपूर्वक समग्रता या पूर्णता में जीने का मार्ग प्रशस्त करता है। वेदों से निकला हुआ योग शब्द शाब्दिक रूप से जुड़ने के अर्थ को व्यक्त करता है। 

अनुमानत: लगभग 200 वर्ष ईसापूर्व महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में प्राचीन ज्ञान को कुछ सूत्रों यानी थोड़े से शब्दों से बनी संक्षिप्त शब्द-शृंखला में ग्रथित कर योग-विज्ञान के सिद्धांत और प्रयोग के निष्कर्षों को बड़े वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित कर लोक-कल्याण के लिए प्रस्तुत किया। इसका उद्देश्य था मन में उठने वाली उथल-पुथल को रोकने, दैनिक जीवन में शांति स्थापित करने, और अंतत: आत्मा और ब्रह्म का संयोग कराने के लिए मार्ग दिखाना। ध्यान, आसन, प्राणायाम और आध्यात्मिक नियमों के उपयोग को स्पष्ट करते हुए यह लघु ग्रंथ सहस्रों वर्षों से सबका मार्गदर्शक बना हुआ है। योग-दर्शन के अनुसार स्वास्थ्य और खुशहाली एक ऐसी स्थिति है जो मनुष्य की मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक दशाओं के संतुलन और गुणवत्ता पर निर्भर करती है। 

वस्तुत: योग एक यात्रापथ भी है और यात्रा का लक्ष्य भी है। दिव्यता का निर्देश गुरु के माध्यम से मिलता है। यहां पर यह बताना भी उचित होगा कि दुर्गम जटिल संसार में दिव्य तत्व के प्रति समर्पण शांति पाने में लाभकर होता है। प्रभु-अनुग्रह के लिए समर्पण भी एक सक्रिय स्थिति या जीवन-प्रक्रिया है। परंतु योग के लिए यह समर्पण जरूरी नहीं है। निरीश्वरवादी भी योग में प्रवृत्त हो सकता है। 

स्मरण रहे कि शरीर-मन-संकुल में आने वाला सुधार केवल सतही उपकरण होता है। योग एक आध्यात्मिक अनुशासन है क्योंकि यह न केवल शरीर-मन-संकुल का सुधार करता है बल्कि इसके समुचित उपयोग की विधि भी बतलाता है। योग का उपयोग हमें योग के अभ्यास का अवसर देता है। योग हममें से जो श्रेष्ठ है उसे उपलब्ध कराता है। चेतन रूप से योग का उपयोग जीवन को समृद्ध करता चलता है। 

स्मरणीय है कि एक अध्ययन-विषय के रूप में योग भारतीय दर्शनों में से एक है। प्राय: सभी भारतीय दर्शन उस सर्वव्यापी परमात्म तत्व को स्वीकार करते हैं जो सभी विद्यमान वस्तुओं में उपस्थित है। व्यक्ति और उस परम सत्ता में एकात्मता होती है। योग मार्ग वह पाठ है जो व्यक्ति-चैतन्य को विकसित और समृद्ध करता है ताकि जीवन में अधिक सामंजस्य (हार्मनी) का अनुभव शामिल हो सके और अंतत: परमात्म तत्व के साथ एकता का अनुभव हो सके। 

जैसा कि उपनिषदों में वर्णित है हमारा अस्तित्व पांच कोशों से बनी रचना है। इस रचना में शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद के पांच क्रमिक स्तर पहचाने गये हैं। योग का अभ्यास इन कोशों के बीच पारस्परिक संतुलन और चैतन्य लाता है और अस्तित्व के केंद्र परमात्म तत्व की ओर अग्रसर करता है। कह सकते हैं कि योग बाह्य से आंतरिक बुद्धि और आंतरिक से बाह्य बुद्धि की यात्रा है। 

पातंजल योग-सूत्र बड़े ही सूक्ष्म ढंग से गूढ़ बातों को सामने रखते हैं। उन संक्षिप्त सूत्रों की विशद व्याख्या मनीषियों द्वारा कई तरह की जाती रही है। यह अष्टांग योग के नाम से प्रसिद्ध है। इसके आठ अंग हैं : यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। सारे सूत्रों को चार अध्यायों या पादों : समाधि, साधना, विभूति और कैवल्य, के अंतर्गत व्यवस्थित किया गया है। इसी में पूरे योग-शास्त्र का विवेचन निबद्ध है। समाधि पाद में बताया गया है कि अहं के विचार के साथ अपना तादात्मीकरण और परमात्मा के साथ या उनके अंश के रूप में अपनी पहचान बनाना ही योग का मुख्य प्रतिपाद्य है। 

योगाभ्यास से चेतना का परिष्कार होता है ताकि मन परमात्मा की दिशा में अग्रसर हो। दु:ख और पीड़ा का अनुभव जो जो अहं के जुड़ने के फलस्वरूप होता है दूर हो और साधक प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन कर सके। एकाग्रता मुख्य प्रतिपाद्य है। साधन पाद का विषय क्रिया-योग है । मन में उठने वाले विघ्न को नियंत्रित करने की विधि बताई गई है। विभूति पाद में विभिन्न सिद्धियों या असाधारण शक्तियों का वर्णन किया गया है। चौथे, कैवल्य पाद में उस वास्तविक स्वतंत्रता की बात की गई है जो योग से मिलती है। 

आत्म-ज्ञान के लिए अष्टांग योग के अभ्यास के अनुगमन, जिसे राज-योग भी कहते हैं, की संस्तुति की जाती है। योग के आठ अंग हैं न कि एक के बाद एक आने वाले चरण या सोपान। साधक को इन पर साथ-साथ समानांतर रूप से चलना चाहिए। योगाभ्यास का उद्देश्य साधक को आत्मावलोकन : अपने विचारों और व्यवहारों और उनके परिणामों को देखना-समझना भी होता है। यम और नियम नामक पहले दो चरण नैतिकता और सदाचारपूर्वक जीवन जीने के लिए निर्देश देते हैं। जहां यम बाहरी दुनिया के साथ सम्बन्ध पर केंद्रित हैं वहीं नियम निजी आध्यात्मिक विकास और आत्मानुशासन की आदतों को बताते हैं। 

यम पांच हैं : अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इंद्रियसुख का नियंत्रण) और अपरिग्रह (अनावश्यक वस्तुओं संचय/ संग्रह)। बाह्य और आभ्यंतर इंद्रियों के संयम को यम कहते हैं। पतंजलि ने इनको महाव्रत कहा है जो जाति, देश और काल की सीमा से रहित सार्वभौम स्वरूप वाले हैं। यम वस्तुत: प्रतिबंध हैं जो सिर्फ कर्म के स्तर पर ही नहीं बल्कि विचार और शब्द के स्तर पर भी लागू होते हैं। इन यमों को अपनाने पर योगाभ्यासी व्यक्ति को स्वतंत्रता मिलती है और खुली सांस लेने का अवसर मिलता है। 

इनके अतिरिक्त पांच नियम हैं जो वस्तुत: सदाचार के पालन पर बल देते हैं। ये हैं : शौच (पवित्रता), संतोष, तप (इच्छाओं का शमन), स्वाध्याय (आध्यात्मिक ग्रंथों तथा स्वयं का अध्ययन) और ईश्वर-प्रणिधान (परमेश्वर को आत्मार्पण। इस तरह यम और नियम योग पथ के राही के लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्याख्या करते हैं। ये आत्म शोधन का भी काम करते हैं और अच्छे तथा सुखी जीवन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ये नींव रखने का काम करते हैं। 

आसन और प्राणायाम शारीरिक अभ्यास हैं पर इनका आध्यात्मिक महत्व भी है। आध्यात्मिक विकास की ओर उन्मुख जीवन के लिए औजार भी ठीक होना चाहिए। राह मालूम हो लक्ष्य भी ज्ञात हो पर चालक ठीक है या नहीं यह भी देखना होता है। सोद्देश्य जीवन के लिए शरीर ठीक रखना जरूरी है। यह पवित्र कर्तव्य बनता है कि शरीर को स्वस्थ रखा जाए। प्राणायाम से प्राण ऊर्जा का संचरण शरीर में स्वेच्छा से होता है, सिद्धियां भी आती हैं और मन की स्थिरता भी। 

वस्तुत: प्राणायाम और प्रत्याहार दोनों ही आंतरिक दुनिया की ओर उन्मुख होते है और इस अर्थ में पहले के तीन चरणों- यम, नियम और आसान- से भिन्न होते हैं है। प्राणायाम का अभ्यास लयात्मक स्वांस द्वारा इंद्रियों के अंदर की ओर खोजने की दिशा में चेतना को ले चलना, अंदर के अध्यात्म के गहन अनुभव की ओर अग्रसर करना संभव हो पाता है। पहले के पाँच चरणों द्वारा बाद के तीन चरणों के लिए उर्वर आधार भूमि का निर्माण करते हैं। धारणा योग का छठां चरण है। 

इसके अंतर्गत साधक अपने अवधान की एकाग्रता एक दिशा में और लम्बे समय तक बनाए रखता है। यह परमात्म तत्व पर ध्यान केंद्रित करने की तैयारी है। बिना किसी व्यवधान के निर्बाध ध्यान करना साधक को सहकार का अवसर देता है। साधक का समग्र अस्तित्व - शरीर, श्वांस, इंद्रियां, मन, बुद्धि और अहंकार, ध्यान की वस्तुझ्रसभी परमात्म तत्व के साथ एकीकृत हो जाते हैं। इस यात्रा का अंतिम पड़ाव समाधि है जिसमें परमात्म तत्व के साथ एकाकार होना होता है। 

तब अलगाव का भ्रम दूर हो जाता है और आनंद के साथ परम चेतना के साथ एकत्व का अनुभव होता है। आधुनिक युग में भारत में योग के ऊपर अध्ययन-अनुसंधान लगभग एक सदी से हो रहे हैं। पश्चिमी देशों में योग की लोकप्रियता बढ़ने के साथ मनोचिकित्सा (थेरैपी) के रूप में इसके वैज्ञानिक विश्लेषण और शोध का तेजी से प्रचलन हुआ। अब अनेक मानसिक, सांवेगिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं जैसे दुश्चिंता (ऐंजाइटी), अवसाद (डिप्रेशन), पाचन क्रिया से जुड़े रोग, हृदय रोग, अस्थमा, मधुमेह और कैंसर आदि पर योग-अभ्यास के प्रभाव जांचे समझे जा रहे हैं। 

चिकित्सा और मनोविज्ञान के अंतर्गत योग द्वारा आध्यात्मिक परिष्कार पर ध्यान नहीं दिया गया है जो जीवन के प्रति दृष्टिकोण या जीवन के अनुभव को प्रभावित करता है। योगाभ्यास करने वाले प्राय: शरीर में विश्राम, मन में एकाग्रता और हृदय में शांति का अनुभव करते हैं। योग अपने को साधने की पराकाष्ठा या चरम बिंदु तक पहुंचा देता है। परंतु मनुष्य स्वभाव से अपूर्ण होता है। 

दिव्य या परमात्म तत्व ही उसे चरम उत्कर्ष (परफेक्शन) की ओर ले जाता है। परम तत्व से संयुक्त होना ही योग का लक्ष्य हो जाता है। वेदांत के दृष्टिकोण को मानें तो मनुष्य उसी दिव्य तत्व की प्रकट अभिव्यक्ति होता है। यह मिलन वस्तुत: आत्मान्वेषण हो जाता है। स्वयं अपने भीतर और सारे जगत में दिव्यता का दर्शन ही योग का अभीष्ट होता है। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

Published / 2024-06-20 16:52:46
अष्टांग योग का मानव जीवन में महत्व : योगाचार्य महेशपाल

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस से संबंधित विशेष एबीएन हेल्थ डेस्क। भारत सहित पूरे विश्व में हर साल की भांति इस साल भी बड़े उत्साह, उमंग और हर्षोल्लास के साथ 10वा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को स्वयं और समाज के लिए योग थीम के अनुसार हम अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने जा रहे हैं, योगाचार्य महेशपाल विस्तार पूर्वक बताते है कि आंतरराष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाता है। यह दिन उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लम्बा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीर्घायु बनाता है। इसलिए 21 जून को विश्व योग दिवस मनाने के लिए चुना गया, 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। भारत के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अन्दर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो किसी प्रस्तावित दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ में पारित करने के लिए सबसे कम समय था, उसके पश्चात 21 जून 2015 को सद्भाव और शांति के लिए योग थीम के साथ 192 देशों द्वारा प्रथम बार विश्व योग दिवस मनाया गया। महिलाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को केंद्र में रखते हुए महिला सशक्तिकरण के लिए योग एवं स्वयं और समाज के लिए योग।थीम इस साल 2024 के योग दिवस की थीम बनाई गई है जिससे हमारी मातृशक्ति ,बहन बेटियां शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक रूप से सशक्त बन सकें और विभिन्न प्रकार के रोगों से अपने स्वयं का और अपने परिवार का बचाव करते हुए राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। अष्टांग योग में जीवन के सामान्य व्यवहार से लेकर ध्यान एवं समाधि-सहित अध्यात्म की उच्चतम अवस्थाओं तक का अनुपम समावेश है। जो भी व्यक्ति अपने अस्तित्व की खोज में लगा है तथा जीवन के पूर्ण सत्य को परिचित होना चाहता है, उसे अष्टांग योग का अवश्य ही पालन करना चाहिए। यम और नियम अष्टांग योग के मूल आधार हैं। अष्टांग योग का उद्देश्य सही कार्यों, ध्यान, अनुशासन और व्यायाम की मदद से किसी व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जा को उसकी बाहरी दुनिया की ऊर्जा के साथ जोड़ना है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए व्यक्तियों को अष्टांग योग के आठ अंगों का अभ्यास करने की आवश्यकता है। जैसा कि महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में यह आठ अंगों का वर्णन किया है जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि मुख्य रूप से समाहित है। यम और नियम वस्तुतः शील और तपस्या के द्योतक हैं। यम का अर्थ है संयम जो साधक के अंदर सामाजिक नैतिकता का विकास करता है, वही नियम द्वारा व्यक्तिगत नैतिकता का विकास होता है। आसन से तात्पर्य है स्थिर और सुख पूर्वक बैठने के प्रकार से (स्थिर सुखमासनम्‌) जो देहस्थिरता, शरीरिक नियंत्रण को साधता है। प्राणायाम प्राणस्थैर्य एवं मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्ति की साधना हैं, प्राणस्थैर्य और मन:स्थैर्य की मध्यवर्ती साधना का नाम प्रत्याहार, प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है। देह के किसी अंग पर (हृदय में, नासिका के अग्रभाग पर) अथवा बाह्य पदार्थ पर (जैसे इष्टदेवता की मूर्ति आदि पर) चित्त को लगाना धारणा कहलाता है, किसी एक स्थान पर या वस्तु पर निरन्तर मन स्थिर होना ही ध्यान है। ध्यान में सदृशवृत्ति का ही प्रवाह रहता है, ध्यान की परिपक्वावस्था का नाम ही समाधि है। यह चित्त की वह अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है, धारणा ध्यान समाधि का सामूहिक नाम संयम है जिसे जीतने का फल है विवेक ख्याति का आलोक या प्रकाश। समाधि के बाद प्रज्ञा का उदय होता है और यही योग का अंतिम लक्ष्य और मोक्ष प्राप्ति का साधन है। इस प्रकार हमें हमारे जीवन में अष्टांग योग का पालन करते हुए दैनिक दिनचर्या में नित्य प्रतिदिन योग करते हुए योग अनुसार आहारचर्या का पालन करते हुए निरोग और स्वस्थ पूर्वक जीवन जीते हुए समाधि की ओर आगे बढ़ जाते हैं जिससे हमारे जीवन जीने का उद्देश्य पूरा होता है, आइये हम सब मिलकर योग से अपने आप को स्वस्थ बनाकर अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाए और जीवन को सफल बनायें।

Published / 2024-06-18 21:21:22
पेट की समस्त बीमारियों का जड़ है हमारा मन : संन्यासी मुक्तरथ

एबीएन हेल्थ डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में सत्यानंद योग मिशन राजधानी के प्रमुख-प्रमुख जगहों पर योग शिविर का संचालन कर रहा है। इस कड़ी में आज होटल रेन्ड्यू, लालपुर में वृहद योग कक्षा का संचालन हुआ। जिसमें स्वामी मुक्तरथ और इनकी टीम ध्यान, प्राणायाम और योग की आवश्यक क्रियाओं को  बताये।

मुक्तरथ जी ने बताया कि 80 प्रतिशत बीमारियों का कारण हमारा मन है। सिर्फ बीस प्रतिशत बीमारियां ही शारीरिक हैं। पेट के समस्त प्रकार की बीमारियों का जड़ हमारे मन में है और उपाय ढूंढ़ते हैं शरीर में। ईलाज करते हैं पेट का। पेप्टिक अल्सर, ड्यूडिनल अल्सर, कोलाइटिस, गेस्ट्रोइंटेसटाइनल डिजीज, कॉन्स्टिपेशन, पाइल्स ये सारी बीमारियां तनाव की वजह से आती है। 

जब तक हम मन को रिलैक्स करने का उपाय नहीं करेंगे, मेडिटेशन नहीं करेंगे, प्राणायाम नहीं करेंगे। तब तक इन बीमारियों को दूर नहीं किया जा सकता है। बढ़ते कैंसर का भी बड़ा कारण तनाव है। आज इंसान को योग की बहुत ज्यादा जरूरत है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए योग से बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। 

होटल रेन्ड्यू के प्रबंधक अमित साहू ने कहा कि राजधानी में योग के प्रचार-प्रसार और शिविर लगाने में मेरा सहयोग स्वामी जी को मिलते रहेगा। योग से हमने बहुत लाभ देखा है और खुद महसूस भी किया है।

Published / 2024-06-15 23:13:00
फिर आया कोरोना का नया खतरनाक वेरिएंट

फिर सामने आया कोरोना का नया वैरिएंट, JN1 से भी खतरनाक

एबीएन हेल्थ डेस्क। अमेरिका में कोरोना के फिर से नए के मामले देखने को मिल रहे हैं। रोग नियंत्रण और रोकनाम केंद्र ने बताया है कि देश में कोविड के नये वैरिएंट (KP.3 Covid Strain) का पता चला है। इसका नाम KP.3 है। 

अमेरिका में 25 प्रतिशत से अधिक कोरोना पीड़ितों में ये पाया गया है। ये नया वैरिएंट पहले के JN.1 वैरिएंट से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है। जानकारी के मुताबिक, न्यू केपी 3 वैरिएंट ओमिक्रॉन वैरिएंट से निकला है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन केपी 3 वैरिएंट के खिलाफ कारगर साबित हो रहे हैं।

क्या है इस नये वैरिएंट के लक्षण

इस वैरिएंट के हल्के से लेकर गंभीर लक्षण हो सकते हैं। सामान्य लक्षणों में बुखार, सूखी खांसी और थकान शामिल हैं, इसके बाज जोड़ों में दर्द, सिरदर्द और गले में खराश हो सकती है। कई कोरोना पॉजिटिव पाये गये लोगों में स्वाद या गंध का खोना वायरस के विशिष्ट लक्षण हो सकते हैं। इसके अलावा उल्टी और दस्त जैसे गैस्ट्रोंइटेस्टाइनल लक्षण भी देखे गये हैं।

ऐसे करें कोविड 19 से बचाव 

  • किसी भी तरह के वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। जैसे साफ-सफाई को पूरा ध्यान रखें।
  • खांसते और छींकते समय अपने मुंह और नाक को अच्छे से ढक कर रखें।
  • मुंह और नाक से निकलने वाले ड्रॉपलेट्स को फैलने से रोकने के लिए सार्वजनिक स्थान पर मास्क का इस्तेमाल करें।
  • जितना संभव हो शारीरिक दूरी बनाये रखें और दूसरों से कम से कम 6 फीट की दूरी रखें।
  • साफ सफाई का खास ख्याल रखें और साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोते रहें।
  • बाहर के फलों और सब्जियों को अच्छे से धोकर ही बनाये और खायें।
  • वायरस के खिलाफ 60 परसेंट अल्कोहल वाले सैनिटाइजर का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।

Published / 2024-06-13 16:52:23
षटकर्म योगअभ्यास क्रिया से आंतरिक और शारीरिक शुद्धिकरण : योगाचार्य महेशपाल

एबीएन हेल्थ डेस्क। षट्कर्म शब्द की उत्पत्ति षट् और कर्म इन दो शब्दों के मेल से हुई है। इनमें षट् का अर्थ है छः (6) और कर्म का अर्थ है कार्य । इस प्रकार षट्कर्म का अर्थ हुआ छः कार्य। हां पर षट्कर्म का अर्थ ऐसे छः विशेष कर्मों से है जिनके द्वारा शरीर की शुद्धि होती है।

हठयोग में इन छः प्रकार के शुद्धि कर्मों को षट्कर्म कहते हैं। इन्हें अंग्रेजी में सिक्स बॉडी क्लींजिंग प्रोसेस कहा जाता है। योगाचार्य महेश पाल विस्तार पूर्वक बताते हैं कि महर्षि घेरण्ड ने छः षट्कर्मों को घेरण्ड संहिता में सप्तांग योग (घटस्थ योग) के पहले अंग के रूप में वर्णित किया है। 

उनका मानना है कि बिना षट्कर्म के अभ्यास के कोई भी साधक योग मार्ग में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । सबसे पहले शरीर की शुद्धि आवश्यक है। बिना शरीर की शुद्धि के योग के अन्य अंगों के पालन में साधक को आगे बढ़ने में कठिनाई होती है। इसलिए महर्षि घेरण्ड ने षट्कर्म को योग के पहले अंग के रूप में स्वीकार किया है।

स्वामी स्वात्माराम ने हठप्रदीपिका में षट्कर्म का वर्णन करते हुए कहा है कि जिन साधको के शरीर में चर्बी ( मोटापा ) और कफ अधिक है उन साधको को पहले षट्कर्मों का अभ्यास करना चाहिए। जिनमें चर्बी व मोटापा नहीं है उन योग साधकों को षट्कर्मों की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार स्वामी स्वात्माराम ने केवल चर्बी व कफ की अधिकता वालों के लिए ही षट्कर्म करने का उपदेश दिया है । 

मुख्य रूप से यह छह  कर्मों द्वारा बॉडी को डिटॉक्स किया जाता है जिनमें, धौति, बस्ति, नेति,त्राटक लौलिकी( नौलि),कपालभाति शामिल हैं धौति क्रिया से  पाचनतंत्र एवं आहार नलिका की सफाई होती है और कब्ज, अपच, अम्लता ( एसिडिटी ) व कफ रोग ठीक होते हैं, वस्ति क्रिया से उत्सर्जन तंत्र व बड़ी आँत की सफाई होती है।

कब्ज, बवासीर, भगन्दर , प्लीहा, वायु गोला, वात, पित्त व कफ से उत्पन्न रोग समाप्त होते हैं, नेति क्रिया से आँख, नाक व गले से सम्बंधित बीमारियों को ठीक होती है, नौलि क्रिया को लोकिकी भी कहा जाता है । यह उदर ( पेट ) से सम्बंधित रोगों के लिए उपयोगी होती है, त्राटक क्रिया से हमारी आँखों की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं जिससे हमारे आँखों के रोग दूर होते हैं।

कपालभाति क्रिया मस्तिष्क सम्बंधित रोगों के लिए बहुत ही लाभकारी होती है । इससे हमारे श्वसनतंत्र की शुद्धि होती है ।षट्कर्मों की हमारे जीवन में बहुत उपयोगिता है  इनके अभ्यास से हमारे सारे शरीर की शुद्धि होती है ।षट्कर्म का अभ्यास करने से पहले हमें कुछ सावधानी बरतनी चाहिए षट्कर्मों के अभ्यास से पूर्व साधक को अपने आहार की शुद्धि रखनी चाहिए । 

साधक को केवल पथ्य (सात्विक) आहार ही ग्रहण करना चाहिए। किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन नहीं लेना चाहिए । आहार का योग साधना में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। किसी बीमारी या रोग की अवस्था में पहले चिकित्सक से सुझाव लेना आवश्यक है । उसके बाद ही आप षट्कर्मों का अभ्यास करें  षट्कर्मों के अभ्यास की शुरुआत अकेले ही घर पर नहीं करनी चाहिए,इसके लिए विधिवत रूप से योग केन्द्र पर जाकर, योग गुरु से ही इनका प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए।

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