एबीएन हेल्थ डेस्क। टीकाकरण पर भारत की शीर्ष संस्था एनटीएजीआई ने कोविड-19 रोधी टीके कोविशील्ड की दूसरी खुराक पहली खुराक के आठ से 16 सप्ताह के बीच देने की सिफारिश की है। आधिकारिक सूत्रों ने रविवार को यह जानकारी दी। वर्तमान में कोविशील्ड की दूसरी खुराक राष्ट्रीय कोविड-19 टीकाकरण रणनीति के तहत पहली खुराक के 12-16 सप्ताह के बीच दी जाती है। सिफारिश अभी टीकाकरण कार्यक्रम में लागू नहीं : टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजीआई) ने अभी तक भारत बायोटेक के कोवैक्सीन की खुराक देने की अवधि में कोई बदलाव का सुझाव नहीं दिया है, जिसकी दूसरी खुराक पहली खुराक के 28 दिन बाद दी जाती है। कोविशील्ड के बारे में सिफारिश को अभी तक राष्ट्रीय कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम में लागू नहीं किया गया है। एक आधिकारिक सूत्र ने कहा, एनटीएजीआई की नवीनतम सिफारिश प्रोग्रामेटिक डेटा से प्राप्त हालिया वैश्विक वैज्ञानिक साक्ष्य पर आधारित है। सूत्र ने कहा, इसके अनुसार, जब कोविशील्ड की दूसरी खुराक आठ सप्ताह बाद दी जाती है तो उत्पन्न एंटीबॉडी प्रतिक्रिया लगभग 12 से 16 सप्ताह के अंतराल पर खुराक दिए जाने के समान होती है। सूत्र ने कहा कि कई देशों में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच इस निर्णय से शेष छह से सात करोड़ लोगों को कोविशील्ड की दूसरी खुराक मिल जाएगी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। ओमिक्रॉन के एक सब-वेरिएंट BA.2 की वजह से पूरी दुनिया में कोविड-19 के मामलों की संख्या में एक बार फिर से उछाल देखने को मिल रहा है। मौजूदा वेरिएंट पिछले वेरिएंट से अधिक संक्रामक है। बीते एक हफ्ते के दौरान पूरी दुनिया में इसकी मरीजों की संख्या रोजाना 12 फीसदी की दर से बढ़ रही है और यह 18 लाख तक पहुंच गई है। न्यूज एजेंसी AFP के मुताबिक, पश्चिमी देशों में नई मामलों की संख्या ज्यादा देखी जा रही है। दूसरी ओर, भारत में नई मामलों की संख्या कम हो रही है। शनिवार को, भारत में 3 हजार से कम कोविड केस दर्ज किए गए, ऐसा लगातार छठे दिन हुआ, जबकि दूसरे देश बढ़ते केस के कारण चिंतित हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, कोविड के 2,075 मामले सामने आए हैं जिससे देश में एक्टिव मरीजों की संख्या घटकर 28 हजार से कम हो गई है, यह अब तक के कुल मरीजों की संख्या का 0.06 फीसदी हिस्सा है। कोविड के खिलाफ सुरक्षा उपायों में ढील न बरतने का फैसला पड़ोसी देशों में कोविड के बढ़ते मामलों को देख भारत ने इस वायरस के खिलाफ सुरक्षा उपायों में ढील न बरतने का फैसला किया है। शुक्रवार को स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर कहा है कि कोविड एप्रोप्रियेट बिहेवियर का पालन करने के लिए सरकारें अपनी पांच रणनीति- टेस्ट, ट्रैक, ट्रीट, वैक्सीनेट और निर्देशों के पालन पर ध्यान देते रहें। गहन निगरानी के तहत, इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारी और गंभीर श्वसन संक्रमण वाले भर्ती किए गए मरीजों का फिर से कोरोना टेस्ट किया जाएगा और पॉजिटिव पाए जाने पर जीनोम सिक्वेंसिंग के लिए नमूने भेजे जाएंगे। क पत्र में, भूषण ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि नए वेरिएंट का सही समय पर पता लगाने के लिए INSACOG नेटवर्क को पर्याप्त संख्या में नमूने जमा किए जाएं। ILI और SARI मामलों में पर्याप्त टेस्टिंग करना सरकार के लिए कोविड के प्रबंधन के लिए काफी अहम रहा है। भूषण ने कहा है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवश्यक रूप से सभी सावधानियां बरतनी चाहिए और आर्थिक व सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ सुरक्षा उपायों का पर्याप्त ध्यान रखना है। राज्यों के लिए यह भी बहुत जरूरी है कि वे सभी लोगों को वैक्सीन लगाने के लिए प्रेरित करें। बंगलुरु के एक अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ आदित्य एस चोवटी ने बताया कि ओमिक्रॉन वेरिएंट के वजह से लोगों में इस बीमारी के खिलाफ पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है, इसलिए अभी घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने आगे कहा, क्लिनिकली देखा जाए तो ओमिक्रॉन की लहर बहुत अधिक गंभीर नहीं थी, इसके लक्षण भी गंभीर नहीं थे और इस लहर का पीक स्तर गुजर चुका है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि इस लहर से लोगों को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त हो चुकी है। एक बार किसी विशेष वेरिएंट के खिलाफ हमारे शरीर में एंटीबॉडी तैयार हो जाती है, तो इससे हमें संक्रमण से बचने में मदद मिलती है या फिर यह बहुत हद तक गंभीरता को कम कर देती है। हालांकि, यह माना जाता है कि ओमिक्रॉन दोबारा संक्रमित कर सकता है। इस पर डॉ चोवटी का कहना है कि सबसे पहले हमें भर्ती होने के मामलों को कम से कम से रखना है और मृत्यु दर को नियंत्रण में रखना है। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो मुझे नहीं लगता कि ओमिक्रॉन की वजह से भारत को डरने की जरूरत है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वैक्सीनेशन की रफ्तार और कोविड एप्रोप्रियेट बिहेवियर को बनाए रखने की जरूरत है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। महाराष्ट्र के पुणे स्थित जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स ने शुक्रवार को भारत के पहले एमआरएनए (mRNA) कोरोना वैक्सीन के दूसरे और तीसरे फेज के टेस्टिंग डेटा को ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) को सौंप दिया है। कंपनी ने एक ओमिक्रॉन स्पेसिफिक वैक्सीन भी विकसित की है, जिसका इंसानों पर प्रभावकारिता और इम्यूनोजेनेसिटी के लिए परीक्षण किया जाएगा। दरअसल,जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स कंपनी देश का पहला एमआरएनए वैक्सीन विकसित कर रही है। जिसकी जानकारी सूत्रों के हवाले से की दी है। इससे पहले भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ भार्गव ने बताया कि यह टीका भविष्य में अन्य बीमारियों के इलाज में भी उपयोगी साबित होने वाला है और भारत वैक्सीन महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। भार्गव ने अपने बयान में कहा, भारत एक वैक्सीन सुपर पावर बनने की ओर बढ़ रहा है और यह फैक्ट कि ये टीके अन्य बीमारियों के लिए उपलब्ध होने जा रहे हैं। एमआरएनए वैक्सीन की अहमियत पर नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ वीके पॉल ने कहा था कि वैक्सीन का यह एमआरएनए प्लेटफॉर्म आज कोरोना के मद्देनजर एक संपत्ति है और अन्य बीमारियों के लिए भी इससे परे है। यह मलेरिया, डेंगू या टीबी हो सकता है। ऐसी कई बीमारियां हैं जिनके लिए हम अभी भी सस्ती और प्रभावी टीकों की तलाश कर रहे हैं। बता दें कि जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स ने mRNA वैक्सीन के दूसरे और तीसरे फेज के डेटा पेश किए हैं। टीकों के बारे में सिफारिशें सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी (एसईसी) द्वारा आकलन के बाद ही आएंगी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दक्षिण पूर्व एशिया और यूरोप के कुछ हिस्सों में कोरोना वायरस के फिर से सिर उठाने का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि वे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारी और श्वसन संबंधी गंभीर संक्रमण की फिर से निगरानी शुरू करें ताकि किसी भी तरह के शुरुआती संकेत नज़रअंदाज़ नहीं हो सकें और कोविड नियंत्रण में रहे। इंफ्लूएंजा-जैसी बीमारी (आईएलआई) और श्वसन संबंधी गंभीर संक्रमण (एसएआरआई) के मामलों की जांच सरकार के लिए कोविड प्रबंधन के स्तंभ रहे हैं। बहरहाल, इसकी जांच हाल में रोक दी गई थी, क्योंकि भारत में कोविड-19 के मामले कम आ रहे हैं। निगरानी बढ़ाने के तहत आईएलआई और एसएआरआई से पीड़ित अस्पताल में भर्ती मरीजों की कोविड जांच कराई जाएगी और संक्रमित नमूनों को जीनोम अनुक्रमण के लिए भेजा जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने एक पत्र में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि कोविड के स्वरूपों का समय पर पता लगाने के लिए पर्याप्त संख्या में नमूने आईएनएसएसीओजी नेटवर्क में जमा कराएं। उन्होंने प्रोटोकॉल के अनुसार जांच जारी रखने, सभी सावधानियों का पालन करने और आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को फिर से शुरू करते समय सतर्कता नहीं छोड़ने पर भी जोर दिया। भूषण ने पत्र में कहा कि अगर मामलों के नए कलस्टर उभर रहे हैं तो प्रभावी निगरानी की जाए और आईएलआई एवं एसएआरआई मामलों की नियमों के तहत जांच की जाए और उनपर नजर रखी जाए ताकि किसी भी तरह के शुरुआती संकेत नज़रअंदाज़ न हों और कोविड संक्रमण का प्रसार नियंत्रण में रहे। कोविड-उपयुक्त व्यवहार का पालन कराना चाहिए : उन्होंने कहा कि राज्य मशीनरी को आवश्यक जागरूकता पैदा करनी चाहिए और कोविड-उपयुक्त व्यवहार का पालन सुनिश्चित कराना चाहिए। भूषण ने पत्र में कहा दक्षिण पूर्व एशिया और यूरोप के कुछ देशों में कोविड-19 मामलों में बढ़ोतरी होने के मद्देनजर 16 मार्च को स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई, जिसमें राज्यों को नमूनों का जीनोम अनुक्रमण कराने और कोविड की स्थिति की गहन निगरानी पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी गई।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना की प्रीकॉशन डोज को लेकर अहम जानकारी साझा की है। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने ऐलान किया है कि 12-14 आयु वर्ग के बच्चों का टीकाकरण 16 मार्च 2022 से शुरू होगा। स्वास्थ्य सचिव आज मद्देनजर सभी राज्यों के साथ बात करेंगे। उन्होंने इस मामले में सभी राज्यों के मुख्य सचिव को पत्र लिखा है। उन्होंने पत्र में टीकाकरण की जानकारी देते हुए कहा कि केवल कॉर्बेवैक्स वैक्सीन का उपयोग 12-14 वर्ष के आयु वर्ग के लाभार्थियों के लिए किया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि प्रीकॉशन डोज अब 60 से अधिक आयु वर्ग के लोगों को प्रदान की जा सकती है। उन्होंने कहा कि इस खुराक की प्राथमिकता और अनुक्रमण दूसरी खुराक की तारीख से 9 महीने पूरे होने पर आधारित होगा। प्रीकॉशन डोज का टीकाकरण उसी टीके से होना चाहिए, जिससे पहला टीकाकरण किया गया था। समाचार एजेंसी पीटीआई ने सोमवार को एक रिपोर्ट में कहा कि टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजीआई) ने हैदराबाद स्थित बायोलॉजिकल ई को 12-14 वर्ष आयु वर्ग के लोगों को इसके कॉर्बेवैक्स वैक्सीन लगाने के लिए अपनी सिफारिश दी है। यानी भारत में 12 से 14 आयु वर्ग के बच्चों को बायोलॉजिकल ई का कॉर्बेवैक्स टीका दिया जाएगा। 3 जनवरी से हुई टीकाकरण की शुरुआत देश में 3 जनवरी, 2022 से पहली बार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कोरोना वैक्सीन लगाने का अभियान शुरू हुआ था। तब से 15 से 18 वर्ष के बच्चों को टीके लगाए जा रहे हैं। इस कारण बड़े बच्चों के स्कूल खोलने में भी आसानी हुई। अब 12 वर्ष के बच्चों को भी टीका लगाने से छोटे बच्चों को भी स्कूल भेजने में कोई हिचक नहीं रहेगी। जिन बच्चों का जन्म वर्ष 2008, 2009 या 2010 में हुआ है, उन्हें टीके लगाए जाएंगे। देश में 18 साल से कम उम्र के लोगों के लिए उपलब्ध यह कोरोनारोधी चौथा टीका होगा।
एबीएन सेट्रल डेस्क7 उत्तर प्रदेश सरकार ने 16 मार्च से 12 से 14 आयु वर्ग के बच्चों का कोविड टीकाकरण और 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के बुजुर्गो को कोविड प्रिकाशन डोज दिए जाने का फैसला किया है। आधिकारिक प्रवक्ता ने सोमवार को बताया कि आगामी 16 मार्च से 12-14 आयु वर्ग के बच्चों का कोविड टीकाकरण और 60 वर्ष अथवा उससे अधिक उम्र के बुजुर्गो को कोविड प्रिकॉशन डोज की सुविधा प्रारंभ होने जा रही है। गौरतलब है कि इससे पहले तीन जनवरी को 15 से 18 साल के बच्चों के टीकाकरण अभियान शुरू किया गया था। प्रदेश में पिछले सप्ताह के अंत तक 29 करोड़ 43 लाख 9 हजार 712 कोरोना वैक्सीन की डोज दी जा चुकी थी जिनमें 18 वर्ष से अधिक लोंगों को 15,24,48,057 पहली डोज तथा 12,03,96,024 को दूसरी डोज दी गयी थी। इसके अलावा 15 से 18 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों को 1,28,78,493 पहली डोज तथा 62,53,011 डोज दी गयी वहीं 23 लाख 34 हजार 127 प्रीकॉशन डोज दी गयी है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। भारत के दवा नियामक ने सीरम इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया के कोविड-19 वैक्सीन कोवोवैक्स को कुछ शर्तों के तहत 12-17 वर्ष आयु वर्ग के लिए सीमित आपातकालीन उपयोग की अनुमति दी है। यह 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों के बीच उपयोग के लिए नियामक की अनुमति हासिल करने वाला चौथा टीका है। ड्रग्स कंट्रोलर जनरल आॅफ इंडिया (डीसीजीआई) की मंजूरी पिछले सप्ताह सीडीएससीओ की कोविड-19 पर विषय विशेषज्ञ समिति द्वारा 12 से 17 वर्ष की आयु के लोगों के लिए कोवोवैक्स को आपातकालीन उपयोग अनुमति देने की सिफारिश के बाद आई है। 2707 बच्चों पर एसआईआई का अध्ययन : सरकार ने अभी तक 15 साल से कम उम्र वाले किशोरों को टीका लगाने पर कोई फैसला नहीं लिया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने लगातार कहा है कि टीकाकरण की जरूरत और टीकाकरण अभियान में और लोगों को शामिल करने की लगातार समीक्षा की जाती है। 21 फरवरी को एसआईआई में निदेशक (सरकारी और नियामक मामलों) प्रकाश कुमार सिंह ने डीसीजीआई को ईयूए आवेदन में कहा था कि 12 से 17 वर्ष की आयु के लगभग 2707 बच्चों पर दो अध्ययनों से पता चलता है कि कोवोवैक्स अत्यधिक प्रभावकारी, प्रतिरक्षात्मक और सुरक्षित है। एक आधिकारिक सूत्र ने बताया कि सिंह ने अपने आवेदन कहा है- यह अनुमोदन न केवल हमारे देश के लिए फायदेमंद होगा, बल्कि पूरे विश्व को लाभान्वित करेगा। साथ ही हमारे प्रधानमंत्री के मेकिंग इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड के दृष्टिकोण को भी पूरा करेगा। हमारे सीईओ डॉ अदार सी पूनावाला के दर्शन के अनुरूप, मुझे यकीन है कि कोवोवैक्स हमारे देश और दुनिया के बच्चों को बड़े पैमाने पर कोविड-19 से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और हमारे राष्ट्रीय ध्वज को विश्व स्तर पर ऊंचा रखेगा। कोवोवैक्स को व्यस्कों में आपातकालीन उपयोग की मंजूरी मिली थी : डीसीजीआई ने पहले ही 28 दिसंबर को वयस्कों में आपातकालीन स्थितियों में सीमित उपयोग के लिए कोवोवैक्स को मंजूरी दे दी है। इसे अभी तक देश के टीकाकरण अभियान में शामिल नहीं किया गया है। डीसीजीआई ने 21 फरवरी को कुछ शर्तों के तहत 12 से 18 वर्ष से कम आयु वर्ग के लिए बायोलॉजिकल ई के कोविड-19 वैक्सीन कोबेर्वैक्स के सीमित उपयोग की अनुमति दी थी। कोवोवैक्स, नोवावैक्स से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण द्वारा निर्मित है और सशर्त विपणन अनुमति के लिए यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी द्वारा अनुमोदित है। दिसंबर 2017 को डब्ल्यूएचओ द्वारा आपातकालीन उपयोग सूची भी प्रदान की गई है। देश में भारत बायोटेक के कोवाक्सिन का उपयोग 15-18 वर्ष के बीच के किशोरों का टीकाकरण करने के लिए किया जा रहा है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। जब भी हेल्दी खाने की बात होती है तो सबसे पहले नाम दलिया का आता है। दलिया खाने में काफी फायदेमंद माना जाता है और मैदा को खाने से मना किया जाता है। लेकिन, कभी आपने सोचा है कि आखिर दलिया और मैदा गेहूं से ही बनाए जाते हैं, लेकिन दोनों में इतना अंतर क्यों होता है। एक फायदेमंद है तो एक को खाने से मना किया जाता है। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों है। कैसे बनते हैं दलिया और मैदा? दलिया भी गेहूं से बनता है और दलिया बनाने के लिए पहले गेहूं को पीसा जाता है। लेकिन, दलिया बनाते वक्त पूरी तरह से पीसा नहीं जाता है, छोटे-छोटे टुकड़े ही किए जाते हैं। अगर इसे ज्यादा बारीक पीस दिया जाए तो ये आटा बन जाता है। दलिया एक तरीके से गेहूं की किनकी है, जैसे चावल की होती है और यह टूटे हुए चावल होते हैं। वहीं, मैदा भी गेहूं से बनाया जाता है और इसकी प्रक्रिया अलग होती है। मैदा बनाने के लिए सबसे पहले मील में सभी गेहूं के दाने की ऊपरी परत निकलकर अलग हो जाती है। इस ऊपरी परत को हटाकर सफेद वाले हिस्से का काफी बारीक पिसा जाता है। यह पूरी तरह सफेद होता है और इसे पिसने के बाद 80 जाल प्रति इंच वाली चलनी से छाना जाता है और इसे एकदम बारीक कर दिया जाता है। छिलके हटने से यह हल्का पीला भी नहीं होता है और एकदम सफेद होता है गुणों में क्यों है अलग? दलिया और मैदा में इसलिए अलग अलग गुण होते हैं, क्योंकि दलिया सीधे गेहूं से पीसा जाता है। इससे इसके पोषक तत्व इसी में रहते हैं और यह काफी लाभदायक होता है। वहीं मैदा को बनाने में छिलके हटाया जाए हैं और गेंहू के इन छिलकों में ही सबसे ज्यादा पोषक तत्व पाए जाते हैं। ऐसे में मैदा में ये पोषक तत्व नहीं होते हैं और सफेद हिस्से में स्टार्च आदि होने से यह शरीर के लिए नुकसान दायक होते हैं। इसलिए मैदा को हेल्थ के लिए नुकसान दायक माना जाता है और इसे ना खाने की सलाह दी जाती है।
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