एबीएन सेंट्रल डेस्क। निपाह से लेकर कोरोना वायरस तक के संक्रमण फैलने में चमगादड़ की अहम भूमिका रही है। दुनियाभर के वैज्ञानिकों अपनी रिसर्च में इसकी पुष्टि भी की है। चमगादड़ से फैलने वाले ज्यादातर वायरस की शुरूआत एशियाई देशों से ही हुई है। चिंता की बात यह है कि एशिया में 40 फीसदी ऐसे चमगादड़ हैं जिनके बारे में वैज्ञानिक भी अंजान हैं। यह दावा चाइनीज एकेडमी आॅफ साइंस और हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी की रिसर्च में किया गया है। जानिए, इसके खतरे क्या हैं : ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, साउथ-ईस्ट एशिया और चीन में हॉर्सशू चमगादड़ की 40 फीसदी प्रजाति का ब्योरा वैज्ञानिक रिकॉर्ड में भी नहीं है। यह चमगादड़ की ऐसी प्रजाति है, जिनसे वायरस का संक्रमण फैलने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इनमें वायरस लम्बे समय तक बना रहा है। भविष्य में ऐसी अंजान प्रजाति से नए वायरस का संक्रमण फैल सकता है। हॉर्सशू चमगादड़ से इंसानों में फैलने वाली बीमारी को जूनोटिक डिजीज कहते हैं। खास बात यह भी है कि इनके जरिए फैलने वाली ज्यादातर बीमारियों का अब तक कोई सटीक इलाज नहीं खोजा सका है। इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के 40 फीसदी चमगादड़ों की जानकारी रिकॉर्ड में न होना चिंताजनक है।कोरोनावायरस भी चमगादड़ से इंसानों में पहुंचा था। कई रिसर्च रिपोर्ट में यही दावा किया गया था। चीन के वुहान इंस्टीट्यूट आॅफ वायरोलॉजी के वायरस विशेषज्ञ शी झेंगली का कहना है, हॉर्सशू चमगादड़ की अंजान प्रजातियों को पहचान लिया जाता है तो भविष्य में इनके जरिए फैलने वाली बीमारियों का रिस्क कम करने में मदद मिल सकती है। इतना ही नहीं, कोरोनावायरस की उत्पत्ति के बारे में भी अहम जानकारी मिल सकती है। हॉन्ग-कॉन्ग यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता एलिस के मुताबिक, कोरोना वायरस का कनेक्शन भी चीन के दक्षिण-पश्चिम इलाके के यून्नान प्रांत में पाए जाने वाले हॉर्सशू चमगादड़ से मिला है। हॉर्सशू चमगादड़ की मुख्य 11 प्रजाति हैं, इनसे ही इनकी ऐसी-ऐसी नई प्रजातियों का जन्म हुआ है, जिनके बारे में वैज्ञानिकों को अधिक जानकारी नहीं है। इनका पता लगाने की कोशिश जारी है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश की आम जनता पहले से ही महंगाई के बोझ के तले दबी हुई है और उस पर कच्चे तेल में तेजी के चलते पेट्रोल-डीजल के रोज बढ़ रहे दामों ने इस बोझ को और भी बढ़ा दिया है। बीते सात दिनों में छह दिन पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े हैं और इससे माल ढुलाई भी बढ़ गई है। इस बीच आम जनता पर एक अप्रैल यानी चार दिन बाद स्वास्थ्य के मोर्चे पर महंगाई का एक और बम फूटने वाला है। दरअसल, 800 दवाएं महंगी होने जा रही हैं। 10.76 फीसदी बढ़ जाएंगे दाम : गौरतलब है कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने बीते दिनों दवाओं के दाम बढ़ाने को अनुमति दी है। इसके तहत दर्द निवारक व विभिन्न संक्रमणों और हृदय, किडनी, अस्थमा से संबंधित मरीजों को दी जाने वालीं करीब 800 आवश्यक दवाएं नए वित्त वर्ष में 10.76 फीसदी तक महंगी हो जाएंगी। ये बढ़ी हुई दरें एक अप्रैल 2022 से लागू हो जाएंगी। बता दें कि मरीजों के लिए उपयोगी ये दवाएं राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (एनएलईएम) के तहत मूल्य नियंत्रण में रखी जाती हैं। एनपीपीए की संयुक्त निदेशक रश्मि तहिलियानी के अनुसार, उद्योग प्रोत्साहन घरेलू व्यापार विभाग के आर्थिक सलाहकार कार्यालय ने सालाना 10.76 फीसदी वृद्धि की अनुमति दी है। पहली बार इतनी मूल्य वृद्धि : हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि सूचीबद्ध दवाओं की मूल्यवृद्धि पर हर वर्ष अनुमति दी जाती है। लेकिन इस बार होने वाली मूल्य वृद्धि अब तक की सबसे अधिक है। विशेषज्ञों ने कहा है कि ऐसा पहली बार है कि सूचीबद्ध दवाओं को सूची से बाहर की दवाओं से ज्यादा महंगा करने की अनुमति दी गई है। अब तक मूल्य वृद्धि की बात करें तो इनमें प्रति वर्ष के हिसाब से एक से दो फीसदी बढ़ोतरी की जाती थी। इससे पहले साल 2019 में एनपीपीए ने दवाओं की कीमतों में दो फीसदी और इसके बाद साल 2020 में दवाओं के दाम में 0.5 फीसदी की वृद्धि करने की अनुमति दी थी। इन प्रमुख दवाओं पर असर : जिन दवाओं के दाम में इजाफा होने वाला है उनमें सबसे आम उपयोग में लाई जाने वाली पैरासिटामोल भी शामिल है। इसके अलावा एजिथ्रोमाइसिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन हाइड्रोक्लोराइड, मेट्रोनिडाजोल, फेनोबार्बिटोने जैसी दवाएं भी इस सूची में हैं। इसके अलावा कोरोना के इलाज में इस्तेमाल की जानें वाली दवाइयों के अलावा कई विटामिन, खून बढ़ाने वाली दवाएं, मिनरल को भी इसमें रखा गया है। कुल मिलाकर 30 श्रेणियों में 376 दवाएं रखी गई हैं। ये बुखार, संक्रमण, त्वचा व हृदय रोग, एनीमिया, किडनी रोगों, डायबिटीज व बीपी की दवाएं हैं। एंटी एलर्जिक, विषरोधी, खून पतला करने, कुष्ठ रोग, टीबी, माइग्रेन, पार्किंसन, डिमेंशिया, साइकोथेरैपी, हार्मोन, उदर रोग की दवाएं भी शामिल हैं। कच्चा माल महंगा होने का असर : रिपोर्ट के मुताबिक, देश में इस्तोमाल होने वाली कुल दवाओं के 16 फीसदी पर इस मूल्य वृद्धि का असर दिखाई देने वाला है। गौरतलब है कि फार्मा सेक्टर ने अपनी व्यथा उजागर करते हुए गैर-सूचीबद्ध दवाओं के दाम में भी 20 फीसदी तक इजाफा करने की मांग की है। उन्होंने अपना तर्क रखते हुए कहा है कि दवाओं के कच्चे माल की कीमत 15 से 150 प्रतिशत तक बढ़ी हैं। सिरप, ओरल ड्रॉप्स, संक्रमण में उपयोगी प्रोपलीन ग्लाइकोल, ग्लिसरीन, सॉल्वेंट के दाम 250 प्रतिशत तक बढ़े। परिवहन, पैकेजिंग, रखरखाव भी महंगा हुआ है। ऐसे में दवाओं का दाम न बढ़ने से उन्हें भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करार पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि भारत की पारंपरिक दवाएं और स्वास्थ्य पद्धतियां विश्व स्तर पर बहुत लोकप्रिय हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन सेंटर हमारे समाज में तंदुरुस्ती बढ़ाने में काफी मदद करेगा। पारंपरिक चिकित्सा को लेकर भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ एक बड़ा कदम आगे बढ़ाया है। आयुष मंत्रालय ने कल गुजरात के जामनगर में भारत में पारंपरिक चिकित्सा के लिए डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर की स्थापना के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किया है। इस समझौते से उत्साहित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह WHO सेंटर हमारे समाज में तंदुरुस्ती बढ़ाने में काफी मदद करेगा। पीएम मोदी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के ट्विटर हैंडल को टैग करते हुए कहा कि भारत की पारंपरिक दवाएं और स्वास्थ्य पद्धतियां विश्व स्तर पर बहुत लोकप्रिय हैं। यह WHO सेंटर हमारे समाज में तंदुरुस्ती बढ़ाने में काफी मदद करेगा। गुजरात के जामनगर में स्थापित होगा WHO ग्लोबल सेंटर : इससे पहले आयुष मंत्रालय ने कल गुजरात के जामनगर में भारत में पारंपरिक चिकित्सा के लिए WHO ग्लोबल सेंटर की स्थापना को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मेजबान देश समझौते पर हस्ताक्षर किया है, जिसका अंतरिम कार्यालय गुजरात में द इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेनिंग एंड रिसर्च इन आयुर्वेद में स्थित है। आयुष मंत्रालय ने यह भी बताया कि जीसीटीएम का प्राथमिक उद्देश्य आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से दुनिया भर से पारंपरिक चिकित्सा की क्षमता का दोहन करना और दुनिया भर के समुदायों के समग्र स्वास्थ्य में सुधार करना है। समझौते को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कल शुक्रवार को ट्वीट कर बताया कि डब्ल्यूएचओ और भारत सरकार ने आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से पारंपरिक दवाओं की क्षमता को अधिकतम स्तर तक करने के लिए डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की है। 170 देशों में जारी है पारंपरिक चिकित्सा : विश्व स्वास्थ्य संगठन की वेबसाइट के अनुसार, डब्ल्यूएचओ और भारत सरकार ने पारंपरिक चिकित्सा के लिए डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर स्थापित करने को लेकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। पारंपरिक चिकित्सा के लिए यह वैश्विक ज्ञान केंद्र, भारत सरकार से 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश द्वारा समर्थित है, जिसका उद्देश्य लोगों और धरती के स्वास्थ्य में सुधार के लिए आधुनिक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के माध्यम से दुनिया भर से पारंपरिक चिकित्सा की क्षमता का दोहन करना है। दुनिया की लगभग 80% आबादी पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करती है। अब तक WHO के 194 सदस्य देशों में से 170 ने पारंपरिक चिकित्सा के इस्तेमाल की सूचना दी है और उनकी सरकारों ने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों तथा उत्पादों पर विश्वसनीय साक्ष्य व डेटा का एक निकाय बनाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन का समर्थन किया है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। नोवोवैक्स और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने भारत में 12-18 साल की उम्र के किशोरों के लिए अपने कोरोना वैक्सीन के पहले आपातकालीन उपयोग की मंजूरी की घोषणा की है। नोवोवैक्स द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, वैक्सीन को NVX-CoV2373 के रूप में भी जाना जाता है। वहीं भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा इसे कोवोवैक्स नाम के तहत निर्मित किया जा रहा है। यह पहला प्रोटीन-आधारित वैक्सीन है जो भारत में 12-18 आयु वर्ग में उपयोग के लिए अधिकृत किया गया है। नोवावैक्स के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टेनली सी एर्क ने कहा कि हमें किशोरों के लिए इस वैक्सीन की पहली मंजूरी मिलने पर गर्व है। सीरम इंस्टिट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा कि भारत में टीकाकरण को मजबूत करने की दिशा में यह और बड़ा मील का पत्थर है। पिछले महीने वैक्सीन का आखिरी चरण का ट्रायल किया गया था। नोवोवैक्स ने कहा था कि कोरोना वायरस के खिलाफ उसकी वैक्सीन 80 फीसदी प्रभावी है। टेस्टिंग के दौरान वैक्सीन ने बेहतर इम्यून प्रतिक्रिया दी थी। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने कंपनी को आपात स्थिति में वैक्सीन के इस्तेमाल की अनुमति दी है। इससे पहले कोर्बीवैक्स, जाइडस कैडिला की ZyCoV-D और भारत बायोटेक की कोवाक्सिन को अनुमति दी जा चुकी है। बता दें कि DCGI ने पहले ही 28 दिसंबर को 18 साल और उससे अधिक उम्र के वयस्कों के लिए कोवोवैक्स के आपातकालीन उपयोग को मंजूरी दी थी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। टीकाकरण पर भारत की शीर्ष संस्था एनटीएजीआई ने कोविड-19 रोधी टीके कोविशील्ड की दूसरी खुराक पहली खुराक के आठ से 16 सप्ताह के बीच देने की सिफारिश की है। आधिकारिक सूत्रों ने रविवार को यह जानकारी दी। वर्तमान में कोविशील्ड की दूसरी खुराक राष्ट्रीय कोविड-19 टीकाकरण रणनीति के तहत पहली खुराक के 12-16 सप्ताह के बीच दी जाती है। सिफारिश अभी टीकाकरण कार्यक्रम में लागू नहीं : टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजीआई) ने अभी तक भारत बायोटेक के कोवैक्सीन की खुराक देने की अवधि में कोई बदलाव का सुझाव नहीं दिया है, जिसकी दूसरी खुराक पहली खुराक के 28 दिन बाद दी जाती है। कोविशील्ड के बारे में सिफारिश को अभी तक राष्ट्रीय कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम में लागू नहीं किया गया है। एक आधिकारिक सूत्र ने कहा, एनटीएजीआई की नवीनतम सिफारिश प्रोग्रामेटिक डेटा से प्राप्त हालिया वैश्विक वैज्ञानिक साक्ष्य पर आधारित है। सूत्र ने कहा, इसके अनुसार, जब कोविशील्ड की दूसरी खुराक आठ सप्ताह बाद दी जाती है तो उत्पन्न एंटीबॉडी प्रतिक्रिया लगभग 12 से 16 सप्ताह के अंतराल पर खुराक दिए जाने के समान होती है। सूत्र ने कहा कि कई देशों में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच इस निर्णय से शेष छह से सात करोड़ लोगों को कोविशील्ड की दूसरी खुराक मिल जाएगी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। ओमिक्रॉन के एक सब-वेरिएंट BA.2 की वजह से पूरी दुनिया में कोविड-19 के मामलों की संख्या में एक बार फिर से उछाल देखने को मिल रहा है। मौजूदा वेरिएंट पिछले वेरिएंट से अधिक संक्रामक है। बीते एक हफ्ते के दौरान पूरी दुनिया में इसकी मरीजों की संख्या रोजाना 12 फीसदी की दर से बढ़ रही है और यह 18 लाख तक पहुंच गई है। न्यूज एजेंसी AFP के मुताबिक, पश्चिमी देशों में नई मामलों की संख्या ज्यादा देखी जा रही है। दूसरी ओर, भारत में नई मामलों की संख्या कम हो रही है। शनिवार को, भारत में 3 हजार से कम कोविड केस दर्ज किए गए, ऐसा लगातार छठे दिन हुआ, जबकि दूसरे देश बढ़ते केस के कारण चिंतित हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, कोविड के 2,075 मामले सामने आए हैं जिससे देश में एक्टिव मरीजों की संख्या घटकर 28 हजार से कम हो गई है, यह अब तक के कुल मरीजों की संख्या का 0.06 फीसदी हिस्सा है। कोविड के खिलाफ सुरक्षा उपायों में ढील न बरतने का फैसला पड़ोसी देशों में कोविड के बढ़ते मामलों को देख भारत ने इस वायरस के खिलाफ सुरक्षा उपायों में ढील न बरतने का फैसला किया है। शुक्रवार को स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर कहा है कि कोविड एप्रोप्रियेट बिहेवियर का पालन करने के लिए सरकारें अपनी पांच रणनीति- टेस्ट, ट्रैक, ट्रीट, वैक्सीनेट और निर्देशों के पालन पर ध्यान देते रहें। गहन निगरानी के तहत, इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारी और गंभीर श्वसन संक्रमण वाले भर्ती किए गए मरीजों का फिर से कोरोना टेस्ट किया जाएगा और पॉजिटिव पाए जाने पर जीनोम सिक्वेंसिंग के लिए नमूने भेजे जाएंगे। क पत्र में, भूषण ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि नए वेरिएंट का सही समय पर पता लगाने के लिए INSACOG नेटवर्क को पर्याप्त संख्या में नमूने जमा किए जाएं। ILI और SARI मामलों में पर्याप्त टेस्टिंग करना सरकार के लिए कोविड के प्रबंधन के लिए काफी अहम रहा है। भूषण ने कहा है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवश्यक रूप से सभी सावधानियां बरतनी चाहिए और आर्थिक व सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ सुरक्षा उपायों का पर्याप्त ध्यान रखना है। राज्यों के लिए यह भी बहुत जरूरी है कि वे सभी लोगों को वैक्सीन लगाने के लिए प्रेरित करें। बंगलुरु के एक अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ आदित्य एस चोवटी ने बताया कि ओमिक्रॉन वेरिएंट के वजह से लोगों में इस बीमारी के खिलाफ पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है, इसलिए अभी घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने आगे कहा, क्लिनिकली देखा जाए तो ओमिक्रॉन की लहर बहुत अधिक गंभीर नहीं थी, इसके लक्षण भी गंभीर नहीं थे और इस लहर का पीक स्तर गुजर चुका है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि इस लहर से लोगों को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त हो चुकी है। एक बार किसी विशेष वेरिएंट के खिलाफ हमारे शरीर में एंटीबॉडी तैयार हो जाती है, तो इससे हमें संक्रमण से बचने में मदद मिलती है या फिर यह बहुत हद तक गंभीरता को कम कर देती है। हालांकि, यह माना जाता है कि ओमिक्रॉन दोबारा संक्रमित कर सकता है। इस पर डॉ चोवटी का कहना है कि सबसे पहले हमें भर्ती होने के मामलों को कम से कम से रखना है और मृत्यु दर को नियंत्रण में रखना है। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो मुझे नहीं लगता कि ओमिक्रॉन की वजह से भारत को डरने की जरूरत है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वैक्सीनेशन की रफ्तार और कोविड एप्रोप्रियेट बिहेवियर को बनाए रखने की जरूरत है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। महाराष्ट्र के पुणे स्थित जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स ने शुक्रवार को भारत के पहले एमआरएनए (mRNA) कोरोना वैक्सीन के दूसरे और तीसरे फेज के टेस्टिंग डेटा को ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) को सौंप दिया है। कंपनी ने एक ओमिक्रॉन स्पेसिफिक वैक्सीन भी विकसित की है, जिसका इंसानों पर प्रभावकारिता और इम्यूनोजेनेसिटी के लिए परीक्षण किया जाएगा। दरअसल,जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स कंपनी देश का पहला एमआरएनए वैक्सीन विकसित कर रही है। जिसकी जानकारी सूत्रों के हवाले से की दी है। इससे पहले भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ भार्गव ने बताया कि यह टीका भविष्य में अन्य बीमारियों के इलाज में भी उपयोगी साबित होने वाला है और भारत वैक्सीन महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। भार्गव ने अपने बयान में कहा, भारत एक वैक्सीन सुपर पावर बनने की ओर बढ़ रहा है और यह फैक्ट कि ये टीके अन्य बीमारियों के लिए उपलब्ध होने जा रहे हैं। एमआरएनए वैक्सीन की अहमियत पर नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ वीके पॉल ने कहा था कि वैक्सीन का यह एमआरएनए प्लेटफॉर्म आज कोरोना के मद्देनजर एक संपत्ति है और अन्य बीमारियों के लिए भी इससे परे है। यह मलेरिया, डेंगू या टीबी हो सकता है। ऐसी कई बीमारियां हैं जिनके लिए हम अभी भी सस्ती और प्रभावी टीकों की तलाश कर रहे हैं। बता दें कि जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स ने mRNA वैक्सीन के दूसरे और तीसरे फेज के डेटा पेश किए हैं। टीकों के बारे में सिफारिशें सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी (एसईसी) द्वारा आकलन के बाद ही आएंगी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दक्षिण पूर्व एशिया और यूरोप के कुछ हिस्सों में कोरोना वायरस के फिर से सिर उठाने का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि वे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारी और श्वसन संबंधी गंभीर संक्रमण की फिर से निगरानी शुरू करें ताकि किसी भी तरह के शुरुआती संकेत नज़रअंदाज़ नहीं हो सकें और कोविड नियंत्रण में रहे। इंफ्लूएंजा-जैसी बीमारी (आईएलआई) और श्वसन संबंधी गंभीर संक्रमण (एसएआरआई) के मामलों की जांच सरकार के लिए कोविड प्रबंधन के स्तंभ रहे हैं। बहरहाल, इसकी जांच हाल में रोक दी गई थी, क्योंकि भारत में कोविड-19 के मामले कम आ रहे हैं। निगरानी बढ़ाने के तहत आईएलआई और एसएआरआई से पीड़ित अस्पताल में भर्ती मरीजों की कोविड जांच कराई जाएगी और संक्रमित नमूनों को जीनोम अनुक्रमण के लिए भेजा जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने एक पत्र में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि कोविड के स्वरूपों का समय पर पता लगाने के लिए पर्याप्त संख्या में नमूने आईएनएसएसीओजी नेटवर्क में जमा कराएं। उन्होंने प्रोटोकॉल के अनुसार जांच जारी रखने, सभी सावधानियों का पालन करने और आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को फिर से शुरू करते समय सतर्कता नहीं छोड़ने पर भी जोर दिया। भूषण ने पत्र में कहा कि अगर मामलों के नए कलस्टर उभर रहे हैं तो प्रभावी निगरानी की जाए और आईएलआई एवं एसएआरआई मामलों की नियमों के तहत जांच की जाए और उनपर नजर रखी जाए ताकि किसी भी तरह के शुरुआती संकेत नज़रअंदाज़ न हों और कोविड संक्रमण का प्रसार नियंत्रण में रहे। कोविड-उपयुक्त व्यवहार का पालन कराना चाहिए : उन्होंने कहा कि राज्य मशीनरी को आवश्यक जागरूकता पैदा करनी चाहिए और कोविड-उपयुक्त व्यवहार का पालन सुनिश्चित कराना चाहिए। भूषण ने पत्र में कहा दक्षिण पूर्व एशिया और यूरोप के कुछ देशों में कोविड-19 मामलों में बढ़ोतरी होने के मद्देनजर 16 मार्च को स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई, जिसमें राज्यों को नमूनों का जीनोम अनुक्रमण कराने और कोविड की स्थिति की गहन निगरानी पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी गई।
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