एबीएन हेल्थ डेस्क। ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) ने मंगलवार को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के कोविड -19 वैक्सीन कोवोवैक्स (Covovax) को 7-11 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मंजूरी दे दी है। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, डीसीजीआई ने इस उम्र के बच्चों के लिए आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी दी है। डीसीजीआई ने पिछले साल 28 दिसंबर 2021 को वयस्कों के लिए कोवोवैक्स को मंजूरी दी थी। 12-17 साल की आयु के बच्चों के लिए 9 मार्च 2022 को मंजूरी दी थी। कोवोवैक्स एक प्रोटीन आधारित कोविड-19 वैक्सीन है, जिसका निर्माण सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने नोवावैक्स के लाइसेंस के तहत किया गया है और यह Covax सुविधा का हिस्सा है। कोवोवैक्स एसआईआई द्वारा निर्मित दूसरा कोविड-19 वैक्सीन है, जो कोविशील्ड भी बनाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले साल दिसंबर में Covovax की आपातकालीन उपयोग के लिए मंजूरी दी थी। कोवोवैक्स दो खुराक वाली वैक्सीन है। इसे 2 से 8 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किया जा सकता है। SII के अनुसार Covovax की प्रभावकारिता 90 प्रतिशत है। फिलहाल कोवोवैक्स की कीमत 225 रुपये है। भारत के दवा नियामक ने पहले ही 6-12 साल की उम्र के बच्चों के लिए भारत बायोटेक के कोवैक्सिन, 5-12 साल के बच्चों के लिए बायोलॉजिकल ई के कोविड -19 वैक्सीन कॉर्बेवैक्स और 12 साल से अधिक उम्र के बच्चों के लिए ZycovD (ज़ाइडस कैडिला वैक्सीन) को मंजूरी दे दी है। सरकार ने 16 मार्च से 12-14 वर्ष की आयु के बच्चों का टीकाकरण शुरू किया। 15-18 वर्ष की आयु के किशोरों के लिए टीकाकरण 3 जनवरी से शुरू हुआ।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दक्षिणी चीन में एक फ्लू के प्रकोप की वजह से दवाओं की कमी हो गई है, जिसके बाद डॉक्टरों ने इन्फ्लूएंजा और कोविड-19 के दोहरे स्वास्थ्य जोखिमों की चेतावनी दी है। एक सरकारी मीडिया रिपोर्ट में सोमवार को यह जानकारी दी गई। ग्लोबल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों ने कहा कि लॉकडाउन सहित लगातार कोविड-19 की रोकथाम के उपायों के कारण कमजोर सामूहिक रोग प्रतिरोधक शक्ति (हर्ड इम्युनिटी) आंशिक रूप से इन्फ्लूएंजा मामलों के असामान्य तरीके से बढ़ने के लिए जिम्मेदार हो सकती है। डॉक्टरों और विशेषज्ञों का कहना है कि यह चिंताजनक है कि इन्फ्लूएंजा से पीड़ित लोगों की संख्या सर्दियों के मुकाबले काफी अधिक है, जो आमतौर पर तब होती है जब संक्रमण ज्यादा तेजी से फैलता है। ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक चाइनीज नेशनल इन्फ्लुएंजा सेंटर (सीएनआईसी) की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है, 4 अप्रैल से 19 जून के बीच 17 प्रांतों में इन्फ्लूएंजा के 507 मामलों में, 503 दक्षिणी चीन में थे, जो 2021 में 136 मामलों की तुलना में काफी ज्यादा है। जब फ्लू से पीड़ितों की तादाद 10 या अधिक हो जाती है, तो उसे इन्फ्लूएंजा के प्रकोप के रूप में परिभाषित किया जाता है। चीन के 3 क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित : समाचार रिपोर्ट में कहा गया है, बड़ी मांग की वजह से ओसेल्टामिविर जैसी इन्फ्लूएंजा की एंटीवायरल दवाएं दक्षिणी चीन के कई फार्मेसियों में कम संख्या में उपलब्ध हैं। सीएनआईसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिणी चीन में दो क्षेत्र ग्वांगडोंग और गुआंग्शी ज़ुआंग स्वायत्त क्षेत्र और पूर्वी चीन में एक फ़ुज़ियान प्रांत सबसे अधिक इन्फ्लूएंजा से प्रभावित होने के साथ लिस्ट में सबसे ऊपर है। इन तीनों ही क्षत्रों में इन्फ्लूएंजा के मामले की संख्या क्रमशः 119, 79 और 109 हैं। इन्फ्लूएंजा के सबटाइप की संक्रमण दर अधिक शेनझेन अस्पताल के प्रमुख लू होंगझोउ ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि भारी बारिश, कम तापमान और कोविड -19 के खिलाफ नियंत्रण के उपाय, जिसने जनता में श्वसन संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम कर दिया, वास्तव में दक्षिणी चीन में असामान्य इन्फ्लूएंजा प्रसार में योगदान दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण चीन में बढ़ते संक्रमणों में इन्फ्लूएंजा ए (H3N2) उपप्रकार (सबटाइप) के सबसे अधिक मामले मिले हैं, उच्च महामारी तीव्रता, उच्च संक्रमण दर और तेजी से बार-बार म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) इसकी विशेषता है। हालांकि, लू ने कहा कि इस संक्रमण से मृत्यु दर 0.2% है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। एक्सरसाइज शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाती है। यह वजन को कंट्रोल करती है। मेटाबॉलिज्म को सुधारती है और बॉडी को स्ट्रॉन्ग बनाती है। पर ये सब होता कैसे है, अमेरिकी वैज्ञानिकों ने यह गुत्थी सुलझा ली है। उनका कहना है, वर्कआउट में दौरान शरीर में कौन से बदलाव होते हैं जिसके कारण इंसान को फायदा पहुंचता है, इसका पता लगा लिया गया है। जानिए क्या कहती है, अमेरिकी वैज्ञानिकों की नई रिसर्च…रिसर्च करने वाले अमेरिका के स्टेनफोर्ड और बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के वैज्ञानिकों का कहना है, उन्होंने ऐसे ब्लड मॉलिक्यूल की खोज की है जिसका निर्माण एक्सरसाइज के दौरान होता है। यह ब्लड मॉलिक्यूल इंसान में खाना खाने की चाहत और मोटापा दोनों को कम करता है। नेचर जर्नल में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, रिसर्च के जरिए भूख और एक्सरसाइज के बीच के कनेक्शन को समझा गया है। शोधकर्ता डॉ यॉन्ग शू का कहना है, खासकर मोटे लोगों के रेग्युलर एक्सरसाइज करने पर उनका वजन घटता है, भूख नियंत्रण में रहती है और मेटाबॉलिज्म में सुधार होता है। शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च चूहे पर की है। चूहे पर एक्सरसाइज के असर को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने उनके ब्लड प्लाज्मा की जांच की। चूहे वर्कआउट कर सकें इसके लिए उन्हें खासतौर पर ट्रेडमिल पर भागने की ट्रेनिंग दी गई थी। ब्लड में जिस मॉलिक्यूल की खोज की गई है वो अमीनो एसिड का बदला हुआ रूप है, जिसे Lac-Phe नाम दिया गया। शोधकर्ताओं का कहना है, Lac-Phe तब बनता है जब कोई लगातार एक्सरसाइज करता है और मांसपेशियों में सनसनी होती है। रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि शरीर में यह मॉलिक्यूल तब बनता है, जब इंसान स्प्रिंट एक्सरसाइज करता है। तब ब्लड में इस मॉलिक्यूल का निर्माण तेजी से होता है। इस तरह यह समझा जा सका कि एक्सरसाइज के जरिए कैसे वजन कंट्रोल होता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश में कोरोना के बढ़ते मामले रूकने का नाम नहीं ले रहे, एक बार फिर से कोरोना की सुपर स्पीड 17 हज़ार के पार पहुंच गई। पिछले 24 घंटे में कोरोना के 17,073 नए केस सामने आए हैं, वहीं 21 और लोगों की कोरोना से मौत हुई। इसी के साथ भारत में COVID-19 केसों में 45.4 फीसदी उछाल देखने को मिला है। देश में अब तक कुल कोरोना वैक्सीनेशन 1,97,11,91,329 हुआ है। वहीं पिछले 24 घंटे में कोरोना वैक्सीनेशन 2,49,646 हुआ है। विकली पॉजिटिविटी रेट 3.39% है. अबतक कुल कोरोना टेस्टिंग 86.10 करोड़ हुई है। वहीं पिछले 24 घंटों में कोरोना टेस्टिंग 3,03,604 हुई है। बता दें कि इससे पहले महाराष्ट्र में रविवार को कोरोना वायरस संक्रमण के 6,493 नये मामले सामने आने से संक्रमण के मामलों की कुल संख्या 79,62,666 हो गयी और पांच लोगों की मौत होने से मृतकों की संख्या 1,47,905 पर पहुंच गई। पांचों मरीजों की मौत मुंबई में हुई।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनियाभर में मंकीपॉक्स के बढ़ते खतरे के बीच वर्ल्ड हेल्थ नेटवर्क ने इसे महामारी घोषित कर दिया है। ब्रिटेन में 6 मई को इसका पहला मामला सामने आने के बाद से अब तक करीब 3,417 मामले सामने आ चुके हैं। वर्ल्ड हेल्थ नेटवर्क में दुनियाभर के ऐसे वैज्ञानिक और विशेषज्ञ जुड़े हुए हैं जो महामारी को पहचानने का काम करते हैं और उसका समाधान ढूंढते हैं। हालांकि, चर्चा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन भी जल्द ही मंकीपॉक्स को महामारी घोषित कर सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि किसी बीमारी को महामारी कब घोषित किया जाता है। 1. वेबएमडी की रिपोर्ट के मुताबिक, जब कोई बीमारी कई देशों में फैल जाती है, ज्यादा लोगों पर असर डालती है और जान का जोखिम बढ़ता है तो इसे महामारी के दायरे में रखा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 को महामारी में तब शामिल किया था जब इसके मामले दुनियाभर के देशों में तेजी से बढ़ने लगे थे। मौतों का आंकड़ा बढ़ने लगा है। 2. किसी बीमारी को महामारी घोषित करने के पीछे कई बातों को आधार बनाया जाता है। पहला, कितने लोग उस बीमारी से संक्रमित हो रहे हैं। दूसरा- वो वायरस या बैक्टीरिया के संक्रमण को कितना गंभीर बना रहा है यानी बीमारी कितना भयानक रूप ले रही है। कुछ खास समूह लोगों को वह बीमारी होने का खतरा कितना है और बचाव के लिए उठाए जा रहे कदम कितने प्रभावशाली हैं। 3. किसी बीमारी को महामारी घोषित करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन जिम्मेदार होता है। बीमारी को महामारी घोषित करने से पहले वह अपने दुनियाभर में मौजूद नेटवर्क से उस बीमारी से जुड़ी रिपोर्ट और डाटा मांगता है, जिसके आधार पर फैसला लिया जाता है। फैसला लेते समय 6 फेज पर नजर रखी जाती है। 4. बीमारी को महामारी घोषित करने से पहले हऌड चेक करता है कि वह कौन सी फेज में है। पहले फेज को सामान्य स्थिति माना जाता है, वहीं, बीमारी के छठे फेज में होने का कारण है उसे महामारी घोषित किया जाता है। छठे फेज का मतलब है, बीमारी कई देशों में फैल रही है और लोगों को एक-दूसरे से संक्रमण फैलने लगा है। 5. ऐसे होते हैं 6 फेज: पहला फेज: संक्रमण जानवर में पाया गया है, यह इंसानों में नहीं फैला है। दूसर फेज: जानवर में पाए गए वायरस का संक्रमण इंसानों में भी देखा गया। तीसरा फेज: जब संक्रमण एक से दूसरे इंसान में फैलता है, लेकिन बड़े स्तर पर मामले सामने नहीं आते। चौथा फेज: जब इंसानों में संक्रमण का स्तर बढ़ता है और कम्युनिटी लेवल पर मामले बढ़ते हैं। पांचवा फेज: जब संक्रमण एक से अधिक देशों में फैलता है। छठा फेज: जब संक्रमण कई देशों में फैलने लगता है और इंसान से इंसान में इंफेक्शन के मामले बढ़ते हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। कोरोना वायरस का संकट अभी तक खत्म नहीं हुआ है। कोरोना वायरस के केस एक बार फिर बढ़ने लगे हैं। वहीं, एक रिपोर्ट सामने आई है, जो वाकई डरा देने वाली है। दरअसल, इस रिपोर्ट में सामने आया है कि कोरोना महामारी के बाद हार्ट अटैक की संख्या में काफी इजाफा हो गया है। यहां तक कि हार्ट अटैक से होने वाली मौतों की संख्या 6 गुना तक बढ़ गई है और कई मायनों में हार्ट अटैक से होने वाली मौतों ने कैंसर को भी पीछे छोड़ दिया है। तो अब सवाल ये है कि क्या कोरोना वायरस की वजह से हार्ट अटैक ज्यादा आने लगे हैं? इसके अलावा लोगों का सवाल है कि कोरोना के बाद से क्यों हार्ट अटैक और इससे होने वाली मौत के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। तो हम आपको डॉक्टर से की गई बातचीत के आधार पर बताते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है और क्या सही में कोरोना से हार्ट पर असर पड़ा है। हार्ट अटैक के क्या हैं आंकड़े : इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, एक आरटीआई में यह पता चला है कि पिछले साल जनवरी से जून के बीच, सिर्फ 6 महीनों में ही मुंबई में हार्ट अटैक से करीब 18 हजार मौतें हुई थीं। आरटीआई से मिले आंकड़ों के अनुसार, 2018 में हार्ट अटैक से 8 हजार 601 मौतें हुई थीं और फिर 2019 में 5 हजार 849 हुईं। इशके बाद 2020 में भी हार्ट अटैक से मौतों की संख्या में कमी आई और उस साल 5 हजार 633 मौतें हुईं। मगर 2021 से इनमें इजाफा शुरू हो गया और 2021 में हार्ट अटैक से जान गंवाने वालों की संख्या में 6 गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी हो गई। पिछले साल जनवरी से जून के 6 महीनों में ही मुंबई में हार्ट अटैक से 17 हजार 880 लोगों की जान चली गई थी। इस डेटा ने कैंसर को भी पीछे छोड़ दिया है। क्या कोरोना से पड़ा हार्ट पर असर : कोरोना और हार्ट अटैक से कनेक्शन को लेकर हमने दिल्ली के पीएसआरआई हार्ट इंस्टीट्यूट के चेयरमैन डॉक्टर के के तलवार से बात की। उन्होंने बताया कि कोरोना की वजह से हार्ट पर असर हुआ है, लेकिन ऐसा नहीं है कि कोरोना की वजह से ही इतने हार्ट अटैक के केस बढ़ गए हैं। उन्होंने बताया कि इससे हार्ट संबंधी दिक्कतें मरीजों को बढ़ गई है और अभी तक इस पर रिसर्च चल रही है। डॉक्टर तलवार ने बताया, बेशक कोरोना की वजह से लोगों को कोरोना की दिक्कत हुई है और हार्ट का फंक्शन भी प्रभावित हुआ है। एक डेटा ये भी कहता है कि जब कोरोना से ठीक होने वाले लोगों का हार्ट का एमआरआई किया गया तो उसमें सामने आया कि सामने आया कि हार्ट पर असर हुआ है। अब इसमें कोई लोग ठीक हो गए हैं मगर यह इश्यू है। उन्होंने कहा, ऐसे में यह कहा जा सकता है लोगों को कोराना के बाद हार्ट संबंधी दिक्कतें आई हैं, जिसमें बहुत कम लोगों को हार्ट फेल्योर आदि दिक्कतें आई हैं। ज्यादा लोगों को कोरोना के बाद ब्लड प्रेशर बढ़ने, पल्स रेट ऊपर नीचे होने, चक्कर आने जैसी दिक्कतें हो रही हैं। क्या कोरोना की वजह से आ रहे हैं हार्ट अटैक : अब बात करते हैं कि क्या हार्ट अटैक कोरोना की वजह से ही आ रहे हैं। इस पर डॉक्टर तलवार का कहना है कि हार्ट संबंधी दिक्कत हुई हैं और कुछ केस में ज्यादा दिक्कत होने की वजह से हार्ट अटैक की शिकायत भी हुई है। लेकिन ऐसा नहीं है कि कोरोना से ही हार्ट अटैक बढ़ रहे हैं। डॉक्टर तलवार के अनुसार, हार्ट अटैक दूसरा कारण ये भी है कि कई लोगों को पहले से हार्ट संबंधी दिक्कतें थीं और उन्होंने कोरोना की वजह से उन पर ध्यान नहीं दिया और जो रेग्युलर चेकअप करवाना था, वो भी नहीं करवाया। इस वजह से उनकी दिक्कत बढ़ गई है और ये दिक्कत हार्ट अटैक, हार्ट फेल्योर जैसी दिक्कतों में तब्दील हो गई। कोरोना से हार्ट पर असर होने का क्या कारण है : अब बात करते हैं कि कोरोना से हार्ट पर असर किस तरह से पड़ा। इस पर डॉक्टर तलवार का कहना है, इसके दो कारण हैं। एक तो कोरोना Angiotensin Converting Enzyme लंग्स में होते हैं और इनकी वजह से निमोनिया आदि होते हैं। वैसे ही ये हार्ट में भी होते हैं, तो इस वजह से हार्ट को भी कोरोना में इन्वॉल्व कर लिया जाता है, जिस वजह से हार्ट पर असर पड़ता है। इसके अलावा ओवर इम्यूनिटी की वजह से लोगों में हार्ट अटैक जैसी दिक्कतें हो रही हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। निजी कैंसर अस्पताल अपोलो कैंसर सेंटर ने दातार कैंसर जेनेटिक्स के सहयोग से स्तन कैंसर को जल्द से जल्द पता लगाने के लिए नयी प्रौद्योगिकी आधारित रक्त परीक्षण शुरू करने की घोषणा की है। कंपनी ने आज यहां जारी बयान में कहा कि एक क्रांतिकारी रक्त परीक्षण जो अत्यंत सटीकता से बिना लक्षण वाले व्यक्तियों में भी प्रारंभिक अवस्था में ही स्तन कैंसर का पता लगा सकता है की शुरूआत की है। स्तन कैंसर के लगातार बढ़ते मामलों और इसके विषय में होने वाली सामाजिक चर्चा ने ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में, तकनीकी विकास के इतिहास में होने वाले महत्वपूर्ण क्रम विकास में से एक को जन्म दिया है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया शुक्रवार को देश में कोविड-19 के बढ़ते मामलों को लेकर विशेषज्ञों की कोर टीम के साथ एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करेंगे। आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी है। देश में पिछले कुछ हफ्तों में कोरोना वायरस संक्रमण में वृद्धि देखी जा रही है। 10 राज्यों महाराष्ट्र, केरल, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और गुजरात में 1,000 से अधिक सक्रिय मामले हैं। ओमिक्रॉन और इसके वैरिएंट जिम्मेदार : किसी भी नए उभरते हुए वैरिएंट या सब-वैरिएंट की संभावना की जांच करने और संक्रमण के पीछे के कारणों का पता लगाने के लिए निर्देश जारी किया गया था। भारतीय SARS-CoV-2 जीनोमिक्स कंसोर्टियम (INSACOG) के विशेषज्ञों के अनुसार, ओमिक्रॉन और इसके वैरिएंट मुख्य रूप से बीए.2 (BA.2)और बीए.2.38 (BA.2.38) कोविड के मामलों में मौजूदा वृद्धि के पीछे हैं। बीए.2 और इससे जुड़े वायरस 85 फीसदी मामलों में मिले हैं, 33 फीसदी सैंपर में बीए.2.38 मिला है। सूत्र ने कहा कि 10 प्रतिशत से कम नमूनों में बीए.4 और बीए.5, पाया गया है। पिछली समीक्षा बैठक में कहा गया था कि अब तक देश में चिंता में डालने वाला कोई वैरिएंट नहीं है। भारत में अब बीए.2 के अलावा बीए.4 और बीए.5 हैं, जिनमें अन्य ओमिक्रॉन सबलाइनेज की तुलना में थोड़ी अधिक संक्रामकता है। केरल के 11, मिजोरम के छह और महाराष्ट्र के पांच सहित भारत के 43 जिलों में साप्ताहिक कोविड संक्रमण दर 10 प्रतिशत से अधिक है। सूत्रों ने कहा कि 42 जिलों में, जिनमें राजस्थान के आठ, दिल्ली के पांच और तमिलनाडु के चार जिले शामिल हैं, साप्ताहिक संक्रमण दर 5 से 10 प्रतिशत के बीच है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। बीमार होने पर डॉक्टर अलग अलग तरह की दवाएं देते हैं। कोई दवा गोली के रूप में पेट में जाती है तो कई बार इंजेक्शन रूप में लेना होता है तो कभी दवा को सीधे ही प्रभावित स्थान पर लगाया जाता है। लेकिन कई बार शरीर के किसी खास हिस्से में समस्या होने के लिए दवा ही खाई जाती है जो पेट में जाने के बाद उसी हिस्से में असर दिखाती लगती हैं। इसमें दर्द की दवाएं प्रमुख होती हैं। आखिर दवाओं को पता कैसे चलता है कि उन्हें शरीर के किस विशेष ही में जाना है। दवा विशेषज्ञ ने इस प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि आखिर होता क्या है। क्या खास हिस्से में ही जाती हैं दवाएं : क्या वाकई ऐसा होता है कि सिर दर्द या पीठ दर्द के लिए ली गई दवाएं सिर या पीठ में ही जाकर अपना असर दिखाती हैं। इसका स्पष्ट उत्तर नहीं में तो है, लेकिन दवाओं में खास तरह के रसायन डाल कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि वे शरीर के किसी विशेष हिस्सों ज्यादा असर दिखा सकें और बाकी में कम। कुछ दूसरे तत्व भी : दरअसल दवाओं में केवल प्रभावित हिस्सों के लिए सक्रिय दवा के अलावा भी बहुत से दूसरे तत्व भी होते हैं। इनमें ये निष्क्रिया तत्व भी शामिल होते है, जो स्थिरता, दवा के अवशोषण, रंग, स्वाद, और अन्य गुणों को मजबूत करने के लिए डाले जाते हैं, जिससे दवा प्रभावी रूप से काम कर सके। मिसाल के तौर पर सिरदर्द के लिए ली जाने वाली मशहूर दवा एस्प्रिन में ऐसे तत्व भी होते हैं, जिससे ढुलाई के दौरान दवा टूटकर बिखरती नहीं है, जबकि ऐसी दवाएं मुंह में लेते ही घुलने लगती हैं। खास तरह से डिजाइन : कोलोराडो यूनिवर्सिटी में फार्मस्यूटिकल्स साइंसेस के प्रोफेसर टॉम एंकार्डोक्वे ने कंवर्शेसन्स में अपने लेख में बताया कि दवाओं में अन्य तरह के घटकों को डिजाइन कर विकसित कर दवा को शरीर के खास हिस्से में ज्यादा प्रभाव देने के लिए बनाया जाता है। इसे समझने के लिए दवाएं शरीर में जाकर कैसे काम करती हैं यह समझना जरूरी है। क्या होता है दवा के साथ : जब भी हम को दवा निगलते हैं, तो वह सबसे पहले पेट और आंतों में जाकर घुलती है। इसके बाद दवा के अणु खून के प्रवाह में मिल जाते हैं जिससे वे शरीर के हर अंग और ऊतकों में चले जाते हैं। दवा के अणु कोशिकाओं के उन बाध्यकारी रिसेप्टर्स को प्रभावित करते हैं, जो किसी विशेष प्रतिक्रिया को शुरू करते हैं। दवाओं के दुष्प्रभाव भी : हालांकि दवाओं को खास तरह के रिसेप्टर्स को ध्यान में रख कर ही डिजाइन किया जाता है, जिससे वांछनीय नतीजे मिल सकें, उन्हें खून के जरिए शरीर के अन्य हिस्सों में जाने से रोकना संभव ही नहीं होता है। इसी वजह से गैर जरूरी जगहों पर जाने से हमें दवा के साइडइफेक्ट्स देखने को मिलते हैं। दवा का असर समय के साथ हलका हो जाता है और वह पेशाब के जरिए बाहर भी निकल जाती है, इसीलिए कई दवाओं को खाने का बाद पेशाब में बदबू आती है तो कुछ दवाओं के लेने पर पेशाब का रंग ज्यादा पीला हो जाता है। खून के जरिए भी दवा : कुछ दवाएं ऐसी भी होती है जो पेट में घुलती ही नहीं है तो कुछ दवाएं बहुत ही धीमी गति से घुलती हैं। तो कुछ कम घुल पाती हैं जिससे उन्हें बार बार लेने की जरूरत होती है, तो वहां पेट की पाचन प्रक्रिया से गुजरने से बचाने के लिए कुछ दवाओं को सीधे खून में इंजेक्शन के जरिए डाला जाता है। जैसे कैंसर की ट्यूमर कोशिकाओं को मारने के लिए मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज में खास प्रोटीन होता है। अगर इस दवा को पेट के जरिए शरीर में पहुंचा जाए तो पेट अन्य प्रोटीन से उसे अलग नहीं देख पाता है। वहीं ओन्टमेंट्स यानि त्वचा के लिए क्रीम, आंखों के लिए आईड्रॉप या फेफड़ों के लिए इन्हेलर आदि से भी सीधे प्रभावित हिस्सों तक दवा को पहुंचाया जाता है। वहीं खाने वाली दवाओं को सही समय और सही मात्रा में लेना बहुत जरूरी होता है। ऐसे में डॉक्टर ही मरीज की स्थिति के अनुसार सही डोज क निर्धारण कर सकता है। वहीं कुछ दवा तभी लेना चाहिए जब मरीज को उसकी जरूरत महसूस होती है।
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