एबीएन हेल्थ डेस्क। कोरोना के खिलाफ कॉर्बेवैक्स वैक्सीन की बूस्टर डोज को केंद्र सरकार की तरफ से जल्द ही अंतिम मंजूरी मिल सकती है। असल में केंद्र सरकार आपातकालीन स्थिति में प्रतिबंधित उपयोग के लिए कॉर्बेवैक्स वैक्सीन बूस्टर डोज को अपनी अंतिम मंजूरी देने पर विचार कर रही है। सरकार से जुड़े सूत्राें ने यह दावा किया है। कॉर्बेवैक्स वैक्सीन हेट्रोलोगस कोविड-19 बूस्टर डोज है। मतलब इस वैक्सीन का प्रयोग स्वतंत्रत रूप से बूस्टर डोज के तौर पर किया जा सकता है। मसलन जिन लोगों ने वैक्सीन की पहली डोज कोविशील्ड या कोवैक्सीन की लगवाई हुई हैं। वह स्वतंत्र रूप से कॉर्बेवैक्स वैक्सीन को बूस्टर डोज या तीसरी डोज के तौर पर ले सकते हैं। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने 4 जून को कॉर्बेवैक्स वैक्सीन को बूस्टर डोज के रूप में इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है, जिसे DCGI की तरफ से आपातकालीन स्थिति में प्रतिबंधित उपयोग के लिए बूस्टर डोज के तौर पर अनुमति दी गई थी। इसके बाद जुलाई के महीने में टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (NTAGI) ने वयस्कों के लिए एक स्वतंत्रत बूस्टर वैक्सीसन के रूप में कॉर्बेवैक्स की सिफारिश की थी। भारत की पहली स्वतंत्र बूस्टर डोज : कॉर्बेवैक्स वैक्सीन को हैदराबाद स्थित फार्मास्युटिकल और वैक्सीन कंपनी बायोलॉजिकल ई लिमिटेड ने तैयार किया है। कॉर्बेवैक्स भारत की पहली कोरोना वैक्सीन बन गई है, जिसे DCGI और टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (NTAGI) ने वयस्कों के लिए एक स्वतंत्र (नियमित कंपनी के टीके से अलग) बूस्टर के रूप में देने की सिफारिश की है। मसलन कॉर्बेवैक्स भारत में पहला ऐसा टीका है, जिसे स्वतंत्रत बूस्टर डोज के रूप में अनुमोदित किया गया है। परीक्षण में प्रभावी साबित हुआ है कॉर्बेवैक्स बूस्टर : कॉर्बेवैक्स वैक्सीन बूस्टर बनाने वाली कंपनी ने हाल ही में अपना नैदानिक परीक्षण डेटा प्रस्तुत डीसीजीआई के सामने प्रस्तुत किया था। जिसने विषय विशेषज्ञ समिति के साथ एक विस्तृत मूल्यांकन और विचार-विमर्श के बाद, कॉर्बेवैक्स वैक्सीन को स्वतंत्र बूस्टर खुराक के रूप में उन लोगों को देने के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान की, जिन्होंने पहले से ही अन्य कंपनी के टीकों की दो खुराक ली हुई हैं। कंपनीके नैदानिक परीक्षण डेटा सता चला है कि कॉर्बेवैक्स बूस्टर खुराक ने प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण वृद्धि प्रदान की और एक प्रभावी बूस्टर के लिए आवश्यक उत्कृष्ट सुरक्षा प्रोफ़ाइल प्रदान की। असल में कॉर्बेवैक्स की बूस्टर खुराक ने प्लेसीबो की तुलना में कोविशील्ड और कोवैक्सिन समूहों में एंटीबॉडी टाइटर्स को बेअसर करने में काफी वृद्धि की है। वहीं कंपनी कीप्रबंध निदेशक महिमा दतला ने कहा, हम इस स्वीकृति से बहुत खुश हैं, जो भारत में COVID-19 बूस्टर खुराक की आवश्यकता को पूरा करेगा। हमने अपनी COVID-19 टीकाकरण यात्रा में एक और मील का पत्थर पार कर लिया है। यह स्वीकृति एक बार फिर से विश्व स्तरीय सुरक्षा मानकों और कॉर्बेवैक्स की उच्च प्रतिरक्षण क्षमता को दर्शाता है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। अगर आप शाकाहारी हैं तो इस मौसम में कुछ सब्जियों से दूरी बना लें। कुछ सब्जियां तेजी से यूरिक एसिड को बढ़ा सकती हैं। पालक का सेवन इस मौसम में नहीं करें। पालक में प्रोटीन और प्यूरीन होता है जो यूरिक एसिड के स्तर को बढ़ा देता है। यूरिक एसिड हमारी बॉडी में पाए जाने वाला टॉक्सिन हैं जो सभी की बॉडी में बनता है। इन टॉक्सिन को किडनी फिल्टर करके यूरिन के जरिए बॉडी से बाहर भी निकाल देती है। यूरिक एसिड का बॉडी में बनना परेशानी की बात नहीं है इसका बॉडी में स्टोर होना बीमारियों को बढ़ा सकता है। यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने पर ये खून में मिलने लगता है और हड्डियों में जाकर क्रिस्टल के रूप में जमा होने लगते हैं। यूरिक एसिड के हड्डियों में जमा होने से हड्डियों की कई बीमारियां पैदा हो जाती है जिसे गाउट कहते हैं। डाइट में प्यूरीन वाले फूड्स यूरिक एसिड को तेजी से बढ़ाते हैं। कुछ फूड्स जैसे पनीर, रेडमीट, राजमा, चावल, रेड मीट, हाई फ्रूक्टोज फूड, सी फूड जैसे सामन, झींगा, झींगा मछली और सार्डिन यूरिक एसिड को तेजी से बढ़ा सकते हैं। यूरिक एसिड बढ़ने से एड़ियों में दर्द, पिंडलियों में दर्द, घुटनों, जोड़ों में दर्द और जोड़ों में सूजन की परेशानी होने लगती है। यूरिक एसिड बढ़ने से डायबिटीज और किडनी की परेशानी होने का खतरा भी अधिक रहता है। आप भी यूरिक एसिड के बढ़ने से परेशान हैं तो अपनी डाइट का विशेष ध्यान रखें। बरसात के मौसम में डाइट का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। इस मौसम में इंफेक्शन का खतरा अधिक रहता है। अगर आप शाकाहारी हैं तो इस मौसम में कुछ सब्जियों से दूरी बना लें। कुछ सब्जियां तेजी से यूरिक एसिड को बढ़ा सकती है। आइए जानते हैं कि बारिश में किन सब्जियों से परहेज करें ताकि यूरिक एसिड कंट्रोल रहे।
टीम एबीएन, रांची। जंकफूड या फास्टफूड हमारी हड्डियों को नुक्सान पहुंचा रहा है। जब हम जंकफूड खाते हैं तब हमारी हड्डियों के लिए जरूरी प्रोटीन, कैल्सियम, विटामिन और मिनरल्स नहीं मिल पाता है। इससे हड्डी कमजोर होने लगती है। खराब जीवनशैली, एक्सरसाइज नहीं करना और खानपान की आदतों में बदलाव के कारण इन दिनों युवाओं में हड्डियों से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। ये बातें नेशनल बोन एंड ज्वाइंट डे पर मेदांता अस्पताल रांची के आर्थोपेडिक्स सर्जन डॉ नीलेश मिश्रा ने कही। उन्होंने कहा कि स्कूल, कालेज, घर और कार्यालय में ज्यादातर समय बीताने के कारण बच्चों से लेकर युवा वर्ग नियमित एक्सरसाइज, खेलकूद से दूर हो जाते हैं। धूप में न निकलने के कारण विटामिन डी भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है। इससे हड्डियां कमजोर होती जाती हैं। मेदांता अस्पताल रांची के आथोर्पेडिक्स सर्जन डॉ नीलेश मिश्रा ने कहा कि पहले हड्डियों से जुड़ी जो बीमारी बुढ़ापे में होती थी वह अब युवाओं में भी होने लगी हैं। ऐसे में नेशनल बोन एंड ज्वाइंट डे का मकसद लोगों को हड्डियों के स्वास्थ्य को लेकर जागरूक करना है। उन्होंने कहा कि हड्डियों के स्वास्थ्य को लेकर महिलाओं को खासतौर से जागरूक होना होगा। आज भी ज्यादातर महिलाएं अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देती हैं। वे पूरे घर का ख्याल रखती हैं लेकिन खुद का नहीं। हड्डियों के लिए जरूरी आहार जैसे दूध और इसके उत्पाद, दाल, हरी सब्जियां, अगर शाकाहारी नहीं हैं तो, रोज एक अंडा आदि खाना चाहिए। महिलाओं को ज्यादा प्रोटीन, कैल्सियम और विटामिन डी की जरूरत है। हड्डियों के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देने के कारण ही ज्यादातर महिलाएं उम्र बढ़ने पर घुटने और मांसपेशियों के दर्द से परेशान रहती हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। स्पेन में शुक्रवार को मंकीपॉक्स वायरस से पहली बार एक शख्स की मौत होने की सूचना दी गई है। यूरोप में मंकीपॉक्स के मौजूदा प्रकोप से जुड़ी ये पहली मौत मानी जा रही है। स्पेन के स्वास्थ्य मंत्रालय के आपातकालीन और सतर्कता समन्वय केंद्र के अनुसार स्पेन मंकीपॉक्स से सबसे अधिक प्रभावित दुनिया के कुछ देशों में से एक है। अब तक स्पेन में करीब 4,298 लोग इस वायरस से संक्रमित हुए हैं। एनडीटीवी की एक खबर के मुताबिक केंद्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जो जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार मंकीपॉक्स के 3,750 रोगियों में से 120 अस्पताल में भर्ती थे और एक मरीज की मौत इस मंकीपॉक्स वायरस के संक्रमण से हो गई है। एक अधिकारी ने कहा कि पोस्टमॉर्टम के नतीजे के नहीं आने के कारण मौत के विशिष्ट कारण के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जा सकती है। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले शनिवार को मंकीपॉक्स के प्रकोप को वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया था। डब्ल्यूएचओ के अनुसार मई की शुरुआत से अफ्रीका के बाहर दुनिया भर में मंकीपॉक्स के 18,000 से अधिक मामलों का पता चला है। डब्ल्यूएचओ के प्रमुख टेड्रोस एडनोम घेब्रेयियस ने बुधवार को कहा कि 78 देशों में इसका पता चला है, जिसमें 70 प्रतिशत मामले यूरोप में और 25 प्रतिशत अमेरिका में पाए गए हैं। भारत में अब तक मंकीपॉक्स के 4 मामले सामने आ चुके हैं। इनमें से एक मामला दिल्ली में भी 24 जुलाई को सामने आया था। केंद्र सरकार ने मंकीपॉक्स के प्रकोप को देखते हुए गाइडलाइन जारी की है। इसमें मंकीपॉक्स से संक्रमित मरीजों के लिए 21 दिनों तक अलगाव में रहने का निर्देश दिया गया है। मंकीपॉक्स के लक्षणों में बुखार के साथ सिरदर्द, गले में खराश के साथ शरीर की त्वचा पर घाव भी बनते हैं। ये लक्षण करीब तीन हफ्ते तक बने रहते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। कोविन पोर्टल के जरिए बच्चों के लिए पोलियो, हेपेटाइटिस और अन्य रूटीन वैक्सीन्स की बुकिंग शुरू करने की तैयारी है। कोरोना टीकाकरण अभियान की तकनीकी रीढ़ साबित हुए कोविन को लेकर इस प्रस्ताव पर केंद्र सरकार विचार कर रही है। नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर डॉ आरएस शर्मा ने एक इंटरव्यू में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बस कुछ ही महीनों के बाद कोविन पर यह प्रक्रिया शुरू जाएगी। इस टेक प्लेटफॉर्म के जरिए रूटीन वैक्सीन के स्लॉट की भी बुकिंग हो सकेगी। इस पोर्टल का फिलहाल कोविड वैक्सीनेशन प्रोग्राम में इस्तेमाल हो रहा है। कोविन में इसके पुराने फीचर बने रहेंगे। इससे देश के टीकाकरण प्रोग्राम के कवरेज को ट्रैक करने में मदद मिलेगी। कोविन के जरिए रिमाइंडर्स भेजने का सिलसिला जारी रहेगा, जैसा कि यह कोविड वैक्सीन के केस में करता है। उदाहरण के तौर पर, अगर बच्चे की पोलियो वैक्सीन पेंडिंग है या जल्द ही लगने वाली है तो सिस्टम उनके पेरेंट्स को रिमाइंडर भेजेगा। यह प्लेटफॉर्म राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के कवरेज की निगरानी में मदद करेगा। साथ ही पूरे डेटा को जुटाने का काम करेगा। उन्होंने बताया कि यह ड्रॉप-आउट मामलों को भी सामने लाएगा और उन्हें रिमाइंडर भेजेगा। इससे टीकाकरण कार्यक्रम के कवरेज को और बेहतर बनाने में मदद करेगी। आपके आसपास किन अस्पतालों में वैक्सीनेशन शॉट्स दी जा रही हैं, पोर्टल के जरिए इसकी जानकारी दी जाएगी। आपको अपने मोबाइल नंबर के जरिए अप्वाइंटमेंट बुक कराना होगा। यूजर्स टीकाकरण कार्यक्रम के पूरा होने के बाद डिजिटल वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट भी डाउनलोड कर सकेंगे।
एबीएन हेल्थ डेस्क। कोरोना के बाद दुनिया भर में मंकीपॉक्स का खतरा बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। आलम यह है कि मंकीपॉक्स के संक्रमण ने अभी तक 70 से अधिक देशों में दस्तक दे दी है। जिसके तहत दुनियाभर में अभी तक 16 हजार से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। जिसमें भारत में सामने आए मंकीपॉक्स के 4 मामले भी हैं। जिसे देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मंकीपॉक्स को लेकर इमरजेंसी अलर्ट घोषित किया हुआ है। वहीं इस बीच केंद्र सरकार भी मंकीपॉक्स को देखते हुए एक्शन मोड़ में आ गई है। जिसके तहत केंद्र सरकान ने मंकीपॉक्स वायरस की पहचान के लिए जांच किट बनाने और इसकी रोकथाम के लिए टीका बनाने की तैयारियां शुरू कर दी है। इसके लिए कंपनियों को आमंत्रित करने के उद्देश्य से टेंडर जारी किया है।
टीम एबीएन, रांची। हेपेटाइटिस का सही समय पर इलाज होना जरूरी है। हेपेटाइटिस बी और सी का सही समय पर पहचान हो जाए तो मरीज की जान बचाई जा सकती है। इलाज से मरीज लंबा जीवन जी सकता है। लेकिन अगर इलाज न मिले या गलत इलाज हो तो मरीज की जान भी जा सकती है। इसलिए हेपेटाइटिस को लेकर हमारे समाज में जागरूकता जरूरी है। ये बातें बुधवार को मेदांता अस्पताल रांची के पेट एवं लिवर रोग विशेषज्ञ डॉ संगीत सौरभ ने कही। वे विश्व हेपेटाइटिस दिवस की पूर्व संध्या पर मीडिया से अपनी बातें रख रहे थे। मेदांता अस्पताल रांची के पेट एवं लिवर रोग विशेषज्ञ ने कहा कि हेपेटाइटिस को लेकर अब भी समाज में जागरूकता की काफी कमी है। हेपेटाइटिस मुख्य तौर पर दो तरह का होता है। एक्यूट हेपेटाइटिस और क्रोनिक हेपेटाइटिस। एक्यूट आसानी से ठीक हो जाता है। एक्यूट हेपेटाइटिस में लिवर में सूजन हो जाती है जो कि आमतौर पर दो से तीन सप्ताह में ठीक हो जाता है। यह हेपेटाइटिस ए और ई वायरस के संक्रमण के कारण होता है। इसके लक्षणों में जोंडिस होना, भूख का कम लगना, उल्टी होना, या उल्टी जैसा लगना, कमजोरी लगना, या सुस्त होना है। हेपेटाइटिस ए और ई संक्रमित खाने या पानी की वजह से होता है। ये साधारणत: बरसात के मौसम में पाया जाता है। ज्यादतर केस में ये तीन हफ्ते के अंदर खुद ही ठीक हो जाता है और इसमें केवल सपोर्टिव इलाज की आवश्यकता होती है। केवल 1 से 2 प्रतिशत केस में यह लिवर फेल्योर का का रूप ले सकता है जिसके लक्षण बेहोशी आना, पेट में सूजन होना या पांव में सूजन होना है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। गैर जरूरी दवाओं से होता है कॉम्प्लिकेटेड एक्यूट हेपेटाइटिस : कॉम्प्लिकेटेड एक्यूट हेपेटाइटिस गैरजरूरी दवाईयों या जड़ी-बूटी के सेवन के वजह से होता है। एक मरीज जिनको पहले से हेपेटाइटिस है और उसे अन्य कारणों से अगर लिवर को क्षति पहुंचती है तो यह हो सकता है। मेदांता अस्पताल रांची के पेट एवं लिवर रोग विशेषज्ञ डॉ संगीत सौरभ कहते हैं कि इस तरह के वायरल हेपेटाइटिस में किसी भी अनावश्यक दवा का सेवन ना करें क्योकि ज्यादातर केस में ये खुद से ठीक हो जाते हैं। क्रोनिक हेपेटाइटिस मुख्यत हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी वायरस की वजह से होता है। जैसा कि इसके नाम से मालूम चलता है ये लम्बी चलने वाली बीमारी होती है। इसका समय पर इलाज नहीं होने से यह लिवर सिरोसिस का रूप ले सकता है और इससे मरीजो में कैंसर होने के खतरा ज्यादा होता है। लिवर सिरोसिस होने पर बीमारी के काफी गंभीर लक्षण दिखते हैं। जिसमें जोंडिस होना, पेट में पानी आना, पाव में सूजन होना आदि शामिल हैं।
टीम एबीएन, मेदिनीनगर, (पलामू)। टीका 12 तरह की जानलेवा बीमारियों से बचाव करता है। किसी बीमारी के विरुद्ध प्रतिरोधात्मक क्षमता (इम्यूनिटी) विकसित करने के लिए जो दवा खिलाई/पिलाई या किसी अन्य रूप में दी जाती है, उसे टीका (वैक्सीन) कहते हैं। यह क्रिया ही टीकाकरण (वैक्सीनेशन) कहलाती है। संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए टीकाकरण सर्वाधिक प्रभावी विधि मानी जाती है। यह जानकारी बुधवार को एएनएम को दी गई। सिविल सर्जन सभागार में सभी प्रखंडों से 2-2 एएनएम को रिफ्रेशर कोर्स में नियमित टीकाकरण से सम्बंधित प्रशिक्षण दिया गया। बच्चों को ससमय टीका के माध्यम से प्रतिरक्षित करने एवं समुदाय को गुणवत्तापूर्ण सेवा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सिविल सर्जन डॉ. अनिल कुमार के निर्देश पर सभी एएनएम का रिफ्रेशर ट्रेनिंग कराया जा रहा है। मौके पर प्रभारी डीआरसीएचओ डॉ. रजी, यूनिसेफ के क्षेत्रीय समन्वयक मनीष प्रियदर्शी, वीसीसीएम अमित कुमार ने प्रशिक्षण दिया। केके शर्मा द्वारा सभी प्रशिक्षणार्थियों को टीकाकरण के रिपोर्टिंग से सम्बंधित जानकारी दी गई। इन 12 बीमारियों से बचाता है टीका : बीसीजी का टीका बच्चों को टीबी से बचाव करता है। यह टीका बच्चे के जन्म के समय दिया जाता है। पेंटावैलेंट टीका बच्चों को पांच घातक रोगों से बचाता है। इनमें गलघोंटू, परटूसिस (काली खांसी), टेटनेस, हेपेटाइटिस बी और हिमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी (हिब) रोग से बचाव करता है। ओपीवी और एफआईपीवी का टीका पोलियो से बचाव करता है। रोटा का वैक्सीन बच्चों को रोटा वायरस से होने वाले डायरिया से बचाव करता है। पीसीवी का टीका निमोनिया से बचाव करता है। एमआर का टीका खसरा और रूबेला से बचाव करता है। जेई का टीका बच्चों को जापानी इंसेफ्लाइटिस से बचाव करता है। बीसीजी, हेपेटाइटिस-बी का टीका बच्चों को जन्म के 24 घण्टे अंदर एवं ओपीवी 0 जन्म के 15 दिनों के अंदर दिया जाता है। ओपीवी, पेंटा, पीसीवी, रोटा, एफईपीवी का टीका डेढ़ महीने में दिया जाता है। ओपीवी, पेंटा, रोटा का दूसरा डोज ढाई महीने में, ओपीवी, पेंटा, रोटा का तीसरा डोज व पीसीवी व एफआईवी का दूसरा डोज साढ़े तीन महीने में और एमआर, जेई, पीसीवी बूस्टर का टीका 9 महीने में पड़ जाने पर फुल इम्यूनाइजेशन और 16 से 24 महीने के अंदर डीपीटीबी, ओपीवीबी, जेई और एमआर का दूसरा डोज पड़ जाने को कम्पलीट इम्यूनाइजेशन कहते हैं। टीकाकरण पूरी तरह से सुरक्षित है।
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