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Published / 2022-09-20 17:35:50
पूरी नींद, तनाव से दूरी और खुश रहने से दूर रहता है अल्जाइमर : डॉ विजय, मेदांता रांची

टीम एबीएन, रांची। वर्ल्ड अल्जाइमर डे के मौके पर मेदांता रांची के न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टर विजय आनंद ने बताया कि अल्जाइमर मूलत: एक न्यूरोडीजेनरेटिव बीमारी है। जो आमतौर पर धीरे-धीरे शुरू होती है और अगर सही तरीके से इलाज न हो तो धीरे-धीरे बिगड़ती चली जाती है। इसके आम प्रारंभिक लक्षणों में हाल की घटनाओं को याद रखने में कठिनाई है। जैसे जैसे बीमारी बढ़ती है, लक्षण में भाषा के साथ समस्याएं, भटकाव, मिजाज और व्यवहार संबंधी समस्याएं शामिल होते जाती हैं। मेदांता रांची के न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टर विजय आनंद बताते हैं, अल्जाइमर क्यों होता है? अभी इसको लेकर रिसर्च जारी हैं। इस बीमारी में मस्तिष्क की वह कोशिकाएं खत्म होने लगती हैं जिनमें याददाश्त स्टोर करने वाली कोशिकाएं होती है। बीमारी के होने पर लोग भूलने की बीमारी से ग्रसित होते हैं, फिर काम को भूलने लगते हैं। उसके बाद अपना नाम, सड़क का नाम, हाल-फिलहाल की घटनाओं को भूल जाते हैं। इसके अलावा चीजों को रख कर भूलना और समय, तारीख को भी याद नहीं रख पाते हैं। डॉक्टर विजय बताते हैं कि इस बीमारी के लक्षण ज्यादातर बुजुर्गों में देखने को मिलता है। साठ साल के बाद लक्षण सामने आते हैं। हालांकि रेयर केस में कम उम्र के भी मरीज मिलते हैं लेकिन पोस्ट रिटायरमेंट मरीजों की संख्या ज्यादा होती है। वह यह भी बताते हैं कि अभी अल्जाइमर को लेकर सही इलाज की तलाश जारी है लेकिन डॉक्टर ऐसे रोग से ग्रसित मरीजों के लिए मेमोरी इन्हैंसर दवाएं देते हैं। डॉ विजय बताते हैं कि आमतौर पर वैसे लोग जो अपनी जीवनशैली में काफी एक्टिव रहते हैं और एक समय विशेष के बाद उनकी एक्टिविटी में कमी होने लगती है, ऐसे लोगों को अल्जाइमर होने की संभावना ज्यादा होती है। हमेशा एक्टिव रहने वाले लोग अगर अपने दिमाग को एक्टिव रखें, जैसे अपने हॉबी को फॉलो करें, गेम या पजल खेलें, ग्रुप, डिस्कशन, योगा, प्राणायाम, स्पोर्ट्स एक्टिविटी पर ध्यान दें तो इस बीमारी से एक हद तक बचाव जरुर हो सकता है या अगर इस बीमारी के लक्षण आने लगते हैं तो उन लक्षणों को आने से कुछ देर तक रोका जा सकता है। खास बात यह है कि तनाव बिल्कुल न लें और अच्छी नींद जरूर लें। उन्होंने बताया कि मेदांता अस्पताल रांची में एक ही छत के नीचे सभी तरह की बीमारियों का गुणवत्तापूर्ण इलाज होता है। यहां अनुभवी डॉक्टरों की टीम है जो अत्याधुनिक तकनीक से मरीजों का इलाज करती है। देश और दुनिया की सबसे लेटेस्ट तकनीक और इलाज को यहां अपनाया जाता है।

Published / 2022-09-14 17:42:28
दुनिया में होने वाली मौत के 5 बड़े कारणों में सेप्सिस एक प्रमुख वजह : मेदांता रांची

टीम एबीएन, रांची। सेप्सिस एक ऐसी बीमारी है जो लोगों में मौत का एक बड़ा कारण है।डब्ल्यूएचओ के अनुसार दुनिया में होने वाली मौत के 5 बड़े कारणों में एक सेप्सिस भी प्रमुख है। डब्ल्यूएचओ ने स्पेसिस से होने वाली मौत को लेकर आगाह भी किया है। दरअसल सेप्सिस या सेप्टीसीमिया एक ऐसी बीमारी है जो जीवन के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। यह तब होता है, जब किसी अन्य संक्रमण के बैक्टीरिया रक्त में प्रवेश करते हैं और पूरे शरीर में फैल जाते हैं। सेप्सिस के बारे में लोगों को अवेयर करने के लिए प्रतिवर्ष 13 सितंबर को विश्व सेप्सिस दिवस मनाया जाता है। मेदांता रांची में इसी मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें विशेषज्ञ डॉक्टरों ने उसे फीस के बारे में विभिन्न प्रकार की जानकारी दी। डॉक्टरों का कहना था कि सब सिस्टम होता है जब किसी को पहले से ही कोई संक्रमण होता है यह मनुष्य के त्वचा फेफड़े मूत्र पथ या कहीं और पूरे शरीर में एक्शन रिएक्शन को ट्रिगर करता है। सेप्सिस किसी को भी हो सकता है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ज्यादा जोखिम में रहते हैं। इनमें 65 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के व्यस्क, डायबिटिक, जिनको फेफड़े की बीमारी है वो ज्यादा जोखिम में रहते हैं। इसके अलावा कैंसर और गुर्दे की बीमारी वाले भी जोखिम में रहते हैं। इस मौके पर की नोट देने वाले डॉक्टरों में डॉक्टर काशिफ जमाल ने विशेष जानकारी दी जबकि डॉ मनोज कुमार ने सर्वाइविंग सेप्सिस 2021 गाइडलाइन के बारे में विस्तार से बताया। इस ओपन हाउस सेशन में डॉ अमित कुमार, डॉ आनंद झा, डॉ देव दत्ता, डॉ नीलेश मिश्रा, डॉ नसीम अख्तर, डॉ अजीत के अलावा विश्वजीत कुमार और अंशिका भी उपस्थित थे।

Published / 2022-09-07 11:14:04
सावधान! शोध में खुलासा : सब्जियों में इस्तेमाल होने वाला कीटनाशक इंसान के खून तक पहुंचा

एबीएन हेल्थ डेस्क। कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के बायो केमिस्ट्री विभाग ने 100 कैंसर रोगियों के ब्लड सैंपल की जांच की तो उसमें एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ। दरअसल, सब्जी में डाले जाने वाला कीटनाशक उनके खून में पाया गया है। इसके बाद जब सामान्य व्यक्तियों के खून के सैंपल की जांच की गई तो उनके खून में भी यह कीटनाशक पाया गया जो बहुत ही खतरनाक है और गंभीर बीमारियों को जन्म देता है। शोध में बताया गया कि लोगों में कैंसर का खतरा बढ़ रहा है, इसकी एक वजह यह भी है। बायो केमेस्ट्री विभागाध्यक्ष डॉ आनंद नारायण सिंह ने बताया कि सब्जियों से शरीर में आई कीटनाशक दवा है मेटाबोलाइज और यह शोध में पाया गया है। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान स्तन कैंसर और मुख कैंसर के रोगियों के सैंपल लिए गए थे, जिसमें जेके कैंसर इंस्टीट्यूट और हैलट में आए कैंसर रोगियों के सैंपल शामिल थे, जिनमें जांच के बाद सब्जियों वाला कीटनाशक ब्लड में पाया गया। डॉक्टरों का कहना है कि सब्जियों में डाली जाने वाली कीटनाशक जब फसलों पर छिड़काव की जाती है तो इसका असर फसल पर पड़ता है और जब व्यक्ति सब्जी खाता है तो कीटनाशक उसके शरीर में पहुंचकर खून में मिल जाता है। इसी वजह से सामान्य व्यक्तियों के खून में भी कीटनाशक दवाएं पाए गए हैं। खून में कई कीटनाशक मिले हैं, इनमें एंडोसेल्फान भी शामिल है जो अल्जाइमर रोग बढ़ा देता है और सेक्स के हारमोंस को कम कर देता है। साथ ही डाईमेथोरेट नामक कीटनाशक भी शरीर के रसायन को नर्वस सिस्टम तक पहुंचाने से रोकता है, जिससे हार्ट संबंधी बीमारियां पैदा होती हैं। इसके अलावा, क्लोरोपाइरोफास भी नर्वस सिस्टम का रोग पैदा करता है। ऐसे ही अन्य कीटनाशक शरीर मे पाए गए हैं जो शरीर के लिए बेहद खतरनाक हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इससे बचने के लिए लोगों को यह ध्यान देना चाहिए कि सब्जियों को हमेशा गर्म पानी से धोकर खाएं। हो सके तो पानी में नमक मिला लें। मौसमी सब्जियों का ही सेवन करें; क्योंकि बेमौसम वाली सब्जियों में ज्यादा कीटनाशक होने की संभावनाएं होती हैं।

Published / 2022-09-06 12:44:33
नाक से पड़ेगी कोरोना वैक्सीन! क्या है नैजल वैक्सीन? जानें क्या कहती है रिसर्च...

एबीएन हेल्थ डेस्क। भारत बायोटेक के इंट्रानेसल (नाक के जरिये दिये जाने वाले) कोरोना वैक्सीन को भारत के औषधि महानियंत्रक ने आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ मनसुख मंडाविया ने इसका ऐलान किया है। नाक के जरिए दी जाने वाली ये पहली कोरोना वैक्सीन है। तकरीबन एक पखवाड़े पहले कोरोना की इइश्-154 इंट्रानैसल वैक्सीन का तीसरा क्लीनिकल ट्रायल पूरा कर लिया है। उस वक्त भारत बायोटेक ने बताया था कि नाक के जरिये दिए जाने वाले कोविड-19 टीके इइश्154 तीसरे फेस के नियंत्रित क्लीनिकल ट्रायल में सुरक्षित, बेहतर तरीके से सहन करने योग्य और प्रतिरक्षाजनक साबित हुआ है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने लिखा है कि भारत बायोटेक की इंट्रानैसल (नाक के जरिए दी जाने वाली) कोरोना वैक्सीन के लिए ऊउॠक से इमरजेंसी उपयोग के लिए मंजूरी मिल गई है। कोरोना के लिए भारत का पहला नाक से दिए जाने वाला टीका होगा। यह कदम महामारी के खिलाफ हमारी सामूहिक लड़ाई को और मजबूत करेगा। उन्होंने आगे कहा है कि भारत पीएम मोदी के नेतृत्व में उडश्कऊ-19 के खिलाफ लड़ाई में अपने विज्ञान, अनुसंधान एवं विकास और मानव संसाधनों का उपयोग किया है। भारत बायोटेक ने बताया था कि बीबीवी154 को सेंट लुइस स्थित वाशिंगटन विश्वविद्यालय की पार्टरनशिप में तैयार किया गया है। प्री क्लीनिकल सुरक्षा आकलन, बड़े पैमाने पर निर्माण, फॉमूर्ला और इंसानों पर क्लीनिकल परीक्षण सहित वितरण प्रणाणी पर काम भारत बायोटेक ने किया। केंद्र सरकार ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग के कोविड सुरक्षा कार्यक्रम के तहत उत्पाद के विकास और क्लीनिकल परीक्षण के लिए आर्थिक सहायता दी। बयान के मुताबिक बीबीवी154 के पहली डोज (शुरूआती दो खुराक) के तौर पर प्रभाव और कोविड-19 के अन्य टीके की दो शुरूआती खुराक लेने वालों को तीसरी खुराक पर बीबीवी154 को देने पर होने वाले असर का आकलन किया गया। क्या है नैजल वैक्सीन : नैजल वैक्सीन नाक से दी जाने वाली वैक्सीन है। व्यक्ति की नाक में वैक्सीन की कुछ बूंदे डालकर उसका टीकाकरण किया जाता है। इसे इंजेक्शन से देने की जरूरत नहीं है और न ही पोलियो की खुराक की तरह यह वैक्सीन पिलाई जाती है। यह एक प्रकार से नेजल स्प्रे जैसी होती है। इस वैक्सीन का लक्ष्य नाक के जरिए डोज को सांस के रास्ते तक पहुंचाना है। डॉक्टरों के मुताबिक, कोई भी वायरस सबसे पहले हमारे शरीर में नाक के जरिए जाता है। कोरोना के भी हमारे शरीर में पहुंचने का सबसे अहम रास्ता नाक ही है। ऐसे में ये वैक्सीन कोरोना को फेफड़ों या शरीर के अन्य हिस्सों में जाने से रोक सकती है। अध्ययनों में टीका सुरक्षित पाया गया था : जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने इस साल अगस्त में बताया था कि 18 साल से 60 साल के आयु वर्ग के समूह में पहले चरण का क्लीनिकल ट्रायल पूरा हो चुका है। डीबीटी ने कहा था कि पहले चरण के परीक्षण में शामिल हुए लोगों पर वैक्सीन की काफी अच्छी प्रतिक्रिया देखी गई थी। किसी में भी टीके के बाद कोई गंभीर प्रतिकूल प्रभाव सामने नहीं आया था। पशुओं पर हुए अध्ययन में टीका एंटीबॉडी का उच्च स्तर बनाने में सफल रहा था।

Published / 2022-09-06 09:44:05
14 डॉक्टर... 2 घंटे का आपरेशन... और निकाला फुटबॉल जैसा ट्यूमर

एबीएन सेंट्रल डेस्क। धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों ने दिल्ली में एक महिला के पेट से करीब 45 किलो फुटबाल जितना एक ट्यूमर को बाहर निकाल उस महिला की जान बचाई। दरअसल, यह मामला दिल्ली स्थित सीके बिरला अस्पताल में सामने आया जहां डॉक्टरों ने पेट दर्द की परेशानी लेकर पहुंची 32 वर्षीय महिला के पेट से लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के जरिये फुटबॉल के आकार का ट्यूमर ऑपरेशन पूरा कर बाहर निकाला। ट्यूमर इतना बड़ा था कि 14 डॉक्टरों को ऑपरेशन पूरा करने में 2 घंटे लग गये। ट्यूमर 4 फीट चौड़ा और 9 इंच लंबा था और इसका कुल वजन 45 किलो के करीब था। नेपाल की रहने वाली यह महिला पेट में बेहद तेज़ दर्द की शिकायत लेकर सीके बिरला अस्पताल पहुंची थी। डॉक्टरों ने जब टेस्ट किए तो पता चला कि उसके पेट में 40 किलोग्राम वजनी और 40 सेंटीमीटर बड़े ट्यूमर का पता चला। ऐसे में डॉक्टरों ने कीहोल लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के जरिये इस विशाल ट्यूमर को बाहर निकाला। डॉक्टरों ने बच्चे की डिलीवरी के दौरान करने वाले आप्रेशन की तरह ही इस ट्यूमर को बाहर निकाला। डाॅक्टर के अनुसार, यह बहुत जटिल सर्जरी थी। यह ट्यूमर पेट की पूरी कैविटी में फैल गया था, जिस कारण हमें लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करने के लिए पेट में बहुत कम जगह मिली। इसके साथ ही यह ट्यूमर बहुत बड़ा और भारी था जिसके कारण लैप्रोस्कोपिक विधि से इसे काटना और संभालना बहुत मुश्किल था। हालांकि अब मरीज पूरी तरह से ठीक है।

Published / 2022-09-04 15:57:57
इस सर्दी कोरोना के नये वैरिएंट का खतरा, ईएमए ने दी टीकाकरण तेज करने की सलाह

एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनियाभर में आतंक मचा चुका कोविड-19 अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। वहीं यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (ईएमए) ने शनिवार को कहा कि इस सर्दी में नए कोरोनोवायरस वैरिएंट के बनने की सबसे अधिक संभावना है। साथ ही कहा कि वायरस से बचने के लिए मौजूदा टीकाकरण अभियान तेज करने चाहिए, इससे ही इस गंभीर बीमारी से बचाव होगा। भारत समेत दुनियाभर के कई देशों में बूस्टर डोज अभियान चल रहा है। ईएमए की टिप्पणी इस साल के अंत में नए कोरोनोवायरस मामलों की आशंका वाली लहर को लेकर बूस्टर अभियान शुरू करने की तैयारी के बीच आई है। ईएमए टीके के प्रमुख मार्को कैवेलरी ने कहा कि नए वैरिएंट को रोकने के लिए नव-अनुमोदित जैब्स का मिश्रण और वायरस से लड़ने के लिए विकसित मूल टीके शामिल होंगे। हालांकि, इसमें कहा गया है कि लोगों को किसी विशिष्ट टीके का इंतजार नहीं करना चाहिए। मार्को कैवेलरी ने कहा कि एक पूरी तरह से नया वैरिएंट उभर सकता है जिसकी हम आज भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। इससे पहले 1 सितंबर को, ईएमए ने फाइजर/बायोएनटेक और मॉडर्ना द्वारा टीकों को मंजूरी दी थी जिन्हें ऑमिक्रॉन के पुराने बीए.1 सबवेरिएंट से निपटने के लिए अनुकूल पाया गया। ब्रिटेन में ओमिक्रॉन के खिलाफ दूसरे बूस्टर टीका को मंजूरी ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग ने शनिवार को कोविड-19 के मूल वायरस और इसके खतरनाक स्वरूप ओमिक्रॉन के खिलाफ दूसरे बाइवैलेंट बूस्टर टीके को मंजूरी दे दी है। विसंयोजी टीका उस टीके को कहते हैं, जो वायरस के दो प्रकार या दो अलग-अलग एंटीजन के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है।

Published / 2022-09-02 17:14:16
डेंगू में समय पर सही इलाज जरूरी : डॉ नीलाभ कुमार सिंह

टीम एबीएन, रांची। डेंगू एक वायरस जनित रोग है। यह चार प्रकार का होता है - डेंनवी-1, डेंनवी-2 डेंनवी-3 डेंनवी-4। डेंगू का वायरस मच्छरों के काटने से फैलता है। जब मच्छर डेंगू संक्रमित मरीज को काटकर दूसरे स्वास्थ्य व्यक्ति को काटता है तब भी डेंगू का संक्रमण फैलता है। इस बीमारी में सही टाइम पर सही इलाज मिलना बहुत ही जरूरी है। ये बातें मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, रांची के इंटरनल मेडिसीन के विशेषज्ञ डॉ नीलाभ कुमार सिंह ने डेंगू के बढ़ते मामले पर मीडिया से बातचीत के दौरान कहीं। उन्होंने कहा कि डेंगू के मुख्य लक्षणों में तेज बुखार, हड्डियों और जोड़ों में तेज दर्द, त्वचा पर लाल चकते, रक्त स्राव आदि लक्षण दिखते है। इसमें मरीज को इतना अधिक दर्द होता है कि इसे ब्रेक बोन फीवर भी कहते है। आम मौसमी बुखार में ये सब लक्षण नहीं होते हैं। इसमें अगर इलाज और परहेज नहीं हो तो मरीज की जान भी जा सकती है। डॉ सिंह बताते हैं कि यह एडिस इजिप्ती नामक मच्छर के काटने से फैलता है। ये मच्छर डेंगू वायरस के वाहक होते है। ये मच्छर दिन के समय काटते हैं। खासकर सुबह में और शाम होने से एक घंटे पहले के समय ज्यादा काटते हैं। ये आमतौर पर बरसात के बाद पनपते हैं। इससे बचने के लिए सबसे जरूरी है कि अपने घर के आसपास बरसात का पानी जमा नहीं होने दें। कूलर या किसी अन्य चीज में साफ पानी लंबे समय तक जमा नहीं रहे। याद रखें इसका मच्छर साफ पानी में पनपता है। डेंगू का मच्छर अक्सर दिन के समय काटता है। इसलिए दिन में मच्छरों के काटने से खुद को बचाएं। इन दिनों फुल बाजू के कपड़े और पावों में जूते पहन कर रहें। शरीर को कहीं से भी खुला ना छोड़ें। रात में सोते समय मच्छरदानी लगाना बचाव का सबसे सही तरीका है। मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, रांची के इंटरनल मेडिसीन के विशेषज्ञ डॉ नीलाभ कुमार सिंह ने कहा कि डेंगू में मरीज को तेज दर्द होता है। इसमें सेल से तेजी से प्लाज्मा लिकेज होने लगता है जिससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इसमें लिक्विड डाइट और पानी अधिक लेना चाहिए। यह चार से पांच दिन तक रहता है। इसमें मरीज का विशेष ख्याल रखने की जरुरत होती है। अधिक परेशानी होने पर अपने नजदीकी डॉक्टर से संपर्क करना जरुरी होता है। डॉ नीलाभ कुमार सिंह कहते हैं कि मेदांता अस्पताल रांची में डेंगू का बेहतर इलाज उपलब्ध है। यहां अनुभवी डॉक्टरों द्वारा आधुनिक तकनीक से मरीजों का इलाज किया जाता है। देश और दुनिया की सबसे लेटेस्ट तकनीक और इलाज को यहां अपनाया जाता है।

Published / 2022-08-29 17:46:30
स्टडी का दावा : एंटीवायरल दवा "टेकोविरिमैट" मंकीपॉक्स के इलाज में असरदार

एबीएन हेल्थ डेस्क। एक नए अध्ययन में एंटीवायरल दवा टेकोविरिमैट के मंकीपॉक्स संक्रमण के उपचार में प्रभावी होने की बात सामने आई है। मंकीपॉक्स से संक्रमित 25 रोगियों पर किये गये इस छोटे अध्ययन को पत्रिका जेएएमए में प्रकाशित किया गया है। मंकीपॉक्स के रोगियों का उपचार एंटीवायरल के साथ किए जाने के परिणामों का यह सबसे शुरुआती आकलन है। टेकोविरिमैट (टीपीओएक्सएक्स) चेचक के उपचार में इस्तेमाल होने वाली एंटीवायरल दवा है। यह दवा वायरस की बाहरी परत को खोलने वाले प्रोटीन की क्रिया को बाधित कर शरीर में वायरस के प्रसार को सीमित करती है। अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (सीडीसी) ने हाल ही में डॉक्टरों को मंकीपॉक्स सहित अन्य ऑर्थोपॉक्स वायरस के संक्रमण वाले मरीजों के उपचार के लिए टेकोविरिमैट का इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी। प्रमुख अध्ययनकर्ता और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में वरिष्ठ संक्रामक रोग विशेषज्ञ एंजिल देसाई ने कहा, मंकीपॉक्स संक्रमण के लिए टेकोविरिमैट के इस्तेमाल पर हमारे पास बहुत सीमित क्लीनिकल आंकड़े हैं। रोग के प्राकृतिक रूप से पनपने के बारे में और इस पर टेकोविरिमैट तथा अन्य एंटीवायरल दवाओं के प्रभाव के बारे में जानने के लिए और अध्ययन किए जाने की जरूरत है।

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