विश्व मस्तिष्क ट्यूमर दिवस : देश में 11 फीसदी की दर से बढ़ रहे मामलेएबीएन सेंट्रल डेस्क। नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ केबी शंकर बताते हैं कि डिजिटल स्क्रीन का संबंध सीधे मस्तिष्क और उससे जुड़े विकारों से है। इसे लेकर अब तक कई अध्ययन भी सामने आए हैं। हालांकि, जिस तरह कुछ साल पहले तक फेफड़े के कैंसर और धूम्रपान के बीच संबंध स्थापित नहीं हुआ था।उसी तरह फोन और ब्रेन ट्यूमर के बीच संबंध विधिवत स्थापित नहीं है, लेकिन अगले 5-10 साल में यह प्रमाणित हो जाएगा कि मोबाइल फोन की वजह से इसके मामले बढ़ रहे हैं। इसके अलावा तनावपूर्ण जीवन शैली, प्रदूषण और खानपान भी इसके कारण हैं।विशेषज्ञों के अनुसार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए ब्रेन ट्यूमर की जल्दी पहचान हो सकती है। जिन शहरों में विशेषज्ञता युक्त अस्पताल नहीं है, वहां जिला अस्पतालों में इस तरह की मशीनें होनी चाहिए। मौजूदा समय में ज्यादातर एमआरआई मशीन एआई आधारित हैं, यह मस्तिष्क में ट्यूमर की सही जगह के साथ उसके आसपास की कोशिकाओं के बारे में भी बता सकती हैं।दिल्ली स्थित जीबी पंत सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के डॉ दलजीत सिंह बताते हैं कि हर ट्यूमर की सर्जरी भी जरूरी नहीं होती। अगर मरीज का ट्यूमर बहुत छोटा है, तो पहले दवाएं दी जाती हैं। एक निश्चित समय तक मरीज में दवाओं का असर देखा जाता है। फिर से उसकी एमआरआई कराते हैं और देखते हैं कि ट्यूमर के आकार में कोई बदलाव आया या नहीं। अगर आकार नहीं बदला है तो सर्जरी को टाला भी जा सकता है।डॉक्टरों के अनुसार, ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी को लेकर अब पहले जैसी स्थिति नहीं है। भारतीय अस्पतालों में कई ऐसी तकनीक मौजूद हैं, जिनके जरिये कम समय, छोटे कट और कम खर्च में ट्यूमर निकाला जा सकता है। इसके अलावा एंडोस्कोपिक ब्रेन ट्यूमर सर्जिकल प्रक्रिया है। गैर-इनवेसिव प्रक्रिया एलआईटीटी यानी लेजर प्रेरित एब्लेशन ट्यूमर थेरेपी और गामा नाइफ का भी इस्तेमाल होता है।
सीरम इस्टीट्यूट ने टीबी का पता लगाने वाले अपने टीके के परीक्षण की मांगी अनुमति, सरकार को लिखा पत्र एबीएन हेल्थ डेस्क। सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (एसआईआई) ने अव्यक्त तपेदिक (लेटेंट ट्यूबरक्लोसिस) का पता लगाने वाले अपने सीवाई-टीबी इंजेक्शन के इन-हाउस परीक्षण की अनुमति देने का केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से आग्रह किया है। आधिकारिक सूत्रों ने बुधवार को यह जानकारी दी। अव्यक्त टीबी से संक्रमित व्यक्तियों में इसके कोई लक्षण नहीं होते हैं और यह संक्रमित व्यक्तियों से अन्य व्यक्तियों में नहीं फैल सकती है। इसका इलाज नहीं मिलने पर उन व्यक्तियों में बाद में टीबी की बीमारी हो सकती है। एसआईआई ने कहा है कि इस उत्पाद के लिए परीक्षण की सुविधा देश की किसी भी सरकारी प्रयोगशाला में उपलब्ध नहीं है। सूत्रों ने बताया कि इस संबंध में एक पत्र एसआईआई के निदेशक प्रकाश कुमार सिंह ने लिखा है। सिंह ने पत्र में लिखा है भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) ने 9 मई, 2022 को सीवाई-टीबी इंजेक्शन के बाजार अनुज्ञप्ति को मंजूरी दे दी थी, लेकिन मंजूरी के एक साल बाद भी, भारत में किसी भी सरकारी प्रयोगशाला में परीक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण सीवाई-टीबी बाजार में उपलब्ध नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, ऐसी जानकारी मिली है कि सिंह ने यह भी उल्लेख किया है कि सीवाई-टीबी अव्यक्त टीबी का पता लगाने के लिए महत्वपूर्ण है और सरकार को इसके इन-हाउस परीक्षण की अनुमति देनी चाहिए ताकि भारत और दुनिया में बड़े पैमाने पर टीका उपलब्ध कराया जा सके। डीजीसीए ने एसआईआई के सीवाई-टीबी टीके के लिए बाजार अनुज्ञप्ति प्रदान किया था, जिसका उपयोग 18 वर्ष और उससे अधिक आयु वालों के लिए अव्यक्त टीबी का पता लगाने के वास्ते त्वचा परीक्षण के लिए किया जा सकता है। सरकार ने कहा है कि भारत 2025 तक तपेदिक को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है।
उपलब्धि : धीमी होंगी कैंसर सेल्स की गतिविधियांएबीएन सेंट्रल डेस्क। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सैन फ्रांसिस्को मेडिकल सेंटर के विज्ञानियों के एक दल ने ब्रेन कैंसर की वजह से मौत को टालने और कैंसर के साथ जीवन को आसान बनाने का रास्ता खोज लिया है। भारतीय मूल की वैज्ञानिक सरिता कृष्णा के नेतृत्व मे किए गए शोध में पता चला है कि कैंसर कोशिकाएं स्वस्थ मस्तिष्क कोशिकाओं के साथ जुड़कर अतिसक्रिय हो जाती हैं, जो संज्ञानात्मक क्षमताओं की क्षति और मृत्यु का कारण बनती हैं। विज्ञान शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित इस शोध के नतीजों से कैंसरग्रस्त ब्रेन ट्यूमर के इलाज में बड़ा बदलाव होगा। इसे खासतौर पर ग्लियोब्लास्टोमा कैंसर रोगियों के इलाज के लिहाज से महत्वपूर्ण खोज माना जा रहा है। यह सबसे घात मस्तिष्क कैंसर होता है। ग्लियोब्लास्टोमा कैंसर से पीड़ित रोगी अधिकतम 15 माह तक जीवित रह पाते हैं। मस्तिष्क में कैंसर कोशिकाएं संज्ञानात्मक क्षमताओं से जुड़े मस्तिष्क के हिस्से की सामान्य कोशिकाओं पर तेजी से हमला करती हैं, जिससे शुरूआत में व्यक्ति की संज्ञान क्षमताएं-सुनना, देखना, सूंघना, महसूस करने की क्षमता खत्म होती हैं और आखिर में मौत हो जाती है। ट्यूमर को भी रोका जा सकेगा इस शोध की प्रमुख लेखक सरिता कृष्णा बताती हैं कि शोध के दौरान यह भी पता चला कि व्यापक तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली एंटी-सीजर दवा से दिमाग में कैंसर कोशिकाओं की तीव्र गतिविधियों को धीमा करते हुए इनकी वृद्धि को रोका जा सकता है। कृष्णा बताती हैं कि शोध में सबसे अहम जानकारी यह सामने आयी है कि स्वस्थ मस्तिष्क कोशिकाओं और कैंसर कोशिकाओं के बीच होने वाले संचार में हेरफेर कर ट्यूमर के विकास को धीमा करते हुए इसे बढ़ने से रोका भी जा सकता है। दिमाग को हाइजैक कर लेता है ट्यूमर केरल के तिरुवनंतपुरम की रहने वाली कृष्णा ने बताया कि इस अप्रत्याशित खोज से पता चला है कि घातक कैंसर कोशिकाएं आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों को हाईजैक कर उनका पुनर्गठन करती हैं। इससे पैदा होने वाली अतिसक्रियता की वजह से संज्ञानात्मक गिरावट होती है, जो रोगियों के जीवित रहने की अवधि को कम करती है।
अध्ययन का दावा : कोविड प्रसार में कोई खास मौसम जिम्मेदार नहींएबीएन सेंट्रल डेस्क। कोविड महामारी के शुरुआती वर्षों के दौरान विशेषज्ञों ने गर्म और आर्द्र मौसम को वायरस के संचरण के लिए अनुकूल बताया था। अब विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि कोई मौसम विशेष बीमारी फैलने के लिए जिम्मेदार नहीं होता। इस संबंध में अब तक जो भी तथ्य सामने आये हैं, उनसे यह साबित नहीं होता कि मौसम की कोई खास स्थिति वायरस के प्रसार में प्रमुख भूमिका निभाती है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु गुणवत्ता काफी हद तक वायरस फैलने के लिए जिम्मेदार है। वायु गुणवत्ता ने महामारी को फैलाने में एक माध्यमिक भूमिका निभाई है। महामारी के शुरूआती ढाई वर्षों के दौरान दुनिया के अलग-अलग देशों से जो साक्ष्य एकत्रित किये गये थे उनके विश्लेषणों से पता चलता है कि रोग संचरण पर मौसम और वायु गुणवत्ता का प्रभाव गैर- फार्मास्युटिकल हस्तक्षेपों, टीकाकरण अभियानों, प्रतिरक्षा प्रोफाइल में बदलाव, वैरिएंट और व्यवहार में परिवर्तन के प्रभाव की तुलना में गौण रहा है। मार्च 2021 में जब महामारी दुनिया के अधिकांश हिस्सों में सक्रिय थी, तब विशेषज्ञ पैनल ने जो निष्कर्ष प्रस्तुत किए थे, उनके गहन विश्लेषणों से पता चला है कि जलवायु परिस्थितियां वायरस के प्रसार में केवल एक छोटी सहायक भूमिका निभा सकती हैं। वायु प्रदूषण संक्रमण बढ़ाने में सहायक टास्क टीम के अध्यक्ष डॉ. बेन जैचिक ने कहा कि इन विश्लेषणों के निष्कर्ष काफी जटिल हैं और आने वाले वर्षों के दौरान इसकी जांच जारी रहेगी। अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि शोधकर्ताओं ने इस बारे में बहुत कुछ सीखा है कि श्वसन वायरस के प्रसार की भविष्यवाणी करते समय पर्यावरणीय डेटा का उपयोग कैसे किया जा सकता है और कैसे नहीं। श्वसन संबंधी अन्य बीमारियों के अध्ययनों से पता चला है कि वायु प्रदूषण कोविड संक्रमण द्वारा फैलाए गए लक्षणों को बढ़ा सकता है। यह इतना घातक हो सकता है कि संक्रमण की चपेट में आए व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है।
मेदांता रांची के विशेष वर्कशॉप में विशेषज्ञ डॉक्टर ने दी जानकारी पूर्वोत्तर भारत में पहली बार रांची में किया गया ऐसे वर्कशॉप का आयोजन दूसरे अस्पतालों के करीब 80 डॉक्टर हुए वर्कशॉप में शामिल टीम एबीएन, रांची। मानव शरीर में उसका मस्तिष्क सबसे अहम हिस्सा है। अगर मनुष्य के शरीर में कोई बीमारी हो जाती है, चोट लग जाती है, तो उसका समय पर और सही उपचार अत्यंत आवश्यक होता है। वर्तमान में भी चिकित्सा के ऐसे साधन हैं, जिसे अगर वक्त पर इलाज के रूप में प्रयोग किया जाये तो जीवन को बचाया जा सकता है। यह बातें मेदांता रांची की तरफ से 6 और 7 मई को विशेष रूप से आयोजित किये गये वर्कशॉप में हिस्सा लेते हुए विशेषज्ञ डॉक्टरों ने कही। इस वर्कशॉप का आयोजन कंप्रिहेंसिव न्यूरो क्रिटिकल केयर कोर्स के नाम से आयोजित किया गया था। पूर्वोत्तर भारत में कोलकाता के बाद रांची में इस तरह के वर्कशॉप का आयोजन किया गया। इस वर्कशॉप के आर्गनाइजिंग चेयरमैन सह मेदांता रांची के एसोसिएट डायरेक्टर एंड हेड क्रिटिकल केयर, डॉक्टर तापस कुमार साहू ने हिस्सा लेने वाले सभी प्रतिभागियों को मस्तिष्क से जुड़ी सारी बीमारियों के साथ ही ट्रामा के केस में वर्तमान में उपलब्ध इलाज की सुविधा के बारे में जानकारी दी।साथ ही यह भी बताया गया कि इसमें और भी प्रगति होगी। डॉक्टर तापस कुमार साहू ने इस विशेष वर्कशॉप में मस्तिष्क की बीमारी से लेकर उसके इलाज करने तक की अत्याधुनिक तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी दी। आयोजन में न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरो सर्जन, क्रिटिकल केयर और आपातकालीन स्थिति में इलाज करने वाले डॉक्टर उपस्थित थे। वर्कशॉप में इस बात की विशेष जानकारी दी गई कि अगर कोई मरीज आपातकालीन स्थिति में आता है तो कैसे और किस तरीके से उसका बेहतर तरीके से उपचार किया जा सकता है ताकि उसकी जीवन की क्षति न हो। इस विशेष वर्कशॉप में मेदांता गुड़गांव, एम्स दिल्ली व एम्स भुवनेश्वर से आए हुए विशेषज्ञों ने भी वर्कशॉप के थीम से जुड़ी कई अहम जानकारियां दी।वर्कशॉप में रांची के भी कई बड़े हॉस्पिटल के विशेषज्ञ भी उपस्थित थे। आयोजन के जनरल सेक्रेट्री सह मेदांता रांची के न्यूरो एनेस्थीसिया और क्रिटिकल केयर के कंसलटेंट डॉ मनोज कुमार और एसएनसीसी के कोर्स कोआर्डिनेटर डॉ हिमांशु प्रभाकर ने भी कई बिंदुओं पर जानकारी दी। इस वर्कशॉप के आर्गेनाइजिंग चेयरमैन मेदांता रांची के एसोसिएट डायरेक्टर एंड हेड क्रिटिकल केयर के डॉक्टर तापस कुमार साहू थे। जबकि जनरल सेक्रेट्री न्यूरो एनेस्थीसिया और क्रिटिकल केयर के कंसलटेंट डॉ मनोज कुमार थे। कंसलटेंट न्यूरो सर्जन डॉक्टर आनंद कुमार झा और कंसलटेंट न्यूरो फिजीशियन डॉक्टर कुमार विजय आनंद कोर्स के को-चेयरमैन थे। डॉ हिमांशु प्रभाकर एसएनसीसी प्रेसिडेंट कोर्स के कोआॅर्डिनेटर थे। आयोजन में करीब 80 डॉक्टरों को न्यूरो और ब्रेन से जुड़ी अलग-अलग बीमारियों और इलाज के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। इस विशेष वर्कशॉप के बारे में मेदांता रांची के हॉस्पिटल डायरेक्टर विश्वजीत कुमार ने कहा कि मेदांता रांची वक्त वक्त पर ऐसे आयोजन करते रहता है। हमारा उद्देश्य बीमारियों के इलाज और अत्याधुनिक सुविधा के साथ लोगों को मदद कैसे पहुंचाई जा सकती है? इसके बारे में विस्तृत जानकारी हासिल करना होता है। मेदांता रांची आगे भी अलग-अलग विषयों पर ऐसे वर्कशॉप का आयोजन करता रहेगा।
हर साल 45 लाख से अधिक महिलाओं, शिशुओं की गर्भावस्था के दौरान मृत्यु हो जाती है : डब्ल्यूएचओएबीएन सोशल डेस्क। दुनियाभर से हर साल 45 लाख से अधिक महिलाओं और शिशुओं की मृत्यु गर्भावस्था के दौरान, बच्चे के जन्म के समय या जन्म के कुछ सप्ताह के अंदर हो जाती है। संयुक्त राष्ट्र ने मंगलवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की जारी एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह जानकारी दी। संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि हर साल 45 लाख से अधिक महिलाओं और शिशुओं की मृत्यु गर्भावस्था, प्रसव या जन्म के पहले सप्ताह के दौरान होती है, जो हर सात सेकंड में एक मौत के बराबर है। समय से चिकित्सा नहीं मिलने और उचित देखभाल के अभाव में ज्यादतर ये मौतें होती हैं। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि पिछले आठ वर्षों के अंदर गर्भवती महिलाओं, माताओं और शिशुओं की मृत्यु दर में कमी नहीं पायी गयी है, क्योंकि उनकी स्वास्थ्य देखभाल में निवेश में कटौती की गयी है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, वर्ष 2015 से, हर साल लगभग 2.90 लाख माताओं की मृत्यु हो जाती है, साथ ही 28 सप्ताह की गर्भावस्था के बाद 19 लाख बच्चे और जन्म के बाद, पहले महीने के भीतर 23 लाख शिशु मर जाते हैं। डब्ल्यूएचओ के मातृ, नवजात, बाल और किशोर स्वास्थ्य और वृद्धावस्था के निदेशक डॉ अंशु बनर्जी के हवाले से संरा ने कहा, गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की मृत्यु दुनिया भर में अस्वीकार्य रूप से उच्च दर पर हो रही है और कोविड-19 महामारी ने उन्हें आवश्यक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए और अधिक झटके दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिणी अफ्रीकी देश, मध्य और दक्षिण एशिया ज्यादातर नवजात और मातृ मृत्यु दर से प्रभावित क्षेत्र हैं। संयुक्त राष्ट्र ने कहा, कि महिलाओं और शिशुओं के जीवन को बचाने के लिए प्रसव से पहले, प्रसव के दौरान और बाद में स्वास्थ्य विशेषज्ञ, गुणवत्तापूर्ण, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ होनी चाहिए। इसके अलावा, स्वच्छ वातावरण, स्वच्छ पानी और बिजली आपूर्ति, सस्ती दवाएं उपलब्ध होनी चाहिए। एजेंसी ने बताया कि वर्तमान रुझानों के संबंध में 60 से अधिक देश 2030 तक संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में निर्धारित मातृ और नवजात मृत्यु दर को पूरा करने में विफल रहेंगे।
देखने में हो रही थी परेशानी, रिम्स के डॉक्टरों ने किया सफल ऑपरेशनटीम एबीएन, रांची। झारखंड का प्रसिद्ध सरकारी अस्पताल रिम्स यूं तो अव्यवस्था को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहता है, लेकिन यहां कई मरीजों को नया जीवन भी मिलता है। अनुभवी डॉक्टरों की टीम ने मौत के मुंह से अब तक कई मरीजों को निकाला है और उन्हें नयी जिंदगी दी है।रांची जिले की एक महिला ट्यूमर से परेशान थी। उसकी आंख बाहर निकल आयी थी। इस कारण देखने में उसे काफी दिक्कत हो रही थी। कई जगहों पर उसने इलाज कराया, लेकिन राहत नहीं मिली। आखिरकार उसने रिम्स में इलाज कराया। न्यूरो सर्जरी विभाग के डॉ प्रो सीबी सहाय की यूनिट में ट्यूमर का सफल ऑपरेशन किया गया। डॉ विकास ने जानकारी दी है कि यह एक रेयर टाइप ऑपरेशन था।ट्यूमर के कारण देखने में हो रही थी दिक्कतरांची जिले के सिकिदिरी की रहने वाली महिला (44 वर्ष) पिछले 5-6 वर्षों से ट्यूमर से परेशान थी। यह ट्यूमर आंख के पीछे एवं ब्रेन के निचले हिस्से में था।इसकी वजह से एक आंख बाहर निकल आयी थी। इस वजह से मरीज को देखने में काफी परेशानी हो रही थी। इलाज के लिए वह कई अस्पताल में दौड़ती रही। आखिरकार इलाज कराने रिम्स पहुंची।रिम्स के न्यूरो सर्जरी विभाग के डॉ प्रो सीबी सहाय की यूनिट में एडमिट हुई और मंगलवार को न्यूरो सर्जरी विभाग एवं नेत्र विभाग की टीम ने महिला मरीज का सफल ऑपरेशन किया। ट्यूमर आसपास फैल चुका था। डॉ विकास ने बताया कि यह एक रेयर टाइप ऑपरेशन था।इस टीम में न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉक्टर प्रो सीबी सहाय और उनकी टीम में रोहित भारती, विकास कुमार, डॉ अशोक एवं नेत्र विभाग की डॉ सिंधु एवं डॉ जेनिफर शामिल थे।
दुनिया में पहली बार डॉक्टरों ने किया ऐसा चमत्कारएबीएन नॉलेज डेस्क। चिकित्सकों की एक टीम ने मां के गर्भ में ही पल रहे एक अजन्मे बच्चे की ब्रेन सर्जरी कर चमत्कार किया है। इस तरह की यह दुनिया की पहली सर्जरी है। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी डॉक्टरों की एक टीम ने गर्भ में पल रहे बच्चे के मस्तिष्क के अंदर एक दुर्लभ रक्त वाहिका की असामान्य स्थिति का इलाज करने के लिए उसकी ब्रेन-सर्जरी की है।अमेरिकी शहर बोस्टन में डॉक्टरों की एक टीम ने यह सफल सर्जरी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गैलेन मालफॉर्मेशन की नस के रूप में जानी जाने वाली दुर्लभ बीमारी का इलाज करने के लिए सफलतापूर्वक भ्रूण की सर्जरी की गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्भ के अंदर हुई यह सर्जरी अल्ट्रासाउंड-गाइडेड प्रक्रिया थी। यह सर्जरी मार्च में हुई थी लेकिन इसके बारे में पूरी रिपोर्ट गुरुवार को स्ट्रोक जर्नल में प्रकाशित हुई है। सीएनएन के मुताबिक, गैलेन मालफॉर्मेशन की स्थिति तब विकसित होती है, जब ब्रेन से हार्ट तक खून पहुंचाने वाली रक्त नलिका का विकास भ्रूण के अंदर नहीं हो पाता है।इस नली के विकसित नहीं होने से बच्चे के विकास पर बुरा असर पड़ता है और उसे कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है। बोस्टन चिल्ड्रन हॉस्पिटल के रेडियोलॉजिस्ट के स्पेशलिस्ट डॉ डैरेन ओरबैक ने बताया कि ऐसी स्थिति में बच्चे के ब्रेन स्ट्रोक या हार्ट फेल होने का खतरा रहता है। ओरबैक के मुताबिक, आमतौर पर ऐसे मामलों में बच्चे के जन्म लेने के बाद उसका इलाज किया जाता है और उसके ब्रेन में एक कैथेटर डालकर उसके ब्लड सप्लाई की गति को कम किया जाता है। बतौर डॉक्टर इस प्रक्रिया में 50 से 60 फीसदी बच्चे बहुत कमजोर हो जाते हैं और उनकी स्थिति गंभीर हो जाती है। ऐसे मामलों में मृत्युदर भी 40 फीसदी के करीब होती है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। कोरोना के बाद गढ़वा में मलेरिया का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। आलम ये है कि गढ़वा जिले के 7 प्रखंड डेंजर जोन में आ गये हैं। इन 7 प्रखंडों में मलेरिया का खतरा लगातार बढ़ रहा है। हालांकि स्वास्थ्य महकमा बीमारी की रोकथाम को लेकर अभियान चला रहा है, लेकिन जरूरी है कि आम जनता भी सावधानियां बरतें। गढ़वा जिले में मलेरिया के मरीजों की बढ़ती संख्या से हड़कंप मचा है। एक्शन मोड में आए स्वास्थ्य महकने ने जिले के सात प्रखंडों को डेंजर जोन घोषित कर दिया है। इन प्रखंडों में मेराल, धुरकी, बंशीधर नगर, भवनाथपुर, माझीयाओ, रंका और भंडरिया शामिल हैं।मौसम में बदलाव है वजह : गढ़वा जिले में कभी भीषण गर्मी तो कभी बारिश से मौसम में हो रहे बदलाव के चलते मलेरिया का प्रकोप बढ़ रहा है। अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ती जा रही है। इस बीच स्वास्थ्य विभाग ने बीमारी के रोकथाम को लेकर अभियान चलाया है। जिसके तहत लगभग 25 हजार ऐसे सैम्पल कलेक्ट किये गये, जिन्हें बुखार था। हालांकि सभी सैंपल्स की रिपोर्ट निगेटिव आयी, लेकिन जब सैंपल्स को पटना भेज कर क्रॉस वेरिफिकेशन किया गया तो दो पॉजिटिव मरीज भी मिले। जिसमें एक मेराल और एक माझीयाओ के हैं। रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद स्वास्थ्य विभाग लोगों में जागरुकता फैलाने कोशिश कर रहा है ताकि ज्यादा लोग बीमारी की चपेट में न आये।ग्रामीण इलाकों में भी जागरूकता अभियान : मलेरिया के ज्यादातर मरीज ग्रामीण इलाकों से मिलते हैं ऐसे में ग्रामीण इलाकों में भी जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। जगह-जगह पर डीडीटी का छिड़काव भी किया जा रहा है। मलेरिया मच्छर की फीमेल प्रजाति एनोफिलीज के काटने से फैलता है। इस मच्छर में प्लाज्मोडियम नाम का जीवाणु पाया जाता है। इसी से संक्रमित होकर लोग बीमार पड़ते हैं। मलेरिया के लक्षण शुरुआत के 2 से 3 दिनों के अंदर ही दिखने लगते हैं। मलेरिया होने पर बुखार आना, सिर दर्द होना, उल्टी होना, मन मचलना, ठंड लगना, चक्कर आना, थकान होना, पेट दर्द, थकान और बैचेनी होना जैसे लक्षण शामिल हैं।हालांकि अब तो वैक्सीन्स से मलेरिया का बचाव हो जाता है, लेकिन कई बार ये बीमारी मौत का कारण भी बन जाती है। ऐसे में जरूरी है कि मलेरिया से बचाव के लिए सावधानियां बरती जाये।इसके लिएमच्छर-दानी लगाकर सोएं और सफाई का ध्यान रखें।घर के अंदर और आस-पास मच्छर मारनेवाली दवा छिड़कें।मोस्कीटो रिपेलेंट मशीनों का इस्तेमाल जरूर करें।घर के दरवाज़ों और खिड़कियों पर जाली लगायें।ऐसे कपड़े पहनें जो पूरे शरीर को ढंकें।घर के अंदर या आस-पास पानी जमा ना होने दें।
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