एबीएन हेल्थ डेस्क। प्रकृति में हर गुण विद्यमान है। कहीं प्रकृति औषधीय गुण समेटे हुए है, तो कहीं विष से भी भर पड़ा है। आइये आज ऐसे ही औषधीय गुण से भरपूर एक फल जामुन की चर्चा करते हैं :?अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं।?जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।?पहले के जमाने में गांवों में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था, जिसे जमोट कहते हैं।?दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहां जल के स्रोत बंद नहीं हुए हैं।?भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख केएन श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहां लकड़ी की वो तख्ती साबुत है, जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।?स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है।?एक रिसर्च के मुताबिक जामुन की पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाये जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।?सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाए, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदें मिक्स करके पी सकते हैं।?जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं। इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं, जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।?जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं।तो है न जामुन बड़े ही काम की चीज...
स्वास्थ्य विभाग ने जारी की एडवाइजरी एबीएन हेल्थ डेस्क। कुछ दिन से बारिश और मौसम की वजह से आई फ्लू कंजेक्टिवाइटिस के मामले बढ़ रहे हैं। इसे देख हैल्थ डिपार्टमेंट ने एहतियात के तौर पर एडवाइजरी भी जारी की है। वहीं, पीजीआई एडवांस आई सेंटर के एचओडी डॉ एसएस पांडव की मानें तो 3 दिन में वायरल के केस बढ़े हैं। बुधवार को ओपीडी में आई फ्लू के 50 केस आये। डॉक्टर्स की मानें तो हर सीजन में केस देखे जाते हैं। 5 दिन में वायरल ठीक हो जाता है। डॉक्टर्स के मुताबिक तेज गर्मी के बाद बारिश से मौसम में तेजी से बदलाव आता है। हवा के साथ प्रदूषण और नमी से फंगल इन्फैक्शन की समस्याएं पैदा होती हैं सबसे ज्यादा आंखों से जुड़ी दिक्कतें परेशान करती हैं। फंगल इन्फैक्शन बढ़ने से आंखों का ख्याल रखना बेहद जरूरी होता है। आई फ्लू होने पर जलन, दर्द और लालपन जैसी परेशानी होती है, जिसका कारण एलर्जिक रिएक्शन है। ज्यादातर शुरुआत एक-आंख से होती हैं, कुछ समय बाद दूसरी मैं आ जाती है। फ्लू आमतौर पर अपने-आप ठीक हो जाता है, लेकिन आंखों को साफ रखना बहुत जरूरी है। आई फ्लू के लक्षण और बचाव • आंखें लाल और जलन होना। चुभन और सूजन आना। • पलकों पर पीला और चिपचिपा तरल जमा होना। • खुजली होना और पानी आना। • बार-बार आंखों को न छुएं और साफ पानी से धोते रहें। • साफ करने के लिए टिश्यू पेपर • या साफ कपड़े का इस्तेमाल करें। • मरीज से आई कॉन्टैक्ट न बनायें। • टीवी मोबाइल से दूरी बनायें। • आंखों पर काला चश्मा पहनें। • डॉक्टर के पास जरूर जायें।
झारखंड के इस शहर में तेजी से बढ़ रहे हैं कंजक्टिवाटिस के मरीज, ये हैं लक्षण और बचावएबीएन हेल्थ डेस्क। शहर में इस समय बरसात व गर्मी के कारण कई तरह की बीमारियां फैल रही हैं। इसमें कंजक्टिवाइटिस भी उन्हीं बरसाती बीमारियों में एक है, जो आंखों को संक्रमित कर रहा है। इसको जय बांग्ला भी कहा जाता है। इस बीमारी से बच्चों से लेकर बड़े तक शिकार हो रहे हैं। एमजीएम और सदर अस्पताल में प्रतिदिन दस से 20 मरीज इलाज कराने के लिए ओपीडी में पहुंच रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा स्कूली बच्चे इसके चपेट में आ रहे हैं। इसकी शुरुआत एक आंख से होती है, लेकिन जल्द ही दूसरी आंख भी इसकी चपेट में आ जाती है। लगातार दवा डालने से तीन से पांच दिनों के अंदर यह पूरी तरह ठीक हो जाता है।लक्षणआंख लाल होना, जलन, खुजली, चुभन, तेज दर्द, सूजन, आंख से लगातार पानी गिरना, पलकों पर चिपचिपाहट और आंख में बार-बार कीचड़ का जमा होना।बचावस्वच्छता का पूरा ध्यान रखें, अगर कोई भी लक्षण दिखाई दे तो घर से बाहर न जायें और परिवार में भी लोगों से शारीरिक दूरी बनाकर रखें, आंखों को बार-बार हाथ न लगायें, खुजली होने पर आंखों को बिल्कुल मले नहीं, आई ड्रॉप डालने से पहले और बाद में हाथों को साबुन से अवश्य धो लें, बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न लें।
डब्ल्यूएचओ की चेतावनी- आर्टिफिशियल स्वीटनर आपकी सेहत के लिए जहर! बन सकता है कैंसर का कारणएबीएन हेल्थ डेस्क। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा घोषणा किये जाने के बाद कि आहार पेय में व्यापक रूप से उपयोग किये जाने वाला कृत्रिम मिठास कैंसर का कारण हो सकता है, डॉक्टर्स एसोसिएशन कश्मीर (डीएके) ने शुक्रवार को इसे गंभीर चिंता का विषय कहा। डीएके के अध्यक्ष डॉ निसार उल हसन ने कहा कि आहार पेय लोगों के जीवन का नियमित हिस्सा बन चुका है और इन पेय पदार्थों से कैंसर का संबंध होना खतरनाक है।उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ की शाखा इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) ने कृत्रिम मिठास एस्पाट्रेम को लीवर कैंसर के बढ़ते खतरे से जोड़ा है। यह निष्कर्ष अमेरिका और यूरोप में किये गये तीन बड़े मानव अध्ययनों पर आधारित है, जिन्होंने कृत्रिम रूप से मीठे पेय पदार्थों की जांच की। इसमें कहा गया कि यह जोखिम विशेष रूप से उन लोगों में ज्यादा है जो इन शीतल पेय को ज्यादा पीते हैं।डीएके अध्यक्ष निसार ने कहा कि मोटापे और मधुमेह की बढ़ती चिंताओं के परिणामस्वरूप कम चीनी वाले खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों में एस्पार्टेम का अत्यधिक उपयोग हुआ है, कम कैलोरी वाले कृत्रिम मिठास का उपयोग डाइट कोक, पेप्सी, शून्य चीनी और अन्य आहार सोडा में चीनी के विकल्प के रूप में किया जाता है, जिसका उद्देश्य यह है कि कृत्रिम मिठास उपभोक्ताओं के शरीर का वजन को संतुलित करने और गैर-संचारी रोगों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।उन्होंने कहा कि हालांकि, शोध में पाया गया है कि फ्री शुगर की जगह एस्पार्टेम जैसे कृत्रिम मिठास से लंबी अवधि में वजन कंट्रोल करने में मदद नहीं मिलती है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम मिठास को मधुमेह और हृदय रोग में वृद्धि के साथ-साथ उच्च मृत्यु जोखिम से भी जोड़ा गया है।डॉ निसार ने कहा- लोगों को आहार पेय से बचना चाहिए क्योंकि एस्पार्टेम से कोई स्वास्थ्य लाभ प्राप्त नहीं होता है और यह एक संभावित कैंसरकारी तत्व है। उन्हें आहार में मिठास को अत्यधिक कम करना चाहिए। खाद्य उद्योग को कृत्रिम मिठास के बिना उत्पाद तैयार करने के अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
जल्द शुरू होगा वैक्सीनेशन, रिम्स में जल्द शुरू होगा येलो फीवर वैक्सीनेशनराज्य में बढ़ते येलो फीवर केस को लेकर हुआ फैसलायेलो फीवर को लेकर अलर्ट मोड पर स्वास्थ्य विभागटीम एबीएन, रांची। झारखंड में येलो फीवर को लेकर अलर्ट जारी कर दिया गया है। तेजी से फैल रहे येलो फीवर को लेकर सरकार और प्रशासन भी एक्शन मोड में नजर आ रहे हैं। इस देखते हुए झारखंड वासियों के लिए राहतभरी खबर सामने आयी है। अब प्रदेश वासियों को येली फीवर के वैक्सीनेशन के लिए राज्य से बाहर नहीं जाना पड़ेगा। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग भी कमर कसना शुरू कर दिया है। इसके लिए फकटर में जल्द ही येलो फीवर वैक्सीनेशन शुरू किया जायेगा। जिसके लिए तैयारी लगभग पूरी कर ली गयी है और अब जल्द ही लोगों को येलो फीवर का टीका लगना शुरू हो जायेगा।बुधवार को केंद्र सरकार की ओर से रीजनल हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर अधिकारी डॉ कैलाश कुमार रिम्स पहुंचे थे और अपने टीम के साथ सेंटर खोलने के लिए निरीक्षण भी कर रहे थे। जैसे ही सर्टिफिकेशन मिलता है, वैसे ही येलो फीवर वैक्सीनेशन की शुरूआत कर दी जायेगी। इसके लिए रिम्स के पीएसएम विभाग में दो कमरे भी आवंटित कर दिये गये हैं।कैसे फैलता है येलो फीवरआपको बता दें कि एक खास प्रजाति के मच्छर की वजह से येलो फीवर फैलता है। इसके वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट की जरूरत विदेश जाने से पहले पड़ती है। येलो फीवर वायरस से उत्पन्न एक हैमरैजिक रोग है, जो संक्रमित मच्छर के काटने से इंसान में फैलता है। इस बुखार को येलो फीवर इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें येलो शब्द पीलिया की ओर संकेत करता है। कुछ रोगियों में इसके लक्षण भी देखे जाते हैं और यह बुखार मनुष्य के पूरे शरीर को ही प्रभावित कर के रख देता है।
डब्ल्यूएचओ की स्टडी रिपोर्ट दे रही टेंशनएबीएन हेल्थ डेस्क। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर पर रिसर्च करने वाली एजेंसी ने अपनी स्टडी में पाया है कि आर्टिफिशियल स्वीटनर ड्रिंक्स में कैंसर पैदा करने वाले तत्व हो सकते हैं। यह स्टडी अगले महीने प्रकाशित होने वाली है। स्टडी में पाया गया है कि कोल्ड ड्रिंक्स और च्यूइंगगम में भी कैंसर पैदा करने वाले तत्व हो सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़ी संस्था इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) की स्टडी में यह जानकारी दी गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएआरसी की इस रिपोर्ट को हाल ही में मंजूरी दी गई है और जुलाई में इसे प्रकाशित किया जायेगा।इस स्टडी में यह नहीं बताया गया है कि किसी इंसान को कितनी मात्रा में इन चीजों को खाना-पीना चाहिए। इस बारे में डब्ल्यूएचओ की एक और एजेंसी जेईसीएफए है, जिसकी ओर से इसे लेकर एडवाइजरी जारी की जा सकती है। आईएआरसी ने पहले भी ऐसी कई रिपोर्ट्स दी हैं, जिसकी दुनिया भर में चर्चा हुई थी। यही नहीं कई मामले तो अदालत तक भी पहुंचे और मैन्युफैक्चरर्स को अपने आइटम्स की रेसिपी में बदलाव करना पड़ा था। कुछ कंपनियां यह भी आरोप लगाती रही हैं कि आईएआरसी की स्टडी जनता को भ्रमित करने वाली रही है।डब्ल्यूएचओ की एक और संस्था जेईसीएफए इस रिपोर्ट का अध्ययन कर रही है। इसके बाद उसकी ओर से एक लिस्ट जारी की जा सकती है, जिसमें कैंसर के खतरे वाली चीजों की जानकारी हो सकती है। 14 जुलाई को आईएआरसी की रिपोर्ट का प्रकाशन होना है।जेईसीएफए के मुताबिक 60 किलोग्राम वजन वाले किसी भी वयस्क को 12 से 36 कैन सोडा ही पीना चाहिए। इससे अधिक का सेवन करना खतरनाक हो सकता है। इस रिपोर्ट का अमेरिका और यूरोप समेत दुनिया भर के देशों में पालन किया जाता है और एडवाइजरी के तौर पर इस्तेमाल होता है।एआरसी की रिपोर्ट्स का दुनिया भऱ में असर देखने को मिलता रहा है। इसी संस्था ने 2015 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ग्लिफोसेट, जो एक तरह का कीटनाशक होता है, से भी कैंसर का खतरा होता है। इस दवा को पत्तेदार फसलों को कीटों से बचाव के लिए छिड़का जाता रहा है। उसकी इस रिपोर्ट पर अदालतों में भी मामले चले। गौरतलब है कि उस रिपोर्ट के बाद से ही यह आम धारणा बनी है कि कीटनाशक के अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा होने वाली फसल में कैंसरकारक तत्व होते हैं।
उपलब्धिकैंसर टीके की खोज में वैज्ञानिकों को मिली सफलताअगले पांच वर्षों में और अधिक आयेंगे टीकेएबीएन हेल्थ डेस्क। जानलेवा कैंसर से लोगों को बचाने के लिए दशकों से चली आ रही खोज में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह खोज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। कैंसर के इलाज में अब अगली बड़ी प्रगति टीका हो सकती है। इन्होंने संभावना व्यक्त की है कि अगले पांच वर्षों में और अधिक टीके आयेंगे।अमेरिका के राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के डॉ जेम्स गुले ने कहा है कि इन टीकों के जरिये कैंसर कोशिकाओं को खोजने और मारने के लिए इंसानों की प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ा सकते हैं। इसके लिए एमआरएनए तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जिसे हाल ही में कोरोना महामारी को लेकर इस्तेमाल में लाया गया। अमेरिका के सिएटल स्थित यूडब्ल्यू मेडिसिन के डॉ नोरा डिसिस का कहना है कि कैंसर के खिलाफ टीका विकसित करने के लिए उसे इन्सानों की प्रतिरक्षा प्रणाली की टी कोशिकाओं के रूप की पहचान करना सिखाना है। इसके बाद शरीर में कहीं भी पहुंचने पर टी कोशिकाओं से जुड़े खतरे का पता लगा सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उनकी यह खोज पूरी दुनिया के लिए एक नया वरदान साबित हो सकती है, जिसमें भारत भी शामिल है। हाल ही के अध्ययनों से यह पता चला है कि भारत में कैंसर के मामले 2022 में 14.6 लाख से बढ़कर 2025 में 15.7 लाख तक पहुंच सकते हैं। ऐसे में लगातार बढ़ते बीमारी के दायरे को टीका के जरिए रोकने में सफलता हासिल की जा सकती है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) हार्ट अटैक के मामलों में एकदम हुए इजाफे और कोविड-19 वैक्सीन के बीच संभावित कनेक्शन का पता लगाने के लिए स्टडी की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हार्ट अटैक और कोविड वैक्सीन की कनेक्शन से जुड़ी स्टडी को अगले दो हफ्तों में जारी किया जा सकता है।आइसीएमआर के डायरेक्टर-जनरल राजीव बहल के हवाले से इसकी जानकारी दी गयी है। पिछले कुछ महीनों में हार्ट अटैक के कई सारे मामले सामने आये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, रिसर्चर्स ने कुछ शुरुआती नतीजों का पता भी लगाया है। फिलहाल लोगों के बीच इस स्टडी को सामने लाने से पहले वे नतीजों की समीक्षा का इंतजार कर रहे हैं। इंडियन जर्नल आफ मेडिकल रिसर्च (आइजेएमआर) के जरिए इस रिसर्च पेपर को स्वीकार भी कर लिया गया है। वर्तमान में रिसर्च पेपर या कहें स्टडी का स्वतंत्र मूल्यांकन चल रहा है। हार्ट अटैक के लगातार सामने आ रहे मामलों की वजह से आम जनता काफी चिंतित नजर आ रही है। रिसर्चर्स ने हार्ट अटैक और वैक्सीन के लिंक का पता लगाने के लिए चार अलग-अलग स्टडी की है। इस चारों स्टडी को जोड़कर एक स्टडी तैयारी की जा रही है, जिसे जारी किया जायेगा। पहली स्टडी में इस बात पर केंद्रित है कि आखिर युवा लोगों की अचानक हो रही मौतों की वजह क्या है? दूसरी स्टडी अचानक हार्ट अटैक से हुई मौत की अलग-अलग वजहों का पता लगाने पर केंद्रित है, जिसमें वैक्सीनेशन, कोविड संक्रमित होने के बाद के प्रभाव और बीमार पड़ने पर मरीज की गंभीरता को भी ध्यान में रखा गया है। कोविड संक्रित होकर अस्पताल में होने वाले मरीजों पर कउटफ ने एक साल तक नजर रखी है। इस स्टडी के लिए 40 अस्पतालों से डाटा लिया गया है। तीसरी स्टडी भी अचानक हुई मौतों पर केंद्रित हैं, जिसमें बड़ी संख्या में ऐसे लोगों की पहचान की गई है, जिनकी मौत अचानक हार्ट अटैक आने या ब्रेन स्ट्रोक की वजह से हुई है। वहीं, चौथी स्टडी उन लोगों पर केंद्रित है, जिन्हें हार्ट अटैक तो आया, मगर इसकी वजह से उनकी मौत नहीं हुई। इस साल मार्च के महीने में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने एक मीडिया कार्यक्रम में कउटफ की स्टडी का ऐलान किया था। उन्होंने कोविड-19 के बाद हार्ट अटैक की वजह से हुई मौतों के बढ़ते मामले की बात को स्वीकार किया था। उनका कहना था कि हार्ट अटैक की वजह से होने वाली मौतों से पैदा हुआ आंकड़ों की एम्स दिल्ली के रिसर्चर्स समीक्षा कर रहे हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। अध्ययन दल ने डीओटीएमए नामक एक धनायनित लिपिड अणु के साथ डीएनए नैनोकेज को क्रियाशील किया, जिसमें एक सकारात्मक रूप से आवेशित शीर्ष समूह और एक हाइड्रोफोबिक श्रृंखला होती है। ड्रग्स या टीके, ज्यादातर मामलों में, कार्रवाई की जगह के अलावा अन्य जगहों पर दिये जाते हैं। उपयोगी होने के लिए उन्हें अपनी कार्रवाई की साइट पर जाना चाहिए। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर के जैविक इंजीनियरिंग अनुशासन के शोधकर्ताओं ने कुशल दवा वितरण के लिए एक नया दृष्टिकोण सुझाया है। नैनोकैज नामक डीएनए से बनी छोटी संरचनाएं अक्सर दवा को कोशिका में प्रवेश करने के लिए नियोजित की जाती हैं। हालांकि, जब नकारात्मक रूप से आवेशित नैनोकैज कोशिका झिल्ली के संपर्क में आते हैं, जो हाइड्रोफोबिक है, तो वे प्रतिकर्षण का अनुभव करते हैं, जिससे उन्हें कोशिका में प्रवेश करने से रोका जा सकता है। चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए डीएनए नैनोस्ट्रक्चर की दक्षता बढ़ाने के लिए सेलुलर उत्थान को अधिकतम करने के लिए सुधार की आवश्यकता है। हमने इन नैनो पिंजरों को कोशिकाओं में अधिक कुशलता से प्रवेश करने में मदद करने के लिए संशोधित करने का एक तरीका खोज लिया है, डॉ रमेश सिंह ने बताया। अध्ययन दल ने डीओटीएमए नामक एक धनायनित लिपिड अणु के साथ डीएनए नैनोकेज को क्रियाशील किया, जिसमें एक सकारात्मक रूप से आवेशित शीर्ष समूह और एक हाइड्रोफोबिक श्रृंखला होती है। डॉ सिंह बताते हैं, डीओटीएमए में डीएनए-नैनोकेज और सेल मेम्ब्रेन दोनों के प्रति एक समानता है, जो नैनोकेज को कोशिकाओं के अंदर जाने में मदद करती है। टीम ने एक मॉडल नैनोकेज, डीएनए टेट्राहेड्रॉन के संशोधन के लिए इसका परीक्षण किया और पाया कि संशोधित नैनोकेज को कैंसर कोशिकाओं द्वारा असंशोधित लोगों की तुलना में बहुत बेहतर तरीके से लिया गया था और गैर-कैंसर कोशिकाओं पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ा। डीएनए नैनोकैज के कार्यात्मककरण की इस पद्धति में, हमने संरचनात्मक बाधा को संबोधित किया, जिससे वितरण के लिए पर्याप्त मात्रा में नैनोकैरियर्स के सेलुलर उत्थान में वृद्धि हुई, टीम कहते हैं। दवाओं और अन्य उपचारों को अधिक प्रभावी ढंग से वितरित करने में सहायता के लिए इस विधि का उपयोग विभिन्न डीएनए नैनो-संरचनाओं के लिए किया जा सकता है। यह वैज्ञानिकों को संशोधित नैनोकैज के संभावित अनुप्रयोगों की जांच के लिए अधिक प्रभावी ढंग से और आगे के शोध के लिए कैंसर के इलाज के नए तरीके विकसित करने में मदद कर सकता है। यह नई विधि जीन ट्रांसफेक्शन और लक्षित बायोइमेजिंग में भी उपयोगी होगी। टीम में रमेश सिंह, पंकज यादव, हेमा नवीना ए और धीरज भाटिया शामिल हैं। यह अध्ययन नैनोस्केल जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
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