टीम एबीएन, रांची। झारखंड में येलो फीवर को लेकर अलर्ट जारी कर दिया गया है। तेजी से फैल रहे येलो फीवर को लेकर सरकार और प्रशासन भी एक्शन मोड में नजर आ रहे हैं। इस देखते हुए झारखंड वासियों के लिए राहतभरी खबर सामने आयी है।
अब प्रदेश वासियों को येली फीवर के वैक्सीनेशन के लिए राज्य से बाहर नहीं जाना पड़ेगा। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग भी कमर कसना शुरू कर दिया है। इसके लिए फकटर में जल्द ही येलो फीवर वैक्सीनेशन शुरू किया जायेगा। जिसके लिए तैयारी लगभग पूरी कर ली गयी है और अब जल्द ही लोगों को येलो फीवर का टीका लगना शुरू हो जायेगा।
बुधवार को केंद्र सरकार की ओर से रीजनल हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर अधिकारी डॉ कैलाश कुमार रिम्स पहुंचे थे और अपने टीम के साथ सेंटर खोलने के लिए निरीक्षण भी कर रहे थे। जैसे ही सर्टिफिकेशन मिलता है, वैसे ही येलो फीवर वैक्सीनेशन की शुरूआत कर दी जायेगी। इसके लिए रिम्स के पीएसएम विभाग में दो कमरे भी आवंटित कर दिये गये हैं।
कैसे फैलता है येलो फीवर
आपको बता दें कि एक खास प्रजाति के मच्छर की वजह से येलो फीवर फैलता है। इसके वैक्सीनेशन सर्टिफिकेट की जरूरत विदेश जाने से पहले पड़ती है।
येलो फीवर वायरस से उत्पन्न एक हैमरैजिक रोग है, जो संक्रमित मच्छर के काटने से इंसान में फैलता है। इस बुखार को येलो फीवर इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें येलो शब्द पीलिया की ओर संकेत करता है। कुछ रोगियों में इसके लक्षण भी देखे जाते हैं और यह बुखार मनुष्य के पूरे शरीर को ही प्रभावित कर के रख देता है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर पर रिसर्च करने वाली एजेंसी ने अपनी स्टडी में पाया है कि आर्टिफिशियल स्वीटनर ड्रिंक्स में कैंसर पैदा करने वाले तत्व हो सकते हैं। यह स्टडी अगले महीने प्रकाशित होने वाली है। स्टडी में पाया गया है कि कोल्ड ड्रिंक्स और च्यूइंगगम में भी कैंसर पैदा करने वाले तत्व हो सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़ी संस्था इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) की स्टडी में यह जानकारी दी गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएआरसी की इस रिपोर्ट को हाल ही में मंजूरी दी गई है और जुलाई में इसे प्रकाशित किया जायेगा।
इस स्टडी में यह नहीं बताया गया है कि किसी इंसान को कितनी मात्रा में इन चीजों को खाना-पीना चाहिए। इस बारे में डब्ल्यूएचओ की एक और एजेंसी जेईसीएफए है, जिसकी ओर से इसे लेकर एडवाइजरी जारी की जा सकती है। आईएआरसी ने पहले भी ऐसी कई रिपोर्ट्स दी हैं, जिसकी दुनिया भर में चर्चा हुई थी।
यही नहीं कई मामले तो अदालत तक भी पहुंचे और मैन्युफैक्चरर्स को अपने आइटम्स की रेसिपी में बदलाव करना पड़ा था। कुछ कंपनियां यह भी आरोप लगाती रही हैं कि आईएआरसी की स्टडी जनता को भ्रमित करने वाली रही है।
डब्ल्यूएचओ की एक और संस्था जेईसीएफए इस रिपोर्ट का अध्ययन कर रही है। इसके बाद उसकी ओर से एक लिस्ट जारी की जा सकती है, जिसमें कैंसर के खतरे वाली चीजों की जानकारी हो सकती है। 14 जुलाई को आईएआरसी की रिपोर्ट का प्रकाशन होना है।
जेईसीएफए के मुताबिक 60 किलोग्राम वजन वाले किसी भी वयस्क को 12 से 36 कैन सोडा ही पीना चाहिए। इससे अधिक का सेवन करना खतरनाक हो सकता है। इस रिपोर्ट का अमेरिका और यूरोप समेत दुनिया भर के देशों में पालन किया जाता है और एडवाइजरी के तौर पर इस्तेमाल होता है।
एआरसी की रिपोर्ट्स का दुनिया भऱ में असर देखने को मिलता रहा है। इसी संस्था ने 2015 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ग्लिफोसेट, जो एक तरह का कीटनाशक होता है, से भी कैंसर का खतरा होता है। इस दवा को पत्तेदार फसलों को कीटों से बचाव के लिए छिड़का जाता रहा है।
उसकी इस रिपोर्ट पर अदालतों में भी मामले चले। गौरतलब है कि उस रिपोर्ट के बाद से ही यह आम धारणा बनी है कि कीटनाशक के अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा होने वाली फसल में कैंसरकारक तत्व होते हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। जानलेवा कैंसर से लोगों को बचाने के लिए दशकों से चली आ रही खोज में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह खोज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। कैंसर के इलाज में अब अगली बड़ी प्रगति टीका हो सकती है। इन्होंने संभावना व्यक्त की है कि अगले पांच वर्षों में और अधिक टीके आयेंगे।
अमेरिका के राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के डॉ जेम्स गुले ने कहा है कि इन टीकों के जरिये कैंसर कोशिकाओं को खोजने और मारने के लिए इंसानों की प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ा सकते हैं। इसके लिए एमआरएनए तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जिसे हाल ही में कोरोना महामारी को लेकर इस्तेमाल में लाया गया।
अमेरिका के सिएटल स्थित यूडब्ल्यू मेडिसिन के डॉ नोरा डिसिस का कहना है कि कैंसर के खिलाफ टीका विकसित करने के लिए उसे इन्सानों की प्रतिरक्षा प्रणाली की टी कोशिकाओं के रूप की पहचान करना सिखाना है। इसके बाद शरीर में कहीं भी पहुंचने पर टी कोशिकाओं से जुड़े खतरे का पता लगा सकती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उनकी यह खोज पूरी दुनिया के लिए एक नया वरदान साबित हो सकती है, जिसमें भारत भी शामिल है। हाल ही के अध्ययनों से यह पता चला है कि भारत में कैंसर के मामले 2022 में 14.6 लाख से बढ़कर 2025 में 15.7 लाख तक पहुंच सकते हैं। ऐसे में लगातार बढ़ते बीमारी के दायरे को टीका के जरिए रोकने में सफलता हासिल की जा सकती है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) हार्ट अटैक के मामलों में एकदम हुए इजाफे और कोविड-19 वैक्सीन के बीच संभावित कनेक्शन का पता लगाने के लिए स्टडी की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हार्ट अटैक और कोविड वैक्सीन की कनेक्शन से जुड़ी स्टडी को अगले दो हफ्तों में जारी किया जा सकता है।
आइसीएमआर के डायरेक्टर-जनरल राजीव बहल के हवाले से इसकी जानकारी दी गयी है। पिछले कुछ महीनों में हार्ट अटैक के कई सारे मामले सामने आये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, रिसर्चर्स ने कुछ शुरुआती नतीजों का पता भी लगाया है। फिलहाल लोगों के बीच इस स्टडी को सामने लाने से पहले वे नतीजों की समीक्षा का इंतजार कर रहे हैं।
इंडियन जर्नल आफ मेडिकल रिसर्च (आइजेएमआर) के जरिए इस रिसर्च पेपर को स्वीकार भी कर लिया गया है। वर्तमान में रिसर्च पेपर या कहें स्टडी का स्वतंत्र मूल्यांकन चल रहा है। हार्ट अटैक के लगातार सामने आ रहे मामलों की वजह से आम जनता काफी चिंतित नजर आ रही है।
रिसर्चर्स ने हार्ट अटैक और वैक्सीन के लिंक का पता लगाने के लिए चार अलग-अलग स्टडी की है। इस चारों स्टडी को जोड़कर एक स्टडी तैयारी की जा रही है, जिसे जारी किया जायेगा।
इस साल मार्च के महीने में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने एक मीडिया कार्यक्रम में कउटफ की स्टडी का ऐलान किया था। उन्होंने कोविड-19 के बाद हार्ट अटैक की वजह से हुई मौतों के बढ़ते मामले की बात को स्वीकार किया था। उनका कहना था कि हार्ट अटैक की वजह से होने वाली मौतों से पैदा हुआ आंकड़ों की एम्स दिल्ली के रिसर्चर्स समीक्षा कर रहे हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। अध्ययन दल ने डीओटीएमए नामक एक धनायनित लिपिड अणु के साथ डीएनए नैनोकेज को क्रियाशील किया, जिसमें एक सकारात्मक रूप से आवेशित शीर्ष समूह और एक हाइड्रोफोबिक श्रृंखला होती है।
ड्रग्स या टीके, ज्यादातर मामलों में, कार्रवाई की जगह के अलावा अन्य जगहों पर दिये जाते हैं। उपयोगी होने के लिए उन्हें अपनी कार्रवाई की साइट पर जाना चाहिए। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर के जैविक इंजीनियरिंग अनुशासन के शोधकर्ताओं ने कुशल दवा वितरण के लिए एक नया दृष्टिकोण सुझाया है।
नैनोकैज नामक डीएनए से बनी छोटी संरचनाएं अक्सर दवा को कोशिका में प्रवेश करने के लिए नियोजित की जाती हैं। हालांकि, जब नकारात्मक रूप से आवेशित नैनोकैज कोशिका झिल्ली के संपर्क में आते हैं, जो हाइड्रोफोबिक है, तो वे प्रतिकर्षण का अनुभव करते हैं, जिससे उन्हें कोशिका में प्रवेश करने से रोका जा सकता है।
चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए डीएनए नैनोस्ट्रक्चर की दक्षता बढ़ाने के लिए सेलुलर उत्थान को अधिकतम करने के लिए सुधार की आवश्यकता है। हमने इन नैनो पिंजरों को कोशिकाओं में अधिक कुशलता से प्रवेश करने में मदद करने के लिए संशोधित करने का एक तरीका खोज लिया है, डॉ रमेश सिंह ने बताया।
अध्ययन दल ने डीओटीएमए नामक एक धनायनित लिपिड अणु के साथ डीएनए नैनोकेज को क्रियाशील किया, जिसमें एक सकारात्मक रूप से आवेशित शीर्ष समूह और एक हाइड्रोफोबिक श्रृंखला होती है। डॉ सिंह बताते हैं, डीओटीएमए में डीएनए-नैनोकेज और सेल मेम्ब्रेन दोनों के प्रति एक समानता है, जो नैनोकेज को कोशिकाओं के अंदर जाने में मदद करती है।
टीम ने एक मॉडल नैनोकेज, डीएनए टेट्राहेड्रॉन के संशोधन के लिए इसका परीक्षण किया और पाया कि संशोधित नैनोकेज को कैंसर कोशिकाओं द्वारा असंशोधित लोगों की तुलना में बहुत बेहतर तरीके से लिया गया था और गैर-कैंसर कोशिकाओं पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ा।
डीएनए नैनोकैज के कार्यात्मककरण की इस पद्धति में, हमने संरचनात्मक बाधा को संबोधित किया, जिससे वितरण के लिए पर्याप्त मात्रा में नैनोकैरियर्स के सेलुलर उत्थान में वृद्धि हुई, टीम कहते हैं।
दवाओं और अन्य उपचारों को अधिक प्रभावी ढंग से वितरित करने में सहायता के लिए इस विधि का उपयोग विभिन्न डीएनए नैनो-संरचनाओं के लिए किया जा सकता है। यह वैज्ञानिकों को संशोधित नैनोकैज के संभावित अनुप्रयोगों की जांच के लिए अधिक प्रभावी ढंग से और आगे के शोध के लिए कैंसर के इलाज के नए तरीके विकसित करने में मदद कर सकता है।
यह नई विधि जीन ट्रांसफेक्शन और लक्षित बायोइमेजिंग में भी उपयोगी होगी। टीम में रमेश सिंह, पंकज यादव, हेमा नवीना ए और धीरज भाटिया शामिल हैं। यह अध्ययन नैनोस्केल जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ केबी शंकर बताते हैं कि डिजिटल स्क्रीन का संबंध सीधे मस्तिष्क और उससे जुड़े विकारों से है। इसे लेकर अब तक कई अध्ययन भी सामने आए हैं। हालांकि, जिस तरह कुछ साल पहले तक फेफड़े के कैंसर और धूम्रपान के बीच संबंध स्थापित नहीं हुआ था।
उसी तरह फोन और ब्रेन ट्यूमर के बीच संबंध विधिवत स्थापित नहीं है, लेकिन अगले 5-10 साल में यह प्रमाणित हो जाएगा कि मोबाइल फोन की वजह से इसके मामले बढ़ रहे हैं। इसके अलावा तनावपूर्ण जीवन शैली, प्रदूषण और खानपान भी इसके कारण हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए ब्रेन ट्यूमर की जल्दी पहचान हो सकती है। जिन शहरों में विशेषज्ञता युक्त अस्पताल नहीं है, वहां जिला अस्पतालों में इस तरह की मशीनें होनी चाहिए। मौजूदा समय में ज्यादातर एमआरआई मशीन एआई आधारित हैं, यह मस्तिष्क में ट्यूमर की सही जगह के साथ उसके आसपास की कोशिकाओं के बारे में भी बता सकती हैं।
दिल्ली स्थित जीबी पंत सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के डॉ दलजीत सिंह बताते हैं कि हर ट्यूमर की सर्जरी भी जरूरी नहीं होती। अगर मरीज का ट्यूमर बहुत छोटा है, तो पहले दवाएं दी जाती हैं। एक निश्चित समय तक मरीज में दवाओं का असर देखा जाता है। फिर से उसकी एमआरआई कराते हैं और देखते हैं कि ट्यूमर के आकार में कोई बदलाव आया या नहीं। अगर आकार नहीं बदला है तो सर्जरी को टाला भी जा सकता है।
डॉक्टरों के अनुसार, ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी को लेकर अब पहले जैसी स्थिति नहीं है। भारतीय अस्पतालों में कई ऐसी तकनीक मौजूद हैं, जिनके जरिये कम समय, छोटे कट और कम खर्च में ट्यूमर निकाला जा सकता है। इसके अलावा एंडोस्कोपिक ब्रेन ट्यूमर सर्जिकल प्रक्रिया है। गैर-इनवेसिव प्रक्रिया एलआईटीटी यानी लेजर प्रेरित एब्लेशन ट्यूमर थेरेपी और गामा नाइफ का भी इस्तेमाल होता है।
सीरम इस्टीट्यूट ने टीबी का पता लगाने वाले अपने टीके के परीक्षण की मांगी अनुमति, सरकार को लिखा पत्र
एबीएन हेल्थ डेस्क। सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (एसआईआई) ने अव्यक्त तपेदिक (लेटेंट ट्यूबरक्लोसिस) का पता लगाने वाले अपने सीवाई-टीबी इंजेक्शन के इन-हाउस परीक्षण की अनुमति देने का केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से आग्रह किया है।
आधिकारिक सूत्रों ने बुधवार को यह जानकारी दी। अव्यक्त टीबी से संक्रमित व्यक्तियों में इसके कोई लक्षण नहीं होते हैं और यह संक्रमित व्यक्तियों से अन्य व्यक्तियों में नहीं फैल सकती है। इसका इलाज नहीं मिलने पर उन व्यक्तियों में बाद में टीबी की बीमारी हो सकती है।
एसआईआई ने कहा है कि इस उत्पाद के लिए परीक्षण की सुविधा देश की किसी भी सरकारी प्रयोगशाला में उपलब्ध नहीं है। सूत्रों ने बताया कि इस संबंध में एक पत्र एसआईआई के निदेशक प्रकाश कुमार सिंह ने लिखा है।
सिंह ने पत्र में लिखा है भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) ने 9 मई, 2022 को सीवाई-टीबी इंजेक्शन के बाजार अनुज्ञप्ति को मंजूरी दे दी थी, लेकिन मंजूरी के एक साल बाद भी, भारत में किसी भी सरकारी प्रयोगशाला में परीक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण सीवाई-टीबी बाजार में उपलब्ध नहीं है।
सूत्रों के मुताबिक, ऐसी जानकारी मिली है कि सिंह ने यह भी उल्लेख किया है कि सीवाई-टीबी अव्यक्त टीबी का पता लगाने के लिए महत्वपूर्ण है और सरकार को इसके इन-हाउस परीक्षण की अनुमति देनी चाहिए ताकि भारत और दुनिया में बड़े पैमाने पर टीका उपलब्ध कराया जा सके।
डीजीसीए ने एसआईआई के सीवाई-टीबी टीके के लिए बाजार अनुज्ञप्ति प्रदान किया था, जिसका उपयोग 18 वर्ष और उससे अधिक आयु वालों के लिए अव्यक्त टीबी का पता लगाने के वास्ते त्वचा परीक्षण के लिए किया जा सकता है। सरकार ने कहा है कि भारत 2025 तक तपेदिक को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सैन फ्रांसिस्को मेडिकल सेंटर के विज्ञानियों के एक दल ने ब्रेन कैंसर की वजह से मौत को टालने और कैंसर के साथ जीवन को आसान बनाने का रास्ता खोज लिया है।
भारतीय मूल की वैज्ञानिक सरिता कृष्णा के नेतृत्व मे किए गए शोध में पता चला है कि कैंसर कोशिकाएं स्वस्थ मस्तिष्क कोशिकाओं के साथ जुड़कर अतिसक्रिय हो जाती हैं, जो संज्ञानात्मक क्षमताओं की क्षति और मृत्यु का कारण बनती हैं।
विज्ञान शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित इस शोध के नतीजों से कैंसरग्रस्त ब्रेन ट्यूमर के इलाज में बड़ा बदलाव होगा। इसे खासतौर पर ग्लियोब्लास्टोमा कैंसर रोगियों के इलाज के लिहाज से महत्वपूर्ण खोज माना जा रहा है। यह सबसे घात मस्तिष्क कैंसर होता है।
ग्लियोब्लास्टोमा कैंसर से पीड़ित रोगी अधिकतम 15 माह तक जीवित रह पाते हैं। मस्तिष्क में कैंसर कोशिकाएं संज्ञानात्मक क्षमताओं से जुड़े मस्तिष्क के हिस्से की सामान्य कोशिकाओं पर तेजी से हमला करती हैं, जिससे शुरूआत में व्यक्ति की संज्ञान क्षमताएं-सुनना, देखना, सूंघना, महसूस करने की क्षमता खत्म होती हैं और आखिर में मौत हो जाती है।
ट्यूमर को भी रोका जा सकेगा
इस शोध की प्रमुख लेखक सरिता कृष्णा बताती हैं कि शोध के दौरान यह भी पता चला कि व्यापक तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली एंटी-सीजर दवा से दिमाग में कैंसर कोशिकाओं की तीव्र गतिविधियों को धीमा करते हुए इनकी वृद्धि को रोका जा सकता है।
कृष्णा बताती हैं कि शोध में सबसे अहम जानकारी यह सामने आयी है कि स्वस्थ मस्तिष्क कोशिकाओं और कैंसर कोशिकाओं के बीच होने वाले संचार में हेरफेर कर ट्यूमर के विकास को धीमा करते हुए इसे बढ़ने से रोका भी जा सकता है।
दिमाग को हाइजैक कर लेता है ट्यूमर
केरल के तिरुवनंतपुरम की रहने वाली कृष्णा ने बताया कि इस अप्रत्याशित खोज से पता चला है कि घातक कैंसर कोशिकाएं आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों को हाईजैक कर उनका पुनर्गठन करती हैं। इससे पैदा होने वाली अतिसक्रियता की वजह से संज्ञानात्मक गिरावट होती है, जो रोगियों के जीवित रहने की अवधि को कम करती है।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse