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Published / 2024-05-13 18:54:59
कब्ज को नियंत्रित करने में सहायक है प्लवानी प्राणायाम : योगाचार्य महेश पाल

एबीएन हेल्थ डेस्क। संस्कृत भाषा में प्लावन का अर्थ है तैरना। इस प्राणायाम के अभ्यास से कोई भी व्यक्ति जल में कमल के पत्तों की तरह तैर सकता है इसलिए इसका नाम प्लाविनी पड़ा। योगाचार्य महेश पाल विस्तार पूर्वक बताते है कि, हठरत्नावली में, इसे भुजंगीमुद्रा कहा जाता है। कोई भी व्यक्ति प्लाविनी प्राणायाम उपरोक्त प्राणायामों में निपुणता हासिल करने के बाद ही कर सकता है। सामान्यतया, सिद्धयोगी प्लाविनी प्राणायाम करते हैं। 

प्लाविनी प्राणायाम में अनुभव की आवश्यकता होती है और ये शुरूआत करने वालों के लिए उपयुक्त नहीं है। इस प्राणायाम का अभ्यास सुखासन या सिद्धासन में बैठकर किया जाता है। इसके अभ्यास में अपनी सांस को इच्छानुसार रोककर रखा जाता है इसलिए इस प्राणायाम को केवली या प्लाविनी प्राणायाम कहा जाता है।

दरअसल, संस्कृत शब्द प्लाविनी मूल शब्द प्लु से बना है जिसका अर्थ है तैरने या तैरने का कारण, इसमें प्राणायाम जोड़ने से श्वास (वायु) तैरने का कारण बन जाती है इसलिए इसे प्लाविनी प्राणायाम कहा जाता है। प्लाविनी के काम करने के पीछे मुख्य विचार हवा को पानी (एक तरल पदार्थ) की तरह निगलना है। 

इसके अलावा, यह द्रव जब शरीर में प्रवेश करता है, तो शरीर को अपना प्राकृतिक आकार पाने और उड़ने की क्षमता प्राप्त करने में मदद करता है इस प्राणायाम में व्यक्ति पानी का सेवन करते समय हवा का सेवन करता है जिससे पेट थोड़ा फूल जाता है और पानी की सतह पर तैरने का एहसास होता, प्लवानी प्राणायाम का अभ्यास करने के लिए सबसे पहले आप पद्मासन या सुखासन में बैठ जायें। 

दोनों नासिका छिद्र से धीरे धीरे सांस लें। अब सांस को अपनी क्षमता के अनुसार रोककर रखें फिर दोनों नासिका छिद्रो से धीरे-धीरे श्वास छोड़ें। यह एक बार हुआ। इस तरह आप 10 से 15 बार करें। और फिर धीरे धीरे इसके अवधि को बढ़ाते रहे, कब्ज पाचन तंत्र की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कोई व्यक्ति का मल बहुत कड़ा हो जाता है तथा मलत्याग में कठिनाई होती है। 

कब्ज अमाशय की स्वाभाविक परिवर्तन की वह अवस्था जैसे ही मल आपकी आंतों से होकर गुजरता है, मल में से कुछ पानी कोलन (जिसे बड़ी आंत भी कहा जाता है) द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। जितनी अधिक देर तक मल बृहदान्त्र में रहता है, उतना अधिक पानी अवशोषित होता है। मल से जितना अधिक पानी लिया जाता है।

मल उतना ही सख्त हो जाता है, जिससे आपको मल त्यागने में कठिनाई हो जाती है और कब्ज हो जाता है, जिसमें मल निष्कासन की मात्रा कम हो जाती  हैं। कब्ज कोलन व पाचन में आई विकृति के कारण होती है कोलन व पाचन तंत्र की विकृति से बचाव मैं सहायक है प्लवानी प्राणायाम, यह प्राणायाम कोलन व पाचन तंत्र से संबंधित अवरोधों को दूर कर पाचन तंत्र व कोलन के कार्य को सुचारू रूप से संचालित करता है जिससे कब्ज की समस्या से बचा जा सकता है।

प्लवानी प्राणायाम के करने से हमें कई लाभ प्राप्त होते हैं, यह ध्यान के लिए बहुत लाभकारी है।पाचनशक्ति को बढ़ाता है और कब्ज की समस्या को दूर करता है इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से प्राणशक्ति शुद्ध होकर आयु बढ़ती है। यह मन को स्थिर व शांत रखने में सहायक है, तनाव को कम करने में बहुत अहम भूमिका निभाता है।यह चिंता एवं क्रोध को दूर करने के लिए उपयोगी प्राणायाम है। 

स्मरण शक्ति का विकास होता हैं। इस प्राणायाम का अभ्यास से पानी में बहुत देर तक बिना हाथ-पैर हिलाएँ रह सकते हैं। तैर सकते हैं, प्लाविनी  प्राणायाम के अभ्यास से संबंधित कुछ सावधानियां वरते,इसका अभ्यास सिर्फ विषेशज्ञ की उपस्थिति में ही करें इसके करने में आपका पेट खाली होना चाइये, हृदय संबंधी किसी भी समस्या और उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए।

हर्निया और हाइड्रोसील की स्थिति में इसे करने से बचें। सांस रोकने से उस पर दबाव पड़ सकता है। यदि आपको कोई पुरानी बीमारी या चिकित्सीय स्थिति है, तो इसका अभ्यास करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेने के उपरांत ही करे, कुल मिलाकर, प्राणायाम अपनी सांसों पर नियंत्रण पाने और इस प्रकार मन के अनुकूल विचारों पर नियंत्रण पाने का एक शानदार तरीका है।

8 प्राचीन प्राणायामों की शृंखला में प्लाविनी शारीरिक और मानसिक रूप से हल्का महसूस करने की सबसे आसान तकनीक है।यह अत्यधिक सरल है क्योंकि इसे आपके घर पर आराम से किया जा सकता है और इसके लिए कम से कम जगह की आवश्यकता होती है। एकमात्र आवश्यक उपकरण हवा है, जो प्रकृति द्वारा प्रचुर मात्रा में प्रदान की जाती है।

Published / 2024-04-25 18:53:12
राजधानी रांची में बर्ड फ्लू, मारे जा रहे कुक्कुट

रांची में बर्ड फ्लू ने दी दस्तक, होटवार क्षेत्रीय कुक्कुट प्रक्षेत्र में बर्ड फ्लू की पुष्टि

टीम एबीएन, रांची। राजधानी रांची में एक बार फिर बर्ड फ्लू ने दस्तक दे दी है। होटवार के क्षेत्रीय कुक्कुट प्रक्षेत्र में पिछले दिनों कुक्कुटों की मौत की सूचना के बाद आईसीएआर-राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान, भोपाल भेजे गये सैंपल में एच 5 एन1 एवियन इन्फ्लूएंजा की पुष्टि हुई है। 

भोपाल स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट आफ आई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज डायग्नोस्टिक लैब से बर्ड फ्लू की पुष्टि होते ही विभाग के अधिकारी हरकत में आ गये हैं।

बीमारी की रोकथाम और सतर्कता के लिए कदम उठाने के निर्देश

राज्य के पशुपालन संयुक्त निदेशक (कुक्कुट) डॉ रजनी पुष्पा सिंकू ने पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन संस्थान कांके के निदेशक को पत्र भेजकर बीमारी की रोकथाम और सतर्कता के उपाय करने के लिए कहा है। 

भारत सरकार के दिशा निर्देश के अनुसार कंट्रोल रूम बनाने, डेली रिपोर्ट तैयार करने, होटवार जहां बर्ड फ्लू का आउट ब्रेक हुआ है वहां की वर्तमान रिपोर्ट बनाने के साथ प्रशासनिक सहयोग से बर्ड फ्लू का प्रसार रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने को कहा है।

Published / 2024-04-21 21:28:56
थायराइड, घेंघा रोग व खर्राटों को नियंत्रित करता है उज्जायी प्राणायाम : योगाचार्य महेश पाल

एबीएन हेल्थ डेस्क। उज्जायी प्राणायाम गले से सांस लेने की तकनीक है, जो योग मे अंतर्निहित है। योगाचार्य महेश पाल बताते हैं कि यह एकमात्र ऐसा प्राणायाम है। इसको कभी भी खाने से पहले, खाने के बाद, उठते, बैठते, सोते किया जा सकता है। यह किसी के शरीर में ऊर्जा को नियंत्रित कर सकता है और सांस को उचित चैनल पर नियंत्रित करता है उज्जायी प्राणायाम को सागर श्वास या विजयी श्वास के नाम से भी जाना जाता है। 

उज्जायी दो शब्दों से मिलकर बना है- उद जिसका अर्थ है श्रेष्ठता या शक्ति का भाव, और जया का अर्थ है जीत, विजय या सफलता, जो इसे विजयी श्वास का अर्थ देता है। सांस छोड़ने और सांस लेने के दौरान समुद्री लहर जैसी ध्वनि के कारण इसे समुद्री श्वास के रूप में जाना जाता है। वायु के साथ गले के घर्षण के कारण ध्वनि उत्पन्न होती है, उज्जायी प्राणायाम उन प्राणायाम में से एक है, जिसे गले की थायराइड समस्या से निदान पाने के लिए किया जाता है। 

इस प्राणायाम को मन एवं तन की शांति के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह प्राणायाम हमें सभी बंधनों से मुक्त कर देता है और एक ताजगी का अनुभव कराता है। उज्जयी सांस एक प्रकार की डायाफ्रामिक सांस है जिसके माध्यम से गले की ग्लोटिस की मांसपेशियां थोड़ी संकुचित हो जाती हैं, जिससे हवा मुखर डोरियों के अंदर और बाहर गुजरते समय फुसफुसाहट, श्रव्य कंपन पैदा करती है, जिससे गले में उपस्थित अविटु ग्रंथी (थायराइड) को एक्टिव कर हाइपोथायरायडिज्म और हाइपरथायरायडिज्म रोग को नियंत्रित किया जाता है। अवटु ग्रंथि हाइपोथैलेमस, पीयूष ग्रंथि आदि कारकों द्वारा नियंत्रित होती है।

अवटु ग्रंथि की सबसे सामान्य समस्याएं अवटु ग्रंथि की अतिसक्रियता (हाइपरथाइरॉयडिज्म) और अवटु ग्रंथि की निम्नसक्रियता (हाइपोथाइरॉयडिज्म) हैं। जब अवटु ग्रंथि बहुत अधिक मात्रा में हार्मोन बनाने लगती है तो शरीर, ऊर्जा का उपयोग मात्रा से अधिक करने लगता है। इसे हाइपर थाइराडिज्म कहते हैं। जब अवटु ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती तो शरीर, ऊर्जा का उपयोग मात्रा से कम करने लगता है। इस अवस्था को हाइपोथायराडिज्म कहते हैं। 

ये असमान्य अवस्थाएं किसी भी आयु वाले व्यक्ति में हो सकती है क्योंकि हाइपरथायरायडिज्म आपके चयापचय को तेज कर देता है जिससे हमारे शरीर पर कई प्रभाव पड़ते हैं, जिसमें,घबराहट या बेचैनी महसूस होना, चिड़चिड़ापन, सामान्य से अधिक या कम ऊर्जा होना, निगलने में परेशानी सूजी हुई थायरॉयड, जिसे गलगंड कहा जाता है, वजन कम होना, वजन बढ़ना, घेंघा रोग, तेज या असमान दिल की धड़कन, सामान्य से अधिक  मल त्याग, भूख का बढ़ना, पसीना आना, मांसपेशियों में कमजोरी, हाथों और उंगलियों में कंपन, अनिद्रा, त्वचा का पतला होना, बालों का टूटना या झड़ना, माहवारी में परिवर्तन, बांझपन, इन सभी समस्याओं से हम ग्रसित होते चले जाते हैं इन समस्याओं को नियंत्रित करने में उज्जायी प्राणायाम काफी लाभकारी माना जाता है।

उज्जाई प्राणायाम करने के लिए सुखासन में बैठ जाएं कमर गर्दन सीधी रखें और दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा में रखें उसके पश्चात हमारी गर्दन को हल्का सा नीचे की ओर झुकाये फिर गले को संकुचित कर गले से आवाज व कंपन करते हुए धीरे-धीरे श्वास को खींचे फिर कुछ देर रोक कर जालंधर बंध लगाए  और फिर धीरे-धीरे बायीं नाशिका से सांस को छोड़ दें इस प्रकार 10 चक्र करे, इस प्राणायाम के अभ्यास से कई लाभ   मिलते है जिसमें, थायराइड, उच्च रक्तचाप और दिल से संबंधित रोगों को नियंत्रित करता है, श्वास की गति को धीमा करके दीघार्यु में सुधार करता है।

आवाज को मधुर बनाता है, गले (कंठ) कफ, खाशी गले की सूजन आदि रोगों को दूर करता है प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाता है,तंत्रिका तंत्र को शांत और पुनर्जीवित करता है, अच्छी नींद को बढ़ावा देता है,खरार्टों को नियंत्रित करता, उज्जायी प्राणायाम करने से पहले कुछ सावधानियां रखे जिसमें, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगी, अचानक चक्कर आने पर इस  प्राणायाम को जारी न रखें प्रतीक्षा करें जब तक आप वापस सामान्य स्थिति में न पहुंच जाएं और सामान्य रूप से सांस न लें। 

सांस लेने की प्रक्रिया करते समय अनावश्यक बल न लगाएं। जिनको सर्वाइकल है वह अभ्यास करते समय गर्दन को आगे ना झुकाएं। उज्जयी प्राणायाम ध्वनि में शामिल बड़बड़ाहट विधि ब्रांकाई को धीरे से कंपन करने में मदद करती है जो सिलिअट एपिथेलियल ऊतक को सक्रिय करने में मदद करती है। श्वसन गतिविधियों के पारंपरिक तरीकों में, सांस छोड़ने के दौरान ब्रांकाई पर दबाव हल्का होता है। उज्जायी प्राणायाम सांस लेने और छोड़ने दोनों के दौरान ब्रांकाई पर एक स्थिर स्तर का दबाव बनाए रखने में मदद करता है। 

यह छोटी ब्रांकाई के ढहने का प्रतिकार करने में मदद करता है, जिससे साँस छोड़ने की विधि में सूजन आ जाती है। फेफड़ों के अंदर अवशिष्ट वायु की मात्रा को भी इस तरह से कम किया जा सकता है। उज्जयी प्राणायाम ब्रोन्कियल अस्थमा या पुरानी श्वसन स्थितियों से पीड़ित लोगों के लिए काफी मददगार है इसलिए थायराइड जैसे गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए हमें इस प्राणायाम को हमारी दैनिक दिनचर्या में शामिल करना चाहिए।

Published / 2024-04-16 20:52:10
पायरिया रोग के संक्रमण से बचाता है शीतकारी प्राणायाम : योगाचार्य महेश पाल

एबीएन हेल्थ डेस्क। वर्तमान समय में मानव स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से ग्रसित होता जा रहा है। उसी क्रम में पायरिया रोग (दांत एवं मसूड़े) की समस्या एक गंभीर जन्म लेते जा रही है, जो बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों में आमतौर पर देखने को आती है। जिससे हमारे मुंह से दुर्गंध आना, मुंह से पस आना, बार-बार मसूड़े से ब्लीडिंग होना आदि समस्या पायरिया बीमारी में होती है। जिससे हमारा पाचन तंत्र भी प्रभावित होता है। इससे बचाव में शीतकारी प्राणायाम काफी लाभकारी माना जाता है। 

योगाचार्य महेश पाल विस्तार से बताते हैं कि प्राणायाम का योग में बहुत महत्व है। आदि शंकराचार्य श्वेताश्वतर उपनिषद पर अपने भाष्य में कहते हैं- प्राणायाम से जिस मन का मैल धुल गया है, वही मन ब्रह्म में स्थिर होता है। इसलिए शास्त्रों में प्राणायाम के विषय में उल्लेख है। 

स्वामी विवेकानंद इस विषय में अपना मत व्यक्त करते हैं कि इस प्राणायाम में सिद्ध होने पर हमारे लिए मानो अनंत शक्ति का द्वार खुल जाता है। मान लो, किसी व्यक्ति की समझ में यह प्राण का विषय पूरी तरह आ गया और वह उस पर विजय प्राप्त करने में भी कृतकार्य हो गया, तो फिर संसार में ऐसी कौन-सी शक्ति है, जो उसके अधिकार में न आये। उसकी आज्ञा से चंद्र-सूर्य अपनी जगह से हिलने लगते हैं।

क्षुद्रतम परमाणु से वृहत्तम सूर्य तक सभी उसके वशीभूत हो जाते हैं, क्योंकि उसने प्राण को जीत लिया है। प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त करना ही प्राणायाम की साधना का लक्ष्य है। शीतकारी प्राणायाम एक यौगिक श्वास व्यायाम है, जो मन को शांत करता है और शरीर को ठंडा करता है। दांतों व मसूड़े को स्वस्थ बनाता है। यह शब्द संस्कृत के शीतकारी से आया है, जिसका अर्थ है चूसना या फुफकारना। 

प्राण जिसका अर्थ है जीवन शक्ति और अयामा, जिसका अर्थ है विस्तार। अभ्यास करने के लिए दांतों को बंद करके मुंह से सांस अंदर खीचना होता है, ये अजगर की सांस लेने के समान हैं। अजगर, मुर्गियां, हिरण के बच्चे मुंह खोलकर गहरी सांस लेते हैं और वे सभी हवा के साथ आसानी से अंदर चले जाते हैं और उनमें उसे पचाने की क्षमता होती है। 

शीतकारी प्राणायाम की प्रक्रिया भी इसी प्रकार है। सांस लेने की ये दोनों गतिविधियां शरीर और दिमाग को ठंडा करने में भी बहुत उपयोगी हैं। जब आपको तेज प्यास लग रही हो और पानी उपलब्ध न हो तो इन प्रक्रियाओं के 6 या 7 चक्र करने से आपकी प्यास कम हो सकती है।  शीतकारी प्राणायाम का उल्लेख हठ योग प्रदीपिका में प्राणायाम की एक प्रक्रिया के रूप में किया गया है। शीतली और शीतकारी प्राणायाम एक जैसे हैं, लेकिन इनमें सिर्फ एक ही अंतर है, सांस लेने के तरीके का। 

शीतली में हम जीभ मोड़कर सांस लेते हैं और शीतकारी में हम दांतों से सांस लेते पायरिया एक गंभीर मसूड़ों का संक्रमण है जो मसूड़ों, स्नायुबंधन और हड्डियों को नुकसान पहुंचाता है। मसूड़ों और दांतों की जड़ों से मवाद निकलता है। आमतौर पर मवाद का सेवन भोजन के साथ किया जाता है, जिससे कई संक्रमण हो सकते हैं पेरियोडोंटल बीमारी के उन्नत चरण में यह रक्तस्राव और मसूड़ों से मवाद निकलने का कारण बनता है। यह सबसे व्यापक बीमारियों में से एक है। 

यह वयस्कों में दांत खराब होने का सबसे आम कारण है। यह आमतौर पर अपर्याप्त दंत स्वच्छता के परिणामस्वरूप होता  हैं पायरिया यह एक जीवाणु संक्रमण का परिणाम है। इसे पायरिया एल्वेओलारिस कहते हैं।पेरियोडोंटाइटिस जिंजिवाइटिस का एक गंभीर रूप है, जिसमें मसूड़ों की सूजन दांत के आसपास की संरचनाओं तक फैल जाती है। प्लाक और टार्टर पहले दांतों और मसूड़ों के बीच बनता है और फिर दांतों के नीचे की हड्डी में फैल जाता है। 

मसूड़े सूज जाते हैं और खून बहता है, सांस से बदबू आती है और दांत ढीले हो जाते हैं। शीतकारी प्राणायाम दांतों व मसूड़े की सूजन को रोकता है प्लाक और टारटर को दांतों व मसूड़े की बीच में बनने से रोकना जिससे मसूड़े की सूजन और खून बहने को रोककर पायरिया जैसी गंभीर समस्या से बचाता है शीतकारी प्राणायाम करने के लिए, आप सबसे पहले साफ-सुथरी और खुली जहग पर ध्यान लगाने वाली मुद्रा में बैठकर आप अपनी आंखें बंद कर पूरे शरीर को आराम देने की कोशिश करें। 

मुंह को बिलकुल सीधा रखकर दांतों को हल्का सा जुड़ा हुआ रखें और अपने होंठों को थोड़ा सा खुला रखें। इसके बाद आप अपनी जीभ को ऊपर की ओर चिपकाते हुए वहीं रखें। ऊपर और नीचे के दोनों दांतों को आपस में मिलाकर सी सी की आवाज करते हुए एक लंबी सांस लेते हुए अपने मुंह को बंद करें। फिर सांस को अंदर से बाहर छोड़ने के लिए अपनी नाक का इस्तेमाल करें और धीरे-धीरे नाक से सांस को त्यागें इस प्रक्रिया को काफी धीरे-धीरे करें और इस प्रक्रिया को करीब 10 बार दोहरायें। 

शीतकारी प्राणायाम के अभ्यास से हमारे शरीर पर कई लाभ देखे गए हैं जिसमें यह शरीर के तापमान को ठंडा करता है इसलिए यह बुखार में उपयोगी है। यह मुंह, गले और जीभ संबंधी रोगों में लाभकारी है। प्लीहा और अपच में मदद करता है। उच्च रक्तचाप और ग्रीष्म सत्र के लिए सर्वोत्तम। यह पायरिया जैसी दंत समस्याओं में कारगर है। 

यह शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। दिमाग को शांत करता है और यह सबसे अच्छा स्ट्रेस बस्टर है। भावनात्मक उत्तेजना और मानसिक तनाव को कम करता है। अवसाद के लिए सर्वोत्तम शीतकारी प्राणायाम करते हुए ये सावधानियां बरतें बुजुर्ग जिन लोगों के दांत काफी कमजोर या जिन लोगों दांत नहीं होते उन लोगों को शीतकारी प्राणायाम नहीं करना चाहिए। 

आप इसकी जगह शीतली प्राणायाम कर सकते हैं। सांस से संबंधित रोग या अस्थमा रोगियों को नहीं करना चाहिए, हृदय रोगियों के लिए ये प्राणायाम थोड़ा मुश्किल और कठिन हो सकता है। कब्ज के शिकार लोगों को भी नहीं करनी चाहिए, कोशिश करें कि आप सुबह के ठंडे मौसम में ही शीतकारी प्राणायाम का अभ्यास करें।

Published / 2024-04-15 21:20:25
अब दो-ढाई लीटर नहीं, रोज चार लीटर पानी पीने की जरूरत

दिन में 12 से 2 बजे तक घर में रहें, रोज 4 लीटर पानी जरूर पीयें, वरना किडनी खराब कर देगी गर्मी 

एबीएन हेल्थ डेस्क। झारखंड में फिलहाल भीषण गर्मी का दौर चल रहा है। हीट वेव को लेकर कई सारे जिलों में अलर्ट जारी है। दोपहर के 12 से 2 बजे तक खासकर मौसम विभाग के तरफ से न निकलने की चेतावनी भी जारी की गयी है। ऐसे में खुद का ख्याल न रखना आपको बहुत बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। 

कई बार लोग डिहाइड्रेशन को हल्के में लेते हैं। पर यह कई बार इतना खतरनाक होता है कि किडनी फेल्यर तक का कारण बन सकता है।  रांची के आयुर्वेदिक डॉक्टर वीके पांडे ने कहा कि गर्मी में खुद का ख्याल रखा बेहद जरूरी है। इस मौसम में छोटी सी भूल आपको बहुत भारी पड़ सकती है। आपको अस्पताल के चक्कर भी लगाने पड़ सकते हैं। इसलिए इन बातों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है। 

गर्मी में सबसे पहले चीज जो करना है वह हर दिन कम से कम 4 लीटर पानी, पीना ही पीना है।क्योंकि पसीने के माध्यम से आपके शरीर से पानी हमेशा निकलते रहता है। ऐसे में डिहाइड्रेशन होना आम बात है। 

  • डिहाइड्रेशन काफी खतरनाक होता है इससे किडनी को प्राप्त मात्रा में पानी नहीं मिलता और किडनी ठीक से फंक्शन नहीं कर पाता। इससे कई बार किडनी में स्टोन और फैलियर तक का कारण बन सकता है।इसीलिए अधिक पानी पीने की आदत डालें। 
  • इसके अलावा गर्मी के मौसम में कोशिश करें वैसे खाना खाए जिसमे 70 से 90% पानी हो। मतलब तरबूज, खरबूज व पपीता। इन सब में 90% तक पानी होता है।
  • इससे न सिर्फ आपका पेट भरेगा। बल्कि, शरीर की कोशिका भी अंदर से हाइड्रेट रहेगी और गर्मी के लिए जरूरी न्यूट्रिएंट्स जैसे विटामिन एबीसी, फोलिक एसिड ,विटामिन बी 16 व विटामिन बी-12 जैसे जरूर विटामिन भी शरीर को मिलते रहेंगे।

Published / 2024-04-05 22:48:39
कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक होता जा रहा बर्ड फ्लू

  • क्या कोरोना से भी बड़ी महामारी बनेगा बर्ड फ्लू, भारत में कितना खतरा?

एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनियाभर में अलग-अलग तरह की बीमारियों पर लगातार रिसर्च चलती रहती है। इसी क्रम में बर्ड फ्लू पर भी हाल ही में एक रिसर्च हुई है। पीट्सबर्ग में बर्ड फ्लू पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों ने इस बीमारी को बड़ा खतरा बताया है। आशंका जतायी है कि आने वाले समय में ये बीमारी बड़ी संख्या में लोगों को संक्रमित कर सकती है।

वैज्ञानिकों ने कहा है कि बर्ड फ्लू का वायरस एच5एन1 बहुत तेजी से अपने पांव पसार रहा है। इससे पक्षी और अब जानवर तक संक्रमित हो रहे हैं। अगर यह वायरस इसी तरीके से बढ़ता रहा तो आने वाले समय में ये कोरोना से भी खतरनाक महामारी का रूप ले सकता है। बर्ड फ्लू कोविड से भी 100 गुना खतरनाक हो सकता है। 

वैज्ञानिक ये आशंका इसलिए जता रहे हैं क्योंकि बर्ड फ्लू पहले की तुलना में अब बहुत ही तेजी से फैल रहा है। पहले ये बीमारी मुर्गियों में ही ज्यादा होती थी। लेकिन अब गाय, बिल्ली और मनुष्य भी इससे संक्रमित हो रहे हैं। अमेरिका में मुर्गियों और 337,000 चूजों में बर्ड फ्लू का संक्रमण मिला है। इससे बड़ी संख्या में मुर्गियों की मौत हो रही है। अमेरिका में गायों में भी बर्ड फ्लू से मरने के मामले सामने आ रहे हैं।

हाल ही में अमेरिकी के टेक्सास में डेयरी फार्म में काम करने वाला एक व्यक्ति H5N1 वायरस से पॉजिटिव पाया गया था। इसी वजह से ही वैज्ञानिकों ने इसपर रिसर्च की है, जिसमें पता चला है कि बर्ड फ्लू के वायरस में कई तरह के म्यूटेशन हो रहे हैं। इस बीच बड़ा सवाल यह है कि क्या बर्ड फ्लू कोविड से बड़ा खतरा बन सकता है और क्या भारत में ये किसी नई महामारी का रूप ले सकता है? ये जानने के लिए हमने एक्सपर्ट्स से बातचीत की है।

क्या है बर्ड फ्लू?

राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में डॉ एनआर रावत बताते हैं कि बर्ड फ्लू एच5एन1 इन्फ्लूएंजा वायरस की वजह से होता है। ये वायरस पक्षियों में फैलता है और उनकी सांस की नली पर हमला करता है। जिससे पक्षियों को सांस लेने में परेशानी होती है और इलाज न मिलने पर उनकी मौत हो जाती है।

ये वायरस पक्षियों के मल और उनकी लार से एक दूसरे में फैलता है। इसकी संक्रमण दर इतनी अधिक होती है कि कुछ ही दिनों में ये वायरस लाखों पक्षियों को संक्रमित कर सकता है और उनकी मौत का कारण बन सकता है।

Published / 2024-03-26 23:20:34
लोगों को जीवन रक्षा की निःशुल्क ट्रेनिंग दे रहे डॉ मुमताज

  • झारखंड का ये अधिकारी दे रहा जीवन बचाने का मंत्र
  • 10 हजार लोगों को दे चुका कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) देने की ट्रेनिंग

एबीएन हेल्थ डेस्क। झारखंड के उत्पाद शुल्क आयुक्त फैज एक्यू अहमद मुमताज) ने एक अभिनव कार्यक्रम शुरू करके एक साहसिक कदम उठाया है। इस पहल का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन कौशल सिखाना है। उनके नेतृत्व में 10 हजार से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया है।

वे अब पूरे राज्य में आपात स्थिति के दौरान जीवन रक्षक सहायता प्रदान करने के लिए तैयार हैं। कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) एक ऐसी तकनीक है। जिसका उपयोग दिल के दौरे या फिर सांस लेने में कठिनाई जैसी आपात स्थितियों के दौरान काम आती है। 

प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा तुरंत सीपीआर दिए जाने पर व्यक्ति के जीवित रहने की संभावना थोड़ी ज्यादा बढ़ जाती है। हाल ही में, छत्तीसगढ़ में एक बुजुर्ग महिला से जुड़ी एक प्रेरक घटना से फैज एक्यू अहमद मुमताज सीपीआर के महत्व को समझाया।

बिहार की अपनी यात्रा के दौरान जानलेवा स्थिति का सामना करने के बावजूद, सीपीआर की बदौलत वह होश में आ गयीं। अहमद मुमताज ने बताया कि अपनी पत्नी, डॉ हेना शादियाह के साथ बातचीत से प्रेरित होकर, उन्होंने समय पर सीपीआर हस्तक्षेप सुनिश्चित करके जीवन बचाने का मिशन शुरू किया। 

उन्होंने उत्पाद शुल्क विभाग के भीतर सीपीआर प्रशिक्षण सत्र शुरू किये, जो तेजी से जिला कार्यालयों, बार और क्लबों तक फैल गये। न्यूनतम संसाधनों और 1-1.5 घंटे के छोटे प्रशिक्षण सत्र के बावजूद अहमद मुमताज की पहल ने गति पकड़ी है।
बता दें कि अहमद मुमताज का दृष्टिकोण प्रशिक्षण से परे तक फैला हुआ है।

उनका लक्ष्य एक प्रभावशाली प्रभाव पैदा करना है। जहां प्रशिक्षित व्यक्ति प्रशिक्षक बन जाए, जिससे सीपीआर विशेषज्ञता का प्रभाव कई गुना बढ़ जाये। अब बागवानी निदेशक के रूप में अपनी नई भूमिका में बदलाव करते हुए, मुमताज झारखंड के समाज में सीपीआर शिक्षा को शामिल करने के लिए कोशिश कर रहे हैं।

चिकित्सा पेशेवर सीपीआर को स्वास्थ्य जागरूकता के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में पहचानते हुए इस पहल का समर्थन करते हैं। डॉ डीपी सिंह एक सामान्य चिकित्सक, संभावित रूप से कई लोगों की जान बचाने के लिए मुमताज के प्रयासों की प्रशंसा करते हैं। एक अन्य चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ दानिश इजाज सीपीआर की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर देते हैं।

राजधानी रांची में रुइन हाउस और स्वर्णरेखा बार एंड रेस्तरां ने सीपीआर प्रशिक्षण के परिवर्तनकारी प्रभाव की प्रशंसा करते हुए प्रशंसापत्र साझा किए हैं। इन प्रतिष्ठानों के कर्मचारी अब आपात स्थिति के दौरान निर्णायक रूप से कार्य करने के लिए सशक्त महसूस करते हैं।

स्वर्णरेखा बार एंड रेस्तरां के मालिक सिकंदर रजवार ने विशेष रूप से मुमताज के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उनके कर्मचारी अब हृदय संबंधी आपात स्थितियों को आत्मविश्वास से संभालने में सक्षम हैं। मुमताज ने व्यापक सीपीआर जागरूकता की महत्वपूर्ण आवश्यकता को पहचानते हुए, उत्पाद शुल्क विभाग के भीतर सीपीआर सत्र शुरू किये।

सीमित बजट पर काम करने और न्यूनतम संसाधनों की आवश्यकता के बावजूद ये सत्र अत्यधिक प्रभावी साबित हुए हैं, जो प्रति प्रशिक्षण केवल 1-1.5 घंटे तक चलते हैं। मुमताज एक ऐसे प्रभाव की कल्पना करते हैं। जहां प्रशिक्षित व्यक्ति प्रशिक्षक बन जाते हैं। जिससे पूरे समुदाय में सीपीआर विशेषज्ञता का प्रभाव बढ़ जाता है।

Published / 2024-03-24 19:44:01
सावधानी के साथ लें होली का मजा : डॉ सरोज राय

एबीएन हेल्थ डेस्क। राग, रंग, उल्लास और हुड़दंड का त्योहार होली 21 मार्च को है। बच्चों से लेकर बड़े तक सभी इस रंगीन त्योहार को पसंद करते हैं और एक-दूसरे के साथ रंग-गुलाल खेल कर और खा-पीकर इसे मनाते हैं। 

पहले के समय में होली पारंपरिक तरीके से मनायी जाती थी, जिसमें प्राकृतिक और ऑर्गेनिक रंगों का प्रयोग होता था, लेकिन आजकल मिलावटी व सिंथेटिक रंगों का प्रचलन काफी अधिक बढ़ गया है। ऐसे रंग हमारी त्वचा, आंखों, नाखून, बाल एवं आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं। 

इन रासायनिक रंगों से त्वचा पर खुजली, दाने, एलर्जी, एग्जिमा, ब्रेकआउट आदि होने लगता है। लेकिन कुछ सावधानियां बरत कर हम होली का त्योहार मस्ती और हर्षोल्लास के साथ मना सकते हैं। 

  1. हमेशा प्राकृतिक और ऑर्गेनिक रंगों से ही होली खेलें।
  2. गीले रंगों की जगह सूखे रंगों का प्रयोग करें।
  3. होली खेलने से पहले शरीर की खुली त्वचा जैसे कि चेहरे, गर्दन, हाथ-पांव के पीछे मॉइश्चराइजर या ऑलिव ऑयल को अच्छे से लगा कर उसके ऊपर सनस्क्रीन अवश्य लगायें। 
  4. होंठों पर सनस्क्रीन युक्त लिप बाम तथा नाखून पर नेल पॉलिश लगाना मत भूलिये।
  5. बालों को धोकर सुखाकर तेल लगायें और अच्छी तरह से बांध लें, हमेशा पूरे गहरे रंग के सूती कपड़े पहने
  6. आभूषण पहन कर होली ना खेलें। 
  7. आंखों को बचाने के लिए सनग्लास लगायें। 
  8. ज्यादा देर तक रंगों को शरीर पर न रहने दें। अधिक देर तक धूप में रंग न खेलें।
  9. पर्याप्त मात्रा में पानी पियें और खानपान का ध्यान रखें। 
  10. अगर आप अस्थमा या एक्जिमा के मरीज हैं, तो रंगों से दूर ही रहें।
  11. रंगों को छुड़ाने में हड़बड़ी न करें। अधिक साबुन, सोदा, केरोसिन आदि का प्रयोग ना करें। 
  12. दही-बेसन, एलोवेरा आदि की मदद से रंगों को  छुड़ायें। 

किसी भी तरह की तकलीफ होने पर स्वयं इलाज करना खतरनाक हो सकता है। ऐसी स्थिति में चर्म रोग विशेषज्ञ से अवश्य मिलें।

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