टीम एबीएन, रांची। वेबिनार का आयोजन 6/11/23 संध्याकाल में दंत्य प्रतिस्थापन विषयगत केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना लाभार्थी कल्याण संघ भारत ने आज संध्या को एक वेबिनार का आयोजन किया। इसमें देश भर के लाभार्थी भाग लिये। वेबिनार विश्वनाथ पांडे की अध्यक्षता में हुई।इसका संचालन डॉक्टर दिलीप गांगुली जन सम्पर्क प्रमुख ने की।
संघ के महासचिव टी के दामोदरण ने धन्यवाद देते हुए कहा कि वेबिनर से दंत स्वास्थ्य देखभाल जागरूकता में काफी वृद्धि हुई है और व्यापक जानकारी मिली है। वेबिनार के अतिथि दंत चिकित्सक रशमीत कुमार, बीडीएस, एमडीएस (ओरल मेडिसिन और रेडियोलॉजी हैप्पी टूथ मल्टीस्पेशलिटी डेंटल क्लिनिक, लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल के सामने, एजी रोड, डोरंडा रांची) ने कहा कि दंत प्रतिस्थापन विषयगत मामले में भले ही दंत स्वास्थ्य देखभाल जागरूकता में काफी वृद्धि हुई है।
फिर भी अधिकांश लोग दांतों की समस्याओं जैसे दांतों का झड़ना, मसूड़े की सूजन और दांतों की सड़न आदि का अनुभव करते हैं। शुरुआती दिनों में लापता दांतों को केवल डेन्चर या ब्रिज से बदला जा सकता। हालांकि, दंत चिकित्सा प्रौद्योगिकी के तेजी से विकास के साथ, उच्च दंत प्रत्यारोपण उपलब्ध हैं। डेंटल इम्प्लांट सर्जरी एक लोकप्रिय और सुरक्षित डेंटल प्रक्रिया है और इसे लापता दांतों के लिए एक अच्छा प्रतिस्थापन माना जाता है।
जबड़े की हड्डी की स्थिति और अन्य स्वास्थ्य कारक दंत प्रत्यारोपण सर्जरी की संभावना निर्धारित करते हैं। प्रत्यारोपण का लाभ यह है कि वे प्राकृतिक दांतों के रूप में दिखाई देते हैं, मुस्कान बनाये रखते हैं और प्रत्यारोपण के आसपास हड्डी को सुरक्षित रूप से ठीक करने की सुविधा देकर मुंह की समग्र संरचना को बनाये रखते हैं।
क्योंकि हड्डी ठीक होने में समय लगता है, उपचार पूरा होने में कुछ समय लग सकता है।ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि दंत प्रत्यारोपण की गहराई समझ लें। दंत प्रत्यारोपण कृत्रिम उपकरण हैं जो एक दंत चिकित्सक रोगी के जबड़े की हड्डी में रखता है। वे टाइटेनियम स्क्रू से बने स्थायी फिक्सेशन होते हैं, जो लापता दांत को बदलने के लिए मसूड़ों के नीचे जबड़े की हड्डी में शल्य चिकित्सा द्वारा प्रत्यारोपित किये जाते हैं।
दांतों के प्रतिस्थापन के लिए दंत प्रत्यारोपण को एक प्रभावी दीर्घकालिक समाधान के रूप में दिखाया गया है। यदि किसी व्यक्ति के एक या अधिक दांत टूट गये हैं, तो उन्हें दांतों के बीच के अंतराल को भरने के लिए दांत प्रत्यारोपण की आवश्यकता हो सकती है। बताया कि डेंटल इम्प्लांट सर्जरी में कई चरण शामिल होते हैं, जिनमें डेंटल इम्प्लांट साइट (जिसे ऑसियोइंटीग्रेशन के रूप में जाना जाता है) के आसपास ठीक से ठीक होने के लिए जबड़े की हड्डी की आवश्यकता होती है।
इम्प्लांट को एक प्राकृतिक दांत के समान गमलाइन में पकड़ना होता है। प्रत्यारोपण जबड़े की हड्डी के भीतर एक शल्य प्रक्रिया द्वारा रखा जाता है और यह कृत्रिम दांत की जड़ के रूप में कार्य करता है। इस प्रक्रिया के लिए टाइटेनियम पहली पसंद है, क्योंकि यह इम्प्लांट को जबड़े की हड्डी के साथ सफलतापूर्वक जोड़ देता है।
मजबूती से अपनी जगह पर बना रहता है और किसी ब्रिजवर्क की तरह क्षतिग्रस्त नहीं होगा। डेंटल इम्प्लांट सर्जरी एक डेंटल प्रक्रिया है जो लापता या क्षतिग्रस्त दांतों को कृत्रिम दांतों से बदल देती है जो असली दांतों की तरह दिखते और काम करते हैं। यह ऑपरेशन खराब फिटिंग वाले डेन्चर या ब्रिजवर्क के लिए एक स्वागत योग्य विकल्प हो सकता है।
दंत प्रत्यारोपण उन रोगियों के लिए पसंदीदा उपचार है जिनके एक या अधिक दांत टूट चुके हैं। प्रत्यारोपण उन रोगियों के लिए उपयुक्त हैं, जिनका एक दुर्घटना में दांत टूट गया है, या दांत गंभीर रूप से सड़ चुके हैं और दांत निकालने की आवश्यकता है। यहां कुछ कारण बताये गये हैं कि किसी को दंत प्रत्यारोपण की आवश्यकता क्यों पड़ सकती है: कैविटी (दांतों की सड़न, दबाना या पीसने की आदत, दांत की जड़ का फ्रैक्चर, चेहरे की चोट कटे ओट मसूढ़े की बीमारी कुछ मामलों में, कुछ कारकों के कारण दंत प्रत्यारोपण सफल नहीं हो सकते हैं।
नीचे दी गयी स्थितियों में कोई व्यक्ति दंत प्रत्यारोपण प्राप्त करने के योग्य नहीं हो सकता है। धुआं, विकिरण उपचार गर्दन या सिर पर, अनियंत्रित मधुमेह, रक्त के थक्के विकार कैंसर जैसी पुरानी बीमारी, खराब रोग प्रतिरोधक क्षमता और जबड़े की हड्डी कमजोर होना।
दंत प्रत्यारोपण से दंत प्रत्यारोपण बेहतर पाचन, चबाने की क्षमता में सुधार करता है। यह आपके आत्मसम्मान को बढ़ाता है।यह आपके बचे हुए दांतों को हिलने से रोकता है। यह आपकी मुस्कान को बरकरार रखता है।यह दांतों को प्राकृतिक रूप देता है। यह स्थायी या हटाने योग्य डेंटल ब्रिज और डेन्चर को बनाए रखने में मदद करेगा।
अन्य स्वास्थ्य लाभों के अलावा आत्मविश्वास में सुधार करने के लिए दंत प्रत्यारोपण महत्वपूर्ण है। आगे बताया कि दंत प्रत्यारोपण उपचार में जोखिम दुर्लभ हैं, और जब वे उत्पन्न होते हैं, तो वे अक्सर हल्के और प्रबंधनीय होते हैं। इम्प्लांट साइट पर संक्रमण या मामूली रक्तस्राव हो सकता है। साथ ही आसपास के ऊतकों और तंत्रिका क्षति में मामूली चोट लग सकती है, जिससे असुविधा या सुन्नता हो सकती है।
ऊपरी जबड़े में दंत प्रत्यारोपण साइनस गुहाओं में से एक में फैल सकता है, जिससे साइनस की समस्या हो सकती है। दुर्लभ परिस्थितियों में मामूली रक्तस्राव का पता लगाया जा सकता है। दंत प्रत्यारोपण के अधिकांश ऑपरेशन सफल होते हैं। उचित मौखिक स्वच्छता का अभ्यास करके संक्रमण से बचा जा सकता है, जैसे कि दिन में दो बार दांतों को ब्रश करना और इंटरडेंटल ब्रश का उपयोग करके अपने दांतों के बीच सफाई करना।
आपको तंबाकू उत्पादों का उपयोग नहीं करना चाहिए और धूम्रपान से बचना चाहिए।प्रत्यारोपण प्रक्रिया के पहले सप्ताह के दौरान, दंत चिकित्सक किसी भी दर्द और दर्द का इलाज करने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं और इबुप्रोफेन जैसी ओवर-द-काउंटर दर्द दवाओं का सुझाव देगा।
सर्जरी के बाद मामूली असुविधा होगी और दंत चिकित्सक नरम खाद्य पदार्थ खाने, दर्द और सूजन को कम करने के लिए आइस पैक लगाने और सर्जिकल साइट के ठीक होने तक धैर्य बनाए रखने की सलाह देंगे। डेंटल इम्प्लांट सुरक्षित हैं और लापता दांतों को बदलने का एक प्रभावी तरीका है।
एक बार डालने के बाद, दंत प्रत्यारोपण जबड़े की हड्डी में मिल जाते हैं। डाक्टर रशमित ने अंत में कई लाभार्थी भागीदारों के प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक दिये।
द्वारा- गणेश प्रसाद चौधरी कार्यपालक सदस्य केंद्रीय सारकार स्वास्थ्य सेवा लाभार्थी कल्याण एसोसिएशन, झारखण्ड रांची
मोबाइल 9308255900
एबीएन हेल्थ डेस्क। थायराइड की समस्या अमूमन महिलाओं में देखी जाती है, हालांकि कई पुरुषों को भी थायराइड हो जाता है। शरीर में हार्मोन के इंबैलेंस की वजह से ये बीमारी होती है। हमारे गले में मौजूद तितली के आकार की थायराइड ग्रंथि होती है, जो हार्मोन का निर्माण करती है।
जब किसी वजह से इस एंडोक्राइन ग्रंथि की कार्यक्षमता प्रभावित होती है तो हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। जिसकी वजह से थायराइड की समस्या से जूझना पड़ता है। इस बीमारी से पीड़ित होने पर सेहत संबंधी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अधिकतर लोग शरीर में होने वाले छोटे-मोटे बदलावों पर ध्यान नहीं देते हैं, लेकिन इससे यह समस्या गंभीर हो सकती है।
थायराइड भी दो तरह का होता है। जब शरीर में थायराइड हार्मोन ज्यादा बनने लगता है तब हाइपरथायरायडिज्म की समस्या होती है और जब यह हार्मोन कम मात्रा में बने तो व्यक्ति हाइपोथायरायडिज्म का शिकार होता है। थायराइड के शुरुआती लक्षणों पर ध्यान दिया जाये तो लाइफस्टाइल में बदलाव कर और कुछ ट्रीटमेंट से इसे कंट्रोल किया जा सकता है। इसलिए इसके लक्षणों को इग्नोर नहीं करना चाहिए।
अगर किसी को हाइपरथायराइड की समस्या हो तो वजन कम होना, भूख ज्यादा लगना, मांसपेशियों में कमजोरी और दर्द, धड़कन तेज होना, घबराहट महसूस होना, बिना वजह चिड़चिड़ापन और पसीना ज्यादा आने जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
जब कोई हाइपोथायराइड से पीड़ित होता है तो उसे पसीना कम आना, बालों का ज्यादा झड़ना, थकान, चेहरे पर सूजन, कब्ज, स्ट्रेस महसूस होना, धड़कनों की गति कम महसूस होना, मांसपेशियों में अकड़न, जोड़ों में दर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
थायराइड के लक्षण दिखाई दे रहे हो तो सोयाबीन और उससे बनी चीजों का सेवन न करें, क्योंकि सोयाबीन में फाइटोएस्ट्रोजन पाया जाता है जो थायराइड हार्मोन बनाने वाले एंजाइम की कार्यक्षमता पर असर डाल सकता है। इसके अलावा इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को अल्कोहल, कैफीन युक्त चीजों जैसे चाय-कॉफी, ज्यादा मीठा और प्रोसेस्ड फूड्स से भी परहेज करना चाहिए।
हेल्दी रहने के लिए यह बहुत जरूरी है कि रोजाना कुछ वक्त एक्सरसाइज के लिए निकाला जाये। थायराइड की समस्या में भी रोजाना वर्कआउट करने से काफी फायदा मिल सकता है, क्योंकि इससे आप अपना वेट मेंटेन रख पाते हैं। वहीं अपनी डाइट में तोरई, लौकी, परवल, मशरूम जैसी सब्जियां शामिल करें। इसके अलावा गाय का दूध, नारियल पानी, ग्रीन टी, बादाम, मूंगफली जैसे फूड्स भी फायदेमंद रहते हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने कहा है कि देश में हार्ट अटैक के मामले कोरोना वायरस की वजह से बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को पहले कोविड का सामना करना पड़ा था। उनमें हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट का रिस्क हो सकता है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के एक अध्ययन का हवाला देते गुए कहा कि जो व्यक्ति गंभीर रूप से कोविड वायरस का शिकार हुए थे उन्हें दिल के दौरे से बचने के लिए एक या दो साल तक जरूरत से ज्यादा परिश्रम नहीं करना चाहिए।
गुजरात में हाल ही में दिल संबंधी समस्याओं की वजह से बहुत से लोगों की मौत हुई है, जिसमें नवरात्रि महोत्सव के दौरान ह्यगरबाह्ण खेलते वक्त हुई घटना भी शामिल है। इसके बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल ने ह्यकार्डियोलॉजिस्टह्ण सहित चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ एक बैठक की।
पटेल ने विशेषज्ञों से कारणों और उपचार का पता लगाने के लिए मौत के आंकड़े जुटाने को कहा है। इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया के बयान से यह साफ हो गया है कि हार्ट अटैक के केस बढ़ने का बड़ा कारण कोरोना वायरस है।
दिल्ली के राजीव गांधी अस्पताल में कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट में डॉ। अजित जैन बताते हैं कि कोरोना महामारी के बाद से ही हार्ट अटैक के केस बढ़े हैं। मरीजों की जांच के दौरान यह साफ हो गया था कि कोरोना वायरस के कारण हार्ट की आर्टरीज में खून के थक्के (ब्लड क्लॉट) बन गये थे। इन क्लॉट की वजह से हार्ट को ब्लड पंप करने में परेशानी हो रही है। इस वजह से दिल का दौरा पड़ रहा है। क्लॉट बनने की एक बड़ी वजह कोरोना का साइड इफेक्ट है।
चिंता की बात यह है कि ये क्लॉट किसी भी उम्र के व्यक्ति के शरीर में बन रहे हैं। भले ही व्यक्ति बाहर से फिट नजर आ रहा हो, लेकिन उसकी हार्ट की नसों में खून के थक्के बन रहे हैं। कई मामलों में इसके कोई लक्षण भी नहीं दिखते हैं। यही कारण है कि अचानक हार्ट अटैक आ रहे हैं और लोगों की मौत हो रही है।
सफदरजंग हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजिस्ट डॉ दीपक कुमार सुमन बताते हैं कि जिन लोगों को कोरोना ने गंभीर रूप से बीमार किया था उन लोगों को हैवी वर्कआउट करने से बचना चाहिए। ऐसे लोगों को डॉक्टर की सलाह के हिसाब से ही एक्सरसाइज करनी चाहिए।
ऐसा इसलिए क्योंकि एक्सरसाइज के दौरान शरीर में आक्सीजन की सप्लाई बढ़ जाती है। ऐसे लंग्स पर प्रेशर पड़ता है और हार्ट भी तेजी से ब्लड पंप करने लगता है। अगर हार्ट में कोरोना की वजह या अन्य किसी कारण से ब्लड क्लॉट बना हुआ है तो हैवी एक्सरसाइज के दौरान हार्ट अटैक आने का खतरा है।
टीम एबीएन, रांची। आज दिनांक 14 अक्टूबर 2023 को सदर अस्पताल रांची के सभागार में जिला स्तरीय तनाव प्रबंधन एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत आयोजित किया गया।
कार्यशाला की शुरुआत एनएमएचपी कार्यक्रम के स्टेट कंसलटेंट शांतना मैडम ने किया। सभा में उपस्थित स्वास्थ्य कर्मियों को संबोधित कहते हुए शांतना मैडम ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन, मानसिक स्वास्थ्य को परिभाषित करते हुए कहता है कि यह सलामती की एक स्थिति है जिसमें किसी व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का एहसास रहता है, वह जीवन के सामान्य तनावों का सामना कर सकता है, लाभकारी और उपयोगी रूप से काम कर सकता है और अपने समाज के प्रति योगदान करने में सक्षम होता है।
कार्यक्रम को आगे बढ़ते हुए मनोचिकित्सक डॉक्टर वीना मिस्त्री ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य मनुष्य के सोचने, समझने, महसूस करने और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करता है। मानसिक विकार में अवसाद दुनिया भर में सबसे बड़ी समस्या है।
यह कई सामाजिक समस्याओं जैसे- बेरोज़गारी, गरीबी और नशाखोरी आदि को जन्म देती है।मानसिक स्वास्थ्य शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है, और यह सबसे बड़ी दौलत में से एक है जिसे हर कीमत पर बचाने की जरूरत है।
कार्यक्रम के दौरान अस्पताल प्रबंधक सुश्री जीरन मैडम, डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस एवं लॉजिस्टिक कंसलटेंट सरोज कुमार चौधरी, डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम असिस्टेंट अभिषेक देव, डॉ नाजिया कैसर, सदर अस्पताल रांची की एएनएम, जीएनएम, नर्सिंग स्टाफ एवं पैरामेडिकल कर्मी मौजूद रहे।
टीम एबीएन, रांची। आज दिनांक 10 अक्टूबर 2023 को मानसिक स्वास्थ्य दिवस के उपलक्ष पर सिविल सर्जन रांची डॉ प्रभात कुमार ने सर्वप्रथम सिविल सर्जन कार्यालय के प्रांगण से फिरायालाल चौक तक प्रभात फेरी का आयोजन किया। जिसमें एनएमटीसी नर्सिंग कॉलेज की छात्राओं ने भाग लिया।
तत्पश्चात सिविल सर्जन कार्यालय के सभागार में सिविल सर्जन महोदय की अध्यक्षता में परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सर्वप्रथम सिविल सर्जन ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य दिवस की शुरुआत विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 7 अप्रैल 1948 को शुरुआत की थी।
पूरे विश्व में यह 1950 में लागू किया गया। जिसका मकसद मानसिक तौर पर लोगों को स्वस्थ रखा जाना है। खास तौर पर कोविद-19 महामारी के दौरान लोगों में मानसिक अवसाद या मानसिक रूप से लोगों में अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंता बढ़ी है।
कार्यक्रम को आगे बढ़ते हुए जिला कुष्ठ निवारण पदाधिकारी पदाधिकारी सह नोडल पदाधिकारी एनसीडी सेल रांची डॉक्टर शोभा किस्पोट्टा ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का एहसास होता है।
इस स्थिति में व्यक्ति दूसरों के साथ सकारात्मक तरीके से बातचीत कर सकता है। साथ ही तनाव की समस्या से निपटने की क्षमता भी रखता है। मानसिक स्वास्थ्य विकार कई प्रकार के होते हैं। इनमें से कुछ सामान्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रकार में ये शामिल हैं ।
कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डालते हुए जिला नोडल पदाधिकारी द्वारा बताया गया कि हमें कुछ महत्वपूर्ण चीजों को समझना अत्यंत आवश्यक है उदाहरण के तौर पर।
मानसिक स्वास्थ्य संबंधी एक विकार चिंता भी है। चिंता के कारण वास्तविक या काल्पनिक स्थितियों में अत्यधिक चिंता या भय उत्पन्न हो सकता है।
यह मानसिक समस्या सामान्य उदासी या दुख से अलग होती है। इसमें व्यक्ति को काफी दुख, क्रोध, निराश या फ्रस्टेशन हो सकती है।
बाइपोलर विकार को पहले मैनिक डिप्रेशन कहा जाता था। इस समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को बारी-बारी से मेनिया (असामान्य रूप से भावनाओं को प्रकट करना) और अवसाद होता है।
यह विकार भोजन और शरीर की छवि से संबंधित जुनूनी व्यवहार होता है। इस समस्या में व्यक्ति बहुत कम खाता है या फिर जरूरत से ज्यादा खाने लगता है।
मानसिक स्वास्थ्य संबंधी यह विकार ऐसी घटनाओं के बाद उत्पन्न होता है, जिसकी कभी आशा न की गई हो। इसमें किसी तरह की लड़ाई , किसी अपने की मृत्यु या गंभीर दुर्घटना शामिल है। इस समस्या की चपेट में आने वाला व्यक्ति तनाव और डर महसूस करता है।
यह एक गंभीर मानसिक रोग है। इसमें लोग ऐसी चीजों को देखने, सुनने और विश्वास करने लगते हैं, जो वास्तविक में हैं ही नहीं।
यह बच्चों में पाये जाने वाले सबसे आम मानसिक विकारों में से एक है। इस समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को अपने व्यवहार को नियंत्रित रखने में परेशानी होती है।
इस मानसिक समस्या के अंतर्गत व्यक्ति को शराब या ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों की लत लग सकती है। इस लत के कारण व्यक्ति की जान को भी जोखिम हो जाता है।
इस स्थिति में व्यक्ति की पर्सनालिटी यानी बिहेवियर में पूरी तरह बदलाव हो जाता है। इससे व्यक्ति के सोचने-समझने, खाने-पीने और सोने के समय में भी बदलाव होता है, जिसका असर व्यक्ति के रिश्तों पर भी पड़ सकता है।
इससे व्यक्ति को तनाव होना भी काफी आम हो जाता है। मनोचिकित्सक डॉ वीना मिस्त्री द्वारा मानसिक स्वास्थ्य के लक्षणों के बारे में विस्तार से बताया कि हम मानसिक स्वास्थ्य के लक्षणों को कैसे समझ पाएंगे इसके लिए हमें विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालें की आवश्यकता है।
इस कार्यक्रम के दौरान जिला कार्यक्रम सहायक अभिषेक देव, फाइनेंशियल एवं लॉजिस्टिक कंसलटेंट सरोज कुमार चौधरी, मनोवैज्ञानिक नाजिया, जिला सलाहकार सुशांत कुमार, सोशल वर्कर सतीश कुमार एवं डाटा एंट्री आपरेटर सौरव आनंद मौजूद रहे।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड में डेंगू के मरीजों की संख्या में रोज इजाफा हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े के मुताबिक गुरुवार को राज्य में डेंगू के 39 नये मरीज मिले हैं। इनमें 26 पूर्वी सिंहभूम, 9 साहिबगंज व 4 धनबाद के हैं।
इस बीच, गुरुवार को टीएमएच जमशेदपुर में डेंगू पीड़ित एक आठ साल के बच्चे की मौत हो गयी। राज्य में अबतक 1447 डेंगू मरीजों की पुष्टि हुई है, जिनमें 901 पूर्वी सिंहभूम के हैं। रांची में 69 मरीज मिल चुके हैं।
आरडीपी से नहीं हो रहा अत्यधिक लाभ चिकित्सकों के अनुसार डेंगू से मिलने वाले सिर्फ दस फीसदी मरीजों को ही प्लेटलेट्स की कमी हो रही है। जिनका प्लेटलेट्स कम हो रहा है उन्हें सिंगल डोनर प्लेटलेट्स की जरूरत पड़ रही है।
आरडीपी से मरीजों को बहुत अधिक लाभ नहीं हो रहा है। पर, ब्लड बैंक में सिंगल डोनर प्लेटलेट्स के लिए किट न्यूनतम साढ़े नौ हजार रुपये में मिल रहा है। ऐसे में निम्न आय वर्ग के लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया पर असर डाला। इसकी यादें आज भी लोगों के जेहन में कैद हैं। इस महामारी ने लाखों लोगों की जान ली है।
हाल ही में इस महामारी से हम उबरे ही थे कि वैज्ञानिकों ने एक संभावित महामारी को लेकर चिंता व्यक्त की है। इस महामारी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने डिजीज एक्स का नाम दिया है। डब्ल्यूएचओ ने चेताया है कि यह महामारी दुनिया में फैलना आरंभ हो चुकी है।
यूके के हेल्थ एक्सपर्ट्स ने डिजीज एक्स को लेकर कहा कि जल्द ही एक नयी महामारी के रूप उभर सकती है। ये कोविड-19 से ज्यादा घातक साबित हो सकती है। 1918-1920 में स्पैनिश फ्लू ने दुनिया में हाहाकार मचाया था। इससे दुनिया भर में 5 करोड़ लोगों की जान चली गयी थी।
डिसीज एक्स के कारण भी इतनी मौत होने की उम्मीद है। यूके की वैक्सीन टास्कफोर्स की चेयरमेन रहीं डेम केट बिंघम के अनुसार, डिसीज एक्स कोरोना वायरस से 7 गुना ज्यादा खतरनाक महामारी हो सकती है। यह करीब 5 करोड़ लोगों की जान ले सकती है।
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में कोरोना से लगभग 70 लाख मौतें हुई थीं। इस महामारी ने चिंताओं को बढ़ा दिया है। अब डिसीज एक्स को कोरोना से भी अधिक घातक बताया जा रहा है। आइये जानने की कोशिश हैं कि डिसीज एक्स है क्या, कैसे फैलता है, इससे बचने के उपाए क्या है?
डिसीज एक्स एक टर्म की तरह है। इसका प्रयोग ऐसी बीमारी के बारे में बताने को लेकर किया जाता है जो इंफेक्शन से फैल जाती है। इसे लेकर मेडिकल साइंस भी अनजान है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, डिसीज एक्स बिना किसी उपचार वाला एक नया वायरस है।
ये जीवाणु, बैक्टीरिया या फंगस भी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है, डिसीज एक्स एक रोगजनक एक्स के कारण हो सकता है. ये दूसरी बीमारी के फैलने कारण होता है। यह आरएनए वायरस की तरह जूनोटिक बीमारी से जुड़ा हो सकता है।
यह जंगली या घरेलू जानवरों में होगा और फिर उनसे इंसानों में फैलने की उम्मीद लगायी जा रही है। कई विशेषज्ञों के अनुसार, लैब में होने वाली दुर्घटनाएं और बायोटेररिज्म की वजह से डिसीज एक्स हो सकता है जो संभावित रूप से वैश्विक विनाशकारी हो सकता है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। भारतीय अपने भोजन में जरूरत से ज्यादा नमक का सेवन कर रहे हैं। एक सर्वेक्षण में सामने आया है कि प्रत्येक भारतीय रोजाना आठ ग्राम नमक खा रहा है, जबकि रोजाना अधिकतम पांच ग्राम नमक ही पर्याप्त है।
अधिक नमक रक्तचाप (बीपी), ब्लॉकेज और स्ट्रोक जैसी बीमारियों की वजह बन रहा है। राष्ट्रीय एनसीडी निगरानी सर्वेक्षण (एनएनएमएस) की रिपोर्ट में भारतीयों के यूरिन में सोडियम की मात्रा भी अधिक पायी जा रही है।
इस रिपोर्ट को बंगलूरू स्थित भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय रोग सूचना विज्ञान और अनुसंधान केंद्र (आईसीएमआर- एनसीडीआईआर) के शोधकर्ताओं ने पूरा किया है। सर्वे में भाग लेने वालों की यूरिन जांच दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों ने की है।
गैर संचारी रोगों को लेकर उच्च सोडियम युक्त आहार लोगों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। डब्ल्यूएचओ ने सभी सदस्य देशों से कहा है कि एक व्यक्ति के लिए दिनभर में अधिकतम पांच ग्राम नमक का सेवन ही काफी होता है, लेकिन भारत में इससे 60 फीसदी अधिक नमक खा रहे हैं।
मेडिकल जर्नल नेचर में प्रकाशित सर्वेक्षण में शोधकर्ताओं ने बताया कि देश के 150 केंद्रों पर दो तरह से 12 हजार लोगों पर अध्ययन किया गया।
इनमें से एक समूह के यूरिन नमूने लेकर जांच की गयी, जबकि दूसरे समूह से बातचीत से सर्वे पूरा किया। 18 से 69 साल की आयु के 10,659 लोगों ने सर्वे में भाग लिया, जिनमें से 2,266 की यूरिन जांच की गयी।
महिलाओं की तुलना में पुरुषों को नमक का स्वाद ज्यादा पसंद है। इतना ही नहीं, शहरी लोग नमकीन और चिप्स के जरिये नमक का अधिक सेवन कर रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग भोजन के साथ चुटकी भर नमक ऊपर से लेते हैं।
एनसीडीआईआर के निदेशक डॉ. प्रशांत माथुर ने बताया, आहार में सोडियम का उच्चस्तर स्ट्रोक और हृदय विफलता के जोखिम को भी बढ़ाता है।
नमक के सेवन के हानिकारक हृदय संबंधी प्रभावों के अलावा यह गैस्ट्रिक कैंसर के लिए एक संभावित जोखिम कारक भी हो सकता है। भारत में गैर संचारी रोगों का भार काफी अधिक है।
सालाना होने वाली कुल मौतों में अकेले हृदय रोगों (सीवीडी) का अनुमान 28.1 फीसदी है। इतना ही नहीं, साल 1990 में 7.8 लाख मौतों की तुलना में 2016 में 16.3 लाख मौतें उच्च रक्तचाप के कारण हुईं।
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