एबीएन हेल्थ डेस्क। बच्चों में बढ़ती आंखों की समस्या एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है, जिसमें वर्तमान समय देखने में आ रहा है कि प्रत्येक बच्चे को जन्म से ही आंखों की समस्या से गुजरना पड़ रहा है। और आंखों पर चश्मा लगता जा रहा है। यह कारण माता-पिता की बदलती लाइफस्टाइल दैनिक दिनचर्या आहार शैली भी एक कारण है। वहीं बच्चों की दिनचर्या एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का ज्यादा उपयोग और फास्ट फूड का अत्यधिक सेवन करने से बच्चे दिन प्रतिदिन आंखों की समस्याओं से ग्रसित होते जा रहे हैं। योगाचार्य महेश पाल विस्तार पूर्वक बताते हैं कि बच्चों में आँखों की समस्याएँ ऐसी किसी भी समस्या या स्थिति को संदर्भित करती हैं जो आँखों, ऑप्टिक तंत्रिका और मस्तिष्क सहित दृश्य प्रणाली को प्रभावित करती हैं।ये समस्याएँ गंभीरता में भिन्न हो सकती हैं, हल्के अपवर्तक त्रुटियों से लेकर अधिक गंभीर स्थितियों तक जो बिना इलाज के दृष्टि हानि का कारण बन सकती हैं। बच्चों में होने वाली आम आँखों की समस्याओं में अपवर्तक त्रुटियाँ शामिल हैं, जैसे कि मायोपिया (नज़दीकी दृष्टि) और हाइपरोपिया (दूरदृष्टि), साथ ही एम्ब्लियोपिया (आलसी आँख), स्ट्रैबिस्मस (भरी आँखें) और कंजंक्टिवाइटिस (गुलाबी आँख) जैसी स्थितियाँ। इन स्थितियों और उनके संकेतों और लक्षणों के बारे में जागरूक होना ज़रूरी है ताकि समय रहते इनका पता लगाया जा सके और उचित उपचार के साथ साथ योग अभ्यास कर समय रहते आंखों की समस्या का निदान कर सकें, बच्चों में आँखों की समस्याओं के कुछ सामान्य लक्षणों में बार-बार आँखों को रगड़ना, अत्यधिक आँसू आना, लाल या सूजी हुई आँखें, प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, आँखें सिकोड़ना , ध्यान केंद्रित न कर पाना, पढ़ने या नज़दीक से काम करने में कठिनाई और आँखों का असामान्य संरेखण शामिल हैं।मायोपिया (निकट दृष्टि दोष): मायोपिया एक अपवर्तक त्रुटि है जिसमें दूर की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं, जबकि पास की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। यह तब होता है जब नेत्रगोलक बहुत लंबा होता है या कॉर्निया बहुत अधिक घुमावदार होता है।हाइपरोपिया (दूरदृष्टि दोष): हाइपरोपिया एक अपवर्तक त्रुटि है जिसमें पास की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं, जबकि दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।यह तब होता है जब नेत्रगोलक बहुत छोटा होता है या कॉर्निया बहुत सपाट होता है।निस्टागमस: निस्टागमस आँखों की एक अनैच्छिक कार्य है, जो अक्सर बार-बार, अनियंत्रित आँखों की हरकतों की विशेषता होती है। यह जन्म से ही मौजूद हो सकता है या बचपन में ही विकसित हो सकता है।एम्ब्लियोपिया (आलसी आँख): एम्ब्लियोपिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें दोनों आँखों या एक आँख की दृष्टि दूसरी की तुलना में कमज़ोर होती है, यहाँ तक कि चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस के इस्तेमाल के बाद भी। यह तब होता है जब मस्तिष्क दृश्य विकास के दौरान एक आँख को दूसरी आँख की तुलना में ज़्यादा महत्व देता है।कंजंक्टिवाइटिस (गुलाबी आँख): कंजंक्टिवाइटिस कंजंक्टिवा की सूजन है,जो आंख के सफेद हिस्से और पलकों के अंदर के हिस्से को ढकने वाला पतला पारदर्शी ऊतक है। यह एलर्जी, वायरस या बैक्टीरिया के कारण हो सकता है।आंसू : नलिकाओं का अवरुद्ध होना: अवरुद्ध आंसू नलिकाएं बच्चों में अत्यधिक आंसू, स्राव और चिपचिपी पलकें पैदा कर सकती हैं। यह आमतौर पर रूढ़िवादी प्रबंधन के साथ जीवन के पहले वर्ष के भीतर ठीक हो जाता है। एकोमोडेटिव एसोट्रोपिया: एकोमोडेटिव एसोट्रोपिया एक प्रकार का स्ट्रैबिस्मस है जिसमें अत्यधिक फोकस करने के प्रयास के कारण एक या दोनों आंखें अंदर की ओर मुड़ जाती हैं। यह अक्सर दूरदर्शिता से जुड़ा होता है।तिरछी आंखें (स्ट्रैबिस्मस): स्ट्रैबिस्मस एक ऐसी स्थिति है जिसमें आंखें ठीक से संरेखित नहीं होती हैं और अलग-अलग दिशाओं में विचलित हो जाती हैं। यह रुक-रुक कर या लगातार हो सकता है और अगर इसका इलाज न किया जाए तो गंभीर दृष्टि हानि हो सकती है। बच्चों में आंखों की समस्या से बचाव के लिए बच्चों की दैनिक दिनचर्या में 1 घंटे का योग अभ्यास अत्यंत आवश्यक है जिसमें प्राणायाम आंसू नलिकाओं के अवरोधों को दूर करने मैं सहायक हैवहीं आंखों की योगिक सूक्ष्म क्रिया से स्ट्रैबिस्मस, आँशु नलिकाओं का अवरुद्ध होने की समस्या, निस्टागमस आदि समस्याओं से बचा जा सकता है वहीं आसान और प्राणायाम ध्यान के द्वारा मायोपिया (निकट दृष्टि दोष), हाइपरोपिया (दूरदृष्टि दोष) एम्ब्लियोपिया (आलसी आँख) कंजंक्टिवाइटिस (गुलाबी आँख) आदि आँखों की समस्याओं से बचा जा सकता है, जिसमे रेगुलर योग अभ्यास मैं आँखों की योगिक सूक्ष्म क्रियाएं, सुखासन, स्वास्तिक आसान पद्मासन, सर्वांगासन शीर्षासन विपरीत करनी मुद्रा , प्राणायाम में अनुलोमविलोम, भ्रामरी, चंद्रभेदी आज्ञाचक्र पर ध्यान, नदी शोधन प्राणायाम आदि के अभ्यास से आंखों की समस्याओं से बचा जा सकता है।5 वर्ष से अधिक के बच्चे योगाभ्यास अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं, आंखों में लालिमा होने की समस्या होने पर शीर्षासन का अभ्यास न करें। बच्चों की दैनिक दिनचर्या में पौष्टिक आहार शैली और दैनिक दिनचर्या में योगाभ्यास को स्थान देकर आंखों की समस्या के साथ-साथ हम बच्चों को भविष्य में आने वाले विभिन्न प्रकार मानसिक व शारीरिक रोगों से बचा सकते हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। परम श्रद्धेय योग ऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, अध्यक्ष वर्ल्ड योगासन एवं योगाचार्य डॉ जयदीप आर्य, महासचिव वर्ल्ड योगासन एवं योगासन भारत के मार्गदर्शन में आॅल इंडिया योगासन पुलिस गेम 27 सितंबर 2024 को भिलाई छत्तीसगढ़ में 18 से 55 वर्ष के आयु वर्ग में संपन्न हुआ। समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ जयदीप आर्य, महासचिव वर्ल्ड योगासन एवं योगासन भारत का सान्निध्य व आशीर्वाद प्राप्त हुआ। मुख्य अतिथि का स्वागत छत्तीसगढ़ योगासन सचिव एव कंपटीशन डायरेक्टर यश पाराशर कंपटीशन मैनेजर जयंत जैन ने पुष्प गुच्छ, स्मृति चिह्न और अंगवस्त्र देकर किया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में रचित कौशिक, कोषाध्यक्ष योगासन भारत का स्वागत किया गया। अन्य गणमान्य अतिथियों में सचिव रोहित कौशिक, यस पारासर उमग नारंग श्रेयस मारकंडेय छत्तीसगढ़ पुलिस आईजी आदि शामिल रहे। मुख्य अतिथि डॉ जयदीप आर्य जी ने करो योग, रहो निरोग के माध्यम से प्रतिदिन योगासन और प्राणायाम को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी और कहा वह दिन दूर नहीं जब योगासन खेल के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए सर्वाधिक मेडल जीतकर राष्ट्र का नाम रोशन करेंगे। योगाचार्य महैश पाल ने बताया की इस प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा आल इंडिया नेशनल योगासन पुलिस गेम का आयोजन भिलाई छत्तीसगढ़ में किया गया जिसमें पूरे देश से 511 योग के खिलाड़ियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में पांच प्रकार के इवेंट्स—ट्रेडिशनल, आर्टिस्टिक पेयर, आर्टिस्टिक सिंगल, रिदमिक पेयर, और आर्टिस्टिक ग्रुप इवेंट्स—में प्रतिभागियों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। इस प्रतियोगिता में प्रत खिलाड़ी को प्रत्येक आसन के प्रदर्शन पर 10 अंक में से अंक दिये गये, जो माइक्रो मार्किंग सिस्टम के आधार पर खिलाड़ियों की प्रतिभा को आकलन किया गया। योगासन भारत, भारत सरकार के खेल युवा कल्याण विभाग के अंतर्गत कार्य करने बाली योग की सबसे बड़ी संस्था है जो हमेशा योगासन को गाव से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर योग के खिलाडियों को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है, इस प्रतियोगिता मे आर्टिस्टिक सिंगल सीनियर बी+सी ग्रुप में प्रथम स्थान बब्लिना खाकरे मध्य प्रदेश पुलिस का रहा, दूसरा स्थान राजस्थान व तृतीय स्थान पंजाब पुलिस का रहा। इसी तरह अन्य इवेंट में बीएसएफ पुलिस आइटीबीपी पुलिस एवं अन्य इवेंट में अलग-अलग राज्य की पुलिस ग्रुप ने स्थान प्राप्त किया। समापन पर छत्तीसगढ़ योगासन सचिव व छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा सभी अतिथियों, खिलाड़ियों और आयोजन समिति का धन्यवाद ज्ञापित किया एवं राष्ट्रगान के साथ प्रतियोगिता को सम्पन्न किया गया।
बनाया शून्य मृत्यु दर का कीर्तिमान एबीएन सेंट्रल डेस्क। नया जीवन पाने वाले इन हृदय रोगियों के लिए विश्व हृदय दिवस की पूर्व संध्या पर बत्रा हास्पिटल में सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। बत्रा हार्ट एंड मल्टीस्पिशयलिटी ग्रुप, फरीदाबाद ने समय पर और तत्परता से इलाज के जरिए पिछले एक साल में हृदयाघात से भर्ती सभी 110 मरीजों की जान बचा कर शून्य मृत्युदर का कीर्तिमान बनाया है। इन मरीजों में ज्यादातर वे थे जिन्हें गंभीर रूप से दिल का दौरा पड़ा था या हृदय संबंधी गंभीर समस्याएं थीं। विश्व हृदय दिवस की पूर्व संध्या पर हास्पिटल में आयोजित एक सम्मान और सालगिरह समारोह को संबोधित करते हुए कार्डियक साइंसेज के निदेशक और अध्यक्ष डॉ. पंकज बत्रा ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा, पिछले साल भर में हमारे पास हृदय रोगों और हृदयाघात के 110 मरीज आये और विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा उनके सफलतापूर्वक इलाज से उन्हें जीवनदान मिला। इस कार्यक्रम में उपस्थित अधिकांश मरीजों को गंभीर रूप से दिल के दौरे पड़े थे और उनकी धमनियों में 100 प्रतिशत ब्लॉकेज था। इस कार्यक्रम में कश्मीर से लेकर केरल तक के 55 से 85 वर्ष की आयु के मरीजों ने बत्रा हार्ट एंड मल्टीस्पेशलिटी हास्पिटल, फरीदाबाद में नया जीवन पाने के अपने अनुभवों को साझा किया। दिल्ली के अधेड़ आयु के एक मरीज डेविड ने बताया कि किन हालात में वे इस अस्पताल पहुंचे और किस तरह डॉ. पंकज की तत्परता से उनका जीवन बच पाया। उन्होंने बताया, मुझे हृदय की समस्या थी जबकि मैं इसे पेट में गैस और जलन की समस्या समझता रहा। जब सीने में दर्द बढ़ने लगा तो मुझे बत्रा हास्पिटल लाया गया जहां डॉ. पंकज ने तुंरत मेरे मर्ज को पहचान कर समय से मेरा इलाज कर मेरा जीवन बचाया। डेविड की पत्नी ने भी इसी बात को दोहराया और वहां मौजूद उन मरीजों की भावनाओं को अभियक्ति जिन्हें इस हास्पिटल में जीवनदान मिला। ज्यादातर मरीजों ने छुट्टियों में भी गंभीर रूप से पीड़ित मरीजों को आपात चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने की बत्रा हास्पिटल की प्रतिबद्धता की चर्चा करते हुए उम्मीद जताई कि यह रविवार और छुट्टियों के दिन भी खुला रहेगा। डॉ. पंकज ने कहा, शून्य मृत्युदर हमारी टीम के समर्पण और उनकी विशेषज्ञता का प्रमाण है। हमने आपातकालीन चिकित्सा जिसे डोर बैलून टाइम कहते हैं और जहां मरीज की जान बचाने के लिए 30 मिनट से भी कम का समय मिलता है, में अपनी विशेषज्ञता से नये मानदंड स्थापित करते हुए इसे एक जीवनरक्षक प्रारूप बनाया है। मरीजों को सम्मानित करने के साथ ही अस्पताल प्रबंधन ने गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) के स्टाफ, नर्सों, डॉक्टरों और मरीज के अस्पताल में भर्ती होने से पहले व उसके बाद इलाज व देखभाल में शामिल सभी कर्मचारियों को भी मेरिट प्रमाणपत्र से सम्मानित किया। इस मौके पर बत्रा हर्ट एंड मल्टी स्पेशियलिटी हास्पिटल, फरीदाबाद के अध्यक्ष रमेश कुमार बत्रा ने डॉ पंकज की किताब प्रीवेंशन आॅफ हर्ट डिजीज का लोकार्पण किया। हृदय की बीमारियों से बचाव के लिए जीवनशैली में सुधार की जरूरत की चर्चा करते हुए डॉ. पंकज ने नियमित व्यायाम, टहलने, तनावमुक्त रहने, धूम्रपान नहीं करने और ब्लड प्रेशर एवं मधुमेह पर नजर रखते हुए समय-समय पर चिकित्सा जांच कराते रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा, चिकित्सा विज्ञान में तमाम अविष्कारों के बावजूद 2019 के आंकड़े बताते हैं कि हृदय संबंधी बीमारियों से दुनिया में 1.80 करोड़ लोगों की मौत हुई जिसमें 58 प्रतिशत लोग एशिया के थे। इसकी बड़ी वजह अनियमित नींद, मोबाइल का लगातार इस्तेमाल, जंक फूड और धूम्रपान है। बत्रा हास्पिटल हृदय दशकों से हृदय चिकित्सा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है और देशभर के मरीजों की उम्मीदों पर खरा उतरा है।
बिना दवाई कंट्रोल होगा कोलेस्ट्रॉल, आज से ही लाइफस्टाइल में करें 8 बदलाव एबीएन हेल्थ डेस्क। बदलती लाइफस्टाइल और गलत तरीके के खान-पान की वजह से लोग कोलेस्ट्रॉल जैसी कई समस्याओं के शिकार हो रहे हैं। शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ने से धमनियों में ब्लॉकेज का जोखिम होता है। इसलिए इसको नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। ऐसे में आप अपनी जीवनशैली में कुछ बदलाव करके हाइ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कंट्रोल में रख सकते हैं। जो लोग फिजिकल एक्टिविटी कम करते हैं और जिनकी खराब खान-पान की आदत के साथ जीवन शैली भी गड़बड होती है। उन्हें हाई बीपी, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल जैसी गंभीर बीमारियां बड़ी ही आसानी से अपने चपेट में ले लेती हैं। बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल की समस्या को खुद से दूर रखना जरूरी है। वरना हम कई अन्य गंभीर बीमारियों का भी शिकार बन सकते हैं। कुछ खाद्य पदार्थों में फैट अधिक मात्रा में पाया जाता है, जिनके अधिक सेवन से कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ जाता है, जिसे हाई कोलेस्ट्रॉल कहते हैं। शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर जब ज्यादा होने लगता है तो रक्त वाहिकाओं में फैट जमा होने लगता है और यह आपकी धमनियों के जरिए रक्त प्रवाह में परेशानी खड़ा करता है। वहीं जब खून हार्ट की मांसपेशियों तक ठीक तरह से नहीं पहुंच पाता है तो हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ जाता है, जिससे हम हार्ट अटैक और स्ट्रोक के शिकार भी हो सकते हैं। डॉक्टर दवाओं की मदद से कोलेस्ट्रॉल के बढ़े हुए लेवल को कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं लेकिन अगर जीवन शैली अच्छी न हो तो इन दवाओं का असर भी धीरे-धीरे कम हो जाता है। अगर आप बैड कोलेस्ट्रॉल की समस्या को जड़ से खत्म करना चाहते हैं तो लाइफस्टाइल में कुछ छोटे-छोटे बदलाव आपके जीवन में असरदार साबित हो सकते हैं। इससे खराब कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखा जा सकता है। हाई कोलेस्ट्रॉल के लक्षण इस बीमारी को खुद से दूर रखना जरूरी है। वरना हम कई अन्य गंभीर बीमारियों के भी शिकार बन सकते हैं। शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने पर हाई ब्लड प्रेशर और वजन अधिक होने जैसी समस्या भी देखी जाती है। हाई कोलेस्ट्रॉल के खुद कोई खास लक्षण नहीं होते हैं। ऐसे में 20 या उससे अधिक उम्र के लोगों को हर 5 सालों में कम से कम एक बार ब्लड में कोलेस्ट्रॉल के लेवल की जांच करानी चाहिए। अगर आपके घर के किसी सदस्य में हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या का अनुवांशिकी इतिहास रहा है तो डॉक्टर आपको बार-बार कोलेस्ट्रॉल की जांच करने की सलाह भी दे सकते हैं। कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के मुख्य कारण हमारे शरीर में कोलेस्ट्रॉल दो तरह के होते हैं। एक गुड कोलेस्ट्रॉल और दूसरा है बेड कोलेस्ट्रॉल। इसको हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया या हाइपरलिपिडेमिया और हाई कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। जानवरों से बने फूड्स जैसे अंडे, दूध, मीट, पनीर और मक्खन के साथ सैचुरेटेड फैट को लेने से उच्च कोलेस्ट्रॉल की समस्या हो सकती है। पैकेट बंद खाद्य पदार्थों जैसे बिस्किट, नमकीन और चिप्स का सेवन भी हाई कोलेस्ट्रॉल के कारणो में शामिल होता है। अधिक वजन के कारण भी एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। जो लोग फिजिकल एक्टिविटी नहीं करते उनके शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल तेजी से बढ़ सकता है। हाइपोथाइरॉएडिज्म और किडनी लिवर जैसे रोगों के कारण भी हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या का खतरा बढ़ सकता है। धूम्रपान और शराब का सेवन खराब कोलेस्ट्रॉल को बढ़ा सकता है। हाई कोलेस्ट्रॉल के मरीजों के लिए बैलेंस डाइट कोलेस्ट्रॉल के जोखिम को कम करने के लिए भले ही आप दवाइयों का सहारा ले रहे हो लेकिन जीवनशैली में कुछ बदलाव आपके लिए मददगार साबित हो सकते हैं। कोलेस्ट्रॉल को हमेशा ठीक रखना चाहते हैं तो स्वस्थ भोजन खाएं। अपने डाइट में साबूदाना, मिलेट्स, लीन प्रोटीन, फल, सब्जियां इत्यादि जरूर शामिल करें। आहार में बदाम, अखरोट, एवोकाडो, अलसी के बीज और मछली जैसे ओमेगा 3 फैटी एसिड से भरपूर फूड्स को शामिल करें। कोलेस्ट्रॉल को कम करने में बैलेंस डाइट अहम भूमिका निभाती है। जिन फूड्स में ट्रांस फैट्स और सैचुरेटेड फैट्स कम मात्रा में पाया जाता है, ही अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं।
डायबिटीज, बीपी की ये दवाएं लैब टेस्ट में फेलखराब मेडिसिन ऐसे पहुंचाती हैं शरीर को नुकसानएबीएन हेल्थ डेस्क। भारत में दवाओं की बढ़ती क़ीमतें आम लोगों के लिए एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। इस बीच जब ये पता चले की डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों को कंट्रोल करने वाली कुछ दवाएं लैब टेस्ट में फेल हैं तो फिर ये चिंता का विषय है।भारत की भारत में ड्रग रेगुलेटरी अथॉरिटी केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने 53 दवाओं को लैब क्वालिटी टेस्ट में फेल किया है। इनमें हाई ब्लड प्रेशर और टाइप-2 डायबिटीज को कंट्रोल करने वाली दवाएं भी शामिल हैं। भारत में डायबिटीज के 10 करोड़ से ज्यादा मरीज हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, आमतौर पर डायबिटीज के कुल मरीजों में से 80 फीसदी से ज्यादा टाइप-2 वाले होते हैं। इसी तरह भारत में हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों की संख्या भी 20 करोड़ है। ऐसे में अब सोचिए कि इतनी बड़ी आबादी जिस बीमारी की दवा खाती है उनकी क्लाविटी अच्छी नहीं है।जो दवाएं टेस्ट में फेल हुई हैं उनमें हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने वाली मेडिसिन टेल्मिसर्टन और टाइप-2 डायबिटीज की दवा ग्लिमेपिराइड भी शामिल है। हालांकि इन नाम की सभी मेडिसिन फेल नहीं है, इन दवाओं को बनाने वाली दो कंपनियों की दवा की ही क्वालिटी खराब मिली है। इस बीच यह जानना भी जरूरी है की टेस्ट में फेल दवाएं अगर कोई खा चुका है तो वह कैसे शरीर को नुकसान पहुंचाती है। क्या सभी दवाएं ही खराब हैं? इसको जानने के लिए हमने एक्सपर्ट्स से बातचीत की है। दिल्ली में मेडिसिन के डॉ अजय कुमार बताते हैं कि लैब टेस्ट में फेल होने वाली दवाएं वह होती हैं। जिनको खाने से सेहत खराब हो सकती है।आमतौर पर दवा किडनी और लिवर को खराब करती है, चूंकि डायबिटीज और हाई बीपी की दवाएं लोग आमतौर पर हर दिन ही खाते हैं तो अगर टेस्ट में फेल दवा कोई खा चुका है तो इससे लिवर में खराबी या किडनी की कोई बीमारी होने की आशंका रहती है। हालांकि लैब टेस्ट में फेल होने का ये मतलब नहीं है कि भारत या दुनिया में मौजूद सभी ग्लिमेपिराइड और टेल्मिसर्टन दवा खराब हैं। ऐसा बिलकुल नहीं है।डॉ कुमार बताते हैं कि हर दवा को कई कंपनियां अपने-अपने ब्रांड नेम से बनाती हैं।मैसर्स, मैस्कॉट हेल्थ सीरीज़ प्रा. लिमिटेड की ओर से बनाई जा रही ग्लिमेपिराइड लैब टेस्ट में फेल हुई है। इसी तरह स्विस गार्नियर लाइफ कंपनी की टेल्मिसर्टन फेल है। यानी सिर्फ इन कंपनी की ओर से बनाई जा रही ग्लिमेपिराइड और टेल्मिसर्टन दवाओं की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। बाकी कंपनियों की दवाएं ठीक है। उनको आप खा सकते हैं. उनसे नुकसान नहीं है।क्यों लैब टेस्ट में दवा होती है फेल?जीटीबी हॉस्पिटल में सीनियर रेजिडेंट डॉ अंकित कुमार बताते हैं कि कई बार खराब मौसम और किसी बैक्टीरिया के दवाओं के स्टॉक में जाने से कुछ स्टॉक खराब हो जाता है। कुछ मामलों में सेंपलिंग एरर की वजह से भी दवाएं लैब टेस्ट में फेल हो जाती हैं।ऐसे में जरूरी नहीं होता कि कंपनी की ओर से बनाई गई सभी दवाएं ही खराब हों, या आगे जो दवा बनेंगी वो भी फेल हो जाएं, ये सब जरूरी नहीं है। हालांकि फिर भी दवा कंपनियों को सभी चीजों का ध्यान रखना चाहिए। कंपनियों को स्टॉक की सही से जांच करनी चाहिए। इसके बाद ही दवाएं आम लोगों तक जानी चाहिए।
कोरोना वायरस का नया खतरा! 27 देशों तक फैला XEC वेरिएंट, कितना खतरनाक?एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनियाभर में लाखों लोगों की जान लेने वाला कोरोना वायरस एक बार फिर पैर पसार रहा है। इसी साल जून में जर्मनी के बर्लिन में कोरोना वायरस का एक नया वेरिएंट XEC (MV.1) सामने आया था, जानकारी के मुताबिक यह वेरिएंट दुनियाभर में तेज़ी से फैल रहा है। स्क्रिप्स रिसर्च के आउटब्रेक डॉट इन्फो पेज पर 5 सितंबर को दी गयी जानकारी के मुताबिक अमेरिका के 12 राज्यों और 15 देशों में इस वेरिएंट के 95 मरीज पाये गये हैं। वहीं ऑस्ट्रेलिया के डाटा इंटिग्रेशन स्पेशलिस्ट माइक हनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी दी है कि यूरोप, नॉर्थ अमेरिका और एशिया के करीब 27 देशों में इस नए वेरिएंट के 100 से ज्यादा मरीजों की पहचान की जा चुकी है।माइक हनी ने आशंका जतायी है कि आने वाले दिनों में यह वेरिएंट ओमिक्रॉन के DeFLuQE की तरह चुनौती बन सकता है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक इस महीने की शुरुआती दो हफ्तों में ओमिक्रॉन वेरिएंट का KP.3.1.1 स्ट्रेन (जिसे DeFLuQE के नाम से जाना जाता है) हावी रहा है।1 से 14 सितंबर के बीच अमेरिका में इस वेरिएंट के करीब 52.7 % मरीज पाये गये हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि जितनी तेजी से XEC वेरिएंट फैल रहा है, वह जल्द ही KP.3 वेरिएंट के बाद दूसरा बड़ा खतरा हो सकता है। इस वेरिएंट के लक्षण भी बुखार और सर्दी की तरह हैं। इसमें तेज बुखार आना, शरीर में दर्द, थकान, खांसी और गले में खराश महसूस हो सकती है। इसके अलावा सांस लेने में परेशानी, सिरदर्द, स्वाद और सुगंध का पता न चलना, उल्टी और डायरिया जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं। कोरोना वायरस से ग्रसित ज्यादातर लोग कुछ ही हफ्तों में ठीक महसूस करने लगते हैं लेकिन इस वेरिएंट से संक्रमित मरीज को ठीक होने में ज्यादा समय लगता है।
टीम एबीएन, रांची। एडीज मच्छर के काटने से फैलने वाली बीमारी डेंगू तेजी से राज्य के कई जिलों में पांव पसार रहा है। राजधानी के अलग-अलग निजी और सरकारी अस्पतालों में डेंगू के लक्षण के साथ पहुंच रहे हैं। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग जहां अलर्ट मोड में हैं तो वहीं दूसरी ओर डॉक्टर इससे बचाव के उपाय भी लोगों को बता रहे हैं।08 सितंबर तक 436 लोगों में डेंगू की हो चुकी है पुष्टिझारखंड में वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल के नोडल पदाधिकारी डॉ बीके सिंह ने बताया कि इस वर्ष राज्य के गोड्डा, पाकुड़ और जामताड़ा जिले को छोड़ बाकी के 21 जिलों में डेंगू के मरीज मिल चुके हैं। सबसे ज्यादा 122 डेंगू मरीज की पहचान रांची में हुई है जबकि पूर्वी सिंहभूम में 66, खूंटी में 59 मरीज मिले हैं। स्वास्थ्य निदेशालय के अनुसार बोकारो में 09, चतरा में 05, देवघर में 06, धनबाद में 09, दुमका में 01, गढ़वा में 16, गिरिडीह में 18, गुमला में 08, हजारीबाग में 20, कोडरमा में 04, लातेहार में 04, लोहरदगा में 03, पलामू में 13, रामगढ़ 06, साहिबगंज में 24, सरायकेला-खरसावां में 15, सिमडेगा में 04 और पश्चिमी सिंहभूम में 24 डेंगू के कंफर्म केस मिल चुके हैं।
देश के टॉप-21 अस्पतालों में मिला डेडली बैक्टीरिया, आइसीएमआर की चौंकाने वाली रिपोर्ट! एबीएन सेंट्रल डेस्क। एक नयी रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ( आइसीएमआर) के अनुसार, देश के 21 प्रमुख अस्पतालों में सुपरबग्स की खतरनाक उपस्थिति देखी गई है। इन सुपरबग्स के कारण अस्पतालों में भर्ती मरीजों के जीवन को खतरा हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा क्लासीफाइड सुपरबग्स (क्लेबसिएला न्यूमोनिया और एस्चेरिचिया कोलाई) मुख्य रूप से एम्स दिल्ली, पीजीआइ चंडीगढ़, अपोलो अस्पताल चेन्नई और दिल्ली के गंगाराम अस्पताल सहित कई अन्य अस्पतालों में पाये गये। आईसीएमआर रिपोर्ट में कहा गया है कि ये सुपरबग्स मरीजों के सैंपल में पाये गये, जिनमें खून, यूरीन और अन्य तरल पदार्थ शामिल हैं, जो आउट पेशेंट विभागों (ओपीडी), वार्डों और आईसीयू से एकत्र किए गए थे। इस खुलासे से अस्पतालों में अलार्म बज गया है और उन्हें सुपरबग्स के आगे प्रसार को रोकने के लिए दवाओं का बेहतर मैनेजमेंट और जीवाणु अपशिष्ट के निपटान के लिए सख्त प्रोटोकॉल का पालन करने की सलाह दी गयी है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनइपी) द्वारा इस साल की शुरुआत में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि 2050 तक सुपरबग्स कैंसर जितने बड़े खतरे में हो सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसे सुपरबग्स के प्रत्यक्ष आर्थिक परिणाम 2030 के अंत तक लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष होंगे। इसके अलावा, 24 मिलियन लोग चरम गरीबी में धकेले जा सकते हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि पशु पालन और फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा प्रदूषण से सुपरबग्स का उदय बढ़ गया है। क्या हैं सुपरबग्स? सुपरबग्स बैक्टीरिया, वायरस, फंगी या परजीवी के ऐसे स्ट्रेन हैं जो ज्यादातर एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति रजिस्टेंस होते हैं, जिनमें आधुनिक दवाएं भी शामिल हैं। वे अक्सर एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग के कारण होते हैं। कीटाणुनाशक, एंटीसेप्टिक्स और एंटीबायोटिक्स जो जर्म्स को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं, हर जगह मौजूद हैं, टूथपेस्ट और शैम्पू से लेकर गाय के दूध और गंदे पानी तक।
टीम एबीएन, रांची। विश्व फिजियोथेरेपी दिवस पर सिनर्जी ग्लोबल हॉस्पिटल के फिजियोथेरेपी डिपार्टमेंट में वर्ल्ड फिजियोथेरेपी दिवस को बहुत ही हर्ष उल्लास के साथ मनाया गया। इस बार वर्ल्ड फिजियोथेरेपी डे का थीम रोल आफ फिजियोथेरेपी इन मैनेजमैंट एंड प्रिवेंशन इन लो बैक पैन था। जिस विषय पर हमारे मुख्य अतिथि और प्रवक्ता ने अपने विचारों को साझा किया।डॉ रजनीश कुमार (हड्डी रोग विशेषज्ञ) ने बताया कि हेल्थ केयर प्रोफेशन में जितना इंपोर्टेंट रोल हमारा है, उतने ही महत्वपूर्ण रोल फिजियोथेरेपी का है। सर्जरी के बाद पेशेंट को वापस दैनिक दिनचर्चा में लाने में फिजियोथेरेपी का पचास प्रतिशत का योगदान है। साथ ही डॉ राहुल (हड्डी रोग विशेषज्ञ) ने भी बताया कि जितने पेशेंट हमारे पास आते हैं उनमें से अस्सी- नब्बे प्रतिशत मामला का मुख्य कारण कमर दर्द से रिलेटेड ही रहता है।जिसे ठीक करने हेतु हम फिजियोथेरेपी की सलाह देते हैं। फिजियोथेरेपी अतिथि के रूप में मौजूद संध्या आर मेहता (आईपीएस, डीआइजी, सीआईडी) मैम ने भी फिजियोथेरेपी को लेकर अपने जीवन के अनुभव को शेयर किया कि कैसे फिजियोथेरेपी की मदद से पुराने कमर दर्द से राहत पाया और वापस से दर्द से निजात पाया। विशेष अतिथि लवली चौबे (स्वर्ण विजेता भारत) (लॉन बॉल) और कॉमनवेल्थ गेम्स ने भी बताया कि खेलने के दौरान उन्होंने फिजियोथेरेपी के मदद से कैसे अपने सपनों को साकार किया। साथ ही गेस्ट के तौर पर डॉ कुमकुम विद्यार्थी मैम (सीनियर ज्ञानिकोलोजिस्ट) और डॉ संगीत सौरभ सर (गैस्ट्रोलॉजिस्ट) ने भी फिजियोथेरेपी के जागरूकता हेतू अपने अपने विचार प्रकट किये। आखिरी स्पीकर के तौर पर डीबीपीआर के संस्थापक डॉ रजनीश कुमार बरियार, डॉ प्रियंका बरियार ने सभी अतिथियों को सौल और मोमेंटो देकर उनका सम्मान किया और डॉ बरियार ने बताया कि हम कैसे अपने समाज के हर व्यक्ति को फिजियोथेरेपी के एक्सरसाइज से हम उन्हें कमर के दर्द से दूर रख सकते हैं।उनका बस एक ही उद्देश्य है कि समाज का हर व्यक्ति को स्वस्थ रहना है। उनकी पूरी टीम कैसे इस कार्य में जुटी हुई है और अंत में डॉ सुभालक्ष्मी खटुआ ने वोट आफ थैंक्स देकर कार्यक्रम का समापन किया। डॉ शुभालक्ष्मी ने उन सारे मरीज का भी सम्मान किया और उन्हें शॉल और गुलदस्ता देकर उनका स्वागत भी किया गया। कार्यक्रम में डॉ ज्योत्सना, डॉ अफजल, डॉ आर्यन, डॉ राहुल, डॉ नेहा, डॉ शिवानी, डॉ शीला, डॉ धीरज, डॉ मेहर, डॉ सबाना, जौनुअल, निशांत, राज सिंह, संजू सिंह, डॉ नसीम, डॉ जावेद, डॉ हेमलता, सबीना, पिंकी सुशांत ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सबने फिजियोथेरेपी की जागरूकता को लेकर कमर के दर्द के इलाज और इसके रोक थाम के बारे में बेहतरिन जानकारी दी।
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