एबीएन हेल्थ डेस्क। उज्जायी प्राणायाम गले से सांस लेने की तकनीक है, जो योग मे अंतर्निहित है। योगाचार्य महेश पाल बताते हैं कि यह एकमात्र ऐसा प्राणायाम है। इसको कभी भी खाने से पहले, खाने के बाद, उठते, बैठते, सोते किया जा सकता है। यह किसी के शरीर में ऊर्जा को नियंत्रित कर सकता है और सांस को उचित चैनल पर नियंत्रित करता है उज्जायी प्राणायाम को सागर श्वास या विजयी श्वास के नाम से भी जाना जाता है।
उज्जायी दो शब्दों से मिलकर बना है- उद जिसका अर्थ है श्रेष्ठता या शक्ति का भाव, और जया का अर्थ है जीत, विजय या सफलता, जो इसे विजयी श्वास का अर्थ देता है। सांस छोड़ने और सांस लेने के दौरान समुद्री लहर जैसी ध्वनि के कारण इसे समुद्री श्वास के रूप में जाना जाता है। वायु के साथ गले के घर्षण के कारण ध्वनि उत्पन्न होती है, उज्जायी प्राणायाम उन प्राणायाम में से एक है, जिसे गले की थायराइड समस्या से निदान पाने के लिए किया जाता है।
इस प्राणायाम को मन एवं तन की शांति के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह प्राणायाम हमें सभी बंधनों से मुक्त कर देता है और एक ताजगी का अनुभव कराता है। उज्जयी सांस एक प्रकार की डायाफ्रामिक सांस है जिसके माध्यम से गले की ग्लोटिस की मांसपेशियां थोड़ी संकुचित हो जाती हैं, जिससे हवा मुखर डोरियों के अंदर और बाहर गुजरते समय फुसफुसाहट, श्रव्य कंपन पैदा करती है, जिससे गले में उपस्थित अविटु ग्रंथी (थायराइड) को एक्टिव कर हाइपोथायरायडिज्म और हाइपरथायरायडिज्म रोग को नियंत्रित किया जाता है। अवटु ग्रंथि हाइपोथैलेमस, पीयूष ग्रंथि आदि कारकों द्वारा नियंत्रित होती है।
अवटु ग्रंथि की सबसे सामान्य समस्याएं अवटु ग्रंथि की अतिसक्रियता (हाइपरथाइरॉयडिज्म) और अवटु ग्रंथि की निम्नसक्रियता (हाइपोथाइरॉयडिज्म) हैं। जब अवटु ग्रंथि बहुत अधिक मात्रा में हार्मोन बनाने लगती है तो शरीर, ऊर्जा का उपयोग मात्रा से अधिक करने लगता है। इसे हाइपर थाइराडिज्म कहते हैं। जब अवटु ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती तो शरीर, ऊर्जा का उपयोग मात्रा से कम करने लगता है। इस अवस्था को हाइपोथायराडिज्म कहते हैं।
ये असमान्य अवस्थाएं किसी भी आयु वाले व्यक्ति में हो सकती है क्योंकि हाइपरथायरायडिज्म आपके चयापचय को तेज कर देता है जिससे हमारे शरीर पर कई प्रभाव पड़ते हैं, जिसमें,घबराहट या बेचैनी महसूस होना, चिड़चिड़ापन, सामान्य से अधिक या कम ऊर्जा होना, निगलने में परेशानी सूजी हुई थायरॉयड, जिसे गलगंड कहा जाता है, वजन कम होना, वजन बढ़ना, घेंघा रोग, तेज या असमान दिल की धड़कन, सामान्य से अधिक मल त्याग, भूख का बढ़ना, पसीना आना, मांसपेशियों में कमजोरी, हाथों और उंगलियों में कंपन, अनिद्रा, त्वचा का पतला होना, बालों का टूटना या झड़ना, माहवारी में परिवर्तन, बांझपन, इन सभी समस्याओं से हम ग्रसित होते चले जाते हैं इन समस्याओं को नियंत्रित करने में उज्जायी प्राणायाम काफी लाभकारी माना जाता है।
उज्जाई प्राणायाम करने के लिए सुखासन में बैठ जाएं कमर गर्दन सीधी रखें और दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा में रखें उसके पश्चात हमारी गर्दन को हल्का सा नीचे की ओर झुकाये फिर गले को संकुचित कर गले से आवाज व कंपन करते हुए धीरे-धीरे श्वास को खींचे फिर कुछ देर रोक कर जालंधर बंध लगाए और फिर धीरे-धीरे बायीं नाशिका से सांस को छोड़ दें इस प्रकार 10 चक्र करे, इस प्राणायाम के अभ्यास से कई लाभ मिलते है जिसमें, थायराइड, उच्च रक्तचाप और दिल से संबंधित रोगों को नियंत्रित करता है, श्वास की गति को धीमा करके दीघार्यु में सुधार करता है।
आवाज को मधुर बनाता है, गले (कंठ) कफ, खाशी गले की सूजन आदि रोगों को दूर करता है प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाता है,तंत्रिका तंत्र को शांत और पुनर्जीवित करता है, अच्छी नींद को बढ़ावा देता है,खरार्टों को नियंत्रित करता, उज्जायी प्राणायाम करने से पहले कुछ सावधानियां रखे जिसमें, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगी, अचानक चक्कर आने पर इस प्राणायाम को जारी न रखें प्रतीक्षा करें जब तक आप वापस सामान्य स्थिति में न पहुंच जाएं और सामान्य रूप से सांस न लें।
सांस लेने की प्रक्रिया करते समय अनावश्यक बल न लगाएं। जिनको सर्वाइकल है वह अभ्यास करते समय गर्दन को आगे ना झुकाएं। उज्जयी प्राणायाम ध्वनि में शामिल बड़बड़ाहट विधि ब्रांकाई को धीरे से कंपन करने में मदद करती है जो सिलिअट एपिथेलियल ऊतक को सक्रिय करने में मदद करती है। श्वसन गतिविधियों के पारंपरिक तरीकों में, सांस छोड़ने के दौरान ब्रांकाई पर दबाव हल्का होता है। उज्जायी प्राणायाम सांस लेने और छोड़ने दोनों के दौरान ब्रांकाई पर एक स्थिर स्तर का दबाव बनाए रखने में मदद करता है।
यह छोटी ब्रांकाई के ढहने का प्रतिकार करने में मदद करता है, जिससे साँस छोड़ने की विधि में सूजन आ जाती है। फेफड़ों के अंदर अवशिष्ट वायु की मात्रा को भी इस तरह से कम किया जा सकता है। उज्जयी प्राणायाम ब्रोन्कियल अस्थमा या पुरानी श्वसन स्थितियों से पीड़ित लोगों के लिए काफी मददगार है इसलिए थायराइड जैसे गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए हमें इस प्राणायाम को हमारी दैनिक दिनचर्या में शामिल करना चाहिए।
एबीएन हेल्थ डेस्क। वर्तमान समय में मानव स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से ग्रसित होता जा रहा है। उसी क्रम में पायरिया रोग (दांत एवं मसूड़े) की समस्या एक गंभीर जन्म लेते जा रही है, जो बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों में आमतौर पर देखने को आती है। जिससे हमारे मुंह से दुर्गंध आना, मुंह से पस आना, बार-बार मसूड़े से ब्लीडिंग होना आदि समस्या पायरिया बीमारी में होती है। जिससे हमारा पाचन तंत्र भी प्रभावित होता है। इससे बचाव में शीतकारी प्राणायाम काफी लाभकारी माना जाता है।
योगाचार्य महेश पाल विस्तार से बताते हैं कि प्राणायाम का योग में बहुत महत्व है। आदि शंकराचार्य श्वेताश्वतर उपनिषद पर अपने भाष्य में कहते हैं- प्राणायाम से जिस मन का मैल धुल गया है, वही मन ब्रह्म में स्थिर होता है। इसलिए शास्त्रों में प्राणायाम के विषय में उल्लेख है।
स्वामी विवेकानंद इस विषय में अपना मत व्यक्त करते हैं कि इस प्राणायाम में सिद्ध होने पर हमारे लिए मानो अनंत शक्ति का द्वार खुल जाता है। मान लो, किसी व्यक्ति की समझ में यह प्राण का विषय पूरी तरह आ गया और वह उस पर विजय प्राप्त करने में भी कृतकार्य हो गया, तो फिर संसार में ऐसी कौन-सी शक्ति है, जो उसके अधिकार में न आये। उसकी आज्ञा से चंद्र-सूर्य अपनी जगह से हिलने लगते हैं।
क्षुद्रतम परमाणु से वृहत्तम सूर्य तक सभी उसके वशीभूत हो जाते हैं, क्योंकि उसने प्राण को जीत लिया है। प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त करना ही प्राणायाम की साधना का लक्ष्य है। शीतकारी प्राणायाम एक यौगिक श्वास व्यायाम है, जो मन को शांत करता है और शरीर को ठंडा करता है। दांतों व मसूड़े को स्वस्थ बनाता है। यह शब्द संस्कृत के शीतकारी से आया है, जिसका अर्थ है चूसना या फुफकारना।
प्राण जिसका अर्थ है जीवन शक्ति और अयामा, जिसका अर्थ है विस्तार। अभ्यास करने के लिए दांतों को बंद करके मुंह से सांस अंदर खीचना होता है, ये अजगर की सांस लेने के समान हैं। अजगर, मुर्गियां, हिरण के बच्चे मुंह खोलकर गहरी सांस लेते हैं और वे सभी हवा के साथ आसानी से अंदर चले जाते हैं और उनमें उसे पचाने की क्षमता होती है।
शीतकारी प्राणायाम की प्रक्रिया भी इसी प्रकार है। सांस लेने की ये दोनों गतिविधियां शरीर और दिमाग को ठंडा करने में भी बहुत उपयोगी हैं। जब आपको तेज प्यास लग रही हो और पानी उपलब्ध न हो तो इन प्रक्रियाओं के 6 या 7 चक्र करने से आपकी प्यास कम हो सकती है। शीतकारी प्राणायाम का उल्लेख हठ योग प्रदीपिका में प्राणायाम की एक प्रक्रिया के रूप में किया गया है। शीतली और शीतकारी प्राणायाम एक जैसे हैं, लेकिन इनमें सिर्फ एक ही अंतर है, सांस लेने के तरीके का।
शीतली में हम जीभ मोड़कर सांस लेते हैं और शीतकारी में हम दांतों से सांस लेते पायरिया एक गंभीर मसूड़ों का संक्रमण है जो मसूड़ों, स्नायुबंधन और हड्डियों को नुकसान पहुंचाता है। मसूड़ों और दांतों की जड़ों से मवाद निकलता है। आमतौर पर मवाद का सेवन भोजन के साथ किया जाता है, जिससे कई संक्रमण हो सकते हैं पेरियोडोंटल बीमारी के उन्नत चरण में यह रक्तस्राव और मसूड़ों से मवाद निकलने का कारण बनता है। यह सबसे व्यापक बीमारियों में से एक है।
यह वयस्कों में दांत खराब होने का सबसे आम कारण है। यह आमतौर पर अपर्याप्त दंत स्वच्छता के परिणामस्वरूप होता हैं पायरिया यह एक जीवाणु संक्रमण का परिणाम है। इसे पायरिया एल्वेओलारिस कहते हैं।पेरियोडोंटाइटिस जिंजिवाइटिस का एक गंभीर रूप है, जिसमें मसूड़ों की सूजन दांत के आसपास की संरचनाओं तक फैल जाती है। प्लाक और टार्टर पहले दांतों और मसूड़ों के बीच बनता है और फिर दांतों के नीचे की हड्डी में फैल जाता है।
मसूड़े सूज जाते हैं और खून बहता है, सांस से बदबू आती है और दांत ढीले हो जाते हैं। शीतकारी प्राणायाम दांतों व मसूड़े की सूजन को रोकता है प्लाक और टारटर को दांतों व मसूड़े की बीच में बनने से रोकना जिससे मसूड़े की सूजन और खून बहने को रोककर पायरिया जैसी गंभीर समस्या से बचाता है शीतकारी प्राणायाम करने के लिए, आप सबसे पहले साफ-सुथरी और खुली जहग पर ध्यान लगाने वाली मुद्रा में बैठकर आप अपनी आंखें बंद कर पूरे शरीर को आराम देने की कोशिश करें।
मुंह को बिलकुल सीधा रखकर दांतों को हल्का सा जुड़ा हुआ रखें और अपने होंठों को थोड़ा सा खुला रखें। इसके बाद आप अपनी जीभ को ऊपर की ओर चिपकाते हुए वहीं रखें। ऊपर और नीचे के दोनों दांतों को आपस में मिलाकर सी सी की आवाज करते हुए एक लंबी सांस लेते हुए अपने मुंह को बंद करें। फिर सांस को अंदर से बाहर छोड़ने के लिए अपनी नाक का इस्तेमाल करें और धीरे-धीरे नाक से सांस को त्यागें इस प्रक्रिया को काफी धीरे-धीरे करें और इस प्रक्रिया को करीब 10 बार दोहरायें।
शीतकारी प्राणायाम के अभ्यास से हमारे शरीर पर कई लाभ देखे गए हैं जिसमें यह शरीर के तापमान को ठंडा करता है इसलिए यह बुखार में उपयोगी है। यह मुंह, गले और जीभ संबंधी रोगों में लाभकारी है। प्लीहा और अपच में मदद करता है। उच्च रक्तचाप और ग्रीष्म सत्र के लिए सर्वोत्तम। यह पायरिया जैसी दंत समस्याओं में कारगर है।
यह शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। दिमाग को शांत करता है और यह सबसे अच्छा स्ट्रेस बस्टर है। भावनात्मक उत्तेजना और मानसिक तनाव को कम करता है। अवसाद के लिए सर्वोत्तम शीतकारी प्राणायाम करते हुए ये सावधानियां बरतें बुजुर्ग जिन लोगों के दांत काफी कमजोर या जिन लोगों दांत नहीं होते उन लोगों को शीतकारी प्राणायाम नहीं करना चाहिए।
आप इसकी जगह शीतली प्राणायाम कर सकते हैं। सांस से संबंधित रोग या अस्थमा रोगियों को नहीं करना चाहिए, हृदय रोगियों के लिए ये प्राणायाम थोड़ा मुश्किल और कठिन हो सकता है। कब्ज के शिकार लोगों को भी नहीं करनी चाहिए, कोशिश करें कि आप सुबह के ठंडे मौसम में ही शीतकारी प्राणायाम का अभ्यास करें।
एबीएन हेल्थ डेस्क। झारखंड में फिलहाल भीषण गर्मी का दौर चल रहा है। हीट वेव को लेकर कई सारे जिलों में अलर्ट जारी है। दोपहर के 12 से 2 बजे तक खासकर मौसम विभाग के तरफ से न निकलने की चेतावनी भी जारी की गयी है। ऐसे में खुद का ख्याल न रखना आपको बहुत बड़ी मुसीबत में डाल सकता है।
कई बार लोग डिहाइड्रेशन को हल्के में लेते हैं। पर यह कई बार इतना खतरनाक होता है कि किडनी फेल्यर तक का कारण बन सकता है। रांची के आयुर्वेदिक डॉक्टर वीके पांडे ने कहा कि गर्मी में खुद का ख्याल रखा बेहद जरूरी है। इस मौसम में छोटी सी भूल आपको बहुत भारी पड़ सकती है। आपको अस्पताल के चक्कर भी लगाने पड़ सकते हैं। इसलिए इन बातों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है।
गर्मी में सबसे पहले चीज जो करना है वह हर दिन कम से कम 4 लीटर पानी, पीना ही पीना है।क्योंकि पसीने के माध्यम से आपके शरीर से पानी हमेशा निकलते रहता है। ऐसे में डिहाइड्रेशन होना आम बात है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनियाभर में अलग-अलग तरह की बीमारियों पर लगातार रिसर्च चलती रहती है। इसी क्रम में बर्ड फ्लू पर भी हाल ही में एक रिसर्च हुई है। पीट्सबर्ग में बर्ड फ्लू पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों ने इस बीमारी को बड़ा खतरा बताया है। आशंका जतायी है कि आने वाले समय में ये बीमारी बड़ी संख्या में लोगों को संक्रमित कर सकती है।
वैज्ञानिकों ने कहा है कि बर्ड फ्लू का वायरस एच5एन1 बहुत तेजी से अपने पांव पसार रहा है। इससे पक्षी और अब जानवर तक संक्रमित हो रहे हैं। अगर यह वायरस इसी तरीके से बढ़ता रहा तो आने वाले समय में ये कोरोना से भी खतरनाक महामारी का रूप ले सकता है। बर्ड फ्लू कोविड से भी 100 गुना खतरनाक हो सकता है।
वैज्ञानिक ये आशंका इसलिए जता रहे हैं क्योंकि बर्ड फ्लू पहले की तुलना में अब बहुत ही तेजी से फैल रहा है। पहले ये बीमारी मुर्गियों में ही ज्यादा होती थी। लेकिन अब गाय, बिल्ली और मनुष्य भी इससे संक्रमित हो रहे हैं। अमेरिका में मुर्गियों और 337,000 चूजों में बर्ड फ्लू का संक्रमण मिला है। इससे बड़ी संख्या में मुर्गियों की मौत हो रही है। अमेरिका में गायों में भी बर्ड फ्लू से मरने के मामले सामने आ रहे हैं।
हाल ही में अमेरिकी के टेक्सास में डेयरी फार्म में काम करने वाला एक व्यक्ति H5N1 वायरस से पॉजिटिव पाया गया था। इसी वजह से ही वैज्ञानिकों ने इसपर रिसर्च की है, जिसमें पता चला है कि बर्ड फ्लू के वायरस में कई तरह के म्यूटेशन हो रहे हैं। इस बीच बड़ा सवाल यह है कि क्या बर्ड फ्लू कोविड से बड़ा खतरा बन सकता है और क्या भारत में ये किसी नई महामारी का रूप ले सकता है? ये जानने के लिए हमने एक्सपर्ट्स से बातचीत की है।
राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में डॉ एनआर रावत बताते हैं कि बर्ड फ्लू एच5एन1 इन्फ्लूएंजा वायरस की वजह से होता है। ये वायरस पक्षियों में फैलता है और उनकी सांस की नली पर हमला करता है। जिससे पक्षियों को सांस लेने में परेशानी होती है और इलाज न मिलने पर उनकी मौत हो जाती है।
ये वायरस पक्षियों के मल और उनकी लार से एक दूसरे में फैलता है। इसकी संक्रमण दर इतनी अधिक होती है कि कुछ ही दिनों में ये वायरस लाखों पक्षियों को संक्रमित कर सकता है और उनकी मौत का कारण बन सकता है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। झारखंड के उत्पाद शुल्क आयुक्त फैज एक्यू अहमद मुमताज) ने एक अभिनव कार्यक्रम शुरू करके एक साहसिक कदम उठाया है। इस पहल का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन कौशल सिखाना है। उनके नेतृत्व में 10 हजार से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया है।
वे अब पूरे राज्य में आपात स्थिति के दौरान जीवन रक्षक सहायता प्रदान करने के लिए तैयार हैं। कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) एक ऐसी तकनीक है। जिसका उपयोग दिल के दौरे या फिर सांस लेने में कठिनाई जैसी आपात स्थितियों के दौरान काम आती है।
प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा तुरंत सीपीआर दिए जाने पर व्यक्ति के जीवित रहने की संभावना थोड़ी ज्यादा बढ़ जाती है। हाल ही में, छत्तीसगढ़ में एक बुजुर्ग महिला से जुड़ी एक प्रेरक घटना से फैज एक्यू अहमद मुमताज सीपीआर के महत्व को समझाया।
बिहार की अपनी यात्रा के दौरान जानलेवा स्थिति का सामना करने के बावजूद, सीपीआर की बदौलत वह होश में आ गयीं। अहमद मुमताज ने बताया कि अपनी पत्नी, डॉ हेना शादियाह के साथ बातचीत से प्रेरित होकर, उन्होंने समय पर सीपीआर हस्तक्षेप सुनिश्चित करके जीवन बचाने का मिशन शुरू किया।
उन्होंने उत्पाद शुल्क विभाग के भीतर सीपीआर प्रशिक्षण सत्र शुरू किये, जो तेजी से जिला कार्यालयों, बार और क्लबों तक फैल गये। न्यूनतम संसाधनों और 1-1.5 घंटे के छोटे प्रशिक्षण सत्र के बावजूद अहमद मुमताज की पहल ने गति पकड़ी है।
बता दें कि अहमद मुमताज का दृष्टिकोण प्रशिक्षण से परे तक फैला हुआ है।
उनका लक्ष्य एक प्रभावशाली प्रभाव पैदा करना है। जहां प्रशिक्षित व्यक्ति प्रशिक्षक बन जाए, जिससे सीपीआर विशेषज्ञता का प्रभाव कई गुना बढ़ जाये। अब बागवानी निदेशक के रूप में अपनी नई भूमिका में बदलाव करते हुए, मुमताज झारखंड के समाज में सीपीआर शिक्षा को शामिल करने के लिए कोशिश कर रहे हैं।
चिकित्सा पेशेवर सीपीआर को स्वास्थ्य जागरूकता के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में पहचानते हुए इस पहल का समर्थन करते हैं। डॉ डीपी सिंह एक सामान्य चिकित्सक, संभावित रूप से कई लोगों की जान बचाने के लिए मुमताज के प्रयासों की प्रशंसा करते हैं। एक अन्य चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ दानिश इजाज सीपीआर की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर देते हैं।
राजधानी रांची में रुइन हाउस और स्वर्णरेखा बार एंड रेस्तरां ने सीपीआर प्रशिक्षण के परिवर्तनकारी प्रभाव की प्रशंसा करते हुए प्रशंसापत्र साझा किए हैं। इन प्रतिष्ठानों के कर्मचारी अब आपात स्थिति के दौरान निर्णायक रूप से कार्य करने के लिए सशक्त महसूस करते हैं।
स्वर्णरेखा बार एंड रेस्तरां के मालिक सिकंदर रजवार ने विशेष रूप से मुमताज के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उनके कर्मचारी अब हृदय संबंधी आपात स्थितियों को आत्मविश्वास से संभालने में सक्षम हैं। मुमताज ने व्यापक सीपीआर जागरूकता की महत्वपूर्ण आवश्यकता को पहचानते हुए, उत्पाद शुल्क विभाग के भीतर सीपीआर सत्र शुरू किये।
सीमित बजट पर काम करने और न्यूनतम संसाधनों की आवश्यकता के बावजूद ये सत्र अत्यधिक प्रभावी साबित हुए हैं, जो प्रति प्रशिक्षण केवल 1-1.5 घंटे तक चलते हैं। मुमताज एक ऐसे प्रभाव की कल्पना करते हैं। जहां प्रशिक्षित व्यक्ति प्रशिक्षक बन जाते हैं। जिससे पूरे समुदाय में सीपीआर विशेषज्ञता का प्रभाव बढ़ जाता है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। राग, रंग, उल्लास और हुड़दंड का त्योहार होली 21 मार्च को है। बच्चों से लेकर बड़े तक सभी इस रंगीन त्योहार को पसंद करते हैं और एक-दूसरे के साथ रंग-गुलाल खेल कर और खा-पीकर इसे मनाते हैं।
पहले के समय में होली पारंपरिक तरीके से मनायी जाती थी, जिसमें प्राकृतिक और ऑर्गेनिक रंगों का प्रयोग होता था, लेकिन आजकल मिलावटी व सिंथेटिक रंगों का प्रचलन काफी अधिक बढ़ गया है। ऐसे रंग हमारी त्वचा, आंखों, नाखून, बाल एवं आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं।
इन रासायनिक रंगों से त्वचा पर खुजली, दाने, एलर्जी, एग्जिमा, ब्रेकआउट आदि होने लगता है। लेकिन कुछ सावधानियां बरत कर हम होली का त्योहार मस्ती और हर्षोल्लास के साथ मना सकते हैं।
किसी भी तरह की तकलीफ होने पर स्वयं इलाज करना खतरनाक हो सकता है। ऐसी स्थिति में चर्म रोग विशेषज्ञ से अवश्य मिलें।
एबीएन हेल्थ डेस्क। होली की मस्ती में अपने रेशमी बालों की हिफाजत करना बिल्कुल न भूलें, क्योंकि होली के रंगों में कई तरह के रसायन जैसे लेड आक्साइड, मरकरी सल्फाइट, कॉपर सल्फेट, कांच के कण, अभ्रक और धूल की भी अच्छी-खासी मौजूदगी होती है।
ये रसायन जहां एक तरफ हमारे बालों की चमक छीन लेते हैं, वहीं त्वचा को रूखी और बेजान बना देते हैं। इसलिए जरूरी है कि होली खेलते समय अपनी दमकती हुई त्वचा और रेशम जैसे बालों की फिक्र जरूर करें।
होली खेलते समय लोग अकसर गुलाल और गीले रंगों का इस्तेमाल करते हैं। ये रंग प्राकृतिक नहीं होते हैं। इनमें रासायनिक तत्व और चमकने वाली माइका तथा लेड जैसे रसायन होते हैं। इस कारण इन रंगों से होली खेलने के बाद स्किन पर निशान पड़ना, त्वचा का बदरंग होना जैसी समस्याएं आम हैं।
होली अगर खुली जगह पर खेली जाती है, तो उस दौरान त्वचा पर सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें पड़ती हैं जिनका बुरा असर होता है। इससे त्वचा रूखी हो जाती है, त्वचा में नमी की कमी हो जाती है और दाग-धब्बे भी पड़ जाते हैं। इसलिए होली खेलने के लिए जब घर से बाहर निकलें तो उसके 20 मिनट पहले त्वचा पर सनस्क्रीन लोशन लगा लें।
ध्यान रहे कि वही सनस्क्रीन क्रीम लगाएं, जिसका एसपीएफ स्तर 20 या इससे ज्यादा हो। यदि आपकी त्वचा अधिक संवेदनशील है और उस पर जल्दी दाग-धब्बे होते हैं तो और ज्यादा एसपीएफ वाला सनस्क्रीन चुनें।
ज्यादातर सनस्क्रीन ऐसे होते हैं जिनमें त्वचा को मॉयश्चराइज करने की क्षमता होती है। यदि आपकी त्वचा रूखी है तो सनस्क्रीन को पहले चेहरे पर लगाएं, इसके बाद थोड़ी देर इंतजार करके मॉयश्चराइजर लगायें।
दिन के समय हल्का मेकअप किया जा सकता है। आंखों को आईपेन से या काजल से संवारें और लिपग्लोस का इस्तेमाल करें। यह हल्का मेकअप कैमिकल युक्त रंगों से त्वचा को बचाने में सहायक हो सकता है।
होली खेलने के बाद त्वचा से रंग छुड़ाने के लिए तुरंत साबुन से चेहरा न धोएं। क्योंकि साबुन से इसमें रूखापन आ जाता है। इसकी बजाय क्लिंजिंग क्रीम या लोशन का इस्तेमाल करें। इससे चेहरे पर मसाज करें। इसके बाद गीली रूई से चेहरे को पोंछ लें। आंखों के आसपास की जगह को साफ करें। हल्के हाथों से की गयी साफ-सफाई होली के रंगों को आसानी से हटा सकती है।
होली के अगले दिन सूर्य की किरणों से सम्पर्क में रहने से त्वचा को होने वाली नुकसान जैसे रूखापन और दाग धब्बों को हटाने के लिए दो टेबल स्पून शहद में आधा कप दही मिलायें। इसमें थोड़ी मात्रा हल्दी की मिलाकर इस मिश्रण को चेहरे, गर्दन और बाजू पर लगाएं।
इसे त्वचा पर 20 मिनट तक लगाने के बाद ताजे पानी से धो दें। शहद एक प्राकृतिक मॉयश्चराइजर है और यह त्वचा को मुलायम बनाता है। इसमें मिलायी दही त्वचा को पोषण देती है और होली के रंगों में मिलाए गए रासायनिक तत्वों से उसे सुरक्षा देती है।
होली के रंग सिर की त्वचा ही नहीं बल्कि बालों को भी रूखा और बेजान बना देते हैं इसलिए होली खेलने के लिए घर से निकलने से पहले बालों की सुरक्षा के लिए उस पर तेल की परत चढ़ा लें। होली खेलने के बाद बालों को धोने के दौरान इसे पहले सादे पानी से अच्छी तरह धोएं ताकि बालों में लगे सूखे रंग और माइका के छोटे कण बालों को नुकसान न पहुंचाएं।
इसके बाद किसी हर्बल शैम्पू से बालों को धोएं। सिर से रंगों को अच्छी तरह छुड़ाने के लिए शैम्पू को थोड़ी देर सिर में लगाकर अच्छी तरह सिर की मालिश करें और इसके बाद इन्हें पानी से धो दें। पानी के एक मग में थोड़ा सा नीबू मिलाएं और इससे सिर धोएं। बालों को आखिरी बार बीयर से भी धोया जा सकता है।
यह बालों को मुलायम बनाता है और उनकी कंडीशनिंग करता है। नींबू का जूस बीयर में मिलाएं और इसे बालों पर शैम्पू करने के बाद लगाएं। इसे थोड़ी देर के लिए यूं ही छोड़ दें और सादे पानी से बालों को धोएं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। योग के आठ अंगों में से चौथा अंग है प्राणायाम। प्राण+आयाम से प्राणायाम शब्द बनता है। प्राण का अर्थ जीवात्मा माना जाता है, लेकिन इसका संबंध शरीरांतर्गत वायु से है जिसका मुख्य स्थान हृदय में है। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब बह मृत्यु को प्राप्त होता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। तब यह सिद्ध हुआ कि वायु ही प्राण है।
आयाम के दो अर्थ है- प्रथम नियंत्रण या रोकना, द्वितीय विस्तार करना, योगाचार्य महेश पाल विस्तार पूर्वक बताते हैं कि योगग्रंथ हठयोग प्रदीपिका के अनुसार मानव शरीर में 72000 नस - नाड़ियों का जाल बिछा हुआ है नाड़ियों के शुद्धिकरण का कार्य नाड़ी शोधन प्राणायाम द्वारा किया जाता है, नाड़ी शब्द का अर्थ है, मार्ग या शक्ति का प्रवाह और शोधन का अर्थ होता है, शुद्ध करना।
नाड़ी शोधन का अर्थ हुआ, वह अभ्यास जिससे नाड़ियों का शुद्धिकरण हो। नाड़ी शोधन प्रभावी प्राणायाम है, जो मस्तिष्क, हृदय, शरीर और भावनाओं को सही रखता है नाड़ियां मानव शरीर में सूक्ष्म ऊर्जा चैनल हैं जो विभिन्न कारणों से अवरुद्ध हो सकती हैं। नाड़ी शोधन प्राणायाम एक सांस लेने की तकनीक है जो इन अवरुद्ध ऊर्जा चैनलों को साफ़ करने में मदद करती है, तनाव के कारण नाड़ियां अवरुद्ध हो जाती हैं।
भौतिक शरीर में विषाक्तता के कारण भी नाड़ियों में रुकावट आती है शारीरिक और मानसिक आघात के कारण नाड़ियां अवरुद्ध हो जाती हैं अस्वस्थ जीवन शैली के कारण भी देखे जाते हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना मानव शरीर में सबसे महत्वपूर्ण नाड़ियों में से तीन हैं।
जब इड़ा नाड़ी सुचारू रूप से काम नहीं करती है या अवरुद्ध हो जाती है, तो व्यक्ति को सर्दी, अवसाद, कम मानसिक ऊर्जा और सुस्त पाचन एवं बायां नासिका अवरुद्ध होने का अनुभव होता है। जबकि जब पिंगला नाड़ी सुचारू रूप से काम नहीं करती है या अवरुद्ध हो जाती है, तो व्यक्ति को गर्मी, तेज गुस्सा और जलन, शरीर में खुजली, शुष्क त्वचा और गला, अत्यधिक भूख, अत्यधिक शारीरिक या यौन ऊर्जा और दाहिनी नासिका अवरुद्ध हो जायेगी।
नाड़ी शोधन हठ योग के अंतर्गत ध्यान या धारणा प्रारम्भ करने के पूर्व कम से कम तीन माह तक चारो संध्याओं (प्रातः काल, दोपहर, संध्याकाल, अर्धरात्रि) में किया जाने वाला प्राणायाम है। नाड़ियों के शोधन हो जाने से ध्यान ऊर्जा के उर्ध्वगमन में बाधा समाप्त हो जाती है।नाड़ी शोधन में सांस लेने में जितना समय लगता है उससे अधिक समय सांस रोकने और छोड़ने में लगता है।
सांस लेते समय सांस की गति इतनी धीमी होनी चाहिए की सांस लेने की आवाज स्वयं को ही आए नाड़ी शोधन प्राणायाम करने के लिए कमर गर्दन सीधी कर ले सुखासन पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाए फिर ज्ञान मुद्रा का चयन करें उसके पश्चात बांयी नासिक से सांस ले और फिर कुछ देर रोक कर रखे फिर धीरे-धीरे दांयी नासिक से सांस छोड़ दें उसके पश्चात दांयी नासिक से सांस ले और बांयी नासिका सांस से छोड़ दें जैसा कि अनुपात के माध्यम से बताया जा रहा है प्रारंभ में स्वास का अनुपात 1:1:1,उसके पश्चात 1:2:2, अभ्यस्त होने के बाद 1:4:2 के अनुपात में अभ्यास किया जाता है अर्थात अगर आप 15 सेकेंड सांस लेते हैं तो 60 सेकेण्ड रोक कर रखे और 30 सेकेण्ड तक छोड़े ये प्रक्रिया 10 मिनिट तक दोहराएं, नाड़ीशोधन प्राणायाम से हृदय, फेफड़े व मस्तिष्क के स्नायु को बल मिलता है, जिससे वो स्वस्थ बने रहते हैं।
साथ ही यह मन को शांत और एकाग्र करने वाला है। इसके अभ्यास से तनाव, क्रोध, चिंता, चिड़चिड़ापन, बेचैनी, हाई ब्लड प्रेशर, माइग्रेन, नींद न आना, अंगों में कम्पन, मल्टिपल सिरॉसिस आदि मन-मस्तिष्क के विकारों में लाभ पहुंचता है। यह हमारे भीतर शान्ति व धैर्य को बढ़ाकर संकल्प शक्ति, निर्णय शक्ति, और संतुलन शक्ति का विकास करता है।
नाड़ी शोधन प्राणायाम साइलेंट हार्ट अटैक से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, साइलेंट हार्ट अटैक काफी खतरनाक है। इसकी पहचान कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। कई बार साइलेंट अटैक के लक्षणों को लोग ऐसे ही नज़रअंदाज कर बैठते हैं। छाती में हल्का दर्द या अचानक सांस फूलने को साधारण बात समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं।
एक स्टडी के मुताबिक करीब 45 प्रतिशत लोगों को हार्ट अटैक के कोई लक्षण नहीं होते हैं। जिसे साइलेंट हार्ट अटैक माना जाता है। जैसा कि नाम से जाहिर है कि ऐसे हार्ट अटैक में बिना किसी लक्षण के अटैक आता है। ये ज्यादा खतरनाक माना जाता है। ऐसी स्थिति में लोगों को पहले हार्ट अटैक का पता नहीं चल पाता है। लोग सही इलाज भी नहीं करवाते हैं और फिर दूसरा अटैक खतरनाक साबित हो जाता है।
साइलेंट हार्ट अटैक एक गंभीर बीमारी है जिसका हमें पता भी नहीं चलता और यह हमें मृत्यु की ओर ले जाती है कोरोना काल के पश्चात पूरे देश में साइलेंट हार्ट अटैक के कैस बढ़ते जा रहे हैं। जिसमें देखा जा रहा है कि 9 साल से लेकर 50 साल तक के बच्चों युवाओं और बुजुर्गों में यह अटेक गंभीर रूप से चिंता का विषय बनता जा रहा है, साइलेंट हार्ट अटैक का मतलब है कि आपके दिल को ऑक्सीजन नहीं मिल रही है। इससे दिल को आघात पहुंचता है।
आमतौर पर, रक्त का थक्का कोरोनरी धमनियों में से एक के माध्यम से रक्त के प्रवाह को रोककर दिल के दौरे का कारण बनता है। कोरोनरी धमनी की ऐंठन रक्त प्रवाह को रोक देती है जिससे साइलेंट हार्ट अटैक की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है।
नाड़ी शोधन प्राणायाम के अभ्यास से शुद्ध ऑक्सीजन हृदय तक पहुंचती है जिसके माध्यम से कोरोनरी धमनी के अवरोध दूर हो जाते हैं। धमनी और शिराओं के अवरोधों को दूर कर रक्त का थक्का जमने से रूक जाता है, जिससे साइलेंट हार्ट अटैक से बचा जा सकता है। यह प्राणायाम नस- नाड़ियों (धमनी, शिराओं) के शोधन का कार्य करता है।
साइलेंट हार्ट अटैक आने के कई कारण होते हैं, जिसमें मधुमेह, मोटापा, जेनेटिक, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, योग व्यायाम की कमी, मादक पदार्थों का सेवन, जंक फूड का सेवन, योग प्राणायाम का महत्व बढ़ रहा है वैज्ञानिक समुदाय के लिए यह अधिक स्वीकार होता जा रहा है।
छंदोग्य उपनिषद के अनुसार प्राण एक आंतरिक मैट्रिक्स (सूक्ष्म ऊर्जा) है और वायु एक बाहरी मैट्रिक्स (स्थूल ऊर्जा) है योग के अनुसार स्थूल शरीर (अन्नमय कोष) का पोषण सूक्ष्म शरीर (प्राणमय कोष) द्वारा होता है जिसमें चक्र और नाड़ियां होती हैं। यह नाड़ियां प्राण को ले जाती हैं जो चक्र को उत्तेजित करती हैं और इस तरह विभिन्न अंगों और प्रणालियों को पोषण देती है और मानव शरीर में सभी शारीरिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं।
एक शोध के अनुसार नाड़ी शोधन प्राणायाम के 20 मिनट के अभ्यास का प्रभाव श्रवण प्रतिक्रिया समय में महत्वपूर्ण परिवर्तन के साथ-साथ हृदय गति परिवर्तनशीलता को कम करने के लिए पाया गया और कार्डियोरेस्पिरेटरी मापदंडों में सुधार देखा गया जो कार्डियोरेस्पिरेटरी दक्षता में वृद्धि का संकेत है। यह खोज इंगित करती है कि नाड़ी शोधन प्राणायाम का अभ्यास रक्तचाप को कम करता है और आवश्यक उच्च रक्तचाप वाले रोगियों में प्रतिक्रिया समय में सुधार करता है।
हमें हमारे शरीर में साइलेंट हार्ट अटैक के संकेत मिलते ही तुरंत सबसे पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए और इस प्रकार के अटैक से बचाव के लिए दैनिक दिनचर्या में सुधार कर योग प्राणायाम को आवश्यक रूप से शामिल करे एवं सात्विक भोजन को अपनी आहारचर्या में शामिल करना चाहिए।
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