एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण सभी की नजरें इन दिनों समुद्री मार्ग खासकर होर्मुज स्ट्रेट की तरफ टिकी है। लेकिन इस बीच एक और बड़ी खबर सामने आयी है। अंडमान सागर में एक दर्दनाक हादसा हो गया, म्यांमार जा रही शरणार्थियों से भरी एक जहाज अचानक पलट गया। इस नाव में रोहिंग्या रिफ्यूजी और बांग्लादेशी नागरिक सवार थे। शुरूआती जानकारी के मुताबिक, इस घटना में 250 से ज्यादा लोग लापता हैं, जिससे चिंता और बढ़ गयी है।
बांग्लादेश कोस्ट गार्ड के मुताबिक, 9 अप्रैल को समुद्र में बहते हुए नौ लोगों को बचाया गया। इनमें तीन रोहिंग्या और छह बांग्लादेशी नागरिक थे। इन्हें बांग्लादेश के जहाज एमटी मेघना प्राइड ने सुरक्षित निकाला।
अधिकारियों ने बताया कि बचाये गये लोगों में आठ पुरुष और एक महिला शामिल थे। बाद में इन्हें टेकनाफ लाकर पुलिस को सौंप दिया गया। यह रेस्क्यू जहाज के क्रू ने खुद किया, क्योंकि हादसा बांग्लादेश के समुद्री इलाके के बाहर हुआ था।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, जहाज में ज्यादा भीड़ और खराब मौसम इस हादसे की वजह हो सकते हैं। वहीं, यूएनएचसीआर और आईओएम ने बताया कि यह ट्रॉलर कॉक्स बाजार के टेकनाफ से बड़ी संख्या में लोगों को लेकर मलेशिया जा रहा था।
एजेंसियों का कहना है कि नाव में ज्यादा भीड़ थी और समुद्र में तेज हवाएं व खराब मौसम था। इसी वजह से नाव का संतुलन बिगड़ गया और वह डूब गयी। अभी तक यह साफ नहीं है कि हादसा ठीक कब हुआ और खोज-बचाव अभियान को लेकर भी कोई पक्की जानकारी नहीं दी गयी है।
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने बताया कि कई लोग विदेश में नौकरी और बेहतर जिंदगी के झूठे वादों में फंसकर ऐसे खतरनाक सफर पर निकल पड़ते हैं, जिससे उनकी जान जोखिम में पड़ जाती है।
बता दें दुनिया भर से मदद की मांग भी तेज हो गयी है। यूएनएचसीआर और आईओएम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए ज्यादा फंड और सहायता देने की अपील की है।
बांग्लादेश में इस समय 10 लाख से ज्यादा रोहिंग्या रह रहे हैं, जो म्यांमार से भागकर आये हैं। एजेंसियों ने कहा कि जब तक इन लोगों के लिए स्थायी समाधान और बेहतर हालात नहीं बनते, तब तक ऐसे जोखिम भरे सफर जारी रहेंगे और हादसे होते रहेंगे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका द्वारा ब्लैकलिस्ट एक विशाल क्रूड आयल टैंकर अमेरिकी नाकेबंदी के बावजूद स्ट्रेट आफ हॉर्मुज को पार कर सुरक्षित ईरान के तट तक पहुंच गया। ईरान के इस दावे ने अमेरिका की समुद्री रणनीति पर सवाल खड़े कर दिये हैं।
भारत में मुंबई स्थित ईरानी महावाणिज्य दूतावास के अनुसायह वेरी लार्ज कू्रड कैरियर अपनी पूरी यात्रा के दौरान ट्रैकिंग सिस्टम चालू रखे हुए था। ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए कहा कि जहाज ने अपनी लोकेशन छिपाने की कोई कोशिश नहीं की और खुलेआम अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र से होकर गुजरा।
दूतावास के मुताबिक, यह सुपरटैंकर लगभग 20 लाख बैरल तक कच्चा तेल ले जाने में सक्षम है। इसके बावजूद अमेरिकी नाकेबंदी इसे रोकने में असफल रही और जहाज बिना किसी नुकसान के अपने गंतव्य तक पहुंच गया।
इससे पहले अमेरिका ने दावा किया था कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य में कड़ी नाकेबंदी लागू कर दी है। इसके तहत ईरान के बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों को रोका जायेगा। इन जहाजों में वो जहाज भी शामिल हैं जिन्होंने ईरान को किसी प्रकार का शुल्क (टोल) दिया है।
अमेरिका का कहना था कि इस नाकेबंदी के जरिए वह ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाना चाहता है, क्योंकि ईरान का लगभग 90% अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्री मार्गों से होता है। ईरान के इस दावे से यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या अमेरिकी नाकेबंदी पूरी तरह प्रभावी है या उसमें खामियां हैं। अगर एक ब्लैकलिस्टेड जहाज खुले तौर पर इस मार्ग से गुजर सकता है, तो यह अमेरिका की रणनीतिक पकड़ पर बड़ा सवाल है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने मार्च 2026 में रूसी कच्चे तेल की बंपर खरीद की है। इस खरीद में तीन गुना से अधिक का उछाल आया है। यह बढ़कर 5.3 अरब यूरो (लगभग 58,229 करोड़ रुपये) रही है। इस बढ़ोतरी के पीछे इंपोर्ट वॉल्यूम यानी आयात मात्रा का दोगुना होना और ग्लोबल तेल कीमतों में उछाल है।
इसने भारत के ऊर्जा आयात के समीकरण दोबारा बदल दिये हैं। यूरोपीय शोध संस्था सेंटर फॉर रिसर्च आॅन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में खरीद में गिरावट के बाद मार्च में भारत ने रूस से तेल की खरीद फिर तेज कर दी।
फरवरी में भारत रूस से ऊर्जा आयात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश था। कुल आयात 1.8 अरब यूरो रहा था। उस समय कच्चे तेल की हिस्सेदारी 81 फीसदी (1.4 अरब यूरो) थी। कोयले की हिस्सेदारी 22.3 करोड़ यूरो और पेट्रोलियम उत्पादों की 12.1 करोड़ यूरो थी। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में चार फीसदी की कमी दर्ज की गयी। लेकिन, रूस से आयात दोगुना हो गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि मार्च में सबसे बड़ा बदलाव सरकारी रिफाइनरियों के आयात में देखा गया। इसमें मासिक आधार पर 148 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
यह आयात मार्च, 2025 की तुलना में 72 फीसदी अधिक रहा। इसका कारण वायदा बाजार में रूसी तेल की अधिक उपलब्धता बताया गया है।
मैंगलुरु और विशाखापत्तनम स्थित सरकारी रिफाइनरियों ने नवंबर, 2025 के अंत में रूस से आयात रोक दिया था। लेकिन, मार्च, 2026 में फिर से खरीद शुरू कर दी। फरवरी में भारत चीन और तुर्किये के बाद तीसरा सबसे बड़ा आयातक था।
रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में रूस से भारत के कच्चे तेल आयात में 19 फीसदी की कमी आयी थी। जबकि कुल आयात में नौ फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी थी। इसके बावजूद रूस फरवरी में भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना रहा। कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 20 फीसदी थी।
सीआरईए ने कहा कि रूस अपने तेल निर्यात के लिए एशियाई बाजारों, खासकर भारत और चीन, पर बहुत ज्यादा निर्भर है। 2026 की पहली तिमाही में रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात का 90 फीसदी हिस्सा इन दोनों देशों को गया।
यूरोपीय संघ (ईयू) की ओर से 21 जनवरी, 2026 से रूसी कच्चे तेल से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध के बावजूद मार्च में ऐसे 14 जहाजों ने यूरोपीय बंदरगाहों पर तेल उत्पाद उतारे, जो रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल करने वाली रिफाइनरियों से जुड़े थे। इनमें से नौ खेप तुर्किये की रिफाइनरियों से, चार भारत से और एक जॉर्जिया से भेजी गयी थीं।
कुछ जहाजों ने कई यूरोपीय बंदरगाहों पर तेल उत्पाद उतारे। फ्रांस मार्च में इन खेप का सबसे बड़ा रिसीवर रहा, जहां चार खेप उतारी गयींं। इसके बाद साइप्रस (तीन खेप) का स्थान रहा। इसके अलावा बेल्जियम, बुल्गारिया, इटली और नीदरलैंड ने भी दो-दो खेप रिसीव कीं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। ईरान में पिछले 45 दिनों से इंटरनेट सेवाएं लगभग पूरी तरह बंद हैं। साइबर निगरानी संस्था नेटब्लॉक्स के अनुसार, देश में नियर ब्लैआउट की स्थिति है और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी 1,056 घंटे से अधिक समय से बाधित है। यह इंटरनेट बंदी उस समय शुरू हुई थी जब यूनाईटेट स्टेट्स और इजराइल ने ईरान पर सैन्य हमले किये थे। इसके बाद से ईरानी सरकार ने बाहरी डिजिटल संपर्क पर लगभग पूरी तरह रोक लगा दी है।
इससे पहले भी जनवरी में सरकार ने देशभर में विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई हफ्तों तक इंटरनेट बंद किया था। मौजूदा ब्लैकआउट ने आम नागरिकों को दुनिया से लगभग काट दिया है। इंटरनेट संकट के साथ-साथ क्षेत्रीय तनाव भी बढ़ता जा रहा है। ईरान ने यूनाईटेट स्टेट्स की उस योजना का कड़ा विरोध किया है, जिसमें उसके बंदरगाहों पर नाकेबंदी की बात कही गयी है।
ईरानी सेना ने चेतावनी दी है कि पर्सियन गल्फ और गल्फ आफ ओमान में सुरक्षा या तो सबके लिए होगी या किसी के लिए नहीं। अगर ईरान के बंदरगाह असुरक्षित हुए, तो क्षेत्र के अन्य बंदरगाह भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। ईरान ने स्ट्रेट आफ हॉर्मूज पर नियंत्रण बनाये रखने की बात कही है। उसने कहा कि दुश्मन देशों से जुड़े जहाजों को गुजरने नहीं दिया जायेगा व अन्य जहाजों को नियमों के अनुसार अनुमति दी जायेगी।
ईरान ने अमेरिका के कदम को गैरकानूनी बताते हुए इसे समुद्री डकैती जैसा बताया है। वहीं यूनाईटेड स्टेट्स सेंट्रल कमांड ने घोषणा की है कि वह 13 अप्रैल से ईरान के बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों पर नाकेबंदी लागू करेगा।
हालांकि, उसने कहा है कि अन्य देशों के जहाजों की आवाजाही को रोका नहीं जायेगा। ईरान इस समय दोहरे संकट से जूझ रहा है। एक तरफ डिजिटल ब्लैकआउट और दूसरी तरफ बढ़ता सैन्य व समुद्री तनाव। यह स्थिति न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बड़ा प्रभाव डाल सकती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क । ग्लोबल लेवल पर दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने सोने पर अपना भरोसा जताया है। The Kobeissi Letter की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 में केंद्रीय बैंकों ने मिलकर लगभग 19 टन सोना खरीदा।
आपको बता दें कि पिछले 23 महीनों से सोने की खरीदारी का यह सिलसिला लगातार जारी है। जनवरी में हुई 6 टन की खरीदारी को मिलाकर, इस साल के शुरुआती दो महीनों में ही कुल 25 टन सोना विभिन्न देशों के रिजर्व में जोड़ा जा चुका है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इजराइल अपने सभी सैन्य और रणनीतिक लक्ष्यों को हर हाल में पूरा करेगा। चाहे वह समझौते के जरिये हो या फिर दोबारा युद्ध शुरू करके। नेतन्याहू ने देश के लोगों की हिम्मत और सेना की बहादुरी की सराहना करते हुए कहा कि इस संघर्ष में इजराइल ने बड़ी जीत हासिल की है।
उन्होंने दावा किया कि ईरान अब पहले से कहीं ज्यादा कमजोर हो गया है, जबकि इजराइल पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में है। उन्होंने उन सैनिकों और नागरिकों को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने इस संघर्ष में अपनी जान गंवायी।
साथ ही, घायल लोगों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की और शोकाकुल परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। इस बयान के बीच जमीनी हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। इजराइल डिफेंस फोर्स ने दावा किया है कि उसने बेरूत में हिज्बुल्लाह के एक बड़े नेता के करीबी सहयोगी अली यूसुफ हर्शी को मार गिराया है।
इसके अलावा, दक्षिणी लेबनान में हथियारों के ठिकानों और सप्लाई रूट्स को भी निशाना बनाया गया है। इजराइल का कहना है कि लेबनान में उसकी कार्रवाई जारी रहेगी, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर में लेबनान शामिल नहीं है।
इस बात को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी स्पष्ट किया है कि ऐसा कोई वादा नहीं किया गया था। इस बीच, इजराइल की कार्रवाई से लेबनान में हालात और खराब हो गये हैं। लगातार हमलों के कारण वहां भारी जनहानि और तबाही की खबरें सामने आ रही हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच कूटनीति तेजी से आगे बढ़ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और एक व्यापक समझौता अब करीब है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि अमेरिका अब ईरान के साथ मिलकर काम करेगा।
उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान में प्रोडक्टिव रेजीम चेंज हुआ है, जिससे सहयोग का नया रास्ता खुला है। उन्होंने सबसे बड़ा दावा करते हुए कहा कि ईरान अब यूरेनियम संवर्धन नहीं करेगा। यह मुद्दा लंबे समय से दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद रहा है। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका और ईरान मिलकर उन परमाणु अवशेषों को हटायेंगे, जो पहले हमलों के दौरान जमीन के अंदर दब गये थे।
उन्होंने कहा कि पूरी स्थिति की निगरानी यूनाईटेड स्टेट्स सैटेलाइट फोर्स के सैटेलाइट सिस्टम के जरिए की जा रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि हमलों के बाद से परमाणु स्थलों को छेड़ा नहीं गया है और स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है।साथ ही ट्रंप ने बताया कि दोनों देशों के बीच टैरिफ और प्रतिबंधों में राहत को लेकर भी बातचीत चल रही है और उनके 15-सूत्रीय प्रस्ताव के कई बिंदुओं पर सहमति बन चुकी है।
इस बीच अमेरिका और ईरान ने दो हफ्तों के लिए सभी सैन्य हमले रोकने पर सहमति जताई है। यह अस्थायी युद्धविराम मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। सबसे अहम बात यह है कि ईरान ने स्ट्रेट आॅफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने पर सहमति दी है। यह मार्ग वैश्विक तेल सप्लाई का प्रमुख रास्ता है, और इसके खुलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार को राहत मिली है।
हालांकि, ईरान ने इस पूरे समझौते को अपनी जीत बताया है। तेहरान का कहना है कि वह अपनी शर्तों पर बातचीत कर रहा है और यह युद्धविराम युद्ध के अंत की गारंटी नहीं है। आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अहम बातचीत प्रस्तावित है, जहां आगे के समाधान पर चर्चा होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह सीजफायर सिर्फ अस्थायी राहत है। कई बड़े मुद्दे खासतौर पर परमाणु कार्यक्रम अभी भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत के आम परिवारों से लेकर सूक्ष्म, लघु और मंझोले उपक्रमों तथा खासतौर पर उर्वरक उत्पादन को एलपीजी और प्राकृतिक गैस की कमी जिस प्रकार प्रभावित कर रही है, उसे देखते हुए यह जानने की मेरी उत्सुकता बढ़ गयी कि भारत से पांच गुना सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वाला देश चीन इतना शांत कैसे नजर आ रहा है। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उसने समझदारी बरती जबकि हम पूरी तरह बेपरवाह रहे। हमारी तरह चीन भी बहुत हद तक तेल और गैस के आयात पर ही निर्भर है लेकिन हमारे उलट वहां घबराहट के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं।
हमें पता है कि चीन अपनी गैस और कच्चे तेल का बहुत बड़ा हिस्सा रूस से पाइपलाइन से हासिल करता है। क्या वह पर्याप्त है? हमारे यहां तो घबराहट का माहौल है क्योंकि खरीफ की बोआई की तैयारियों के बीच उर्वरक को लेकर अनिश्चितता है जबकि चीन शांत है। वह अपनी जरूरतों को लेकर तो आश्वस्त है ही बल्कि निर्यात प्रतिबद्धता को लेकर भी निश्चिंत है। हम भी चीन से उर्वरक आयात पर निर्भर करते हैं।
पूर्वी लद्दाख-गलवान संकट के बाद उर्वरक आपूर्ति रोके जाने की कड़वी स्मृतियां हमारे पास हैं। हालांकि चीन ने फिलहाल अप्रत्याशित स्थिति को कारण बताकर खाद के अपने निर्यात से इनकार नहीं किया है। इसकी वजह तब सामने आई जब मैंने अपने दायरे से बाहर जाकर शोध किया। वास्तविकता ने मुझे सदमे में डाल दिया। यह सदमा चीन की कामयाबी को लेकर भी था और अपने आम चलताऊ रवैये को लेकर भी था बातें ज्यादा और नतीजा मामूली।
कुछ कटु सत्य इस प्रकार हैं। चीन के पास कुछ ही गैस क्षेत्र हैं इसके बावजूद वहां पर्याप्त गैस है। ऐसा इसलिए क्योंकि चीन ने कोयले से गैस बनाने में धैर्यपूर्वक पूंजी, कौशल और तकनीक का निवेश किया। अब वह इसके वैश्विक उत्पादन का आधे से अधिक उत्पादित करता है। भारत और चीन ने इस विचार पर लगभग एक ही समय काम करना शुरू किया था लेकिन चीन के सालाना 8 करोड़ टन का हम केवल 3 से 5 फीसदी ही उत्पादन कर पा रहे हैं।
चीन गैस बनाने के लिए सालाना करीब 34 करोड़ टन कोयले का इस्तेमाल करता है जबकि हम इसका केवल 1.4 फीसदी ही इस्तेमाल में लाते हैं। साल 2007 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने कोयला आधारित मीथेन गैस को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कीं और रानीगंज में एक छोटा सा संयंत्र भी लगाया। उसके बाद से यह विचार ठंडे बस्ते में ही पड़ा है।
संपग्र के कार्यकाल में कोयले की बदनामी भी हुई। कोविड प्रेरित सुधारों के दौर में 2020 में मोदी सरकार ने एक अति महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन की शुरुआत की। मैं अति महत्त्वाकांक्षी शब्द का इस्तेमाल बहुत सावधानीपूर्वक कर रहा हूं क्योंकि इसके तहत 2030 तक सालाना 10 करोड़ टन कोयला गैसीकरण का लक्ष्य था। इसके लिए 4 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जाना था।
10 करोड़ टन सालाना के साथ हमारा कोयला गैस उत्पादन चीन से 25 फीसदी अधिक होता। यह यकीनन जबरदस्त खबर थी।अब इस योजना का छठा साल चल रहा है और कुल उत्पादन बमुश्किल 50 लाख टन सालाना हो सका है। इसमें भी 18 लाख टन जिंदल स्टील ऐंड पॉवर के ओडिशा के अंगुल संयंत्र से आता है। यह नवाचारी आधुनिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करता है और अधिकांशत: आंतरिक खपत में काम आता है।
कोयला मंत्रालय और नीति आयोग की वेबसाइट हमें बताती है कि 64,000 करोड़ रुपये के निवेश वाली सात कोयला गैसीकरण परियोजनाएं मंजूर की जा चुकी हैं। इनमें से तकरीबन सभी सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड के साथ संयुक्त उपक्रम में होंगी लेकिन फिलहाल ये नियमन चक्र में फंसी हैं। मैंने झारखंड के जामताड़ा जिले के कास्टा में ईस्टर्न कोलफील्ड्स (कोल इंडिया की सहायक कंपनी) की भूमिगत कोल गैसीफिकेशन परियोजना के बारे में पढ़ा।
अब तक वहां उत्पादन शुरू हो जाना चाहिए था लेकिन यह कोयला और पर्यावरण मंत्रालयों के बीच विवाद में उलझकर रह गयी। पर्यावरण मंत्रालय का जोर है कि यह परियोजना 300 मीटर गहरी होनी चाहिए। कोयला मंत्रालय इसे 150-160 मीटर रखना चाहता है। परिणाम, वही ढाक के तीन पात। यह जानकर और बुरा लगेगा कि हम अपनी कोयला निकासी को केवल खुले खदान तक सीमित किया है।
हमारा सारा भूमिगत कोयला अप्रयुक्त पड़ा है, जबकि चीनी तीन किलोमीटर भूमिगत जा रहे हैं। कोयला मंत्रालय की वेबसाइट पर दो अच्छे लेख निजी क्षेत्र के समूहों यानी अदाणी और जिंदल से आते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि भारत के पास दुनिया में पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है। वे तकनीकी प्रक्रियाओं को फ्लो-चार्ट्स के साथ समझाते हैं, सुधारों और आवश्यक संसाधनों की सूची देते हैं।
और यकीनन वे रणनीतिक लाभों का भी उल्लेख करते हैं, जिनमें इस समय का पसंदीदा: ऊर्जा आत्मनिर्भरता शामिल है। यह सब बहुत सलीके से प्रस्तुत किया गया है। चीन की तरह हमारे पास भी दूरदर्शिता की कमी नहीं है लेकिन चीन के उलट हम जुबानी जमा खर्च से आगे बढ़कर अमली जामा नहीं पहना सके। कच्चे तेल की कीमतें कम होने के साथ ही हमारी रुचि कम होने लगती है।
हाइड्रोकार्बन के मंदी के दौर में भी चीन ने न तो रुचि गंवायी न ही ध्यान हटाया। उन्होंने कोयले के जरिये ऊर्जा स्वतंत्रता को राष्ट्रीय रणनीतिक लक्ष्य बनाया और हासिल किया। हम हमेशा की तरह राजनीतिक-अफसरशाही-नियामक विश्लेषण में उलझ कर रह गये। हमारे यहां दिक्कत यह है कि लंबी परियोजनाओं के दौरान जैसे ही कीमत कम होती है किसी न किसी भवन में बैठा कोई अफसरशाह उसकी दुहाई देकर काम ठप कर देता है।
इससे निजी क्षेत्र का उत्साह भी जाता रहता है। चीन क्यों कामयाब रहा? उसने इसे रणनीतिक योजना के रूप में देखा और ध्यान बनाये रखा। इससे चीन ऊर्जा संबंधी झटकों से बच सका। कोयला ईंधन के रूप में लोकप्रिय नहीं है लेकिन भारत के पास यही है। कोयले से रसायन बनाना भी प्रदूषणकारी गतिविधि है, लेकिन यह बिजली संयंत्रों में इसे जलाने की तुलना में कहीं कम प्रदूषणकारी है। किसी भी स्थिति में, हमारा बिजली उत्पादन अधिकतर नवीकरणीय स्रोतों की ओर बढ़ रहा है और परमाणु ऊर्जा वापसी के लिए तैयार है।
बिजली उत्पादन के लिए कोयला जलाना भले ही बुरा हो, लेकिन इसे गैस में बदलना कहीं कम बुरा है। सल्फर, जो एक महत्त्वपूर्ण उप-उत्पाद है, उद्योग और उर्वरकों दोनों के लिए बड़ी मांग रखता है। यह भी एक ऐसा रसायन है जिसके लिए हम आयात पर निर्भर हैं। मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं के पास राजनीतिक शक्ति होती है और इसलिए हम ईंधन, एलपीजी, डीजल, पेट्रोल की उपलब्धता या कीमतों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। उर्वरक की कमी इससे भी बड़ा खतरा है क्योंकि यह हमारी खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है।
बस इतना है कि हमारे टीवी चैनल किसानों को लेकर उत्तेजित नहीं होते। खरीफ का मौसम आने वाला है। युद्ध से पहले ही अधिशेष उत्पादन करने वाले राज्यों ने (मुख्यत: आयातित) यूरिया और डाइअमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की राशनिंग शुरू कर दी थी। इन उर्वरकों का उत्पादन करने के लिए गैस और अमोनिया की भारी मात्रा की आवश्यकता होती है। वास्तव में, भारत द्वारा उत्पादित या आयातित प्राकृतिक गैस का 30 फीसदी उर्वरक संयंत्रों में जाता है। अब, झटका देने के लिए, मैं आपको चीन की कहानी बताता हूं।
चीन अपने 90 फीसदी से अधिक अमोनिया का उत्पादन कोयला गैसीकरण से करता है। अमोनिया डीएपी के लिए आवश्यक है। भारत इसका अधिकांश आयात करता है और कमी इतनी गंभीर है कि हताश किसानों द्वारा दंगे या लूटपाट को रोकने के लिए कई राज्य अपनी आपूर्ति पुलिस थानों में रखते हैं और किसानों को उनकी जमीन और आधार-आधारित पंजीकरण के आधार पर आवंटित करते हैं। अब ध्यान दीजिए। चीन कोयले से प्राप्त सिंथेटिक गैस का उपयोग करके दुनिया के कुल यूरिया का 40 फीसदी उत्पादन करता है।
यह दुनिया के कुल मेथनॉल का 54 फीसदी भी बनाता है, जिसमें से लगभग 70 फीसदी कोयले से आता है। और हम अपने उर्वरकों के लिए सबसे अधिक आयात-निर्भर हैं। यहां तक कि चीन जब चाहे इस लीवर को खींच सकता है और हमें परेशानी में डाल सकता है। हम खाद्यान्न आत्मनिर्भरता का जश्न मनाते हैं। सच तो यह है कि हम अपने राष्ट्रीय शर्म को छिपाते हैं। खाद के आयात पर हमारी अतिनिर्भरता जहाज से थाली तक वाली हमारी हैसियत को उजागर करती है। खाड़ी में चल रहे युद्ध ने हमारी इन कमजोरियों से हमारा सामना कर दिया है। चीन ने हमें राह दिखाई है कि दरअसल हमें करना क्या है।
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