एबीएन सेंट्रल डेस्क। नया साल 2026 कई अहम बदलावों के साथ शुरू होने जा रहा है। 1 जनवरी से टैक्स, बैंकिंग, ईपीएफओ, राशन कार्ड और सरकारी कर्मचारियों से जुड़े कई नियमों में बदलाव देखने को मिल सकता है। ये बदलाव आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और खर्चों पर सीधा असर डालेंगे।
अगर 31 दिसंबर 2025 तक पैन कार्ड को आधार से लिंक नहीं कराया गया, तो 1 जनवरी 2026 से पैन कार्ड निष्क्रिय हो सकता है। इसके बाद बैंकिंग, इनकम टैक्स रिटर्न, लोन, निवेश और बड़े लेनदेन में दिक्कत आ सकती है। साथ ही जुमार्ना भी देना पड़ सकता है।
नये साल में टैक्सपेयर्स के लिए राहत की उम्मीद है। सरकार नये इनकम टैक्स बिल के तहत टैक्स स्लैब और नियमों में बदलाव कर सकती है। इससे सैलरीड कर्मचारियों, छोटे कारोबारियों और आम करदाताओं को फायदा मिलने की संभावना है।
1 जनवरी 2026 से बैंकिंग सेक्टर में भी नए नियम लागू हो सकते हैं। अब क्रेडिट स्कोर हर हफ्ते अपडेट होगा, जो पहले 15 दिन में होता था। इसके अलावा एसबीआई, पीएनबी और एचडीएफसी जैसे बैंकों ने लोन और एफडी की ब्याज दरों में बदलाव किये हैं, जिनका असर नये साल से दिखेगा।
नौकरीपेशा लोगों के लिए ईपीएफओ ने विड्रॉल नियमों को आसान कर दिया है। अब निकासी को तीन कैटेगरी में बांटा गया है : जरूरी जरूरतें, घर से जुड़ी जरूरतें और खास परिस्थितियां। इससे कर्मचारियों को यह समझना आसान होगा कि कब और कितना पैसा निकाला जा सकता है।
1 जनवरी के बाद राशन कार्ड से जुड़ी सुविधाएं पूरी तरह आनलाइन हो सकती हैं। नया राशन कार्ड बनवाना, नाम जोड़ना या हटाना और सुधार कराना अब घर बैठे किया जा सकेगा। इससे ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को बड़ी राहत मिलेगी।
सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए 2026 खुशखबरी ला सकता है। उम्मीद है कि 1 जनवरी 2026 से 8वां वेतन आयोग लागू किया जा सकता है। शुरूआती अनुमानों के अनुसार, सैलरी और पेंशन में 20 से 35 फीसदी तक की बढ़ोतरी संभव है।
(नोट: यह खबर सामान्य जानकारी पर आधारित है। सभी बदलाव सरकार की अंतिम अधिसूचना और आधिकारिक ऐलान पर निर्भर करेंगे।)
टीम एबीएन, रांची। शहर में अनाधिकृत निर्माण, अतिक्रमण और बिना वैधानिक अनुमति संचालित व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ रांची नगर निगम ने सख्ती तेज कर दी है। प्रशासक के निर्देश पर नगर निगम क्षेत्र में लगातार निरीक्षण अभियान चलाया जा रहा है।
इसी क्रम में रविवार को वार्ड संख्या–01 के कांके रोड, जवाहर नगर और मिशन गली क्षेत्र में तीन भवनों का भौतिक निरीक्षण किया गया, जहां नियमों के उल्लंघन के गंभीर मामले सामने आये।
निगम ने कहा कि बिना नक्शा पारित कराए किसी भी प्रकार का भवन निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके साथ ही रेजिडेंशियल होल्डिंग में व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन भी नियमों के विरुद्ध है। इसके बावजूद कई स्थानों पर नियमों को दरकिनार कर निर्माण और व्यवसाय संचालित किये जा रहे हैं, जिस पर अब नगर निगम ने कड़ा रुख अपनाया है।
निरीक्षण के दौरान पहले भवन में Innovative Retail Concept Pvt. Ltd. द्वारा व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन पाया गया। लेकिन जांच के दौरान स्वीकृत भवन प्लान प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इससे यह स्पष्ट नहीं हो सका कि संबंधित भवन वैधानिक अनुमति के आधार पर संचालित है या नहीं।
दूसरे भवन में हीरामनी देवी द्वारा सड़क मार्ग पर अतिक्रमण कर निर्माण किए जाने का मामला सामने आया। जांच में यह भी पाया गया कि उक्त निर्माण के लिए कोई वैध नक्शा या अन्य आवश्यक वैधानिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। नगर निगम ने इसे नियमों का गंभीर उल्लंघन माना है, क्योंकि अतिक्रमण से न केवल यातायात बाधित होता है बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा भी प्रभावित होती है।
तीसरा भवन लेक कैसल बिल्डिंग में बिना किसी वैधानिक दस्तावेज के होटल का संचालन किया जा रहा था। निरीक्षण के दौरान यहां भी स्वीकृत भवन प्लान और वैध ट्रेड लाइसेंस उपलब्ध नहीं कराया गया। नगर निगम अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति होटल या किसी भी प्रकार का व्यावसायिक संचालन पूरी तरह गैरकानूनी है।
नगर निगम की टीम ने जांच के दौरान यह स्पष्ट किया कि संबंधित भवनों में संचालित गतिविधियां कमर्शियल होल्डिंग, स्वीकृत भवन प्लान और वैध ट्रेड लाइसेंस के आधार पर हैं या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। इसको लेकर सभी संबंधित व्यक्तियों और संस्थानों को नोटिस जारी किया गया है।
नोटिस में 24 घंटे के भीतर सभी आवश्यक वैधानिक दस्तावेजों के साथ रांची नगर निगम कार्यालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है। नगर निगम ने साफ किया है कि दस्तावेजों की विस्तृत जांच के बाद यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है या आवश्यक कागजात प्रस्तुत नहीं किए जाते हैं।
झारखंड नगरपालिका अधिनियम–2011 और झारखंड भवन उपविधि–2016 के तहत विधि-सम्मत कार्रवाई की जाएगी। इसके तहत संबंधित भवनों को सील करने तक की कार्रवाई की जा सकती है। रांची नगर निगम ने अवैध निर्माण, अतिक्रमण और गैरकानूनी व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति अपनाने की बात दोहराई है।
निगम प्रशासन का कहना है कि शहर को सुव्यवस्थित, सुरक्षित और कानूनसम्मत बनाने के लिए यह अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा। नगर निगम ने आम नागरिकों और भवन स्वामियों से नियमों का पालन करने की अपील की है, ताकि किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई से बचा जा सके।
टीम एबीएन, रांची। अगर आप नगर निकाय चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, तो ये काम जरूर कर लें। नहीं तो आपकी उम्मीदवारी रद हो सकती है। दरअसल, चुनाव आयोग ने निर्देश जारी किया है। इसके तहत अगर आपके नाम पर उस क्षेत्र में नगर निगम या जिला प्रशासन के द्वारा अधिरोपित कोई टैक्स बकाया है, तो उसे समय पर चुका दें और नो ड्यूज सर्टिफिकेट ले लें। नहीं तो नगर निगम चुनाव के लिए आपकी उम्मीदवारी रद कर दी जायेगी।
राज्य चुनाव आयोग ने आने वाले नगर निगम चुनावों को लेकर सभी जिलों को साफ निर्देश जारी किये हैं। आयोग के सचिव राधेश्याम प्रसाद के अनुसार, जिस भी उम्मीदवार पर होल्डिंग टैक्स या किसी भी तरह का कोई और टैक्स बकाया है, उसे बकाया चुकाना आवश्यक है। सभी उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करते समय इस संबंध में एक शपथ पत्र देना करना होगा, यह अनिवार्य है।
काफी जद्दोजहद के बाद राज्य में नगर निकाय चुनाव का रास्ता साफ होता हुआ दिख रहा है। यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो जनवरी के दूसरे सप्ताह तक इसकी अधिकारी घोषणा होने की संभावना है। बैलेट पेपर के जरिए राज्य में पहली बार शहर की सरकार चुनी जायेगी। इसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग तैयारी पूरी करने में जुटी है।
संभावना है कि फरवरी में चुनाव की प्रक्रिया संपन्न कर ली जाये। राज्य में 48 शहरी निकाय क्षेत्र हैं, जिसके तहत नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत के जनप्रतिनिधियों का चुनाव कराया जाना है। वार्डों के आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जल्द ही आयोग के द्वारा अध्यक्ष और मेयर जैसे पदों के लिए आरक्षण को अंतिम रूप दिया जायेगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्र सरकार की गरीबों के लिए महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री आवास में भी भ्रष्टाचार होने लगी है। ताजा मामला झारखंड के हजारीबाग का है। यहां पर हुवाग पंचायत के सचिव प्रभु नारायण सिंह को पीएम आवास योजना में रिश्वतखोरी के आरोप में एसीबी की तीन में गिरफ्तार किया है।
पंचायत सचिव की गिरफ्तारी उस व्यक्त हुई, जब इस योजना में लाभुक से पहली किश्त जारी करने के बदले रिश्वत की रकम ले रहा था। लाभुक की शिकायत के बाद एसीबी ने जाल बिछाया और पंचायत सचिव को दबोचने में कामयाब हुए। इस कार्रवाई के बाद सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गये हैं।
जानकारी के मुताबिक हुवाग गांव निवासी मो. अलीजान अंसारी को पीएम आवास स्वीकृत हुआ था। इस योजना में कई लभुकों को पहली किश्त मिल चुकी थी। लेकिन मो. अलीजान अंसारी को पहली किश्त देने में टालमटोल किया जा रहा था। पंचायत सचिव ने कहा कि बगैर सेटिंग के कैसे भुगतान होगा। तय योजना के अनुसार जैसे ही पंचायत सचिव ने 2500 रुपये की रकम ली, एसीबी की टीम ने मौके पर ही उसे पकड़ लिया।
गिरफ्तारी के बाद आरोपी से पूछताछ की जा रही है और मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की भी जांच की जा रही है। वहीं एसीबी अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी ताकि सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार पर लगाम लगायी जा सके। एसीबी के अधिकारियों ने बताया कि सरकारी योजनाओं में लभुकों को हो रही शिकायत पर हमलोग जांच करते हैं और योजना बना के संबंधित घुसखोर पर कार्रवाई करते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने बाल तस्करी पर गहरी चिंता जतायी है। शीर्ष कोर्ट ने एक फैसले में बाल तस्करी को लेकर कहा कि यह देश में एक बेहद चिंताजनक हकीकत है। आधुनिक गुलामी के सबसे भयावह रूपों में से एक बाल तस्करी है। अफसोस कि सुरक्षा कानूनों के बावजूद संगठित गिरोहों द्वारा बच्चों का यौन शोषण फल-फूल रहा है। सुप्रीम कोर्ट बेंगलुरु में तस्करों के एक गिरोह द्वारा जबरन यौन शोषण की शिकार एक नाबालिग लड़की के मामले की सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरोह के सदस्यों की सजा को बरकरार रखा।
द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने संगठित अपराध नेटवर्क की जटिल और बहुस्तरीय संरचना की ओर ध्यान दिलाया, जो नाबालिग पीड़ितों की भर्ती, परिवहन, आश्रय और शोषण के विभिन्न स्तरों पर काम करते हैं। अदालत ने कहा कि यह अपराध गरिमा, शारीरिक अखंडता और प्रत्येक बच्चे को शोषण से बचाने के राज्य के संवैधानिक वादे की बुनियाद पर चोट करता है। पीठ ने बाल तस्करी के मामलों में पालन किए जाने वाले दिशा-निर्देश निर्धारित किये।
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अपीलकर्ता के वकील ने पीड़िता के बयानों और अभियोजन के मामले को कई आधारों पर चुनौती दी थी।
पीठ ने बच्चे की गवाही सुनते समय अदालतों को संवेदनशीलता और लचीलापन बरतने की आवश्यकता पर बल दिया। पीठ ने कहा कि बच्चे के लिए अपराध की प्रकृति को सटीक और स्पष्ट रूप से बयान करना संभव नहीं हो सकता है। ऐसे में अदालतों को उसके साक्ष्य में मामूली विसंगतियों के कारण उसकी गवाही पर अविश्वास नहीं करना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट तौर पर कहा कि ऐसी पीड़िता किसी भी तरह से अपराध में सहभागी नहीं होती, बल्कि वह एक घायल गवाह की तरह होती है, जिसकी गवाही अपने आप में अहम सबूत है।
पीठ ने यह भी कहा है कि बाल तस्करी का अपराध समाज और संविधान दोनों की बुनियाद पर सीधा हमला है। बच्चों को शिकार बनाने वाली यह व्यवस्था बेहद भयावह, अमानवीय और गहराई तक फैली हुई है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। यौन तस्करी की शिकार खासकर नाबालिग पीड़िता के बयान को पूरी गंभीरता और भरोसे के साथ देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि अदालतों को नाबालिग पीड़िताओं की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कमजोरियों को ध्यान में रखते हुए उनके बयान का मूल्यांकन करना चाहिए। खासकर जब पीड़िता किसी हाशिये पर खड़े या सामाजिक रूप से पिछड़े समुदाय से आती हो। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह उम्मीद करना कि पीड़िता हर बात को बिल्कुल सटीक और क्रमबद्ध तरीके से बतायेगी, व्यवहारिक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन शोषण की भयावह यादों को दोबारा बताना खुद में एक और पीड़ा है, जिसे द्वितीयक पीड़ितकरण कहा जा सकता है। यह पीड़ा तब और गहरी हो जाती है, जब पीड़िता नाबालिग हो और उसे धमकी, बदले का डर, सामाजिक बदनामी और पुनर्वास की अनिश्चितता का सामना करना पड़े। ऐसे में अदालतों को पीड़िता की गवाही को संवेदनशीलता, यथार्थ और मानवीय दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
स्टेट आफ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह (1996) के फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि यदि पीड़िता का बयान विश्वसनीय है, तो केवल उसकी गवाही पर भी सजा दी जा सकती है। पीठ ने पाया कि पीड़िता की गवाही सबसे विश्वसनीय है और एनजीओ कार्यकर्ता, डिकॉय गवाह और स्वतंत्र गवाह ने इसकी पुष्टि की है।
मामला 2010 का है, जिसमें केपी किरणकुमार @ किरण बनाम स्टेट बाय पीन्या पुलिस के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी। 19 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन फैसलों को सही ठहराया जिनमें आरोपियों को कई धाराओं में दोषी पाया गया था।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड हाईकोर्ट में रांची स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार (होटवार जेल) में शराब व जीएसटी घोटाला के आरोपियों का डांस करते वीडियो सामने आने के बाद स्वत: संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने मंगलवार की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को पूरे मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की घटना शर्मनाक है। अदालत अब इस मामले में छह जनवरी को अगली सुनवाई करेगा। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ में इस जनहित याचिका पर सुनवाई हुई।
वरिष्ठ अधिवक्ता धीरज ने बताया कि जेल में नाच प्रकरण के बाद सोशल मीडिया अकाउंट से माफिया एवं सरगनाओं के द्वारा आपराधिक क्रियाकलापों की खबर समाचार पत्रों के माध्यम से आने पर झारखंड उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इसे बहुत ही गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को शपथ पत्र के माध्यम से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
खंडपीठ ने नाराजगी जाहिर करते हुए मौखिक रूप से कहा कि राज्य की एजेंसी के लिए शर्मनाक चिंताजनक स्थिति है। इस मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए छह जनवरी का समय निर्धारित किया गया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। किशोर न्याय प्रणाली का मूल उद्देश्य है—गलती करने वाले बच्चों को दंड के बजाय सुधार और पुनर्वास की ओर ले जाना। लेकिन आज यही प्रणाली भारी बोझ के नीचे दबी हुई है। देशभर के किशोर न्याय बोर्डों में 55,000 से अधिक मामले लंबित हैं, और 50,000 से ज्यादा किशोर फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
यह स्थिति न केवल न्याय प्रक्रिया की कमजोरियों को उजागर करती है, बल्कि उन बच्चों के भविष्य पर भी गहरा प्रभाव डालती है जो जीवन की सबसे संवेदनशील उम्र में न्याय के इंतजार में हैं।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों की संख्या तीन-चौथाई से अधिक है। यह वह उम्र है जब व्यक्तित्व का निर्माण होता है, और किसी भी कानूनी अनिश्चितता का असर जीवनभर उनके साथ चलता है।
2015 में किशोर न्याय अधिनियम में बदलाव कर प्रणाली को मजबूत और अधिक संवेदनशील बनाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन एक दशक बाद भी कानून द्वारा अपेक्षित बुनियादी संरचना तैयार नहीं हो सकी।
लाखों बच्चों का भविष्य केवल इसलिए दांव पर नहीं लगना चाहिए क्योंकि हमारी व्यवस्था समय पर निर्णय लेने में सक्षम नहीं है। 55,000 लंबित मामले सिर्फ एक संख्या नहीं हैं ये वे बच्चे हैं जो जीवन के चौराहे पर खड़े हैं और अपने लिए न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कानून की मंशा तभी पूरी होगी जब किशोर न्याय प्रणाली को संसाधनों, संवेदनशीलता और गति तीनों से सशक्त बनाया जाये। बच्चों का भविष्य इंतजार नहीं कर सकता; व्यवस्था को अब तेजी से जागना ही होगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने पॉक्सो मामलों में बच्चों को न्याय दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक छलांग लगाई है। पहली बार एक वर्ष में दर्ज होने वाले पॉक्सो मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया है। इस मामले में छत्तीसगढ़ शीर्ष पर है जिसने 189 प्रतिशत मामलों का निपटारा किया। साल 2025 में जहां छत्तीसगढ़ में पॉक्सो कानून के तहत 1416 मामले दर्ज हुए, वहीं अदालतों ने 2678 मामलों का निपटारा किया, जिसमें पिछले कई वर्षों से लंबित मामलों का बड़ा हिस्सा शामिल है।
इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) फॉर चिल्ड्रन की रिपोर्ट पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन: अचीविंग द टिपिंग पॉइंट टू जस्टिस फॉर चाइल्ड विक्टिम्स ऑफ सेक्सुअल एब्यूज के अनुसार वर्ष 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80,320 मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का अदालती सुनवाई के बाद निपटारा किया गया। इससे निपटाने की दर 109 प्रतिशत तक पहुंच गई। खास बात यह है कि 24 राज्यों में भी पॉक्सो मामलों की निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक रही है। रिपोर्ट में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) के तहत सभी लंबित मामलों को चार वर्षों के भीतर खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की स्थापना करने की सिफारिश की गई है।
मुकदमों को लेकर अक्सर तारीख पर तारीख की छवि से बदनाम भारत में 2023 तक पॉक्सो के 2,62,089 मामले लंबित थे। लेकिन अब एक अहम बदलाव देखने को मिला है क्योंकि निपटाए गए मामलों की संख्या दर्ज किए गए मामलों से ज्यादा हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां न्यायिक व्यवस्था अब सिर्फ लंबित मामलों को संभालने के बजाय उन्हें सक्रिय रूप से कम करना शुरू कर रही है। साथ ही रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लंबित पॉक्सो मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए चार साल की अवधि में 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें स्थापित की जाएं। इसके लिए लगभग 1,977 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिसमें निर्भया फंड का भी उपयोग किया जा सकता है।
रिपोर्ट कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी ध्यान दिलाती है। जैसे कि राज्यों के बीच मामलों के निपटान की दर में अंतर, दोष सिद्धि की दर में निरंतरता की कमी और लगभग 50 फीसदी मामलों का दो साल तक लंबित रहना। उदाहरण के तौर पर, छत्तीसगढ़ में लंबित मामलों में 3 प्रतिशत 6–10 साल से, 6 प्रतिशत 5 साल से, 14 प्रतिशत 4 साल से, 34 प्रतिशत 3 साल से और शेष 43 प्रतिशत मामले 2 साल से लंबित हैं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि कई मामले वर्षों से लंबित हैं। ये आंकड़े उन मामलों को दिखाते हैं जो कई साल पहले न्याय प्रणाली में दर्ज हुए थे, लेकिन अब तक उनमें कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। रिपोर्ट बताती है, किसी मामले की प्रक्रिया के शुरुआती दौर से ही लंबित रहने की समस्या शुरू हो जाती है और व्यवस्था को तय समय सीमा के भीतर मामलों को आगे बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
न्यायिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में इन आंकड़ों के दूरगामी असर पर बात करते हुए इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक (शोध) पुरुजीत प्रहराज ने कहा, भारत आज बाल यौन शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जब न्यायिक व्यवस्था दर्ज किए जाने वाले मामलों से अधिक पॉक्सो मामलों का निपटारा करने लगती है, तब यह सिर्फ आंकड़ों की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी होती है, जो बच्चों ने व्यवस्था पर खो दिया था। हमारा शोध बार-बार यह दिखाता है कि न्याय में हर दिन की देरी, बच्चे के मानसिक आघात को और गहरा करती है। इसलिए इस गति को बनाए रखना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। ताकि हर बच्चे के लिए समय पर संवेदनशील और बाल-केंद्रित न्याय अपवाद नहीं, बल्कि हक़ीक़त बन सके।
इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन, बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी है। जेआरसी 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ देश के 451 जिलों में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहा है।
राज्यों में देखें, तो सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पॉक्सो के मामलों के निपटान की दर 150 प्रतिशत से अधिक रही है। वहीं, अन्य सात राज्यों में यह निपटारे की दर 121 से 150 प्रतिशत के बीच रही, जबकि 10 राज्यों ने 100 से 120 प्रतिशत तक की निपटान दर हासिल की। इन 24 राज्यों ने न सिर्फ 2025 में दर्ज हुए मामलों का निपटारा किया, बल्कि वर्षों से लंबित मामलों को भी काफी हद तक समाप्त करने में सफलता पाई।
रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि पॉक्सो के लंबित मामलों को शीघ्र निपटाने के मकसद से प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हर साल मामलों के निपटान की दर 100 प्रतिशत से अधिक बनाए रखें। इसके साथ ही जो राज्य न्यायिक प्रक्रिया में पीछे हैं, उन्हें तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाए। साथ ही दोषसिद्धि और बरी होने की दरों की नियमित और बारीकी से निगरानी की जाए। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि मामलों के बेहतर विश्लेषण और दस्तावेजों की त्वरित उपलब्धता के लिए एआई आधारित कानूनी शोध उपकरणों और दस्तावेज प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग किया जाए, ताकि न्याय प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही अधिक तेज व प्रभावी हो सके।
यह रिपोर्ट 2 दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है, जिन्हें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी), नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और लोकसभा में पूछे गए सवालों और उनके जवाबों से लिया गया है।
और जानकारी के लिए संपर्क करें
जितेंद्र परमार
8595950825
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse