मानव सेवा की मिसाल बना सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम, दो असहाय व्यक्तियों को दिया आश्रयअब आश्रम में निराश्रितों की संख्या 45 हुईटीम एबीएन, रांची। परमहंस डॉ. संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के मार्गदर्शन एवं सहयोग से संचालित एमआरएस श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट, रांची के अंतर्गत श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम, पुंदाग द्वारा जनवरी 2024 से मंदबुद्धि, दिव्यांग, मानसिक रूप से अस्वस्थ एवं निराश्रित लोगों की नि:शुल्क सेवा की जा रही है। संस्था जरूरतमंदों को आश्रय, भोजन, चिकित्सा और अपनत्व प्रदान कर मानव सेवा का अनुकरणीय कार्य कर रही है। सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि बुधवार को आश्रम की टीम ने दो असहाय मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों को रेस्क्यू कर आश्रय प्रदान किया। सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति रांची रेलवे स्टेशन के समीप तथा दूसरा नगड़ी के लालगुटवा क्षेत्र में लावारिस अवस्था में भटक रहा है। दोनों की स्थिति अत्यंत दयनीय एवं अस्वच्छ थी। सूचना मिलते ही आश्रम के सेवा साथी मुकुंद यादव, परमेश्वर प्रमाणिक एवं सूरज प्रमाणिक ने तत्परता दिखाते हुए दोनों को सुरक्षित रेस्क्यू किया। इसके बाद अस्पताल में उनकी चिकित्सकीय जांच करायी गयी और उन्हें सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य-प्रेम सभागार) में लाकर आश्रय दिया गया। दोनों व्यक्तियों के नाम, पते एवं परिवार के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिल सकी है। उनकी याददाश्त भी प्रभावित है। आश्रम प्रबंधन ने उनकी देखभाल के लिए एक व्यक्ति का नाम बंसीलाल तथा दूसरे का नाम बंशीधर रखा है। संजय सर्राफ ने बताया कि गुरुजी स्वामी सदानंद जी महाराज के सहयोग से आश्रम में रह रहे सभी निराश्रितों को घर जैसा वातावरण, भोजन, चिकित्सा, स्नेह एवं सम्मान देने का प्रयास किया जाता है। दो दिन पूर्व भी एक निराश्रित को आश्रम में लाया गया था। अब आश्रम में रहने वाले निराश्रितों की संख्या बढ़कर 45 हो गयी है। उन्होंने कहा कि जरूरतमंदों की सहायता करना समाज का नैतिक दायित्व है। मानव सेवा से बढ़कर कोई सेवा कार्य नहीं है। संस्था इसी भावना के साथ निरंतर सेवा कार्य में जुटी हुई है। उक्त जानकारी एम.आर.एस. श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट, रांची के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।
जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर को जितिया मातृप्रेम, त्याग और संतान की दीघार्यु की मंगलकामना का पर्व : संजय सर्राफएबीएन सोशल डेस्क। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति में अनेक पर्व और व्रत ऐसे हैं जिनमें पारिवारिक सुख, संतान की मंगलकामना और मातृप्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इन्हीं महत्वपूर्ण पर्वों में जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया अथवा जिउतिया व्रत भी कहा जाता है, विशेष स्थान रखता है। इस वर्ष जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जायेगा। जीवित्पुत्रिका व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य,सुख-समृद्धि, उन्नति एवं सुरक्षित जीवन की मंगलकामना से करती हैं। यह अत्यंत कठिन व्रत माना जाता है, जिसमें अनेक महिलाएं पूरे दिन और रात्रि तक निर्जला उपवास रखती हैं। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश सहित अनेक क्षेत्रों में यह पर्व विशेष श्रद्धा एवं आस्था के साथ मनाया जाता है। नेपाल में भी यह जितिया व्रत के रूप में लोकप्रिय है। जीवित्पुत्रिका व्रत की प्रसिद्ध कथा राजा जीमूतवाहन, पक्षीराज गरुड़ और नाग शंखचूड़ से जुड़ी है। कथा के अनुसार नागवंश को गरुड़ के भय से बचाने के लिए जीमूतवाहन ने शंखचूड़ के स्थान पर स्वयं को बलिदान के लिए प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ ने जीमूतवाहन को नाग समझकर उठा लिया, किंतु उनके अद्भुत त्याग और परोपकार से प्रभावित होकर सत्य का ज्ञान हुआ। इसके बाद गरुड़ ने नागों को अभय प्रदान किया और पूर्व में मारे गए नागों को अमृत के प्रभाव से पुनर्जीवन मिला। यह कथा त्याग, करुणा, परोपकार, साहस और प्राणीमात्र के प्रति दया का संदेश देती है। इसी कारण जीवित्पुत्रिका व्रत को संतान की रक्षा और दीघार्यु की कामना से जुड़े पवित्र व्रत के रूप में श्रद्धापूर्वक देखा जाता है। व्रती महिलाएं प्रात: स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करती हैं और संकल्प लेकर विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं। भगवान वासुदेव की पूजा, व्रत-कथा का श्रवण तथा पारंपरिक रूप से जीवित्पुत्रिका से संबंधित पूजन किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार पूजा-विधि और प्रसाद में अंतर भी देखने को मिलता है। जीवित्पुत्रिका व्रत केवल उपवास या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां के त्याग, वात्सल्य, विश्वास और संतान के प्रति अटूट प्रेम की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह पर्व परिवार में संस्कार, श्रद्धा और पारस्परिक स्नेह को मजबूत करने का संदेश देता है। माताएं अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और मंगलमय जीवन के लिए कठिन तपस्या करती हैं, जो भारतीय संस्कृति में मातृत्व की गरिमा को रेखांकित करता है। अत: जीवित्पुत्रिका व्रत भारतीय लोकपरंपरा और सनातन आस्था का ऐसा पर्व है, जिसमें मां की प्रार्थना, त्याग और संतान के प्रति असीम स्नेह एक साथ दिखाई देता है। यह पर्व हमें परोपकार, करुणा, संयम और परिवार के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराता है।
सजल श्रद्धा गुरुमाता भगवती देवी का जन्म शताब्दी दिवस साधकों ने श्रद्धा व उत्साहपूर्वक मनायासद्गुरु की कृपा से ही शिष्य को तत्व बोध की प्राप्ति होती है : आजादी सिंहएबीएन सोशल डेस्क (रांची)। अखिल विश्व गायत्री परिवार शान्तिकुञ्ज युग महर्षि वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ गुरुदेवश्री पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी की धर्मपत्नी सजल श्रद्धा, जगत जननी स्वरूपा गुरुमाता भगवती देवी का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्थी को श्रद्धापूर्वक जन्म शताब्दी दिवस 5 कुण्डीय महायज्ञ व दीपयज्ञ विधान सहित सेक्टर टू शक्तिपीठ में मनाया गया। इसके अतिरिक्त धूर्वा बस स्टैंड प्रज्ञापीठ, अलकापुरी शक्तिपीठ, टाटीसिल्वे, बुण्डु तमाड़, खलारी, डकरा, नवाडीह व बेड़ो चरणपीठ तथा प्रज्ञामंडलो में एवं गृहे गृहे परिसरों में गायत्री परिवार के साधक भाई-बहनों ने माताजी के स्थापित मूर्ति व तस्वीर पर श्रद्धा-सुमन पुष्पांजलि अर्पित कर विशेष पूजा-पाठ,गायत्री महामंत्र का विशेष जप और यज्ञीय अनुष्ठान किया गया। सेक्टर टू पीठ पर गुरुमाताजी के जीवन वृतांत पर प्रकाश डालते हुए सहायक जोन समन्वयक आजादी सिंहजी ने शान्तिकुञ्ज से आकर वहां का विशेष संदेश सुनाया। पूरे झारखंड तथा उपजोन रांची के सभी जिलों में समन्वय समितिगठन को, मंडलों व पंचायतों को मजबूत, सशक्त बनाने, इस वर्ष नई दिल्ली, शान्तिकुञ्ज सहित पूरे भारत में मनाए व चलाए जाने वाले जन्म शताब्दी की शान्तिकुञ्ज के अनुयाज कार्यक्रम पर चर्चा की। इस अवसर पर सिंहजी ने कहा कि सद्गुरु की कृपा से ही शिष्य को तत्व बोध की प्राप्ति होती है।सद्गुरु की कृपा अपरंपार होती है। बताया कि उन्होंने ही अपने जीवन काल मे नारी जागरण, युग परिवर्तन के अनेक सूत्रीय आन्दोलन और उज्जवल भविष्य की मंगलमय घोषणा की थी। सबके स्वस्थ जीवन, समाज कल्याण, विश्व कल्याण की मंगल कामनाएँ करते व धन्यवाद देते हुए जिला समन्वयक जेएनपी ने बताया कि *वन्दनीया माता जी की चेतना-सत्ता व जीवन वृत्तान्त की महिमा व महत्ता अवर्णनीय है।कहा कि माताजी ने करोड़ों साधक-शिष्यों को सन्मार्ग पर चलाया और विश्व मंगल हेतु जो महानतम पुरुषार्थ किया वो युगों युगों तक स्मरणीय रहेगा। उनके जीवन वृतांत पर इस वर्ष की सितम्बर माह युग निर्माण पत्रिका के विशिष्ट प्रकाशन पर भी चर्चा की।इस कार्यक्रम के पूर्व संध्या पर हर एक इकाई में अखंड जप-अनुष्ठान किया गया। कई शाखाओं में शाम में आज दीपयज्ञीय कार्यक्रम भी किया गया। साथ ही प्रज्ञा गीत के माध्यम से उद्गार भाव प्रकट किया। आज आनलाइन गायत्री-परिवार अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय स्तर पर सामूहिक अखंड जप-अनुष्ठान व यज्ञीय अनुष्ठान भी किए गए। उक्त जानकारी गायत्री परिवार, रांची शक्तिपीठ सेक्टर टू के जय नारायण प्रसाद और प्रमोद कुमार ने दी।
12 ज्योतिर्लिंग और चार धाम के दर्शन कर कोडरमा पहुंचे अजय विश्वकर्मा404 दिनों की स्केटिंग यात्रा के बाद हुआ जोरदार स्वागत404 दिनों में 19 हजार किमी की स्केटिंग यात्रा पूरी कर लौटे अजय, विश्वकर्मा समाज ने किया स्वागतएबीएन न्यूज नेटवर्क, झुमरी तिलैया। डोमचांच प्रखंड के फुलवरिया निवासी अजय कुमार विश्वकर्मा ने स्केटिंग के जरिए 404 दिनों में करीब 19 हजार किलोमीटर की यात्रा पूरी कर कोडरमा लौटे। कोडरमा पहुंचने पर झुमरी तिलैया स्थित महाराणा प्रताप चौक के श्रीश्री भगवान विश्वकर्मा मंदिर परिसर में विश्वकर्मा समाज के लोगों ने उनका फूल-माला पहनाकर एवं मिठाई खिलाकर जोरदार स्वागत किया।अजय कुमार विश्वकर्मा, पिता संजय विश्वकर्मा, ने अपनी इस अनोखी यात्रा के दौरान देश के 19 राज्यों का भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने स्केटिंग करते हुए 12 ज्योतिर्लिंग और चार धाम समेत कई प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन किए। 404 दिनों तक स्केटिंग के जरिए हजारों किलोमीटर का सफर तय कर वापस लौटना उनके साहस, जुनून और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।अजय विश्वकर्मा ने बताया कि इस यात्रा का उद्देश्य खासकर युवाओं के बीच सकारात्मक और धार्मिक संदेश पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि युवा अपनी बुरी आदतों को छोड़कर धार्मिक एवं अच्छे कार्यों में ध्यान लगाएं और अपने लक्ष्य व भविष्य पर ध्यान केंद्रित करें। उन्होंने कहा कि युवाओं में सकारात्मक सोच और अनुशासन को बढ़ावा देना भी उनकी यात्रा का एक उद्देश्य रहा।कोडरमा लौटने पर विश्वकर्मा समाज के लोगों ने अजय की इस उपलब्धि की सराहना की। समाज के लोगों ने कहा कि उनकी यह यात्रा समाज के साथ-साथ क्षेत्र के युवाओं के लिए भी प्रेरणादायक है। अजय ने अपनी मेहनत, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर यह अनोखी यात्रा पूरी की है।स्वागत कार्यक्रम में सूरज विश्वकर्मा, कामेश्वर विश्वकर्मा, आतिश ओबेरॉय उर्फ सोनू विश्वकर्मा, विपिन विश्वकर्मा, राजन विश्वकर्मा, कृष्णा विश्वकर्मा, विशाल विश्वकर्मा, विनोद विश्वकर्मा, मनोहर विश्वकर्मा, मनोज विश्वकर्मा, हीरो विश्वकर्मा, छोटेलाल विश्वकर्मा, परवीन विश्वकर्मा, धर्मेंद्र विश्वकर्मा, दिलीप विश्वकर्मा और चंदन विश्वकर्मा समेत विश्वकर्मा समाज के कई लोग मौजूद थे।
कोडरमा : आईलेक्स मल्टीप्लेक्स में युवाओं ने देखी हनुमान अंश फिल्मआईलेक्स मल्टीप्लेक्स में हनुमान अंश फिल्म का विशेष प्रदर्शन, युवाओं को मिला संस्कार और सेवा का संदेशएबीएन न्यूज नेटवर्क, झुमरी तिलैया (कोडरमा)। उजाला कॉम्प्लेक्स स्थित आईलेक्स मल्टीप्लेक्स में संत नीम करौरी बाबा के जीवन एवं उनके आध्यात्मिक विचारों से प्रेरित फिल्म हनुमान अंश का विशेष प्रदर्शन किया गया। इस अवसर पर अग्रवाल समाज के बड़ी संख्या में लोग अपने परिवार के साथ फिल्म देखने पहुंचे। कार्यक्रम में बच्चों, युवाओं, महिलाओं एवं बुजुर्गों की उत्साहपूर्ण सहभागिता देखने को मिली। विशेष रूप से बच्चों एवं युवाओं में फिल्म को लेकर काफी उत्साह नजर आया।फिल्म प्रदर्शन से पूर्व श्रद्धालुओं द्वारा सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ किया गया। इसके पश्चात विधिवत आरती की गयी और भगवान हनुमान के जयकारों के बीच फिल्म का शुभारंभ हुआ। आध्यात्मिक वातावरण और पारिवारिक माहौल ने पूरे कार्यक्रम को विशेष बना दिया।कार्यक्रम के प्रायोजक व संयोजक मुकेश भालोटिया ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य केवल फिल्म का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि समाज में भगवान हनुमान के प्रति श्रद्धा एवं भारतीय संत परंपरा के प्रति प्रेम को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति, संस्कार एवं आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ना बेहद आवश्यक है। फिल्म के माध्यम से युवाओं में सेवा, संस्कार, सदाचार, अनुशासन और सकारात्मक जीवन-दृष्टिकोण को विकसित करने का संदेश देने का प्रयास किया गया। कार्यक्रम के परियोजना निर्देशक अरविंद चौधरी ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के सामने अनेक चुनौतियां हैं। ऐसे में भारतीय संस्कृति और संत परंपरा से जुड़े प्रेरणादायी प्रसंग उन्हें सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि फिल्म के माध्यम से युवाओं को अच्छे विचारों को अपने जीवन में अपनाने, माता-पिता एवं गुरुजनों का सम्मान करने, जरूरतमंदों की सहायता करने तथा समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझने का संदेश देने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि संत नीम करौरी बाबा का जीवन सेवा, सरलता, भक्ति और मानव कल्याण की प्रेरणा देता है। हनुमान अंश के माध्यम से इन्हीं जीवन मूल्यों को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।फिल्म के दौरान मल्टीप्लेक्स का माहौल पूरी तरह आध्यात्मिक एवं पारिवारिक नजर आया। समाज के बुजुर्गों के साथ युवा-युवतियां और बच्चे भी एक साथ फिल्म का आनंद लेते दिखाई दिये। कई दर्शकों ने फिल्म के प्रेरणादायी प्रसंगों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी फिल्मों के माध्यम से मनोरंजन के साथ-साथ संस्कार एवं सकारात्मक सोच का संदेश भी समाज तक पहुंचता है।मौके पर अग्रवाल समाज के अध्यक्ष कैलाश चौधरी, सचिव संजीव खेतान, जयंती संयोजक मनोज पिलानिया, अंकित चौधरी, सारिका लड्ढा, नेहा हिसारिया ने कहा कि हनुमान अंश केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, भक्ति और सेवा भाव से जुड़ा प्रेरणादायी संदेश है। उन्होंने कहा कि फिल्म के माध्यम से भगवान हनुमान के आदर्शों तथा संत परंपरा के जीवन मूल्यों को समाज और विशेषकर युवाओं तक पहुंचाने का सराहनीय प्रयास किया गया है।कार्यक्रम में श्याम सुंदर सिंघानिया, महेश दारूका, जगदीश संघई, दीपक सिंघानिया, मनोज केंडिया, मुन्ना सुल्तानिया, दीनदयाल केडिया, संजय दारूका, सुजीत परशुरामपुरिया, संजय खेमानी, सुरेंद्र गुप्ता, संजीव अग्रवाल, रवि केडिया, रमेश भालोटिया, संजय अग्रवाल, राकेश सुरेका, मनोज लड्ढा, गोपाल मोदी, सुनील लोहिया, प्रदीप बंसल, प्रेम फतेसरिया अनूप सरावगी, विनीत संघई, आयुष पोद्दार, सोनु भालोटिया, बबीता केडिया, ज्योति संघई, उमा बजाज, शालु चौधरी, मिहिर खेतान, हर्षित सिंघानिया, विजय बजाज, अंकित खेतान, केशव चौधरी, अमित सिंघानिया सहित कई लोग उपस्थित थे।कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालु भक्तों के बीच हनुमान चालीसा की पुस्तिकाएं एवं प्रसाद वितरित किया गया। उपस्थित लोगों ने भगवान हनुमान के जयकारे लगाये और समाज में सेवा, संस्कार एवं सद्भावना को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।आयोजकों ने कहा कि ऐसे आयोजन भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिक मूल्यों को नयी पीढ़ी से जोड़ने के साथ-साथ परिवार और समाज के बीच आपसी जुड़ाव को भी मजबूत करते हैं। हनुमान अंश का यह विशेष प्रदर्शन झुमरी तिलैया में भक्ति, संस्कार और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला एक यादगार आयोजन बन गया।
संपूर्ण समाज को जोड़ना ही सेवा कार्य का उद्देश्य : गुरुशरण प्रसाद टीम एबीएन, रांची। सेवा भारती, झारखंड का तीन दिवसीय सेवा सारथी कार्यशाला सह किशोरी विकास प्रशिक्षण वर्ग सेवा धाम, जोन्हा,रांची में सपन्न हुआ। समापन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय सेवा भारती के न्यासी गुरुशरण प्रसाद ने कहा कि अपने प्रेम और व्यवहार से संपूर्ण समाज को जोड़ने के लिए सेवा कार्य किया जा रहा है। सेवा आयाम स्वयं सहायता समूह शक्ति का केंद्र है। सेवा भारती के सेवा सारथी इसे अधिक बलशाली और परिणामकारी बना रहे हैं। आज प्रत्येक महिलाओं के हाथ में कौशल,कोई न कोई कला होना आवश्यक है। मौके पर उन्होंने किशोरियों को अनावश्यक मोबाईल उपयोग से बचने की बात कही साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यक्तिगत रूप से एक पेड़ लगाने,जल बचाव एवं स्वच्छता पर अधिक ध्यान आकृष्ट किया। कार्यशाला में बीसीसीएल के पूर्व सीएमडी अजय सिंह ने योगासन और ध्यान मुद्रा के विभिन्न प्रकार का अभ्यास कराया। वर्ग में सेवा सारथी कार्यकर्ताओं ने अपने क्षेत्र में कार्य विस्तार की योजना बनायी। समापन कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन देते हुए सेवा भारती की न्यासी सोनी मेहता बताया कि अपनी घर- गृहस्थी देखते सेवा भारती के सेवा सारथी विभिन्न सेवा कार्यों के रथ को निरंतर आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। तीन दिवसीय कार्यशाला में राष्ट्रीय सेवा भारती की न्यासी श्रीमती शिल्पा वर्णेकर, प्रांत प्रशिक्षण प्रमुख रमाकांत दूबे आदि कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस वर्ग में सेवा सारथी, किशोरी एवं प्रमुख कार्यकर्ताओं सहित 95 की संख्या थी।
टीम एबीएन, रांची। मदन मोहन मंदिर की स्थापना काल क्या है तथा कितने दिनों में यह मंदिर बनकर तैयार हुआ, इन तिथियों की जानकारी स्पष्टत: मंदिर में रखे शिलापट्ट में उत्कीर्ण शिलालेख से मिलती है। यह शिलालेख प्रवेश द्वार के ठीक सामने मंदिर के चबूतरे पर गर्भगृह की दीवार के दक्षिणी भाग में रखा देखा जा सकता है। दो शिलालेखों में ये तथ्य लिखे मिलते हैं। इनके अतिरिक्त गर्भगृह के दरवाजे पर उत्कीर्ण दिन-तारीख तथा राजा द्वारा प्रदत्त ताम्रपत्र जो लक्ष्मीनारायण तिवारी को प्राप्त हुआ था, साक्ष्य के रूप में मौजूद हैं। इन्हीं आधारी तथ्यों का उल्लेख विभिन्न पुस्तकों में भी दिखाई पड़ता है जैसे-डिस्ट्रिकट गजेटियर, रांची मुंडाज एंड देयर कंट्री, बिहार थ्रू एजेज, छोटानागपुर का इतिहास, लिस्ट आॅफ मोनुमेंटस इन दि छोटानागपुर, छोटानागपुर के प्राचीन स्मारक और झारखंड की रूपरेखा तथा झारखंड का भूगोल आदि पुस्तकें उल्लेखनीय हैं। प्रस्तुत है क्रमश: शिलालेखों की पंक्तियां एक शिलालेख जो छोटी आकृत्ति में है, इसमें निम्न पंक्तियां उत्कीर्ण हैं : श्री राम राज्य। संवत सत्रह सइ बाइस। बैशाख सुदि दशमी रजनीश। श्री रघुनाथ नरेश विराज। लक्ष्मी नारायण ईश्वर माठसाज। दूसरे शिलालेख की पंक्तियां निम्नवत हैं : श्री मदन मोहन जी : शुभ संवत 1722 समय वैसाख सुदी दशमी 10 के श्रीश्री मदन मोहनक शुभा दावा देयाल श्री संवत 1725 समय सावन सुदी दशमी 10 के दरवाजा और छरदेवाली दावा देल तैयार भेल संवत 1739 तेकर लगीत भेल रूपैया 14001 चौदह हजार एक रूपैया। ताकर हिन्दू मठ दरयाज छारदेयाली ढहायाय से गाइक रक्त पीयय ब्रह्मण मारलेक हत्या गुरू मारलेक हत्या ताकर हए। मुसलमान मय मठ दरयाज छारदेवाली ढाहायाय से सूअर खाए आखुर मारलक ओ पीरक धारा शुअर कहरा डारलक दोष तेहि-मुसलमानक (हए) तेयारी लक्ष्मीनारायण भगवत इ विनति लिखाय राखल हय। कारीगर अनिरूद्ध विनती सांच हय उपर्युक्त पंक्तियों की सरल व्याख्या आवश्यक है। शिलालेख में श्री राम राज्य लिखने का तात्पर्य आरंभिक संबोधन तो माना जा सकता है लेकिन यह भी संकेत मिलता है कि मंदिर का निर्माण औरंगजेब काल में भी निर्विघ्न संपन्न होना। निश्चय ही बोड़ेया और आसपास का वातावरण शांतिपूर्ण रहा होगा। नागवंशी राजा का काल मुगल सल्तनत के आतंक से दूर रहा होगा और यहां मंदिर निर्माण में पंडित लक्ष्मी नारायण तिवारी को निष्कलंक, निष्कंटक और निश्शंक व विमल परिवेश मिला होगा। आगे यह लिखा गया है कि मंदिर की नीव का शुभारंभ संवत 1722 (1665 ई.) के वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को किया गया। इस अवसर पर राजा रघुनाथ शाही उपस्थित थे। लक्ष्मी नारायण तिवारी ने नींव रखी। दूसरे शिलालेख में यह स्पष्ट किया गया है कि मदन मोहन मंदिर की नीव 1722 संवत (1665 ई.) में वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी को रखी गयी थी। संवत 1725 (1668 ई.) के श्रावण शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को अर्थात् तीन वर्ष तीन माह के बाद चारदीवारी एवं दरवाजे की नींव रखी गयी थी। मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ संवत 1739 (1682 ई.) में। अर्थात् मंदिर को बनकर पूर्ण होने में कुल सत्रह वर्ष लगे। कहीं-कहीं इस लेखन का यह अर्थ निकाला गया है कि मंदिर का निर्माण तीन वर्ष में पूरा हो गया जबकि चारदीवारी पूर्ण होने में 14 वर्ष लगे। लेकिन ठीक से शिलालेख पढ़ें तो अर्थ स्पष्ट है कि 1665 में मंदिर की नींव पडी, 1668 में चारदीवारी की नींव पडी और 1672 ई. में ये सब पूर्ण हुए। मंदिर के निर्माण में कुल 14001 (चौदह हजार एक रुपये) की लागत आयी। शिलालेख की आगे की पंक्तियों से यह ज्ञात होता है कि तत्कालीन हिन्दुस्तान के शासक औरंगजेब की कट्टर धर्मांधता से मंदिर निर्माता लक्ष्मी नारायण तिवारी जरूर परेशान हुए होंगे। उनके मन में मंदिर को क्षति पहुंचाने की शंका अवश्य उत्पन्न हुई होगी। यही कारण है कि उन्होंने शिलालेख में शपथ लिखवाया कि जो कोई भी हिंदू मंदिर के दरवाजे और चारदीवारी को किसी भी प्रकार से ढाहने का अर्थात नुकसान पहुंचाने का प्रयत्न करेगा उसे गाय के रक्त पान का, ब्राह्मण हत्या का और गुरू की हत्या का पाप लगेगा। अगर कोई मुसलमान होकर मंदिर के दरवाजे, चारदीवारी को ढाहने का या किसी तरह के नुकसान पहुंचाने का प्रयास करेगा तो उसे सूअर खाने का, आखुर (सुअर) मारने का और किसी पीर की थाली में सूअर मांस परोसने का घोर पाप लगेगा। यह निवेदन लक्ष्मी नारायण तिवारी ने लिखवाया है। मंदिर का कारीगर अनिरूद्ध भी कहते हैं कि यह लिखा सत्य है। इस प्रकार शिलालेखों में अंकित तिथियों से ज्ञात होता है कि मदन मोहन मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था। यह औरंगजेब का शासन काल था तथा छोटानागपुर में इस समय राजा रघुनाथ शाही विराजमान थे। नागवंशी राजाओं की राजधानी इस समय खुखरा से ढोइसा गढ़ में स्थापित की जा चुकी थी। इस प्रसंग में लक्ष्मी नारायण तिवारी को राजा द्वारा प्रदत्त ताम्रपत्र का उल्लेख करना आवश्यक है। ताम्रपत्र अभी भी बोड़ेया के तिवारी परिवार में उपलब्ध है। यह अभी दो टुकड़ों में देखा जा सकता है। प्रस्तुत है ताम्रपत्र में उल्लेखित पंक्तियों का हू-ब-हू अनुकृति या प्रतिलिपि श्री राम नागवंशी राजाओं की खुदी हुई राजमुहर मुहर की बगल में लिखा है श्री मदन मोहन संवत 1733 साल समै माघ सुदी 13 रोज सुभदी न व्रीत पत्र लीखते भसोसती श्री प्रबल प्रतापों उदीत परताप ताप सम्पन्न महाराजाधीराज श्री रघुनाथ शाहीदेव तेवारी श्री लक्ष्मी न्याराऐनक ठाकुर श्री श्री देवा कही देवोत्रव्रीत के देल मौजा बोड़ेया पहिले तेवारीक ब्रीत हए से गांव फेरीक श्री श्री कही हम व्रीति के देल जलकर पतकर गाछ माछ प्रजा पुर चतुर सीमा बेतलव के देल देल दीनहुजुदन समस्त बाते जे पेल हीन्दु होएपेले तो गाए खाए तुरूक होएपेले सुअर खाए इअथे साख्खी महाराज कुमार ठाकुर श्री इन्दु साही ब्रह्मचारी गोसाई श्री हरीनाथ तथा काजी श्री जानकी रामदास तथा ठाकुर श्री चतुरभुज राय तथा श्री पुरोहित गनपति तथा पंडे श्री बलपति राय तथा पान्डे श्री लक्ष्मी रामदास तथा बीरभद्र दास तथा भंडारी श्री लालराय दास खात अखौरी श्री वंशीदास साखी गणेश पंडित मोकाम डोइसानगर साखी बेनीदत्त ठाकुर साखी तेवारी रामजीठ साखी गुरू विधनेश। उपर्युक्त ताम्रलिपि का अर्थ निम्नवत है संवत 1733 (1682 ई.) के माघ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के शुभ दिन में यह वृत्तिपत्र लिखा जा रहा है कि प्रबल प्रतापी महाराजा श्री रघुनाथ शाही ने श्री लक्ष्मी नारायण तिवारी के ठाकुर श्री को श्री देवता कहकर देवोत्तर में पूर्व से प्राप्त बोड़ेया ग्राम तिवारी जी की वृत्ति है जिसे फिर से वृत्ति (भरण-पोषण हेतु धन) के रूप में जल, वृक्ष, प्रजा, गांव के चारों सीमा तक बिना मांगे प्रदान किया। दिये हुए सभी बातों से कोइ मना करे तो हिन्दु को गौ खाने के तथा मुसलमान को सूअर खाने के समान होगा। इसमें साक्षी हैं महाराज कुमार ठाकुर इंदु शाही, ब्रह्मचारी गोसाई श्री हरिनाथ तथा काजी और श्री जानकी राम दास, ठाकुर श्री चतुर्भुज राय, पुरोहित श्री गणपति, पांडे श्री बलपति राय, पांडे श्री लक्ष्मी राम दास, वीरभद्र दास, भंडारी श्री लाल राय दास, पत्र अखौरी श्री वंशीदास, साक्षी गणेश पंडित ग्राम डोइसानगर, साक्षी बेनीदत्त ठाकुर, साक्षी तेवारी रामजीठ, साक्षी गुरू विघ्नेश। यह ताम्र पत्र महाराजा ने लक्ष्मीनारायण तिवारी को उस समय सौंपा था जब मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा था। इस ताम्र पत्र प्राप्ति के छ: वर्ष उपरांत मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ था। यह भी प्रमाणित होता है कि लक्ष्मीनारायण तिवारी का संपर्क राजाओं से था और राजाओं को यहाँ के मंदिर निर्माण की सूचना थी। नागवंशी राजाओं का काल देखा जाए तो 45वें राजा दुर्जनशाल ने डोइसा में राजधानी बसायी थी। इनका राजकाल था 1550 ई. से 1590 ई. तक। इसके वाद 48वें राजा के रूप में रामशाह 1646 ई. से 1670 ई. तक रहे। यहाँ 1665 ई. में मंदिर का निर्माण आरम्भ हुआ था। 49वें राजा थे रघुनाथ शाही जिनका राजकाल था 1671 ई. से 1706 ई.। इसी समय 1682 ई. में मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ था । मंदिर का आकार / शिल्प मदन मोहन मंदिर की भव्यता का आभास इसके आकार के विवरण से ही प्राप्त होता है। प्रस्तुत है क्रमश: चारदीवारी या परकोटे, प्रवेश द्वार, चबूतरा, गर्भगृह, गर्भगृह का द्वार, गुम्बद आदि का विवरण : चारदीवारी / परकोटा मदन मोहन मंदिर के चारों ओर 3 फीट 5 इंच मोटी दीवार दी गयी है जिसे चारदीवारी या परकोटा कहा जाता है। इस परकोटे की लंबाई बाहर से उत्तर दक्षिण 76 फीट (115 कड़ी) तथा पूरब पश्चिम लम्बाई 112 फीट (170 कड़ी) है। मंदिर परिसर परकोटे के अनुसार 8512 वर्ग फीट अर्थात 19.54 डिसमिल क्षेत्र में विस्तृत है। ये हैं आकर्षण का केंद्र प्रवेश द्वार मंदिर का चबूतरा स्तंभ गर्भगृह गर्भगृह की ऊंचाई शिखर जलकूप तुलसी मंच मंदिर का पश्चभाग प्रसाद गृह डोल चबूतरा कलुआ महादेव विग्रह / मूर्ति
रांची : एक असहाय मंदबुद्धि व्यक्ति को लाया गया सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रमटीम एबीएन, रांची। परमहंस डॉ संत शिरोमणी स्वामी सदानंद जी महाराज के द्वारा संचालित एम.आर.एस श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट राँची के अंतर्गत काम कर रही सामाजिक संस्था श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम पुंदाग में चल रहे मंदबुद्धि, दिव्यांग, निराश्रितों लोगों की निःशुल्क सेवा संस्था जनवरी 2024 से लगातार कर रही है। सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि सोमवार को एक मंदबुद्धि असहाय व्यक्ति को आश्रम में लाया गया। जो मानसिक रोगी है।आश्रम की टीम को सूचना मिली कि एक असहाय मंदबुद्धि व्यक्ति रांची के रातू रोड नजदीक लावारिस अवस्था में घूम रहा है। जो की बहुत ही अस्वच्छ अवस्था में था, आश्रम की टीम ने उस व्यक्ति को रातू रोड के पास से रेस्क्यू करके आश्रम लाया। टीम में आश्रम के सेवा साथी मुकुंद यादव,परमेश्वर प्रमाणिक एवं सूरज प्रमाणिक शामिल थे। उसके बाद अस्पताल में उसकी मेडिकल जांच कराई गई। बाद में सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य प्रेम सभागार) मे लाया गया। उस व्यक्ति का नाम और पते की कोई जानकारी नहीं मिली है। याददाश्त भी खो चुके थे,आश्रम कमेटी ने उस व्यक्ति का नाम मनमोहन रखा है।आश्रम की टीम को सूचना मिलने पर समय-समय पर जरूरतमंदों को रेस्क्यू किया जाता है।प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि आश्रम में रह रहे इन सभी निराश्रितो को गुरुजी सदानंद जी महाराज के सहयोग से घर जैसा माहौल देने की कोशिश की जाती है। आश्रम में अब निराश्रितों की संख्या 43 हो गया है। उन्होंने कहा कि मानव सेवा से बढ़कर कोई सेवा कार्य नहीं है।
रुक्मिणी विवाह से सुदामा चरित्र तक गूंजा भक्ति का स्वर, श्रीमद्भागवत कथा की पूर्णाहुतिसात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का हुआ समापनसच्ची भक्ति में श्रद्धा, विश्वास और पूर्ण समर्पण का है विशेष महत्व: साध्वी गोपिका जीएबीएन सोशल डेस्क। डॉ संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के पावन सानिध्य में एम.आर.एस. श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा रांची के पुंदाग स्थित श्री राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर में श्री राधाष्टमी महोत्सव के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का शनिवार को श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ समापन हुआ। कथा के सप्तम एवं अंतिम दिवस वृंदावन की सुप्रसिद्ध कथा वाचिका साध्वी गोपिका जी ने श्री रुक्मिणी विवाह, कंस उद्धार तथा भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की अद्भुत मित्रता के प्रसंगों का भावपूर्ण एवं विस्तृत वर्णन किया।कथा के दौरान साध्वी गोपिका जी ने बताया कि रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य एवं पति मानकर पूर्ण समर्पण भाव से उनका स्मरण किया। भगवान श्रीकृष्ण ने भक्त की पुकार स्वीकार करते हुए रुक्मिणी जी का हरण कर उनसे विवाह किया। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति में श्रद्धा, विश्वास और पूर्ण समर्पण का विशेष महत्व है। इसके पश्चात कंस उद्धार का प्रसंग सुनाते हुए साध्वी गोपिका जी ने भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा आगमन तथा अत्याचार के प्रतीक कंस के अंत का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जब अधर्म बढ़ता है, तब धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर का अवतार होता है। इसके बाद श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता का मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मित्रता में प्रेम, समानता, आत्मीयता और निस्वार्थ भाव की महत्ता बताई। निर्धन सुदामा के प्रति भगवान श्रीकृष्ण का प्रेम यह संदेश देता है कि सच्ची मित्रता धन-दौलत और पद-प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि हृदय के भाव से जुड़ी होती है। सभी प्रसंगों के दौरान प्रस्तुत की गई सजीव झांकियों ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। साध्वी गोपिका जी के सुमधुर श्री राधा-कृष्ण भजनों से पूरा मंदिर परिसर भक्तिरस में डूब गया। भजनों के दौरान श्रद्धालु भावविभोर होकर झूमते और भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाते रहे। श्री राधा रानी श्यामा जी का वृंदावन से मंगाए गए जड़ित आभूषणों से अत्यंत आकर्षक एवं मनोहारी श्रृंगार किया गया, जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया। कथा के समापन पर श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ की विधिवत पूर्णाहुति हुई। इसके पश्चात सामूहिक आरती की गई तथा श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। भारी बारिश के बावजूद अंतिम दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए मंदिर पहुंचे। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने कथा वाचिका साध्वी गोपिका जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके मुखारविंद से सात दिनों तक श्रद्धालुओं को श्रीमद्भागवत के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की भावनाओं को देखते हुए अगले वर्ष भी साध्वी गोपिका जी से श्रीमद्भागवत कथा कराने का प्रयास किया जाएगा। इस अवसर पर डूंगरमल अग्रवाल, राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, निर्मल जालान,अरविंद अग्रवाल, विजय अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल,पूरणमल सर्राफ, निर्मल छावनिका, नंदकिशोर चौधरी,अंजनी अग्रवाल, सुरेश भगत, मधुसूदन जाजोदिया, संजय सर्राफ, पवन पोद्दार, दिलीप अग्रवाल,शिव भगवान अग्रवाल,श्याम सुंदर गोयल, ज्ञान प्रकाश शर्मा, विष्णु सोनी, मनीष सोनी, विशाल जालान, विद्या देवी अग्रवाल, बिमला जालान, सुनीता अग्रवाल, संतोष देवी अग्रवाल, उर्मिला पाड़िया, दीक्षा अग्रवाल, शकुंतला केजरीवाल, सरिता अग्रवाल, सुमन चौधरी,रमा देवी डोकानिया, आशा मुंजाल, अमिता जालान, दीपिका मोतिका,नीलम गोयल, नंदरानी पाठक, आशा सिंह, उषा मोदी,ललिता पोद्दार, किरण पोद्दार, शोभा अग्रवाल, इंदू पोद्दार,लाल देवी, किरण बरनवाल, नंद रानी पाठक, सुनीता देवी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिला-पुरुष उपस्थित थे।
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